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अधिकांश लोगों को स्वप्न में ईश्वर दिखाई देते हैं शास्त्रों के अनुसार स्वप्न में ईश्वर का दिखना बेहद शुभ होता है तो चलिए जानते हैं स्वप्न में ईश्वर के दिखाई देने के क्या फल होते हैं:-
१. यदि आप मुश्किल दौर से गुजर रहे हों तो उस स्थिति में ईश्वर का स्वप्न में दिखाई देना बेहद शुभ होता है इसका अर्थ यह होता है कि ईश्वर आपको धैर्य व संयम के साथ प्रयास करने और उम्मीद न खोने के संकेत दे रहे हैं।
२. यदि आप भक्ति के मार्ग से भटक गए हों और उस स्थिति में यदि स्वप्न में ईश्वर दिखाई दें तो इसका तात्पर्य यह होता है कि ईश्वर आपको भक्ति के मार्ग पर चलने का संकेत दे रहे हैं जो कि आपके कार्य सफलता में लाभप्रद सिद्ध होगा।
३. यदि आप स्वप्न में ईश्वर को अपने घर में ही दर्शन देते देखते हैं तो यह बेहद शुभ संकेत होता है जिसका तात्पर्य यह होता है कि आपके पूरे परिवार पर ईश्वर की कृपा बनी हुई है।
४. यदि आप स्वप्न में ईश्वर को अपने कार्यस्थल या स्कूल/कॉलेज पर दर्शन देते देखते हैं तो इसका तात्पर्य यह होता है कि आपको कार्यक्षेत्र में कड़ी मेहनत के उपरांत बड़ी सफलता प्राप्त होगी।
५. यदि स्वप्न में ईश्वर आपको कोई सलाह दे रहे हैं तो इसका तात्पर्य यह होता है कि ईश्वर आपको अपने अंतर्मन की बात सुनने का संकेत दे रहे हैं।
६. यदि स्वप्न में ईश्वर आप पर क्रोधित दिखाई देते हैं तो इसका तात्पर्य यह होता है कि आप कोई ऐसा कार्य कर रहे हैं जिससे ईश्वर आपसे रुष्ठ हैं तथा ईश्वर आपको वह कार्य न करने की सलाह दे रहे हैं।
होलाष्टक 2021: होलाष्टक के साथ शुरू हुए रंग पर्व के विधान—Astrology Sutras
होलाष्टक 2021
होलाष्टक फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से फाल्गुन माह की पूर्णिमा तक के समय को कहा जाता है होलाष्टक का अर्थ होता है होली से पहले के 8 दिवस होलाष्टक के समय सभी शुभ कार्य व मांगलिक कार्यक्रम वर्जित होते हैं इन 8 दिवसों में सभी मांगलिक कार्यक्रम जैसे विवाह, गृह प्रवेश व नई दुकानों को खोलना इत्यादि जैसे शुभ कार्यों को करना वर्जित माना गया है फाल्गुन मास की पूर्णिमा को होली का पर्व मनाया जाता है, और इसी दिन होलाष्टक की समाप्ति भी होती है।
2021 में कब से कब तक है होलाष्टक:-
होलाष्टक की शुरुआत 21 मार्च 2021 को फाल्गुन शुक्ल अष्टमी रविवार से हो रही है जो कि 28 मार्च 2021 रविवार तक है।
आमलकी एकादशी:-
आमलकी एकदशी को रंग भरी एकादशी भी कही जाती है फाल्गुन शुक्ल एकादशी के दिन रंग भरी एकादशी अर्थात आमलकी एकादशी मनाई जाती है इस बार एकादशी तिथि 24 मार्च 2021 को प्रातः 5 बजकर 46 मिनट पर लग रही है जो कि 25 मार्च 2021 को प्रातः 5 बजकर 38 मिनट तक रहेगी अतः 24 मार्च 2021 को रंग भरी एकादशी मनाई जाएगी।
होलिका दहन शुभ मुहर्त:-
फाल्गुन पूर्णिमा पर 28 मार्च 2021 को होलिका दहन किया जाएगा पूर्णिमा तिथि 27 मार्च 2021 को देर रात्रि 2 बजकर 28 मिनट पर लग रही है जो कि 28 मार्च 2021 को रात्रि 12 बजकर 39 मिनट तक रहेगी शास्त्रों के अनुसार भद्रा मुक्त पूर्णिमा में होलिका दहन का विधान है इस दिन भद्रा दोपहर में 1 बजकर 33 मिनट तक रहेगी होलिका दहन के संदर्भ में कहा गया है “निशामुखे प्रदोषे” सूर्यास्त के 48 मिनट बाद तक के समय को प्रदोष काल कहा जाता है 28 मार्च 2021 को सूर्यास्त शाम के 6 बजकर 11 मिनट पर हो रहा है हालांकि पूर्णिमा तिथि रात्रि 12 बजकर 39 मिनट तक है अतः प्रदोष काल से रात्रि 12:39 के पूर्व होलिका दहन किया जा सकता है इनमें भी होलिका दहन हेतु सबसे शुभ मुहर्त रात्रि 9 से 11 तक का है, 29 मार्च 2021 को चैत्र कृष्ण प्रतिपदा तिथि के दिन धूलि वंदन कर रंग पर्व होली मनाई जाएगी।
होरा शास्त्र में द्वादश भावों की धर्म अर्थ काम व मोक्ष के अनुरूप संक्षिप्त व्याख्या
होरा शास्त्र में द्वादश भावों की धर्म अर्थ काम मोक्ष के अनुरूप संक्षिप्त व्याख्या भाग-१
होरा शास्त्र में द्वादश भावों की धर्म अर्थ काम व मोक्ष के अनुरूप संक्षिप्त व्याख्या
जैसा कि आप सब जानते हैं कि प्रत्येक कुंडली मे १२ भाव होते हैं और यदि इन भावों को तीन-तीन के समूह में चार भागों में बाँटा जाए तो विभाजन निम्न प्रकार से होता है:-
१.धर्म त्रिकोण भाव:- प्रथम, पंचम व नवम भाव को धर्म त्रिकोण भाव कहते हैं।
२.अर्थ त्रिकोण भाव:- द्वितीय, षष्ठ व दशम भाव को अर्थ त्रिकोण भाव कहते हैं।
३.काम त्रिकोण भाव:- तृतीय, सप्तम व एकादश भाव को काम त्रिकोण भाव कहते हैं।
४. मोक्ष त्रिकोण भाव:- चतुर्थ, अष्टम व द्वादश भाव को मोक्ष त्रिकोण भाव कहते हैं।
इन स्थानों पर जो ग्रह तथा नक्षत्र होंगे वह अपने स्वभावानुसार उस व्यक्ति के कर्मों की गति स्पष्ट करते हैं उदाहरणार्थ:- यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में अशुभ या पापी ग्रह, अर्थ व काम अर्थात इच्छाओं के स्थान में बैठे हैं तो उस व्यक्ति की इच्छायें व प्रवृत्ति उसी तरफ अधिक होंगी और उसकी इच्छाएँ व अर्थ रूपये-पैसे संबंधी कार्य उसी समय पूरे होंगे जब उस कुण्डली की गणना के अनुसार उन ग्रहों का समय आयेगा वहीं दूसरी ओर, यदि कोई व्यक्ति धर्म व मोक्ष की प्राप्ति चाहता है, तो उसकी कुण्डली की कुंडली मे शुभ ग्रह धर्म व मोक्ष वाले स्थानों में अवश्य ही बैठे होंगें।
कुंडली के धर्म त्रिकोण भाव
अब कुंडली के प्रत्येक भावों का विश्लेषण उपरोक्त प्रकार से करते हैं, जैसा कि आप सब जानते हैं कि इस संसार मे धर्म ही प्रधान है व्यक्ति धर्म का समुचित पालन करके ही जीवन के अंतिम उद्देश्य मोक्ष तक पहुँच सकता है
इस कारण से ही किसी भी कुंडली मे 1, 5, 9 स्थान को मूल त्रिकोण की संज्ञा दी गई है अतएव सर्वप्रथम धर्म भावों के बारे में विस्तार से जानते हैं:-
लग्न स्थान प्रथम धर्म त्रिकोण भाव:-
कुंडली का प्रथम धर्म त्रिकोण भाव
इस भाव से व्यक्ति की शरीर पुष्टि, वात-पित्त-कफ प्रकृति, त्वचा का रंग, यश-अपयश, पूर्वज, सुख-दुख, आत्मविश्वास, अहंकार, मानसिकता आदि को जाना जाता है इससे हमें शारीरिक आकृति, स्वभाव, वर्ण चिन्ह, व्यक्तित्व, चरित्र, मुख, गुण व अवगुण, प्रारंभिक जीवन विचार, यश, सुख-दुख, नेतृत्व शक्ति, व्यक्तित्व, मुख का ऊपरी भाग, के संबंध में ज्ञान मिलता है।
पंचम भाव द्वितीय त्रिकोण भाव:-
कुंडली का द्वितीय धर्म त्रिकोण भाव
इस भाव से संतति, बच्चों से मिलने वाला सुख, विद्या बुद्धि, उच्च शिक्षा, विनय-देशभक्ति, पाचन शक्ति, कला, रहस्य शास्त्रों की रुचि, अचानक धन-लाभ, प्रेम संबंधों में यशनौकरी परिवर्तन आदि का विचार किया जाता है इससे हमें विद्या, विवेक, लेखन, मनोरंजन, संतान, मंत्र-तंत्र, प्रेम, सट्टा, लॉटरी, अकस्मात धन लाभ, पूर्वजन्म, गर्भाशय, मूत्राशय, पीठ, प्रशासकीय क्षमता, आय जानी जाती है।
नवम भाव तृतीय धर्म त्रिकोण भाव:-
कुंडली का तृतीय धर्म त्रिकोण भाव
इस भाव से आध्यात्मिक प्रगति, भाग्योदय, बुद्धिमत्ता, गुरु, परदेश गमन, ग्रंथपुस्तक लेखन, तीर्थ यात्रा, भाई की पत्नी, दूसरा विवाह आदि के बारे में बताया जाता है इससे हमें धर्म, भाग्य, तीर्थयात्रा, संतान का भाग्य, साला-साली, आध्यात्मिक स्थिति, वैराग्य, आयात-निर्यात, यश, ख्याति, सार्वजनिक जीवन, भाग्योदय, पुनर्जन्म, मंदिर-धर्मशाला आदि का निर्माण कराना, योजना विकास कार्य, न्यायालय से संबंधित कार्य का विचार किया जाता है।
पोस्ट की लंबाई को ध्यान रखते हुए अगला भाग जल्द ही प्रकाशित होगा।
विक्रम संवत २०७८ के मासिक शिवरात्रि व्रत व पूजन विधि
विक्रम संवत २०७८ के मासिक शिवरात्रि व्रत
प्रति मास कृष्ण पक्षीय निशीथ काल व्यापिनी चतुर्दशी के दिन मासिक शिवरात्रि व्रत किया जाता है समाज में फाल्गुन तथा श्रावण मास पूजा विशेष प्रचलित है “ईशान संहिता” के अनुसार फाल्गुन मास में ज्योतिर्लिंग का प्रादुर्भाव हुआ था:-
शिवलिङ्गतयोद्भूतः कोटि सूर्य समप्रभः।
इसलिए उसे महाशिवरात्रि के नाम से जाना जाता है जनश्रुतियों के अनुसार श्रावण मास में शिव जी ने संसार की रक्षा हेतु विषपान किया था और विष की विकलता में इधर-उधर भागने लगे तब सभी ने विष की गर्मी से बचाने हेतु शिव जी का गंगाजल से रुद्राभिषेक किया था तभी से गंगाजल द्वारा रुद्राभिषेक की परंपरा शुरू हुई थी, गंगाजल से शिव अभिषेक आराधना में सर्वोत्तम माना जाता है गंगाजल के अतिरिक्त रत्नोदक, इक्षुरस (गन्ने का रस), दुग्ध, पंचामृत (दूध, दहीं, घी, चीनी, शहद) आदि अनेक द्रव्यों से किया जाता है।
वृहद् धर्मपुरण अ. ५७ में तो यहाँ तक लिखा है कि शिवलिङ्ग में सभी देवताओं का पूजन करें:-
शिवलिङ्गSपि सर्वेषां देवानां पूजनं भवेत्।
सर्वलोक मये यस्याच्छिव शक्तिविर्भु: प्रभु:।।
पंचाक्षर मन्त्र:-“नमः शिवाय”
षडाक्षर मंत्र:-“ॐ नमः शिवाय”
मासशिवरात्रि व्रत
मासिक शिवरात्रि व्रत तारीखें
१.वैशाख९ मई २०२१(रविवार)
२.ज्येष्ठ८ जून २०२१(मंगलवार)
३.आषाढ़८ जुलाई २०२१(गुरुवार)
४.श्रावण (विशेष)६ अगस्त २०२१(शुक्रवार)
५.भाद्रपद५ सितंबर २०२१(रविवार)
६.आश्विन४ अक्टूबर २०२१(सोमवार)
७.कार्तिक२ नवंबर २०२१(मंगलवार)
८.मार्गशीर्ष२ दिसंबर २०२१(गुरुवार)
९.पौष१ जनवरी २०२२(शनिवार)
१०.माघ३० जनवरी २०२२(रविवार)
११.फाल्गुन महाशिवरात्रि (विशेष)१ मार्च २०२२(मंगलवार)
१२.चैत्र३० मार्च २०२२(बुधवार)
शिवरात्रि पूजन विधि:-
शिवरात्रि व्रत व पूजन विधि
सुबह सूर्योदय से पूर्व उठकर नित्य क्रिया से निवृत्त होकर स्नानादि कर के भगवान शिव का जलाभिषेक व पंचामृत स्नान करना चाहिए तदोपरांत चंदन, भस्म, रोली, जौं, काला तिल, अक्षत शिवलिंग पर अर्पित करना चाहिए तथा जनेऊ, बड़ी सुपाड़ी, वस्त्र, इत्र, गुलाब के पुष्प, विल्वपत्र, दूर्वा, भांग व धतूरा अर्पित करना चाहिए उसके बाद नैवेध अर्पित कर शिव जी का पूजन करना चाहिए और आरती कर पूजा संपन्न करनी चाहिए, अभीष्ट लाभ हेतु रुद्राभिषेक, रुद्रार्चन कर सकते हैं।
महाशिवरात्रि 11 मार्च 2021 जानें पूजन विधि व शुभ मुहर्त
महाशिवरात्रि पूजन विधि व शुभ मुहर्त
शिव महापुराण के अनुसार फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को महाशिवरात्रि के नाम से जाना जाता है इसी दिन पुरुष (शिव) व प्रकृति (पार्वती) का साकार रूप में विवाह संपन्न हुआ था धर्म शास्त्रों में रात्रिकालीन विवाह मुहर्त को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है इसी कारण शिव जी का पार्वती जी का विवाह रात्रि में ही संपन्न हुआ था अतः फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को निशीथ काल में महाशिवरात्रि मनाई जाती है जो कि इस वर्ष ११ मार्च २०२१ को है।
महाशिवरात्रि का महत्व
महाशिवरात्रि का महत्व
शिवमहापुराण के अनुसार महाशिवरात्रि के दिन ही पुरुष अर्थात भगवान आशुतोष व प्रकृति अर्थात माता पार्वती का साकार रूप में विवाह संपन्न हुआ था इस दिन श्रद्धा भाव से शिव जी की पूजा करने से भगवान शिव जी की कृपा शीघ्र प्राप्त होती है तथा मनुष्य अपने सभी पापकर्मों से मुक्त होकर मृत्यु पश्चात भगवान आशुतोष के चरणों में स्थान प्राप्त करता है, पुराणों के अनुसार पूर्वजन्म में एक बार कुबेर ने अनजाने में ही महाशिवरात्रि के दिन भगवान आशुतोष की पूजा की थी जिससे प्रसन्न होकर शिव जी ने उन्हें अगले जन्म में देवताओं का कोषाध्यक्ष बनने का वरदान दिया था और शिव जी के वरदान से वह देवताओं के कोषाध्यक्ष बनें।
महाशिवरात्रि पूजन शुभ मुहर्त:-
महाशिवरात्रि शुभ मुहर्त
११ मार्च २०२१ को दिन के २ बजकर २१ मिनट पर चतुर्दशी तिथि लगेगी जो कि १२ मार्च २०२१ को दिन के २ बजकर २० मिनट तक रहेगी धर्मशास्त्रों में फाल्गुन कृष्ण, चतुर्दशी तिथि को निशीथ काल में महाशिवरात्रि पर्व मनाने का विधान है अतः इस वर्ष ११ मार्च २०२१ को महाशिवरात्रि पर्व मनाया जाएगा, इस दिन धनिष्ठा नक्षत्र रात के ९ बजकर २८ मिनट तक तदोपरान्त शतभिषा नक्षत्र और शिव योग दिन के ९ बजकर २८ मिनट तक तदोपरांत सिद्ध योग रहेगा तथा चंद्रमा दिन के ९ बजकर २० मिनट पर कुंभ राशि में प्रवेश करेंगे साथ ही इस दिन अभिजीत मुहर्त दिन के १२ बजकर २० मिनट से १ बजकर ०८ मिनट तक रहेगा अतः दिन के २ बजकर २१ मिनट बाद से संपूर्ण दिन-रात्रि शिव जी व पार्वती जी के पूजन हेतु शुभ रहेगा साथ ही शिव योग में और अभिजीत मुहर्त में भी पूजा की जा सकती है।
महाशिवरात्रि पूजन विधि:-
सुबह सूर्योदय से पूर्व उठकर नित्य क्रिया से निवृत्त होकर स्नानादि कर के भगवान शिव का जलाभिषेक व पंचामृत स्नान करना चाहिए तदोपरांत चंदन, भस्म, रोली, जौं, काला तिल, अक्षत शिवलिंग पर अर्पित करना चाहिए तथा जनेऊ, बड़ी सुपाड़ी, वस्त्र, इत्र, गुलाब के पुष्प, विल्वपत्र, दूर्वा, भांग व धतूरा अर्पित करना चाहिए उसके बाद नैवेध अर्पित कर शिव जी का पूजन करना चाहिए और आरती कर पूजा संपन्न करनी चाहिए, अभीष्ट लाभ हेतु रुद्राभिषेक, रुद्रार्चन कर सकते हैं।
प्रदोष व्रत में सूर्यास्त के बाद आशुतोष भगवान शिव जी का पूजन किया जाता है प्रत्येक मास की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत किया जाता है कर्ज मुक्ति के लिए भौम प्रदोष व्रत, शांति व सुरक्षा के लिए सोम प्रदोष व्रत, रोग-व्याधि-पीड़ा व अन्य उपद्रव के शांति हेतु रवि प्रदोष व्रत सर्वश्रेष्ठ माना गया है साथ ही जो व्यक्ति नियमित प्रदोष व्रत करते हैं भगवान शिव उनके सभी कष्टों को दूर करते हैं तथा व्यक्ति के मृत्यु उपरांत अपने चरण कमलों में स्थान देते हैं।
प्रदोष व्रत व पूजन विधि:-
प्रदोष व्रत व पूजन विधि
सुबह सूर्योदय से पूर्व उठकर नित्य क्रिया से निवृत्त होकर स्नानादि कर के भगवान शिव का जलाभिषेक व पंचामृत स्नान करना चाहिए तदोपरांत नैवेध का भोग लगाकर व्रत का संकल्प लेना चाहिए तथा व्रत के नियमों का पालन करते हुए फलाहार (फल व दूध) का सेवन करना चाहिए तथा प्रदोष काल में शिव जी का पूजन कर भोग लगाना चाहिए व प्रसाद का एक अंश गाय को खिलाकर प्रसाद ग्रहण करना चाहिए।
वास्तु शास्त्र के अनुसार कुबेर का निवास स्थान होती यह दिशा यहाँ नही होनी चाहिए यह 5 चीजें
इस दिशा में भूलकर भी नही होनी चाहिए यह 5 चीजें
वास्तु शास्त्र के अनुसार घर की प्रत्येक दिशा का अपना महत्व होता है, वास्तु शास्त्र के अनुसार उत्तर दिशा कुबेर की मानी गयी है तथा यह दिशा पूजा-पाठ के लिए सर्वोत्तम मानी गयी है जिस कारण से उत्तर दिशा का महत्व और भी बढ़ जाता है अतः 5 ऐसी चीजें हैं जिनके इस दिशा में होने से व्यक्ति के जीवन में अनेक प्रकार की परेशानियां आती है तो चलिए जानते हैं वह कौन सी ऐसी 5 चीजें हैं जिन्हें हमें उत्तर दिशा में नही रखना चाहिए।
१. घर की उत्तर दिशा कुबेर का स्थान मानी गयी है अतः इस दिशा में जूते-चप्पल इत्यादि नही रखने चाहिए क्योंकि उत्तर दिशा में जूते-चप्पल इत्यादि रखने से घर में नकारात्मक शक्ति का प्रभाव बहुत जल्दी होता है।
२. वास्तु शास्त्र के अनुसार घर के उत्तर दिशा में शौचालय का होना सबसे अधिक अशुभ माना गया है जिस घर के उत्तर दिशा में शौचालय होता है उस घर में देवी लक्ष्मी कभी वास नही करती तथा उस घर में सदैव दरिद्रता बनी रहती है।
३. वास्तु शास्त्र के अनुसार घर के उत्तर दिशा में कूड़ेदान का होना भी बेहद अशुभ माना गया है इससे घर में नकारात्मक ऊर्जा का संचार काफी तीव्रता से होता है।
४. वास्तु शास्त्र के अनुसार घर के उत्तर दिशा में फर्नीचर भारी मात्रा में नही रखना चाहिए क्योंकि भारी मात्रा में फर्नीचर होने से घर में सकारात्मक ऊर्जा के संचार में दिक्कतें आती हैं तथा घर में दरिद्रता का वास होने लगता है।
५. वास्तु शास्त्र के अनुसार घर के उत्तर दिशा में टूटे हुए सामान नही रखने चाहिए इससे भी घर में दरिद्रता का वास बना रहता है।
नोट:-
वास्तु शास्त्र के अनुसार घर के उत्तर दिशा में पूजा स्थल, तिजोरी व किताबों का होना शुभ होता है।
उपाय:-
यदि आपके घर की उत्तर दिशा में वास्तु दोष हो तो उसके निवारण हेतु नित्य पानी में नमक पोछा लगाना चाहिए इससे वास्तु दोष के प्रभाव में कमी आती है।
सीता अष्टमी 2021: इस प्रकार पूजन करने से होती है मनचाहे वर की प्राप्ति
सीता अष्टमी 2021
फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि सीता अष्टमी के रूप में मनाई जाती है पौराणिक कथाओं के अनुसार फाल्गुन मास की अष्टमी तिथि के दिन ही सीता माता धरती से प्रकट हुई थीं वर्ष २०२१ में सीता अष्टमी ६ मार्च को मनाई जाएगी, सीता अष्टमी के दिन सुहागन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु के लिए व्रत करती हैं ऐसी मान्यता है कि सीता अष्टमी का व्रत करने से दाम्पत्य जीवन की समस्याओं से मुक्ति मिलती है साथ ही जिन कन्याओं के विवाह में बाधाएं आ रही हो उन्हें भी यह व्रत अवश्य करना चाहिए जिससे उनके विवाह में आ रही बाधाएं दूर होती हैं तथा मनचाहे वर की प्राप्ति होती है।
पूजन शुभ मुहर्त:-
ऋषिकेश पंचांग काशी के अनुसार अष्टमी तिथि ५ मार्च २०२१की रात्रि ११:१६ से ६ मार्च २०२१ की रात्रि ०९:०२ तक रहेगी निर्णय सिंधु के अनुसार व्रत व पर्व उदया तिथि के अनुसार मनाना चाहिए अतः इस वर्ष सीता जयंती ६ मार्च २०२१ को मनाई जाएगी।
पूजन व व्रत विधि:-
प्रातः सूर्योदय के पूर्व नित्य क्रिया से निवृत्त होकर स्नानादि कर गणेश जी का पूजन करना चाहिए तदोपरांत भगवान श्री राम व सीता माँ की प्रतिमा के समक्ष व्रत का संकल्प लेकर व्रत का आरंभ करना चाहिए तत्पश्चात माँ गौरी व सीता जी को पीले पुष्प, पीले वस्त्र व पीले मीठे का भोग और १६ श्रृंगार का सामान अर्पित कर “ॐ रामाभ्यां नमः” मंत्र का जप करना चाहिए व सूर्यास्त के समय दुग्ध व गुड़ से बने पदार्थ का भोग लगाकर प्रसाद को दान करना चाहिए व प्रसाद से व्रत का पारण करना चाहिए।
योनि से जातक के बारह वर्ष के भीतर आयु का निश्चय नही हो सकता, क्योंकि माता-पिता के किये हुए कर्मों से बाल ग्रहों से बालक का नाश होता है।
जन्म से 12 वर्ष तक चार 2 वर्ष तीन जगह विभाग किया है, चार वर्ष तक का बालक माता के पाप से मरता है, उसके बाद आठ वर्ष तक पिता के पाप से मरता है और अंत के जो वर्ष हैं (आठवें के बाद 12 वर्ष तक) उसमें अपने पापों से मरता है।
जन्म से 8 वर्ष तक बालारिष्ट रहता है, उसके बाद 20वें वर्ष तक योगारिष्ट (दुष्ट ग्रहों से उत्पन्न) रहता है, 32वें वर्ष तक अल्पायु, 32 से 70 तक मध्यम आयु और 70 के बाद 100 तक पूर्ण आयु कही गयी है एवं 100 से 120 वर्ष तक परम आयु समझनी चाहिए।
आयु निर्धारण सूत्र
१. जन्म कुंडली में यदि चंद्रमा छठे, आठवें या बाहरवें भाव में रहकर सूर्य के अतिरिक्त पाप ग्रह (मंगल, शनि, राहु, केतु) से देखा जाता हो तो बृहस्पति के लग्न में रहने पर भी बालक मरता ही है, मतलब यह प्रवल अरिष्ट योग होता है।
२. लग्न से पांचवां व नौवां भाव पाप ग्रह की राशि हो उसमें सूर्यादि ग्रह हों तो क्रम से पिता, माता, भाई, मामा, नानी, नाना और बालक जल्द नष्ट होते हैं।
३. लग्न और चंद्रमा क्रूर ग्रह से दृष्ट हों तथा शुभ ग्रह से संबंध न रखते हों और यदि बृहस्पति लग्न में न हो तो बालक की माता की मृत्यु निश्चित होती है।
४. यदि सूर्य, चंद्रमा चतुर्थ स्थान में स्थित हों और शनि सप्तम में हो तो बालक के माता की मृत्यु होती है और यदि लग्न से छठे भाव में क्रूर ग्रह हो तो भाई का नाश होता है।
५. शनि के साथ चंद्रमा और सूर्य बाहरवें भाव में हो, मंगल चौथे भाव में हो तो बालक की माता गर्भ के साथ मरती है।
६. लग्न और चंद्रमा एक साथ या अलग-अलग शुभ ग्रह की दृष्टि से रहित हों या पाप ग्रह के मध्य में हो तो बालक की माता गर्भ के साथ मरती है।
७. छठे, बाहरवें और आठवें भाव में क्रूर ग्रह हों और इन स्थानों में शुभ ग्रह न हों तथा पाप ग्रह के मध्य में शुक्र व गुरु हों तो प्रसव होते ही स्त्री बालक सहित मरती है।
८. चंद्रमा से चौथे या दसवें भाव में पाप ग्रह हों तथा उनको शुभ ग्रह न देखते हों तो बालक की माता की मृत्यु होती है अथवा सूर्य से दसवां भाव पाप ग्रह से देखा जाता हो किन्तु शुभ ग्रह से न देखा जाता हो तो बालक की माता की मृत्यु होती है।
९. बली सूर्य शनि से दृष्ट या युत होकर तीसरे भाव में हो अथवा क्षीण चंद्रमा पाप ग्रह के साथ शुक्र से तीसरे भाव में हो तो प्रसव होते ही स्त्री बालक सहित मार जाती है।
१०. लग्न से आठवें भाव में सूर्य या मंगल पाप ग्रह हों और शुभ ग्रह से न देखे जाते हों साथ ही चंद्रमा कृष्ण पक्ष का हो तो उस बालक के माता की मृत्यु हो जाती है।
११. यदि दिन में जन्म हो शुक्र से सूर्य पांचवे या नौवें में हो और यदि रात्रि का जन्म हो तो चंद्रमा से शनि पांचवें या नौवें भाव में हो और उसे पाप ग्रह देखते हों और शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तथा चंद्रमा बल रहित हो तो बालक की माता की मृत्यु होती है।