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नरक चतुर्दशी एवं श्री हनुमान जन्मोत्सव 2026: 7 नवंबर को दुर्लभ महासंयोग, जानें शुभ मुहूर्त, यम दीपदान, अभ्यंग स्नान व संपूर्ण शास्त्रोक्त विधि

सनातन धर्म में पांच दिवसीय दीपोत्सव का द्वितीय दिवस ‘नरक चतुर्दशी’, ‘रूप चौदस’, ‘छोटी दीपावली’ तथा ‘श्री हनुमान जन्मोत्सव’ के परम पावन पर्व के रूप में मनाया जाता है। यह पावन तिथि सौंदर्य, आरोग्यता, यम-भय निवारण और अष्टसिद्धि-नवनिधि के दाता संकटमोचन हनुमान जी की कृपा प्राप्ति का दिव्य महापर्व है। वर्ष 2026 में यह महापर्व 07 नवंबर 2026 (शनिवार) को चित्रा नक्षत्र, प्रीति योग, कन्या राशि के चंद्रमा और सांध्यकालीन मेष लग्न के दुर्लभ महासंयोग में मनाया जाएगा।

Astrology Sutras (ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी) के इस विशेष शोधपरक आलेख में हम निर्णय सिन्धु, मुहूर्त चिन्तामणि, स्कन्द पुराण, अगस्त्य संहिता और वाल्मीकि रामायण के अकाट्य प्रमाणों के आलोक में जानेंगे तिथि का यथार्थ, प्रदोष व मेष लग्न में हनुमान पूजा का महामुहूर्त, 14 दीपकों से यम दीपदान, भोर में अभ्यंग स्नान का रहस्य और हनुमान जी की सिंदूर-चोला अर्पण सहित संपूर्ण शास्त्रोक्त पूजन विधि।

💡 7 या 8 नवंबर: तिथि निर्णय, हनुमान जन्मोत्सव एवं स्नान का शास्त्रोक्त समन्वय

ऋषिकेश पंचांग (काशी मान) के अनुसार कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी तिथि 07 नवंबर 2026 को दिन में 10:43 बजे प्रारंभ होगी और 08 नवंबर 2026 को दिन में 10:51 बजे समाप्त होगी।

  • प्रदोष व निशीथ व्यापिनी (07 नवंबर): निर्णय सिन्धु एवं अगस्त्य संहिता के अनुसार हनुमान जी का प्राकट्य कार्तिक चतुर्दशी के सांध्य/रात्रि काल में हुआ था तथा यम दीपदान भी प्रदोष काल में किया जाता है। 07 नवंबर को प्रदोष काल, मेष लग्न और मध्यरात्रि में पूर्ण चतुर्दशी विद्यमान है, अतः हनुमान जन्मोत्सव, यम दीपदान व 14 दीपकों का पूजन 07 नवंबर (शनिवार) को ही होगा।
  • अरुणोदय अभ्यंग स्नान (08 नवंबर की भोर): धर्मसिन्धु के अनुसार तैलाभ्यंग स्नान सूर्योदय पूर्व चतुर्दशी में किया जाता है। 08 नवंबर की भोर (अरुणोदय काल 05:00 से 06:31 AM) में चतुर्दशी तिथि विद्यमान रहेगी, अतः पवित्र अभ्यंग स्नान व यम तर्पण 08 नवंबर की प्रातः काल संपन्न किया जाएगा।

 सूक्ष्म पंचांग विवरण (ऋषिकेश पंचांग, काशी अनुसार)

07 नवंबर 2026 का सुनिश्चित गणितीय पंचांग मान निम्नलिखित है:

पंचांगीय अंग / विवरण सटीक समय व मान (ऋषिकेश पंचांग, काशी)
दिनांक एवं वार 07 नवंबर 2026, शनिवार
कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी प्रारंभ 07 नवंबर 2026, दिन में 10:43 बजे से
चतुर्दशी तिथि समाप्त 08 नवंबर 2026, दिन में 10:51 बजे तक
सूर्योदय / सूर्यास्त (काशी) प्रातः 06:31 बजे / सायं 05:29 बजे
नक्षत्र संचरण चित्रा नक्षत्र (रात्रि शेष / 08 नवंबर भोर 06:20 तक)
योग संचरण प्रीति योग (रात्रि शेष / 08 नवंबर भोर 04:47 तक)
चन्द्र राशि कन्या राशि में संचरण
मेष लग्न (अत्यंत शुभ) सायं 04:25 बजे से 06:02 बजे तक
राहुकाल (वर्जित काल) प्रातः 09:16 बजे से 10:38 बजे तक
प्रदोष काल (संध्या वेला) सायं 05:29 बजे से रात्रि 08:05 बजे तक

⏰ पूजन, दीपदान एवं अभ्यंग स्नान के सर्वश्रेष्ठ शुभ मुहूर्त

07 नवंबर 2026 को हनुमान जन्मोत्सव पूजन और यम दीपदान हेतु विभिन्न कालों के प्रामाणिक मुहूर्त निम्नलिखित हैं:

अनुष्ठान / वेला सटीक समय अवधि महत्व एवं शास्त्रीय फल
मेष लग्न व प्रदोष महासंयोग सायं 05:29 से 06:02 तक श्री हनुमान जन्मोत्सव पूजन का सर्वश्रेष्ठ काल
प्रदोष काल यम दीपदान सायं 05:29 से 07:05 तक 14 दीपकों का प्रज्वलन व यम तर्पण
निशीथ काल (मध्यरात्रि साधना) रात्रि 11:38 से 12:31 तक हनुमान बाहुक, सुंदरकांड व तंत्र साधना
अरुणोदय अभ्यंग स्नान 08 नवंबर प्रातः 05:00 से 06:31 तक तिल तैल मालिश, अपामार्ग प्रक्षालन व स्नान

📜 शास्त्रों के अनुसार प्रमाण: श्लोक, ध्यान व अर्घ्य मंत्र

कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी पर हनुमान जन्मोत्सव, अभ्यंग स्नान और यम दीपदान के शास्त्रीय श्लोक निम्नलिखित हैं:

शास्त्रोक्त मूल श्लोक प्रमाणिक अर्थ एवं आध्यात्मिक संदर्भ

“आश्विने मासि मेषेऽर्के स्वात्यां भौमे दिने तथा।
कार्तिके कृष्णपक्षे तु चतुर्दश्यां कपीश्वरः॥”

अगस्त्य संहिता / स्कन्द पुराण

अर्थ: कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को सांध्य काल में केसरीनंदन, वायुपुत्र भगवान कपीश्वर हनुमान जी का प्राकट्य माता अंजना के गर्भ से हुआ था।

“तैले लक्ष्मीर्जले गङ्गा दीपावल्याश्चतुर्दशीम्।
प्रातःस्नानं तु यः कुर्याद्यमलोकं न पश्यति॥”

स्कन्द पुराण (अभ्यंग स्नान श्लोक)

अर्थ: नरक चतुर्दशी की प्रातः काल तेल में साक्षात मां लक्ष्मी और समस्त जलों में मां गंगा का वास होता है। जो मनुष्य इस दिन तैलाभ्यंग स्नान करता है, उसे यमलोक की यातना नहीं देखनी पड़ती।

“सीतालोष्टसमायुक्त सकण्टकदलान्वित।
हर पापमपामार्ग भ्राम्यमाणः पुनः पुनः॥”

अपामार्ग प्रक्षालन मंत्र

अर्थ: हे कांटों और पत्तियों से युक्त अपामार्ग (चिरचिटा)! सिर के ऊपर बारंबार घुमाए जाने पर आप मेरे कायिक, वाचिक और मानसिक सभी प्रकार के पापों और नरक-भय का हरण करें।

🚩 कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी: श्री हनुमान जन्मोत्सव का रहस्य

उत्तर भारत में चैत्र पूर्णिमा के अतिरिक्त कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को श्री हनुमान जन्मोत्सव मनाने की सुदीर्घ परंपरा है। वाल्मीकि रामायण एवं अगस्त्य संहिता के अनुसार जब भगवान सूर्यदेव के तेज और भगवान शिव के एकादश रुद्रावतार के रूप में पवनपुत्र का अवतरण हुआ, तब वह बेला कार्तिक चतुर्दशी की ही थी। इस दिन शनिवार का होना सोने पर सुहागा है, क्योंकि शनिवार स्वयं पवनपुत्र और शनिदेव की संयुक्त कृपा का दिन है। इस दिन सिंदूर और चमेली के तेल का लेपन करने से जातक की कुंडली के समस्त ग्रह दोष (विशेषकर शनि, मंगल व राहु की पीड़ा) तत्काल शांत हो जाते हैं।

🛠️ श्री हनुमान जी की संपूर्ण प्रामाणिक पूजन एवं चोला अर्पण विधि

सायं 05:29 से 06:02 के मध्य (मेष लग्न व प्रदोष काल) लाल वस्त्र धारण कर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशासन पर बैठें:

  1. संकल्प: हाथ में जल, अक्षत, पुष्प और सिक्का लेकर संकल्प करें—“मम सकल-संकट-निवारणार्थं श्रीसीताराम-प्रीत्यर्थं च श्रीहनुमत्पूजनमहं करिष्ये।”
  2. पवित्र स्नान व आसन: श्री हनुमान जी की प्रतिमा या चित्र को गंगाजल मिश्रित जल से स्नान कराएं।
  3. सिंदूर व चमेली का चोला: चमेली के शुद्ध तेल में शुद्ध नारंगी सिंदूर घोलें। सर्वप्रथम भगवान के चरणों में अनामिका उंगली से सिंदूर अर्पित करें, तदुपरांत संपूर्ण विग्रह पर चोला चढ़ाएं। इसके ऊपर चांदी का वर्क अर्पित करें।
  4. जनेऊ व वस्त्र: हनुमान जी को लाल लंगोट अथवा पीला वस्त्र एवं शुद्ध सूत का जनेऊ (यज्ञोपवीत) धारण कराएं।
  5. आक व तुलसी माला: 108 आक (मदार) के पुष्पों अथवा तुलसी पत्तों पर लाल चंदन से ‘श्रीराम’ लिखकर उसकी माला हनुमान जी के गले में पहनाएं।
  6. दिव्य नैवेद्य: शुद्ध घी में बनी बेसन की बूंदी, बूंदी के लड्डू, रोट और बनारसी मीठा पान (गुलकंद, सौंफ, कत्था युक्त, बिना चूना-सुपारी) का भोग लगाएं।
  7. स्तोत्र पाठ: चमेली के तेल का पंचमुखी दीपक जलाकर श्री हनुमान चालीसा, बजरंग बाण अथवा सुंदरकांड का सस्वर पाठ करें।
  8. आरती: कर्पूर अथवा घृत के दीप से “आरती कीजै हनुमान लला की…” गाकर आरती उतारें और परिवार सहित प्रसाद ग्रहण करें।

🪔 नरक चतुर्दशी के 4 प्रमुख शास्त्रोक्त कृत्य

शास्त्रोक्त कृत्य विधि एवं धार्मिक महत्व
1. यम दीपदान (14 दीपक) 07 नवंबर की संध्या प्रदोष काल में 14 मिट्टी के दीपक सरसों के तेल से जलाए जाते हैं। एक बड़ा चौमुखा दीपक मुख्य द्वार के बाहर दक्षिण दिशा में यमराज के निमित्त रखा जाता है और शेष 13 दीपक तुलसी, तिजोरी, जलस्थान और छत पर रखे जाते हैं।
2. तैलाभ्यंग स्नान (रूप चौदस) 08 नवंबर की भोर में पूरे शरीर पर तिल के तेल व बेसन-हल्दी के उबटन की मालिश करके स्नान करने से शारीरिक कांति बढ़ती है और नरक का भय मिटता है।
3. अपामार्ग प्रक्षालन स्नान करते समय अपामार्ग (चिरचिटा) के पौधे को सिर के ऊपर 3 या 7 बार घड़ी की दिशा (क्लॉकवाइज) में घुमाकर दक्षिण दिशा में फेंकने से समस्त नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है।
4. यम तर्पण (पितृ शांति) स्नान के पश्चात दक्षिण मुख होकर जल में काले तिल और कुशा लेकर यमराज के 14 नामों (यम, धर्मराज, मृत्यु, अंतक, वैवस्वत आदि) से जलांजलि देने से पितरों की तृप्ति होती है।

📖 नरकासुर वध की पौराणिक कथा: श्रीकृष्ण और सत्यभामा का पराक्रम

प्रागज्योतिषपुर का असुर राजा नरकासुर ब्रह्मा जी के वरदान से अहंकारी हो गया था। उसने देवमाता अदिति के दिव्य कुंडल छीन लिए और इंद्र का छत्र हरण कर लिया। इतना ही नहीं, उसने देवताओं, गंधर्वों और ऋषियों की 16,100 रूपवती कन्याओं को बंदी बनाकर कारागार में डाल दिया था। देवताओं के त्राहिमाम करने पर भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी पटरानी सत्यभामा के साथ गरुड़ पर सवार होकर नरकासुर पर आक्रमण किया।

चूँकि नरकासुर को पृथ्वी माता के अंश से उत्पन्न स्त्री के हाथों मृत्यु का वरदान था, अतः भगवान श्रीकृष्ण ने देवी सत्यभामा (जो भूदेवी का अवतार थीं) को सारथी बनाकर युद्ध कराया। कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी के दिन सत्यभामा के सहयोग से भगवान श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र से दुष्ट नरकासुर का वध किया और सभी 16,100 कन्याओं को बंधनमुक्त कराया।

असुर के रक्त और कालिख को धोने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने भोर में तेल से स्नान (अभ्यंग स्नान) किया। नरकासुर के वध की प्रसन्नता में ब्रजवासियों और नगरवासियों ने असंख्य दीप प्रज्वलित कर विजयोत्सव मनाया। इसी स्मृति में कार्तिक चतुर्दशी को ‘नरक निवारण चतुर्दशी’ कहा जाता है।

⚠️ क्या करें और क्या न करें: शास्त्रोक्त नियम

क्या अवश्य करें? (परम कल्याणकारी) क्या कदापि न करें? (सर्वथा वर्जित)
1. सायं काल प्रदोष में 14 दीपकों का यम दीपदान करें।
2. हनुमान जी को चोला व चमेली का तेल अर्पित करें।
3. भोर में तिल तेल मालिश कर सूर्योदय से पूर्व स्नान करें।
4. घर के पुराने कबाड़ और दरिद्रता को बाहर निकालें।
5. ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ व ‘हनुमान चालीसा’ का जप करें।
1. सूर्योदय के बाद देर तक न सोएं (दरिद्रता का वास होता है)।
2. घर में क्लेश, कटु वचन या किसी का अपमान न करें।
3. यम दीपक को घर की चौखट के अंदर न रखें (सदा बाहर रखें)।
4. दक्षिण दिशा में पैर करके शयन न करें।
5. मांसाहार, मदिरा या तामसिक भोजन का पूर्ण त्याग रखें।

💬 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Google FAQs)

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न प्रामाणिक शास्त्रीय समाधान
हनुमान जन्मोत्सव की पूजा 7 नवंबर को करें या 8 को? हनुमान जी का प्राकट्य सांध्य काल/रात्रि में हुआ था। 07 नवंबर को प्रदोष काल में मेष लग्न (सायं 05:29 से 06:02) और रात्रि में चतुर्दशी तिथि विद्यमान है। अतः हनुमान जन्मोत्सव पूजन 07 नवंबर (शनिवार) को ही शास्त्रसम्मत है।
रूप चौदस का अभ्यंग स्नान किस दिन किया जाएगा? अभ्यंग स्नान सूर्योदय से पूर्व चतुर्दशी तिथि में विहित है। 08 नवंबर की भोर में प्रातः 05:00 से 06:31 बजे तक चतुर्दशी तिथि रहेगी। अतः मुख्य रूप चौदस स्नान 08 नवंबर की सुबह होगा।
नरक चतुर्दशी पर 14 दीपक ही क्यों जलाए जाते हैं? कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को 14 लोकों की शांति और धर्मराज यमराज के 14 स्वरूपों के निमित्त 14 दीपक प्रज्वलित किए जाते हैं, जिससे 14 प्रकार के नरकों से आत्मा की रक्षा होती है।
यम का चौमुखा दीपक किस दिशा में रखना चाहिए? यम दीपक सदैव घर की मुख्य चौखट के बाहर, अनाज की ढेरी पर दक्षिण दिशा (यमराज की दिशा) की ओर मुख करके रखना चाहिए।

निष्कर्ष: नरक चतुर्दशी 2026 तन के सौंदर्य, मन की शुद्धि और आत्मिक अभय का पावन संगम है। 07 नवंबर को प्रदोष काल व मेष लग्न में की गई हनुमान जी की आराधना और यम दीपदान आपके परिवार को समस्त भय, रोग और बाधाओं से मुक्त कर चिरंजीवी सुख प्रदान करता है।

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धनतेरस 2026: 6 नवंबर को मनाया जाएगा धनत्रयोदशी महापर्व, जानें खरीदारी व पूजा का महामुहूर्त, यम दीपदान रहस्य एवं संपूर्ण शास्त्रोक्त विधि

सनातन धर्म में पांच दिवसीय दीपोत्सव का दिव्य शुभारंभ कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि यानी धनतेरस (धनत्रयोदशी) से होता है। यह पावन पर्व केवल नवीन धातुओं अथवा बर्तनों की खरीदारी का लौकिक दिवस नहीं, अपितु समुद्र मंथन से अमृत कलश लेकर प्रकट हुए देवताओं के वैद्य भगवान धन्वन्तरि, धन-वैभव की अधिष्ठात्री मां महालक्ष्मी, धनाध्यक्ष भगवान कुबेर और अकाल मृत्यु का भय हरने वाले धर्मराज यमराज की चतुर्विध आराधना का महापर्व है। वर्ष 2026 में यह महापर्व 06 नवंबर 2026 (शुक्रवार) को स्थिर वृषभ लग्न, हस्त नक्षत्र और विष्कुंभ योग के मंगलकारी संयोग में मनाया जाएगा।

Astrology Sutras (ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी) के इस विशेष शोधपरक आलेख में हम निर्णय सिन्धु, मुहूर्त चिन्तामणि, स्कन्द पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण के अकाट्य प्रमाणों के साथ जानेंगे तिथि निर्णय का यथार्थ, स्थिर लग्न में खरीदारी व पूजा के अचूक मुहूर्त, यम दीपदान का वैदिक विधान, 13 दीपकों का रहस्य और क्या खरीदें तथा क्या कदापि न खरीदें।

💡 6 या 7 नवंबर 2026: तिथि निर्णय और निर्णय सिन्धु का अकाट्य नियम

ऋषिकेश पंचांग (काशी मान) के अनुसार कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी तिथि 06 नवंबर 2026 को पूर्वाह्न 11:07 बजे प्रारंभ होगी और 07 नवंबर 2026 को पूर्वाह्न 10:43 बजे समाप्त हो जाएगी।

  • प्रदोषव्यापिनी ग्राह्यता: निर्णय सिन्धु एवं धर्मसिन्धु का स्पष्ट निर्देश है—“कार्तिके कृष्णपक्षे त्रयोदश्यां निशामुखे। प्रदोषव्यापिनी ग्राह्या त्रयोदशी धनदा यतः॥” धनतेरस का पूजन, कुबेर-लक्ष्मी आराधना और यम दीपदान केवल प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद) में ही शास्त्रसम्मत होता है।
  • 06 नवंबर ही क्यों? 06 नवंबर को त्रयोदशी तिथि दिन में 11:07 से प्रारंभ होकर संपूर्ण प्रदोष काल, स्थिर लग्न और संपूर्ण रात्रि में व्याप्त रहेगी। वहीं 07 नवंबर को त्रयोदशी सुबह 10:43 बजे ही समाप्त हो जाएगी और शाम को चतुर्दशी लग जाएगी। अतः पूरे भारतवर्ष में धनतेरस, धन्वन्तरि जयंती और यम दीपदान 06 नवंबर 2026 (शुक्रवार) को ही मनाया जाएगा।

धनतेरस 2026: सूक्ष्म पंचांग विवरण (ऋषिकेश पंचांग अनुसार)

06 नवंबर 2026 का गणितीय पंचांग मान (काशी सूर्योदय मान अनुसार) निम्नलिखित है:

पंचांगीय अंग / विवरण सटीक समय व मान (ऋषिकेश पंचांग, काशी)
पर्व / वार धनतेरस (धनत्रयोदशी) / 06 नवंबर 2026, शुक्रवार
त्रयोदशी तिथि प्रारंभ 06 नवंबर 2026, पूर्वाह्न 11:07 बजे से
त्रयोदशी तिथि समाप्त 07 नवंबर 2026, पूर्वाह्न 10:43 बजे तक
सूर्योदय / सूर्यास्त (काशी) प्रातः 06:31 बजे / सायं 05:29 बजे
नक्षत्र संचरण हस्त नक्षत्र (रात्रि शेष / 07 नवंबर भोर 05:43 तक)
योग संचरण विष्कुंभ योग (प्रातः 07:12 से 07 नवंबर भोर 05:57 तक)
चन्द्र संचरण कन्या राशि में अहोरात्र (पूरे दिन-रात)
राहुकाल (खरीदारी वर्जित) प्रातः 10:38 बजे से दोपहर 12:00 बजे तक
प्रदोष काल (संध्या वेला) सायं 05:29 बजे से रात्रि 08:06 बजे तक

⏰ धनतेरस 2026: स्थिर लग्न एवं पूजन-खरीदारी के सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त

ज्योतिष शास्त्र और मुहूर्त चिन्तामणि का नियम है कि धनतेरस पर श्रीलक्ष्मी, कुबेर और धन्वन्तरि की पूजा तथा धातु खरीदारी ‘स्थिर लग्न’ (Fixed Ascendant) में की जाए, तो लक्ष्मी का घर में स्थाई वास होता है और संपत्ति क्षय नहीं होती।

स्थिर लग्न / मुहूर्त सटीक समय अवधि उपयुक्तता एवं फल
कुंभ लग्न (स्थिर) दोपहर 01:22 से 02:53 तक वाहन, स्वर्ण, भूमि, बहीखाता व बर्तन खरीदारी
वृषभ लग्न (महामुहूर्त) सायं 05:58 से 07:54 तक धन्वन्तरि, महालक्ष्मी, कुबेर पूजन व यम दीपदान (सर्वोत्तम)
सिंह लग्न (स्थिर – निशीथ) मध्यरात्रि 12:26 से 02:40 तक तांत्रिक साधना, कनकधारा जप, कुबेर सिद्धि
यम दीपदान वेला सायं 05:35 से 06:45 के मध्य प्रदोष काल के प्रारंभ में घर के मुख्य द्वार पर

विशेष नोट: यद्यपि प्रातः 07:12 से 09:29 तक वृश्चिक लग्न भी स्थिर लग्न है, किंतु उस समय तक त्रयोदशी तिथि प्रारंभ नहीं होगी (त्रयोदशी पूर्वाह्न 11:07 से लगेगी)। अतः खरीदारी का पहला श्रेष्ठ समय दोपहर 01:22 बजे (कुंभ लग्न) से ही प्रारंभ होगा।

📜 शास्त्रों के अनुसार प्रमाण: श्लोक, ध्यान व स्तुति

धनतेरस के पावन अवसर पर भगवान धन्वन्तरि, यमराज और धनाध्यक्ष कुबेर के पूजन हेतु प्रामाणिक शास्त्रोक्त मंत्र निम्नलिखित हैं:

शास्त्रोक्त मूल मंत्र शास्त्रीय अर्थ एवं विनियोग

“नमामि धन्वन्तरिमादिदेवं सुरासुरैर्वन्दितपादपद्मम्।
सुधाघटं हस्तचतुष्टयेन बिभ्रत् च कान्त्या ज्वलदर्करूपम्॥”

धन्वन्तरि ध्यान श्लोक

अर्थ: जिनके चरणकमल सुर और असुर दोनों द्वारा पूजित हैं, जो अपने चार हाथों में शंख, चक्र, जलोका और अमृत कलश धारण किए हुए हैं, उन आदिदेव भगवान धन्वन्तरि को मैं नमन करता हूँ। वे हमें निरोगी काया प्रदान करें।

“मृत्युना पाशदण्डाभ्यां कालेन श्यामया सह।
त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतां मम॥”

स्कन्द पुराण (यम दीपदान मंत्र)

अर्थ: कार्तिक त्रयोदशी की संध्या को किए गए इस दीपदान से पाश और दण्ड धारण करने वाले, काल स्वरूप सूर्यपुत्र धर्मराज यमराज मुझ पर और मेरे परिवार पर प्रसन्न हों तथा हमें अकाल मृत्यु से मुक्त रखें।

“ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये।
धनधान्यसमृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा॥”

कुबेर महामंत्र

अर्थ: यक्षराज, विश्रवा के पुत्र, समस्त धन-धान्य और निधियों के अधिपति भगवान कुबेर को नमस्कार है। वे हमारे गृह में अक्षय धन-धान्य और श्री-समृद्धि प्रदान करें।

🌊 समुद्र मंथन और भगवान धन्वन्तरि प्राकट्य रहस्य

श्रीमद्भागवत महापुराण के अष्टम स्कंध के अनुसार, जब देवों और दानवों ने क्षीरसागर का मंथन किया, तो कालकूट विष, कामधेनु, उच्चैःश्रवा अश्व और ऐरावत हाथी आदि 13 रत्नों के प्राकट्य के उपरांत कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन भगवान श्रीहरि विष्णु के अंशावतार भगवान धन्वन्तरि अपने हाथों में दिव्य अमृत से परिपूर्ण स्वर्ण कलश लेकर प्रकट हुए। वे आयुर्वेद के आदि प्रणेता हैं। उनके प्रकट होने के ठीक दो दिन बाद कार्तिक अमावस्या को भगवती महालक्ष्मी का प्राकट्य हुआ। यही कारण है कि दीपावली से पूर्व धनतेरस के दिन आरोग्य के दाता धन्वन्तरि की पूजा को प्रथम प्राथमिकता दी जाती है, क्योंकि स्वस्थ शरीर ही समस्त धर्म और अर्थ का मूल आधार है (“शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्”)।

🪔 यम दीपदान: अकाल मृत्यु हरण की संपूर्ण शास्त्रोक्त विधि

वर्ष भर में केवल धनतेरस की संध्या ही वह पावन वेला है जब मृत्यु के देवता यमराज के निमित्त दीप प्रज्वलित किया जाता है। स्कन्द पुराण के अनुसार जो प्राणी इस दिन यमदीप प्रज्वलित करता है, उसके कुल में किसी भी सदस्य की अकाल मृत्यु (Accidental Death) नहीं होती।

यम दीपदान की प्रामाणिक विधि:

  1. चौमुखा दीपक: गेहूं के आटे का एक बड़ा चार बत्तियों (चौमुखा) वाला दीपक बनाएं। (यदि मिट्टी का दीपक लें तो वह सर्वथा नवीन होना चाहिए)।
  2. द्रव्य प्रक्षेप: दीपक में कड़वा तेल (शुद्ध सरसों का तेल या तिल का तेल) भरें। उसमें चार रुई की बत्तियां चारों दिशाओं की ओर रखें। दीपक के अंदर एक तांबे का सिक्का, थोड़ा अक्षत और एक कौड़ी अवश्य डालें।
  3. प्रज्वलन व दिशा: सायं काल 05:35 से 06:45 के मध्य घर के अंदर दीपक प्रज्वलित करें। फिर घर का कोई वरिष्ठ सदस्य अथवा गृहिणी उस दीपक को लेकर घर के मुख्य प्रवेश द्वार के बाहर दक्षिण दिशा (यम की दिशा) की ओर मुख करके खलिहान या चौखट के दाईं ओर रख दे।
  4. अनाज की ढेरी: दीपक को सीधे जमीन पर न रखें, उसके नीचे थोड़ी खील, गेहूं अथवा धान की ढेरी अवश्य बनाएं।
  5. प्रार्थना व नियम: उपर्युक्त स्कन्द पुराणोक्त मंत्र (“मृत्युना पाशदण्डाभ्यां…”) पढ़कर यमराज से परिवार की रक्षा की प्रार्थना करें। दीपक रखने के पश्चात पीछे मुड़कर न देखें और सीधे घर के अंदर आ जाएं।

🛍️ धनतेरस पर क्या खरीदें और क्या कदापि न खरीदें?

क्या अवश्य खरीदें? (परम शुभ) क्या कदापि न खरीदें? (सर्वथा वर्जित)
1. पीतल के बर्तन: भगवान धन्वन्तरि का प्रिय धातु पीतल है। पीतल का कलश या पात्र खरीदना आरोग्यवर्धक है।
2. सोना व चांदी: मां लक्ष्मी व चंद्रमा का प्रतीक, जो वंश वृद्धि और स्थायित्व लाता है।
3. साबुत धनिया: धनतेरस पर सूखा धनिया खरीदना महालक्ष्मी को आकर्षित करता है। इसे दिवाली पर पूजन के बाद तिजोरी में रखा जाता है।
4. नई झाड़ू: मत्स्य पुराण के अनुसार झाड़ू मां लक्ष्मी का स्वरूप है, यह दरिद्रता का समूल नाश करती है।
5. गोमती चक्र व कौड़ियां: 11 गोमती चक्र या पीली कौड़ियां आर्थिक संकट दूर करती हैं।
1. लोहा व स्टील: लोहा शनि और राहु का कारक है। स्टील भी लोहे का ही आधुनिक रूप है, अतः धनतेरस पर शुद्ध धातु (सोना, चांदी, तांबा, पीतल) ही लें।
2. कांच व चीनी मिट्टी: कांच राहु का प्रतीक है, जो जीवन में भटकाव और दरिद्रता लाता है।
3. नुकीली व धारदार वस्तुएं: चाकू, कैंची, दरांती, सुई आदि हिंसा और अमंगल के प्रतीक हैं, इन्हें खरीदना वर्जित है।
4. काले रंग के वस्त्र या वस्तुएं: काला रंग नकारात्मकता और शोक का प्रतीक माना गया है।
5. खाली बर्तन घर न लाएं: बाजार से जो भी बर्तन खरीदें, उसमें थोड़े चावल, बताशे अथवा जल डालकर ही गृह प्रवेश करें।

📖 धनतेरस की पौराणिक कथा: राजा हिम के पुत्र और यमराज की पराजय

प्राचीन काल में राजा हिम के एक सुयोग्य पुत्र का जन्म हुआ। ज्योतिषियों ने उसकी जन्मकुंडली देखकर भविष्यवाणी की कि विवाह के ठीक चौथे दिन सर्पदंश से इस बालक की अकाल मृत्यु हो जाएगी। राजा और रानी अत्यंत व्याकुल हुए, किंतु राजकुमार के युवा होने पर उसका विवाह एक अत्यंत पतिव्रता और बुद्धिमती कन्या से हुआ।

जब विवाह का चौथा दिन (कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी) आया, तो नववधू ने अपने पति की प्राण-रक्षा के लिए एक अद्भुत उपाय किया। उसने शयनकक्ष के चारों ओर और महल के मुख्य द्वार पर असंख्य स्वर्ण-रजत के आभूषण, रत्न और सिक्कों के ढेर लगा दिए। संपूर्ण कक्ष को दीपकों की माला से प्रज्वलित कर दिया, जिससे वहां ऐसा दिव्य प्रकाश फैल गया कि अंधकार का नामोनिशान न रहा।

वधू ने अपने पति को शयन करने से रोक दिया और स्वयं पूरी रात उसे मधुर स्वर में पौराणिक कथाएं और धर्म के भजन सुनाने लगी। मध्यरात्रि में जब साक्षात यमराज सर्प का भयंकर रूप धारण करके राजकुमार को डसने आए, तो हीरों, सोने-चांदी के आभूषणों और प्रज्वलित दीपकों के चकाचौंध प्रकाश से उनकी आंखें चौंधिया गईं। सर्प रूपी यमराज भीतर प्रवेश नहीं कर सके और आभूषणों की ढेरी पर ही बैठ गए।

पूरी रात यमराज उस पतिव्रता कन्या के मधुर भजनों और कथाओं को मुग्ध होकर सुनते रहे। प्रातः काल हुआ और राजकुमार की मृत्यु की निर्धारित घड़ी व्यतीत हो गई। यमराज बिना प्राण लिए शांत भाव से यमलोक लौट गए। इस प्रकार उस पतिव्रता वधू ने दीपकों और स्वर्ण के तेज से अपने पति को अकाल मृत्यु से मुक्त करा लिया। तभी से कार्तिक त्रयोदशी को ‘धनतेरस’ के रूप में दीप प्रज्वलन और धातु क्रय की परंपरा प्रारंभ हुई।

🛠️ धनतेरस संध्या पूजन की संपूर्ण प्रामाणिक विधि

सायं 05:58 से 07:54 (स्थिर वृषभ लग्न) के मध्य पूजा आरंभ करें:

  • चौकी स्थापन: ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में लकड़ी की चौकी पर लाल अथवा पीला वस्त्र बिछाएं। उस पर भगवान गणेश, मां महालक्ष्मी, भगवान धन्वन्तरि और कुबेर यंत्र/प्रतिमा स्थापित करें।
  • अभिषेक व पूजन: सर्वप्रथम गणपति जी का पूजन करें। इसके उपरांत भगवान धन्वन्तरि को पीले पुष्प, पीत चंदन, मौली, जनेऊ और तुलसी दल अर्पित करें।
  • नैवेद्य अर्पण: भगवान धन्वन्तरि को खीर, बताशे और औषधीय फल अर्पित करें। कुबेर जी को धनिया की पंजीरी व श्वेत मिष्ठान्न का भोग लगाएं।
  • 13 दीपकों का विधान: पूजा में कुल 13 मिट्टी के दीपक प्रज्वलित किए जाते हैं। इनमें से 1 दीपक यमराज के लिए मुख्य द्वार पर, 1 तुलसी जी के पास, 1 तिजोरी के पास और शेष दीपक घर के विभिन्न कोनों व छत पर रखे जाते हैं।
  • आरती व क्षमा-प्रार्थना: श्री धन्वन्तरि अमृतवाणी, कुबेर आरती और महालक्ष्मी आरती करें तथा घर में सुख, शांति व निरोगता की प्रार्थना करें।

💬 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Google FAQs)

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न प्रामाणिक शास्त्रीय उत्तर
क्या 7 नवंबर को धनतेरस की खरीदारी हो सकती है? 07 नवंबर को त्रयोदशी केवल सुबह 10:43 बजे तक ही है। धनतेरस का मुख्य पर्व, संध्या पूजा और यम दीपदान 06 नवंबर को ही मान्य है। यदि कोई अत्यंत विवशता में 7 नवंबर को खरीदारी करना चाहे, तो उसे सुबह 10:43 से पूर्व ही संपन्न करना होगा।
धनतेरस पर खरीदी गई झाड़ू का क्या करें? झाड़ू पर सफेद धागा या मौली बांधकर उस पर कुमकुम लगाएं। धनतेरस की रात इसका प्रयोग न करें। दीपावली की सुबह इस नई झाड़ू से घर की सफाई आरंभ करें, इससे दरिद्रता दूर होती है।
साबुत धनिया का क्या महत्व है? धनिया ‘धन’ का प्रतीक है। धनतेरस पर सूखा खड़ा धनिया खरीदकर लक्ष्मी पूजन में रखें। दीपावली पूजन के बाद थोड़े बीज गमले में बो दें और शेष बीज लाल कपड़े में बांधकर अपनी तिजोरी में रखें।
यम का दीपक घर के अंदर क्यों नहीं रखा जाता? यमराज मृत्यु और संहार के अधिपति हैं। उनका दीपक घर की दहलीज से बाहर दक्षिण दिशा में इसलिए रखा जाता है ताकि नकारात्मक ऊर्जा और अकाल मृत्यु की छाया घर की चौखट के बाहर ही विसर्जित हो जाए।

निष्कर्ष: धनतेरस 2026 केवल धन संचय का पर्व नहीं, अपितु जीवन के सर्वोत्तम धन ‘आरोग्य’ और ‘अभय’ को प्राप्त करने का पावन दिन है। 06 नवंबर 2026 को स्थिर वृषभ लग्न (सायं 05:58 से 07:54) में किया गया धन्वन्तरि व कुबेर पूजन तथा यम दीपदान आपके कुल को वर्ष भर निरोगी, सुरक्षित और ऐश्वर्यवान बनाए रखने में समर्थ है।

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