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ज्योतिष के 7 सरल व प्रमाणित सूत्र

ज्योतिष के 7 सरल व प्रमाणित सूत्र

 

ज्योतिष के सरल व प्रमाणित सूत्र
ज्योतिष के सरल व प्रमाणित सूत्र

 

आप सभी को राम-राम आज मैं आप सभी को ज्योतिष के 7 ऐसे सूत्र बताने जा रहा हूँ जो बहुत ही सरल व प्रमाणित हैं और ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुभव में भी यह सूत्र शत-प्रतिशत सत्य प्रमाणित हुए हैं तो चलिए जानते हैं उन सूत्रों के बारे में:-

 

१. यदि लग्न कुंडली के प्रथम भाव का स्वामी द्वितीय भाव में हो व द्वितीय भाव का स्वामी एकादश भाव में हो साथ ही एकादश भाव का स्वामी लग्न में हो तो महालक्ष्मी योग बनता है इस योग में जन्मे व्यक्ति को कभी धन की कमी नही रहती अर्थात ऐसे व्यक्ति अत्यंत धनी होते हैं।

२. यदि गोचरवश शनि पंचम भाव में आ जाएं तो यह साढ़ेसाती व ढैया से भी अधिक कष्टकारी फल देने वाले होते हैं।

३. यदि पंचम व नवम भाव के स्वामी सप्तम भाव में हो और सप्तम भाव का स्वामी केंद्र में कहीं भी बैठा हो तो ऐसे व्यक्तियों का भाग्योदय बाल्यकाल में ही हो जाता है।

४. यदि लग्न कुंडली के द्वितीय भाव में सूर्य स्थित हो और उसको शनि देखता हो तो ऐसी स्थिति में व्यक्ति को आर्थिक रूप से कड़ा संघर्ष करना पड़ता है।

५. यदि लग्न कुंडली के तृतीय, षष्ठ व एकादश भाव में शनि स्थित हो तो व्यक्ति जीवन के प्रारंभिक भाग अर्थात 36 वर्ष की आयु तक कड़ा संघर्ष करते हैं किंतु उत्तरार्ध में अत्यंत धनी होते हैं।

६. यदि गोचरवश शनि तृतीय, षष्ठ व एकादश भाव में आ जाएं तो कुछ परिवर्तन (नौकरी/स्थान) के साथ अच्छी उन्नति होती है।

७. यदि पंचम का स्वामी सप्तम में हो, सप्तम का स्वामी नवम में हो और नवम का स्वामी एकादश भाव में हो तो ऐसे व्यक्तियों का भाग्योदय विवाह उपरांत होता है व ऐसे व्यक्तियों की संतान जब इनके कार्य मे सहयोग करती है तो ऐसे व्यक्तियों के कार्यक्षेत्र में निश्चय ही वृद्धि होती है।

जय श्री राम।
Astrologer:- Pooshark Jetly
Astrology Sutras (Astro Walk Of Hope)
Mobile:- 7007245896, 9919367470
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पौराणिक कथाएं

खाटूश्याम मंदिर की स्थापना कब और कहाँ हुई:—-Astrology Sutras

खाटूश्याम मंदिर की स्थापना कब और कहाँ हुई:—-Astrology Sutras

 

 

माहाभारत ग्रंथ के अनुसार बर्बरीक जो कि अतिबलशाली भीम के पौत्र व घटोत्कच और मोरवी के पुत्र थे, बचपन से ही उनमें एक विलक्षण शक्ति थी तथा इन्होंने युद्ध कला अपनी माता तथा श्री कृष्ण से सीखा था, बर्बरीक ने माता की आज्ञा अनुसार नव दुर्गा की घोर तपस्या की व उनको प्रसन्न कर तीन अमोघ बाण प्राप्त किए जो कि कभी विफल नही हो सकते थे इस प्रकार बर्बरीक “तीन बाणधारी” के नाम से प्रसिद्ध हुए।

 

महाभारत युद्ध के समय बर्बरीक की भी युद्ध में सम्मिलित होने की प्रवल इच्छा जागृत हुई व उन्होंने अपनी माता को वचन दिया कि जो भी पक्ष निर्बल होगा मैं उसकी तरफ से युद्ध करूँगा और नीले घोड़े पर सवार होकर कुरुक्षेत्र की रणभूमि की तरफ चल दिए उस समय श्री कृष्ण ध्यान में लीन थे और उन्होंने अपने योग विद्या से जब यह देखा तो ब्राह्मण रूप धारण कर के बर्बरीक के समक्ष पहुँच कर उन्हें रोक कर उनसे कुरुक्षेत्र की रणभूमि की तरफ जाने का कारण पूछा व बर्बरीक द्वारा यह बताए जाने पर कि वह युद्ध में भाग लेने जा रहे हैं उनकी हँसी उड़ाई और कहा कि केवल यह तीन बाण के साथ आप युद्ध कैसे कर सकेंगे इस पर बर्बरीक ने उत्तर दिया कि उनका एक बाण ही समस्त शत्रुओं का नाश करने के लिए काफी है और शत्रुओं का दमन करने के बाद उनका बाण वापस उनके तुणीर में आ जाएगा और यदि वह इन तीनों बाणों का एक साथ संघान किया तो तीनों बाणों की विध्वंसक शक्ति से समस्त ब्रह्मांड की नाश हो जाएगा, यह जानकर श्री कृष्ण जी ने उन्हें चुनौती दी कि इस पीपल वृक्ष के सभी सूखे पत्तों को भेद कर दिखाओ किंतु वही पत्ते भेदना है जो सूखे हों या उनमें छिद्र हो बर्बरीक ने श्री कृष्ण की चुनौती को स्वीकार किया और अपने एक ही बाण से उस पीपल वृक्ष के सभी सूखे व छिद्रित पत्तों को भेद दिया तत्पश्चात वह बाण श्री कृष्ण के चरणों के पास जाकर रुक गया तब बर्बरीक ने श्री कृष्ण जी से निवेदन किया कि एक पत्ता आपके पैर के नीचे बचा हुआ है अतः आप अपना पैर हटा लें अन्यथा यह बाण आपके पैर पर घात कर देगा क्योंकि दुर्गा जी से प्राप्त बरदान के अनुसार उनका कोई बाण लक्ष्य भेदे बिना वापस नही आता तब भी श्री कृष्ण जी के पैर न हटाने पर माँ दुर्गा प्रकट हुई व श्री कृष्ण जी से प्राथना की कि उनके वरदान की लाज रखने हेतु अपना पैर हटा लें तब श्री कृष्ण जी ने अपना पैर जैसे ही हटाया उस बाण ने उस बचे हुए पत्ते को भी भेद दिया तत्पश्चात श्री कृष्ण जी ने दुर्गा जी को यह वचन दिया कि उनके पैर का निचला हिस्सा आज से उनके शरीर का सबसे कमजोर भाग होगा तथा यही भाग उनके इस शरीर को त्याग कर परमधाम लौटने का कारण बनेगा।

 

 

 

श्री कृष्ण जी इस बात को भली-भांति जानते थे इस महायुद्ध में कौरवों की हार निश्चित है और यदि बर्बरीक को न रोका गया तो यह युद्ध अधर्म के विजय का कारण बन सकता है अतः ब्राह्मण रूपी श्रीं कृष्ण जी ने बर्बरीक से दान माँगने की इच्छा रखी तो बर्बरीक ने उन्हें दान देने का वचन देते हुए दान माँगने को कहा तब श्री कृष्ण जी ने दान रूप में बर्बरीक से उनका शीश माँगा इस पर बर्बरीक चिंतन में पड़ गए और श्री कृष्ण जी के उनकी चिंता का कारण पूछने पर उन्होंने श्री कृष्ण जी से कहा कि मेरी इस युद्ध के साक्षी बनने की प्रवल इच्छा थी इस पर श्री कृष्ण जी ब्राह्मण रूप को त्याग कर अपने वास्तविक रूप में आ गए और बर्बरीक को समझाते हुए कहा कि इस महायुद्ध में धर्म के विजय हेतु तुम्हारे शीश का दान अनिर्वाय है तथा श्री कृष्ण जी ने बर्बरीक को आशीर्वाद दिया कि उनका यह दान अनंत काल तक याद रखा जाएगा तथा उनकी इस महायुद्ध को देखने की इच्छा भी जरूर पूरी होगी इस आशीर्वाद को प्राप्त कर बर्बरीक अत्यंत प्रसन्न हुए व अपना शीश श्री कृष्ण के चरणों में अर्पित कर दिया तत्पश्चात श्री कृष्ण जी ने उनके शीश को युद्धभूमि के समीप एक पर्वत पर स्थापित कर दिया जहाँ से बर्बरीक इस महाभारत युद्ध के प्रत्यक्ष साक्षी बनें।

 

महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद पांडवों में अहंकार की उत्पत्ति देखकर श्री कृष्ण जी मुस्कुराए और पांडवों को उस पर्वत पर ले गए जहाँ “महादानी” बर्बरीक का शीश स्थित था व उन्होंने बर्बरीक से निवेदन किया कि वह ही निर्णय लें कि पाँचों पांडव में से इस युद्ध के विजय का श्रेय किसको देना चाहिए इस पर बर्बरीक खूब हँसे और बोले कि कौन पांडव मैंने तो कुरुक्षेत्र में केवल श्री कृष्ण जी और उनके सुदर्शन चक्र को ही देखा श्री कृष्ण जी ने अकेले ही समस्त अधर्मियों का अंत किया अतः इस युद्ध में विजय श्री कृष्ण की ही हुई है इस बात से श्री कृष्ण जी प्रसन्न होकर बर्बरीक को आशीर्वाद देते हैं कि आज से तुम “श्याम” नाम से जाने जाओगे क्योंकि जो हारे का सहारा हो वही “श्याम” है अतः कलयुग में सभी लोग तुम्हारी मेरे नाम “श्याम” से पूजा करेंगे व जो भक्त तुम्हारी पूजा करेगा उसके सारे कष्ट दूर होंगे व उन्हें हर कार्य में सफलता प्राप्त होगी।

 

 

 

 

बर्बरीक के खाटूश्याम नाम का रहस्य:-

 

बर्बरीक का शीश श्री कृष्ण जी द्वारा  “खाटू नगर” के पर्वत पर स्थित किया गया था जिस कारण से उन्हें खाटूश्याम के नाम से भी जाना जाता है।

 

क्यों की जाती है खाटूश्याम की पूजा:-

 

स्कंद पुराण के अनुसार:-

 

तत्सतथेती तं प्राह केशवो देवसंसदि।

शिरस्ते पूजयिषयन्ति देव्या: पूज्यो भविष्यसि।।

(स्कंद पुराण, कौ. ख. ६६.६५)

 

भावार्थ:- हे वीर! ठीक है तुम्हारे शीश की पूजा होगी और तुम देवरूप में पूजित होकर प्रिसिद्धि को प्राप्त करोगे।

 

खाटूश्याम जी का यह मंदिर राजस्थान राज्य के सीकर जिले में स्थित है तथा इनके प्रमुख देवता श्री कृष्ण जी और प्रमुख उत्सव फाल्गुन महोत्सव है इनके अन्य नाम खाटू नरेश, मोर्विनंदन व मोरछड़ी धारक है, मोर पंखों से बनी छड़ी को हमेशा अपने पास रखने के कारण से इनका नाम मोरछड़ी कहलाया।

 

जय श्री राम।

Astrologer:- Pooshark Jetly

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जून 2020: धनु लग्न व धनु राशि वालों के लिए कैसा रहेगा

जून 2020: धनु लग्न व धनु राशि वालों के लिए कैसा रहेगा

 

धनु लग्न
धनु लग्न मासिक गोचरफल

 

धनु लग्न व धनु राशि वालों के लिए जून 2020 अच्छा रहेगा माह के शुरुवात में सूर्य का छठे भाव से गोचर रहेगा अतः सरकारी अफसरों से व्यर्थ विवाद में न पड़ें, भाग्य का सहयोग प्राप्त होगा, शत्रुओं पर विजय प्राप्त होगी, यदि कोर्ट-कचहरी में कोई मामला चल रहा है तो उसमें विजय प्राप्त होगी, मामा पक्ष के किसी सदस्य के स्वास्थ्य में परेशानी संभव रहेगी 14 जून को सूर्य गोचर बदलकर आपके सप्तम भाव में आ जाएंगे फलस्वरूप बेरोजगारों को नौकरी प्राप्त होगी, जीवनसाथी के स्वभाव में तेजी अनुभव होगी, व्यर्थ के विवाद में पड़ने से बचें, माह के शुरुवात में शुक्र का छठे भाव से गोचर रहेगा जो कि वक्री अवस्था में गोचर करेंगे अतः महिलाओं के साथ व्यर्थ विवाद में न पड़ें, दवाइयों या शत्रुओं पर धन व्यय हो सकता है, स्वास्थ्य का ख्याल रखें, जिन्हें हार्मोन्स से जुड़ी समस्या हो व गर्भवती महिलाएं स्वास्थ्य का विशेष ख्याल रखें, माह के शुरुवात में बुध व राहुका सप्तम भाव से गोचर रहेगा फलस्वरूप विवाह के योग बनेंगे, यदि आपके विवाह में बाधाएं आ रही है तो राहु के उपाय करें लाभ होगा, कार्यस्थल पर तनाव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है अतः तनाव लेने से बचें, मित्रों पर अधिक विश्वास करने से बचें, 18 जून को बुध वक्री होकर आपके सप्तम भाव से गोचर करेंगे अतः कार्यक्षेत्र से जुड़े निर्णय सोच-समझकर ही लें, जीवनसाथी की वाणी कटु रह सकती है, राजनीति से जुड़े लोगों के लिए यह माह अच्छा रहेगा, 21 जून को सूर्य ग्रहण है जो कि आपके लिए शुभ नही रहेगा अतः उस दिन यदि संभव हो तो यात्राओं को टालने का प्रयास करें।

 

धनु राशिफल
धनु राशिफल

 

माह के शुरुवात में गुरु व शनि आपके धन भाव अर्थात दूसरे भाव से गोचर कर नीचभंग राजयोग बनाएंगे किंतु दोनों ही ग्रह वक्री अवस्था में गोचर करेंगे अतः वाणी पर नियंत्रण रखें, धन लाभ के योग बनेंगे, माता के स्वास्थ्य में परेशानी संभव रहेगी, वाहन सावधानी चलाएं क्योंकि तीसरे भाव से गोचर कर रहे मंगल की चौथी दृष्टि छठे भाव रोग व शत्रु भाव पर रहेगी जहाँ सूर्य व शुक्र पहले से ही गोचर कर रहे हैं और शनि की भी सप्तम दृष्टि अष्टम भाव पर रहेगी अतः 18 जून तक एक्सीडेंट होने के योग बनेंगे, परिवार के साथ अच्छा समय बीतेगा, आय में उतार-चढ़ाव बना रहेगा, माह के शुरुवात में लग्न से केतु का गोचर रहेगा फलस्वरूप आध्यात्म की ओर झुकाव बड़ेगा, यदि आपकी कुंडली में केतु अच्छी स्थिति में है तो आत्मसम्मान में वृद्धि होगी, माह के शुरुवात में मंगल का तीसरे भाव से गोचर रहेगा अतः आवेश में आने से बचें, पराक्रम में वृद्धि होगी व मेहनत का पूर्ण फल भी प्राप्त होगा, पिता से वैचारिक मतभेद संभव रहेगा, यात्राओं के योग बनेंगे, 18 जून को मंगल गोचर बदलकर आपके चतुर्थ भाव में आ जाएंगे फलस्वरूप आय में वृद्धि के योग बनेंगे, बड़े भाई-बहन यदि हैं तो उनका सहयोग मिलेगा व उनकी उन्नति भी होगी, माह की 2, 8, 16, 23 व 29 तिथियों को अचानक धन लाभ के योग बनेंगे या कहीं से रुका हुआ पैसा मिल सकता है।

 

धनु राशिफल
धनु राशिफल

 

कुल मिलाकर धनु लग्न व धनु राशि वालों के लिए जून 2020 अच्छा रहेगा जिसमें विवाह के योग बनेंगे, बेरोजगारों को नौकरी प्राप्त होगी, अचानक धन लाभ के योग बनेंगे, आध्यात्म की ओर झुकाव बड़ेगा, आत्मसम्मान में वृद्धि होगी, वाहन सावधानी से चलाएं, वाणी पर नियंत्रण रखें व व्यर्थ के विवाद में न पड़ें, तनाव लेने से बचें, माह की 4, 5, 6,व 18, 19, 20, 21, 23 व 24 तिथियों पर विशेष सावधानी बरतें, मेरे अनुसार यदि धनु लग्न व धनु राशि वाले व्यक्ति यदि अमावस्या के दिन विष्णु सहस्रनाम का पाठ कर नारियल को बहते पानी में प्रवाहित करें व व गणेश संकटनाशन स्तोत्र का नित्य पाठ करें तो लाभ होगा।

 

जय श्री राम।

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मई 2020: कन्या लग्न व कन्या राशि वालों के लिए कैसा रहेगा

मई 2020: कन्या लग्न व कन्या राशि वालों के लिए कैसा रहेगा

 

कन्या लग्न
कन्या लग्न कुंडली

 

कन्या लग्नकन्या राशि वालों के लिए मई 2020 अच्छा रहेगा माह की शुरुवात में सूर्यबुध का गोचर अष्टम भाव से रहेगा सूर्य का अष्टम भाव से उच्च राशि का गोचर विपरीत राजयोग बनाएगा जिस कारण से अचानक कोई सफलता प्राप्त होने के योग बनेंगे, व्यर्थ की यात्राओं को टालने का प्रयास करें, जीवनसाथी के स्वास्थ्य में परेशानी संभव रहेगी अतः उनके स्वास्थ्य का ख्याल रखें, अष्टम भाव जीवनसाथी के वाणी का भी भाव है अतः उनके वाणी में कुछ तेजी रहेगी साथ ही अष्टम भाव आपके ससुराल अर्थात जीवनसाथी के परिवार को दर्शाता है जहाँ से सूर्य का गोचर उनसे विवाद करा सकता है अतः तनाव लेने से बचें, माह के शुरुवात में बुध का भी अष्टम भाव से गोचर रहेगा जिस कारण से आपके स्वास्थ्य में परेशानी व तनाव बना रह सकता है 9 मई को बुध गोचर बदलकर आपके भाग्य स्थान में आ जाएंगे फलस्वरूप मान-प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी, भाग्य का सहयोग मिलेगा, धार्मिक कार्यों में रुचि बढ़ेगी 14 मई को सूर्य भी गोचर बदलकर आपके नवम भाव अर्थात भाग्य स्थान में आ जाएंगे फलस्वरूप धार्मिक कार्यों में धन व्यय होगा, धार्मिक यात्रा के योग बनेंगे, पिता के स्वास्थ्य का ख्याल रखें, छोटे भाई-बहन की उन्नति होगी 24 मई को बुध पुनः गोचर बदलकर आपके दशम भाव में आ जाएंगे फलस्वरूप उन्नति के नए मार्ग खुलेंगे, माता का सहयोग प्राप्त होगा, जिनका कार्य बैंक, फाइनेंस, टीचिंग से जुड़ा हुआ है उनके लिए बुध का यह गोचर बेहद शुभ रहेगा, मान-प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी।

 

कन्या राशिफल
कन्या राशिफल

 

माह के शुरुवात में शुक्र का भाग्य स्थान से गोचर रहेगा जो कि आपके लिए बेहद शुभ रहेगा अतः भाग्य की वृद्धि होगी, किसी महिला से धन लाभ होगा या किसी महिला के सहयोग से उन्नति के नए मार्ग खुलेंगे, आपके जीवनसाथी के यदि छोटे भाई-बहन हैं तो उनकी उन्नति होगी किन्तु उनके स्वास्थ्य में भी कुछ समस्या रह सकती है, कुटुंब का सहयोग प्राप्त होगा, आय में वृद्धि होगी, माह के शुरुवात में गुरु, मंगलशनि का पंचम भाव से गोचर रहेगा फलस्वरूप जो लोग विवाह योग्य हो गए हैं उनके विवाह के लिए कहीं बात चल सकती है, तकनीकी क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए भी यह समय काफी अच्छा रहेगा, संतान का सहयोग प्राप्त होगा व उनकी उन्नति होगी, जिनका विवाह हो गया है व संतान की चाह रखते हैं उनके लिए संतान प्राप्ति के योग बनेंगे 4 मई को मंगल गोचर बदलकर छठे भाव में आ जाएंगे अष्टम भाव के स्वामी का छठे भाव से गोचर स्वास्थ्य के लिहाज से बहुत अच्छा नही कहा जा सकता अतः अपने स्वास्थ्य का ख्याल रखें, जिन्हें रक्त जनित कोई समस्या हो तथा जिनकी उम्र 55-60 के ऊपर हो वह अपने स्वास्थ्य का विशेष ख्याल रखें, विपरीत परिस्थितियों से होते हुए अचानक बड़ी सफलता प्राप्त होगी, शत्रुओं पर विजय प्राप्त होगी, सरकारी कर्मचारियों से फालतू विवाद में न पड़ें, 14 मई से 17 जून तक वाहन सावधानी से चलाएं।

 

कन्या राशिफल
कन्या राशि

 

कुल मिलाकर कन्या लग्नकन्या राशि वालों के लिए मई 2020 अच्छा रहेगा जिसमें उन्नति के नए मार्ग खुलेंगे, यदि आप विवाह योग्य हो गए हैं तो विवाह के योग बनेंगे, तनाव लेने से बचें व व्यर्थ की यात्राओं को टालने का प्रयास करें, मान-प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी, किसी महिला से धन लाभ या महिला के सहयोग से उन्नति के नए मार्ग खुलेंगे, संतान की उन्नति होगी व संतान का सहयोग भी प्राप्त होगा, यदि आपका विवाह हो गया है व संतान की चाह रखते हैं तो संतान प्राप्ति के योग बनेंगे, वाहन सावधानी से चलाएं, जिनकी उम्र 55-60 के अधिक है और रक्त से जुड़ी समस्या है वह अपने स्वास्थ्य का विशेष ख्याल रखें, धार्मिक कार्यों में धन व्यय होगा, भाग्य का सहयोग प्राप्त होगा, फालतू विवाद में न पड़ें, माह की 2, 3, 11, 13, 14, 15, 21, 22, 23 व 28 तिथियों पर विशेष सावधानी बरतें, मेरे अनुसार यदि कन्या लग्नकन्या राशि वाले व्यक्ति यदि नित्य सुंदरकांड का पाठ करें व नित्य सूर्य को जल देकर आदित्य हिर्दय स्तोत्र का पाठ करें तो लाभ होगा।

 

जय श्री राम।

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चतुर्थ भाव में स्थित शनि का फल भाग २

चतुर्थ भाव में स्थित शनि का फल भाग २

 

चतुर्थ भाव में स्थित शनि का फल
चतुर्थ भाव में स्थित शनि का फल

 

चतुर्थ भाव में स्थित शनि के फल मैंने दो भागों में विभक्त किया था जिसके पहले भाग की link को मैं इस पोस्ट में उपलब्ध करा रहा हूँ साथ ही उसी विषय पर आगे चर्चा करते हुए शनि के चतुर्थ भाव में विभिन्न स्थितियों में स्थित होने के फल को विस्तार से समझाते हुए पूर्ण करता हूँ।

 

चतुर्थ भाव में स्थित शनि का फल भाग:-१ पढ़ने के लिए इस link पर जाएं:-

 

चतुर्थ भाव में स्थित शनि का फल भाग १

 

यदि उच्च राशि का शनि चतुर्थ भाव में स्थित हो जो कि केवल कर्क लग्न की कुंडली में ही संभव है तो ऐसे व्यक्ति दूसरों को अनुशासित करने में लगे रहते हैं कहने का आशय यह है कि ऐसे व्यक्तियों की चाह होती है कि उनके इच्छा अनुसार लोग कार्य करें ऋषि कश्यप का मत है कि ऐसे व्यक्ति पक्षियों को बंधन में रखने से सुखी होते हैं ऐसे व्यक्तियों को भूमि व वाहन सुख प्राप्त होता है साथ ही इनको बहुत मजबूत विचारों वाले जीवनसाथी की प्राप्ति होती है, यदि उच्च नवांश का शनि चतुर्थ भाव में हो तो ऐसे व्यक्ति माँसाहारी होते हैं तथा माँसाहार भोजन करने में इन्हें बहुत आनंद आता है।

 

यदि शुभ वर्ग का शनि चतुर्थ भाव में स्थित हो तो ऐसे व्यक्ति खेती से जुड़े कार्य से सुख की प्राप्ति करते हैं कहने का आशय यह है कि ऐसे व्यक्ति जहाँ कच्चे माल को बनाने या खरीदने-बेचने का कार्य होता हो वहाँ अधिक सफल होते हैं, यदि पाप वर्ग का शनि चतुर्थ भाव में हो तो ऐसे व्यक्ति नकारात्मक चीजों की ओर जल्दी आकर्षित होते हैं ऋषि कश्यप का मत है कि ऐसे व्यक्ति दोषों को अपनाकर सुख का अनुभव करते हैं अतः ऐसे व्यक्तियों को कोई भी निर्णय बहुत सोच समझकर लेना चाहिए।

 

चतुर्थ भाव में शनि
चतुर्थ भाव में शनि

 

यदि नीच राशि का शनि चतुर्थ भाव में स्थित हो जो कि मकर लग्न की कुंडली में ही संभव है तो ऐसे व्यक्ति अधिकांश समय अकेले रहना पसंद करते हैं व इन्हें भूमि और वाहन का उत्तम सुख प्राप्त होता है और ऐसे व्यक्तियों के जीवनसाथी उच्च पद पर नौकरी करते हैं, यदि नीच नवांश का शनि चतुर्थ भाव में स्थित हो तो ऐसे व्यक्ति बोलते कुछ व करते कुछ हैं कहने का आशय यह है कि ऐसे व्यक्ति वंचक होते हैं साथ ही ऐसे व्यक्ति लोगों की मदद कर के सुख को अनुभव करते हैं।

 

चतुर्थ भाव में स्थित शनि का फल भाग:-१ पढ़ने के लिए इस link पर जाएं:-

 

चतुर्थ भाव में स्थित शनि का फल भाग १

 

यदि चतुर्थ भाव में मित्र राशि का शनि स्थित हो तो ऐसे व्यक्तियों का कार्यस्थल पर अधिक मन लगता है व ऐसे व्यक्ति परिवार से अधिक अपने कार्य को महत्व देते हैं, यदि शत्रु राशि का शनि चतुर्थ भाव में स्थित हो तो ऐसे व्यक्ति दूसरों को ठगने से सुखी होते हैं कहने का आशय यह है कि ऐसे सभी कार्य जिसमें बुद्धि-विवेक द्वारा मुनाफा अधिक कमाया जा सकता है उन सभी कार्यों जैसे मार्केटिंग, बिज़नेस में अधिक सफल होते हैं।

 

यदि मित्र नवांश का शनि चतुर्थ भाव में स्थित हो तो ऐसे व्यक्तियों के घरेलू सुख में कुछ तनाव की स्थिति बनी रहती है साथ ही ऐसे व्यक्तियों को भूमि सुख अवश्य प्राप्त होता है, शत्रु नवांश का शनि चतुर्थ भाव हो तो ऐसे व्यक्ति जीवों को बेचकर सुखी होते हैं कहने का आशय यह है कि ऐसे व्यक्ति जीवों को बेचकर धनार्जन करते हैं अब आज के समय में dog cannel खोलना वगैरह इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।

 

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यदि वर्गोत्तम स्थिति का शनि चतुर्थ भाव में हो तो ऐसे व्यक्ति दूसरों को हानि पहुँचा कर सुख का अनुभव करते हैं कहने का आशय यह है कि ऐसे व्यक्ति कुछ इस तरह का कार्य करते हैं जिससे दूसरों को हानि या दुःख पहुँचे उदाहरण के तौर पर जैसे वकालत का कार्य क्योंकि इसमें व्यक्ति अपने पक्ष के व्यक्ति को विजय दिलवाकर उनसे सुख के साधन प्राप्त करता है किंतु उसके इस कृत्य से दूसरे पक्ष को कुछ हानि व दुःख पहुँचता है।

 

यदि स्वराशि शनि चतुर्थ भाव में हो जो कि तुलावृश्चिक लग्न की कुंडली में ही संभव है तो व्यक्ति रस पदार्थ बेचकर सुखी होता है कहने का आशय यह है कि ऐसा व्यक्ति कोई ऐसा कार्य करता है जिससे दूसरों को सुख की अनुभूति हो साथ ही ऐसे व्यक्तियों भूमि सुख निश्चय ही प्राप्त होता है, यदि तुला लग्न की कुंडली में शनि चतुर्थ भाव में हो तो अधिक लाभकारी होता है क्योंकि तुला लग्न की कुंडली में राजयोगकारक हो जाता है और दसवीं दृष्टि से लग्न को अपनी उच्च राशि में देखता है अतः तुला लग्न की कुंडली में चतुर्थ भाव में स्थित शनि व्यक्ति की मान-प्रतिष्ठा में वृद्धि करता है व बड़ी सफलता दिलवाता है वहीं वृश्चिक लग्न की कुंडली में चतुर्थ भाव में स्थित शनि दर्शाता है कि ऐसे व्यक्तियों की परिश्रम अधिक करना पड़ेगा क्योंकि शनि तीसरे भाव अर्थात पराक्रम भाव का भी स्वामी होता है साथ ही ऐसे व्यक्ति अत्यधिक परिश्रम कर के जीवन में बड़ी सफलता को प्राप्त करते हैं।

चतुर्थ भाव में स्थित शनि का फल भाग:-१ पढ़ने के लिए इस link पर जाएं:-

चतुर्थ भाव में स्थित शनि का फल भाग १

 

जय श्री राम।

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शादी से पहले कुंडली में ‘नाड़ी दोष’ क्यों है खतरनाक? (जानें मृत्यु योग का सच और अचूक परिहार)

नाड़ी दोष व उसका परिहार

नाड़ी दोष:-

कुंडली मिलान की प्रकिया में अष्ट कूट का मिलान किया है वह अष्ट कूट क्रमशः वर्ण, वश्य, तारा, योनी, ग्रह मैत्री, गण, भकूट और नाड़ी होते हैं इन अष्ट कूटों में प्रत्येक का अपना-अपना महत्व होता है, इस लेख में मैं नाड़ी पर चर्चा करता हूँ क्योंकि यह एक ऐसा विषय है जिसको अधिकतर लोग नजरअंदाज कर देते हैं जब कि नाड़ी न मिलने पर दामपत्य जीवन में अनेक प्रकार के दुष्प्रभाव देखने को मिलते हैं।

ज्योतिष ग्रंथों में नाड़ी तीन प्रकार की बताई गई है जो कि क्रमशः आदि नाड़ी, मध्य नाड़ी और अंत्य नाड़ी के नाम से जानी जाती है अब प्रश्न यह उठता है कि यह कैसे ज्ञात किया जाए कि किस व्यक्ति का जन्म किस नाड़ी में हुआ है अतः इस पर मैं विस्तार से वर्णन करता हूँ।

हमारे ज्योतिष शास्त्र में कुल 27 नक्षत्र होते हैं और प्रत्येक नाड़ी में 9 नक्षत्र आते हैं जिसका निर्धारण व्यक्ति के जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में स्थित हो उसके आधार पर किया जाता है जिन्हें मैं विस्तार से लिख रहा हूँ।

🚩 सनातन धर्म का अद्भुत रहस्य:

👉 यहाँ पढ़ें: नवरात्रि 9 दिन की ही क्यों होती है?

नाड़ियों में आने वाले नक्षत्र:-

नाड़ियों में 27 नक्षत्रों का विभाजन (आदि, मध्य, अंत्य) - Nakshatra in Nadi Astrology
आदि, मध्य और अंत्य नाड़ी में 27 नक्षत्रों का शास्त्र-सम्मत विभाजन।

१. आदि नाड़ी:-

अश्विनी, आद्रा, पुनर्वसु, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, ज्येष्ठा, मूल, शतभिषा और पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र में जन्म लेने पर आदि नाड़ी प्राप्त होती है।

२. मध्य नाड़ी:-

भरणी, मृगशिरा, पुष्य, पूर्वाफाल्गुनी, चित्रा, अनुराधा, पूर्वाषाढ़ा, घनिष्ठा और उत्तराभाद्रपद नक्षत्र में जन्म लेने पर मध्य नाड़ी प्राप्त होती है।

३. अंत्य नाड़ी:-

कृतिका, रोहिणी, श्लेषा, मघा, स्वाती, विशाखा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण और रेवती नक्षत्र में जन्म लेने पर अंत्य नाड़ी प्राप्त होती है।

नाड़ी दोष के परिहार:-

उक्त नाड़ी विचार में आदि व अंत्य नाड़ी में से कोई एक नाड़ी ही दोनों की हो तो कुछ विद्वानों का मत है कि रज्जूकूट अनुकूल हो, राशिकूट शुभ हो, दोनों का राशि स्वामी एक हो या दोनों राशियों में मैत्री हो तो नाड़ी दोष विशेष अनिष्टकारक नही होता है।

विशेष:-

मध्य नाड़ी एक हो तो पुरुष की मृत्यु तथा आदि अंत्य में स्त्री की मृत्यु होती है।

✨ कुंडली का एक और भयानक दोष:

👉 यहाँ पढ़ें: मंगल दोष के लक्षण और अचूक उपाय

नक्षत्रानुसार नाड़ी दोष परिहार:-

नक्षत्रानुसार नाड़ी दोष परिहार और अचूक उपाय - Nadi Dosh Cancellation Rules
विशिष्ट नक्षत्रों के संयोग से नाड़ी दोष का कट जाना (दोष परिहार)।
  • विशाखा, अनुराधा, घनिष्ठा, रेवती, हस्त, स्वाती, आद्रा, पूर्वाभाद्रपद इन 8 नक्षत्रों में से किसी भी नक्षत्र में वर, कन्या या दोनों में से एक का ही जन्म हो तो विवाह शुभ होता है अर्थात नाड़ी दोष का परिहार हो जाता है।
  • उत्तराभाद्रपद, रेवती, रोहिणी, विशाखा, आद्रा, श्रवण, पुष्य और मघा इन 8 नक्षत्रों में भी वर व कन्या का जन्म नक्षत्र पड़े तो नाड़ी दोष शांत हो जाता है, भरणी, मृगशिरा, शतभिषा, हस्त, पूर्वाषाढ़ा व श्लेषा इन नक्षत्रों में भी नाड़ी दोष नही रहता है।
  • वर व कन्या की एक राशि हो लेकिन जन्म नक्षत्र अलग हो या जन्म नक्षत्र एक हों व राशियां भिन्न-भिन्न हो तो नाड़ी दोष नही होता है, एक नक्षत्र में भी चरण भेद होने पर अत्यावश्यकता में विवाह किया जा सकता है।
  • कृतिका, रोहिणी, घनिष्ठा, शतभिषा, पुष्य, श्लेषा ये नक्षत्र एक ही राशि में पड़ते हैं, तब भी इन जोड़े नक्षत्रों में यदि वर व कन्या के नक्षत्र हो तो इन्हें छोड़ना चाहिए।
  • रोहिणी, आद्रा, मघा, विशाखा, पुष्य, श्रवण, रेवती, उत्तराभाद्रपद में से किसी एक नक्षत्र में ही दोनो का जन्म हो तब भी नाड़ी दोष नही रहता, नक्षत्र चरण भेद आवश्यक है।
नक्षत्रेक्ये पादभेदे शुभम् स्यात।।
पराशरः प्राह नवांशभेदादेकर्क्षराश्योरपि सौमनस्यम्।।
एकक्षै चैकपादे च विवाह: प्राणहानिद:।।
दम्पत्योरेकपादे तु वर्षान्ते मरणं ध्रुवम्।।

अर्थात:-

चरण व नक्षत्र दोनों एक होने का फल मृत्यु है, नाड़ी कूट सर्व शिरोमणि प्रधान है, इसके गुण 8 माने जाते हैं।

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📌 FAQ: नाड़ी दोष से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: नाड़ी कितने प्रकार की होती है?

उत्तर: ज्योतिष शास्त्र के अनुसार नाड़ी तीन प्रकार की होती है— आदि नाड़ी, मध्य नाड़ी और अंत्य नाड़ी।

प्रश्न 2: नाड़ी दोष कब लगता है?

उत्तर: विवाह के समय कुंडली मिलान (अष्टकूट मिलान) में जब वर और कन्या दोनों की नाड़ी एक ही (समान) होती है, तब नाड़ी दोष लगता है।

प्रश्न 3: क्या एक नाड़ी होने पर विवाह किया जा सकता है?

उत्तर: यदि वर व कन्या की राशि एक हो लेकिन जन्म नक्षत्र अलग हो, या जन्म नक्षत्र एक हों व राशियां भिन्न-भिन्न हों, या नक्षत्र चरण में भेद हो, तो नाड़ी दोष का परिहार हो जाता है और विवाह संभव है।

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ग्रहों के कारकतत्व भाग १

ग्रहों के कारकतत्व भाग १

 

ग्रहों के कारकतत्व
ग्रहों के कारकतत्व

 

सूर्य:-

 

तांबा, सोना, पिता, धैर्य, शौर्य, आत्मा, प्रकाश, जंगल, मंदिर, हवन, उत्साह, शक्ति, पहाड़ में यात्रा, भगवान शिव से संबंधित कार्यों का कारक होता है।

 

चंद्र:-

 

अन्न, खेती, जल, गाय, माता का कुशल, फल, पुष्प, मोती, चांदी, वस्त्र, सफेद वस्तु, मुलायम वस्तु, यश, काँसा, दूध, दहीं, स्त्री प्राप्ति, सुखपूर्वक भोजन, रूप (सुंदरता) का कारक होता है।

 

मंगल:-

 

शारीरिक और मानसिक ताकत, पृथ्वी से उत्पन्न होने वाले पदार्थ, भाई-बहन के गुण, रण, साहस, रसोई की अग्नि, सोना, अस्त्र, चोर, शत्रु, उत्साह, दूसरे पुरुष की स्त्री में रति, मिथ्या भाषण, वीर्य (ताकत, पराक्रम), चित का उत्साह, उदारता, बहादुरी, चोट, सेनाधिपत्य का कारक होता है।

 

बुध:-

 

पांडित्य, बोलने की शक्ति, कला, निपुणता, विद्वानों द्वारा स्तुति, मामा, विद्या में बुद्धि का योग, यज्ञ, भगवान विष्णु से संबंधित धार्मिक कार्य, शिल्प, बन्धु, युवराज, मित्र, भांजा, भांजी, चतुरता आदि का कारक होता है।

 

गुरु:-

 

ज्ञान, अच्छे गुण, पुत्र, मंत्री, आचरण, चरित्र, आचार्यत्व (पढ़ाना या दीक्षा लेना), वेद शास्त्र, सदगति, देवताओं और ब्राह्मणों की भक्ति, यज्ञ, तपस्या, श्रद्धा, खजाना, विद्वता, सम्मान, दया, यदि किसी स्त्री की कुंडली हो तो उसके पति का विचार आदि का कारक गुरु होता है।

 

शुक्र:-

 

संपत्ति, सवारी, वस्त्र, भूषण, नाचने, गाने तथा बाजे के योग, सुगंधित पुष्प, रति (स्त्री-पुरुष प्रसंग), शैया (पलंग) और उससे संबंधित व्यापार, मकान, वैभव, विलास, विवाह या अन्य शुभ कर्म, उत्सव, यदि किसी पुरुष की कुंडली हो तो उसकी पत्नी का विचार आदि शुक्र के कारक होते हैं।

 

विशेष:-  वृहस्पति अर्थात गुरु पति का कारक और शुक्र पत्नी का कारक होता है, शुक्र स्त्री का कारक होने के नाते यह भी देखा जा सकता है कि उक्त जातक का स्त्रियों के साथ कैसे संबंध रहेगा।

 

शनि:-

 

आयु, मरण, भय, अपमान, पतन, बीमारी, दुख, दरिद्रता, बदनामी, पाप, मजदूरी, अपवित्रता, निंदा, मन का साफ न होना, मारने का सूतक, स्थिरता, भैस, आलस्य, कर्जा, लोहे की वस्तु, नौकरी, दासता, जेल जाना, खेती के साधन आदि शनि के कारक होते हैं।

 

शनि ग्रह से जुड़ी विस्तृत जानकारी व उनके सभी कारक तत्वों को जानने हेतु इस link पर जाएं।

शनि ग्रह से आखिर क्यों डरते हैं लोग, जाने शनि को– शनि ग्रह की सम्पूर्ण जानकारी:-

 

राहु:-

 

शोध करने की प्रवृ्ति, निष्ठुर वाणी युक्त, विदेश में जीवन, यात्रा, अकाल मृत्यु, इच्छाएं, त्वचा पर दाग, चर्म रोग, सरीसृ्प, सांप और सांप का जहर, विष, महामारी, अनैतिक महिला से संबन्ध, दादा, नानी, व्यर्थ के तर्क, भडकाऊ भाषण, बनावटीपन, विधवापन, दर्द और सूजन, डूबना, अंधेरा, दु:ख पहुंचाने वाले शब्द, निम्न जाति, दुष्ट स्त्री, जुआरी, विधर्मी, चालाकी, संक्रीण सोच, पीठ पीछे बुराई करने वाले, पाखण्डी।

 

केतु:-

 

शोध, निष्ठुर वाणी, चर्म रोग, अतिशूल, दु:ख, चण्डीश्वर, कुत्ता, वायु विकार, क्षयरोग , ब्रह्मज्ञान, संसार से विरक्त, गणेशादि देवताओं की उपासना और मोक्ष का कारक है।

 

सभी ग्रहों के विभिन्न राशियों में अलग-अलग चीजों के कारक होते हैं जिनको मैं आगे भाग में विस्तार से बतायूँगा।

 

जय श्री राम।

Astrologer:- Pooshark Jetly

Astrology Sutras (Astro Walk Of Hope)

Mobile:-9919367470