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लग्न कुंडली के चतुर्थ पंचम व षष्ठ भाव में सूर्य का फल
मेष लग्न कुंडली के चतुर्थ, पंचम व षष्ठ भाव में सूर्य का फल
लग्न कुंडली के चतुर्थ पंचम व षष्ठ भाव में सूर्य का फल
ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी द्वारा लिखित यह फल उनके स्वम् के अनुभव पर आधारित है यहाँ सिर्फ एक ही ग्रह के विभिन्न भावों में फल को बताया गया है अन्य किसी ग्रह के युति व दृष्टि संबंध बनाने या नीचभंग राजयोग बनने से बताए गए फलों में कुछ बदलाव संभव रहेगा।
मेष लग्न कुंडली के चतुर्थ भाव में सूर्य का फल:-
लग्न कुंडली के चतुर्थ भाव में सूर्य का फल
ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार लग्न कुंडली के चतुर्थ भाव माता एवं भूमि के स्थान पर सूर्य के अपने मित्र चंद्र की कर्क राशि में बैठा होने के कारण से जातक/जातिका सुखपूर्वक विद्या प्राप्त करेंगे तथा संतान पक्ष की तरफ से सुख रहेगा और जातक/जातिका बुद्धि के अंदर तेजी रहते हुए भी शांति धारण करेंगे तथा बुद्धि की योग्यता से भूमि व मकानादि का सुख प्राप्त करेंगे और माता का पूर्ण सहयोग प्राप्त करेंगे तथा सूर्य के सप्तम दृष्टि से दशम भाव पिता एवं राज्य स्थान को अपने शत्रु शनि की मकर राशि में देखने के कारण से पिता के संबंध में कुछ वैमन्यस्ता रहेगी और जातक/जातिका को कुछ परिश्रम से समाज में मान एवं प्रतिष्ठा प्राप्त होगी।
मेष लग्न कुंडली के पंचम भाव में सूर्य का फल:-
लग्न कुंडली के पंचम भाव में सूर्य का फल
ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार लग्न कुंडली के पंचम भाव विद्या व संतान स्थान पर सूर्य के अपने स्वामित्व वाली सिंह राशि में बैठा होने के कारण से उच्च शिक्षा प्राप्ति के योग बनेंगे तथा बुद्धि एवं वाणी की महान तेजी के कारण से जातक/जातिका समाज में बड़ा भारी प्रभाव बनाने में सफल होंगे एवं संतान के रूप में राजा तुल्य पुत्र प्राप्त होगा किंतु जातक/जातिका के मन में एक अभिमान (अपनी बुद्धि की योग्यता के सम्मुख दूसरे की बुद्धि को छोटा समझना) प्रायः बना रहेगा और सातवीं दृष्टि से एकादश भाव लाभ स्थान अपने शत्रु शनि की कुंभ राशि में देखने के कारण से अत्यधिक परिश्रम करने पर भी आय की तरफ से मन में असंतोष रहेगा तथा जातक/जातिका लाभ के मार्ग में कुछ कटु भाषण से अपना कार्य संपादन करेंगे।
मेष लग्न कुंडली के षष्ठ भाव में सूर्य का फल:-
लग्न कुंडली के षष्ठ भाव में सूर्य का फल
ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार लग्न कुंडली के षष्ठ भाव रोग व शत्रु स्थान पर सूर्य के अपने मित्र बुध की कन्या राशि में बैठा होने के कारण से कुछ कठिन परिस्थितियों से होते जातक/जातिका की शिक्षा पूर्ण होगी फिर भी जातक/जातिका विद्या और बुद्धि के द्वारा समाज में बड़ा भारी प्रभाव बनाने में सफल होंगे साथ ही संतान पक्ष के अंदर भी जातक/जातिका को कुछ परेशानी अनुभव होगी या संतान को कष्ट रहेगा किंतु षष्ठ भाव में सूर्य अत्यधिक शक्तिशाली फल का दाता होता है इसलिए शत्रु पक्ष में जातक/जातिका बड़ी भारी सफलता प्राप्त करेंगे कहने का आशय यह है शत्रुओं पर विजय प्राप्त होगी तथा सातवीं दृष्टि से द्वादश भाव को मित्र गुरु की मीन राशि में देखने के कारण से जातक/जातिका खर्चा बहुत करेंगे और बाहरी स्थानों पर अपनी बुद्धि व विवेक द्वारा बड़ी सफलता प्राप्त करेंगे और समाज में मान-सम्मान प्राप्त करेंगे।
मेष लग्न कुंडली के प्रथम, द्वितीय व तृतीय में सूर्य का फल
मेष लग्न कुंडली के प्रथम, द्वितीय व तृतीय भाव में सूर्य का फल
मेष लग्न कुंडली के प्रथम, द्वितीय व तृतीय में सूर्य का फल
ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी द्वारा लिखित यह फल उनके स्वम् के अनुभव पर आधारित है यहाँ सिर्फ एक ही ग्रह के विभिन्न भावों में फल को बताया गया है अन्य किसी ग्रह के युति व दृष्टि संबंध बनाने या नीचभंग राजयोग बनने से बताए गए फलों में कुछ बदलाव संभव रहेगा।
मेष लग्न कुंडली के प्रथम भाव में सूर्य का फल:-
मेष लग्न कुंडली के प्रथम भाव में सूर्य का फल
ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार लग्न कुंडली के प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर सूर्य के अपने उच्च राशि मेष में बैठा होने के कारण से जातक/जातिका का कद प्रभावशाली रहेगा और बुद्धि में उत्तेजना रहेगी साथ ही उच्च शिक्षा प्राप्त होगी और जातक/जातिका की वाणी का लोगों पर अच्छा प्रभाव पड़ेगा तथा ऐसे जातक/जातिका के हिर्दय में बड़ा भारी स्वाभिमान रहेगा एवं संतान का उत्तम सुख प्राप्त होगा किंतु सूर्य के सप्तम भाव को स्त्री एवं रोजगार स्थान में अपनी नीच राशि तुला में देखने के कारण से जातक/जातिका को स्त्री/पुरुष स्थान में क्लेश एवं कष्ट तथा सुंदरता की कुछ कमी प्राप्त होगी और रोजगार के मार्ग में कुछ परेशानियाँ तथा कुछ कमी प्रतीत होगी और गृहस्थी के सुख संबंधों में एवं संचालन में कुछ दिक्कतें रहेंगी।
मेष लग्न कुंडली के द्वितीय भाव में सूर्य का फल:-
मेष लग्न कुंडली के द्वितीय भाव में सूर्य का फल
ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जीके अनुसार लग्न कुंडली के द्वितीय भाव धन एवं कुटुंब स्थान पर सूर्य के अपने शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में बैठा होने के कारण से संतान पक्ष में कुछ बाधा या संतान को कष्ट रहेगा और शिक्षा कठिन परिस्थितियों से होते हुए पूर्ण होगी किंतु ऐसे जातक/जातिका बुद्धि योग द्वारा धन की वृद्धि करने के लिए विशेष प्रयत्न करेंगे परंतु धन संचय में कुछ त्रुटि या कमी अनुभव होगी और सातवीं दृष्टि से अष्टम भाव को अपने मित्र मंगल की वृश्चिक राशि में देखने के कारण से व्यक्ति के आयु की वृद्धि होगी और ऐसे जातक/जातिका को पुरातत्व शक्ति का लाभ बुद्धि योग द्वारा प्राप्त होगा तथा जातक/जातिका के जीवन की दिनचर्या में बड़ा भारी प्रभाव रहेगा एवं कुटुंब का भी कुछ सुख प्राप्त होगा।
मेष लग्न कुंडली के तृतीय भाव में सूर्य का फल:-
मेष लग्न कुंडली के तृतीय भाव में सूर्य का फल
ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार लग्न कुंडली के तृतीय भाव भाई एवं पराक्रम स्थान पर सूर्य के अपने मित्र बुध की मिथुन राशि में बैठा होने के कारण से उच्च शिक्षा प्राप्ति के योग बनेंगे और जातक/जातिका अत्यंत बुद्धिमान होंगे तथा अत्यंत पराक्रमी व जल्द ही आवेश में आ जाने वाले होंगे और ऐसे जातक/जातिका के दिमाग एवं वाणी में कुछ तेजी रहेगी साथ ही सप्तम दृष्टि से नवम भाव भाग्य व धर्म स्थान को सूर्य के अपने मित्र गुरु की धनु राशि में देखने के कारण से बुद्धि योग की शक्ति के द्वारा जातक/जातिका का भाग्योदय होगा और ऐसे जातक/जातिका धर्म का पालन एवं मनन करने वाले होंगे तथा ईश्वर एवं धर्म में निष्ठा रखेंगे।
लग्न कुंडली के द्वादश भाव में सूर्य का फल–Astrology Sutras
लग्न कुंडली के द्वादश भाव में सूर्य का फल
यदि लग्न कुंडली के द्वादश भाव में सूर्य हो तो ग्रंथकारों का मत है कि ऐसे व्यक्ति अत्यधिक धन खर्च करने वाले, पिता से विरोध रखने वाले, विरुद्ध बुद्धि, जन्म स्थान से बाहर रहने वाले, पर स्त्रीगामी, नेत्र रोगी एवं देवताओं के भक्त होते हैं तथा इन्हें २६ वेंवर्ष में कोई रोग व ३८ वेंवर्ष में अर्थ की हानि होती है, यदि लग्न कुंडली के द्वादश भाव में सूर्य हो और द्वादश स्थान का स्वामी बलवान ग्रह से युत हो तो ऐसे व्यक्ति देवताओं की सिद्धि प्राप्त करने वाले और अनेक प्रकार के सुख को प्राप्त करने वाले होते हैं किंतु यदि सूर्य के साथ द्वादश भाव में पाप ग्रह बैठे हों तो व्यक्ति बुरे कार्यों में धन व्यय करने वाले होते हैं तथा इनको शैय्या सुख कुछ वैमनस्यता के साथ मिलता है साथ ही यदि लग्न कुंडली के द्वादश भाव में सूर्य षष्ठ भाव के स्वामी के साथ बैठा हो तो व्यक्ति कुष्ठ रोगी होता है परंतु यदि सूर्य शुभ ग्रह से युत या दृष्ट हो तो कुष्ठ रोग नही होता है।
लग्न कुंडली के यदि द्वादश भाव में सूर्य हो तो व्यक्तियों को शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है किंतु चाचा पक्ष से विवाद रहते हैं साथ ही ऐसे व्यक्तियों को नेत्रों में कोई समस्या बनी रहती है और शरीर में विशेष व्यथा रहती है मानसागरी में कहा गया है कि:-
अर्थात यदि लग्न कुंडली के द्वादश भाव में सूर्य हो तो व्यक्ति प्रायः गलत निर्णय लेने वाला, पर स्त्रीगामी, पक्षी समूहों का नाश करने वाला अर्थात आकाश में उड़ने वाले पक्षियों का शिकार करने वाला, कुरुप तथा दुष्ट प्रवत्ति वाला होता है और ऐसे व्यक्तियों के जंघा में रोग रहते हैं तथा इनका देह दुर्बल होता है एवं ऐसे व्यक्ति साधारण लोगों से विरोध रखते हैं किंतु राजा से धन प्राप्त करते हैं, मंत्रेश्वर महाराज जी ने फलदीपिका में कहा है कि यदि लग्न कुंडली के द्वादश भाव में सूर्य हो तो ऐसे व्यक्ति को पिता का सुख कुछ वैमन्यस्ता के साथ प्राप्त होता है अर्थात पिता से इनके वैचारिक मतभेद रहते हैं तथा इनकी दृष्टि कुछ मंद होती है या नेत्रों में कोई रोग रहता है और व्यक्ति धनहीन व पुत्रहीन होता है।
ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के मत व अनुभव के अनुसार द्वादश भाव को व्यय भाव भी कहते हैं जिसे सभी ग्रंथकारों ने दुष्टस्थान अर्थात अशुभ भाव माना है जिस कारण से सभी ग्रंथकारों ने द्वादश भाव में सूर्य के अधिकतर अशुभ फल को ही बताया है किंतु धन के मामले में द्वादश भाव का सूर्य अच्छा फल देता है मानसागरी में कहा गया है “नरपति धनयुक्त:” अर्थात राजा से धन प्राप्त होता है तो वहीं कुछ ग्रंथकारों ने कहा है कि “शैय्या सुखहीन:” अर्थात द्वादश भाव का सूर्य शैय्या सुख की हानि करता है किंतु यह तभी संभव है जब द्वादश भाव कमजोर या पीड़ित हो अन्यथा शैय्या सुख की हानि नही होती है।
ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार यदि लग्न कुंडली के द्वादश भाव में सूर्य यदि कर्क, वृश्चिक या मीन राशि में हो तो व्यक्ति खर्चीला, बेफिक्र, राजनीति के कारण से कारावास की सजा पाने वाला, लोकोपकारी तथा पराक्रमी और शत्रुओं पर विजय पाने वाला होता है, यदि वृषभ, कन्या या मकर राशि में हो तो व्यक्ति स्वतंत्रता प्रिय, विचारपूर्वक कार्य करने वाला, सभी संकटों को धैर्य के साथ सहन करने वाला व सत्कर्म कार्य से ख्याति प्राप्त करने वाला होता है, यदि मेष, सिंह व धनु राशि में हो तो व्यक्ति कृपण, विचारहीन, अभिमानी तथा बुरे कर्मों के कारण दंड पाने वाला होता है एवं मिथुन, तुला व कुंभ राशि में हो तो व्यक्ति खर्चीला तथा अपने वर्ग और समाज में विख्याति पाने वाला होता है।
लग्न कुंडली के एकादश भाव में सूर्य का फल–Astrology Sutras
लग्न कुंडली के एकादश भाव में सूर्य का फल
यदि लग्न कुंडली के एकादश भाव में सूर्य हो तो ग्रंथकारों का मत है कि ऐसे व्यक्ति रूपवान, निरोगी, ज्ञानी, विनीत, गान विद्या में रुचि रखने वाले, कीर्तिमान, यशस्वी, सत्कर्मी, प्रसिद्ध, वाहन युत और अनेक शत्रुओं से युक्त होते हैं तथा ऐसे व्यक्ति धन-धान्य से युत व प्रायः सरकारी नौकरी वाले या सरकार से सम्मान प्राप्त करने वाले एवं सेवक जनों से प्रेम रखने वाले होते हैं, ऐसे व्यक्तियों को प्रायः २५ वें वर्ष में वाहन सुख प्राप्त होता है यदि लग्न कुंडली के एकादश भाव में सूर्य उच्च राशि मेष या स्वराशि सिंह का हो तो व्यक्ति कलह के कारण से तनावयुक्त किंतु राजा या उच्चपदाधिकारी द्वारा सम्मानित व लाभ प्राप्त करने वाला और चतुष्पद से धन लाभ प्राप्त करने वाला और अत्यधिक वलवान होता है साथ ही यदि सूर्य के साथ लग्न कुंडली के चतुर्थ भाव का स्वामी भी बैठा हो तो व्यक्ति का अनेक संपत्तियों पर अधिकार होता है किंतु ऐसे व्यक्तियों का भाग्य उतार-चढ़ाव से भरपूर रहता है।
यदि लग्न कुंडली के एकादश भाव में सूर्य हो तो व्यक्ति राजा के समान सुख व अधिकार प्राप्त करने वाला और लोगों को दंड देने का अधिकार रखने वाला होता है प्रायः ऐसे व्यक्ति जज के पद पर आसीन होते हैं या किसी ऊँचे पद पर आसीन होते हैं साथ ही ऐसे व्यक्तियों को प्रायः भारत रत्न भी प्राप्त होने की संभावना रहती है तथा इन्हें अनेक प्रकार के वाहनों व सवारी का सुख प्राप्त होता है मानसागरी में कहा गया है कि:-
अर्थात यदि लग्न कुंडली के एकादश भाव में सूर्य हो तो व्यक्ति को बहुधनवान होने का सौभाग्य प्राप्त होता है तथा ऐसे व्यक्ति राजसेवक होते हैं कहने का आशय यह है कि इन्हें राज कर्मचारी बनने का अवसर प्राप्त होता है तथा ऐसे व्यक्ति गुणवान होने के साथ-साथ दूसरों के गुणों की कदर करने वाले होते हैं किंतु इनका शरीर दुबला-पतला होता है और ऐसे व्यक्ति इतने रूपवान और मनोहर होते हैं कि इन्हें देखते ही कामिनी किशोरियों का चित्त फड़क उठता है और सुंदर स्त्रियाँ इनकी ओर खिंची हुई स्वम् ही चली आती है अर्थात ऐसे व्यक्ति मूर्तिमान कामदेव ही होते हैं, मंत्रेश्वर महाराज जी ने फलदीपिका में कहा है कि जिन व्यक्तियों की लगन कुंडली के एकादश भाव में सूर्य हो वह धनी और दीर्घायु होते हैं किंतु इन्हें अपने किसी अत्यधिक प्रिय की मृत्यु से अत्यधिक शोक सहन करना पड़ता है और ऐसे व्यक्ति राजा अथवा जनगण के मुखिया होते हैं साथ ही ऐसे व्यक्ति नेक सलाह देने वाले, सुंदर नेत्रों वाले व गायन विद्या में रुचि रखने वाले होते हैं।
ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुभव व मत अनुसार यदि लग्न कुंडली के एकादश भाव में सूर्य हो तो ऐसे व्यक्ति अत्यधिक धनी, २५ वें वर्ष में वाहन सुख प्राप्त करने वाले, अनेक नौकर-चाकर से युक्त किंतु सूर्य का पापी ग्रह से संबंध बनाने पर अत्यधिक धन व्यय करने वाले होते हैं, ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार यदि लग्न कुंडली के एकादश भाव में सूर्य हो तो और पाप ग्रह से दृष्ट हो तो व्यक्ति को कोई न कोई दुःख प्रायः बना ही रहता है जैसे कभी संपत्ति का अभाव तो कभी संतति का अभाव होता है साथ ही एकादश भाव का सूर्य बड़े भाई के लिए शुभ नही होता है, एकादश भाव में यदि सूर्य मेष राशि का हो तो संतति का अभाव रहता है, मिथुन राशि का हो तो पुत्र का सुख नही मिलता कहने का आशय यह है कि या तो पुत्र से वैचारिक मतभेद रहता है या पुत्र को किसी प्रकार का कष्ट रहता है या पुत्र कहीं दूसरे स्थान में वास करता है या पुत्र की मृत्यु हो जाती है, यदि सिंह राशि का सूर्य हो तो अत्यधिक परिश्रम करने पर ही बड़ी सफलता मिलती है तथा कन्या संतति अधिक रहती है, यदि तुला राशि का हो तो धन, सम्मान, कीर्ति आदि सभी मिलते हैं लेकिन मन शांत नही रहता, यदि धनु राशि का सूर्य एकादश भाव में हो तो व्यक्ति कानून का विशेषज्ञ होता है, यदि कुंभ राशि का सूर्य हो तो कठिन परिश्रम से सफलताएं मिलती है किंतु पुत्र सुख उत्तम रहता है।
ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार यदि लग्न कुंडली के एकादश भाव में सूर्य किसी भी पुरुष राशि का हो वह बड़े भाई के लिए अशुभ रहता है अर्थात या तो बड़े भाई की मृत्यु हो जाती है या बड़े भाई को कोई कष्ट रहता है या बड़े भाई से झगड़े होते रहते हैं साथ ही ऐसे व्यक्तियों को संपत्ति अवश्य ही मिलती है किंतु उसके लिए इन्हें अत्यधिक परिश्रम करना पड़ता है, यदि स्त्री राशि का सूर्य एकादश भाव में हो तो व्यक्ति को संतति व संपत्ति दोनो ही सुख मिलते हैं तथा संपत्ति अचानक से मिलती है।
लग्न कुंडली के दशम भाव में सूर्य का फल–Astrology Sutras
लग्न कुंडली के दशम भाव में सूर्य का फल
यदि लग्न कुंडली के दशम भाव में सूर्य हो तो ग्रंथकारों का मत है कि ऐसे व्यक्ति स्वस्थ, शूरवीर, अच्छी बुद्धि वाले, साधुजनों से प्रीति रखने वाले, प्रसिद्ध, बुद्धिमान, धन उपार्जन करने में चतुर, अति साहसी, संगीत प्रिय और भूमि व भवन के मालिक होते हैं साथ ही ऐसे व्यक्ति पुत्रवान, भूषण और वाहन युक्त होते हैं १८वें वर्ष में इन्हें विद्या के प्रताप से प्रसिद्धि व १९वें वर्ष में किसी से वियोग होता है साथ ही यदि सूर्य पर तीन ग्रहों की दृष्टि पड़ती हो तो व्यक्ति राजा का प्रिय, अच्छा कार्य करने में कुशल, पराक्रमी और प्रसिद्ध होता है, लग्न कुंडली के दशम भाव में यदि सूर्य उच्च राशि मेष या स्वराशि का सिंह का हो तो व्यक्ति बली, यशस्वी और प्रसिद्ध होता है किंतु यदि सूर्य पर पाप ग्रह की दृष्टि हो तो व्यक्ति के प्रत्येक कार्य में बाधाएं उत्पन्न होती रहती है।
यदि लग्न कुंडली के दशम भाव में सूर्य हो तो व्यक्ति की माता को किसी प्रकार के रोग प्रायः बने रहते हैं और ऐसे व्यक्तियों के मन में ग्लानि प्रायः बनी रहती है साथ ही ऐसे व्यक्तियों का मित्र व स्त्री आदि प्रियजनों से वियोग होता है, मानसागरी में कहा गया है कि:-
अर्थात यदि लग्न कुंडली के दशम भाव में सूर्य हो तो व्यक्ति बहुगुणी होता है साथ ही ऐसे व्यक्ति सुखी, दानी, अभिमानी, कोमल, पवित्र, नाचने-गाने में रुचि रखने वाले और उच्चपदाधिकारी द्वारा सम्मानित होते किंतु जीवन के उत्तरार्ध में स्वास्थ्य समस्या से पीड़ित रहते हैं, मंत्रेश्वर महाराज जी ने फलदीपिका में कहा है कि यदि लग्न कुंडली के दशम भाव में सूर्य हो तो ऐसे व्यक्ति राजा के समान सुख प्राप्त करने वाले, पुत्रवान और अनेक सवारी का सुख प्राप्त करने वाले होते हैं साथ ही लोग इनकी प्रशंसा करते हैं और ऐसे व्यक्ति मतिमान, बलवान तथा कीर्तिमान होते हैं।
ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार यदि लग्न कुंडली के दशम भाव में सूर्य हो तो व्यक्ति बुद्धिमान, प्रसिद्धि प्राप्त करने वाला, धन संचय में निपुण, सूर्य को 3 शुभ ग्रह देखते हों तो राजा द्वारा सम्मान प्राप्त करने वाला, तालाब-कुएं-मंदिर का निर्माण करवाने वाला तथा शुभ कार्यों में रुचि लेने वाला होता है, यदि लग्न कुंडली के दशम भाव में सूर्य मेष, कर्क, सिंह, वृश्चिक तथा धनु राशि का हो तो पुलिस, सेना व आबकारी के माध्यम से अच्छा धन लाभ प्राप्त करता है या बैंकिंग, फाइनेंस, मार्केटिंग के क्षेत्र में अच्छी उन्नति प्राप्त करता है, यदि सूर्य दशम भाव में वृषभ, कन्या, मकर, कुंभ या मिथुन राशि का हो तो व्यक्ति उच्चाधिकारी होता है साथ ही यदि अन्य शुभ ग्रहों का सहयोग हो व मंगल भी दशम भाव में सूर्य के साथ हो तो व्यक्ति राजनीति के क्षेत्र में ऊँचे शिखर पर पहुँचता है, तुला राशि का सूर्य यदि दशम भाव में हो तो कुछ झंझटों के साथ उन्नति प्राप्त होती है किंतु यदि सूर्य का नीचभंग हो रहा हो तो व्यक्ति जज, मिनिस्टर आदि के समान किसी पद को प्राप्त करता है।
ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार यदि लग्न कुंडली के दशम भाव में सूर्य वृश्चिक राशि का हो तो व्यक्ति प्रसिद्ध डॉक्टर हो सकता है, दशम भाव का सूर्य एकदम से बड़ी सफलता नही देता ऐसे व्यक्ति धीरे-धीरे उन्नति प्राप्त करते हैं ऊंचे शिखर तक पहुँचते हैं किंतु जीवन के अंतिम भाग में रोगी होते हैं और बंधु-बांधवों से कलह व वियोग का दुःख प्राप्त करते हैं।
वर्ष कुंडली के विभिन्न भावों में मुंथा व ग्रहों के फल
वर्ष कुंडली के विभिन्न भावों में मुंथा व ग्रहों के फल
वर्ष कुंडली के विभिन्न भावों में मुंथा व ग्रहों के फल
ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार ज्योतिष में लग्न कुंडली, चंद्र कुंडली व नवमांश के बाद वर्ष कुंडली की अत्यधिक भूमिका होती है जिससे व्यक्ति का भावी वर्ष कैसा जाएगा यह ज्ञात किया जाता है इसमें मुंथा की विशेष भूमिका होती है तो चलिए जानते हैं वर्ष कुंडली के विभिन्न भावों में मुंथा व ग्रहों के फल:-
मुंथा फल:-
ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार मुंथा यदि प्रथम भाव में हो तो सुख व शत्रुनाश, द्वितीय भाव में हो तो सुयश और अर्थागम, तृतीय भाव में हो तो कार्यपुष्टि व धन, चतुर्थ भाव में हो तो अंग पीड़ा व दुःख, पंचम भाव में हो तो सुबुद्धि और सुखाप्ति, षष्ठ भाव में हो तो रोग भय और अर्थ नाश, सप्तम भाव में हो तो रोग भय और व्यसन, अष्टम भाव में हो तो दुर्व्यसन और रोग भय, नवम भाव में हो तो भाग्योदय, दशम भाव में हो तो राज्य सुख व धन प्राप्ति, एकादश भाव में हो तो धर्मार्थ और लाभ एवं द्वादश भाव में हो तो सुव्यय और लाभ आदि फल मिलते हैं।
सूर्य फल:-
ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार सूर्य यदि प्रथम भाव में हो तो क्लेश व चिंता, द्वितीय भाव में हो तो शोक और राजभय, तृतीय भाव में हो तो पराक्रम व धन लाभ, चतुर्थ भाव में हो तो हानि और पीड़ा भय, पंचम भाव में हो तो रोगभय व पुत्र नाश, षष्ठ भाव में हो तो सुख और शत्रु नाश, सप्तम भाव में हो तो स्त्री कष्ट और पीड़ा भय, अष्टम भाव में हो तो शोक व कष्टादि भय, नवम भाव में हो तो धर्म वृद्धि व राज्यप्रद, दशम भाव में हो तो सुख एवं उच्च पद की प्राप्ति, एकादश भाव में हो तो सुखार्थ और लाभ एवं द्वादश भाव में हो तो उद्वेग और पीड़ा आदि फल मिलते हैं।
चंद्रमा फल:-
ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार चंद्रमा यदि प्रथम भाव में हो तो कफ व ज्वरादि पीड़ा, द्वितीय भाव में हो तो नेत्र पीड़ा व धन प्राप्ति, तृतीय भाव में हो तो धन प्राप्ति व हर्ष, चतुर्थ भाव में हो तो सुख और शत्रुनाश, पंचम भाव में हो तो सुख और सुमति, षष्ठ भाव में हो तो अंङ्ग पीड़ा और व्यय, सप्तम भाव में हो तो ज्वरादि भय, अष्टम भाव में हो तो विविध कष्ट भय, नवम भाव में हो तो पुण्योदय और धनागमन, दशम भाव में हो तो सुकर्म और ज्याप्ति, एकादश भाव में हो तो लाभ एवं द्वादश भाव में हो तो व्यय व नेत्र पीड़ा आदि फल मिलते हैं।
मंगल फल:-
ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार मंगल यदि प्रथम भाव में हो तो वातव्याधि और व्रण, द्वितीय भाव में हो तो नेत्र रोग और वित्त नाश, तृतीय भाव में हो तो आरोग्यता और द्रव्य लाभ, चतुर्थ भाव में हो तो व्यसन और रोग भय, पंचम भाव में हो तो पुत्र प्राप्ति व दुर्बुद्धि, षष्ठ भाव में हो तो सुख व शत्रु नाश, सप्तम भाव में हो तो स्त्री नाश व कष्ट, अष्टम भाव में हो तो ज्वर पीड़ा व व्रण पीड़ा, नवम भाव में हो तो पुण्योदय व धन प्राप्ति, दशम भाव में हो तो राज्यार्थ और लाभ, एकादश भाव में हो तो धन लाभ एवं द्वादश भाव में हो तो विरोध व कर्ण पीड़ा आदि फल मिलते हैं।
बुध फल:-
ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार बुध यदि प्रथम भाव में हो तो सुख, यश व धन लाभ, द्वितीय भाव में हो तो द्रव्य प्राप्ति व सुख, तृतीय भाव में हो तो सुख व सुमान, चतुर्थ भाव में हो तो सुख व द्रव्य लाभ, पंचम भाव में हो तो पुत्र व सुख की प्राप्ति, षष्ठ भाव में हो तो रोगभय और कलह, सप्तम भाव में हो तो धनागम और कफ रोग, अष्टम भाव में हो तो व्यांग्रता और कफ रोग, नवम भाव में हो तो धन व कीर्ति की प्राप्ति, दशम भाव में हो तो मान, सुख व धन लाभ, एकादश भाव में हो तो सुख व जय की प्राप्ति एवं द्वादश भाव में हो तो शत्रु व रोगादि भय आदि फल प्राप्त होते हैं।
गुरु फल:-
ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार गुरु यदि प्रथम भाव में हो तो सुख व यश लाभ, द्वितीय भाव में हो तो कीर्ति व धन की प्राप्ति, तृतीय भाव में हो तो जय व सुख की प्राप्ति, चतुर्थ भाव में हो तो वाहन प्राप्ति व सुख, पंचम भाव में हो तो पुत्र प्राप्ति व सुख, षष्ठ भाव में हो तो शत्रु व रोगादि भय, सप्तम भाव में हो तो सुख व वित्त की प्राप्ति, अष्टम भाव में हो तो कठिन समय व रोगादि भय, नवम भाव में हो तो सुख व भाग्य वृद्धि, दशम भाव में हो तो राज्यार्थ लाभ, एकादश भाव में हो तो सुतार्थ और लाभ एवं द्वादश भाव में हो तो शोक व रोगादि भय आदि फल प्राप्त होते हैं।
शुक्र फल:-
ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार शुक्र यदि प्रथम भाव में हो तो सम्मान व धन लाभ, द्वितीय भाव में हो तो धन प्राप्ति व उच्च पद की प्राप्ति, तृतीय भाव में हो तो कीर्ति वृद्धि व अर्थागम, चतुर्थ भाव में हो तो सुख व अर्थ लाभ, पंचम भाव में हो तो धनागम व सुख, षष्ठ भाव में हो तो रिपुभति एवं कष्ट, सप्तम भाव में हो तो कलत्र और सौख्य, अष्टम भाव में हो तो ज्वर व पीड़ा, नवम भाव में हो तो धर्म व धनागम, दशम भाव में हो तो मान व जया लाभ, एकादश भाव में हो तो क्षेमार्थ व लाभ एवं द्वादश भाव में हो तो व्यय व अर्थ लाभ आदि फल प्राप्त होते हैं।
शनि फल:-
ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार शनि यदि प्रथम भाव में हो तो शत्रु भय व वातव्याधि, द्वितीय भाव में हो तो पीड़ा भय और विरोध, तृतीय भाव में हो तो धन प्राप्ति और जय, चतुर्थ भाव में हो तो सुख व अर्थ नाश और कष्ट, पंचम भाव में हो तो सुत हानि व पीड़ा, षष्ठ भाव में हो तो धन प्राप्ति एवं कष्ट नाश, सप्तम भाव में हो तो स्त्री कष्ट और कलह, अष्टम भाव में हो तो दुःख और रोगादि भय, नवम भाव में हो तो भाग्य वृद्धि और शत्रु नाश, दशम भाव में हो तो धन हानि और पीड़ा भय, एकादश भाव में हो तो धन व पुत्र प्राप्ति एवं द्वादश भाव में हो तो क्लेश और चिंता आदि फल प्राप्त होते हैं।
राहु फल:-
ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार राहु यदि प्रथम भाव में हो तो शिरोवेदना और कलह, द्वितीय भाव में हो तो नृपभय और पीड़ा, तृतीय भाव में हो तो शत्रु नाश, चतुर्थ भाव में हो तो वातव्याधि और दुःख, पंचम भाव में हो तो बुद्धि नाश और निर्धन, षष्ठ भाव में हो तो रिपुक्षय एवं आरोग्य, सप्तम भाव में हो तो धन क्षय व पीड़ा, अष्टम भाव में हो तो धन क्षय और रोग भय, नवम भाव में हो तो धन एवं धर्म वृद्धि, दशम भाव में हो तो वाहन नाश और जय, एकादश भाव में हो तो विपुत्र और सुलाभ एवं द्वादश भाव में हो तो व्याधि और भय आदि फल प्राप्त होते हैं।
केतु फल:-
ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार केतु यदि प्रथम भाव में हो तो पीड़ा, भय और चिंता, द्वितीय भाव में हो तो क्लेश और धन क्षय, तृतीय भाव में हो तो आरोग्य और धर्म नाश, चतुर्थ भाव में हो तो कष्ट और राज्य भय, पंचम भाव में हो तो पीड़ा भय और दुर्बुद्धि, षष्ठ भाव में हो तो सुख और धनागम, सप्तम भाव में हो तो क्लेश और रोग, अष्टम भाव में हो तो ज्वर व पीड़ा, नवम भाव में हो तो भाग्य और यशोर्थ लाभ, दशम भाव में हो तो कीर्ति और अर्थ लाभ, एकादश भाव में हो तो पुत्रार्थ और सुख लाभ एवं द्वादश भाव में हो तो शोक और कष्ट भय आदि फल प्राप्त होते हैं।
अर्थात ब्रह्मा जी बोले– हे तात! आपने जो मुझसे पूछा था वह सृष्टि का वर्णन मैंने कर दिया अतः अब गुणों का स्वरूप कहता हूँ, उसे एकाग्रचित्त होकर सुनो।
सत्वगुण को प्रीति स्वरूप समझना चाहिए, वह प्रीति सुख से संपन्न होती है सरलता, सत्य, शौच, श्रद्धा, क्षमा, धैर्य, कृपा, लज्जा, शांति और संतोष इन लक्षणों से निश्चल सत्वगुण की प्रीति होती है, सत्वगुण का वर्ण श्वेत है यह सर्वदा धर्म के प्रति प्रीति उत्पन्न करता है, सत्-श्रद्धा का आविर्भाव करता है तथा असत्-श्रद्धा को समाप्त करता है, तत्त्वदर्शी मुनियों ने तीन प्रकार की श्रद्धा बताई है– सात्त्विकी, राजसी एवं तीसरी तामसी।
रक्तवर्णं रज: प्रोक्तमप्रीतिकरमद्भुतम्। अप्रीतिर्दु:खयोगत्वाद्भवत्येव सुनिश्चिता।। प्रद्वेषोऽथ तथा द्रोहो मत्सर: स्तंभ एव च। उत्कण्ठा च तथा निद्रा श्रद्धा तत्र च राजसी। मानो मदस्तथा गर्वो रजसा किल जायते। प्रत्येवयं रजस्त्वेतैर्लक्षणैश्च विचक्षणै:।।
अर्थात रजोगुण रक्तवर्ण वाला कहा गया है यह आश्चर्य एवं अप्रीति को उत्पन्न करता है दुःख से योग के कारण ही निश्चित रूप से अप्रीति उत्पन्न होती है जहाँ ईर्ष्या, द्रोह, मत्सर, स्तंभन, उत्कण्ठा एवं निद्रा होती है वहॉं राजसी श्रद्धा रहती है अभिमान, मद और गर्व ये सब भी राजसी श्रद्धा से ही उत्पन्न होते हैं अतः विद्वान् मनुष्यों को चाहिए कि वे इन लक्षणों द्वारा राजसी श्रद्धा समझ लें।
अर्थात तमोगुण का वर्ण कृष्ण होता है यह मोह और विषाद उत्पन्न करता है आलस्य, अज्ञान, निद्रा, दीनता, भय, विवाद, कायरता, कुटिलता, क्रोध, विषमता, अत्यंत नास्तिकता और दूसरों के दोषों को देखने का स्वभाव ये तीन तामसिक श्रद्धा के लक्षण हैं, तामसी श्रद्धा से युक्त ये सभी लक्षण परपीड़ादायक हैं।
अर्थात आत्मकल्याण की इच्छा रखने वालों को अपने में निरंतर सत्वगुण का विकास करना चाहिए, रजोगुण पर नियंत्रण रखना चाहिए तथा तमोगुण का नाश करना चाहिए, ये तीनों गुण एक-दूसरे का उत्कर्ष होने की दशा में परस्पर विरोध करने लगते हैं ये सभी एक-दूसरे के आश्रित हैं, निराश्रय होकर नही रहते, तीनों गुण सत्त्वगुण, रजोगुण तथा तमोगुण में से कोई एक अकेला कभी नही रह सकता ये सभी सदैव मिलकर रहते हैं इसलिए ये अन्योन्याश्रय संबंध वाले कहे गए हैं।
सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण के अन्योन्याश्रय संबंध होने का वर्णन अगले भाग में…..
श्रीमद्देवीभागवत महापुराण के अनुसार बुध के जन्म की कथा
बुध के जन्म की कथा
श्रीमद्देवीभागवत महापुराण के प्रथम स्कंध के ग्याहरवें अध्याय में बुध के जन्म की सुंदर कथा मिलती है जिन्हें ४ भाग में प्रकाशित करूँगा तो चलिए जानते हैं कि श्रीमद्देवीभागवत महापुराण के अनुसार बुध के जन्म की क्या कथा है:-
ऋषय ऊचु:
कोऽसौ पुरुरवा राजा कोर्वशी देवकन्याका। कथं कष्टं च सम्प्राप्तं तेन राज्ञा महात्मना।। सर्वं कथानकं ब्रूहि लोमहर्षणजाधुना। श्रोतुकामा वयं सर्वे त्वन्मुखाब्जच्युतं रसम्।। अमृतादपि मिष्टा ते वाणी सूत रसात्मिका। न तृप्यामो वयं सर्वे सुधया च यथामरा:।।
अर्थात ऋषिगण बोले– हे सूत जी! वे राजा पुरुरवा कौन थे तथा वह देवकन्या उर्वशी कौन थी? उस मनस्वी राजा ने किस प्रकार संकट प्राप्त किया? हे लोमहर्षणतनय! आप इस समय पूरा कथानक विस्तारपूर्वक कहें हम सभी लोग आपके मुखारविंद से निःसृत रसमयी वाणी को सुनने के इच्छुक हैं, हे सूत जी! आपकी वाणी अमृत से भी बढ़कर मधुर एवं रसमयी है, जिस प्रकार देवगण अमृत पान से कभी तृप्त नही होते ठीक उसी प्रकार आपके कथा श्रवण से हम तृप्त नही होते।
अर्थात सूत जी बोले– हे मुनियों! अब आप लोग उस दिव्य तथा मनोहर कथा को सुनिए, जिसे मैंने परम श्रेष्ठ व्यासा जी के मुख से सुना है, मैं उसे अपनी बुद्धि के अनुसार कहूँगा।
सुर गुरु बृहस्पति की पत्नी का नाम “तारा” था, वह रूप-यौवन से संपन्न तथा सुंदर अंगों वाली थी एक बार वह सुंदरी अपने यजमान चंद्रमा के घर गईं उस रूप तथा यौवन से संपन्न चंद्रमुखी कामिनी को देखते ही चंद्रमा उस पर आसक्त हो गए तथा देवी तारा भी चंद्रमा को देखकर आसक्त हो गईं इस प्रकार दोनों तारा व चंद्रमा एक-दूसरे को देखकर प्रेमविभोर हो गए, ये दोनों प्रेमोन्मत्त एक-दूसरे को चाहने की इच्छा से युक्त हो विहार करने लगे इस प्रकार उनके कुछ दिन व्यतीत हुए तब बृहस्पति ने देवी तारा को घर लाने के लिए अपना एक शिष्य भेजा परंतु वह न आ सकी, जब चंद्रमा ने बृहस्पति के शिष्य को कई बार लौटाया तो बृहस्पति क्रोधित होकर चंद्रमा के पास स्वम् गए और चंद्रमा के घर जाकर उदार चित्त बृहस्पति ने अभिमान के साथ मुस्कुराते हुए उस चंद्रमा से कहा:-
अर्थात हे चंद्रमा! तुमने यह धर्मविरुद्ध कार्य क्यों किया और मेरी इस परम सुंदरी पत्नी को अपने घर में क्यों रख लिया? हे देव! मैं तुम्हारा गुरु हूँ और तुम मेरे यजमान हो तब हे मूर्ख! तुमने गुरु पत्नी को अपने घर में क्यों रख लिया? ब्रह्म हत्या करने वाला, सुवर्ण चुराने वाला, मदिरापान करने वाला, गुरूपत्नीगामी तथा पाँचवा इन पापियों के साथ संसर्ग रखने वाला– ये “महापातकी” है, तुम महापापी, दुराचारी एवं अत्यंत निन्दनीय हो यदि तुमने मेरी पत्नी के साथ अनाचर किया है तो तुम देवलोक में रहने योग्य नही हो, हे दुष्टात्मन्! असितापांगी मेरी इस पत्नी को छोड़ दो जिससे मैं इसे अपने घर ले जायूँ अन्यथा गुरु पत्नी का अपहरण करने वाले तुझको मैं श्राप दे दूँगा, इस प्रकार बोलते हुए स्त्री विरह से कातर तथा क्रोधाकुल देव गुरु बृहस्पति से रोहिणी पति चंद्रमा ने कहा:-
लग्न कुंडली के नवम भाव में सूर्य का फल–Astrology Sutras
लग्न कुंडली के नवम भाव में सूर्य का फल
यदि लग्न कुंडली के नवम भाव में सूर्य हो तो ग्रंथकारों का मत है कि ऐसे व्यक्ति धर्म-कर्म में निरत, श्रेष्ठ बुद्धि वाले, मातृकुल के विरोधी, पुत्रवान, सुखी और पुत्र तथा मित्रों से सुखी रहते हैं साथ ही ऐसे व्यक्ति सूर्य और शिव आदि देवताओं का पूजन करने वाले तथा पिता से विरोध करने वाले होते हैं, यदि लग्न कुंडली के नवम भाव में सूर्य हो तो व्यक्ति उत्कृष्ट विषय और सूर्य मंडल की अद्भुत घटना वली से प्रेम रखने वाला, उदार, साधारण संपत्ति अर्जित करने वाला, अच्छी सूझ-बूझ वाला तथा पैतृक संपत्ति का त्याग करने वाले होते हैं साथ ही इन्हें प्रायः पहले और दसवें वर्ष में तीर्थ यात्रा का सौभाग्य भी प्राप्त होता है किंतु यदि सिंह राशि का सूर्य नवम भाव में हो तो प्रायः व्यक्ति के भाई नही होते या भाई से वैचारिक मतभेद रहते हैं या भाई को किसी प्रकार से स्वास्थ्य में समस्या रहती है तथा यदि लग्न कुंडली के नवम भाव में सूर्य अपनी मित्र राशि का हो तो व्यक्ति सात्विक, अनुष्ठान शील और धार्मिक होता है।
यदि लग्न कुंडली के नवम भाव में सूर्य अपनी उच्च राशि अर्थात मेष या मित्र राशि के होकर स्थित हो तो व्यक्ति के पिता दीर्घायु होते हैं साथ ही ऐसे व्यक्ति धनवान और ईश्वर का भजन तथा भक्ति करने वाले होते हैं और इन्हें गुरु व देवताओं से अत्यधिक प्रेम रहता है किंतु यदि सूर्य लग्न कुंडली के नवम भाव में अपनी नीच राशि अर्थात तुला के होकर स्थित हों तो यह स्थिति भाग्य एवं धर्मानुष्ठान दोनो के लिए अनिष्टकर होता है और चिंता तथा विरक्ति प्रदान करता है, मंत्रेश्वर महाराज जी ने फलदीपिका में कहा है कि यदि लग्न कुंडली के नवम भाव में सूर्य स्थित हो तो ऐसे व्यक्तियों को पिता व गुरु का पूर्ण सुख नही मिल पाता है किंतु ऐसे व्यक्तियों को पुत्र एवं बांधवों से अवश्य ही सुख मिलता है साथ ही ऐसे व्यक्ति देव व ब्राह्मण के भक्त होते हैं, मानसागरी में कहा गया है कि:-
अर्थात यदि लग्न कुंडली के नवम भाव में सूर्य हो तो व्यक्ति सत्यवक्ता, सुंदर केशों वाला, कुल के लोगों का हित चाहने वाला, देवताओं व ब्राह्मणों में श्रद्धा रखने वाला होता है साथ ही ऐसे व्यक्तियों का बचपन में स्वास्थ्य प्रायः उतार-चढ़ाव युक्त तथा युवावस्था में स्थिरता होती है तथा ऐसे व्यक्ति धनाढ्य, दीर्घायु तथा रूपवान होते हैं, आचार्य वराहमिहिर के अनुसार यदि लग्न कुंडली के नवम भाव में में सूर्य हो तो व्यक्ति सुखी होता है तथा इन्हें धन, पुत्र एवं शौर्य तीनों सुख प्राप्त होते हैं।
ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुभव व मत के अनुसार यदि लग्न कुंडली के नवम भाव में सूर्य हो तो व्यक्ति को केवल शुभ फल ही प्राप्त हों ऐसा नही होता है सभी ग्रंथकारों ने नवमस्थ सूर्य के कुछ शुभ तो कुछ अशुभ फल बताए हैं वैधनाथ जी ने तो यहाँ तक कहा है कि यदि लग्न कुंडली के नवम भाव में सूर्य हो तो व्यक्ति धर्मान्तर कर लेता है जो कि अत्यंत अशुभ फल है वैधनाथ जी के मत के अनुसार व्यक्ति नवमस्थ सूर्य की अन्त: प्रेरणा से अपना परंपरागत श्रुति-स्मृति-प्रतिपादित धर्म जो छोड़कर विधर्मियों के धर्म को स्वीकार करता है ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार यह फल तभी मिलते हैं जब नवम भाव का स्वामी पाप प्रभाव युक्त हो, यदि लग्न कुंडली के नवम भाव में सूर्य हो व्यक्ति को जीवन के प्रथम भाग में दुःख तथा अंतिम भाग में सुख मिलता है किंतु ऐसे व्यक्तियों को बुढापे में भी प्रायः कोई दुःख रहता है।
ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार यदि लग्न कुंडली के नवम भाव में सूर्य मिथुन, तुला या कुंभ राशि का हो तो व्यक्ति लेखक, प्रकाशक या प्राध्यापक हो सकते हैं, यदि मेष, सिंह व धनु राशि का सूर्य नवम भाव में हो तो ऐसे व्यक्ति सेना, पुलिस या अन्य किसी प्रकार के सुरक्षा विभाग में कार्य करते हैं या फिर इंजीनियर होते हैं, यदि लग्न कुंडली के नवम भाव में सूर्य कर्क, वृश्चिक या मीन के हो तो व्यक्ति कवि, नाटककार, रसायन विद्या का संशोधक या धर्म से जुड़ा हुआ कार्य करने वाला होता है, यदि लग्न कुंडली के नवम भाव में सूर्य वृषभ, कन्या या मकर राशिगत हो तो व्यक्ति खेती या व्यापार का मालिक होता है, ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जीके अनुसार यदि लग्न कुंडली के नवम भाव में सूर्य हों तो व्यक्ति धार्मिक, देवताओं व ब्राह्मणों का भक्त होता है किंतु ऐसे व्यक्ति बहुत भाग्यशाली नही होते, ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार यदि लग्न कुंडली के नवम भाव में सूर्य हो तो व्यक्ति को स्त्री व पुत्र दोनो सुख उत्तम मिलते हैं तथा यदि सूर्य उच्च राशि मेष का हो तो पिता की अच्छी उन्नति व पिता से अत्यधिक प्रेम आदि फल भी मिलते हैं और ऐसे व्यक्तियों के पिता दीर्घायु होते हैं किंतु यदि सूर्य नवम भाव में नीच राशि तुला का हो तो व्यक्ति के पिता से वैचारिक मतभेद रहते हैं तथा पिता को कोई कष्ट अथवा पिता की मृत्यु आदि फल मिलते हैं।