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विक्रम संवत 2078 में वर्ष प्रवेश लग्न से भारत का भविष्य
विक्रम संवत २०७८ के वर्ष प्रवेश लग्न से भारत में घटित होने वाली प्रमुख घटनाएं
विक्रम संवत 2078 में वर्ष प्रवेश लग्न से भारत का भविष्य
भारत के प्रवेश वर्ष प्रवेश लग्न के विचार से वर्ष प्रवेश लग्न मेष व द्रव्येश शुक्र है अतः मनोरंजन जगत एवं श्रृंगार संबधी व्यापार में थोड़ा लाभ होगा, पराक्रमेश बुध के होने से भारत की नीतियों से अंतराष्ट्रीय क्षेत्र में सफलता प्राप्त होगी, सुखेश चंद्रमा के होने के कारण से लोक कल्याण के कार्य से जनता सुखी रहेगी तथा बुध के कष्टेश होने के कारण से अनावश्यक समस्याओं का सामना करना पड़ेगा, मारकेश मंगल के होने के कारण से कई जगह अहिंसक उपद्रव होंगे व भाग्येश गुरु के होने के कारण से शिक्षा के क्षेत्र में उन्नति होगी, कर्मेश शनि से कानून व्यवस्था अच्छी दीर्घकालिक योजनाओं का शुभारंभ होगा, आयेश शनि के होने से राष्ट्रीय कोष में वृद्धि होगी तथा व्ययेश गुरु के होने के कारण से शिक्षा, ऊर्जा व योग के क्षेत्र में विस्तार होगा।
राहु और शनि से बनने वाला अशुभ योग: जानिए कौन सा है यह अशुभ योग व उसके फल और उपाय
शनि व राहु से बनने वाला पिशाच योग
शनि और राहु इन दोनों को वैदिक ज्योतिष में पाप ग्रह की श्रेणी में रखा गया है जब यह दो ग्रह आपस में संबंध बनाते हैं तो पिशाच नामक योग बनता है अब प्रश्न यह उठता है कि किस प्रकार से शनि व राहु संबंध बनाएं तो यह योग बनता है उससे पूर्व हमारे लिए यह जानना आवश्यक है कि आखिर शनि व राहु से ही क्यों पिशाच योग बनता है व पिशाच योग का क्या अर्थ है इसके लिए हमें पहले शनि व राहु को समझना होगा शनि व राहु रात्रि बली होते हैं शनि का वर्ण श्याम है और शनि अंधेरे का ग्रह है और राहु एक माया अर्थात जादू है जब भी शनि और राहु के बीच संबंध बनता है तो एक नकारात्मक शक्ति का सृजन होता है जिसे पराशरी ज्योतिष में “पिशाच योग” की संज्ञा प्राप्त है।
राहु व शनि के चार प्रकार से संबंध बनने पर व्यक्ति को पिशाच योग का फल प्राप्त होता है वह इस प्रकार है:-
१. शनि व राहु एक साथ युति कर के किसी भी भाव में स्थित हों।
२. शनि व राहु एक दूसरे को परस्पर देखतें हों।
३. शनि की राहु या राहु की शनि पर दृष्टि हो।
४. गोचर वश जब शनि जन्म के राहु या राहु जन्म के शनि पर से गोचर करता हो।
इन चार प्रकार के शनि व राहु के मध्य संबंध बनने पर पिशाच योग बनता है अब प्रश्न यह उठता है कि इस पिशाच योग के क्या होते हैं तो चलिए मैं विभिन्न भावों में बनने वाले पिशाच योग के फल को बताता हूँ:-
पिशाच योग
१. यदि लग्न में शनि व राहु की युति हो तो ऐसे व्यक्ति के ऊपर तांत्रिक क्रियाओं का अधिक प्रभाव रहता है तथा ऐसे व्यक्ति हमेशा चिंतित रहते हैं और इनके मस्तिष्क में नकारात्मक विचार सबसे पहले आते हैं साथ ही ऐसे व्यक्तियों को कोई न कोई रोग निरंतर बना रहता है।
२. यदि द्वितीय भाव में शनि व राहु की युति हो तो व्यक्ति के घर वाले ही उसके शत्रु रहते हैं तथा इनको हर कार्य में बाधाओं का सामना करना पड़ता है और इनकी वाणी में कुछ दोष रहता है साथ ही धन संचय में कठिनाई व जुए-सट्टे आदि में धन हानि होती है तथा ऐसे व्यक्ति नशीले पदार्थों या तामसिक पदार्थों या दोनों का सेवन करते हैं।
३. यदि तृतीय भाव में शनि व राहु की युति हो तो ऐसे व्यक्ति अधिकतर भ्रमित रहते हैं व ऐसे व्यक्तियों का छोटा भाई नही होता या छोटे भाई को किसी प्रकार कोई कष्ट रहता है कहने का आशय यह है कि तृतीय भाव का पिशाच योग छोटे भाई के सुख की हानि करता है साथ ही ऐसे व्यक्तियों को समय-समय पर भारी उतार-चढ़ाव के समय से गुजरना पड़ता है साथ ही यदि पंचमेश पर भी शनि या राहु की या दोनों की दृष्टि हो या युति हो तो ऐसे व्यक्तियों को संतान नही होती या होकर मर जाती है कहने का आशय यह है कि ऐसे व्यक्तियों को संतान सुख नही प्राप्त होता है।
४. यदि चतुर्थ भाव में शनि व राहु की युति हो तो यह और भी खराब स्थिति होती है क्योंकि चतुर्थ भाव भूमि, मकान, माता व सुख का भाव होता है अतः ऐसी स्थिति में व्यक्तियों को माता का पूर्ण सुख नही मिल पाता तथा इनके घर में नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव रहता है प्रायः ऐसे व्यक्तियों के घर में वास्तु दोष अवश्य ही रहता है साथ ही ऐसे व्यक्तियों को मकान का सुख भी मुश्किल से ही प्राप्त होता है क्योंकि शनि निर्माण का कारक होता है और राहु माया, भ्रम व बाधाओं का कारक होता है ऐसे व्यक्ति जब भी किसी मकान का निर्माण आरंभ करवाते है तो उनके परिवार में रोग, व्याधि व पीड़ा प्रायः बनी रहती है या ऐसे व्यक्तियों को बड़ा आर्थिक नुकसान सहन करना पड़ता है।
५. यदि पंचम भाव में शनि व राहु की युति हो तो व्यक्ति के मस्तिष्क में नकारात्मक विचार आते रहते हैं साथ ही ऐसे व्यक्तियों की शिक्षा भी कठिन परिस्थितियों से होते हए पूर्ण होती है व बड़े भाई-बहन को किसी प्रकार का कष्ट रहता है तथा ऐसे व्यक्तियों की संतान को कष्ट रहता है और यदि पंचमेश का भी शनि व राहु या दोनों में से किसी एक से भी संबंध बनता हो तो ऐसे व्यक्तियों की संतान हीन अर्थात देह के किसी भाग में दुर्बलता लिए हुए होती है या होकर मर जाती है कहने का आशय यह है कि ऐसे व्यक्तियों को संतान सुख नही प्राप्त होता है।
६. यदि षष्ठ भाव में शनि व राहु की युति हो तो ऐसे व्यक्तियों के छुपे हुए शत्रु अधिक होते हैं षष्ठ भाव से रोग, रिपु और ऋण का विचार करते हैं अतः ऐसे व्यक्तियों की बीमारी का रहस्य जल्दी ज्ञात नही हो पाता और किसी जुए व सट्टे में हारने या नशे के कारण से धन हानि व ऋण की वृद्धि होती है ऐसे व्यक्तियों को हिर्दय घात होने या अन्य किसी प्रकार की दिल की बीमारी, रक्त जनित विकार, एक्सीडेंट से देह के किसी भाग में कमजोरी की संभावना रहती है और मामा पक्ष से विवाद बना रहता है।
७. यदि सप्तम भाव में शनि व राहु की युति हो तो ऐसी स्थिति में व्यक्ति को अनेक प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है क्योंकि सप्तम भाव से रोजगार, जीवनसाथी, दाम्पत्य जीवन, मित्र, साझेदारी आदि का विचार किया है अतः इस भाव में शनि व राहु की युति होने पर व्यक्ति को अपने मित्रों व साझेदारियों से धोखा मिलने की संभावना रहती है तथा किसी दूसरे व्यक्ति के कारण से घर के वातावरण में कलह का माहौल बना रहता है साथ ही ऐसे व्यक्तियों को किसी महिला के कारण से अपमानजनक स्थितियों का भी सामना करना पड़ता है और रोजगार के मार्ग में अनेक प्रकार की परेशानियों का सामना करते हुए धैर्य व संयम रखते हुए सफलता प्राप्त होती है।
८. अष्टम भाव से ससुराल, आयु, मृत्यु, पुरातत्व, रहस्मई कार्य, गूढ़ विद्या, जीवनसाथी की वाणी आदि का विचार किया जाता है अतः ऐसे स्थिति में अष्टम भाव में यदि शनि व राहु की युति हो तो व्यक्ति के दाम्पत्य जीवन में कलह की स्थितियाँ प्रायः बनी रहती है ध्यान देने योग्य बात यह है वहाँ बैठे इन दोनों ग्रह की सप्तम दृष्टि द्वितीय भाव जो आपका कुटुंब व वाणी का भाव है पर दृष्टि होती है अतः ऐसे व्यक्तियों का दाम्पत्य जीवन न्यून होता और यदि सप्तमेश अर्थात सप्तम भाव का स्वामी भी इनसे संबंध बनाता हो या त्रिक भाव में बैठा हो तो ऐसी स्थिति में दाम्पत्य जीवन को बचाना और भी मुश्किल हो जाता है साथ ही ऐसे व्यक्तियों को जीवन में कई बार शल्य चिकित्सा भी करानी पड़ सकती है तथा ऐसे व्यक्तियों को उदर व मूत्र विकार भी रहता है साथ ही ऐसे व्यक्तियों की आयुष्य पर भी अनेक बार संकट आते हैं व ऐसे व्यक्तियों के अनैतिक संबंध बनने की भी संभावना रहती है।
९. यदि नवम भाव में शनि व राहु की युति हो तो ऐसा व्यक्ति धर्म के विपरीत आचरण करने वाला होता है तथा ऐसे व्यक्तियों के भाग्य में निरंतर उतार-चढ़ाव आते रहते हैं साथ ही ऐसे व्यक्तियों के पिता को भी किसी प्रकार का कष्ट रहता है किंतु यदि भाग्येश की दृष्टि नवम भाव पर हो तो व्यक्ति को कड़े संघर्ष उपरांत सफलता प्राप्त होती है।
१०. यदि दशम भाव में शनि व राहु की युति हो तो व्यक्ति के घरेलू सुख में कुछ कमी व माता-पिता को कष्ट रहता है तथा ऐसे व्यक्तियों के कारोबार में निरंतर उतार-चढ़ाव आते रहते हैं साथ ही किसी राजा या उच्चाधिकारी से दंड भी प्राप्त होने की संभावना रहती है।
११. एकादश भाव को लाभ भाव भी कहा जाता है ज्योतिष का एक सर्वमान्य नियम है कि एकादश भाव में क्रूर से क्रूर ग्रह भी शुभ फल प्रदान करते है क्योंकि एकादश भाव का दूसरा नाम ही लाभ भाव है इस स्थिति में यदि शनि व राहु की युति एकादश भाव में हो तो व्यक्ति को जुए-सट्टे व किसी गलत कार्य द्वारा धन की प्राप्ति होती है किंतु ऐसे व्यक्तियों के भाई-बहन को किसी प्रकार का कष्ट अवश्य ही रहता है तथा ऐसे व्यक्तियों को संतान का पूर्ण सुख नही प्राप्त हो पाता है।
१२. द्वादश भाव में यदि शनि व राहु की युति हो तो व्यक्ति के अनैतिक संबंध बनने की अधिक संभावना रहती है साथ ही ऐसे व्यक्तियों के गृहस्थ सुख में कुछ कमी रहती है तथा ऐसे व्यक्तियों को जीवन में कई बार धोखा मिलता है तथा किसी असाध्य रोग से पीड़ा होती है।
नोट:-
१. शनि व राहु की युति के अतिरिक्त उपरोक्त बताए गए अन्य प्रकार से संबंध बनाने पर भी प्राप्त होते हैं।
२. यदि शनि व राहु की युति या प्रतियुति (शनि से सप्तम भाव में राहु या राहु से सप्तम भाव में शनि हो) शनि की मकर या कुंभ राशि में हो तो स्थितियाँ धैर्य के साथ अत्यधिक प्रयास करने पर नियंत्रण में आ जाती है।
३. कुंडली के प्रथम अर्थात लग्न से सप्तम तक के भाव रात्रि बली होते हैं अतः इन भावों में शनि व राहु का संबंध बनना अत्यधिक कष्टदाई होता है।
मैंने द्वादश भावों में पिशाच योग बनने के फल को विस्तार से बताया है अब प्रश्न यह उठता है कि इस दोष के क्या उपाय होते हैं तो सर्वप्रथम मैं यहाँ यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि किसी भी प्रकार के दोष का उपाय पूर्ण विधि व शास्त्रोचित तरह से करने पर ही लाभ मिलता है अतः मैं यहाँ कुछ उपाय बता रहा हूँ जिन्हें करने से निश्चय ही लाभ प्राप्त होगा:-
१. दुर्गा सप्तशती का विधि पूर्वक पाठ व दशांश कराने से पिशाच योग के दुष्प्रभाव से मुक्ति मिलती है।
२. नित्य संकटमोचन हनुमाष्टक व सुंदरकांड का पाठ करने से पिशाच योग के दुष्प्रभाव से मुक्ति मिलती है।
३. शनि व राहु के हवनात्मक जप से भी पिशाच योग के दुष्प्रभाव में कमी आती है।
४. नित्य शनि स्तोत्र का पाठ करने व अमावस्या के दिन सूर्यास्त के समय बहते पानी में नारियल प्रवाहित करने से भी पिशाच योग के दुष्प्रभाव में कमी आती है।
अनेक ग्रंथों में सूर्यादि सभी ग्रहों के विभिन्न स्थानों में फल बताएं गए हैं पिछले लेख में मैंने भृगु सूत्र आधारित सूर्य के प्रथम भाव, द्वितीय भाव व तृतीय भाव में फल को बताया था अतः उसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए सूर्य के चतुर्थ भाव में फल को लिख रहा हूँ:-
भृगु सूत्र आधारित प्रथम भाव में सूर्य के फल को पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएं👇🏻
१. यदि कुंडली के चतुर्थ भाव में सूर्य सामान्य स्थिति में बैठा हो तो व्यक्ति अहंकारी, समाज हित के विपरीत आचरण करने वाला, गर्म शरीर वाला तथा मानसिक पीड़ा से युक्त होता है और उसे ३२वें वर्ष की आयु में सभी कार्यों में सफलता प्राप्त होती है।
२. यदि चतुर्थ भाव में सूर्य अपनी उच्च राशि (मेष) या स्वराशि (सिंह) का होकर स्थित हो तो व्यक्ति को बहुत मान-प्रतिष्ठा, सफलता, सत्ता प्राप्ति व पद प्राप्ति आदि होती है तथा ऐसा व्यक्ति ज्ञानवान व वीर होता है।
भृगु सूत्र आधारित द्वितीय भाव में सूर्य के फल को पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएं👇🏻
३. यदि चतुर्थ भाव में सूर्य अपनी नीच राशि (तुला) का होकर स्थित हो तो ऐसा व्यक्ति धन, धान्य आदि की समृद्धि से रहित होता है।
चतुर्थ भाव में सूर्य
४. यदि चतुर्थ भाव में सूर्य स्थित हो और/सुखेश बलवान होकर स्वराशि, त्रिकोण अथवा केंद्र में बैठा हो तो व्यक्ति को आन्दोलिका (उत्तम वाहन) की प्राप्ति होती है जो कि लक्षणान्वित (लाल बत्ती आदि चिन्हों से युक्त) होती है।
५. यदि कुंडली के चतुर्थ भाव में सूर्य स्थित हो और चतुर्थेश/सुखेश पाप ग्रहों से युक्त अथवा दृष्ट होकर दुष्ट स्थान में बैठा हो तो व्यक्ति को दुर्वाहन (बुरे वाहन आदि) प्राप्त होते हैं तथा ऐसा व्यक्ति खेत, भूखण्ड एवं भवन आदि से हीन होता है और वह किसी दूसरे द्वारा दिए गए आवास में पराश्रित होकर रहता है।
भृगु सूत्र आधारित तृतीय भाव में सूर्य के फल को पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएं👇🏻
अनेक ग्रंथों में सूर्यादि सभी ग्रहों के विभिन्न स्थानों में फल बताएं गए हैं पिछले लेख में मैंने भृगु सूत्र आधारित सूर्य के प्रथम भाव व द्वितीय में फल को बताया था अतः उसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए सूर्य के तृतीय भाव में फल को लिख रहा हूँ:-
भृगु सूत्र आधारित प्रथम भाव में सूर्य के फल को पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएं:-
१. यदि कुंडली के तृतीय भाव में सूर्य हो तो व्यक्ति बुद्धिमान होता है किंतु ऐसे व्यक्तियों को अनुजों (छोटे भाइयों) का अभाव रहता है साथ ही बड़ा भाई तो होता है किंतु बड़े भाई के सुखों में त्रुटि रहती है और ऐसे व्यक्तियों को उम्र के ४, ५, ८ अथवा १२वें वर्ष में कुछ पीड़ा होती है।
२. यदि कुंडली के तृतीय भाव में सूर्य पाप ग्रह से युक्त होकर बैठा हो तो व्यक्ति क्रूर कर्मों को करने वाला होता है तथा उसके दो भ्राता होते हैं साथ ही ऐसा व्यक्ति पराक्रमी तथा लड़ाई-झगड़े से न घबराने वाला और कीर्तिमान व अपने द्वारा अर्जित धन का भोग करने वाला होता है।
३. यदि तृतीय भाव में सूर्य शुभ ग्रहों से युक्त हो तो व्यक्ति के सहोदर भाइयों की अच्छी उन्नति व वृद्धि होती है।
४. यदि तृतीय भाव में सूर्य हो और तृतीयेश/पराक्रमेश बली अवस्था में बैठा हो या तृतीय भाव में सूर्य स्वराशि स्थित हो तो व्यक्ति अत्यंत पराक्रमी, खुद के पराक्रम से संपूर्ण सुख भोगने वाला, उच्च पद पर आसीन होने वाला, राजा या उच्चाधिकारी द्वारा सम्मानित होता है तथा ऐसे व्यक्तियों के भाई दीर्घायु होते हैं।
५. यदि तृतीय भाव में सूर्य स्थित हो और तृतीयेश/पराक्रमेश पाप ग्रहों से युक्त व दृष्ट हों तो व्यक्ति आलस्य करने वाला व पाप कर्म करने वाला होता है तथा ऐसे व्यक्तियों के भाइयों का नाश होता है।
६. यदि तृतीय भाव में सूर्य स्थित हो और उस पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो व्यक्ति धनवान, भोगी तथा सुखी होता है।
भृगु सूत्र आधारित द्वितीय भाव में सूर्य के फल को पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएं:-
हर माह की त्रयोदशी तिथि के दिन प्रदोष व्रत रखा जाता है जब त्रयोदशी तिथि मंगलवार के दिन पड़ती है तो उसे भौम प्रदोष व्रत के नाम से जाना जाता है शास्त्रों के अनुसार भौम प्रदोष व्रत करने से व्यक्ति को कर्ज से शीघ्र मुक्ति मिलती है, शास्त्रों के अनुसार जो भी व्यक्ति भौम प्रदोष का व्रत करते हुए मंगल के २१ नामों का जप करते हुए व कथा पढ़ते हुए शिव जी व हनुमान जी की उपासना करता है उसके सभी अमंगल दूर हो जाते हैं तथा कर्ज से शीघ्र छुटकारा मिल जाता है।
व्रत विधि:-
भौम प्रदोष व्रत विधि व मंगल के २१ नाम
प्रातः स्नानादि कर दाहिने हाथ में लाल पुष्प, रोली, अक्षत, सुपाड़ी, जल व कुछ दक्षिणा लेकर व्रत का संकल्प लेना चाहिए तदोपरांत पूरे दिन निराहार व्रत रखना चाहिए और संध्या में प्रदोष काल के समय भगवान शिव जी और हनुमान जी की पूजा अर्चना करनी चाहिए और मंगल के २१ या १०८ नामों का उच्चारण व भौम प्रदोष व्रत कथा का वाचन करना चाहिए व प्रसाद के सेवन पश्चात अन्न ग्रहण करना चाहिए।
एक नगर में एक वृद्ध महिला अपने पुत्र के साथ रहती थी वृद्ध महिला को हनुमान जी के प्रति गहरी आस्था थी व वह प्रत्येक मंगलवार के दिन व्रत रखकर हनुमान जी की उपासना करती थीं एक बार हनुमान जी ने उस वृद्ध महिला की श्रद्धा व भक्ति भाव की परीक्षा लेने का सोचा और साधु रूप धारण कर वृद्ध महिला के घर पधारे और कहने लगे कि क्या कोई हनुमान जी भक्त है जो मेरी एक इच्छा पूर्ण करेगा यह वचन सुनकर वृद्ध महिला द्वार पर आ गयी और बोली हे साधु महाराज आज्ञा करें मैं आपकी किस प्रकार से सहायता कर सकती हूँ तब साधु वेशधारी हुनमान जी कहने लगे कि मुझे तीव्र क्षुधा लगी है, मैं भोजन करना चाहता हूँ अतः आप जमीन पर मिट्टी का लेप लगाकर चूल्हा तैयार कर दें इस पर वह वृद्ध महिला बोलीं कि हे साधु आप मिट्टी से जमीन को लीपने व गड्ढा खोदने के अतिरिक्त अन्य कोई आज्ञा दे दें मैं उसे अवश्य पूर्ण करूँगी।
साधु वेशधारी हनुमान जी ने वृद्ध महिला को तीन बार प्रतिज्ञा दिलवाई और कहा कि आप अपने पुत्र को बुला दीजिए मैं उसकी पीठ पर अग्नि प्रज्वलित कर भोजन बनाऊँगा इतना सुनते ही वृद्ध महिला घबरा गयीं किंतु प्रतिज्ञा में बँधे होने के कारण उन्होंने अपने पुत्र को बुलाकर साधु वेशधारी हनुमान जी को सौंप दिया व पुनः अंदर चली गयी कुछ समय पश्चात साधु वेशधारी हनुमान जी ने वृद्ध महिला को पुनः बुलाकर कहा कि भोजन तैयार हो गया है आप भी अपने पुत्र को बाहर बुला लें ताकि वो भी इस भोजन को ग्रहण कर सके यह सुनकर वृद्ध महिला हाथ जोड़कर निवेदन करने लगीं कि हे साधु महाराज मेरे मृत पुत्र का नाम लेकर मुझे और कष्ट न दें किंतु साधु महाराज के न मानने पर उन्होंने अपने पुत्र को आवाज दी और अपने पुत्र को जीवित पाकर अचंभित हो साधु वेशधारी हनुमान जी के चरणों में गिर पड़ीं तब हनुमान जी अपने मूल स्वरूप में आए व कहने लगे कि मैं आपकी श्रद्धा और भक्ति की परीक्षा लेने आया था और उसमें आप सफल हुईं व हनुमान जी ने उन महिला को सभी अमंगल से मुक्ति व अपनी भक्ति का आशीर्वाद दिया।
शास्त्रों के अनुसार यदि कोई व्यक्ति कर्ज में डूब गया हो या उसके साथ निरंतर कुछ न कुछ अमंगल हो रहा हो तो उसे भौम प्रदोष व्रत अवश्य करना चाहिए ऐसा करने से हनुमान जी व शिव जी की कृपा से व्यक्ति के सभी अमंगल दूर हो जातें हैं व वह कर्ज से शीघ्र ही मुक्त हो जाता है।
अनेक ग्रंथों में सूर्यादि सभी ग्रहों के विभिन्न स्थानों में फल बताएं गए हैं पिछले लेख में मैंने भृगु सूत्र आधारित सूर्य के प्रथम भाव में फल को बताया था अतः उसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए सूर्य के द्वितीय भाव में फल को लिख रहा हूँ:-
१.यदि कुंडली के द्वितीय भाव में सूर्य हो तो व्यक्ति प्रायः मुख के रोगों से पीड़ित रहता है साथ ही उसके जीवन के २५ वें वर्ष में राजदंड के कारण (न्यायालय की आज्ञा से) से धन की हानि होती है यह सामान्य फल है किंतु यदि सूर्य अपनी उच्च राशि (मेष) या स्वराशि (सिंह)का होकर द्वितीय भाव में स्थित हो तो मुख रोग तथा राजदंड से धन का नाश नही होता है।
२.यदि द्वितीय भाव में सूर्य के साथ पाप ग्रह बैठे हों तो व्यक्ति नेत्र रोगी होता है साथ ही थोड़ा विद्वान तथा रोगी शरीर वाला होता है।
३.यदि द्वितीय भाव में स्थित सूर्य पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो व्यक्ति धनी होता है और उसकी कुंडली के अनेक दोषों (बुरे फल) का नाश हो जाता है तथा उसके नेत्रों में भी कोई रोग नही होता है।
४.यदि द्वितीय भाव में सूर्य अपनी उच्च राशि (मेष) या स्वराशि (सिंह) का होकर स्थित हो तो ऐसा व्यक्ति बहुत धनवान होता है और उसे प्रचुर सम्पन्नता तथा वैभव की प्राप्ति होती है।
५.यदि द्वितीय भाव में सूर्य के साथ बुध भी स्थित हो तो व्यक्ति शीघ्रता पूर्वक बोलता है (यहाँ मूल में पवनवाक शब्द का प्रयोग हुआ है इसका अर्थ है कि जैसे तेज हवा चलती है ठीक उसी प्रकार तेज रफ्तार से बातचीत करने वाला)।
६.यदि द्वितीय भाव में सूर्य स्थित हो व द्वितीय भाव का स्वामी स्वराशि या उच्च राशि में स्थित हो तो व्यक्ति वाग्मी (वार्तालाप में कुशल) होता है साथ ही इस योग में जन्मा व्यक्ति विविध विज्ञानों एवं कलाओं में निष्णात होता है ऐसा व्यक्ति ज्ञानवान तथा अच्छे नेत्र दृष्टि वाला होता है और राजयोग का पूर्ण सुख प्राप्त करता है।
१. यदि सौम्य ग्रह (बुध, गुरु, शुक्र और पूर्णिमा का चंद्र) केंद्र के स्वामी हों तो शुभ फल नही प्रदान करते हैं।
२. यदि क्रूर ग्रह (सूर्य, मंगल, शनि, क्षीण अर्थात अमावस्या का चंद्र व पाप ग्रह से ग्रस्त बुध) केंद्र के स्वामी हो तो अशुभ फल नही प्रदान करते हैं।
३. अष्टम भाव में कोई भी ग्रह हो चाहे व स्वग्रही हो या उच्च के स्वास्थ्य संबंधित समस्याएं अवश्य ही प्रदान करते हैं।
४. कर्क व सिंह लग्न वालों के लिए मंगल अधिक शुभ होता है क्योंकि इन कुंडलियों में मंगल त्रिकोण व केंद्र के स्वामी होकर राजयोगकारक हो जाते हैं।
५. राहु और केतु को छाया ग्रह कहा गया है अतः यह ग्रह जिन ग्रहों के साथ या जिन राशि पर बैठते हैं उनके फल के अनुसार ही अपना फल प्रदान करते हैं।
६. त्रिकोण और केंद्र के स्वामी भले दोषयुक्त हों किंतु यदि ये आपस में संबंध बनाते हैं तो योगकारक बनकर शुभ फल प्रदान करते हैं।
७. राहु में केतु की अंतर्दशा सदैव ही कष्टदायक होती है।
८. योगकारक ग्रह की दशा में राजयोग समान सुख की प्राप्ति होती है किंतु यदि योगकारक ग्रह पाप ग्रह से युत या दृष्ट हो या त्रिक भाव में स्थित हो तो कुछ संघर्ष के साथ उन्नति व सफलता देते हैं।
९. यदि कोई क्रूर ग्रह योगकारक ग्रह से संबंध बनाता है तो क्रूर ग्रह की दशा के अंदर योगकारक ग्रह की अंतर्दशा शुभ फलदाई होती है।
१०. यदि कोई क्रूर ग्रह योगकारक ग्रह से संबंध बनाता है तो योगकारक ग्रह की दशा के अंदर क्रूर ग्रह की अंतर्दशा संघर्ष का सूचक होती है।
११. यदि योगकारक ग्रह त्रिकोण में स्थित हो या त्रिकोण भाव के स्वामी से संबंध बना ले तो अत्यंत शुभफलदाई होता है जिसमें राजा के समान सुख की प्राप्ति होती है।
१२. अष्टम भाव का शनि आयुष्य की वृद्धि करता है किंतु वाणी दोष के कारण से दाम्पत्य सुख की हानि करता है।
१३. यदि राहु या केतु केंद्र में बैठे हों और केंद्र या त्रिकोण के स्वामी से युत या दृष्ट हों तो राहु व केतु भी योगकारक हो जाते हैं।
१४. कुंडली का अष्टम भाव आयुष्य का भाव होता है और अष्टम से अष्टम भाव अर्थात लग्न कुंडली का तीसरा भाव भी आयुष्य का भाव होता है।
१५. लग्न कुंडली का द्वितीय, सप्तम व द्वादश भाव मारक भाव होते हैं क्योंकि सप्तम व द्वितीय भाव आयुष्य भाव के व्यय भाव व द्वादश भाव लग्न का व्यय भाव होता है।
ज्योतिष के कुछ प्रसिद्ध व सर्वमान्य सूत्र
१६. यदि मारक ग्रहों की दशा में मृत्यु न हो तो कुंडली में जो भी पाप ग्रह अधिक बलवान होगा उसकी दशा में व्यक्ति की मृत्यु होती है।
१७. यदि शनि मारक भाव से संबंध बनाता है तो प्रवल मारक बन जाता है।
१८. कोई भी ग्रह अपनी महादशा के अंदर अपनी ही अंतर्दशा में कभी शुभ फल प्रदान नही करते हैं।
१९. मारक ग्रहों की दशा में योगकारक ग्रह की अंतर्दशा में व्यक्ति को प्रसिद्धि अवश्य प्राप्त होती है किंतु पूर्ण सुख नही मिल पाता है।
२०. शुक्र की दशा में शनि की अंतर्दशा हो तो व्यक्ति को शुक्र ग्रह के ही फल की प्राप्ति होती है ठीक इसी प्रकार शनि की महादशा में शुक्र की अंतर्दशा हो तो व्यक्ति को शनि के ही फल प्राप्त होते हैं।
२१. यदि लग्न का स्वामी दशम में हो और दशम का स्वामी लग्न में हो तो यह बहुत ही शुभ फलदाई होता है ऐसा व्यक्ति खुद के परिश्रम से अनेक सफलताएं प्राप्त कर प्रसिद्ध हो जाता है और राजा या राज्य सरकार या किसी उच्च अधिकारी से सम्मान प्राप्त करता है।
२२. यदि नवम का स्वामी दशम में हो और दशम का स्वामी नवम में हो तो ऐसा व्यक्ति निश्चय ही बड़ी उन्नति प्राप्त करता है।
२३. यदि नवम का स्वामी दशम में हो और दशम का स्वामी लग्न में हो तो ऐसे व्यक्ति को दशम भाव में जो राशि हो उसके स्वामी से संबंधित वस्तुओं का व्यापार करना चाहिए।
२४. यदि नवम का स्वामी एकादश में हो तो ऐसा व्यक्ति निश्चय ही धनवान होता है।
२५. यदि एकदाश भाव का स्वामी लग्न में हो तो ऐसे व्यक्तियों को हर ११वें दिन कोई न कोई लाभ अवश्य मिलता है।
शास्त्रों के अनुसार सूर्य के गोचर परिवर्तन को सूर्य की सक्रांति के नाम से जाना जाता है जब सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने उनके घर अर्थात मकर राशि में प्रवेश करते हैं तो मकर की सक्रांति अर्थात मकर सक्रांति का पर्व मनाया जाता है मकर सक्रांति के साथ ही खरमास का समापन व मांगलिक कार्यक्रमों का आरंभ हो जाता है चूँकि इस बार गुरु व शुक्र के अस्त रहने के कारण से मांगलिक कार्यक्रम के लिए शुभ मुहर्त 22 अप्रैल से प्राप्त होंगे, शास्त्रों में मकर सक्रांति के दिन कुछ विशेष उपायों का वर्णन मिलता है जिनसे अनेक परेशानियों से मुक्ति मिलती है तो चलिए जानते हैं कि ऐसे कौन से उपाय है जिनको करने से अनेक परेशानियों से मुक्ति मिलती है:-
१. मकर सक्रांति के दिन सूर्योदय के पूर्व तिल स्नान (नहाने के पानी में तिल मिलाकर स्नान) करना चाहिए तथा उगते हुए सूर्य को ताँबे के पात्र में जल, कुमकुम, अक्षत, तिल, गुण व लाल पुष्प मिलाकर “ॐ घृणि सूर्याय नमः” मन्त्र का जाप करने से सूर्य देव की कृपा से आरोग्यता की प्राप्ति होती है।
२. मकर सक्रांति के दिन गरीबों व ब्राह्मणों को भोजन कराने से घर में अन्न की कभी कमी नही होती है।
३. मकर सक्रांति के दिन गुण व कच्चा चावल बहते पानी में प्रवाहित करने से नजर दोष से मुक्ति व आरोग्यता की प्राप्ति होती है।
४. मकर सक्रांति के दिन साफ लाल वस्त्र में गेहूँ और गुण को बाँधकर कुछ दक्षिणा के साथ ब्राह्मण व गरीबों को दान करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
५. जिस किसी की कुंडली में सूर्य अशुभ स्थिति में हो उन्हें ताँबे का सिक्का या ताँबे का चौकोर टुकड़ा बहते पानी में सूर्य के मंत्र “ॐ घृणि सूर्याय नमः” का जप करते हुए प्रवाहित करने से लाभ मिलता है।
६. मकर सक्रांति के दिन तिल युक्त जल पितरों को अर्पित करने, तिल से अग्नि में हवन करने, गरीबों को तिल का दान व भोजन (तिल युक्त खिचड़ी) कराने से अनन्य पुण्य की प्राप्ति होती है।
७. मकर सक्रांति के दिन गाय को तिल युक्त खिचड़ी खिलाने से सभी ग्रहों से उत्पन्न दोषों से मुक्ति मिलती है।
८. यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में सूर्य नीच राशि के हैं तो उन्हें मकर सक्रांति के दिन सूर्य यंत्र की विधि पूर्वक स्थापना करनी चाहिए तथा उस यंत्र को नित्य ताँबे के पात्र में जल, अक्षत, कुमकुम व लाल पुष्प मिलाकर अर्पित करते हुए 501 की संख्या में सूर्य मंत्र “ॐ घृणि सूर्याय नमः” का जप करना चाहिए इस उपाय से लाभ अवश्य प्राप्त होगा व धन, स्वास्थ्य, रक्त जनित विकार जैसी समस्याओं से मुक्ति मिलेगी तथा सामाजिक प्रतिष्ठा व मान-सम्मान की प्राप्ति होगी।
९. मकर सक्रांति के दिन गरीबों को खिचड़ी, कंबल, गरम वस्त्र, लकड़ी (अलाव जलाने हेतु), घी, दाल-चावल इत्यादि वस्तुओं का दान करने से सभी मनोकामनाओं की पूर्ति होती है।
१०. मकर सक्रांति के दिन प्रातः स्नानादि कर के सूर्य को तांबे के पात्र से जल, कुमकुम, लाल पुष्प, अक्षत, तिल इत्यादि को मिलाकर अर्पित करने व अदित्यहिर्दय स्तोत्र का पाठ करने से सभी कष्टों से मुक्ति व कार्य में सफलता प्राप्त होती है।
वार्षिक राशिफल 2021: जानिए 2021 में कैसा रहेगा आपका भाग्य भाग:-१ Astrology Sutras
वार्षिक राशिफल 2021
वर्ष 2020 में सभी राशि वालों को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा साथ ही समस्त विश्व कोरोना नामक महामारी से झूझता रहा अब जल्द ही 2021 का आरंभ होने जा रहा है वर्ष के आरंभ में शनि व गुरुमकर राशि से गोचर करेंगे जिससे गुरु का नीचत्व भंग होगा, वर्ष 2021 का आरंभ कन्या लग्न, कर्क राशि व पुष्य नक्षत्र से होगा तथा वर्ष 2021 का अंत कर्क लग्न से होगा अतः वर्ष 2021 का आरंभ वैवाहिक जीवन, करियर, प्रेम,आर्थिक स्थिति व शिक्षा के लिए अच्छा रहेगा किंतु मार्च में गोचर में मंगल व राहु की युति हो जाने से घर/परिवार में मानसिक तनाव, विवाद व कार्यक्षेत्र में उतार-चढ़ाव बना रहेगा तथा अप्रैल और मई माह में स्थितियों में पुनः सुधार होगा तथा वर्ष के मध्य भाग में उन्नति के अनेक अवसर प्राप्त होने के योग बनेंगे।
सितंबर से दिसंबर 2021 का समय भाग्य में उन्नति, यात्राओं, पदोन्नति के योग बनाएंगे किंतु स्वास्थ्य के प्रति विशेष रूप से सतर्कता बरतनी होगी, दिसंबर माह में मंगल का तृतीय भाव से गोचर ऊर्जा का नया संचार करेगा जिससे शत्रुओं पर विजय, प्राकृतिक आपदाएं, भूकंप के योग बनेंगे, कुल मिलाकर वर्ष 2021 काफी अच्छा रहने वाला है यह फलकथन भारत वर्ष की कुंडली के गोचर के अनुसार है जनमानस की कुंडली में स्थित ग्रह व उनकी स्थिति, दशा-अंतर्दशा, गोचर, भिन्नाष्टकवर्ग के अनुसार फलादेश में अंतर संभव रहेगा।
वार्षिक राशिफल 2021:-
2021 राशिफल
मेष राशिफल:-
मेष राशिफल
मेष राशि वालों के लिए वर्ष 2021 में उन्नति के नए मार्ग खुलेंगे किंतु शनि के दशम भाव से गोचर के कारण से धन संचय में कठिनाई व कुटुम्ब से मतभेद होने के योग बनेंगे, पशु व वाहन से चोट आदि का भय बना रहेगा, बेरोजगारों को नौकरी प्राप्त होगी किंतु मई से अक्टूबर 2021 का समय कुछ संघर्ष भरा रहेगा अतः सावधान रहें व कोई भी निर्णय बहुत सोच विचार कर ही लें, जून के मध्य भाग से कार्यक्षेत्र में तनाव की स्थितियाँ उत्पन्न होंगी, वर्ष का अंतिम भाग मेष राशि वालों के लिए काफी अच्छा रहेगा यह वह समय रहेगा जहाँ आपको आपके द्वारा किए प्रयासों का पूर्ण फल मिलेगा, नौकरी परिवर्तन, पदोन्नति व बेरोजगारों को नौकरी प्राप्त होने के योग बनेंगे, अप्रैल के अंतिम भाग से अगस्त के प्रथम सप्ताह तक का समय घरेलू/पारिवारिक सुख के लिए अच्छा रहेगा कोई शुभ समाचार प्राप्त हो सकता है, घर में नए मेहमान का आगमन संभव है, यदि आप विवाह योग्य हो गए हैं तो विवाह हेतु कहीं बात चल सकती है, पड़ोस में विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण बढ़ेगा, प्रेमियों के लिए भी वर्ष 2021 अच्छा रहेगा व आपका प्रेम विवाह कुछ परिश्रम से संपन्न होने के योग बनेंगे, वर्ष 2021 के अंतिम भाग में स्वास्थ्य के प्रति विशेष सावधानी बरतें, पशु, वाहन व हथियार आदि से चोट आदि लगने का भय रहेगा अतः सावधानी बरतें।
उपाय:- नित्य सुंदरकांड का पाठ करें व शनिवार के दिन काले कंबल का दान करें।
वृषभ राशिफल:-
वृषभ राशिफल
वृषभ राशि वालों के वर्ष के आरंभ से ही राहु का लग्न से गोचर रहेगा लग्न से राहु का गोचर मन में अनेक प्रकार की भ्रामक स्थितियाँ उत्पन्न करेंगे अतः कोई भी निर्णय बहुत सोच-विचार कर के ही लें, वृषभ राशि वालों के लिए वर्ष 2021 उतार-चढ़ाव वाला रहेगा अनेक अवसरों पर आय को लेकर कुछ तनावपूर्ण स्थितियाँ उत्पन्न होंगी किंतु अप्रैल के मध्य भाग के बाद से अचानक धन लाभ प्राप्ति के योग बनेंगे तथा रुके हुए कार्य पूर्ण होने से तनाव में कुछ कमी अनुभव होगी, यदि आप जमीन या मकान क्रय करने का विचार कर रहे हैं तो 20 सितंबर तक रुक जाएं अन्यथा नुकसान झेलना पड़ सकता है, अक्टूबर से शेयर बाजार में पैसा निवेश करने का सही समय रहेगा, पैतृक संपत्ति प्राप्त होने के योग बनेंगे, कार्यक्षेत्र में उन्नति प्राप्त करने हेतु अथक परिश्रम करना पड़ेगा विशेषतः मई से अक्टूबर माह तक कार्यक्षेत्र में रिस्क लेने से बचें तथा कार्यस्थल पर किसी से व्यर्थ विवाद न करें, वर्ष 2021 का अंतिम भाग कुछ राहत देगा जिसमें उन्नति के नए अवसर प्राप्त होंगे, पदोन्नति का लंबे समय से इंतजार कर रहे लोगों के लिए यह अच्छा समय सिद्ध होगा, अप्रैल से जून 2021 के मध्य घर में किसी मांगलिक कार्यक्रम के होने के योग बन रहे हैं, यदि आप विवाह योग्य हो गए हैं तो वर्ष के मध्य भाग में विवाह हेतु कहीं बात चल सकती है किंतु सप्तम भाव से केतु का गोचर विवाह में कुछ अड़चनें उत्पन्न कर सकता है, इस वर्ष पार्टनरशिप में कार्य आरंभ करना जोखिम भरा सिद्ध होगा अतः लोगों पर अधिक विश्वास करने से बचें।
उपाय:- नित्य श्री सूक्त व गणेश संकटनाशन स्तोत्र का पाठ करें।
मिथुन राशिफल:-
मिथुन राशिफल
मिथुन राशि वालों के लिए वर्ष 2021 मिला-जुला रहेगा वर्ष के आरंभ में शनि व गुरु का अष्टम भाव से गोचर रहेगा अतः स्वास्थ्य के प्रति विशेष सावधानी बरतें, आय के साथ व्यय में भी वृद्धि होगी, जो लोग लंबे समय से भूमि/वाहन क्रय करने की योजना बना रहे हैं उनके लिए भूमि/वाहन आदि क्रय करने के योग बनेंगे, अचानक धन लाभ के योग बनेंगे, पिता का सहयोग प्राप्त होगा, वर्ष 2021 निवेश के लिहाज से आपके लिए शुभ नही है अतः निवेश आदि करने से पहले अच्छे से सोच-विचार कर लें, शनि का प्रभाव आप पर संपूर्ण वर्ष रहेगा अतः कार्यस्थल पर विशेष सावधानी बरतें, वर्ष के मध्य भाग में कुछ राहत मिलने की संभावना है जिसमें लंबे समय से रुके हुए कार्य पूर्ण होने के योग बनेंगे तथा बेरोजगारों को नौकरी भी प्राप्त होगी, नौकरी पेशा लोगों के लिए वर्ष का मध्य भाग ज्यादा शुभ नही रहेगा अतः इस दौरान नौकरी परिवर्तन का प्रयास न करें, विदेश से कोई अच्छा अवसर भी आपको मिल सकता है, परिवार के सदस्यों के साथ किसी यात्रा और जाने के योग बनेंगे, प्रेमियों के लिए वर्ष 2021 काफी अच्छा रहेगा व पूर्व से चले आ रहे मन-मुटाव दूर होंगे, वर्ष 2021 का अंतिम भाग दाम्पत्य जीवन के लिए अधिक शुभ नही है किसी तीसरे व्यक्ति की बातों के कारण से गलतफहमी उत्पन्न हो सकती है तथा वाहनादि से चोट का भय रह सकता है, यदि स्वास्थ्य के लिहाज से देखा जाए तो वर्ष 2021 आपके लिए मिला-जुला रहेगा, उदर, नेत्र, ज्वर, इन्फेक्शन की समस्या हो सकती है।
उपाय:- नित्य शनि स्तोत्र व श्री सूक्त का पाठ करें।
कर्क राशिफल:-
कर्क राशिफल
कर्क राशि वालों के लिए वर्ष 2021 मिला-जुला रहने वाला है इस वर्ष सप्तम भाव से गुरु व शनि का गोचर रहेगा अतः जो लोग विवाह योग्य हो गए हैं उनके विवाह के योग बनेंगे, कार्य के सिलसिले से यात्राओं के योग बनेंगे, शनि की भाग्य स्थान पर दृष्टि होने से भाग्य वृद्धि हेतु अतिरिक्त प्रयास करना पड़ेगा, स्वास्थ्य के प्रति सजग रहें, व्यय में वृद्धि के योग बनेंगे अतः प्रयास करें कि फिजूल खर्चों पर धन व्यय न हो, 25 अप्रैल के बाद से अचानक से व्यय में वृद्धि होगी किंतु वर्ष के अंतिम भाग में आय वृद्धि के योग बनेंगे जिससे आर्थिक स्थिति में कुछ सुधार होगा, धैर्य व संयम के साथ कार्य करें तथा आवेश में आकर इस वर्ष निर्णय लेने से बचें, इस वर्ष आपको छाती में दर्द, जोड़ों में जलन व दर्द की शिकायत रह सकती है, वर्ष के आरंभ में उन्नति के अच्छे अवसर प्राप्त होंगे, विदेश यात्रा या परदेश यात्राएं होंगी, व्यापार हेतु आपकी बनाई हुई नीतियाँ सफल रहेंगी, नौकरी पेशा लोगों के लिए यह वर्ष कुछ हद तक संघर्ष पूर्ण रहेगा किंतु वर्ष के अंतिम भाग में आपके किये गए प्रयास के फलस्वरूप पदोन्नति के योग बनेंगे, घर/परिवार में खुशियों का माहौल रहने से मन प्रसन्न रहेगा, 28 अप्रैल के बाद घर में कोई धार्मिक कार्य होने के योग बनेंगे, प्रेमियों के लिए वर्ष 2021 काफी अच्छा सिद्ध होगा तथा प्रेमी/प्रेमिका के साथ किसी रोमैंटिक यात्रा पर जाने के योग बनेंगे, सप्तम से शनि व गुरु के गोचर के कारण से दाम्पत्य जीवन में तनाव बना रहेगा, जीवनसाथी को समझने का प्रयास करें व गलतफहमी का शिकार होने से बचें, वर्ष 2021 के मध्य भाग तक का समय स्वास्थ्य के लिहाज से अच्छा सिद्ध होगा, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे लोगों के लिए भी वर्ष 2021 अच्छा सिद्ध होगा, मेहनत का पूर्ण फल प्राप्त होगा।