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सप्तम भाव से विवाह, जीवनसाथी, पार्टनरशिप, नौकरी, मित्रता का विचार किया जाता है जहाँ सूर्य के अपने नीच राशि अर्थात तुला में बैठा होने के कारण से कठिन परिस्थितियों से होते हुए शिक्षा पूर्ण होने के योग बनेंगे तथा जातक/जातिका बुद्धि और विवेक की लघुता से कार्य करेंगे और संतान पक्ष में भी कुछ कमजोरी अनुभव होगी कहने का आशय यह है कि संतान को कष्ट या कुछ मुश्किल से संतान सुख प्राप्ति के योग बनेंगे तथा स्त्री के सुख-स्थान में परेशानी अनुभव होगी साथ ही रोजगार के मार्ग में दिक्कतों से एवं दिमागी परिश्रम से सफलता प्राप्ति के योग बनेंगे व सातवीं दृष्टि से प्रथम भाव अर्थात लग्न को अपनी उच्च राशि मेष में देखने के कारण से देह के कद में कुछ लम्बाई प्राप्त होगी तथा हिर्दय में कुछ छिपा हुआ स्वाभिमान विशेष रहेगा और बुद्धि की युक्ति से मान एवं प्रभाव प्राप्त होगा।
अष्टम भाव से आयु, ससुराल, गूढ़ रहस्य, जीवनसाथी की वाणी का विचार किया जाता है जहाँ सूर्य अपने मित्र मंगल की वृश्चिक राशि में बैठा होने के कारण से शिक्षा कठिन परिस्थितियों से होते हुए पूर्ण होगी तथा संतान पक्ष से कुछ कष्ट अनुभव होगा कहने का आशय यह है कि संतान सुख कुछ कष्ट से प्राप्त होगा या संतान से विवाद बना रहेगा या संतान को कोई कष्ट संभव रहेगा और दिमाग में कुछ परेशानियाँ रहेंगी तथा जीवन की दिनचर्या में प्रभाव रहेगा और और आयुष्य की वृद्धि होगी साथ ही पुरातत्व संबंध में बुद्धि योग द्वारा प्रभाव और चमत्कार रहेगा व सातवीं दृष्टि से दूसरे भाव धन और कुटुंब स्थान में अपने शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देखने के कारण से जातक/जातिका धन के कोष की वृद्धि करने में बहुत प्रयत्नशील रहेंगे किंतु फिर भी धन और कुटुंब की तरफ से कुछ असंतोष युक्त शक्ति प्राप्त होगी।
ज्योतिष में सबसे प्रसिद्ध योगों में पंचमहापुरुष योग का विशेष महत्व है हम सभी जानते हैं कि ज्योतिष में 9 ग्रहों (सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु) की गढ़ना की जाती है जिनमें राहु और केतु को छाया ग्रह की संज्ञा दी गयी है तथा सूर्य और चंद्र को आत्मा व मन का कारक कहा गया है और यह ग्रह स्वम् प्रकाशमान है इनके अतिरिक्त शेष ग्रह (मंगल, बुध, गुरु, शुक्र व शनि) के केंद्र (प्रथम, चतुर्थ, सप्तम व दशम भाव को केंद्र कहते हैं) में स्वराशि या उच्च राशि में बैठे होने से एक अन्य योग का सृजन होता है जिसे पंचमहापुरुष योग कहा जाता है इन पंचमहापुरुष योग के नाम रूचक योग, शश योग, भद्र योग, मालव्य योग व शश योग है जो कि क्रमशः मंगल, शनि, बुध, शुक्र और गुरु से बनते हैं अब ऊपर बताए गए पंचमहापुरुष योग में से किसी एक में उत्पन्न व्यक्ति का स्वरूप या भाग्योदय कैसे होगा बताता हूँ।
रूचक योग:-
रूचक योग
यदि मंगल केंद्र में मेष, वृश्चिक व मकर राशि के होकर बैठे हो तो रूचक नामक पंचमहापुरुष योग बनता है इस योग में जन्मा व्यक्ति बड़े चेहरे वाला, बहुत साहस से धन प्राप्त करने वाला, शूर, बली और शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाला होता है तथा ऐसे व्यक्ति अभिमानी भी होते हैं, मंत्रेश्वर महाराज जी ने कहा है कि ऐसा व्यक्ति अभिमानी प्रकृति का होता है और सेनापति हो (सेनापति से तात्पर्य उच्च पदाधिकारी समझना चाहिए), अपने गुणों के कारण से प्रसिद्ध, कीर्तिमान और प्रत्येक उद्योग में विजयी हो, मानसागरी में कहा गया है कि ऐसे व्यक्ति दीर्घायु, स्वच्छ कांति वाले, साहसी, नीले केश वाले, हाथ-पैर सुडौल, शंख समान कंठ वाले (अर्थात उनकी आवाज कुछ तेज होती है मतलब तेज बोलते हैं), दुष्ट, ब्राह्मण व गुरुओं के आगे विनयी, जनता से प्रेम रखने वाले व पैर से ऊपर किंतु कटि से नीचे दुबले होते हैं तथा इनके शरीर पर किसी चोट या जलने का निशान अवश्य होता है और इन्हें 70 वर्ष की आयु प्राप्त होती है।
भद्र योग:-
भद्र योग
यदि बुध केंद्र में मिथुन या कन्या राशि के होकर बैठे हो तो भद्र नामक पंचमहापुरुष योग बनता है इस योग में जन्मा व्यक्ति कुशाग्र अर्थात तेज बुद्धि वाला और विद्वान होता है तथा विद्वान आदमी व बड़े अधिकारी भी इनकी प्रशंसा करते हैं, ऐसे व्यक्ति भाषण देने में चतुर होते हैं साथ ही वैभवशाली और उच्च अधिकारी होते हैं मंत्रेश्वर महाराज ने कहा है कि ऐसा व्यक्ति शुद्ध हो (शरीर, वस्त्र, रहन-सहन स्वच्छ हो) तथा अत्यंत वैभवशाली होता है, मानसागरी के अनुसार भद्र योग में जन्मा व्यक्ति सिंह के समान मुख और हाथी सी चाल वाला, पुष्ट वक्ष स्थल और गोलाकार सुडौल दोनों बाहुवाला, दोनों बाहुओं को फैलाने से जितना हो उतना लंबा, कामी, सत्वगुणी तथा योग का ज्ञाता, हाथ व ऐसे व्यक्तियों के पैर में शंख, तलवार, हाथी, गदा, फूल, वाण, चक्र, कमल, पताका, हल आदि के निशान होते हैं तथा इनकी दोनों भृकुटि सुंदर व धार्मिक होता है, भद्र योग में जन्मा व्यक्ति धन को तराजू पर तौलता है तथा कान्यकुब्ज क्षेत्र का राजा होकर पुत्र-स्त्री से सुखी और 80 वर्ष की आयु को प्राप्त करने वाला होता है।
हंस योग:-
हंस योग
यदि गुरु केंद्र में कर्क, धनु व मीन राशि के होकर बैठे हो तो हंस नामक पंचमहापुरुष योग बनता है इस योग में जन्मे व्यक्ति के हाथ और पैरों में शंख, कमल, मत्स्य और अंकुश के चिन्ह होते हैं तथा ऐसे व्यक्ति उत्तम भोजन करने वाले और सज्जन लोगों से प्रशंसा प्राप्त करने वाले होते हैं तथा इनका अरुण मुख, ऊँची नासिका, सुंदर पैर, हंस के समान शरीर, गौर वर्ण, लाल नख, हंस के समान स्वर होते है व इन्हें कफ की समस्या भी रहती है मंत्रेश्वर महाराज जी कहते हैं कि हंस योग में जन्मे व्यक्ति का शरीर देखने बहुत शुभ (सुंदर, सौम्य) होता है, मानसागरी के अनुसार हंस योग में जन्मा व्यक्ति जल में विहार करने वाला, अत्यंत कामी, स्त्री से कभी तृप्त न होने वाला, अड़सठ अंगुल ऊँचा शरीर वाला और 60 वर्ष की आयु को प्राप्त करने वाला होता है।
मालव्य योग:-
मालव्य योग
यदि शुक्र केंद्र में वृषभ, तुला व मीन राशि के होकर बैठे हों तो मालव्य नामक पंचमहापुरुष योग बनता है इस योग में जन्मा व्यक्ति धैर्यवान और पुष्ट अंग वाला, उत्तम भोजन करने वाला, विद्वान, पुत्र और स्त्रियों से सुख प्राप्त करने वाला, यशस्वी, सुडौल शरीर व पतले होंठ वाला होता है मंत्रेश्वर महाराज जी कहते हैं मालव्य योग में जन्मा व्यक्ति प्रसन्नमुख, शांतचित्त और अच्छी सवारियों (मोटर आदि) का भोक्ता होता है मानसागरी के अनुसार मालव्य योग में जन्मा व्यक्ति पतली कमर वाला, चंद्रमा के समान कांति वाला, सर्वत्र पराक्रमी, घुटनों तक लंबी बाहु वाला, 13 अंगुल की मुँह की लंबाई वाला और 70 वर्ष की आयु तक राज्य करने वाला होता है।
शश योग:-
यदि शनि केंद्र में तुला, मकर व कुंभ राशि के होकर बैठे हो तो शश नामक पंचमहापुरुष योग बनता है इस योग में जन्म लिए व्यक्ति अत्यंत प्रभावशाली, उच्च पदाधिकारी, बलवान, धनी और सुखी होते हैं मंत्रेश्वर महाराज जी कहते हैं कि शश योग में जन्मा व्यक्ति किसी ग्राम के मालिक हों या नृप (बहुत से मनुष्यों के स्वामी) अर्थात उच्च पदाधिकारी होते हैं तथा ऐसे व्यक्तियों की मातहती में अच्छे-अच्छे लोग काम करते हैं तथा शश योग में जन्मे व्यक्तियों का आचरण उत्तम नही होता और ऐसे व्यक्ति अन्य पुरुषों की स्त्रियों में आसक्त रहते हैं मानसागरी के अनुसार शश योग में जन्मे व्यक्ति छोटे मुँह और दाँत वाले, क्रोधी, दुष्ट, वन-पर्वत, किला और नदी के प्रिय, मेहमानों के प्रिय, मध्यम कद के और प्रसिद्ध होते हैं साथ ही विविध सेनाओं को इकट्ठा करने में लगे रहने वाले, धातु कर्म में कुशल, चंचल नेत्र वाले, माता के भक्त, दूसरों के दोष ढूँढने वाले, हाथ व पैर में पलंग, शंख, बाण, शस्त्र, माला, वीणा के समान रेखा वाले और 70 वर्ष तक शासन करने वाले होते हैं।
मंत्रेश्वर महाराज जी के अनुसार यदि चंद्र कुंडली से भी केंद्र में उपर्युक्त पाँचों ग्रह स्वराशि या उच्च राशि बैठे हों तो भी पंचमहापुरुष योग बनता है कहने का आशय यह है कि जैसे जन्म लग्न से केंद्र का विचार करते हैं ठीक वैसे ही चंद्र कुंडली से भी विचार करना चाहिए, यदि कोई एक ग्रह उपर्युक्त प्रकार से योगकारक हो तो मनुष्य भाग्यवान होता है, यदि दो ग्रह योग बनावें तो राजा के समान सुख की प्राप्ति होती है, यदि तीन ग्रह योग बनावे तो व्यक्ति राजा या उच्च अधिकारी होता है, यदि चार ग्रह योग बनावे तो महाराजा समान सुख प्राप्त होता है तथा यदि किसी की कुंडली में रूचक, भद्र, हंस, मालव्य और शश ये पाँचों योग हो वह इनसे भी उच्च पदवी प्राप्त करता है।
मानसागरी के अनुसार मंगल, बुध, गुरु, शुक्र या शनि के केंद्र में अपनी उच्च या स्वराशि में स्थित होने से जो पंचमहापुरुष योग बनते हैं किंतु यदि जो ग्रह यह योग बना रहे हों वह सूर्य या चंद्र के साथ हो तो ऐसे महापुरुष योग के प्रभाव से जातक/जातिका राजा या राजतुल्य नही होते परंतु उसकी दशा या अंतर्दशा में केवल शुभ फल की प्राप्ति होती है।
पंचम भाव से विद्या, संतान, बौद्धिक क्षमता, प्रेम का विचार किया जाता है जहाँ सूर्य के अपने स्वराशि अर्थात स्वम् की राशि सिंह में बैठा होने के कारण से अच्छी शिक्षा प्राप्ति के योग बनते हैं और बुद्धि व वाणी की महान तेजी के कारण से ऐसे व्यक्ति समाज बड़ा भारी प्रभाव रखते हैं व संतान का उत्तम सुख व कम से कम एक पुत्र का सुख प्राप्त करते हैं किंतु ऐसे व्यक्तियों में अहंकार भी बना रहता है जिस कारण से अपनी बुद्धि की योग्यता के सम्मुख दूसरों की बुद्धि को तुच्छ समझते हैं तथा सातवीं दृष्टि से एकादश भाव जो कि लाभ भाव है को अपने शत्रु शनि की कुंभ राशि में देखने के कारण से आमदनी के मार्ग में विशेष प्रयत्न करने के बाद भी लाभ प्राप्ति की तरफ से कुछ असंतोष रहेगा किंतु ऐसे व्यक्ति लाभ के मार्ग में कुछ कटु भाषण से कार्य सम्पादन करते हैं।
षष्ठ भाव से रोग, शत्रु, प्रतियोगी परीक्षा, मामा की स्थिति का विचार किया जाता है जहाँ सूर्य अपने मित्र बुध की कन्या राशि में बैठा होने के कारण से विद्या ग्रहण करने में कुछ दिक्कतें रहेंगी किंतु बुद्धि और विद्या के द्वारा बड़ा भारी प्रभाव प्राप्त होगा और संतान पक्ष के अंदर कुछ परेशानी रहेगी, छठे भाव में गर्म ग्रह (सूर्य को गर्म ग्रह कहा जाता है) बड़ा शक्तिशाली फल का दाता हो जाता है इसलिए शत्रुओं पर विजय प्राप्त होगी व प्रतियोगी परीक्षाओं को निकालने की शक्ति प्राप्त होगी तथा सातवीं दृष्टि से द्वादश भाव खर्च व बाहरी स्थान को अपने मित्र गुरु की मीन राशि में देखने के कारण से व्यय/खर्चों में वृद्धि होगी और बुद्धि योग द्वारा बाहरी स्थानों से सफलता व मान प्राप्ति के योग बनेंगे।
अर्थात:- आयु का सटीक ज्ञान तो देवों के लिए भी दुर्लभ है फिर भी बालारिष्ट, योगारिष्ट, अल्प, मध्य, दीर्घ, दिव्य व अस्मित ये सात प्रकार की आयु होती हैं इसके अलावा लग्नेश, राशीश, अष्टमेश व चंद्र नीच, शत्रु राशि के हों व 6, 8, 12 भाव आदि में चले जाएं चंद्र नीच के अलावा अमावस्या युक्त हो तथा इन पर राहु, केतु का प्रभाव हो तो भी मारक योग बन जाता है जो कि मृत्यु का कारण बनते हैं।
१. बालारिष्ट योग में व्यक्ति की अधिकतम आयु 8 वर्ष तक की हो सकती है।
२.योगारिष्ट योग में व्यक्ति की अधिकतम आयु 20 वर्ष तक की हो सकती है।
३. अल्पायु योग में व्यक्ति की अधिकतम आयु 32 वर्ष तक की हो सकती है।
४. मध्यमायु योग में व्यक्ति की अधिकतम आयु 64 वर्ष तक की हो सकती है।
५. दीर्घायु योग में व्यक्ति की आयु अधिकतम 120 वर्ष तक की हो सकती है।
६. दिव्य योग में व्यक्ति की आयु अधिकतम 1000 वर्ष तक की हो सकती है।
७. अस्मित योग में व्यक्ति की अधिकतम आयु की कोई सीमा नहीं होती है।
ज्योतिष में जीवन अवधि का विचार सामान्यतः अष्टम भाव से किया जाता है इसके साथ ही अष्टमेश, कारक शनि, लग्न-लग्नेश, राशि-राशीश, चंद्रमा, कर्मभाव व कर्मेश, व्यय भाव व व्ययेश तथा इसके अलावा प्रत्येक लग्न के लिए मारक अर्थात् शत्रु ग्रह, द्वितीय, सप्तम, तृतीय एवं अष्टम भाव तथा इनके स्वामियों तथा शुभ एवं अशुभ पाप ग्रहों द्वारा डाले जाने वाले प्रभाव पर भी विचार करना अत्यंत महत्वपूर्ण है।
सामान्यतः आयु में कमी करके मृत्यु का योग ‘मारक’ ग्रह देते हैं इस तरह से शब्ध “मारक” या “मारकेश” का अर्थ होता है मारने वाला या मृत्यु देने वाले ग्रह जो आयु में कमी कर मृत्यु देता है सामान्यतः मारकेश ग्रह वह होता है जो लग्नेश से शत्रुता रखता है मंगल व बुध एक दूसरे के लिए मारकेश हैं, सूर्य व शनि एक दूसरे के लिए मारकेश हैं, शनि व चंद्र एक दूसरे के लिए मारकेश हैं, शुक्र व मंगल एक दूसरे के लिए मारकेश हैं, गुरु व बुध एक दूसरे के लिए मारकेश हैं, राहू व केतू छाया ग्रह सूर्य, चंद्र, मंगल व बृहस्पति के लिए मारकेश हैं।
तीसरे भाव से भाई-बहन व पराक्रम का विचार किया जाता है जहाँ अपने मित्र बुध की राशि पर सूर्य के बैठे होने के कारण से उच्च शिक्षा प्राप्ति के योग बनते हैं व बैद्धिक क्षमता काफी अच्छी रहती है तथा ऐसे जातक/जातिका हर स्थिति में तुरंत निर्णय लेने में सक्षम होते हैं साथ ही इनके पराक्रम व पुरुषार्थ में काफी वृद्धि होती है अर्थात ऐसे व्यक्ति बहुत मेहनती होते हैं साथ ही इनके दिमाग व वाणी में भी तेजी रहती है और सातवीं दृष्टि से भाग्य व धर्म स्थान को मित्र गुरु की राशि में देखने के कारण से ऐसे व्यक्ति बुद्धि व विवेक शक्ति द्वारा भाग्य वृद्धि करने में सफल होते हैं तथा धर्म का मनन व पालन करते हैं साथ ही ऐसे व्यक्तियों की ईश्वर और धर्म में निष्ठा बनी रहती है।
मेष लग्न की कुंडली के चतुर्थ भाव में सूर्य का फल:-
मेष लग्न कुंडली के चतुर्थ भाव में सूर्य
चतुर्थ भाव से माता, भूमि, वाहन व मानसिक स्थिति का विचार किया जाता है जहाँ सूर्य अपने मित्र चंद्र की कर्क राशि में बैठा होने के कारण से सुखपूर्वक विद्या प्राप्ति के योग बनता है तथा ऐसे व्यक्तियों संतान का उत्तम सुख प्राप्त होता है साथ ही ऐसे व्यक्ति बुद्धि के अंदर तेजी रहते हुए भी शांति धारण किए रहते हैं व बुद्धि की योग्यता से भूमि-मकानादि का सुख भी प्राप्त करते हैं और सातवीं दृष्टि से दशम भाव को अपने शत्रु शनि की मकर राशि में देखने के कारण से पिता के संबंध में कुछ वैमनस्यता प्राप्त करेंगे तथा राज्य के मार्ग में कुछ नीरसता रहते हुए भी समाज में कुछ मान व प्रतिष्ठा प्राप्त होगी।
मेष लग्न की कुंडली के विभिन्न भावों में सूर्य का फल भाग १
मेष लग्न कुंडली
मेष लग्न की कुंडली में सूर्यपंचमभाव के स्वामी होते हैं और पंचम भावसंतान, विद्या, बौद्धिक क्षमता, सफलता, प्रेम, निवेश व अन्य बहुत से चीजों का कारक होता है जिनके स्वामी बनकर सूर्य अपने मित्र मंगल के लग्न में विभिन्न भावों में बैठकर विभिन्न प्रकार के फल देते हैं तो चलिए जानते हैं मेष लग्न की कुंडली के विभिन्न भावों में सूर्य के फल:-
मेष लग्न की कुंडली के प्रथम भाव में सूर्य का फल:-
मेष लग्न के प्रथम भाव में सूर्य
प्रथम भाव से हम देह का विचार करते हैं जहाँ त्रिकोण के स्वामीसूर्य के अपनी उच्च राशि में बैठे होने के कारण से जातक/जातिका के देह का कद प्रभावशाली रहता है और बुद्धि के अंदर उत्तेजना शक्ति रहती है तथा विद्या के स्थान में महानता प्राप्त होती है कहने का आशय यह है उच्च शिक्षा प्राप्ति के योग बनते हैं साथ ही ऐसे जातक/जातिका की वाणी में प्रभाव रहता है अर्थात इनकी बोली गयी अधिकतर बात सबको पसंद आती है साथ ही ऐसे व्यक्तियों के हिर्दय में बड़ा भारी स्वाभिमान भी रहता है तथा संतान का उत्तम सुख भी प्राप्त होता है किंतु सूर्य के सप्तम दृष्टि से सप्तम भाव को अपनी नीच राशितुला में देखने के कारण से स्त्री स्थान में क्लेश एवं कष्ट तथा सुंदरता की कमी प्राप्त होती है और रोजगार के मार्ग में कुछ परेशानियाँ तथा कुछ कमी प्रतीत होती है और गृहस्थ के सुख संबंधों में एवं संचालन में कुछ दिक्कतें बनी रहती हैं।
मेष लग्न की कुंडली के द्वितीय भाव में सूर्य का फल:-
मेष लग्न कुंडली के द्वितीय भाव में सूर्य
दूसरे भाव में शत्रु शुक्र की राशि पर बैठे होने के कारण से संतान पक्ष में कुछ बाधा रहती है और विद्या ग्रहण करने में कुछ दिक्कतों का सामना करना पड़ता है किंतु ऐसे जातक/जातिका बुद्धि व विवेक द्वारा धन वृद्धि के सफल प्रयत्न करते हैं फिर भी धन संचय में कुछ कमी अनुभव होती है क्योंकि द्वितीय भाव में सूर्य कुछ बंधन युक्त फल देता है तथा सातवीं दृष्टि से मित्र मंगल की वृश्चिक राशि को अष्टम भाव में देखने के कारण से आयु की वृद्धि होती है तथा जीवन की दिनचर्या में बड़ा भारी प्रभाव रहता है और कुटुंब का कुछ प्रभाव रहता है अर्थात कुटुंब का कुछ सुख प्राप्त होता है।
मेष लग्न का स्वामी मंगल होता है और यह काल पुरुष का लग्न होता है लग्न में मेष राशि होने के कारण से ऐसे व्यक्ति क्रोधी स्वभाव के होते हैं व आक्रामक होते हैं ऐसे व्यक्ति की सहनशक्ति काफी कम होती है किंतु इनकी वाणी मधुरता लिए होती है क्योंकि दूसरे भाव में शुक्र की राशि होती है तथा इन्हें स्वादिष्ट व्यंजनों का शौंक होता है इनके तीसरे भाव अर्थात पराक्रम भाव में बुध की राशि होने के कारण से ऐसे व्यक्ति चतुराई ज्यादा दिखाते हैं और अपनी ही चतुराई में फँस कर रह जाते हैं क्योंकि मंगल का सबसे बड़ा शत्रु बुध होता है, मेष लग्न के व्यक्तियों को माता से बहुत लगाव होता है।
मेष लग्न के व्यक्तियों की गोल आँखे होती है तथा इनके घुटने कुछ कमजोर होते हैं कहने का आशय यह है कि इनके घुटने में अकसर चोट लगने का भय या घुटनों में दर्द की समस्या बनी रहती है, यह उग्र प्रकृति अर्थात क्रोधी होते हैं और सामान्य गति से कुछ तेज चलते हैं इनको घूमने-फिरने का बहुत शौंक होता है किंतु पानी वाली जगहों से प्रायः दूरी बनाकर रखते हैं, इनमें कामुकता की अधिकता रहती है क्योंकि सप्तम भाव का स्वामी शुक्र व अष्टम का स्वामी मंगल होता है इन्हें भोजन स्वादिष्ट किंतु सीमित मात्रा में करना पसंद होता है, अधिकतर जगहों पर इन्हें मिथ्या संवाद करते हुए भी देखा जाता है मेष लग्न के व्यक्ति अपने कार्य को पूर्ण निष्ठा व ईमानदारी से करते हैं क्योंकि इनकी कुंडली में दशम भाव के स्वामी शनि होते हैं तथा मार्केटिंग, फाइनेंस, बैंकिंग के कार्य में अधिक सफल होते हैं।
मेष लग्न वालों के लिए सूर्य व मंगल शुभ होते हैं और कृष्ण पक्ष व अमावस्या का चंद्र इनके लिए बहुत शुभ होते हैं बुध, शनि व शुक्र इनके लिए अशुभ होते हैं क्योंकि मंगल की इन तीनों ग्रहों से नैसर्गिक शत्रुता होती है साथ ही बुध शत्रु भाव, शुक्र मारक भाव के स्वामी होते हैं और मेष लग्न के चर लग्न होने के कारण से शनि इस कुंडली में बाधकेश होते हैं, मेष लग्न वालों के लिए गुरु नवम भाव के स्वामी होने के कारण से शुभ व द्वादश भाव के स्वामी होने के कारण से अशुभ अर्थात मिश्रित फल प्रदान करते हैं, मेष लग्न वालों के लिए सूर्य-चंद्र व सूर्य-मंगल की युति या प्रतियुति बेहद शुभ होती है तथा सूर्य-शनि, मंगल-गुरु और चंद्र-गुरु की युति या प्रतियुति मध्यम फल प्रदान करने वाली होती है व गुरु-शनि और गुरु-शुक्र की युति या प्रतियुति बेहद अशुभ फलदाई होती है।
विशेष:-
मेष लग्न वालों के लिए मूँगा, माणिक, मोती, पोखराज शुभ रत्न होने हैं और इनके लिए नीलम, पन्ना व हीरा उन्नति में बाधक होते हैं।
कुंडली से कैसे जानें कि ससुराल से प्यार मिलेगा या अपमान भान:-१—Astrology Sutras
ससुराल से प्रेम मिलेगा या अपमान
यह विषय बहुत ही रोचक है क्योंकि लड़का हो या लड़की सबके मन में यह जानने की प्रवल जिज्ञासा रहती है कि उनका अपने ससुराल से व ससुराल के सदस्यों से कैसा संबंध रहेगा इसके लिए हमें कुंडली में सर्वप्रथम वैवाहिक जीवन से जुड़े सभी भावों पर ग्रहों को देखना चाहिए, हम सभी जानते हैं कि लग्न हम खुद है अर्थात हमारा स्वभाव हमें लग्न बताता है इसके बाद हमें कुंडली के दूसरे भाव का अध्यन करना चाहिए क्योंकि द्वितीयभाव हमारी वाणी का होता है और हमारा समाज में लोगो से कैसा संबंध है यह हमारी वाणी पर निर्भर करता है उसके बाद चतुर्थ भाव का अध्यन करना चाहिए क्योंकि चतुर्थ भाव से हम मानसिक स्थिति व घरेलू सुख का विचार करते हैं तदोपरांत सबसे महत्वपूर्ण भाव सप्तम भाव का विचार करना चाहिए क्योंकि यह भाव हमारे जीवनसाथी के स्वभाव को दर्शाता है उसके बाद अष्टम भाव जो जीवनसाथी व उसके परिवार अर्थात हमारे ससुराल वालों की वाणी का भाव है और यह जातिका का मांगल्य भाव भी होता है, तदोपरांत द्वादश भाव का विचार करना चाहिए क्योंकि यह शैया सुख को दर्शाता है।
नोट:-मेरे अनुसार दशम भाव का विचार करना चाहिए क्योंकि जैसे चतुर्थ भाव हमारी मानसिक स्थिति व घरेलू सुख को दर्शाता है वैसे ही वैसे ही दशम भाव को यदि देखा जाए तो सप्तम से चतुर्थ होने के कारण से जीवनसाथी की मानसिक स्थिति को दर्शाता है।
यह बहुत ही लंबा विषय है जिसे मैं कई भाग में लिखूँगा और इस लेख में सिर्फ मुख्य सूत्रों पर चर्चा करूँगा जिससे हम आसानी से ज्ञात कर सकते हैं कि हमारा हमारे ससुराल वालों से कैसा संबंध रहेगा व हमें अपने ससुराल से प्रेम या अपमान में से क्या प्राप्त होगा।
सूत्र:-
प्रथम से चतुर्थ सूत्र
१. सप्तम भाव में शुभ राशि हो और सप्तम भाव शुभ ग्रह से युत व दृष्ट हो तो जातक/जातिका को साँस के पक्ष से सुख की प्राप्ति होती है।
२. सप्तम भाव में यदि अशुभ राशि हो और सप्तम भाव शुभ ग्रह से युत व दृष्ट हो तो जातक/जातिका को साँस के पक्ष से मिश्रित फल की प्राप्ति होती है।
३. सप्तम भाव में यदि शुभ राशि हो और सप्तम भाव अशुभ ग्रह से युत व दृष्ट हो तो जातक/जातिका को साँस के पक्ष से मिश्रित फल की प्राप्ति होती है।
४. सप्तम भाव में यदि अशुभ राशि हो और सप्तम भाव अशुभ ग्रह से युत व दृष्ट हो तो जातक/जातिका को साँस के पक्ष से अशुभ फल की प्राप्ति होती है।
पंचम व षष्ठ सूत्र
५. यदि लग्नेश और सप्तमेश (पंचधा मैत्री में) शत्रु हों तो जातक/जातिका की ससुराल पक्ष से शत्रुता रहती है।
६. यदि लग्नेश और सप्तमेश (पंचधा मैत्री में) मित्र हों तो जातक/जातिका की ससुराल पक्ष से मित्रता रहती है।
विशेष:-
कुंडली देखते समय हमें इन सभी सूत्रों को ध्यान पूर्वक देखना चाहिए व इन्हें लगाते कैसे हैं इसे दो उदाहरण कुंडली से समझने का प्रयास करेंगे किंतु उससे पूर्व हम यह जानने का प्रयास करते हैं कि नैसर्गिक मित्रता, तात्कालिक मित्रता व पंचधा मैत्री क्या होती है।
नैसर्गिक मित्रता:-
नैसर्गिक मित्रता पर मैंने पहले भी एक पोस्ट लिखी है पोस्ट की लंबाई को ध्यान में रखते हुए उसकी link आप सभी को उपलब्ध करा रहा हूँ आप वहाँ से देख सकते हैं।
हमें जिस दो ग्रहों की तात्कालिक मित्रता देखनी हो उन दोनों ग्रहों की स्थिति को देखना चाहिए अर्थात जहाँ ग्रह बैठा हो उससे तीन भाव आगे और तीन भाव पीछे यदि कोई ग्रह हो तो वह उसके तात्कालिक मित्र होते हैं अन्य किसी भाव पर होने पर वह ग्रह आपस में तात्कालिक शत्रुता रखते हैं।
पंचधा मैत्री:-
नैसर्गिक मित्रता और तात्कालिक मित्रता के समावेश से पंचधा मैत्री निकलती है जिसे मैं अगली पोस्ट में विस्तार से लिखूँगा अभी उदाहरण को मैं कुछ इस तरह से समझाने का प्रयास करूँगा कि आप सभी को परेशानी न हो।
उदाहरण कुंडली:- १
उदाहरण कुंडली- १
इस कुंडली में सप्तम भाव में गुरु की मीन राशि है जो कि शुभ ग्रह है तथा सप्तम भाव पर किसी भी ग्रह (शुभ हो या अशुभ) दृष्टि नही है साथ ही इस कुंडली में लग्नेश बुध है और बुध, गुरु को न तो शत्रु मानता है और न ही मित्र एवं बुध से गुरु एकादश भाव में है अतः यह तात्कालिक रूप से भी मित्र हुए अतः सम (+) मित्र = मित्र का योग हुआ।
फल:- हम इन जातिका को कह सकते हैं कि आपका ससुराल वालों से अच्छा संबंध रहेगा व आपको अपने ससुराल से प्रेम व यश की प्राप्ति होगी।
उदाहरण कुंडली:- २
उदाहरण कुंडली-२
इस कुंडली में शनि सप्तमेश है जो कि क्रूर ग्रह है और लग्नेश सूर्य का नैसर्गिक शत्रु भी है तथा सप्तम भाव पर किसी भी ग्रह (शुभ हो या अशुभ) की दृष्टि नही है एवं लग्नेश सूर्य चतुर्थ भाव में शनिके साथ बैठने से तात्कालिक शत्रु भी हुआ अतः शत्रु (+) शत्रु = अति शत्रु हुए।
फल:- हम इन जातक को कह सकते हैं कि आपकी आपके ससुराल वालों से बिल्कुल भी नही बनेगी तथा आप उनके लिए चाहे जितना कर लें आपको उतना सम्मान नही प्राप्त हो सकेगा जिसकी आप उम्मीद रखते हैं।
संतान प्राप्ति में बाधा के योग: जानें बीज स्फुट व क्षेत्र स्फुट क्या होता है व इसे कैसे निकालते हैं
संतान बाधा के योग
संतान प्राप्ति के लिए बीज स्फुट व क्षेत्र स्फुट की बहुत अधिक महत्ता होती है क्योंकि यह दोनों ही प्रजनन क्षमता को मापने का ज्योतिष में सबसे सरल व सबसे सटीक तरीका होता है बीज स्फुट से पुरुष के वीर्य की स्थिति व क्षेत्र स्फुट से महिला की प्रजनन क्षमता को मापा जाता है तो चलिए जानते हैं इन्हें कैसे निकाला जाता है।
बीज स्फुट निकालने का तरीका:-
बीज स्फुट पुरुष की कुंडली में निकाला जाता है इनमें 3 ग्रहों की गढ़ना की जाती है और वह है गुरु, शुक्र व सूर्य क्योंकि ज्योतिष में गुरु को संतान का कारक, शुक्र को वीर्य का कारक और सूर्य को पितृ का कारक माना गया है और सूर्य पितृ की महत्ता को भी दर्शाता है, अब लग्न कुंडली में इन तीनों ग्रहों की राशि व डिग्री को देखना चाहिए और यह तीनों जिन राशि व डिग्री में हो उन्हें जोड़ लेना चाहिए इनके जोड़ से हमें जो प्राप्त होता है वह बीज स्फुट कहलाता है इसके बाद हमें नवमांश में बीज स्फुट की स्थिति देखनी चाहिए।
क्षेत्र स्फुट निकालने का तरीका:-
क्षेत्र स्फुट महिला की कुंडली में निकाला जाता है इनमें भी 3 ग्रहों की गढ़ना की जाती है और वह है गुरु, मंगल व चंद्र क्योंकि गुरु संतान कारक, मंगल मासिक धर्म व प्रजनन क्षमता का कारक और चंद्र प्रजनन की प्रक्रिया को दर्शाता है अब लग्न कुंडली में इन तीनों ग्रहों की राशि व डिग्री को देखना चाहिए और यह तीनों जिन राशि व डिग्री में हो उन्हें जोड़ लेना चाहिए इनके जोड़ से हमें जो प्राप्त होता है वह क्षेत्र स्फुट कहलाता है इसके बाद हमें नवमांश में क्षेत्र स्फुट की स्थिति देखनी चाहिए।
बीज स्फुट का फल:-
१. पुरुष की कुंडली में यदि बीज स्फुट विषम राशि और विषम नवमांश में आए तो संतान प्राप्ति की संभावना प्रवल होती है।
२. यदि दोनों (राशि और नवमांश) सम आए तो संभावना क्षीण हो जाती है।
३. यदि विषम राशि और सम नवमांश या सम राशि और विषम नवमांश आए तो संभावना सम रहती है कहने का आशय यह है कि कुछ विलंब के साथ संतान प्राप्ति के योग बनते हैं।
क्षेत्र स्फुट का फल:-
१. महिला की कुंडली में यदि क्षेत्र स्फुट सम राशि और सम नवमांश में आए तो संतान प्राप्ति की संभावना प्रवल होती है।
२. यदि दोनों (राशि और नवमांश) विषम आए तो संभावना क्षीण हो जाती है।
३. यदि विषम राशि और सम नवमांश या सम राशि और विषम नवमांश आए तो संभावना सम रहती है कहने का आशय यह है कि कुछ विलंब के साथ संतान प्राप्ति के योग बनते हैं।
उदाहरण पुरुष कुंडली से:-
उदाहरण पुरुष कुंडली
यह सिंह लग्न की कुंडली है अतः अब यहाँ हम गुरु, शुक्र व सूर्य की राशि और अंशों को एक जगह लिखकर इनका जोड़ निकलेंगे।
विशेष:-
ग्रह जिस राशि में बैठे हों उसके ठीक पहले वाली राशि को लेंगे जैसे यहाँ गुरु मिथुन राशि में 10° 24′ का है तो इसे हम 2` 10° 24′ व शुक्र कर्क राशि में 29° 45′ का है तो 3` 29° 45′ और सूर्य कन्या राशि में 0° 34′ का है तो 5` 0° 34′ लेंगे अब इनका जोड़ करेंगे।
इनका जोड़ हमें यह प्राप्त हुआ अब हमें पता है कि एक मिनट में 60 सेकंड होते है और 103′, 60 से अधिक है अतः हम 103′ से 60 को घटा देंगे।
10`39°103′ – 60 —————— 10` 40° 43′ —————–
अब हमें 10` 40° 43′ प्राप्त हुआ चूँकि हमें पता है एक राशि अधिकतम 30° की होती है इसलिए हम 10` 40° 43′ के 40° में से 30° को घटा देंगे।
10` 40° 43′ – 30 —————— 11` 10° 43′ ——————
हमें 11` 10° 43′ जो प्राप्त हुआ यह बीज स्फुट कहलाता है अब आप सभी को याद होगा कि 11 वीं राशि कुंभ होती है तथा हमें शुरुवात में सभी ग्रह जिन राशि में बैठे हुए थे उनके ठीक पहले की राशि को लिया था अतः अब हम 11 में 1 और जोड़ देंगे तो हमें 12 प्राप्त होगा अतः हमें मीन राशि जो कि सम राशि होती है वह प्राप्त हुई अतः हम कह सकते हैं कि मीन राशि के 10° 43′ अंश का नवमांश होगा जो कि मीन राशि का चतुर्थ नवमांश अर्थात तुला का नवमांश होगा।
अब इसके फल में हम यह देख सकते हैं कि मीन राशि जो कि सम राशि और तुला नवमांश जो कि विषम राशि का नवमांश है प्राप्त होता है अतः बीज स्फुट का तीसरा सूत्र इसमें लागू होता अर्थात इनको संतान सुख कुछ विलंब के साथ प्राप्त होगा।
नोट:- इसी तरह महिला का क्षेत्र स्फुट निकालना चाहिए।