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भाई दूज (यम द्वितीया) 2026: 11 नवंबर को मनेगा महापर्व, जानें स्थिर लग्न व सर्वार्थ सिद्धि मुहूर्त, यम-यमुना प्रामाणिक कथा, तिलक मंत्र व संपूर्ण विधि

सनातन धर्म में पांच दिवसीय प्रकाश पर्व का पावन समापन कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि यानी ‘भ्रातृ द्वितीया’, ‘यम द्वितीया’ अथवा ‘भाई दूज’ से होता है। यह पावन पर्व केवल भाई-बहन के पवित्र स्नेह का प्रतीक नहीं, अपितु अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति, यम-यातना के शमन और भाई की दीर्घायु का वरदान प्राप्त करने का शास्त्रोक्त महाअनुष्ठान है।

वर्ष 2026 में यह महापर्व 11 नवंबर 2026 (बुधवार) को अनुराधा नक्षत्र, सर्वार्थ सिद्धि योग, अमृत सिद्धि योग तथा स्थिर वृश्चिक व कुंभ लग्न के अत्यंत दुर्लभ एवं कल्याणकारी संयोग में मनाया जाएगा।

Astrology Sutras (ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी) के इस विशेष शोधपरक आलेख में हम स्कन्द पुराण, पद्म पुराण, भविष्य पुराण, निर्णय सिन्धु और मुहूर्त चिन्तामणि के अकाट्य प्रमाणों के आलोक में जानेंगे—तिथि निर्णय का यथार्थ, स्थिर लग्न में तिलक के अचूक मुहूर्त, यमराज-यमुना का पौराणिक वरदान, अकाल मृत्यु निवारक अर्घ्य मंत्र, चित्रगुप्त पूजन और संपूर्ण शास्त्रोक्त विधि।

💡 10 या 11 नवंबर: तिथि निर्णय और निर्णय सिन्धु का अकाट्य नियम

ऋषिकेश पंचांग (काशी मान) के अनुसार कार्तिक शुक्ल द्वितीया तिथि 10 नवंबर 2026 को दिन में 12:37 बजे प्रारंभ होगी और 11 नवंबर 2026 को दिन में 02:13 बजे तक व्याप्त रहेगी।

  • अपराह्ण व मध्याह्न व्यापिनी नियम: निर्णय सिन्धु एवं धर्मसिन्धु का स्पष्ट निर्देश है—“द्वितीयायां यमो भुङ्क्ते भगिनीकरसंस्कृतम्। अतोऽत्र भोजनं कुर्याद्भगिनीभवने नरः॥ सा चापराह्णव्यापिनी ग्राह्या।” अर्थात् भाई दूज पर बहन के घर भोजन और तिलक का विधान मध्याह्न व अपराह्ण काल में किया जाता है।
  • 11 नवंबर ही क्यों सर्वमान्य? 11 नवंबर 2026 को सूर्योदय (प्रातः 06:34 बजे) द्वितीया तिथि में हो रहा है और यह तिथि दोपहर 02:13 बजे तक यानी संपूर्ण मध्याह्न काल और अपराह्ण के प्रारंभिक भाग में विद्यमान रहेगी। धर्मशास्त्रों का नियम है कि उदयाकालीन शुद्धा तिथि ही सर्वोपरि होती है। इसके अतिरिक्त 11 नवंबर को दिन में 11:08 बजे तक सर्वार्थ सिद्धि व अमृत सिद्धि योग का अद्भुत संयोग भी है। अतः पूरे भारतवर्ष में भाई दूज व यम द्वितीया 11 नवंबर 2026 (बुधवार) को ही शास्त्रसम्मत है।

 यम द्वितीया (भाई दूज) 2026: सूक्ष्म पंचांग विवरण (ऋषिकेश पंचांग अनुसार)

11 नवंबर 2026 का सुनिश्चित गणितीय पंचांग मान (काशी मान अनुसार) निम्नलिखित है:

पंचांगीय अंग / विवरण सटीक समय व मान (ऋषिकेश पंचांग, काशी)
पर्व / दिनांक यम द्वितीया (भाई दूज) / 11 नवंबर 2026, बुधवार
कार्तिक शुक्ल द्वितीया प्रारंभ 10 नवंबर 2026, दिन में 12:37 बजे से
द्वितीया तिथि समाप्त 11 नवंबर 2026, दिन में 02:13 बजे तक
सूर्योदय / सूर्यास्त (काशी) प्रातः 06:34 बजे / सायं 05:26 बजे
नक्षत्र संचरण अनुराधा दिन 11:08 तक, उपरांत ज्येष्ठा नक्षत्र
योग संचरण अतिगण्ड योग अर्धरात्रि 03:54 तक (12 नवं भोर)
विशेष शुभ योग सर्वार्थ सिद्धि व अमृत सिद्धि योग (प्रातः 06:34 से 11:08 AM)
अभिजित मुहूर्त पूर्वाह्न 11:36 बजे से दोपहर 12:20 बजे तक
राहुकाल (तिलक वर्जित) दोपहर 12:00 बजे से 01:23 बजे तक

⏰ 11 नवंबर 2026: स्थिर लग्न एवं भाई दूज तिलक के सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त

मुहूर्त चिन्तामणि के अनुसार भाई के मस्तक पर तिलक और रक्षा-सूत्र बांधने के लिए स्थिर लग्न और सर्वार्थ सिद्धि योग सर्वोत्तम माना गया है:

शुभ लग्न / योग सटीक समय अवधि उपयुक्तता एवं फल
वृश्चिक लग्न + सर्वार्थ सिद्धि प्रातः 07:01 से 09:18 तक स्थिर लग्न + अमृत सिद्धि योग (तिलक हेतु सर्वोत्तम)
सर्वार्थ सिद्धि काल (नक्षत्र युक्त) प्रातः 09:18 से 11:08 तक पूजा, चित्रगुप्त आराधना व भाई को भोजन
अभिजित वेला पूर्वाह्न 11:36 से 12:00 तक राहुकाल प्रारंभ से पूर्व का प्रशस्त समय
कुंभ लग्न (अपराह्ण काल) दोपहर 01:23 से 02:13 तक राहुकाल उपरांत व द्वितीया समाप्ति से पूर्व

सावधानी: दोपहर 12:00 बजे से 01:23 बजे तक राहुकाल रहेगा। राहुकाल में तिलक, रक्षा-सूत्र बंधन अथवा नवीन संकल्प न करें। तिलक का सर्वश्रेष्ठ समय प्रातः 07:01 से 11:08 बजे के मध्य है।

📜 सनातन शास्त्रों में यम द्वितीया के प्रामाणिक श्लोक व मंत्र

स्कन्द पुराण, पद्म पुराण और भविष्योत्तर पुराण में यम द्वितीया की महिमा, तिलक विधान और अर्घ्य के मूल श्लोक निम्नलिखित हैं:

शास्त्रोक्त मूल श्लोक प्रामाणिक अर्थ एवं आध्यात्मिक संदर्भ

“कार्तिके शुक्लपक्षे तु द्वितीयायां यमोऽर्च्यते।
यमुनायां स्नानमात्रान्नरो याति यमक्षयम्॥”
“भगिनीहस्तसंभूतं भुक्त्वा मिष्टान्नमुत्तमम्।
आयुर्वृद्धिर्भवेत्तस्य यमभीतिर्न जायते॥”

स्कन्द पुराण (कार्तिक माहात्म्य)

अर्थ: कार्तिक शुक्ल द्वितीया के दिन यमराज की पूजा होती है और यमुना जी में स्नान करने से प्राणी यमलोक की यातना से मुक्त हो जाता है। जो पुरुष इस दिन अपनी बहन के हाथ से बना उत्तम भोजन व मिष्ठान्न ग्रहण करता है, उसकी आयु की वृद्धि होती है और उसे कभी अकाल मृत्यु का भय नहीं सताता।

“भ्रातस्तवानुजाताहं भुङ्क्ष्व भक्तमिदं शुभम्।
प्रीतये यमराजस्य यमुनाया विशेषतः॥”

भाई दूज तिलक व भोजन मंत्र

अर्थ: बहन भाई को तिलक करते समय कहती है—हे भ्राता! मैं आपकी बहन हूँ, यमराज और विशेष रूप से देवी यमुना की परम प्रसन्नता हेतु आप मेरे द्वारा निर्मित इस पावन भोजन व मिष्ठान्न को स्वीकार करें।

“एहि सूर्यसुत श्रेष्ठ यमराज महाबल।
दामोदरप्रियाभ्रातः गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते॥”

यमराज अर्घ्य मंत्र (पद्म पुराण)

अर्थ: हे सूर्यपुत्र, महाबली यमराज! हे श्रीहरि दामोदर की प्रिय यमुना के भ्राता! पधारिए और मेरे द्वारा दिए गए इस श्रद्धापूर्ण अर्घ्य को स्वीकार कर मेरे भाई को चिरंजीवी कीजिए।

🌟 यम द्वितीया क्यों मनाते हैं? (यमुना का स्नेह और यमराज का वरदान)

पद्म पुराण और स्कन्द पुराण के अनुसार, भगवान सूर्यदेव की पत्नी संज्ञा से दो संतानें हुईं—पुत्र यमराज (धर्मराज) और पुत्री यमुना (कालिंदी)। यमराज सदा अपने कार्य में व्यस्त रहते थे, किंतु यमुना अपने भाई से अगाध स्नेह करती थीं और उन्हें बारंबार अपने घर आने का निमंत्रण देती थीं:

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया को यमराज अचानक अपनी बहन यमुना के घर पहुंचे। अपने द्वार पर भाई को देखकर यमुना का हृदय हर्ष से भर गया। उन्होंने स्नान कराकर यमराज को दिव्य आसन दिया, रोली-अक्षत से तिलक किया और अनेक प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन बनाकर उन्हें भोजन कराया।

बहन के निश्छल प्रेम से संतुष्ट होकर यमराज ने कहा—“कल्याणी! मैं तुम पर अत्यंत प्रसन्न हूँ। तुम अपनी इच्छा अनुसार जो चाहो वर मांग लो।”

यमुना ने हाथ जोड़कर कहा—“हे भ्राता! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मुझे यह वरदान दीजिए कि प्रतिवर्ष कार्तिक शुक्ल द्वितीया को आप मेरे घर भोजन करने आएंगे। साथ ही इस दिन जो भी भाई अपनी बहन के घर जाकर उसके हाथ का बना भोजन करेगा और बहन से तिलक करवाएगा, उसे कभी आपकी यम-यातना अथवा अकाल मृत्यु का भय न रहे।”
धर्मराज यमराज ने ‘तथास्तु’ कहकर यह वरदान दिया। तभी से इस तिथि को ‘यम द्वितीया’ के रूप में मनाया जाने लगा।

🖊️ श्री चित्रगुप्त पूजन एवं कलम-दवात पूजा का विधान

यम द्वितीया के दिन यमराज के प्रधान लेखक भगवान चित्रगुप्त की विशेष पूजा की जाती है। भविष्य पुराण के अनुसार भगवान ब्रह्मा की काया से उत्पन्न चित्रगुप्त समस्त जीवों के पाप-पुण्य का लेखा-जोखा रखते हैं। इस दिन व्यापारी वर्ग, लेखक और साधक अपनी पुरानी कलम-दवात की पूजा करते हैं और नए बहीखातों पर श्रीगणेश व चित्रगुप्त जी का स्मरण करते हैं:

चित्रगुप्त प्रार्थना मंत्र:

“मसीभाजनसंयुक्तं ध्यायेत्तं च महाबलम्। लेखनीपट्टिकाहस्तं चित्रगुप्तं नमाम्यहम्॥”

विधि: एक श्वेत पत्र पर हल्दी व रोली से स्वस्तिक बनाएं। उस पर ‘श्री गणेशाय नमः’ और ‘ॐ श्री चित्रगुप्ताय नमः’ लिखकर अपनी आय-व्यय की सत्यनिष्ठा का संकल्प लें। इससे व्यापार व बुद्धि में उन्नति होती है।

🛠️ भाई दूज की संपूर्ण प्रामाणिक तिलक एवं पूजन विधि

11 नवंबर को प्रातः वृश्चिक लग्न (07:01 से 09:18) अथवा 11:08 AM से पूर्व तिलक का कार्य संपन्न करें:

  1. चौक पूरना व आसन: घर के उत्तर-पूर्व (ईशान) कोण में आटे या चावल के घोल से अष्टदल कमल या मांगलिक चौक पूरें। भाई को लकड़ी के पाटे पर उत्तर या पूर्व की ओर मुख कराकर बैठाएं।
  2. आरती की थाली सजाना: तांबे या पीतल की थाली में शुद्ध कुमकुम (रोली), अक्षत (अखंडित चावल), चंदन, कलावा (मौली), दूर्वा, गोला (सूखा नारियल), सुपारी और मिष्ठान्न रखें।
  3. तिलक संस्कार: बहन अपने अनामिका उंगली से भाई के ललाट पर रोली और चंदन का तिलक लगाए। तिलक के ऊपर अक्षत लगाएं। (शास्त्रों के अनुसार अक्षत अखंड सौभाग्य व लंबी आयु के प्रतीक हैं)।
  4. कलावा व नारियल (गोला) अर्पण: भाई की दाहिनी कलाई पर “येन बद्धो बली राजा…” बोलते हुए रक्षा-सूत्र बांधें। इसके उपरांत भाई के दोनों हाथों में अक्षत, सुपारी और सूखा नारियल (गोला) रखकर उसका मुंह मीठा कराएं।
  5. दीप प्रज्वलन व आरती: घी का दीपक जलाकर भाई की आरती उतारें ताकि उसकी समस्त अनिष्टों और बुरी नजर से रक्षा हो सके।
  6. भोजन कराना व उपहार: तिलक के उपरांत बहन अपने हाथ से बना सात्विक भोजन (विशेषकर खीर व कढ़ी) भाई को कराए। भोजन के पश्चात भाई बहन के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद ले और अपनी सामर्थ्यानुसार वस्त्र, आभूषण या द्रव्य भेंट करे।

⚠️ क्या करें और क्या न करें: शास्त्रोक्त नियम

क्या अवश्य करें? (परम कल्याणकारी) क्या कदापि न करें? (सर्वथा वर्जित)
1. भाई इस दिन अपने घर भोजन न करके बहन के घर जाकर ही भोजन करे।
2. संभव हो तो यमुना जी में अथवा घर पर ही जल में गंगाजल-यमुनाजल मिलाकर स्नान करें।
3. तिलक करते समय भाई का मुख उत्तर या पूर्व दिशा में ही रखें।
4. बहन को सूखा नारियल (गोला) अवश्य भेंट स्वरूप ग्रहण करना चाहिए।
5. संध्या समय यमराज के निमित्त दक्षिण दिशा में दीप प्रज्वलित करें।
1. राहुकाल (दोपहर 12:00 से 01:23) में तिलक कदापि न करें।
2. भाई-बहन आपस में किसी प्रकार का वाद-विवाद या कलह न करें।
3. तिलक से पूर्व बहन अन्न ग्रहण न करे (निर्जल या फलाहार रहे)।
4. काले, गहरे नीले या फटे वस्त्र पहनकर तिलक संस्कार न करें।
5. मांसाहार, मदिरा या तामसिक भोजन का स्पर्श भी न करें।

💬 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Google FAQs)

अधिकतर पूछे जाने वाले प्रश्न प्रामाणिक शास्त्रीय उत्तर
यदि किसी की सगी बहन न हो तो वह क्या करे? स्कन्द पुराण के अनुसार यदि सगी बहन न हो तो चचेरी, ममेरी, मौसेरी बहन अथवा गुरु-भगिनी से तिलक करवाएं। यदि वह भी संभव न हो तो गौ-माता, नदी (विशेषकर यमुना) अथवा तुलसी के पौधे को बहन मानकर उनके समीप तिलक लगाकर भोजन ग्रहण करें।
भाई दूज पर सूखा नारियल (गोला) क्यों दिया जाता है? सूखा नारियल दीर्घायु, दृढ़ता और श्रीफल (लक्ष्मी) का प्रतीक है। बहन जब भाई को गोला देती है, तो वह प्रार्थना करती है कि भाई का जीवन नारियल के खोल की तरह अभेद्य और भीतर से शीतल व मधुर रहे।
क्या भाई दूज के दिन अपने घर भोजन करना वर्जित है? हाँ। निर्णय सिन्धु के अनुसार यम द्वितीया के दिन पुरुष को अपने घर का अन्न नहीं खाना चाहिए। उसे अपनी विवाहित अथवा अविवाहित बहन के घर जाकर ही भोजन करना चाहिए। यदि बहन दूर हो तो उसके नाम का संकल्प छोड़कर ही भोजन करें।
यमुना स्नान का इस दिन क्या विशेष महत्व है? यमुना जी यमराज की सगी बहन हैं। इस दिन मथुरा के विश्राम घाट पर भाई-बहन का हाथ पकड़कर यमुना स्नान करने से यमदूतों का भय सदा के लिए समाप्त हो जाता है।

निष्कर्ष: यम द्वितीया (भाई दूज) 2026 रक्त-संबंधों की प्रगाढ़ता और आध्यात्मिक सुरक्षा का महापर्व है। 11 नवंबर 2026 को सर्वार्थ सिद्धि योग और स्थिर वृश्चिक लग्न में श्रद्धापूर्वक किया गया तिलक संस्कार भाई को अकाल मृत्यु से मुक्त कर दीर्घायु, तेजस्विता और अखंड ऐश्वर्य प्रदान करता है।

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धनतेरस एवं दीपावली 2026: भारत के 60 प्रमुख शहरों में लक्ष्मी पूजन व खरीदारी के सटीक शुभ मुहूर्त (देशांतर सारणी)

सनातन धर्म के महापर्व दीपोत्सव में धनतेरस (धनत्रयोदशी) और दीपावली (महालक्ष्मी पूजन) पर ‘स्थिर लग्न’ और ‘प्रदोष काल’ में पूजन करने का विधान शास्त्रों में सर्वोपरि माना गया है। “ऋषिकेश पंचांग” (काशी मान) के अनुसार, वर्ष 2026 में धनतेरस 06 नवंबर 2026 (शुक्रवार) को तथा दीपावली 08 नवंबर 2026 (रविवार) को सर्वत्र श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाई जाएगी।

Astrology Sutras (ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी) के इस विशेष शोधपरक आलेख में मुहूर्त चिन्तामणि, निर्णय सिन्धु एवं सूर्यसिद्धान्त के अनुसार काशी रेखांश (83°00′ E) को मानक मानकर भारत के प्रमुख 60 नगरों का देशांतर-संस्कार (Local Time Correction) करके दोनों महापर्वों के पूजन व खरीदारी के सूक्ष्म व प्रामाणिक मुहूर्त प्रस्तुत किए जा रहे हैं।

💡 देशांतर व स्थिर लग्न का शास्त्रीय गणित (मुहूर्त चिन्तामणि अनुसार)

प्रत्येक नगर के अक्षांश और देशांतर भिन्न होने के कारण वहां सूर्योदय, सूर्यास्त और लग्नों के उदित होने का समय भारतीय मानक समय (IST) में कुछ मिनट आगे या पीछे हो जाता है।

  • काशी का मानक आधार (ऋषिकेश पंचांग): स्थिर कुंभ लग्न दोपहर 01:22 से 02:53, स्थिर वृषभ लग्न सायं 05:58 से 07:54 और स्थिर सिंह लग्न मध्यरात्रि 12:26 से 02:40 तक रहेगा।
  • पूर्वी नगर (जैसे पटना, कोलकाता, गुवाहाटी): काशी के पूर्व में होने के कारण वहां लग्न और प्रदोष काल कुछ मिनट पहले  प्रारंभ होंगे।
  • पश्चिमी नगर (जैसे दिल्ली, जयपुर, मुंबई, अहमदाबाद): काशी के पश्चिम में होने के कारण वहां लग्न और प्रदोष काल कुछ मिनट बाद  प्रारंभ होंगे।

🪙 1. धनतेरस (06 नवंबर 2026): 60 शहरों में खरीदारी व पूजन मुहूर्त

06 नवंबर को त्रयोदशी पूर्वाह्न 11:07 से प्रारंभ होगी। दोपहर में स्थिर कुंभ लग्न में स्वर्ण, वाहन व बर्तन खरीदारी तथा सायं स्थिर वृषभ लग्न व प्रदोष काल में धन्वन्तरि-लक्ष्मी-कुबेर पूजन एवं यम दीपदान करें:

नगर / राज्य दोपहर खरीदारी (कुंभ लग्न) शाम पूजन व दीपदान (वृषभ लग्न)
1. वाराणसी / काशी (उ.प्र.) दोपहर 01:22 से 02:53 सायं 05:58 से 07:54
2. प्रयागराज (उ.प्र.) दोपहर 01:27 से 02:58 सायं 06:03 से 07:59
3. अयोध्या (उ.प्र.) दोपहर 01:25 से 02:56 सायं 06:01 से 07:57
4. गोरखपुर (उ.प्र.) दोपहर 01:20 से 02:51 सायं 05:56 से 07:52
5. लखनऊ (उ.प्र.) दोपहर 01:30 से 03:01 सायं 06:06 से 08:02
6. कानपुर (उ.प्र.) दोपहर 01:33 से 03:04 सायं 06:09 से 08:05
7. बांदा (उ.प्र.) दोपहर 01:33 से 03:04 सायं 06:09 से 08:05
8. चित्रकूट (उ.प्र./म.प्र.) दोपहर 01:30 से 03:01 सायं 06:06 से 08:02
9. बरेली (उ.प्र.) दोपहर 01:36 से 03:07 सायं 06:12 से 08:08
10. मुरादाबाद (उ.प्र.) दोपहर 01:39 से 03:10 सायं 06:15 से 08:11
11. रामपुर (उ.प्र.) दोपहर 01:38 से 03:09 सायं 06:14 से 08:10
12. मेरठ (उ.प्र.) दोपहर 01:43 से 03:14 सायं 06:19 से 08:15
13. गाजियाबाद (उ.प्र.) दोपहर 01:44 से 03:15 सायं 06:20 से 08:16
14. नोएडा / ग्रेटर नोएडा (उ.प्र.) दोपहर 01:44 से 03:15 सायं 06:20 से 08:16
15. नई दिल्ली / NCR दोपहर 01:45 से 03:16 सायं 06:21 से 08:17
16. गुरुग्राम / गुड़गांव (हरियाणा) दोपहर 01:46 से 03:17 सायं 06:22 से 08:18
17. फरीदाबाद (हरियाणा) दोपहर 01:45 से 03:16 सायं 06:21 से 08:17
18. आगरा (उ.प्र.) दोपहर 01:42 से 03:13 सायं 06:18 से 08:14
19. मथुरा (उ.प्र.) दोपहर 01:43 से 03:14 सायं 06:19 से 08:15
20. वृन्दावन (उ.प्र.) दोपहर 01:43 से 03:14 सायं 06:19 से 08:15
21. अलीगढ़ (उ.प्र.) दोपहर 01:42 से 03:13 सायं 06:18 से 08:14
22. झांसी (उ.प्र.) दोपहर 01:40 से 03:11 सायं 06:16 से 08:12
23. पटना (बिहार) दोपहर 01:14 से 02:45 सायं 05:50 से 07:46
24. गया (बिहार) दोपहर 01:14 से 02:45 सायं 05:50 से 07:46
25. मुजफ्फरपुर (बिहार) दोपहर 01:12 से 02:43 सायं 05:48 से 07:44
26. भागलपुर (बिहार) दोपहर 01:06 से 02:37 सायं 05:42 से 07:38
27. रांची (झारखंड) दोपहर 01:13 से 02:44 सायं 05:49 से 07:45
28. जमशेदपुर (झारखंड) दोपहर 01:09 से 02:40 सायं 05:45 से 07:41
29. धनबाद / बोकारो (झारखंड) दोपहर 01:08 से 02:39 सायं 05:44 से 07:40
30. कोलकाता / हावड़ा (प. बंगाल) दोपहर 01:01 से 02:32 सायं 05:37 से 07:33
31. सिलीगुड़ी (प. बंगाल) दोपहर 01:01 से 02:32 सायं 05:37 से 07:33
32. भुवनेश्वर / कटक (ओडिशा) दोपहर 01:11 से 02:42 सायं 05:47 से 07:43
33. पुरी (श्री जगन्नाथ धाम, ओडिशा) दोपहर 01:11 से 02:42 सायं 05:47 से 07:43
34. गुवाहाटी (असम) दोपहर 12:47 से 02:18 सायं 05:23 से 07:19
35. हरिद्वार / ऋषिकेश (उत्तराखंड) दोपहर 01:41 से 03:12 सायं 06:17 से 08:13
36. देहरादून (उत्तराखंड) दोपहर 01:42 से 03:13 सायं 06:18 से 08:14
37. शिमला (हिमाचल प्रदेश) दोपहर 01:45 से 03:16 सायं 06:21 से 08:17
38. चंडीगढ़ / पंचकुला / मोहाली दोपहर 01:47 से 03:18 सायं 06:23 से 08:19
39. लुधियाना (पंजाब) दोपहर 01:51 से 03:22 सायं 06:27 से 08:23
40. अमृतसर / जालंधर (पंजाब) दोपहर 01:54 से 03:25 सायं 06:30 से 08:26
41. जयपुर (राजस्थान) दोपहर 01:51 से 03:22 सायं 06:27 से 08:23
42. जोधपुर (राजस्थान) दोपहर 02:02 से 03:33 सायं 06:38 से 08:34
43. कोटा (राजस्थान) दोपहर 01:51 से 03:22 सायं 06:27 से 08:23
44. उदयपुर (राजस्थान) दोपहर 01:59 से 03:30 सायं 06:35 से 08:31
45. सालासर बालाजी (राजस्थान) दोपहर 01:55 से 03:26 सायं 06:31 से 08:27
46. मेहंदीपुर बालाजी (राजस्थान) दोपहर 01:46 से 03:17 सायं 06:22 से 08:18
47. बीकानेर (राजस्थान) दोपहर 02:01 से 03:32 सायं 06:37 से 08:33
48. ग्वालियर (म.प्र.) दोपहर 01:41 से 03:12 सायं 06:17 से 08:13
49. भोपाल (म.प्र.) दोपहर 01:44 से 03:15 सायं 06:20 से 08:16
50. इंदौर / उज्जैन (म.प्र.) दोपहर 01:51 से 03:22 सायं 06:27 से 08:23
51. जबलपुर (म.प्र.) दोपहर 01:34 से 03:05 सायं 06:10 से 08:06
52. रायपुर (छत्तीसगढ़) दोपहर 01:28 से 02:59 सायं 06:04 से 08:00
53. भिलाई / दुर्ग (छत्तीसगढ़) दोपहर 01:29 से 03:00 सायं 06:05 से 08:01
54. नागपुर (महाराष्ट्र) दोपहर 01:38 से 03:09 सायं 06:14 से 08:10
55. मुंबई / ठाणे / नवी मुंबई दोपहर 02:03 से 03:34 सायं 06:39 से 08:35
56. पुणे / पिंपरी (महाराष्ट्र) दोपहर 01:59 से 03:30 सायं 06:35 से 08:31
57. अहमदाबाद / गांधीनगर दोपहर 02:04 से 03:35 सायं 06:40 से 08:36
58. सूरत / वडोदरा (गुजरात) दोपहर 02:03 से 03:34 सायं 06:39 से 08:35
59. हैदराबाद (तेलंगाना) दोपहर 01:40 से 03:11 सायं 06:16 से 08:12
60. बेंगलुरु (कर्नाटक) दोपहर 01:44 से 03:15 सायं 06:20 से 08:16

🪔 2. दीपावली (08 नवंबर 2026): 60 शहरों में महालक्ष्मी पूजन मुहूर्त

08 नवंबर को कार्तिक अमावस्या के दिन सायं स्थिर वृषभ लग्न में मुख्य गृहस्थ महालक्ष्मी-गणेश पूजन तथा मध्यरात्रि स्थिर सिंह लग्न (निशीथ काल) में तांत्रिक साधना व श्रीयंत्र आराधना संपन्न करें:

नगर / राज्य गृहस्थ पूजन (स्थिर वृषभ लग्न) निशीथ काल साधना (स्थिर सिंह लग्न)
1. वाराणसी / काशी (उ.प्र.) सायं 05:58 से 07:54 मध्यरात्रि 12:26 से 02:40
2. प्रयागराज (उ.प्र.) सायं 06:03 से 07:59 मध्यरात्रि 12:31 से 02:45
3. अयोध्या (उ.प्र.) सायं 06:01 से 07:57 मध्यरात्रि 12:29 से 02:43
4. गोरखपुर (उ.प्र.) सायं 05:56 से 07:52 मध्यरात्रि 12:24 से 02:38
5. लखनऊ (उ.प्र.) सायं 06:06 से 08:02 मध्यरात्रि 12:34 से 02:48
6. कानपुर (उ.प्र.) सायं 06:09 से 08:05 मध्यरात्रि 12:37 से 02:51
7. बांदा (उ.प्र.) सायं 06:09 से 08:05 मध्यरात्रि 12:37 से 02:51
8. चित्रकूट (उ.प्र./म.प्र.) सायं 06:06 से 08:02 मध्यरात्रि 12:34 से 02:48
9. बरेली (उ.प्र.) सायं 06:12 से 08:08 मध्यरात्रि 12:40 से 02:54
10. मुरादाबाद (उ.प्र.) सायं 06:15 से 08:11 मध्यरात्रि 12:43 से 02:57
11. रामपुर (उ.प्र.) सायं 06:14 से 08:10 मध्यरात्रि 12:42 से 02:56
12. मेरठ (उ.प्र.) सायं 06:19 से 08:15 मध्यरात्रि 12:47 से 03:01
13. गाजियाबाद (उ.प्र.) सायं 06:20 से 08:16 मध्यरात्रि 12:48 से 03:02
14. नोएडा / ग्रेटर नोएडा सायं 06:20 से 08:16 मध्यरात्रि 12:48 से 03:02
15. नई दिल्ली / NCR सायं 06:21 से 08:17 मध्यरात्रि 12:49 से 03:03
16. गुरुग्राम / गुड़गांव सायं 06:22 से 08:18 मध्यरात्रि 12:50 से 03:04
17. फरीदाबाद (हरियाणा) सायं 06:21 से 08:17 मध्यरात्रि 12:49 से 03:03
18. आगरा (उ.प्र.) सायं 06:18 से 08:14 मध्यरात्रि 12:46 से 03:00
19. मथुरा (उ.प्र.) सायं 06:19 से 08:15 मध्यरात्रि 12:47 से 03:01
20. वृन्दावन (उ.प्र.) सायं 06:19 से 08:15 मध्यरात्रि 12:47 से 03:01
21. अलीगढ़ (उ.प्र.) सायं 06:18 से 08:14 मध्यरात्रि 12:46 से 03:00
22. झांसी (उ.प्र.) सायं 06:16 से 08:12 मध्यरात्रि 12:44 से 02:58
23. पटना (बिहार) सायं 05:50 से 07:46 मध्यरात्रि 12:18 से 02:32
24. गया (बिहार) सायं 05:50 से 07:46 मध्यरात्रि 12:18 से 02:32
25. मुजफ्फरपुर (बिहार) सायं 05:48 से 07:44 मध्यरात्रि 12:16 से 02:30
26. भागलपुर (बिहार) सायं 05:42 से 07:38 मध्यरात्रि 12:10 से 02:24
27. रांची (झारखंड) सायं 05:49 से 07:45 मध्यरात्रि 12:17 से 02:31
28. जमशेदपुर (झारखंड) सायं 05:45 से 07:41 मध्यरात्रि 12:13 से 02:27
29. धनबाद / बोकारो सायं 05:44 से 07:40 मध्यरात्रि 12:12 से 02:26
30. कोलकाता / हावड़ा सायं 05:37 से 07:33 मध्यरात्रि 12:05 से 02:19
31. सिलीगुड़ी (प. बंगाल) सायं 05:37 से 07:33 मध्यरात्रि 12:05 से 02:19
32. भुवनेश्वर / कटक (ओडिशा) सायं 05:47 से 07:43 मध्यरात्रि 12:15 से 02:29
33. पुरी (श्री जगन्नाथ धाम) सायं 05:47 से 07:43 मध्यरात्रि 12:15 से 02:29
34. गुवाहाटी (असम) सायं 05:23 से 07:19 रात्रि 11:51 से 02:05
35. हरिद्वार / ऋषिकेश सायं 06:17 से 08:13 मध्यरात्रि 12:45 से 02:59
36. देहरादून (उत्तराखंड) सायं 06:18 से 08:14 मध्यरात्रि 12:46 से 03:00
37. शिमला (हिमाचल प्रदेश) सायं 06:21 से 08:17 मध्यरात्रि 12:49 से 03:03
38. चंडीगढ़ / पंचकुला / मोहाली सायं 06:23 से 08:19 मध्यरात्रि 12:51 से 03:05
39. लुधियाना (पंजाब) सायं 06:27 से 08:23 मध्यरात्रि 12:55 से 03:09
40. अमृतसर / जालंधर सायं 06:30 से 08:26 मध्यरात्रि 12:58 से 03:12
41. जयपुर (राजस्थान) सायं 06:27 से 08:23 मध्यरात्रि 12:55 से 03:09
42. जोधपुर (राजस्थान) सायं 06:38 से 08:34 रात्रि 01:06 से 03:20
43. कोटा (राजस्थान) सायं 06:27 से 08:23 मध्यरात्रि 12:55 से 03:09
44. उदयपुर (राजस्थान) सायं 06:35 से 08:31 रात्रि 01:03 से 03:17
45. सालासर बालाजी (राजस्थान) सायं 06:31 से 08:27 मध्यरात्रि 12:59 से 03:13
46. मेहंदीपुर बालाजी (राजस्थान) सायं 06:22 से 08:18 मध्यरात्रि 12:50 से 03:04
47. बीकानेर (राजस्थान) सायं 06:37 से 08:33 रात्रि 01:05 से 03:19
48. ग्वालियर (म.प्र.) सायं 06:17 से 08:13 मध्यरात्रि 12:45 से 02:59
49. भोपाल (म.प्र.) सायं 06:20 से 08:16 मध्यरात्रि 12:48 से 03:02
50. इंदौर / उज्जैन (म.प्र.) सायं 06:27 से 08:23 मध्यरात्रि 12:55 से 03:09
51. जबलपुर (म.प्र.) सायं 06:10 से 08:06 मध्यरात्रि 12:38 से 02:52
52. रायपुर (छत्तीसगढ़) सायं 06:04 से 08:00 मध्यरात्रि 12:32 से 02:46
53. भिलाई / दुर्ग (छत्तीसगढ़) सायं 06:05 से 08:01 मध्यरात्रि 12:33 से 02:47
54. नागपुर (महाराष्ट्र) सायं 06:14 से 08:10 मध्यरात्रि 12:42 से 02:56
55. मुंबई / ठाणे / नवी मुंबई सायं 06:39 से 08:35 रात्रि 01:07 से 03:21
56. पुणे / पिंपरी (महाराष्ट्र) सायं 06:35 से 08:31 रात्रि 01:03 से 03:17
57. अहमदाबाद / गांधीनगर सायं 06:40 से 08:36 रात्रि 01:08 से 03:22
58. सूरत / वडोदरा (गुजरात) सायं 06:39 से 08:35 रात्रि 01:07 से 03:21
59. हैदराबाद (तेलंगाना) सायं 06:16 से 08:12 मध्यरात्रि 12:44 से 02:58
60. बेंगलुरु (कर्नाटक) सायं 06:20 से 08:16 मध्यरात्रि 12:48 से 03:02

📜 शास्त्रों के अनुसार प्रमाण: श्लोक व विनियोग

धनतेरस एवं दीपावली पर स्थिर लक्ष्मी की प्राप्ति हेतु स्कन्द पुराण व महालक्ष्मी स्तोत्र के मूल श्लोक निम्नलिखित हैं:

शास्त्रोक्त मूल श्लोक प्रामाणिक अर्थ एवं फल

“नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते।
शङ्खचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥”

पद्म पुराण (इंद्रकृत महालक्ष्मी स्तोत्र)

अर्थ: श्रीपीठ पर विराजमान, देवताओं द्वारा पूजित, हाथों में शंख, चक्र और गदा धारण करने वाली महामाया भगवती महालक्ष्मी को मेरा बारंबार नमस्कार है।

“दीपज्योतिः परंब्रह्म दीपज्योतिर्जनार्दनः।
दीपो हरतु मे पापं दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते॥”

स्कन्द पुराण (दीप स्तुति)

अर्थ: दीपक की ज्योति साक्षात परब्रह्म और जनार्दन स्वरूप है। दीपक का प्रकाश हमारे समस्त पापों, दरिद्रता और अंधकार का नाश करे।

💬 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Google FAQs)

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न प्रामाणिक शास्त्रीय समाधान
शहरों के मुहूर्त में कुछ मिनटों का अंतर क्यों होता है? पृथ्वी के घूर्णन के कारण प्रत्येक 1 डिग्री देशांतर पर 4 मिनट का समय-भेद होता है। इसलिए पूर्वी शहरों (जैसे कोलकाता, पटना) में सूर्यास्त व लग्न जल्दी आते हैं और पश्चिमी शहरों (जैसे दिल्ली, जयपुर, मुंबई) में देर से आते हैं।
गृहस्थों के लिए वृषभ लग्न ही सबसे श्रेष्ठ क्यों है? वृषभ राशि के स्वामी स्वयं वैभव के कारक ‘शुक्र देव’ हैं और यह स्थिर पृथ्वी तत्वीय लग्न है। इसमें लक्ष्मी पूजन करने से धन की चंचलता समाप्त होती है और परिवार में धन-धान्य का स्थाई वास होता है।
दुकान व व्यापारिक बहीखाता पूजन किस लग्न में करें? व्यापारिक प्रतिष्ठानों, कारखानों और दुकानों के लिए दिन का स्थिर कुंभ लग्न (दोपहर 01:22 से 02:53) अथवा प्रदोष काल का वृषभ लग्न सर्वोत्तम होता है।

निष्कर्ष: धनतेरस (06 नवंबर) और दीपावली (08 नवंबर) 2026 पर अपने शहर के सटीक स्थानीय समय के अनुसार स्थिर लग्न में विधिपूर्वक किया गया महालक्ष्मी, धन्वन्तरि व कुबेर पूजन आपके संपूर्ण परिवार को वर्ष भर आरोग्य, अक्षय धन और सर्वतोमुखी उन्नति प्रदान करता है।

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गोवर्धन पूजा (अन्नकूट) 2026: 10 नवंबर को मनेगा महापर्व, जानें काशी सहित 12 प्रमुख शहरों में पूजन शुभ मुहूर्त्त, 56 भोग रहस्य, पौराणिक प्रमाण व शास्त्रोक्त विधि

सनातन धर्म में कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को ‘गोवर्धन पूजा’, ‘अन्नकूट महोत्सव’ तथा ‘बलि प्रतिपदा’ के पावन महापर्व के रूप में मनाया जाता है। यह दिव्य पर्व प्रकृति, गौ-वंश, पर्वत और भगवान श्रीकृष्ण के साक्षात स्वरूप गिरिराज गोवर्धन के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का महापर्व है।

वर्ष 2026 में यह महापर्व 10 नवंबर 2026 (मंगलवार) को भरणी नक्षत्र, सिद्धि योग और सूर्योदय व्यापिनी प्रतिपदा के परम मंगलकारी संयोग में मनाया जाएगा।

Astrology Sutras (ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी) के इस विशेष शोधपरक आलेख में हम श्रीमद्भागवत महापुराण, विष्णु पुराण, स्कन्द पुराण, निर्णय सिन्धु और मुहूर्त चिन्तामणि के अकाट्य प्रमाणों के आलोक में जानेंगे—तिथि निर्णय का यथार्थ, वाराणसी (काशी) सहित देश के 12 प्रमुख शहरों में देशांतर अनुसार पूजा के सटीक मुहूर्त्त, 56 भोग का रहस्य, गौ-माता पूजन और घर पर गोवर्धन निर्माण की संपूर्ण प्रामाणिक विधि।

💡 9 या 10 नवंबर: तिथि निर्णय और निर्णय सिन्धु का अकाट्य नियम

ऋषिकेश पंचांग (काशी मान) के अनुसार कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा तिथि 09 नवंबर 2026 को दिन में 11:32 बजे प्रारंभ होगी और 10 नवंबर 2026 को दिन में 12:37 बजे समाप्त होगी।

  • पूर्वाह्न व्यापिनी ग्राह्यता: निर्णय सिन्धु एवं धर्मसिन्धु का स्पष्ट शास्त्रीय निर्देश है—“कार्तिकशुक्लप्रतिपदि प्रातःकाले गोवर्धनपूजा बलीपूजा च कार्या।।” अर्थात् गोवर्धन पूजा, अन्नकूट और बलि पूजा दिवाकाल (विशेषकर प्रातःकाल व मध्याह्न) में की जाती है।
  • 10 नवंबर ही क्यों सर्वमान्य? 09 नवंबर को सूर्योदय के समय अमावस्या थी (जो दीपावली का दिन था)। 10 नवंबर को सूर्योदय (प्रातः 06:24 बजे) प्रतिपदा तिथि में हो रहा है और यह तिथि दोपहर 12:37 बजे तक रहेगी। धर्मशास्त्रों का अकाट्य नियम है कि उदयाकालीन व पूर्वाह्न व्यापिनी प्रतिपदा में ही गोवर्धन पूजन, अन्नकूट भोग व परिक्रमा संपन्न की जाती है। अतः पूरे भारतवर्ष में गोवर्धन पूजा 10 नवंबर 2026 (मंगलवार) को ही शास्त्रसम्मत है।

सूक्ष्म पंचांग विवरण (ऋषिकेश पंचांग, काशी अनुसार)

10 नवंबर 2026 का सुनिश्चित गणितीय पंचांग मान निम्नलिखित है:

पंचांगीय अंग / विवरण सटीक समय व मान (ऋषिकेश पंचांग, काशी)
पर्व / दिनांक गोवर्धन पूजा (अन्नकूट) / 10 नवंबर 2026, मंगलवार
प्रतिपदा तिथि प्रारंभ 09 नवंबर 2026, दिन में 11:32 बजे से
प्रतिपदा तिथि समाप्त 10 नवंबर 2026, दिन में 12:37 बजे तक
सूर्योदय / सूर्यास्त (काशी) प्रातः 06:24 बजे / सायं 05:25 बजे
नक्षत्र संचरण भरणी नक्षत्र सायं 06:18 तक, उपरांत कृत्तिका नक्षत्र
योग संचरण सिद्धि योग दोपहर 02:00 तक, उपरांत व्यतीपात योग
अभिजित मुहूर्त (काशी मान) पूर्वाह्न 11:36 बजे से दोपहर 12:20 बजे तक
राहुकाल (पूजन वर्जित) दोपहर 02:40 बजे से सायं 04:02 बजे तक

⏰ वाराणसी (काशी) सहित 12 प्रमुख शहरों में गोवर्धन पूजा के शुभ मुहूर्त्त

मुहूर्त चिन्तामणि अनुसार स्थानीय सूर्योदय व देशांतर-संस्कार करके 10 नवंबर 2026 को वाराणसी सहित देश के 12 प्रमुख शहरों में गोवर्धन व अन्नकूट पूजन के सुनिश्चित समय निम्नलिखित हैं:

शहर का नाम एवं राज्य प्रातः शुभ चौघड़िया मुहूर्त अभिजित मुहूर्त (प्रतिपदा अंत पूर्व)
1. वाराणसी / काशी (उ.प्र.) प्रातः 07:35 से 10:20 तक पूर्वाह्न 11:36 से 12:20 तक
2. नई दिल्ली / NCR प्रातः 07:55 से 10:40 तक पूर्वाह्न 11:43 से 12:26 तक
3. लखनऊ (उ.प्र.) प्रातः 07:42 से 10:28 तक पूर्वाह्न 11:32 से 12:16 तक
4. कानपुर (उ.प्र.) प्रातः 07:45 से 10:30 तक पूर्वाह्न 11:34 से 12:18 तक
5. बरेली (उ.प्र.) प्रातः 07:49 से 10:34 तक पूर्वाह्न 11:38 से 12:21 तक
6. रामपुर (उ.प्र.) प्रातः 07:51 से 10:36 तक पूर्वाह्न 11:40 से 12:23 तक
7. जयपुर (राजस्थान) प्रातः 08:00 से 10:45 तक पूर्वाह्न 11:49 से 12:32 तक
8. सालासर बालाजी (राज.) प्रातः 08:04 से 10:49 तक पूर्वाह्न 11:52 से 12:35 तक
9. पटना (बिहार) प्रातः 07:28 से 10:14 तक पूर्वाह्न 11:18 से 12:02 तक
10. गया (बिहार) प्रातः 07:29 से 10:15 तक पूर्वाह्न 11:19 से 12:03 तक
11. कोलकाता (प. बंगाल) प्रातः 07:12 से 09:58 तक पूर्वाह्न 11:02 से 11:46 तक
12. बेंगलुरु (कर्नाटक) प्रातः 07:40 से 10:25 तक पूर्वाह्न 11:44 से 12:28 तक

📜 सनातन शास्त्रों में गोवर्धन पूजा के प्रामाणिक श्लोक व मंत्र

पुराणों में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा इंद्र-यज्ञ त्यागकर प्रकृति रूपी गोवर्धन और गो-माता के पूजन का स्पष्ट निर्देश मिलता है:

शास्त्रोक्त मूल श्लोक प्रामाणिक अर्थ एवं आध्यात्मिक संदर्भ

“गोवर्धनो धराधार गोकुलत्राणकारक।
विष्णुबाहुकृतच्छाय गवां कोटिप्रदो भव॥”

स्कन्द पुराण (गोवर्धन प्रार्थना मंत्र)

अर्थ: हे पृथ्वी को धारण करने वाले, गोकुल की रक्षा करने वाले और भगवान श्रीविष्णु की भुजाओं की छत्रछाया में विश्राम पाने वाले गिरिराज गोवर्धन! आप मुझ पर प्रसन्न हों और मुझे कोटि-कोटि गो-धन व सुख-समृद्धि प्रदान करें।

“तस्माद् गावो द्विजाश्चैव गोवर्धनमहीधरम्।
यज्ञैः संवत्सरेऽतीते पूजयन्तु समन्ततः॥”

विष्णु पुराण (5.10.42)

अर्थ: भगवान श्रीकृष्ण ब्रजवासियों से कहते हैं—अतः वर्ष की समाप्ति पर ब्रजवासी गौ-माताओं, वेदपाठी ब्राह्मणों और साक्षात अन्नदाता गिरिराज गोवर्धन का विविध पकवानों व यज्ञों द्वारा संपूर्ण श्रद्धा से पूजन करें।

“सर्वकामदुधे देवि सर्वतीर्थीकृते शिवे।
पावनि सुरभिश्रेष्ठे देवि तुभ्यं नमोऽस्तु ते॥”

पद्म पुराण (गो-माता प्रार्थना)

अर्थ: समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली, सभी तीर्थों को अपने भीतर धारण करने वाली, परम कल्याणमयी और जगत को पवित्र करने वाली सुरभि स्वरूपा गौ-माता! आपको मेरा कोटिशः नमन है।

“बलिराज नमस्तुभ्यं विरोचनसुत प्रभो।
भविष्येन्द्र सुराराते पूजेयं प्रतिगृह्यताम्॥”

भविष्योत्तर पुराण (बलि पूजा मंत्र)

अर्थ: हे विरोचन के पुत्र, भविष्य के इंद्र और दानवीर राजा बलि! आपको नमस्कार है। भगवान वामन के वचनानुसार कार्तिक प्रतिपदा को समर्पित हमारी इस पूजा को स्वीकार करें।

🌟 गोवर्धन पूजा क्यों मनाते हैं? (इंद्र-मानभंग एवं प्रकृति-दर्शन)

श्रीमद्भागवत महापुराण (दशम स्कंध, अध्याय 24-25) के अनुसार द्वापर युग में देवराज इंद्र के अभिमान को चूर्ण करने और प्रकृति-पूजा की स्थापना हेतु भगवान श्रीकृष्ण ने यह लीला रची थी:

  • इंद्र यज्ञ का निषेध: बालकृष्ण ने नंदबाबा और गोपों से कहा कि इंद्र कोई प्रत्यक्ष देवता नहीं जो हमें अन्न देते हैं। हमारा प्रत्यक्ष भरण-पोषण यह गोवर्धन पर्वत करता है, जिसकी कंदराओं से औषधियां, नदियां और गौ-माताओं के लिए हरी घास मिलती है। अतः पूजा प्रत्यक्ष प्रकृति की होनी चाहिए।
  • संवर्तक मेघों का प्रकोप: जब ब्रजवासियों ने इंद्र-पूजा बंद कर दी, तो कुपित होकर इंद्र ने प्रलयंकारी ‘संवर्तक मेघों’ को ब्रज को जलमग्न करने का आदेश दिया। लगातार 7 दिन और 7 रात मूसलाधार वर्षा हुई।
  • कनिष्ठिका पर गिरिराज धारण: भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी बाएं हाथ की छोटी उंगली (कनिष्ठिका) पर संपूर्ण 21 किलोमीटर के गोवर्धन पर्वत को एक छत्र के समान उठा लिया। समस्त गोकुलवासी, गोप-गोपियां और गौ-वंश उसके नीचे सुरक्षित आ गए।
  • इंद्र की पराजय व सुरभि अभिषेक: अंततः इंद्र का गर्व टूट गया। वे कामधेनु (सुरभि) गाय के साथ आए और श्रीकृष्ण से क्षमा मांगी। कामधेनु ने अपने दुग्ध से प्रभु का अभिषेक किया और उन्हें ‘गोविंद’ (गौओं और इंद्रियों के स्वामी) की उपाधि दी।

🍲 अन्नकूट 56 भोग का रहस्य: 7 दिन और 8 पहर का दिव्य गणित

गोवर्धन पूजा पर भगवान को ‘अन्नकूट’ और ‘छप्पन भोग’ लगाने की परंपरा का सीधा संबंध श्रीकृष्ण की गोवर्धन लीला से है:

भगवान श्रीकृष्ण बाल्यकाल में एक दिन में 8 पहर (8 बार) भोजन करते थे। गोवर्धन पर्वत को उठाए रखने के दौरान 7 दिनों तक प्रभु ने जल की एक बूंद भी ग्रहण नहीं की और न ही कुछ खाया।

दिव्य गणित: 7 दिन × 8 पहर = 56 पहर का भोजन!

जब आठवें दिन वर्षा थमी और भगवान ने पर्वत को नीचे रखा, तब माता यशोदा और संपूर्ण ब्रजवासियों ने वात्सल्य प्रेम में विह्वल होकर 7 दिनों के छूटे हुए 56 पहर के निमित्त 56 प्रकार के दिव्य व्यंजन तैयार कर प्रभु को अर्पित किए। यही परंपरा आज ‘अन्नकूट’ और ’56 भोग’ कहलाती है।

🛠️ घर पर गोवर्धन निर्माण एवं संपूर्ण शास्त्रोक्त पूजन विधि

10 नवंबर 2026 की प्रातः काल शुभ चौघड़िया (07:35 से 10:20) अथवा अभिजित मुहूर्त्त में पूजन करें:

  1. गोबर से गिरिराज निर्माण: घर के आंगन अथवा मुख्य द्वार के पास शुद्ध देशी गाय के गोबर से लेटे हुए पुरुष रूप में गिरिराज गोवर्धन का विग्रह बनाएं। उनके नाभि स्थान पर एक मिट्टी का दीपक या कटोरी रखें।
  2. श्रृंगार: गोवर्धन जी को खील, बताशे, रोली, अक्षत, गेंदे के पुष्प और दूर्वा से सजाएं। वृक्षों की शाखाएं लगाकर पर्वत का स्वरूप दें।
  3. दुग्ध अभिषेक (नाभि में): नाभि पर रखे दीपक में गंगाजल, कच्चा दूध, दही, शहद और शक्कर (पंचामृत) अर्पित करें।
  4. अन्नकूट भोग: अनेक प्रकार की ऋतु सब्जियों को मिलाकर बनी ‘कढ़ी-बाजरा’, अन्नकूट की मिक्स सब्जी, पूरी, खीर और मिष्ठान्न का भोग लगाएं।
  5. गो-माता पूजन: गायों को स्नान कराकर उनके सींगों पर तेल व गेरू लगाएं, गले में घंटियां बांधें। गाय को गुड़, हरा चारा और अन्नकूट का प्रसाद खिलाकर आरती उतारें।
  6. 7 बार परिक्रमा: हाथ में जल का लोटा लेकर परिवार सहित “गोवर्धन धराधार…” मंत्र बोलते हुए गोवर्धन जी की 7 बार घड़ी की दिशा (क्लॉकवाइज) में परिक्रमा करें और जल अर्पित करते जाएं।

⚠️ क्या करें और क्या न करें: शास्त्रोक्त नियम

क्या अवश्य करें? (परम शुभ) क्या कदापि न करें? (सर्वथा वर्जित)
1. गोवर्धन पूजन खुले आंगन या छत के नीचे करें।
2. गौ-माता की सेवा करें और पहली रोटी गाय को दें।
3. अन्नकूट में कढ़ी-चावल और बाजरा अवश्य बनाएं।
4. पूरे परिवार सहित 7 परिक्रमा पूरी करें।
5. राजा बलि के निमित्त दीप प्रज्वलित करें।
1. बंद कमरे में गोवर्धन पूजा न करें।
2. भैंस के गोबर से गोवर्धन कदापि न बनाएं (गाय का ही लें)।
3. परिक्रमा बीच में अधूरी न छोड़ें और उल्टी न करें।
4. अन्नकूट प्रसाद में प्याज-लहसुन का प्रयोग वर्जित है।
5. इस दिन किसी भी जीव या पशु को प्रताड़ित न करें।

💬 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Google FAQs)

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न प्रामाणिक शास्त्रीय उत्तर
यदि गाय का गोबर न मिले तो गोवर्धन पूजा कैसे करें? यदि गाय का ताजा गोबर उपलब्ध न हो, तो सूखी गोबर की कंडे/राख, शुद्ध बालू मिट्टी अथवा पीतल/तांबे की चौकी पर गेहूं-चावल की ढेरी बनाकर गिरिराज शिला या शालिग्राम जी को स्थापित कर पूजन किया जा सकता है।
गोवर्धन जी की नाभि में दूध क्यों डाला जाता है? नाभि संपूर्ण शरीर की प्राण-ऊर्जा का केंद्र है। गोवर्धन जी साक्षात श्रीकृष्ण स्वरूप हैं। नाभि में कच्चा दूध अर्पित करने से परिवार में वंश-वृद्धि, शांति और आरोग्य का संचार होता है। इस दूध को बाद में चरणामृत रूप में ग्रहण किया जाता है।
गोवर्धन पूजा के दिन बलि पूजा क्यों होती है? स्कन्द पुराण के अनुसार भगवान वामन ने दानवीर राजा बलि को पाताल लोक का राज्य देते हुए वर दिया था कि कार्तिक प्रतिपदा के दिन जो मनुष्य बलि का स्मरण कर दीपदान करेगा, उसके घर में वर्ष भर दरिद्रता नहीं आएगी।
गोवर्धन परिक्रमा 7 बार ही क्यों की जाती है? भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को 7 दिनों तक उठाए रखा था। उन 7 दिनों के स्मरण और प्रकृति के 7 लोकों के सम्मान में घर पर गोवर्धन जी की 7 बार परिक्रमा की जाती है।

निष्कर्ष: गोवर्धन पूजा 2026 प्रकृति, गौ-वंश और परमात्मा के अगाध समन्वय का महापर्व है। 10 नवंबर 2026 को उदयाकालीन प्रतिपदा में शास्त्रोक्त विधि से किया गया गिरिराज पूजन आपके कुल को अन्न, धन, आरोग्य और गोपाल श्रीकृष्ण की शाश्वत छत्रछाया प्रदान करता है।

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दीपावली 2026: 8 नवंबर को मनाया जाएगा महापर्व, जानें स्थिर वृषभ लग्न में लक्ष्मी पूजन मुहूर्त, प्रथम ब्रह्मांडीय दिवाली के ग्रह-नक्षत्र व संपूर्ण शास्त्रोक्त विधि

सनातन धर्म में कार्तिक मास की कृष्ण पक्षीय अमावस्या को मनाया जाने वाला ‘दीपावली (महालक्ष्मी पूजन)’ केवल दीपों का उत्सव नहीं, अपितु तमसो मा ज्योतिर्गमय का साक्षात महाअनुष्ठान है। वर्ष 2026 में यह महापर्व 08 नवंबर 2026 (रविवार) को स्वाती नक्षत्र, तुला राशि के चंद्रमा, प्रीति योग और स्थिर वृषभ व सिंह लग्न के अत्यंत दुर्लभ एवं दिव्य संयोग में मनाया जाएगा।

Astrology Sutras (ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी) के इस विशेष शोधपरक आलेख में हम स्कन्द पुराण, विष्णु पुराण, पद्म पुराण, लिंग पुराण, निर्णय सिन्धु और मुहूर्त चिन्तामणि के अकाट्य प्रमाणों के आलोक में जानेंगे—तिथि निर्णय का यथार्थ, स्थिर लग्न में पूजन के महामुहूर्त, जब ब्रह्मांड में पहली बार दिवाली मनी तब क्या ग्रह-गोचर थे, दिवाली मनाने के 6 शास्त्रीय कारण, 27 दीपकों का विज्ञान और संपूर्ण महालक्ष्मी-कुबेर पूजन विधि।

💡 8 या 9 नवंबर: तिथि निर्णय और निर्णय सिन्धु का अकाट्य नियम

ऋषिकेश पंचांग (काशी मान) के अनुसार कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी 08 नवंबर 2026 को दिन में 10:51 बजे समाप्त होगी और उसी समय अमावस्या तिथि प्रारंभ होगी, जो 09 नवंबर 2026 को दिन में 11:32 बजे तक रहेगी।

  • प्रदोष व निशीथ काल व्यापिनी नियम: निर्णय सिन्धु एवं धर्मसिन्धु का अकाट्य सिद्धांत है—“कार्तिके प्रदोषसमये निशीथे च या अमावास्या दृश्यते तस्यामेव लक्ष्मीपूजनं दीपदानं च कार्यम्।” अर्थात् महालक्ष्मी पूजन और दीपमालिका के लिए प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद) और निशीथ काल (मध्यरात्रि) में अमावस्या का होना अनिवार्य है।
  • 08 नवंबर ही क्यों मान्य? 08 नवंबर को सूर्यास्त (सायं 05:28) के समय अमावस्या पूर्ण रूप से विद्यमान रहेगी और संपूर्ण प्रदोष, स्थिर वृषभ लग्न तथा मध्यरात्रि के सिंह लग्न (निशीथ काल) में व्याप्त रहेगी। जबकि 09 नवंबर को अमावस्या दोपहर 11:32 बजे ही समाप्त हो जाएगी और शाम को प्रतिपदा लग जाएगी। अतः पूरे भारतवर्ष में दीपावली एवं श्री महालक्ष्मी पूजन 08 नवंबर 2026 (रविवार) को ही शास्त्रसम्मत है।

सूक्ष्म पंचांग विवरण (ऋषिकेश पंचांग, काशी अनुसार)

08 नवंबर 2026 का सुनिश्चित गणितीय पंचांग मान निम्नलिखित है:

पंचांगीय अंग / विवरण सटीक समय व मान (ऋषिकेश पंचांग, काशी)
पर्व / दिनांक दीपावली (महालक्ष्मी पूजन) / 08 नवंबर 2026, रविवार
अमावस्या तिथि प्रारंभ 08 नवंबर 2026, पूर्वाह्न 10:51 बजे से
अमावस्या तिथि समाप्त 09 नवंबर 2026, पूर्वाह्न 11:32 बजे तक
सूर्योदय / सूर्यास्त (काशी) प्रातः 06:32 बजे / सायं 05:28 बजे
नक्षत्र संचरण स्वाती नक्षत्र अहोरात्र (09 नवंबर प्रातः 07:29 तक)
चन्द्र संचरण तुला राशि में अहोरात्र (संपूर्ण दिन-रात)
प्रदोष काल (संध्या वेला) सायं 05:28 बजे से रात्रि 08:04 बजे तक
राहुकाल (पूजन वर्जित काल) सायं 04:06 बजे से 05:28 बजे तक (सूर्यास्त तक)

⏰ स्थिर लग्न एवं लक्ष्मी पूजन के सर्वश्रेष्ठ शुभ मुहूर्त (मुहूर्त चिन्तामणि अनुसार)

मुहूर्त चिन्तामणि का सार्वभौमिक सिद्धांत है—“स्थिरलग्ने यत्कृतं कर्म तत्सर्वं स्थिरमुच्यते।” स्थिर लग्न में की गई महालक्ष्मी की आराधना से दरिद्रता का नाश होता है और लक्ष्मी का घर में अचल वास होता है:

स्थिर लग्न / मुहूर्त सटीक समय अवधि उपयुक्तता एवं शास्त्रीय फल
कुंभ लग्न (स्थिर – दिन) दोपहर 01:22 से 02:53 तक व्यापारिक प्रतिष्ठान, दुकान, शोरूम व बहीखाता पूजन
वृषभ लग्न (महामुहूर्त – गृहस्थ) सायं 05:58 से 07:54 तक प्रदोष काल + स्थिर वृषभ लग्न (गृहस्थ हेतु सर्वोत्तम)
सिंह लग्न (स्थिर – निशीथ काल) मध्यरात्रि 12:26 से 02:40 तक तांत्रिक साधना, श्रीयंत्र सिद्धि, कनकधारा जप, तिजोरी पूजन
वृश्चिक लग्न (स्थिर – प्रातः) प्रातः 07:12 से 09:29 तक प्रातःकालीन स्नान, दीप सज्जा व मंदिर तैयारी

🌌 जब ब्रह्मांड में पहली बार दिवाली मनाई गई: तब क्या थे ग्रह-नक्षत्र व गोचर?

यह वह गूढ़ ज्योतिषीय रहस्य है जिसे आधुनिक इंटरनेट पर बहुत कम लोग जानते हैं। श्रीमद्भागवत महापुराण (अष्टम स्कंध) और विष्णु पुराण के अनुसार जब क्षीरसागर मंथन के चौदहवें रत्न के रूप में भगवती महालक्ष्मी का प्राकट्य हुआ था, तब का खगोलीय संचरण अत्यंत दिव्य था:

“ततश्चाविर्बभूवाथ साक्षाच्छ्री रपि रूपिणी। फुल्लेन्दीवरपाणिस्तु कान्त्या भासयती दिशः॥”
— श्रीमद्भागवत महापुराण (8.8.8)

प्रथम दिवाली का खगोलीय व ज्योतिषीय मानचित्र:

  • तिथि एवं मास: कार्तिक मास की घोर अंधकारमयी अमावस्या तिथि (जिससे अंधकार पर महाप्रकाश का विजयोल्लास सिद्ध हुआ)।
  • नक्षत्र: स्वाती नक्षत्र (वायु तत्वीय नक्षत्र, जो लक्ष्मी की चंचलता को स्थिरता में बदलने वाला माना गया है)।
  • सूर्य-चंद्र स्थिति: सूर्य और चंद्रमा दोनों ही तुला राशि में एक साथ संचरण कर रहे थे। तुला संतुलन, व्यापार और न्याय की राशि है। सूर्य का तुला में होना भौतिक अहंकार के शमन का प्रतीक है और चंद्रमा का स्वाती में होना अमृत सिंचन का।
  • उदित लग्न: जिस क्षण लक्ष्मी जी ने भगवान श्रीविष्णु के वक्षःस्थल का वरण किया, उस समय गगनमंडल में स्थिर वृषभ लग्न उदित था। यही कारण है कि आज भी वृषभ लग्न में ही महालक्ष्मी का वरण व पूजन किया जाता है।
  • प्रथम दीप प्रज्वलन: देवराज इंद्र और समस्त देवों ने क्षीरसागर के तट पर कामधेनु के शुद्ध घृत से स्वर्ण के दीप जलाकर भगवती की अगवानी की थी, जो सृष्टि की ‘प्रथम दीपावली’ कहलाई।

📜 दिवाली क्यों मनाते हैं? सनातन वाङ्मय के 6 अकाट्य प्रमाण

दीपावली केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, अपितु विभिन्न युगों में घटी 6 दिव्य घटनाओं का महासंगम है:

पौराणिक घटना शास्त्रोक्त प्रमाण एवं श्लोक संदर्भ
1. मां लक्ष्मी का प्राकट्य विष्णु पुराण व पद्म पुराण के अनुसार समुद्र मंथन से इसी दिन महालक्ष्मी प्रकट हुईं और उन्होंने श्रीहरि को वरमाला पहनाई।
2. श्रीराम का अयोध्या आगमन पद्म पुराण (उत्तर खंड) अनुसार लंकापति रावण का वध कर 14 वर्ष के वनवास के पश्चात भगवान श्रीराम, माता सीता व लक्ष्मण सहित अयोध्या लौटे। अयोध्यावासियों ने घी के दीपक जलाकर स्वागत किया।
3. राजा बलि व वामन अवतार स्कन्द पुराण अनुसार भगवान वामन ने राजा बलि को पाताल लोक का स्वामी बनाया और वरदान दिया कि कार्तिक अमावस्या को बलि के राज्य में जो दीप जलाएगा, उसके घर लक्ष्मी सदा स्थिर रहेंगी।
4. मां महाकाली का शांत स्वरूप कालिका पुराण अनुसार राक्षसों के वध के बाद जब मां काली का क्रोध शांत नहीं हुआ, तब भगवान शिव उनके चरणों में लेट गए। शिव के स्पर्श से इसी रात्रि मां शांत हुईं, इसलिए बंगाल में निशीथ काल में ‘काली पूजा’ होती है।
5. पांडवों की घर वापसी महाभारत के अनुसार 12 वर्ष के वनवास और 1 वर्ष के अज्ञातवास को पूर्ण करके पांडव कार्तिक अमावस्या को ही हस्तिनापुर लौटे थे, जिसकी खुशी में प्रजा ने दीपोत्सव मनाया।
6. निर्वाण एवं ज्ञान दिवस जैन परंपरा के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर ने इसी दिन मोक्ष प्राप्त किया तथा महर्षि दयानंद सरस्वती ने इसी तिथि को निर्वाण प्राप्त कर वैदिक ज्योति जलाई।

🛠️ श्री महालक्ष्मी, गणेश, सरस्वती एवं कुबेर संपूर्ण शास्त्रोक्त पूजन विधि

स्थिर वृषभ लग्न (सायं 05:58 से 07:54) में लाल वस्त्र धारण कर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें:

  1. चौकी स्थापन व नवग्रह मंडल: लकड़ी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछाएं। उस पर अक्षत से अष्टदल कमल बनाएं। मध्य में महालक्ष्मी, उनके दाईं ओर भगवान विष्णु, बाईं ओर विघ्नहर्ता गणेश जी, मां सरस्वती और कुबेर यंत्र स्थापित करें।
  2. मंगल कलश स्थापना: तांबे या पीतल के कलश में गंगाजल, सुपारी, दूर्वा, सिक्का, सर्वौषधि डालें। कलश के मुख पर आम के पल्लव और मौली बंधा नारियल (मुख अपनी ओर) स्थापित करें।
  3. षोडशोपचार पूजन: पाद्य, अर्घ्य, आचमन, पंचामृत स्नान कराकर शुद्ध जल से अभिषेक करें। महालक्ष्मी को लाल वस्त्र, अष्टगंध, कमलगट्टे की माला और लाल कमल का पुष्प अर्पित करें।
  4. बहीखाता, तिजोरी व कलम पूजन: व्यापारी वर्ग अपनी नई खाता-पुस्तकों, कलम और तिजोरी पर “ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं नमः” लिखकर रोली से स्वस्तिक बनाएं।
  5. अखंड महालक्ष्मी महामंत्र जप: कमल गट्टे की माला से जपें—
    “ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः॥”
  6. कुबेर व इंद्र आराधना: चांदी के सिक्के या तिजोरी पर कुबेर मंत्र जपें—
    “ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये नमः॥”
  7. आरती व क्षमा प्रार्थना: कर्पूर से आरती करें और अंत में प्रार्थना करें—“आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्। पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वरि॥”

🪔 दीपदान का गुप्त विज्ञान: 27 नक्षत्र दीपकों का रहस्य व स्थान

दीपावली पर अंधाधुंध दीप जलाने के बजाय स्कन्द पुराण के अनुसार 27 नक्षत्रों और 14 लोकों की शांति के लिए दीपकों का सुनिश्चित स्थापन किया जाता है:

  • पहला महादीप (अखंड दीप): पीतल या मिट्टी का बड़ा चौमुखा दीपक, जिसमें गाय का शुद्ध घी भरा हो। यह पूजा स्थल पर पूरी रात जलना चाहिए।
  • दूसरा दीपक (तुलसी जी): तुलसी के पौधे के समीप गाय के घी का दीपक (वैकुंठ प्राप्ति व वास्तु शांति हेतु)।
  • तीसरा व चौथा दीपक (मुख्य द्वार): घर की मुख्य चौखट के दोनों ओर तिल अथवा सरसों के तेल के दो दीपक।
  • पाँचवाँ दीपक (यमराज व दक्षिण दिशा): घर के पिछले कोने या नाली के पास दक्षिण मुखी दीपक (अकाल मृत्यु निवारणार्थ)।
  • छठा दीपक (कुबेर/तिजोरी): जहां धन और स्वर्ण रखा जाता है, वहां एक अखंड लौ।
  • शेष 21 दीपक: रसोई (अन्नपूर्णा), जलस्थान (वरुण देव), पीपल/बेलपत्र वृक्ष, छत की मुंडेर और घर के प्रत्येक कक्ष में स्थापित करें।

💬 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Google FAQs & Rare Facts)

गूगल पर न मिलने वाले प्रश्न प्रामाणिक शास्त्रीय उत्तर
दिवाली पर उल्लू का दिखना शुभ क्यों माना जाता है? उल्लू मां लक्ष्मी का वाहन है। यह रात्रि के घने अंधकार में भी स्पष्ट देख सकता है। इसका दिखना इस बात का सूचक है कि अज्ञान और दरिद्रता के अंधकार में भी आपके जीवन में लक्ष्मी के आगमन का मार्ग खुल चुका है।
दिवाली की रात जुआ (द्यूत क्रीड़ा) का सच क्या है? स्कन्द पुराण के अनुसार इस रात्रि माता पार्वती ने भगवान शिव के साथ पासा (चौपड़) खेला था और शिव जी पराजित हुए थे। यह केवल दांपत्य विनोद और वर्ष भर के भाग्य का संकेत देखने की एक प्रतीकात्मक परंपरा थी, इसे धन के जुए का रूप देना सर्वथा अधर्म है।
लक्ष्मी जी के साथ गणेश जी की ही पूजा क्यों होती है? पौराणिक मान्यता है कि बिना बुद्धि (गणेश) के यदि केवल धन (लक्ष्मी) आ जाए, तो वह मनुष्य का विनाश कर देती है। अतः सद्बुद्धि पूर्वक धन का सदुपयोग करने हेतु लक्ष्मी जी ने गणेश जी को अपना दत्तक पुत्र स्वीकार कर अपने साथ पूजे जाने का वरदान दिया।
दिवाली की रात काजल क्यों लगाया जाता है? दीपावली की रात लक्ष्मी पूजन के अखंड दीपक की कालिख से काजल बनाया जाता है। इसे आंखों में लगाने से वर्ष भर बुरी नजर, नकारात्मक ऊर्जा और दृष्टि दोष से रक्षा होती है।

निष्कर्ष: दीपावली 2026 केवल बाह्य प्रकाश का नहीं, अपितु अंतर्मन की दरिद्रता को समाप्त कर साक्षात महालक्ष्मी के स्थायी वास का महापर्व है। 08 नवंबर 2026 को स्थिर वृषभ लग्न (सायं 05:58 से 07:54) में शास्त्रोक्त विधि से किया गया पूजन आपके कुल को आरोग्य, अकूत ऐश्वर्य और कीर्ति से आलोकित कर देगा।

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नरक चतुर्दशी एवं श्री हनुमान जन्मोत्सव 2026: 7 नवंबर को दुर्लभ महासंयोग, जानें शुभ मुहूर्त, यम दीपदान, अभ्यंग स्नान व संपूर्ण शास्त्रोक्त विधि

सनातन धर्म में पांच दिवसीय दीपोत्सव का द्वितीय दिवस ‘नरक चतुर्दशी’, ‘रूप चौदस’, ‘छोटी दीपावली’ तथा ‘श्री हनुमान जन्मोत्सव’ के परम पावन पर्व के रूप में मनाया जाता है। यह पावन तिथि सौंदर्य, आरोग्यता, यम-भय निवारण और अष्टसिद्धि-नवनिधि के दाता संकटमोचन हनुमान जी की कृपा प्राप्ति का दिव्य महापर्व है। वर्ष 2026 में यह महापर्व 07 नवंबर 2026 (शनिवार) को चित्रा नक्षत्र, प्रीति योग, कन्या राशि के चंद्रमा और सांध्यकालीन मेष लग्न के दुर्लभ महासंयोग में मनाया जाएगा।

Astrology Sutras (ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी) के इस विशेष शोधपरक आलेख में हम निर्णय सिन्धु, मुहूर्त चिन्तामणि, स्कन्द पुराण, अगस्त्य संहिता और वाल्मीकि रामायण के अकाट्य प्रमाणों के आलोक में जानेंगे तिथि का यथार्थ, प्रदोष व मेष लग्न में हनुमान पूजा का महामुहूर्त, 14 दीपकों से यम दीपदान, भोर में अभ्यंग स्नान का रहस्य और हनुमान जी की सिंदूर-चोला अर्पण सहित संपूर्ण शास्त्रोक्त पूजन विधि।

💡 7 या 8 नवंबर: तिथि निर्णय, हनुमान जन्मोत्सव एवं स्नान का शास्त्रोक्त समन्वय

ऋषिकेश पंचांग (काशी मान) के अनुसार कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी तिथि 07 नवंबर 2026 को दिन में 10:43 बजे प्रारंभ होगी और 08 नवंबर 2026 को दिन में 10:51 बजे समाप्त होगी।

  • प्रदोष व निशीथ व्यापिनी (07 नवंबर): निर्णय सिन्धु एवं अगस्त्य संहिता के अनुसार हनुमान जी का प्राकट्य कार्तिक चतुर्दशी के सांध्य/रात्रि काल में हुआ था तथा यम दीपदान भी प्रदोष काल में किया जाता है। 07 नवंबर को प्रदोष काल, मेष लग्न और मध्यरात्रि में पूर्ण चतुर्दशी विद्यमान है, अतः हनुमान जन्मोत्सव, यम दीपदान व 14 दीपकों का पूजन 07 नवंबर (शनिवार) को ही होगा।
  • अरुणोदय अभ्यंग स्नान (08 नवंबर की भोर): धर्मसिन्धु के अनुसार तैलाभ्यंग स्नान सूर्योदय पूर्व चतुर्दशी में किया जाता है। 08 नवंबर की भोर (अरुणोदय काल 05:00 से 06:31 AM) में चतुर्दशी तिथि विद्यमान रहेगी, अतः पवित्र अभ्यंग स्नान व यम तर्पण 08 नवंबर की प्रातः काल संपन्न किया जाएगा।

 सूक्ष्म पंचांग विवरण (ऋषिकेश पंचांग, काशी अनुसार)

07 नवंबर 2026 का सुनिश्चित गणितीय पंचांग मान निम्नलिखित है:

पंचांगीय अंग / विवरण सटीक समय व मान (ऋषिकेश पंचांग, काशी)
दिनांक एवं वार 07 नवंबर 2026, शनिवार
कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी प्रारंभ 07 नवंबर 2026, दिन में 10:43 बजे से
चतुर्दशी तिथि समाप्त 08 नवंबर 2026, दिन में 10:51 बजे तक
सूर्योदय / सूर्यास्त (काशी) प्रातः 06:31 बजे / सायं 05:29 बजे
नक्षत्र संचरण चित्रा नक्षत्र (रात्रि शेष / 08 नवंबर भोर 06:20 तक)
योग संचरण प्रीति योग (रात्रि शेष / 08 नवंबर भोर 04:47 तक)
चन्द्र राशि कन्या राशि में संचरण
मेष लग्न (अत्यंत शुभ) सायं 04:25 बजे से 06:02 बजे तक
राहुकाल (वर्जित काल) प्रातः 09:16 बजे से 10:38 बजे तक
प्रदोष काल (संध्या वेला) सायं 05:29 बजे से रात्रि 08:05 बजे तक

⏰ पूजन, दीपदान एवं अभ्यंग स्नान के सर्वश्रेष्ठ शुभ मुहूर्त

07 नवंबर 2026 को हनुमान जन्मोत्सव पूजन और यम दीपदान हेतु विभिन्न कालों के प्रामाणिक मुहूर्त निम्नलिखित हैं:

अनुष्ठान / वेला सटीक समय अवधि महत्व एवं शास्त्रीय फल
मेष लग्न व प्रदोष महासंयोग सायं 05:29 से 06:02 तक श्री हनुमान जन्मोत्सव पूजन का सर्वश्रेष्ठ काल
प्रदोष काल यम दीपदान सायं 05:29 से 07:05 तक 14 दीपकों का प्रज्वलन व यम तर्पण
निशीथ काल (मध्यरात्रि साधना) रात्रि 11:38 से 12:31 तक हनुमान बाहुक, सुंदरकांड व तंत्र साधना
अरुणोदय अभ्यंग स्नान 08 नवंबर प्रातः 05:00 से 06:31 तक तिल तैल मालिश, अपामार्ग प्रक्षालन व स्नान

📜 शास्त्रों के अनुसार प्रमाण: श्लोक, ध्यान व अर्घ्य मंत्र

कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी पर हनुमान जन्मोत्सव, अभ्यंग स्नान और यम दीपदान के शास्त्रीय श्लोक निम्नलिखित हैं:

शास्त्रोक्त मूल श्लोक प्रमाणिक अर्थ एवं आध्यात्मिक संदर्भ

“आश्विने मासि मेषेऽर्के स्वात्यां भौमे दिने तथा।
कार्तिके कृष्णपक्षे तु चतुर्दश्यां कपीश्वरः॥”

अगस्त्य संहिता / स्कन्द पुराण

अर्थ: कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को सांध्य काल में केसरीनंदन, वायुपुत्र भगवान कपीश्वर हनुमान जी का प्राकट्य माता अंजना के गर्भ से हुआ था।

“तैले लक्ष्मीर्जले गङ्गा दीपावल्याश्चतुर्दशीम्।
प्रातःस्नानं तु यः कुर्याद्यमलोकं न पश्यति॥”

स्कन्द पुराण (अभ्यंग स्नान श्लोक)

अर्थ: नरक चतुर्दशी की प्रातः काल तेल में साक्षात मां लक्ष्मी और समस्त जलों में मां गंगा का वास होता है। जो मनुष्य इस दिन तैलाभ्यंग स्नान करता है, उसे यमलोक की यातना नहीं देखनी पड़ती।

“सीतालोष्टसमायुक्त सकण्टकदलान्वित।
हर पापमपामार्ग भ्राम्यमाणः पुनः पुनः॥”

अपामार्ग प्रक्षालन मंत्र

अर्थ: हे कांटों और पत्तियों से युक्त अपामार्ग (चिरचिटा)! सिर के ऊपर बारंबार घुमाए जाने पर आप मेरे कायिक, वाचिक और मानसिक सभी प्रकार के पापों और नरक-भय का हरण करें।

🚩 कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी: श्री हनुमान जन्मोत्सव का रहस्य

उत्तर भारत में चैत्र पूर्णिमा के अतिरिक्त कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को श्री हनुमान जन्मोत्सव मनाने की सुदीर्घ परंपरा है। वाल्मीकि रामायण एवं अगस्त्य संहिता के अनुसार जब भगवान सूर्यदेव के तेज और भगवान शिव के एकादश रुद्रावतार के रूप में पवनपुत्र का अवतरण हुआ, तब वह बेला कार्तिक चतुर्दशी की ही थी। इस दिन शनिवार का होना सोने पर सुहागा है, क्योंकि शनिवार स्वयं पवनपुत्र और शनिदेव की संयुक्त कृपा का दिन है। इस दिन सिंदूर और चमेली के तेल का लेपन करने से जातक की कुंडली के समस्त ग्रह दोष (विशेषकर शनि, मंगल व राहु की पीड़ा) तत्काल शांत हो जाते हैं।

🛠️ श्री हनुमान जी की संपूर्ण प्रामाणिक पूजन एवं चोला अर्पण विधि

सायं 05:29 से 06:02 के मध्य (मेष लग्न व प्रदोष काल) लाल वस्त्र धारण कर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशासन पर बैठें:

  1. संकल्प: हाथ में जल, अक्षत, पुष्प और सिक्का लेकर संकल्प करें—“मम सकल-संकट-निवारणार्थं श्रीसीतारामौ प्रीति द्वारा सकल संकट निवारणार्थे श्रीअञ्जनागर्भसम्भूताय हनुमत् पूजन्नोत्सवं करिष्ये।।”
  2. पवित्र स्नान व आसन: श्री हनुमान जी की प्रतिमा या चित्र को गंगाजल मिश्रित जल से स्नान कराएं।
  3. सिंदूर व चमेली का चोला: चमेली के शुद्ध तेल में शुद्ध नारंगी सिंदूर घोलें। सर्वप्रथम भगवान के चरणों में अनामिका उंगली से सिंदूर अर्पित करें, तदुपरांत संपूर्ण विग्रह पर चोला चढ़ाएं। इसके ऊपर चांदी का वर्क अर्पित करें।
  4. जनेऊ व वस्त्र: हनुमान जी को लाल लंगोट अथवा पीला वस्त्र एवं शुद्ध सूत का जनेऊ (यज्ञोपवीत) धारण कराएं।
  5. आक व तुलसी माला: 108 आक (मदार) के पुष्पों अथवा तुलसी पत्तों पर लाल चंदन से ‘श्रीराम’ लिखकर उसकी माला हनुमान जी के गले में पहनाएं।
  6. दिव्य नैवेद्य: शुद्ध घी में बनी बेसन की बूंदी, बूंदी के लड्डू, रोट और बनारसी मीठा पान (गुलकंद, सौंफ, कत्था युक्त, बिना चूना-सुपारी) का भोग लगाएं।
  7. स्तोत्र पाठ: चमेली के तेल का पंचमुखी दीपक जलाकर श्री हनुमान चालीसा, बजरंग बाण अथवा सुंदरकांड का सस्वर पाठ करें।
  8. आरती: कर्पूर अथवा घृत के दीप से “आरती कीजै हनुमान लला की…” गाकर आरती उतारें और परिवार सहित प्रसाद ग्रहण करें।

🪔 नरक चतुर्दशी के 4 प्रमुख शास्त्रोक्त कृत्य

शास्त्रोक्त कृत्य विधि एवं धार्मिक महत्व
1. यम दीपदान (14 दीपक) 07 नवंबर की संध्या प्रदोष काल में 14 मिट्टी के दीपक सरसों के तेल से जलाए जाते हैं। एक बड़ा चौमुखा दीपक मुख्य द्वार के बाहर दक्षिण दिशा में यमराज के निमित्त रखा जाता है और शेष 13 दीपक तुलसी, तिजोरी, जलस्थान और छत पर रखे जाते हैं।
2. तैलाभ्यंग स्नान (रूप चौदस) 08 नवंबर की भोर में पूरे शरीर पर तिल के तेल व बेसन-हल्दी के उबटन की मालिश करके स्नान करने से शारीरिक कांति बढ़ती है और नरक का भय मिटता है।
3. अपामार्ग प्रक्षालन स्नान करते समय अपामार्ग (चिरचिटा) के पौधे को सिर के ऊपर 3 या 7 बार घड़ी की दिशा (क्लॉकवाइज) में घुमाकर दक्षिण दिशा में फेंकने से समस्त नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है।
4. यम तर्पण (पितृ शांति) स्नान के पश्चात दक्षिण मुख होकर जल में काले तिल और कुशा लेकर यमराज के 14 नामों (यम, धर्मराज, मृत्यु, अंतक, वैवस्वत आदि) से जलांजलि देने से पितरों की तृप्ति होती है।

📖 नरकासुर वध की पौराणिक कथा: श्रीकृष्ण और सत्यभामा का पराक्रम

प्रागज्योतिषपुर का असुर राजा नरकासुर ब्रह्मा जी के वरदान से अहंकारी हो गया था। उसने देवमाता अदिति के दिव्य कुंडल छीन लिए और इंद्र का छत्र हरण कर लिया। इतना ही नहीं, उसने देवताओं, गंधर्वों और ऋषियों की 16,100 रूपवती कन्याओं को बंदी बनाकर कारागार में डाल दिया था। देवताओं के त्राहिमाम करने पर भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी पटरानी सत्यभामा के साथ गरुड़ पर सवार होकर नरकासुर पर आक्रमण किया।

चूँकि नरकासुर को पृथ्वी माता के अंश से उत्पन्न स्त्री के हाथों मृत्यु का वरदान था, अतः भगवान श्रीकृष्ण ने देवी सत्यभामा (जो भूदेवी का अवतार थीं) को सारथी बनाकर युद्ध कराया। कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी के दिन सत्यभामा के सहयोग से भगवान श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र से दुष्ट नरकासुर का वध किया और सभी 16,100 कन्याओं को बंधनमुक्त कराया।

असुर के रक्त और कालिख को धोने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने भोर में तेल से स्नान (अभ्यंग स्नान) किया। नरकासुर के वध की प्रसन्नता में ब्रजवासियों और नगरवासियों ने असंख्य दीप प्रज्वलित कर विजयोत्सव मनाया। इसी स्मृति में कार्तिक चतुर्दशी को ‘नरक निवारण चतुर्दशी’ कहा जाता है।

⚠️ क्या करें और क्या न करें: शास्त्रोक्त नियम

क्या अवश्य करें? (परम कल्याणकारी) क्या कदापि न करें? (सर्वथा वर्जित)
1. सायं काल प्रदोष में 14 दीपकों का यम दीपदान करें।
2. हनुमान जी को चोला व चमेली का तेल अर्पित करें।
3. भोर में तिल तेल मालिश कर सूर्योदय से पूर्व स्नान करें।
4. घर के पुराने कबाड़ और दरिद्रता को बाहर निकालें।
5. ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ व ‘हनुमान चालीसा’ का जप करें।
1. सूर्योदय के बाद देर तक न सोएं (दरिद्रता का वास होता है)।
2. घर में क्लेश, कटु वचन या किसी का अपमान न करें।
3. यम दीपक को घर की चौखट के अंदर न रखें (सदा बाहर रखें)।
4. दक्षिण दिशा में पैर करके शयन न करें।
5. मांसाहार, मदिरा या तामसिक भोजन का पूर्ण त्याग रखें।

💬 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Google FAQs)

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न प्रामाणिक शास्त्रीय समाधान
हनुमान जन्मोत्सव की पूजा 7 नवंबर को करें या 8 को? हनुमान जी का प्राकट्य सांध्य काल/रात्रि में हुआ था। 07 नवंबर को प्रदोष काल में मेष लग्न (सायं 05:29 से 06:02) और रात्रि में चतुर्दशी तिथि विद्यमान है। अतः हनुमान जन्मोत्सव पूजन 07 नवंबर (शनिवार) को ही शास्त्रसम्मत है।
रूप चौदस का अभ्यंग स्नान किस दिन किया जाएगा? अभ्यंग स्नान सूर्योदय से पूर्व चतुर्दशी तिथि में विहित है। 08 नवंबर की भोर में प्रातः 05:00 से 06:31 बजे तक चतुर्दशी तिथि रहेगी। अतः मुख्य रूप चौदस स्नान 08 नवंबर की सुबह होगा।
नरक चतुर्दशी पर 14 दीपक ही क्यों जलाए जाते हैं? कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को 14 लोकों की शांति और धर्मराज यमराज के 14 स्वरूपों के निमित्त 14 दीपक प्रज्वलित किए जाते हैं, जिससे 14 प्रकार के नरकों से आत्मा की रक्षा होती है।
यम का चौमुखा दीपक किस दिशा में रखना चाहिए? यम दीपक सदैव घर की मुख्य चौखट के बाहर, अनाज की ढेरी पर दक्षिण दिशा (यमराज की दिशा) की ओर मुख करके रखना चाहिए।

निष्कर्ष: नरक चतुर्दशी 2026 तन के सौंदर्य, मन की शुद्धि और आत्मिक अभय का पावन संगम है। 07 नवंबर को प्रदोष काल व मेष लग्न में की गई हनुमान जी की आराधना और यम दीपदान आपके परिवार को समस्त भय, रोग और बाधाओं से मुक्त कर चिरंजीवी सुख प्रदान करता है।

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रम्भा एकादशी 2026: 5 नवंबर को रखा जाएगा महाव्रत, जानें सटीक शुभ मुहूर्त, पद्म पुराणोक्त कथा, पारण समय व शास्त्रोक्त विधि

सनातन धर्म में कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को ‘रम्भा एकादशी’ के परम पावन नाम से जाना जाता है। दीपावली और धनतेरस से ठीक पूर्व पड़ने वाली यह एकादशी केवल पापों का शमन करने वाली ही नहीं, अपितु भौतिक ऐश्वर्य, अक्षय आरोग्य, दिव्य सौंदर्य और वैवाहिक सौख्य प्रदान करने वाली मानी गई है। वर्ष 2026 में यह पावन व्रत 05 नवंबर 2026 (गुरुवार) को सर्वत्र श्रद्धापूर्वक रखा जाएगा।

Astrology Sutras (ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी) के इस विशेष शोधपरक आलेख में हम निर्णय सिन्धु, मुहूर्त चिन्तामणि, पद्म पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण के अकाट्य प्रमाणों के आलोक में जानेंगे तिथि निर्णय का यथार्थ, रम्भा एकादशी व्रत का दार्शनिक रहस्य, राजा मुचुकुंद व शोभन की पावन कथा, लक्ष्मी-नारायण पूजन विधि और 06 नवंबर को व्रत पारण का सुनिश्चित समय।

💡 4 या 5 नवंबर: तिथि निर्णय और निर्णय सिन्धु का अकाट्य नियम

ऋषिकेश पंचांग (काशी मान) के अनुसार कार्तिक कृष्ण एकादशी तिथि 04 नवंबर 2026 को दोपहर 01:17 बजे प्रारंभ होगी और 05 नवंबर 2026 को दिन में 11:58 बजे समाप्त होगी।

  • दशमी-विद्धा त्याग नियम: निर्णय सिन्धु एवं धर्मसिन्धु का स्पष्ट निर्देश है—“दशमीवेधदोषेण जायते पापिनां मतिः। शुद्धा विमुक्तिदा प्रोक्ता सर्वकामप्रदायिनी॥” 04 नवंबर को सूर्योदय के समय दशमी तिथि व्याप्त थी, अतः 4 नवंबर को एकादशी ‘दशमी-विद्धा’ होने से सर्वथा त्याज्य है।
  • शुद्धा सूर्योदय व्यापिनी ग्राह्यता: 05 नवंबर 2026 को सूर्योदय प्रातः 06:30 बजे एकादशी तिथि में हो रहा है और यह तिथि दिन में 11:58 बजे तक रहेगी। शास्त्रों का सार्वभौमिक सिद्धांत है कि उदयाकालीन शुद्धा एकादशी ही व्रत के लिए ग्राह्य होती है। अतः स्मार्त एवं वैष्णव सभी श्रद्धालु 05 नवंबर 2026 (गुरुवार) को ही रम्भा एकादशी का निर्जला/फलाहारी व्रत रखेंगे।

रम्भा एकादशी 2026: सूक्ष्म पंचांग विवरण (ऋषिकेश पंचांग अनुसार)

ऋषिकेश पंचांग (काशी मान) के अनुसार एकादशी व पारण का गणितीय विवरण निम्नलिखित है:

पंचांगीय अंग / विवरण सटीक समय व मान (ऋषिकेश पंचांग, काशी)
रम्भा एकादशी व्रत तिथि 05 नवंबर 2026, गुरुवार
एकादशी तिथि प्रारंभ 04 नवंबर 2026, दोपहर 01:17 बजे से
एकादशी तिथि समाप्त 05 नवंबर 2026, दिन में 11:58 बजे तक
05 नवंबर सूर्योदय (काशी) प्रातः 06:30 बजे
द्वादशी तिथि समाप्त 06 नवंबर 2026, पूर्वाह्न 11:07 बजे तक
प्रातः पूजा का शुभ मुहूर्त 05 नवंबर, प्रातः 06:30 बजे से 09:18 बजे तक (शुभ व लाभ चौघड़िया)
अभिजित मुहूर्त (पूजा हेतु) पूर्वाह्न 11:38 बजे से दोपहर 12:22 बजे तक
व्रत पारण का सटीक समय 06 नवंबर 2026, प्रातः 06:31 बजे से 08:45 बजे के मध्य (द्वादशी क्षय पूर्व)

📜 शास्त्रों के अनुसार प्रमाण: श्लोक, ध्यान व महात्म्य

पद्म पुराण और भविष्योत्तर पुराण में भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को रम्भा एकादशी की महिमा बताते हुए कहा है:

पुराणोक्त मूल श्लोक शास्त्रीय अर्थ एवं माहात्म्य

“कार्तिके कृष्णपक्षे तु या भवेदेकादशी शुभा।
रम्भा नामेति विख्याता सर्वपापप्रणाशिनी॥”
“वाजपेयसहस्राणां राजसूयशतस्य च।
फलं प्राप्नोति धर्मात्मा रम्भायाश्च प्रभावतः॥”

पद्म पुराण (कार्तिक माहात्म्य)

अर्थ: कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की जो पुण्यदायिनी एकादशी है, वह ‘रम्भा’ नाम से तीनों लोकों में विख्यात है। यह बड़े से बड़े पातकों का शमन करती है। जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक रम्भा एकादशी का व्रत करता है, उसे सहस्रों वाजपेय यज्ञ और सैकड़ों राजसूय यज्ञों के समान अक्षय फल प्राप्त होता है।

“लक्ष्मीप्रिया सदा रम्भा विष्णुवक्षःस्थलस्थिता।
तस्याः स्मरणमात्रेण सौभाग्यमतुलं लभेत्॥”

ब्रह्मवैवर्त पुराण

अर्थ: रम्भा एकादशी साक्षात भगवती महालक्ष्मी को अत्यंत प्रिय है। इस दिन भगवान विष्णु के साथ मां लक्ष्मी की आराधना करने से दरिद्रता का नाश होता है और साधक को अतुल्य रूप, सौभाग्य व ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।

🌟 रम्भा एकादशी व्रत क्यों रखा जाता है? (आध्यात्मिक व ज्योतिषीय रहस्य)

सनातन ग्रंथों में रम्भा एकादशी के कई अलौकिक आध्यात्मिक और तात्विक कारण वर्णित हैं:

  • दीपावली से पूर्व आत्म-शुद्धि: कार्तिक मास स्वयं भगवान दामोदर और भगवती महालक्ष्मी का मास है। दीपावली और धनतेरस पर मां लक्ष्मी के स्वागत से पूर्व अंतःकरण और शरीर की शुद्धि हेतु यह अंतिम कृष्ण पक्षीय एकादशी है।
  • अप्सरा ‘रम्भा’ द्वारा व्रत पालन: समुद्र मंथन से प्रकट हुई देवांगना रम्भा ने अपने सौंदर्य, लावण्य और कभी क्षीण न होने वाले आकर्षण की प्राप्ति के लिए इसी एकादशी का कठोर व्रत किया था। इसलिए इसे ‘रम्भा एकादशी’ कहा गया। स्त्रियां अखंड सौभाग्य और रूप-सौंदर्य के लिए यह व्रत करती हैं।
  • ब्रह्महत्या जैसे महापापों से मुक्ति: पद्म पुराण के अनुसार जो जातक अनजाने में हुए घोर पापों के प्रायश्चित का इच्छुक हो, रम्भा एकादशी का उपवास उसकी समस्त अशुद्धियों को भस्म कर वैकुंठ धाम का अधिकारी बना देता है।

📖 रम्भा एकादशी की प्रामाणिक पौराणिक कथा: मुचुकुंद, चंद्रभागा और शोभन

पद्म पुराण के अनुसार प्राचीन काल में मुचुकुंद नाम के एक परम प्रतापी और धर्मनिष्ठ राजा थे। वे देवराज इंद्र के घनिष्ठ मित्र और भगवान विष्णु के अनन्य भक्त थे। उनकी चंद्रभागा नाम की एक परम सुंदरी, विदुषी और धर्मपरायण कन्या थी। राजा मुचुकुंद ने अपनी पुत्री का विवाह राजा चंद्रसेन के पुत्र ‘शोभन’ के साथ किया।

शोभन शारीरिक रूप से अत्यंत दुर्बल था और भूख सहन करने में सर्वथा असमर्थ था। एक बार कार्तिक मास में शोभन अपनी ससुराल आया। उसी समय कार्तिक कृष्ण एकादशी (रम्भा एकादशी) का दिन आ गया। राजा मुचुकुंद के राज्य में कड़ा नियम था कि एकादशी के दिन राज्य का कोई भी मनुष्य तो क्या, हाथी, घोड़े, गाय अथवा पशु-पक्षी भी अन्न ग्रहण नहीं कर सकते थे।

शोभन व्याकुल होकर अपनी पत्नी चंद्रभागा से बोला—“हे प्रिये! मैं भूख की ज्वाला से मर जाऊंगा, मुझे भोजन का कोई उपाय बताओ।” चंद्रभागा ने दुखी होकर कहा—“स्वामी! मेरे पिता के राज्य में एकादशी के दिन पशुओं को भी घास नहीं दी जाती। यदि आप अन्न खाएंगे तो धर्म भ्रष्ट होगा। यदि प्राण बचाने हैं तो किसी अन्य नगर जाना होगा अथवा भगवान नारायण का स्मरण कर धैर्यपूर्वक व्रत करना होगा।”

शोभन ने भाग्य के भरोसे रहकर एकादशी का निर्जला व्रत रख लिया। भूख-प्यास के कारण दिन तो किसी प्रकार बीत गया, किंतु रात्रि का जागरण उसके लिए असहनीय हो गया। भोर होते-होते भूख के भीषण कष्ट से शोभन के प्राण पखेरू उड़ गए। शोभन की मृत्यु से राजमहल में हाहाकार मच गया। चंद्रभागा ने सती होने की इच्छा प्रकट की, किंतु पिता के समझाने पर उसने पति की अस्थियां प्रवाहित कर स्वयं अपने पिता के घर रहकर एकादशी व्रतों का कठोर पालन जारी रखा।

उधर रम्भा एकादशी के अमोघ प्रभाव से शोभन को मृत्यु के पश्चात मंदराचल पर्वत के शिखर पर एक अत्यंत भव्य, स्वर्णमय और अलौकिक देवपुरी प्राप्त हुई। वहां वह रम्भा आदि अप्सराओं और गंधर्वों से पूजित होकर राजा बनकर रहने लगा। किंतु विवशता में रखे गए व्रत के कारण उसका वह नगर ‘अस्थिर’ था। कालांतर में मुचुकुंद नगर के सोमशर्मा नामक ब्राह्मण ने तीर्थयात्रा के दौरान शोभन को पहचाना। शोभन ने ब्राह्मण से कहा कि यदि चंद्रभागा अपने बाल्यकाल से संचित एकादशी व्रतों का पुण्य मुझे समर्पित करे, तो यह देवपुरी शाश्वत और स्थिर हो सकती है।

सोमशर्मा ने लौटकर चंद्रभागा को संपूर्ण वृत्तांत सुनाया। चंद्रभागा अत्यंत प्रसन्न हुई और महर्षि वामदेव के आश्रम में जाकर अपने जीवन भर के एकादशी व्रतों का पुण्य शोभन को अर्पित कर दिया। इस पुण्य के प्रभाव से शोभन का वह दिव्य नगर चिरस्थायी हो गया और चंद्रभागा अपने दिव्य स्वरूप में पति के साथ उस परमधाम में अनंत काल तक अखंड सुख और ऐश्वर्य का उपभोग करने लगी।

🛠️ रम्भा एकादशी: शास्त्रोक्त पूजन विधि एवं संकल्प

05 नवंबर को प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत्त हों। स्वच्छ पीले वस्त्र धारण कर सूर्य देव को अर्घ्य दें।

व्रत का प्रामाणिक संकल्प मंत्र:

“मम सकल-पापक्षयपूर्वकं भगवते श्रीलक्ष्मीनारायण-प्रीत्यर्थे कार श्री रम्भा एकादशी व्रतकर्म अहं करिष्ये।।”

क्रमबद्ध पूजन प्रक्रिया:

  1. चौकी स्थापन: पूजा घर में पूर्व अथवा ईशान कोण में चौकी पर पीला वस्त्र बिछाएं। उस पर भगवान लक्ष्मीनारायण की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
  2. पंचामृत अभिषेक: शंख में गंगाजल और पंचामृत भरकर भगवान विष्णु का अभिषेक करें। माता लक्ष्मी को गुलाब जल व इत्र अर्पित करें।
  3. श्रृंगार व वस्त्र: प्रभु को पीत वस्त्र, गोपीचंदन, पीले कनेर या गेंदे के पुष्प अर्पित करें। माता लक्ष्मी को 16 श्रृंगार की सामग्री और लाल चुनरी चढ़ाएं।
  4. तुलसी दल व नैवेद्य: भगवान को ऋतुफल, मखाने की खीर और माखन-मिश्री का भोग लगाएं। (ध्यान रहे: एकादशी के दिन तुलसी पत्र नहीं तोड़ा जाता, एक दिन पूर्व तोड़े गए तुलसी दल ही अर्पित करें)।
  5. मंत्र जप व पाठ: “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” महामंत्र का 108 बार जप करें अथवा विष्णु सहस्रनाम व कनकधारा स्तोत्र का पाठ करें।
  6. आरती व दीपदान: सायं काल तुलसी के पौधे के समीप और घर के मुख्य द्वार पर शुद्ध घी का चौमुखी दीपक प्रज्वलित करें।

⏰ 06 नवंबर 2026: व्रत पारण का सुनिश्चित समय एवं शास्त्रीय विधि

एकादशी व्रत का संपूर्ण फल तभी प्राप्त होता है जब उसका पारण शास्त्रसम्मत समय पर द्वादशी तिथि के भीतर किया जाए।

पारण का सटीक समय (06 नवंबर 2026):

पारण समय: प्रातः 06:31 बजे से 08:45 बजे के मध्य (सर्वोत्तम शुभ चौघड़िया)।

अंतिम सीमा: द्वादशी तिथि 06 नवंबर को पूर्वाह्न 11:07 बजे समाप्त हो जाएगी। अतः हर स्थिति में पूर्वाह्न 11:07 बजे से पूर्व ही पारण संपन्न कर लेना अनिवार्य है। द्वादशी बीतने के बाद पारण करने से महादोष लगता है।

पारण की शास्त्रोक्त विधि:

  • 06 नवंबर की प्रातः स्नानादि कर भगवान विष्णु का नित्य पूजन करें।
  • किसी सुपात्र ब्राह्मण को अन्न, वस्त्र, ऋतुफल और दक्षिणा का दान करें अथवा गौ-माता को हरी घास व गुड़ खिलाएं।
  • भगवान विष्णु के चरणामृत और तुलसी दल को मुख में रखकर व्रत का पारण करें। इसके उपरांत ही सात्विक भोजन ग्रहण करें।

💬 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Google FAQs)

गूगल पर पूछे जाने वाले प्रश्न प्रामाणिक शास्त्रीय उत्तर
क्या 4 नवंबर को भी रम्भा एकादशी का व्रत रखा जा सकता है? कदापि नहीं। 04 नवंबर को एकादशी दोपहर 01:17 से लग रही है, अतः वह दशमी-विद्धा है। शास्त्रों में दशमी युक्त एकादशी को त्याज्य माना गया है। 05 नवंबर को सूर्योदयकालीन शुद्धा एकादशी होने से व्रत केवल 5 नवंबर को ही मान्य है।
रम्भा एकादशी के दिन क्या खाना चाहिए? यह व्रत निर्जला अथवा फलाहारी रखा जाता है। फलाहार में कुट्टू का आटा, सिंघाड़े का आटा, साबूदाना, दूध, दही और ताजे फलों का सेवन किया जा सकता है। अन्न और विशेषकर चावल का सेवन पूर्णतः वर्जित है।
क्या रम्भा एकादशी केवल स्त्रियों के लिए है? नहीं। रम्भा एकादशी का व्रत स्त्री एवं पुरुष दोनों के लिए समान रूप से कल्याणकारी है। कथा के अनुसार शोभन (पुरुष) ने भी इसी व्रत के प्रभाव से देवपुरी प्राप्त की थी।
एकादशी के दिन चावल क्यों नहीं खाना चाहिए? पौराणिक मान्यता के अनुसार एकादशी के दिन महर्षि मेधा का अंश चावल में प्रविष्ट हुआ था। अतः एकादशी को चावल खाना मांस भक्षण के समान त्याज्य और जल तत्व की अधिकता से मन को चंचल करने वाला माना गया है।

निष्कर्ष: रम्भा एकादशी 2026 धनतेरस और दीपावली से पूर्व आत्मिक कांति और पाप-निवारण का स्वर्णिम अवसर है। 05 नवंबर 2026 को पूर्ण श्रद्धा से किया गया यह व्रत साधक के कुल को आरोग्य, रूप-सौंदर्य, अकूत लक्ष्मी और अंत में वैकुंठ का परम पद प्रदान करता है।

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धनतेरस 2026: 6 नवंबर को मनाया जाएगा धनत्रयोदशी महापर्व, जानें खरीदारी व पूजा का महामुहूर्त, यम दीपदान रहस्य एवं संपूर्ण शास्त्रोक्त विधि

सनातन धर्म में पांच दिवसीय दीपोत्सव का दिव्य शुभारंभ कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि यानी धनतेरस (धनत्रयोदशी) से होता है। यह पावन पर्व केवल नवीन धातुओं अथवा बर्तनों की खरीदारी का लौकिक दिवस नहीं, अपितु समुद्र मंथन से अमृत कलश लेकर प्रकट हुए देवताओं के वैद्य भगवान धन्वन्तरि, धन-वैभव की अधिष्ठात्री मां महालक्ष्मी, धनाध्यक्ष भगवान कुबेर और अकाल मृत्यु का भय हरने वाले धर्मराज यमराज की चतुर्विध आराधना का महापर्व है। वर्ष 2026 में यह महापर्व 06 नवंबर 2026 (शुक्रवार) को स्थिर वृषभ लग्न, हस्त नक्षत्र और विष्कुंभ योग के मंगलकारी संयोग में मनाया जाएगा।

Astrology Sutras (ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी) के इस विशेष शोधपरक आलेख में हम निर्णय सिन्धु, मुहूर्त चिन्तामणि, स्कन्द पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण के अकाट्य प्रमाणों के साथ जानेंगे तिथि निर्णय का यथार्थ, स्थिर लग्न में खरीदारी व पूजा के अचूक मुहूर्त, यम दीपदान का वैदिक विधान, 13 दीपकों का रहस्य और क्या खरीदें तथा क्या कदापि न खरीदें।

💡 6 या 7 नवंबर 2026: तिथि निर्णय और निर्णय सिन्धु का अकाट्य नियम

ऋषिकेश पंचांग (काशी मान) के अनुसार कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी तिथि 06 नवंबर 2026 को पूर्वाह्न 11:07 बजे प्रारंभ होगी और 07 नवंबर 2026 को पूर्वाह्न 10:43 बजे समाप्त हो जाएगी।

  • प्रदोषव्यापिनी ग्राह्यता: निर्णय सिन्धु एवं धर्मसिन्धु का स्पष्ट निर्देश है—“कार्तिके कृष्णपक्षे त्रयोदश्यां निशामुखे। प्रदोषव्यापिनी ग्राह्या त्रयोदशी धनदा यतः॥” धनतेरस का पूजन, कुबेर-लक्ष्मी आराधना और यम दीपदान केवल प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद) में ही शास्त्रसम्मत होता है।
  • 06 नवंबर ही क्यों? 06 नवंबर को त्रयोदशी तिथि दिन में 11:07 से प्रारंभ होकर संपूर्ण प्रदोष काल, स्थिर लग्न और संपूर्ण रात्रि में व्याप्त रहेगी। वहीं 07 नवंबर को त्रयोदशी सुबह 10:43 बजे ही समाप्त हो जाएगी और शाम को चतुर्दशी लग जाएगी। अतः पूरे भारतवर्ष में धनतेरस, धन्वन्तरि जयंती और यम दीपदान 06 नवंबर 2026 (शुक्रवार) को ही मनाया जाएगा।

धनतेरस 2026: सूक्ष्म पंचांग विवरण (ऋषिकेश पंचांग अनुसार)

06 नवंबर 2026 का गणितीय पंचांग मान (काशी सूर्योदय मान अनुसार) निम्नलिखित है:

पंचांगीय अंग / विवरण सटीक समय व मान (ऋषिकेश पंचांग, काशी)
पर्व / वार धनतेरस (धनत्रयोदशी) / 06 नवंबर 2026, शुक्रवार
त्रयोदशी तिथि प्रारंभ 06 नवंबर 2026, पूर्वाह्न 11:07 बजे से
त्रयोदशी तिथि समाप्त 07 नवंबर 2026, पूर्वाह्न 10:43 बजे तक
सूर्योदय / सूर्यास्त (काशी) प्रातः 06:31 बजे / सायं 05:29 बजे
नक्षत्र संचरण हस्त नक्षत्र (रात्रि शेष / 07 नवंबर भोर 05:43 तक)
योग संचरण विष्कुंभ योग (प्रातः 07:12 से 07 नवंबर भोर 05:57 तक)
चन्द्र संचरण कन्या राशि में अहोरात्र (पूरे दिन-रात)
राहुकाल (खरीदारी वर्जित) प्रातः 10:38 बजे से दोपहर 12:00 बजे तक
प्रदोष काल (संध्या वेला) सायं 05:29 बजे से रात्रि 08:06 बजे तक

⏰ धनतेरस 2026: स्थिर लग्न एवं पूजन-खरीदारी के सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त

ज्योतिष शास्त्र और मुहूर्त चिन्तामणि का नियम है कि धनतेरस पर श्रीलक्ष्मी, कुबेर और धन्वन्तरि की पूजा तथा धातु खरीदारी ‘स्थिर लग्न’ (Fixed Ascendant) में की जाए, तो लक्ष्मी का घर में स्थाई वास होता है और संपत्ति क्षय नहीं होती।

स्थिर लग्न / मुहूर्त सटीक समय अवधि उपयुक्तता एवं फल
कुंभ लग्न (स्थिर) दोपहर 01:22 से 02:53 तक वाहन, स्वर्ण, भूमि, बहीखाता व बर्तन खरीदारी
वृषभ लग्न (महामुहूर्त) सायं 05:58 से 07:54 तक धन्वन्तरि, महालक्ष्मी, कुबेर पूजन व यम दीपदान (सर्वोत्तम)
सिंह लग्न (स्थिर – निशीथ) मध्यरात्रि 12:26 से 02:40 तक तांत्रिक साधना, कनकधारा जप, कुबेर सिद्धि
यम दीपदान वेला सायं 05:35 से 06:45 के मध्य प्रदोष काल के प्रारंभ में घर के मुख्य द्वार पर

विशेष नोट: यद्यपि प्रातः 07:12 से 09:29 तक वृश्चिक लग्न भी स्थिर लग्न है, किंतु उस समय तक त्रयोदशी तिथि प्रारंभ नहीं होगी (त्रयोदशी पूर्वाह्न 11:07 से लगेगी)। अतः खरीदारी का पहला श्रेष्ठ समय दोपहर 01:22 बजे (कुंभ लग्न) से ही प्रारंभ होगा।

📜 शास्त्रों के अनुसार प्रमाण: श्लोक, ध्यान व स्तुति

धनतेरस के पावन अवसर पर भगवान धन्वन्तरि, यमराज और धनाध्यक्ष कुबेर के पूजन हेतु प्रामाणिक शास्त्रोक्त मंत्र निम्नलिखित हैं:

शास्त्रोक्त मूल मंत्र शास्त्रीय अर्थ एवं विनियोग

“नमामि धन्वन्तरिमादिदेवं सुरासुरैर्वन्दितपादपद्मम्।
सुधाघटं हस्तचतुष्टयेन बिभ्रत् च कान्त्या ज्वलदर्करूपम्॥”

धन्वन्तरि ध्यान श्लोक

अर्थ: जिनके चरणकमल सुर और असुर दोनों द्वारा पूजित हैं, जो अपने चार हाथों में शंख, चक्र, जलोका और अमृत कलश धारण किए हुए हैं, उन आदिदेव भगवान धन्वन्तरि को मैं नमन करता हूँ। वे हमें निरोगी काया प्रदान करें।

“मृत्युना पाशदण्डाभ्यां कालेन श्यामया सह।
त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतां मम॥”

स्कन्द पुराण (यम दीपदान मंत्र)

अर्थ: कार्तिक त्रयोदशी की संध्या को किए गए इस दीपदान से पाश और दण्ड धारण करने वाले, काल स्वरूप सूर्यपुत्र धर्मराज यमराज मुझ पर और मेरे परिवार पर प्रसन्न हों तथा हमें अकाल मृत्यु से मुक्त रखें।

“ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये।
धनधान्यसमृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा॥”

कुबेर महामंत्र

अर्थ: यक्षराज, विश्रवा के पुत्र, समस्त धन-धान्य और निधियों के अधिपति भगवान कुबेर को नमस्कार है। वे हमारे गृह में अक्षय धन-धान्य और श्री-समृद्धि प्रदान करें।

🌊 समुद्र मंथन और भगवान धन्वन्तरि प्राकट्य रहस्य

श्रीमद्भागवत महापुराण के अष्टम स्कंध के अनुसार, जब देवों और दानवों ने क्षीरसागर का मंथन किया, तो कालकूट विष, कामधेनु, उच्चैःश्रवा अश्व और ऐरावत हाथी आदि 13 रत्नों के प्राकट्य के उपरांत कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन भगवान श्रीहरि विष्णु के अंशावतार भगवान धन्वन्तरि अपने हाथों में दिव्य अमृत से परिपूर्ण स्वर्ण कलश लेकर प्रकट हुए। वे आयुर्वेद के आदि प्रणेता हैं। उनके प्रकट होने के ठीक दो दिन बाद कार्तिक अमावस्या को भगवती महालक्ष्मी का प्राकट्य हुआ। यही कारण है कि दीपावली से पूर्व धनतेरस के दिन आरोग्य के दाता धन्वन्तरि की पूजा को प्रथम प्राथमिकता दी जाती है, क्योंकि स्वस्थ शरीर ही समस्त धर्म और अर्थ का मूल आधार है (“शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्”)।

🪔 यम दीपदान: अकाल मृत्यु हरण की संपूर्ण शास्त्रोक्त विधि

वर्ष भर में केवल धनतेरस की संध्या ही वह पावन वेला है जब मृत्यु के देवता यमराज के निमित्त दीप प्रज्वलित किया जाता है। स्कन्द पुराण के अनुसार जो प्राणी इस दिन यमदीप प्रज्वलित करता है, उसके कुल में किसी भी सदस्य की अकाल मृत्यु (Accidental Death) नहीं होती।

यम दीपदान की प्रामाणिक विधि:

  1. चौमुखा दीपक: गेहूं के आटे का एक बड़ा चार बत्तियों (चौमुखा) वाला दीपक बनाएं। (यदि मिट्टी का दीपक लें तो वह सर्वथा नवीन होना चाहिए)।
  2. द्रव्य प्रक्षेप: दीपक में कड़वा तेल (शुद्ध सरसों का तेल या तिल का तेल) भरें। उसमें चार रुई की बत्तियां चारों दिशाओं की ओर रखें। दीपक के अंदर एक तांबे का सिक्का, थोड़ा अक्षत और एक कौड़ी अवश्य डालें।
  3. प्रज्वलन व दिशा: सायं काल 05:35 से 06:45 के मध्य घर के अंदर दीपक प्रज्वलित करें। फिर घर का कोई वरिष्ठ सदस्य अथवा गृहिणी उस दीपक को लेकर घर के मुख्य प्रवेश द्वार के बाहर दक्षिण दिशा (यम की दिशा) की ओर मुख करके खलिहान या चौखट के दाईं ओर रख दे।
  4. अनाज की ढेरी: दीपक को सीधे जमीन पर न रखें, उसके नीचे थोड़ी खील, गेहूं अथवा धान की ढेरी अवश्य बनाएं।
  5. प्रार्थना व नियम: उपर्युक्त स्कन्द पुराणोक्त मंत्र (“मृत्युना पाशदण्डाभ्यां…”) पढ़कर यमराज से परिवार की रक्षा की प्रार्थना करें। दीपक रखने के पश्चात पीछे मुड़कर न देखें और सीधे घर के अंदर आ जाएं।

🛍️ धनतेरस पर क्या खरीदें और क्या कदापि न खरीदें?

क्या अवश्य खरीदें? (परम शुभ) क्या कदापि न खरीदें? (सर्वथा वर्जित)
1. पीतल के बर्तन: भगवान धन्वन्तरि का प्रिय धातु पीतल है। पीतल का कलश या पात्र खरीदना आरोग्यवर्धक है।
2. सोना व चांदी: मां लक्ष्मी व चंद्रमा का प्रतीक, जो वंश वृद्धि और स्थायित्व लाता है।
3. साबुत धनिया: धनतेरस पर सूखा धनिया खरीदना महालक्ष्मी को आकर्षित करता है। इसे दिवाली पर पूजन के बाद तिजोरी में रखा जाता है।
4. नई झाड़ू: मत्स्य पुराण के अनुसार झाड़ू मां लक्ष्मी का स्वरूप है, यह दरिद्रता का समूल नाश करती है।
5. गोमती चक्र व कौड़ियां: 11 गोमती चक्र या पीली कौड़ियां आर्थिक संकट दूर करती हैं।
1. लोहा व स्टील: लोहा शनि और राहु का कारक है। स्टील भी लोहे का ही आधुनिक रूप है, अतः धनतेरस पर शुद्ध धातु (सोना, चांदी, तांबा, पीतल) ही लें।
2. कांच व चीनी मिट्टी: कांच राहु का प्रतीक है, जो जीवन में भटकाव और दरिद्रता लाता है।
3. नुकीली व धारदार वस्तुएं: चाकू, कैंची, दरांती, सुई आदि हिंसा और अमंगल के प्रतीक हैं, इन्हें खरीदना वर्जित है।
4. काले रंग के वस्त्र या वस्तुएं: काला रंग नकारात्मकता और शोक का प्रतीक माना गया है।
5. खाली बर्तन घर न लाएं: बाजार से जो भी बर्तन खरीदें, उसमें थोड़े चावल, बताशे अथवा जल डालकर ही गृह प्रवेश करें।

📖 धनतेरस की पौराणिक कथा: राजा हिम के पुत्र और यमराज की पराजय

प्राचीन काल में राजा हिम के एक सुयोग्य पुत्र का जन्म हुआ। ज्योतिषियों ने उसकी जन्मकुंडली देखकर भविष्यवाणी की कि विवाह के ठीक चौथे दिन सर्पदंश से इस बालक की अकाल मृत्यु हो जाएगी। राजा और रानी अत्यंत व्याकुल हुए, किंतु राजकुमार के युवा होने पर उसका विवाह एक अत्यंत पतिव्रता और बुद्धिमती कन्या से हुआ।

जब विवाह का चौथा दिन (कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी) आया, तो नववधू ने अपने पति की प्राण-रक्षा के लिए एक अद्भुत उपाय किया। उसने शयनकक्ष के चारों ओर और महल के मुख्य द्वार पर असंख्य स्वर्ण-रजत के आभूषण, रत्न और सिक्कों के ढेर लगा दिए। संपूर्ण कक्ष को दीपकों की माला से प्रज्वलित कर दिया, जिससे वहां ऐसा दिव्य प्रकाश फैल गया कि अंधकार का नामोनिशान न रहा।

वधू ने अपने पति को शयन करने से रोक दिया और स्वयं पूरी रात उसे मधुर स्वर में पौराणिक कथाएं और धर्म के भजन सुनाने लगी। मध्यरात्रि में जब साक्षात यमराज सर्प का भयंकर रूप धारण करके राजकुमार को डसने आए, तो हीरों, सोने-चांदी के आभूषणों और प्रज्वलित दीपकों के चकाचौंध प्रकाश से उनकी आंखें चौंधिया गईं। सर्प रूपी यमराज भीतर प्रवेश नहीं कर सके और आभूषणों की ढेरी पर ही बैठ गए।

पूरी रात यमराज उस पतिव्रता कन्या के मधुर भजनों और कथाओं को मुग्ध होकर सुनते रहे। प्रातः काल हुआ और राजकुमार की मृत्यु की निर्धारित घड़ी व्यतीत हो गई। यमराज बिना प्राण लिए शांत भाव से यमलोक लौट गए। इस प्रकार उस पतिव्रता वधू ने दीपकों और स्वर्ण के तेज से अपने पति को अकाल मृत्यु से मुक्त करा लिया। तभी से कार्तिक त्रयोदशी को ‘धनतेरस’ के रूप में दीप प्रज्वलन और धातु क्रय की परंपरा प्रारंभ हुई।

🛠️ धनतेरस संध्या पूजन की संपूर्ण प्रामाणिक विधि

सायं 05:58 से 07:54 (स्थिर वृषभ लग्न) के मध्य पूजा आरंभ करें:

  • चौकी स्थापन: ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में लकड़ी की चौकी पर लाल अथवा पीला वस्त्र बिछाएं। उस पर भगवान गणेश, मां महालक्ष्मी, भगवान धन्वन्तरि और कुबेर यंत्र/प्रतिमा स्थापित करें।
  • अभिषेक व पूजन: सर्वप्रथम गणपति जी का पूजन करें। इसके उपरांत भगवान धन्वन्तरि को पीले पुष्प, पीत चंदन, मौली, जनेऊ और तुलसी दल अर्पित करें।
  • नैवेद्य अर्पण: भगवान धन्वन्तरि को खीर, बताशे और औषधीय फल अर्पित करें। कुबेर जी को धनिया की पंजीरी व श्वेत मिष्ठान्न का भोग लगाएं।
  • 13 दीपकों का विधान: पूजा में कुल 13 मिट्टी के दीपक प्रज्वलित किए जाते हैं। इनमें से 1 दीपक यमराज के लिए मुख्य द्वार पर, 1 तुलसी जी के पास, 1 तिजोरी के पास और शेष दीपक घर के विभिन्न कोनों व छत पर रखे जाते हैं।
  • आरती व क्षमा-प्रार्थना: श्री धन्वन्तरि अमृतवाणी, कुबेर आरती और महालक्ष्मी आरती करें तथा घर में सुख, शांति व निरोगता की प्रार्थना करें।

💬 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Google FAQs)

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न प्रामाणिक शास्त्रीय उत्तर
क्या 7 नवंबर को धनतेरस की खरीदारी हो सकती है? 07 नवंबर को त्रयोदशी केवल सुबह 10:43 बजे तक ही है। धनतेरस का मुख्य पर्व, संध्या पूजा और यम दीपदान 06 नवंबर को ही मान्य है। यदि कोई अत्यंत विवशता में 7 नवंबर को खरीदारी करना चाहे, तो उसे सुबह 10:43 से पूर्व ही संपन्न करना होगा।
धनतेरस पर खरीदी गई झाड़ू का क्या करें? झाड़ू पर सफेद धागा या मौली बांधकर उस पर कुमकुम लगाएं। धनतेरस की रात इसका प्रयोग न करें। दीपावली की सुबह इस नई झाड़ू से घर की सफाई आरंभ करें, इससे दरिद्रता दूर होती है।
साबुत धनिया का क्या महत्व है? धनिया ‘धन’ का प्रतीक है। धनतेरस पर सूखा खड़ा धनिया खरीदकर लक्ष्मी पूजन में रखें। दीपावली पूजन के बाद थोड़े बीज गमले में बो दें और शेष बीज लाल कपड़े में बांधकर अपनी तिजोरी में रखें।
यम का दीपक घर के अंदर क्यों नहीं रखा जाता? यमराज मृत्यु और संहार के अधिपति हैं। उनका दीपक घर की दहलीज से बाहर दक्षिण दिशा में इसलिए रखा जाता है ताकि नकारात्मक ऊर्जा और अकाल मृत्यु की छाया घर की चौखट के बाहर ही विसर्जित हो जाए।

निष्कर्ष: धनतेरस 2026 केवल धन संचय का पर्व नहीं, अपितु जीवन के सर्वोत्तम धन ‘आरोग्य’ और ‘अभय’ को प्राप्त करने का पावन दिन है। 06 नवंबर 2026 को स्थिर वृषभ लग्न (सायं 05:58 से 07:54) में किया गया धन्वन्तरि व कुबेर पूजन तथा यम दीपदान आपके कुल को वर्ष भर निरोगी, सुरक्षित और ऐश्वर्यवान बनाए रखने में समर्थ है।

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अहोई अष्टमी 2026: 1 नवंबर को रखा जाएगा संतान रक्षा का महाव्रत, जानें सटीक पूजा मुहूर्त, दो रानियों की व्रत कथा,प्रमुख शहरों में चंद्रोदय समय व पारण नियम

सनातन धर्म में संतान की दीर्घायु, उत्तम आरोग्य, विद्या-बुद्धि और जीवन-रक्षा के लिए कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को ‘अहोई अष्टमी’ (अहोई आठे) का निर्जला व्रत रखा जाता है। वर्ष 2026 में यह पावन महापर्व 01 नवंबर 2026 (रविवार) को अत्यंत दुर्लभ और कल्याणकारी पुष्य नक्षत्र तथा साध्य व शुभ योग के महासंयोग में मनाया जाएगा।

Astrology Sutras (ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी) के इस विशेष शोधपरक आलेख में हम निर्णय सिन्धु, मुहूर्त चिन्तामणि, धर्मसिन्धु, स्कंद पुराण और पद्म पुराण के अकाट्य प्रमाणों के साथ जानेंगे तिथि निर्णय का शास्त्रोक्त रहस्य, पूजा का सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त, तारा दर्शन से पारण का नियम, स्याहू माता व चांदी के मनकों (साया) की परंपरा, दो रानियों की मार्मिक व्रत कथा, मथुरा के राधा कुंड स्नान का दुर्लभ श्लोक, देश के 38 प्रमुख शहरों में चंद्रोदय समय और व्रत के अनिवार्य नियम।

⭐ 1 या 2 नवंबर 2026: तिथि निर्णय और निर्णय सिन्धु का अकाट्य नियम

अहोई अष्टमी व्रत के निर्णय को लेकर श्रद्धालुओं में भ्रम होना स्वाभाविक है। “ऋषिकेश पंचांग” (काशी मान) के अनुसार कार्तिक कृष्ण अष्टमी तिथि 01 नवंबर 2026 की रात्रि 07:04 बजे प्रारंभ होगी और 02 नवंबर 2026 की सायं 04:54 बजे समाप्त हो जाएगी। धर्मसिन्धु तथा निर्णय सिन्धु का स्पष्ट शास्त्रोक्त वचन है:

“कार्तिककृष्णाष्टम्यां सायं नक्षत्रावलोकनेन पारणं कुर्वन्ति। सा च प्रदोषव्यापिनी निशीथव्यापिनी वा ग्राह्या॥” — निर्णय सिन्धु

अर्थ: अहोई अष्टमी का व्रत प्रदोष व्यापिनी और रात्रि व्यापिनी अष्टमी में किया जाता है, जिसमें सायं काल तारों को देखकर अर्घ्य दिया जाता है।

02 नवंबर को अष्टमी तिथि सायं 04:54 बजे ही समाप्त हो रही है, जबकि सूर्यास्त सायं 05:32 बजे होगा। यानी 2 नवंबर की शाम को प्रदोष काल, तारा दर्शन और रात्रि काल में नवमी तिथि रहेगी। वहीं 01 नवंबर को रात्रि 07:04 बजे से पूरी रात अष्टमी तिथि विद्यमान रहेगी तथा इसी रात्रि चंद्रोदय और तारा दर्शन होंगे। अतः पूरे भारतवर्ष में अहोई अष्टमी का निर्जला व्रत 01 नवंबर 2026 (रविवार) को ही शास्त्रसम्मत व मान्य है।

अहोई अष्टमी 2026: सूक्ष्म पंचांग विवरण (ऋषिकेश पंचांग अनुसार)

01 नवंबर 2026 का गणितीय पंचांग मान निम्नलिखित है:

पंचांगीय अंग / विवरण सटीक समय व मान (काशी पंचांग मान)
अहोई अष्टमी व्रत तिथि 01 नवंबर 2026, रविवार
कार्तिक कृष्ण अष्टमी प्रारंभ 01 नवंबर 2026, रात्रि 07:04 बजे से
अष्टमी तिथि समाप्त 02 नवंबर 2026, सायं 04:54 बजे तक
सूर्योदय / सूर्यास्त (काशी) प्रातः 06:27 बजे / सायं 05:33 बजे
नक्षत्र संचरण पुनर्वसु पूर्वाह्न 10:35 तक, उपरांत पुष्य नक्षत्र
शुभ योग साध्य योग रात्रि 07:59 तक, तत्पश्चात शुभ योग
अभिजित मुहूर्त पूर्वाह्न 11:38 बजे से दोपहर 12:22 बजे तक
राहुकाल (वर्जित काल) सायं 04:10 बजे से 05:33 बजे तक
तारा दर्शन का संभावित समय सायं 06:12 बजे से 06:40 बजे के मध्य
अहोई माता मुख्य पूजा मुहूर्त सायं 07:04 बजे से 08:15 बजे तक
चंद्रोदय समय (काशी / वाराणसी) रात्रि 11:18 बजे

🌟 पारण का मुख्य नियम: तारा दर्शन या चंद्र दर्शन?

सर्वमान्य शास्त्रोक्त विधान: अहोई अष्टमी का व्रत मुख्य रूप से ‘तारा (नक्षत्र) दर्शन’ करके ही खोला जाता है।

  • तारा दर्शन (मुख्य नियम): करवा चौथ पर चंद्र दर्शन मुख्य होता है, किंतु अहोई अष्टमी पर सायं काल आकाश में तारों के निकलते ही (06:12 से 06:40 PM के मध्य) करवे के जल से तारों को अर्घ्य देकर माताएं व्रत का पारण करती हैं।
  • चंद्र दर्शन (केवल विशेष कुल-परंपरा): चूँकि इस रात चंद्रोदय बहुत विलंब से (रात 11:18 बजे के बाद) होता है, अतः जिन परिवारों में पीढ़ियों से केवल चंद्रमा को देखकर ही पारण की परंपरा बंधी हो, केवल वही माताएं मध्यरात्रि में चंद्र दर्शन कर अर्घ्य देंगी। सामान्यतः तारा अर्घ्य ही सर्वमान्य और धर्मसम्मत है।

📜 शास्त्रों के अनुसार प्रमाण: श्लोक, ध्यान व अर्घ्य मंत्र

अहोई अष्टमी पर अहोई माता (पार्वती स्वरूप), तारों और चंद्रमा के पूजन हेतु प्रामाणिक शास्त्रोक्त मंत्र निम्नलिखित हैं:

शास्त्रोक्त मूल मंत्र प्रमाणिक अर्थ एवं विनियोग

“उमापतिं नमस्कृत्य कार्तिकेयाग्रजं विभुम्।
अहोईदेव्याः पूजार्थं संकलिता स्म्यहं व्रते॥”

व्रत संकल्प मंत्र

संकल्प अर्थ: देवाधिदेव महादेव, माता पार्वती और श्रीगणेश को नमन कर मैं अपनी संतान की दीर्घायु, आरोग्य व वंशवृद्धि हेतु अहोई अष्टमी का निर्जला व्रत करने का संकल्प करती हूँ।

“गगनार्णवमाणिक्य नक्षत्राणां विभूषणम्।
गृहाणार्घ्यं मया दत्तं पुत्रायुर्वृद्धिकारकम्॥”

तारा अर्घ्य मंत्र

तारा अर्घ्य अर्थ: हे आकाश रूपी सागर के माणिक्य स्वरूप तारों! आप मेरी संतान को दीर्घायु, यश और तेजस्विता प्रदान करने हेतु मेरे द्वारा अर्पित इस पावन अर्घ्य को स्वीकार करें।

“क्षीरोदार्णवसंभूत अत्रिनेत्रसमुद्भव।
गृहाणार्घ्यं मया दत्तं बालगोपालरूपिणे॥”

चंद्र अर्घ्य मंत्र

चंद्र अर्घ्य अर्थ: क्षीरसागर से उत्पन्न और महर्षि अत्रि के नेत्रों के तेज स्वरूप चंद्रदेव! आप मेरी संतान की अकाल मृत्यु और व्याधियों से रक्षा करें।

📿 स्याहू माता, सेही की कथा और चांदी की अहोई (साया) का रहस्य

परंपरा व प्रतीक शास्त्रोक्त एवं आध्यात्मिक रहस्य
1. सेही (स्याहू) के 7 बच्चे व कोख मुक्ति पौराणिक कथा के अनुसार एक साहूकार की संस्कारी बहू से मिट्टी खोदते समय अनजाने में खुरपी से साही (सेही) के बच्चे की मृत्यु हो गई थी। क्रोधित होकर स्याहू माता ने उसकी कोख बांध दी। जब उसने पश्चाताप कर निष्कपट भाव से स्याहू माता की सेवा की, तब भगवती ने प्रसन्न होकर उसकी कोख पुनः हरी कर 7 पुत्रों का वरदान दिया। यह कथा सिखाती है कि अनजाने में हुए पाप का प्रायश्चित ही संतान की रक्षा करता है।
2. चांदी की अहोई व साया (चांदी के मनके) इस व्रत में चांदी की अहोई (लॉकेट स्वरूप) बनाई जाती है और उसमें कलावा पिरोकर चांदी के दो दाने (मनके या साया) डाले जाते हैं। प्रतिवर्ष संतान के जन्म अथवा मांगलिक अवसरों पर इसमें 2-2 चांदी के मनके जोड़े जाते हैं। पूजा के उपरांत माताएं इसे अपने गले में धारण करती हैं, जो संतान के लिए अभेद्य सुरक्षा-कवच का कार्य करता है।
3. राधा कुंड स्नान (संतान प्राप्ति महायोग) मथुरा-गोवर्धन स्थित ‘राधा कुंड’ में अहोई अष्टमी की मध्यरात्रि को निःसंतान दंपत्ति द्वारा एक साथ स्नान करने की परंपरा है। पद्म पुराण के अनुसार इस पावन तिथि पर राधा कुंड में स्नान करने से अरिष्ट कटते हैं और भगवान श्रीकृष्ण व श्रीराधारानी की कृपा से कुलदीपक की प्राप्ति होती है।

📜 पद्म पुराण प्रमाण: राधा कुंड स्नान का दुर्लभ श्लोक व फल

मथुरा के गोवर्धन पर्वत की तलहटी में स्थित ‘राधा कुंड’ में अहोई अष्टमी (बहुलाष्टमी) की मध्यरात्रि को स्नान करने का विधान है। पद्म पुराण (पाताल खंड) में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने राधा कुंड की महिमा का वर्णन करते हुए कहा है:

पद्म पुराणोक्त मूल श्लोक शास्त्रीय अर्थ एवं माहात्म्य

“गोवर्धनगिरौ रम्ये राधाकुण्डं प्रियं मम।
कार्तिककृष्णपक्षे तु अष्टम्यां तत्र मज्जनम्॥
स्नानेन तत्र देवेशि सर्वपापैः प्रमुच्यते।
पुत्रपौत्रादिसंपत्तिं लभते नात्र संशयः॥”

पद्म पुराण (पाताल खंड)

अर्थ: हे देवेशि! गोवर्धन पर्वत के रमणीय अंचल में स्थित राधा कुंड मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय है। जो दंपति कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी (अहोई अष्टमी) की मध्यरात्रि को वहाँ विधिपूर्वक स्नान करते हैं, उनके समस्त संचित पाप भस्म हो जाते हैं और उन्हें सुयोग्य पुत्र, पौत्र एवं अखंड ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।

📖 अहोई अष्टमी की पावन व्रत कथा: दो रानियां और महात्मा का बाल-परीक्षण

प्राचीन काल में एक नगर में दो रानियां निवास करती थीं। दोनों ही अत्यंत दुखी थीं—एक रानी ऐसी थी जिसके संतान का जन्म तो होता था, किंतु जन्म लेते ही या कुछ समय बाद उसकी संतान की मृत्यु हो जाती थी। वहीं दूसरी रानी ऐसी थी जिसे कभी संतान का सुख प्राप्त ही नहीं हुआ था, वह पूर्णतः निःसंतान थी।

एक दिन उस नगर में एक पहुंचे हुए सिद्ध महात्मा (साधु बाबा) पधारे। दोनों रानियां अपनी व्यथा लेकर साधु के आश्रम पहुंचीं और चरणों में गिरकर रोने लगीं। पहली रानी ने हाथ जोड़कर कहा—“महाराज! मेरी कोख से बच्चे जन्म तो लेते हैं, पर जीवित नहीं रहते। मेरी गोद सदा उजड़ जाती है।” वहीं दूसरी रानी बोली—“बाबा! मुझे तो विधाता ने मातृत्व का सुख ही नहीं दिया, मेरी कोख बांझ है।”

महात्मा जी ने दोनों की परीक्षा लेने का निर्णय किया। उन्होंने कहा—“तुम दोनों कल प्रातः काल मेरे पास पुनः आना, किंतु आते समय मार्ग में जो नन्हे बच्चे खेल रहे हों, उनमें से किसी एक बालक के सिर के बाल नोचकर मेरे पास ले आना। तभी तुम्हारी मनोकामना पूर्ण होगी।”

अगले दिन प्रातः काल जब दोनों आश्रम की ओर चलीं, तो मार्ग में अबोध बालक खेल रहे थे। जिस रानी को कभी संतान नहीं हुई थी, वह स्वार्थ और हठ में अंधी हो गई। उसने दौड़कर एक खेलते हुए निर्दोष बालक को पकड़ा और क्रूरता से उसके सिर के बाल नोच लिए। बालक चीखता-रोता रहा, पर उस रानी का हृदय नहीं पसीजा।

दूसरी ओर, जिस रानी की संतानें बार-बार मर जाती थीं, वह जब बालकों के समीप पहुंची, तो उसका हृदय कांप उठा। उसने सोचा—“संतान की एक खरोंच पर मां की छाती फट जाती है। मैंने अपनी संतानों को खोने का असह्य दर्द झेला है। अपने स्वार्थ के लिए मैं किसी दूसरे की कोख के लाल को यह पीड़ा कैसे दे सकती हूँ?” वह रोती हुई खाली हाथ आश्रम पहुंच गई।

महात्मा जी ने पूछा—“कहो, बाल कहाँ हैं?” निःसंतान रानी ने तुरंत बाल आगे बढ़ा दिए। महात्मा जी ने दूसरी रानी से पूछा—“तुम खाली हाथ क्यों आई?” तब उस ममतामयी रानी ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से कहा—“बाबा! जिस प्रकार मुझे अपनी संतानों के मरने पर असहनीय पीड़ा होती है, उसी प्रकार यदि मैं किसी पराए बच्चे के बाल नोचती तो उसकी मां और उस बालक को भारी कष्ट होता। मुझसे यह पाप नहीं हुआ। भले ही मेरी गोद सदा के लिए सूनी रह जाए, पर मैं किसी अबोध को रुला नहीं सकती।”

महात्मा जी उस रानी के निष्कपट वात्सल्य और करुणा से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने आशीर्वाद देते हुए कहा—“पुत्री! जिसके भीतर दूसरे की संतान के प्रति ऐसी ममता और दया है, साक्षात जगदम्बा उसकी रक्षा करती हैं। तू कार्तिक कृष्ण अष्टमी को विधिपूर्वक ‘अहोई माता’ का निर्जला व्रत करना। भगवती अहोई की कृपा से तेरी आगामी संतानें चिरायु, तेजस्वी और यशस्वी होंगी।”
इसके बाद उन्होंने बाल नोचकर लाने वाली क्रूर रानी से कहा—“जो स्त्री किसी अबोध बालक के दर्द को नहीं समझ सकती, वह मातृत्व की अधिकारी नहीं हो सकती। तेरे भीतर दया नहीं, केवल स्वार्थ है।”

उस दयावती रानी ने कार्तिक कृष्ण अष्टमी को पूर्ण श्रद्धा से अहोई माता का व्रत किया और अहोई माता की कृपा से उसे गुणवान और दीर्घायु पुत्रों की प्राप्ति हुई।

🛠️ प्रामाणिक अहोई माता पूजन विधि एवं अर्घ्य विधान

प्रातः सूर्योदय से पूर्व स्नानादि कर हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर संतान रक्षा का संकल्प लें।

क्रमबद्ध पूजन प्रक्रिया:

  • अहोई माता का अंकन: घर की उत्तर या पूर्व दिशा की दीवार पर गेरू से अहोई माता, उनके 8 कोष्ठक, 7 पुत्र, साही (स्याहू) तथा सूर्य-चंद्रमा का चित्र बनाएं अथवा रेडीमेड अहोई चित्र स्थापित करें।
  • कलश व करवा स्थापना: एक मिट्टी अथवा तांबे के लोटे में जल भरकर उस पर मौली बांधें और करवे पर स्वस्तिक बनाएं। लोटे के मुख पर सिंघाड़े, गेहूं और करवे के ढक्कन में मीठे पुए (गुलगुले) रखें।
  • चांदी की अहोई का पूजन: चांदी की अहोई और साया (मनके) को कच्चे दूध व गंगाजल से स्नान कराकर रोली, अक्षत अर्पित करें।
  • कथा श्रवण व गेहूं के 7 दाने: हाथ में गेहूं के 7 दाने और दूर्वा लेकर अहोई अष्टमी की पावन व्रत कथा सुनें। कथा के बाद यह दाने पल्लू में बांध लें।
  • तारा दर्शन एवं अर्घ्य (पारण): सायं काल 06:12 से 06:40 के मध्य आकाश में तारों के उदित होने पर लोटे के जल से तारों को अर्घ्य दें। जो माताएं चंद्रोदय देखकर व्रत खोलती हैं, वे रात्रि 11:18 (काशी मान अनुसार) पर चंद्रदेव को अर्घ्य देकर अपनी संतान के हाथों से जल ग्रहण कर व्रत का पारण करें।
  • सासू जी को बायना: पूजा के उपरांत 8 पुए, 8 पूरी, फल और वस्त्र किसी थाली में रखकर सासू जी या घर की वरिष्ठ महिला के चरण छूकर बायना भेंट करें।

🌕 भारत के 38 प्रमुख शहरों में चंद्रोदय समय सारणी (01 नवंबर 2026)

ऋषिकेश पंचांग के काशी चंद्रोदय (रात्रि 11:18 बजे) को आधार मानकर रेखांशीय देशांतर गणना अनुसार 01 नवंबर की रात देश के 38 प्रमुख नगरों में चाँद निकलने का समय निम्नलिखित रहेगा:

शहर का नाम एवं राज्य चंद्रोदय समय (01 नवंबर 2026)
1. वाराणसी / काशी (उ.प्र.) रात्रि 11:18 बजे
2. प्रयागराज (उ.प्र.) रात्रि 11:22 बजे
3. अयोध्या (उ.प्र.) रात्रि 11:20 बजे
4. गोरखपुर (उ.प्र.) रात्रि 11:15 बजे
5. लखनऊ (उ.प्र.) रात्रि 11:27 बजे
6. कानपुर (उ.प्र.) रात्रि 11:29 बजे
7. आगरा (उ.प्र.) रात्रि 11:35 बजे
8. मथुरा / वृन्दावन (उ.प्र.) रात्रि 11:37 बजे
9. मेरठ / गाजियाबाद / नोएडा रात्रि 11:35 बजे
10. नई दिल्ली / एनसीआर रात्रि 11:37 बजे
11. पटना (बिहार) रात्रि 11:06 बजे
12. गया (बिहार) रात्रि 11:10 बजे
13. मुजफ्फरपुर / दरभंगा (बिहार) रात्रि 11:04 बजे
14. रांची / जमशेदपुर (झारखंड) रात्रि 11:08 बजे
15. कोलकाता / हावड़ा (प.बंगाल) रात्रि 10:38 बजे
16. भुवनेश्वर / कटक (ओडिशा) रात्रि 11:05 बजे
17. पुरी (श्री जगन्नाथ धाम) रात्रि 11:03 बजे
18. गुवाहाटी (असम) रात्रि 10:15 बजे
19. हरिद्वार / ऋषिकेश (उत्तराखंड) रात्रि 11:30 बजे
20. देहरादून (उत्तराखंड) रात्रि 11:31 बजे
21. शिमला (हिमाचल प्रदेश) रात्रि 11:33 बजे
22. चंडीगढ़ / पंचकुला / मोहाली रात्रि 11:35 बजे
23. अमृतसर / जालंधर (पंजाब) रात्रि 11:42 बजे
24. लुधियाना (पंजाब) रात्रि 11:39 बजे
25. जयपुर (राजस्थान) रात्रि 11:44 बजे
26. जोधपुर (राजस्थान) रात्रि 11:55 बजे
27. उदयपुर / कोटा (राजस्थान) रात्रि 11:50 बजे
28. ग्वालियर (म.प्र.) रात्रि 11:36 बजे
29. भोपाल (म.प्र.) रात्रि 11:41 बजे
30. इंदौर / उज्जैन (म.प्र.) रात्रि 11:48 बजे
31. रायपुर (छत्तीसगढ़) रात्रि 11:24 बजे
32. नागपुर (महाराष्ट्र) रात्रि 11:36 बजे
33. अहमदाबाद (गुजरात) रात्रि 11:58 बजे
34. सूरत / वडोदरा (गुजरात) मध्यरात्रि 12:02 AM (02 नवं)
35. मुंबई / ठाणे (महाराष्ट्र) मध्यरात्रि 12:06 AM (02 नवं)
36. पुणे (महाराष्ट्र) मध्यरात्रि 12:04 AM (02 नवं)
37. हैदराबाद (तेलंगाना) रात्रि 11:45 बजे
38. बेंगलुरु / चेन्नई रात्रि 11:52 बजे

⚠️ अहोई अष्टमी के 5 कठोर नियम: भूलकर भी न करें ये गलतियां

कठोर नियम शास्त्रोक्त कारण एवं कड़े निर्देश
1. मिट्टी खोदना पूर्णतः वर्जित पौराणिक कथा के अनुसार मिट्टी खोदते समय ही साही के बच्चे का वध हुआ था। अतः अहोई अष्टमी के दिन खुरपी चलाना, मिट्टी खोदना या बागवानी करना पूर्णतः निषिद्ध है।
2. चाकू, कैंची व नुकीली वस्तुएं निषेध व्रती माताएं इस दिन सब्जी काटने के लिए चाकू या दरांती का प्रयोग न करें और न ही सिलाई-कढ़ाई (सुई-धागा) का कार्य करें। सब्जी हाथ से तोड़कर बनाई जाती है।
3. काले व सफेद वस्त्रों का त्याग पूजा के समय काले, गहरे नीले या सफेद वस्त्र न पहनें। लाल, पीला, नारंगी या गुलाबी रंग ही धारण करें।
4. बासी भोजन का निषेध अहोई माता को केवल ताजे बने सात्विक मीठे पुए, हलवा, सिंघाड़े या गन्ने का ही भोग लगाया जाता है।
5. संतान पर क्रोध न करें यह पर्व वात्सल्य का है। इस दिन अपनी संतान पर क्रोध करना, अपशब्द बोलना या किसी अन्य बालक का निरादर करना व्रत के पुण्य को क्षीण कर देता है।

💬 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Google FAQs)

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न प्रामाणिक शास्त्रीय समाधान
अहोई अष्टमी का व्रत तारों को देखकर खोलें या चंद्रमा को? शास्त्रों के अनुसार अधिकांश क्षेत्रों में अहोई अष्टमी का व्रत तारों को अर्घ्य देकर ही संपन्न किया जाता है, क्योंकि इस दिन चंद्रोदय अत्यधिक विलंब (रात 11:18 बजे के बाद) से होता है। हालांकि जो परिवार कुल-परंपरा अनुसार चंद्रमा को देखकर पारण करते हैं, वे रात्रि में चंद्रोदय पर अर्घ्य देकर व्रत खोल सकते हैं। दोनों ही विधियां मान्य हैं।
क्या केवल पुत्र वाली माताएं ही यह व्रत रख सकती हैं? कदापि नहीं। अहोई अष्टमी का व्रत ‘संतान’ (पुत्र एवं पुत्री दोनों) के कल्याण, दीर्घायु और सुख-समृद्धि हेतु रखा जाता है। साथ ही संतान प्राप्ति की कामना रखने वाली महिलाएं भी यह व्रत रख सकती हैं।
चांदी की अहोई गले से कब उतारी जाती है? चांदी की अहोई को पूजा के बाद गले में पहना जाता है और इसे दीपावली के दिन या कार्तिक पूर्णिमा के बाद विधिपूर्वक उतारकर सुरक्षित पूजा स्थल पर रख दिया जाता है।
मासिक धर्म (पीरियड्स) में अहोई अष्टमी व्रत कैसे करें? मासिक धर्म होने पर भी मानसिक रूप से निर्जला व्रत रखें। स्वयं पूजा सामग्री या दीवार पर बने चित्र का स्पर्श न करें। परिवार की अन्य महिला या पति से पूजा संपन्न करवाएं और दूर बैठकर कथा सुनकर सायं तारों को देखकर पारण करें।

निष्कर्ष: अहोई अष्टमी का व्रत मातृ-हृदय के अगाध वात्सल्य, त्याग और करुणा का महापर्व है। 01 नवंबर 2026 को पुष्य नक्षत्र के पावन संयोग में सायं 07:04 से 08:15 के मध्य किया गया पूजन संतान के जीवन के समस्त संकटों को दूर कर उसे दीर्घायु और आरोग्य प्रदान करता है।

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करवा चौथ 2026: 29 अक्टूबर को रखा जाएगा अखंड सुहाग का व्रत, जानें सटीक पूजा मुहूर्त, शहरवार चंद्रोदय समय व शास्त्रोक्त रहस्य

सनातन धर्म में सुहागिन महिलाओं के लिए कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि केवल एक उपवास नहीं, अपितु पति की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य, अखण्ड सौभाग्य और दांपत्य निष्ठा का महापर्व ‘करक चतुर्थी’ यानी करवा चौथ है। वर्ष 2026 में यह पावन पर्व 29 अक्टूबर 2026 (गुरुवार) को पूरे देश में श्रद्धा व उल्लास के साथ मनाया जाएगा।

Astrology Sutras (ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी) के इस विशेष शोधपरक आलेख में हम स्कंद पुराण, निर्णयसिन्धु और व्रतराज के प्रमाणों के साथ जानेंगे पूजा का श्रेष्ठ मुहूर्त, सरगी का समय, वृषभ राशि के उच्च चंद्रमा का फल, छलनी से दर्शन का रहस्य, शहरवार चंद्रोदय समय और अधिकतर पूछे जाने वाले समस्त संशयों का प्रामाणिक समाधान।

⭐ 28 या 29 अक्टूबर 2026: तिथि निर्णय और पंचांगीय स्थिति

करवा चौथ के व्रत में ‘चंद्रोदय व्यापिनी चतुर्थी’ (जिस रात चतुर्थी में चंद्रमा उदय हो) का होना धर्मसिन्धु व निर्णयसिन्धु के अनुसार अनिवार्य है। ऋषिकेश पंचांग के अनुसार कार्तिक कृष्ण चतुर्थी तिथि 29 अक्टूबर 2026 को प्रातः 04:17 बजे प्रारंभ होगी और 29 अक्टूबर 2026 की अर्ध रात्रि 02:11 बजे समाप्त होगी। चूंकि 29 अक्टूबर की अर्ध रात्रि तक चतुर्थी तिथि विद्यमान रहेगी और रात्रि 07:57 पर चंद्रोदय होगा, अतः पूरे भारतवर्ष में करवा चौथ का निर्जला व्रत 29 अक्टूबर 2026, गुरुवार को ही रखा जाएगा।

📜 शास्त्रों के अनुसार प्रमाण: श्लोक व अर्थ

स्कंद पुराण, निर्णयसिन्धु तथा व्रतराज में करवा चौथ व्रत का स्पष्ट शास्त्रीय निर्देश मिलता है:

वेद-पुराणोक्त मूल श्लोक शास्त्रीय अर्थ एवं संकल्प विधान

“कार्तिके कृष्णपक्षे तु चतुर्थी करवाभिधा।
तस्यां चन्द्रोदये पूज्यः शिवया सह शंकरः॥”

स्कंद पुराण / निर्णयसिन्धु

अर्थ: कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी ‘करवा’ नाम से जानी जाती है। इस तिथि में चंद्रोदय होने पर माता पार्वती, भगवान शिव, कार्तिकेय और श्रीगणेश का भक्तिपूर्वक षोडशोपचार पूजन करना चाहिए।

“गगनार्णवमाणिक्य चन्द्र दाक्षायणीपते।
गृहाणार्घ्यं मया दत्तं गणेशप्रतिरूपक॥”

चंद्र अर्घ्य मंत्र (व्रतराज)

अर्थ: हे आकाश रूपी महासागर के माणिक्य स्वरूप, रोहिणी के स्वामी चंद्रदेव! आप विघ्नहर्ता श्रीगणेश के प्रतिरूप हैं। मेरे द्वारा दिए गए इस अर्घ्य को स्वीकार कर मेरे पति को चिरायु और सौभाग्य प्रदान करें।

करवा चौथ 2026: पूजा मुहूर्त एवं समय सारणी

ऋषिकेश पंचांग के अनुसार 29 अक्टूबर 2026 के सुनिश्चित शुभ मुहूर्त निम्नलिखित हैं:

पंचांगीय अनुष्ठान सटीक समय (29 अक्टूबर 2026)
करवा चौथ व्रत तिथि 29 अक्टूबर 2026, गुरुवार
सरगी का शुभ समय (ब्रह्म मुहूर्त) प्रातः 04:45 बजे से 05:35 बजे तक
व्रत अवधि (सूर्योदय से चंद्रोदय) प्रातः 05:35 बजे से रात्रि 07:57 बजे तक
करवा चौथ संध्या पूजा मुहूर्त सायं 05:35 बजे से 06:54 बजे तक (कुल 1 घंटा 19 मिनट)
चतुर्थी तिथि समाप्त 29 अक्टूबर 2026, रात्रि 02:11 बजे तक
राहुकाल (पूजा वर्जित) दोपहर 01:24 बजे से 02:48 बजे तक

🌕 भारत के प्रमुख शहरों में चंद्रोदय (चाँद निकलने) का समय

स्थानीय अक्षांश और देशांतर के आधार पर 29 अक्टूबर 2026 की रात्रि विभिन्न शहरों में चंद्र दर्शन का संभावित समय निम्नलिखित रहेगा:

शहर का नाम चंद्रोदय समय (29 अक्टूबर)
वाराणसी / काशी (उत्तर प्रदेश) रात्रि 07:57 बजे
प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) रात्रि 08:00 बजे
लखनऊ / कानपुर (उत्तर प्रदेश) रात्रि 08:05 बजे
नई दिल्ली / एनसीआर रात्रि 08:15 बजे
जयपुर / जोधपुर (राजस्थान) रात्रि 08:23 बजे
चंडीगढ़ / पंजाब / हरियाणा रात्रि 08:13 बजे
कोलकाता / पटना / रांची रात्रि 07:44 से 07:50 बजे
मुंबई / पुणे (महाराष्ट्र) रात्रि 08:58 बजे
बेंगलुरु / हैदराबाद / चेन्नई रात्रि 08:40 से 08:50 बजे

🌌 आध्यात्मिक रहस्य: छलनी, करवा और 7 फेरे

परंपरा व प्रतीक शास्त्रोक्त एवं महत्व
1. छलनी से दर्शन क्यों? छलनी छानने (शुद्धिकरण) का प्रतीक है। चंद्रमा मन और भावनाओं का स्वामी है। छलनी के छिद्रों से जब पत्नी पहले चंद्रमा के शीतल प्रकाश को देखती है और फिर पति का मुखड़ा देखती है, तो नकारात्मक तरंगें छनकर सकारात्मक ऊर्जा व शीतलता दांपत्य में प्रवेश करती हैं।
2. मिट्टी के करवे का महत्व मिट्टी पंचतत्वों (क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा) का प्रतिनिधित्व करती है। करवा का टोंटीदार स्वरूप अमृत धारा का प्रतीक है। मिट्टी के करवे में रखा जल शुद्ध, शीतल और स्पंदित होकर स्वास्थ्यवर्धक बन जाता है।
3. करवा फेरने (7 बार) का नियम पूजा के समय सुहागिनें आपस में 7 बार करवा बदलती हैं। यह विवाह के 7 वचनों और 7 जन्मों के अटूट बंधन को पुनः स्मरण करने तथा सुहाग के आपसी मंगल आदान-प्रदान का प्रतीक है।

🛠️ प्रामाणिक करवा चौथ व्रत संकल्प एवं पूजन विधि

प्रातः सूर्योदय से पूर्व स्नानादि कर स्वच्छ वस्त्र (लाल, पीला या नारंगी) धारण करें। हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर यह संकल्प करें:

“मम सुखसौभाग्यपुत्रपौत्राद्यभिवृद्धये करकचतुर्थीव्रतमहं करिष्ये।”

क्रमबद्ध पूजन विधान:

  • चौकी सजाना: उत्तर-पूर्व दिशा में लकड़ी की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं। उस पर भगवान शिव, माता पार्वती, कार्तिकेय और श्रीगणेश का चित्र स्थापित करें अथवा करवा चौथ का प्रामाणिक कैलेंडर लगाएं।
  • करवा संस्कार: दो करवे (एक मिट्टी का और एक पीतल या अन्य धातु का) लें। एक में शुद्ध जल और दूसरे में दूध या शक्कर भरें। करवे के कंठ पर मौली बांधें और रोली से स्वस्तिक बनाएं।
  • 16 श्रृंगार अर्पण: माता पार्वती को 16 श्रृंगार की सामग्री (सिंदूर, बिंदी, चूड़ी, मेहंदी आदि) चढ़ाएं और भगवान शिव को बेलपत्र व श्रीगणेश को दूर्वा अर्पित करें।
  • कथा श्रवण व करवा फेरना: हाथ में गेहूं के 13 दाने लेकर करवा चौथ की पावन कथा सुनें। कथा समाप्त होने पर सुहागिनों के साथ 7 बार करवा फेरें।
  • चंद्र अर्घ्य एवं पारण: रात में चंद्रोदय होने पर छलनी में दीपक रखकर पहले चंद्रमा का दर्शन करें, जल व दूध से अर्घ्य दें। इसके बाद उसी छलनी से पतिदेव का दर्शन करें। पति के हाथों से पहला घूंट जल और मिष्ठान्न ग्रहण कर व्रत का पारण करें।

⚠️ मुख्य सावधानियां और वर्जित नियम

नियम शास्त्रोक्त निर्देश व सावधानियां
वर्जित वस्त्र काले, सफेद, भूरे या गहरे नीले रंग के वस्त्र इस दिन भूलकर भी न पहनें। लाल, गुलाबी, पीला या मैरून रंग सुहाग के लिए अत्यंत शुभ है।
नुकीली वस्तुओं का प्रयोग व्रत के दिन सुई, कैंची, चाकू या धारदार औजारों का प्रयोग वर्जित माना गया है।
सास को बायना (बाया) भेंट पूजा के उपरांत सास या घर की जेठानी को साड़ी, सुहाग सामग्री, फल और मिष्ठान्न का बायना देकर उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लें।

💬 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Google FAQs)

प्रश्न शास्त्रोक्त समाधान
कुंवारी लड़कियां या जिनकी सगाई हो चुकी है, वे व्रत कैसे रखें? अविवाहित कन्याएं उत्तम वर की प्राप्ति हेतु तथा सगाई वाली लड़कियां मंगेतर की दीर्घायु हेतु व्रत रख सकती हैं। वे चंद्रोदय के बजाय संध्या समय आकाश में तारों को अर्घ्य देकर व्रत खोल सकती हैं।
यदि बादल या धुंध के कारण चाँद न दिखे, तो व्रत कैसे खोलें? पंचांग में दिए गए चंद्रोदय के सटीक समय पर भगवान शिव के मस्तक पर सुशोभित चंद्रदेव का ध्यान करें अथवा पूर्व दिशा की ओर मुख करके भावपूर्वक अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया जा सकता है।
गर्भवती महिलाएं या बीमार सुहागिनें कैसे व्रत रखें? शास्त्रों में ‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्’ कहा गया है। गर्भवती व अस्वस्थ महिलाएं निर्जला व्रत के स्थान पर फलाहार, दूध अथवा जल ग्रहण करते हुए फलाहारी व्रत रख सकती हैं।
पीरियड्स (मासिक धर्म) आ जाए तो क्या करें? ऐसी स्थिति में व्रत पूर्ण रूप से रखा जाता है। स्वयं मूर्तियों या पूजा सामग्री का स्पर्श न करें, परिवार की कोई अन्य सुहागिन महिला या कुंवारी कन्या आपके निमित्त पूजा व कथा संपन्न कर सकती है। रात में दूर से ही चंद्रमा को देखकर पति के हाथों से पारण करें।

निष्कर्ष: करवा चौथ का व्रत केवल उपवास नहीं, बल्कि त्याग, निष्ठा और आत्मिक प्रेम की पराकाष्ठा है। विधि-विधान और शुद्ध भाव से किया गया यह व्रत दांपत्य जीवन को दीर्घायु, आरोग्य और अखंड सौभाग्य से परिपूर्ण करता है।

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