सनातन धर्म में पांच दिवसीय दीपोत्सव का द्वितीय दिवस ‘नरक चतुर्दशी’, ‘रूप चौदस’, ‘छोटी दीपावली’ तथा ‘श्री हनुमान जन्मोत्सव’ के परम पावन पर्व के रूप में मनाया जाता है। यह पावन तिथि सौंदर्य, आरोग्यता, यम-भय निवारण और अष्टसिद्धि-नवनिधि के दाता संकटमोचन हनुमान जी की कृपा प्राप्ति का दिव्य महापर्व है। वर्ष 2026 में यह महापर्व 07 नवंबर 2026 (शनिवार) को चित्रा नक्षत्र, प्रीति योग, कन्या राशि के चंद्रमा और सांध्यकालीन मेष लग्न के दुर्लभ महासंयोग में मनाया जाएगा।
Astrology Sutras (ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी) के इस विशेष शोधपरक आलेख में हम निर्णय सिन्धु, मुहूर्त चिन्तामणि, स्कन्द पुराण, अगस्त्य संहिता और वाल्मीकि रामायण के अकाट्य प्रमाणों के आलोक में जानेंगे तिथि का यथार्थ, प्रदोष व मेष लग्न में हनुमान पूजा का महामुहूर्त, 14 दीपकों से यम दीपदान, भोर में अभ्यंग स्नान का रहस्य और हनुमान जी की सिंदूर-चोला अर्पण सहित संपूर्ण शास्त्रोक्त पूजन विधि।
💡 7 या 8 नवंबर: तिथि निर्णय, हनुमान जन्मोत्सव एवं स्नान का शास्त्रोक्त समन्वय
ऋषिकेश पंचांग (काशी मान) के अनुसार कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी तिथि 07 नवंबर 2026 को दिन में 10:43 बजे प्रारंभ होगी और 08 नवंबर 2026 को दिन में 10:51 बजे समाप्त होगी।
- प्रदोष व निशीथ व्यापिनी (07 नवंबर): निर्णय सिन्धु एवं अगस्त्य संहिता के अनुसार हनुमान जी का प्राकट्य कार्तिक चतुर्दशी के सांध्य/रात्रि काल में हुआ था तथा यम दीपदान भी प्रदोष काल में किया जाता है। 07 नवंबर को प्रदोष काल, मेष लग्न और मध्यरात्रि में पूर्ण चतुर्दशी विद्यमान है, अतः हनुमान जन्मोत्सव, यम दीपदान व 14 दीपकों का पूजन 07 नवंबर (शनिवार) को ही होगा।
- अरुणोदय अभ्यंग स्नान (08 नवंबर की भोर): धर्मसिन्धु के अनुसार तैलाभ्यंग स्नान सूर्योदय पूर्व चतुर्दशी में किया जाता है। 08 नवंबर की भोर (अरुणोदय काल 05:00 से 06:31 AM) में चतुर्दशी तिथि विद्यमान रहेगी, अतः पवित्र अभ्यंग स्नान व यम तर्पण 08 नवंबर की प्रातः काल संपन्न किया जाएगा।
सूक्ष्म पंचांग विवरण (ऋषिकेश पंचांग, काशी अनुसार)
07 नवंबर 2026 का सुनिश्चित गणितीय पंचांग मान निम्नलिखित है:
⏰ पूजन, दीपदान एवं अभ्यंग स्नान के सर्वश्रेष्ठ शुभ मुहूर्त
07 नवंबर 2026 को हनुमान जन्मोत्सव पूजन और यम दीपदान हेतु विभिन्न कालों के प्रामाणिक मुहूर्त निम्नलिखित हैं:
📜 शास्त्रों के अनुसार प्रमाण: श्लोक, ध्यान व अर्घ्य मंत्र
कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी पर हनुमान जन्मोत्सव, अभ्यंग स्नान और यम दीपदान के शास्त्रीय श्लोक निम्नलिखित हैं:
🚩 कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी: श्री हनुमान जन्मोत्सव का रहस्य
उत्तर भारत में चैत्र पूर्णिमा के अतिरिक्त कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को श्री हनुमान जन्मोत्सव मनाने की सुदीर्घ परंपरा है। वाल्मीकि रामायण एवं अगस्त्य संहिता के अनुसार जब भगवान सूर्यदेव के तेज और भगवान शिव के एकादश रुद्रावतार के रूप में पवनपुत्र का अवतरण हुआ, तब वह बेला कार्तिक चतुर्दशी की ही थी। इस दिन शनिवार का होना सोने पर सुहागा है, क्योंकि शनिवार स्वयं पवनपुत्र और शनिदेव की संयुक्त कृपा का दिन है। इस दिन सिंदूर और चमेली के तेल का लेपन करने से जातक की कुंडली के समस्त ग्रह दोष (विशेषकर शनि, मंगल व राहु की पीड़ा) तत्काल शांत हो जाते हैं।
🛠️ श्री हनुमान जी की संपूर्ण प्रामाणिक पूजन एवं चोला अर्पण विधि
सायं 05:29 से 06:02 के मध्य (मेष लग्न व प्रदोष काल) लाल वस्त्र धारण कर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशासन पर बैठें:
- संकल्प: हाथ में जल, अक्षत, पुष्प और सिक्का लेकर संकल्प करें—“मम सकल-संकट-निवारणार्थं श्रीसीताराम-प्रीत्यर्थं च श्रीहनुमत्पूजनमहं करिष्ये।”
- पवित्र स्नान व आसन: श्री हनुमान जी की प्रतिमा या चित्र को गंगाजल मिश्रित जल से स्नान कराएं।
- सिंदूर व चमेली का चोला: चमेली के शुद्ध तेल में शुद्ध नारंगी सिंदूर घोलें। सर्वप्रथम भगवान के चरणों में अनामिका उंगली से सिंदूर अर्पित करें, तदुपरांत संपूर्ण विग्रह पर चोला चढ़ाएं। इसके ऊपर चांदी का वर्क अर्पित करें।
- जनेऊ व वस्त्र: हनुमान जी को लाल लंगोट अथवा पीला वस्त्र एवं शुद्ध सूत का जनेऊ (यज्ञोपवीत) धारण कराएं।
- आक व तुलसी माला: 108 आक (मदार) के पुष्पों अथवा तुलसी पत्तों पर लाल चंदन से ‘श्रीराम’ लिखकर उसकी माला हनुमान जी के गले में पहनाएं।
- दिव्य नैवेद्य: शुद्ध घी में बनी बेसन की बूंदी, बूंदी के लड्डू, रोट और बनारसी मीठा पान (गुलकंद, सौंफ, कत्था युक्त, बिना चूना-सुपारी) का भोग लगाएं।
- स्तोत्र पाठ: चमेली के तेल का पंचमुखी दीपक जलाकर श्री हनुमान चालीसा, बजरंग बाण अथवा सुंदरकांड का सस्वर पाठ करें।
- आरती: कर्पूर अथवा घृत के दीप से “आरती कीजै हनुमान लला की…” गाकर आरती उतारें और परिवार सहित प्रसाद ग्रहण करें।
🪔 नरक चतुर्दशी के 4 प्रमुख शास्त्रोक्त कृत्य
📖 नरकासुर वध की पौराणिक कथा: श्रीकृष्ण और सत्यभामा का पराक्रम
प्रागज्योतिषपुर का असुर राजा नरकासुर ब्रह्मा जी के वरदान से अहंकारी हो गया था। उसने देवमाता अदिति के दिव्य कुंडल छीन लिए और इंद्र का छत्र हरण कर लिया। इतना ही नहीं, उसने देवताओं, गंधर्वों और ऋषियों की 16,100 रूपवती कन्याओं को बंदी बनाकर कारागार में डाल दिया था। देवताओं के त्राहिमाम करने पर भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी पटरानी सत्यभामा के साथ गरुड़ पर सवार होकर नरकासुर पर आक्रमण किया।
चूँकि नरकासुर को पृथ्वी माता के अंश से उत्पन्न स्त्री के हाथों मृत्यु का वरदान था, अतः भगवान श्रीकृष्ण ने देवी सत्यभामा (जो भूदेवी का अवतार थीं) को सारथी बनाकर युद्ध कराया। कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी के दिन सत्यभामा के सहयोग से भगवान श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र से दुष्ट नरकासुर का वध किया और सभी 16,100 कन्याओं को बंधनमुक्त कराया।
असुर के रक्त और कालिख को धोने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने भोर में तेल से स्नान (अभ्यंग स्नान) किया। नरकासुर के वध की प्रसन्नता में ब्रजवासियों और नगरवासियों ने असंख्य दीप प्रज्वलित कर विजयोत्सव मनाया। इसी स्मृति में कार्तिक चतुर्दशी को ‘नरक निवारण चतुर्दशी’ कहा जाता है।
⚠️ क्या करें और क्या न करें: शास्त्रोक्त नियम
💬 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Google FAQs)
निष्कर्ष: नरक चतुर्दशी 2026 तन के सौंदर्य, मन की शुद्धि और आत्मिक अभय का पावन संगम है। 07 नवंबर को प्रदोष काल व मेष लग्न में की गई हनुमान जी की आराधना और यम दीपदान आपके परिवार को समस्त भय, रोग और बाधाओं से मुक्त कर चिरंजीवी सुख प्रदान करता है।
