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महाशिवरात्रि 11 मार्च 2021 जानें पूजन विधि व शुभ मुहर्त
महाशिवरात्रि पूजन विधि व शुभ मुहर्त
शिव महापुराण के अनुसार फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को महाशिवरात्रि के नाम से जाना जाता है इसी दिन पुरुष (शिव) व प्रकृति (पार्वती) का साकार रूप में विवाह संपन्न हुआ था धर्म शास्त्रों में रात्रिकालीन विवाह मुहर्त को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है इसी कारण शिव जी का पार्वती जी का विवाह रात्रि में ही संपन्न हुआ था अतः फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को निशीथ काल में महाशिवरात्रि मनाई जाती है जो कि इस वर्ष ११ मार्च २०२१ को है।
महाशिवरात्रि का महत्व
महाशिवरात्रि का महत्व
शिवमहापुराण के अनुसार महाशिवरात्रि के दिन ही पुरुष अर्थात भगवान आशुतोष व प्रकृति अर्थात माता पार्वती का साकार रूप में विवाह संपन्न हुआ था इस दिन श्रद्धा भाव से शिव जी की पूजा करने से भगवान शिव जी की कृपा शीघ्र प्राप्त होती है तथा मनुष्य अपने सभी पापकर्मों से मुक्त होकर मृत्यु पश्चात भगवान आशुतोष के चरणों में स्थान प्राप्त करता है, पुराणों के अनुसार पूर्वजन्म में एक बार कुबेर ने अनजाने में ही महाशिवरात्रि के दिन भगवान आशुतोष की पूजा की थी जिससे प्रसन्न होकर शिव जी ने उन्हें अगले जन्म में देवताओं का कोषाध्यक्ष बनने का वरदान दिया था और शिव जी के वरदान से वह देवताओं के कोषाध्यक्ष बनें।
महाशिवरात्रि पूजन शुभ मुहर्त:-
महाशिवरात्रि शुभ मुहर्त
११ मार्च २०२१ को दिन के २ बजकर २१ मिनट पर चतुर्दशी तिथि लगेगी जो कि १२ मार्च २०२१ को दिन के २ बजकर २० मिनट तक रहेगी धर्मशास्त्रों में फाल्गुन कृष्ण, चतुर्दशी तिथि को निशीथ काल में महाशिवरात्रि पर्व मनाने का विधान है अतः इस वर्ष ११ मार्च २०२१ को महाशिवरात्रि पर्व मनाया जाएगा, इस दिन धनिष्ठा नक्षत्र रात के ९ बजकर २८ मिनट तक तदोपरान्त शतभिषा नक्षत्र और शिव योग दिन के ९ बजकर २८ मिनट तक तदोपरांत सिद्ध योग रहेगा तथा चंद्रमा दिन के ९ बजकर २० मिनट पर कुंभ राशि में प्रवेश करेंगे साथ ही इस दिन अभिजीत मुहर्त दिन के १२ बजकर २० मिनट से १ बजकर ०८ मिनट तक रहेगा अतः दिन के २ बजकर २१ मिनट बाद से संपूर्ण दिन-रात्रि शिव जी व पार्वती जी के पूजन हेतु शुभ रहेगा साथ ही शिव योग में और अभिजीत मुहर्त में भी पूजा की जा सकती है।
महाशिवरात्रि पूजन विधि:-
सुबह सूर्योदय से पूर्व उठकर नित्य क्रिया से निवृत्त होकर स्नानादि कर के भगवान शिव का जलाभिषेक व पंचामृत स्नान करना चाहिए तदोपरांत चंदन, भस्म, रोली, जौं, काला तिल, अक्षत शिवलिंग पर अर्पित करना चाहिए तथा जनेऊ, बड़ी सुपाड़ी, वस्त्र, इत्र, गुलाब के पुष्प, विल्वपत्र, दूर्वा, भांग व धतूरा अर्पित करना चाहिए उसके बाद नैवेध अर्पित कर शिव जी का पूजन करना चाहिए और आरती कर पूजा संपन्न करनी चाहिए, अभीष्ट लाभ हेतु रुद्राभिषेक, रुद्रार्चन कर सकते हैं।
प्रदोष व्रत में सूर्यास्त के बाद आशुतोष भगवान शिव जी का पूजन किया जाता है प्रत्येक मास की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत किया जाता है कर्ज मुक्ति के लिए भौम प्रदोष व्रत, शांति व सुरक्षा के लिए सोम प्रदोष व्रत, रोग-व्याधि-पीड़ा व अन्य उपद्रव के शांति हेतु रवि प्रदोष व्रत सर्वश्रेष्ठ माना गया है साथ ही जो व्यक्ति नियमित प्रदोष व्रत करते हैं भगवान शिव उनके सभी कष्टों को दूर करते हैं तथा व्यक्ति के मृत्यु उपरांत अपने चरण कमलों में स्थान देते हैं।
प्रदोष व्रत व पूजन विधि:-
प्रदोष व्रत व पूजन विधि
सुबह सूर्योदय से पूर्व उठकर नित्य क्रिया से निवृत्त होकर स्नानादि कर के भगवान शिव का जलाभिषेक व पंचामृत स्नान करना चाहिए तदोपरांत नैवेध का भोग लगाकर व्रत का संकल्प लेना चाहिए तथा व्रत के नियमों का पालन करते हुए फलाहार (फल व दूध) का सेवन करना चाहिए तथा प्रदोष काल में शिव जी का पूजन कर भोग लगाना चाहिए व प्रसाद का एक अंश गाय को खिलाकर प्रसाद ग्रहण करना चाहिए।
वास्तु शास्त्र के अनुसार कुबेर का निवास स्थान होती यह दिशा यहाँ नही होनी चाहिए यह 5 चीजें
इस दिशा में भूलकर भी नही होनी चाहिए यह 5 चीजें
वास्तु शास्त्र के अनुसार घर की प्रत्येक दिशा का अपना महत्व होता है, वास्तु शास्त्र के अनुसार उत्तर दिशा कुबेर की मानी गयी है तथा यह दिशा पूजा-पाठ के लिए सर्वोत्तम मानी गयी है जिस कारण से उत्तर दिशा का महत्व और भी बढ़ जाता है अतः 5 ऐसी चीजें हैं जिनके इस दिशा में होने से व्यक्ति के जीवन में अनेक प्रकार की परेशानियां आती है तो चलिए जानते हैं वह कौन सी ऐसी 5 चीजें हैं जिन्हें हमें उत्तर दिशा में नही रखना चाहिए।
१. घर की उत्तर दिशा कुबेर का स्थान मानी गयी है अतः इस दिशा में जूते-चप्पल इत्यादि नही रखने चाहिए क्योंकि उत्तर दिशा में जूते-चप्पल इत्यादि रखने से घर में नकारात्मक शक्ति का प्रभाव बहुत जल्दी होता है।
२. वास्तु शास्त्र के अनुसार घर के उत्तर दिशा में शौचालय का होना सबसे अधिक अशुभ माना गया है जिस घर के उत्तर दिशा में शौचालय होता है उस घर में देवी लक्ष्मी कभी वास नही करती तथा उस घर में सदैव दरिद्रता बनी रहती है।
३. वास्तु शास्त्र के अनुसार घर के उत्तर दिशा में कूड़ेदान का होना भी बेहद अशुभ माना गया है इससे घर में नकारात्मक ऊर्जा का संचार काफी तीव्रता से होता है।
४. वास्तु शास्त्र के अनुसार घर के उत्तर दिशा में फर्नीचर भारी मात्रा में नही रखना चाहिए क्योंकि भारी मात्रा में फर्नीचर होने से घर में सकारात्मक ऊर्जा के संचार में दिक्कतें आती हैं तथा घर में दरिद्रता का वास होने लगता है।
५. वास्तु शास्त्र के अनुसार घर के उत्तर दिशा में टूटे हुए सामान नही रखने चाहिए इससे भी घर में दरिद्रता का वास बना रहता है।
नोट:-
वास्तु शास्त्र के अनुसार घर के उत्तर दिशा में पूजा स्थल, तिजोरी व किताबों का होना शुभ होता है।
उपाय:-
यदि आपके घर की उत्तर दिशा में वास्तु दोष हो तो उसके निवारण हेतु नित्य पानी में नमक पोछा लगाना चाहिए इससे वास्तु दोष के प्रभाव में कमी आती है।
सीता अष्टमी 2021: इस प्रकार पूजन करने से होती है मनचाहे वर की प्राप्ति
सीता अष्टमी 2021
फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि सीता अष्टमी के रूप में मनाई जाती है पौराणिक कथाओं के अनुसार फाल्गुन मास की अष्टमी तिथि के दिन ही सीता माता धरती से प्रकट हुई थीं वर्ष २०२१ में सीता अष्टमी ६ मार्च को मनाई जाएगी, सीता अष्टमी के दिन सुहागन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु के लिए व्रत करती हैं ऐसी मान्यता है कि सीता अष्टमी का व्रत करने से दाम्पत्य जीवन की समस्याओं से मुक्ति मिलती है साथ ही जिन कन्याओं के विवाह में बाधाएं आ रही हो उन्हें भी यह व्रत अवश्य करना चाहिए जिससे उनके विवाह में आ रही बाधाएं दूर होती हैं तथा मनचाहे वर की प्राप्ति होती है।
पूजन शुभ मुहर्त:-
ऋषिकेश पंचांग काशी के अनुसार अष्टमी तिथि ५ मार्च २०२१की रात्रि ११:१६ से ६ मार्च २०२१ की रात्रि ०९:०२ तक रहेगी निर्णय सिंधु के अनुसार व्रत व पर्व उदया तिथि के अनुसार मनाना चाहिए अतः इस वर्ष सीता जयंती ६ मार्च २०२१ को मनाई जाएगी।
पूजन व व्रत विधि:-
प्रातः सूर्योदय के पूर्व नित्य क्रिया से निवृत्त होकर स्नानादि कर गणेश जी का पूजन करना चाहिए तदोपरांत भगवान श्री राम व सीता माँ की प्रतिमा के समक्ष व्रत का संकल्प लेकर व्रत का आरंभ करना चाहिए तत्पश्चात माँ गौरी व सीता जी को पीले पुष्प, पीले वस्त्र व पीले मीठे का भोग और १६ श्रृंगार का सामान अर्पित कर “ॐ रामाभ्यां नमः” मंत्र का जप करना चाहिए व सूर्यास्त के समय दुग्ध व गुड़ से बने पदार्थ का भोग लगाकर प्रसाद को दान करना चाहिए व प्रसाद से व्रत का पारण करना चाहिए।
योनि से जातक के बारह वर्ष के भीतर आयु का निश्चय नही हो सकता, क्योंकि माता-पिता के किये हुए कर्मों से बाल ग्रहों से बालक का नाश होता है।
जन्म से 12 वर्ष तक चार 2 वर्ष तीन जगह विभाग किया है, चार वर्ष तक का बालक माता के पाप से मरता है, उसके बाद आठ वर्ष तक पिता के पाप से मरता है और अंत के जो वर्ष हैं (आठवें के बाद 12 वर्ष तक) उसमें अपने पापों से मरता है।
जन्म से 8 वर्ष तक बालारिष्ट रहता है, उसके बाद 20वें वर्ष तक योगारिष्ट (दुष्ट ग्रहों से उत्पन्न) रहता है, 32वें वर्ष तक अल्पायु, 32 से 70 तक मध्यम आयु और 70 के बाद 100 तक पूर्ण आयु कही गयी है एवं 100 से 120 वर्ष तक परम आयु समझनी चाहिए।
आयु निर्धारण सूत्र
१. जन्म कुंडली में यदि चंद्रमा छठे, आठवें या बाहरवें भाव में रहकर सूर्य के अतिरिक्त पाप ग्रह (मंगल, शनि, राहु, केतु) से देखा जाता हो तो बृहस्पति के लग्न में रहने पर भी बालक मरता ही है, मतलब यह प्रवल अरिष्ट योग होता है।
२. लग्न से पांचवां व नौवां भाव पाप ग्रह की राशि हो उसमें सूर्यादि ग्रह हों तो क्रम से पिता, माता, भाई, मामा, नानी, नाना और बालक जल्द नष्ट होते हैं।
३. लग्न और चंद्रमा क्रूर ग्रह से दृष्ट हों तथा शुभ ग्रह से संबंध न रखते हों और यदि बृहस्पति लग्न में न हो तो बालक की माता की मृत्यु निश्चित होती है।
४. यदि सूर्य, चंद्रमा चतुर्थ स्थान में स्थित हों और शनि सप्तम में हो तो बालक के माता की मृत्यु होती है और यदि लग्न से छठे भाव में क्रूर ग्रह हो तो भाई का नाश होता है।
५. शनि के साथ चंद्रमा और सूर्य बाहरवें भाव में हो, मंगल चौथे भाव में हो तो बालक की माता गर्भ के साथ मरती है।
६. लग्न और चंद्रमा एक साथ या अलग-अलग शुभ ग्रह की दृष्टि से रहित हों या पाप ग्रह के मध्य में हो तो बालक की माता गर्भ के साथ मरती है।
७. छठे, बाहरवें और आठवें भाव में क्रूर ग्रह हों और इन स्थानों में शुभ ग्रह न हों तथा पाप ग्रह के मध्य में शुक्र व गुरु हों तो प्रसव होते ही स्त्री बालक सहित मरती है।
८. चंद्रमा से चौथे या दसवें भाव में पाप ग्रह हों तथा उनको शुभ ग्रह न देखते हों तो बालक की माता की मृत्यु होती है अथवा सूर्य से दसवां भाव पाप ग्रह से देखा जाता हो किन्तु शुभ ग्रह से न देखा जाता हो तो बालक की माता की मृत्यु होती है।
९. बली सूर्य शनि से दृष्ट या युत होकर तीसरे भाव में हो अथवा क्षीण चंद्रमा पाप ग्रह के साथ शुक्र से तीसरे भाव में हो तो प्रसव होते ही स्त्री बालक सहित मार जाती है।
१०. लग्न से आठवें भाव में सूर्य या मंगल पाप ग्रह हों और शुभ ग्रह से न देखे जाते हों साथ ही चंद्रमा कृष्ण पक्ष का हो तो उस बालक के माता की मृत्यु हो जाती है।
११. यदि दिन में जन्म हो शुक्र से सूर्य पांचवे या नौवें में हो और यदि रात्रि का जन्म हो तो चंद्रमा से शनि पांचवें या नौवें भाव में हो और उसे पाप ग्रह देखते हों और शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तथा चंद्रमा बल रहित हो तो बालक की माता की मृत्यु होती है।
माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि बसंत पंचमी के नाम से विख्यात है इस वर्ष माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि १५ फरवरीकी मध्य रात्रि २ बजकर ४५ मिनट से १६ फरवरी की मध्य रात्रि ४ बजकर ३४ मिनटतक रहेगी शास्त्रों में सूर्योदय व्याप्त तिथि के अनुसार पर्व मनाने का विधान है अतः इस वर्ष १६ फरवरी को बसंत पंचमी मनाई जाएगी।
शास्त्रों के अनुसार बसंत पंचमी को श्री पंचमी भी कहा जाता है इस दिन अबूझ मुहर्त होने के कारण से किसी भी मांगलिक कार्यक्रम को करने के साथ किसी नई वस्तु का क्रय या किसी नए कार्य का आरंभ भी किया जा सकता है बसंत पंचमी के दिन विद्या की देवी माता सरस्वती के पूजन का विधान है इस दिन माता सरस्वती की पूजा करने से अत्यंत शुभ फल की प्राप्ति होती है तथा जिन विद्यार्थियों की शिक्षा में अवरोध उत्पन्न हो रहे हों उन्हें बसंत पंचमी के दिन माता सरस्वती की विधि पूर्वक पूजा करनी चाहिए।
पूजा शुभ मुहर्त:-
बसंत पंचमी के दिन अबूझ मुहर्त रहने के कारण किसी भी समय माता सरस्वती की पूजा की जा सकती है।
१६ फरवरी का अति सूक्ष्म पंचांग:-
दिनमान:- २८:००
नक्षत्र:- रेवती ३४ घड़ी १९ पल अर्थात रात्रि ०८:०८ तक।
करण:- वव २३ घड़ी ०८ पल उपरांत वालव
चंद्र गोचर:- मीन रात्रि ०८:०७ तक मेष ०८:०८ से
सूर्योदय:- ०६:३४
सूर्यास्त:- ०५:३६
सूर्य औदयिक स्पष्ट:- ०३:१५:१२
सूर्य गोचर:- कुंभ राशि
चन्द्रास्त:- ०९:५८
उपरोक्त सभी विवरण “ऋषिकेश पंचांग (काशी)” अनुसार है।
१६ फरवरी विशेष:-
चंद्रमा मेष राशि में रात्रि ०८:०८ से, श्री बसंत पंचमी, तक्षक पूजा, सरस्वती पूजन, रतिकाम महोत्सव, पंचक समाप्ति रात्रि ०८:०८ पर, मंगल को रेवती में पुंसवनसीमंत सूतिस्नान लाल वस्त्र धारण पश्चिम दिशा की यात्रा वस्तु क्रय मुहर्त है। रात्रि ०८:०८ के बाद अश्विनी में उत्तर दिशा को छोड़कर अन्य दिशा की यात्रा, ऑपरेशन करवाने का मुहर्त है।
विक्रम संवत 2078 में वर्षा विचार जानें आनंद संवत्सर में कब होगी वर्षा
विक्रम संवत २०७८ में वर्षा होने के योग
आर्द्राप्रवेशाङ्ग के विचार से वर्षा मध्यम है, चक्रवात व तूफान का प्रकोप रहेगा, पूर्वोत्तर पर्वतीय क्षेत्रों में वर्षा उत्तम, पूर्वी भाग में सामान्य वर्षा, देश के पश्चिम व मध्य भाग में वर्षा की कमी होगी, दक्षिण भाग में वायु का प्रकोप होगा, जल संकट संभव है।
शारदधानयोत्तपत्ति के विचार से उत्पादन संतोषप्रद रहेगा, फसलों के मूल्य सामान्य रहेंगे, पूर्वोत्तर तथा दक्षिण पश्चिम कृषि को क्षति होगी, ग्रैष्मिकधानयोत्तपत्ति के विचार से रवी की फसल का उत्पादन उत्तम रहेगा, फसलों को रोगादि का भय होगा, दक्षिण भाग में कृषि को क्षति होगी, फसलों के मूल्यों में वृद्धि होगी।
वर्षा विज्ञान:-
वर्षा विज्ञान
सूर्य के रोहिणी नक्षत्र में जिस दिन वर्षा होवे उसके ऊपर लिखे दिन तक जलवृष्टि उत्तम ढंग से न होगी।
उदाहरण:-
यदि रोहिणी नक्षत्र का सूर्य आने के पाँचवें दिन वर्षा हो गयी तो ३१ दिन तक सुंदर ढंग से जल वृष्टि न हो सकेगी, जिस दिशा से बादल रोहिणी नक्षत्र में आते हुए दृष्टिगोचर होगा उसी दिन में जलवृष्टि की आगे न्यूनता रहेगी।
वर्षा विचार:-
आर्द्रा (२२ जून दिन १/५१ पर)
आर्द्रा का केवल तृतीय चरण निर्जल है शेष सभी चरण सजल है अतः तारीख २२ से २८ जून व तारीख ३ से ५ जुलाई तक वर्षा होगी।
पुनर्वसु (६ जुलाई दिन ३/३२ पर)
पुनर्वसु नक्षत्र का तृतीय व चतुर्थ चरण निर्जल है और प्रथम व द्वितीय चरण सजल है अतः तारीख ६ से १२ जुलाई तक वर्षा होगी।
पुष्य (तारीख २० जुलाई सायं ५/० पर)
पुष्य नक्षत्र का केवल द्वितीय चरण सजल है शेष सभी चरण निर्जल है अतः तारीख २२ से २६ जुलाई तक वर्षा होगी।
आश्लेषा (तारीख ३ अगस्त सायं ५/२४ पर)
आश्लेषा नक्षत्र का केवल द्वितीय चरण सजल है शेष सभी चरण निर्जल है अतः तारीख ६ से ११ अगस्त तक वर्षा होगी।
मघा (तारीख १७ अगस्त सायं ४/०८ पर)
मघा नक्षत्र का केवल द्वितीय चरण सजल है शेष सभी चरण निर्जल है अतः तारीख २० से २३ अगस्त तक वर्षा होगी।
पूर्वाफाल्गुनी (तारीख ३१ अगस्त दिन १२/३२ पर)
पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र का प्रथम व द्वितीय चरण सजल है शेष तृतीय व चतुर्थ चरण निर्जल है अतः तारीख ३१ अगस्त से ६ सितंबर व तारीख ७ से १० सितंबर तक वर्षा होगी।
उत्तराफाल्गुनी (तारीख १४ सितंबर प्रातः ६/२३ पर)
उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र का केवल तृतीय चरण सजल व शेष चरण निर्जल है अतः तारीख २१ से २४ सितंबर तक आँधी-तूफान व उमस के साथ वर्षा होगी।
हस्त (तारीख २७ सितंबर रात्रि ९/३२ पर)
हस्त नक्षत्र का तृतीय व चतुर्थ चरण सजल व शेष प्रथम व द्वितीय चरण निर्जल है अतः तारीख ५ से १० अक्टूबर तक वायु के साथ अच्छी वर्षा होगी।
चित्रा (तारीख ११ अक्टूबर दिन ९/५४ पर)
चित्रा नक्षत्र का प्रथम व द्वितीय चरण सजल व शेष तृतीय व चतुर्थ चरण निर्जल है अतः तारीख ११ से १७ व २३ अक्टूबर को वर्षा होगी।
स्वाती (तारीख २४ अक्टूबर रात्रि ०७/३३ पर)
स्वाती नक्षत्र का तृतीय व चतुर्थ चरण सजल व शेष प्रथम व द्वितीय चरण निर्जल है अतः तारीख १ से ६ नवंबर तक अच्छी वर्षा होगी।
विक्रम संवत 2078 में वर्ष प्रवेश लग्न से भारत का भविष्य
विक्रम संवत २०७८ के वर्ष प्रवेश लग्न से भारत में घटित होने वाली प्रमुख घटनाएं
विक्रम संवत 2078 में वर्ष प्रवेश लग्न से भारत का भविष्य
भारत के प्रवेश वर्ष प्रवेश लग्न के विचार से वर्ष प्रवेश लग्न मेष व द्रव्येश शुक्र है अतः मनोरंजन जगत एवं श्रृंगार संबधी व्यापार में थोड़ा लाभ होगा, पराक्रमेश बुध के होने से भारत की नीतियों से अंतराष्ट्रीय क्षेत्र में सफलता प्राप्त होगी, सुखेश चंद्रमा के होने के कारण से लोक कल्याण के कार्य से जनता सुखी रहेगी तथा बुध के कष्टेश होने के कारण से अनावश्यक समस्याओं का सामना करना पड़ेगा, मारकेश मंगल के होने के कारण से कई जगह अहिंसक उपद्रव होंगे व भाग्येश गुरु के होने के कारण से शिक्षा के क्षेत्र में उन्नति होगी, कर्मेश शनि से कानून व्यवस्था अच्छी दीर्घकालिक योजनाओं का शुभारंभ होगा, आयेश शनि के होने से राष्ट्रीय कोष में वृद्धि होगी तथा व्ययेश गुरु के होने के कारण से शिक्षा, ऊर्जा व योग के क्षेत्र में विस्तार होगा।
राहु और शनि से बनने वाला अशुभ योग: जानिए कौन सा है यह अशुभ योग व उसके फल और उपाय
शनि व राहु से बनने वाला पिशाच योग
शनि और राहु इन दोनों को वैदिक ज्योतिष में पाप ग्रह की श्रेणी में रखा गया है जब यह दो ग्रह आपस में संबंध बनाते हैं तो पिशाच नामक योग बनता है अब प्रश्न यह उठता है कि किस प्रकार से शनि व राहु संबंध बनाएं तो यह योग बनता है उससे पूर्व हमारे लिए यह जानना आवश्यक है कि आखिर शनि व राहु से ही क्यों पिशाच योग बनता है व पिशाच योग का क्या अर्थ है इसके लिए हमें पहले शनि व राहु को समझना होगा शनि व राहु रात्रि बली होते हैं शनि का वर्ण श्याम है और शनि अंधेरे का ग्रह है और राहु एक माया अर्थात जादू है जब भी शनि और राहु के बीच संबंध बनता है तो एक नकारात्मक शक्ति का सृजन होता है जिसे पराशरी ज्योतिष में “पिशाच योग” की संज्ञा प्राप्त है।
राहु व शनि के चार प्रकार से संबंध बनने पर व्यक्ति को पिशाच योग का फल प्राप्त होता है वह इस प्रकार है:-
१. शनि व राहु एक साथ युति कर के किसी भी भाव में स्थित हों।
२. शनि व राहु एक दूसरे को परस्पर देखतें हों।
३. शनि की राहु या राहु की शनि पर दृष्टि हो।
४. गोचर वश जब शनि जन्म के राहु या राहु जन्म के शनि पर से गोचर करता हो।
इन चार प्रकार के शनि व राहु के मध्य संबंध बनने पर पिशाच योग बनता है अब प्रश्न यह उठता है कि इस पिशाच योग के क्या होते हैं तो चलिए मैं विभिन्न भावों में बनने वाले पिशाच योग के फल को बताता हूँ:-
पिशाच योग
१. यदि लग्न में शनि व राहु की युति हो तो ऐसे व्यक्ति के ऊपर तांत्रिक क्रियाओं का अधिक प्रभाव रहता है तथा ऐसे व्यक्ति हमेशा चिंतित रहते हैं और इनके मस्तिष्क में नकारात्मक विचार सबसे पहले आते हैं साथ ही ऐसे व्यक्तियों को कोई न कोई रोग निरंतर बना रहता है।
२. यदि द्वितीय भाव में शनि व राहु की युति हो तो व्यक्ति के घर वाले ही उसके शत्रु रहते हैं तथा इनको हर कार्य में बाधाओं का सामना करना पड़ता है और इनकी वाणी में कुछ दोष रहता है साथ ही धन संचय में कठिनाई व जुए-सट्टे आदि में धन हानि होती है तथा ऐसे व्यक्ति नशीले पदार्थों या तामसिक पदार्थों या दोनों का सेवन करते हैं।
३. यदि तृतीय भाव में शनि व राहु की युति हो तो ऐसे व्यक्ति अधिकतर भ्रमित रहते हैं व ऐसे व्यक्तियों का छोटा भाई नही होता या छोटे भाई को किसी प्रकार कोई कष्ट रहता है कहने का आशय यह है कि तृतीय भाव का पिशाच योग छोटे भाई के सुख की हानि करता है साथ ही ऐसे व्यक्तियों को समय-समय पर भारी उतार-चढ़ाव के समय से गुजरना पड़ता है साथ ही यदि पंचमेश पर भी शनि या राहु की या दोनों की दृष्टि हो या युति हो तो ऐसे व्यक्तियों को संतान नही होती या होकर मर जाती है कहने का आशय यह है कि ऐसे व्यक्तियों को संतान सुख नही प्राप्त होता है।
४. यदि चतुर्थ भाव में शनि व राहु की युति हो तो यह और भी खराब स्थिति होती है क्योंकि चतुर्थ भाव भूमि, मकान, माता व सुख का भाव होता है अतः ऐसी स्थिति में व्यक्तियों को माता का पूर्ण सुख नही मिल पाता तथा इनके घर में नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव रहता है प्रायः ऐसे व्यक्तियों के घर में वास्तु दोष अवश्य ही रहता है साथ ही ऐसे व्यक्तियों को मकान का सुख भी मुश्किल से ही प्राप्त होता है क्योंकि शनि निर्माण का कारक होता है और राहु माया, भ्रम व बाधाओं का कारक होता है ऐसे व्यक्ति जब भी किसी मकान का निर्माण आरंभ करवाते है तो उनके परिवार में रोग, व्याधि व पीड़ा प्रायः बनी रहती है या ऐसे व्यक्तियों को बड़ा आर्थिक नुकसान सहन करना पड़ता है।
५. यदि पंचम भाव में शनि व राहु की युति हो तो व्यक्ति के मस्तिष्क में नकारात्मक विचार आते रहते हैं साथ ही ऐसे व्यक्तियों की शिक्षा भी कठिन परिस्थितियों से होते हए पूर्ण होती है व बड़े भाई-बहन को किसी प्रकार का कष्ट रहता है तथा ऐसे व्यक्तियों की संतान को कष्ट रहता है और यदि पंचमेश का भी शनि व राहु या दोनों में से किसी एक से भी संबंध बनता हो तो ऐसे व्यक्तियों की संतान हीन अर्थात देह के किसी भाग में दुर्बलता लिए हुए होती है या होकर मर जाती है कहने का आशय यह है कि ऐसे व्यक्तियों को संतान सुख नही प्राप्त होता है।
६. यदि षष्ठ भाव में शनि व राहु की युति हो तो ऐसे व्यक्तियों के छुपे हुए शत्रु अधिक होते हैं षष्ठ भाव से रोग, रिपु और ऋण का विचार करते हैं अतः ऐसे व्यक्तियों की बीमारी का रहस्य जल्दी ज्ञात नही हो पाता और किसी जुए व सट्टे में हारने या नशे के कारण से धन हानि व ऋण की वृद्धि होती है ऐसे व्यक्तियों को हिर्दय घात होने या अन्य किसी प्रकार की दिल की बीमारी, रक्त जनित विकार, एक्सीडेंट से देह के किसी भाग में कमजोरी की संभावना रहती है और मामा पक्ष से विवाद बना रहता है।
७. यदि सप्तम भाव में शनि व राहु की युति हो तो ऐसी स्थिति में व्यक्ति को अनेक प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है क्योंकि सप्तम भाव से रोजगार, जीवनसाथी, दाम्पत्य जीवन, मित्र, साझेदारी आदि का विचार किया है अतः इस भाव में शनि व राहु की युति होने पर व्यक्ति को अपने मित्रों व साझेदारियों से धोखा मिलने की संभावना रहती है तथा किसी दूसरे व्यक्ति के कारण से घर के वातावरण में कलह का माहौल बना रहता है साथ ही ऐसे व्यक्तियों को किसी महिला के कारण से अपमानजनक स्थितियों का भी सामना करना पड़ता है और रोजगार के मार्ग में अनेक प्रकार की परेशानियों का सामना करते हुए धैर्य व संयम रखते हुए सफलता प्राप्त होती है।
८. अष्टम भाव से ससुराल, आयु, मृत्यु, पुरातत्व, रहस्मई कार्य, गूढ़ विद्या, जीवनसाथी की वाणी आदि का विचार किया जाता है अतः ऐसे स्थिति में अष्टम भाव में यदि शनि व राहु की युति हो तो व्यक्ति के दाम्पत्य जीवन में कलह की स्थितियाँ प्रायः बनी रहती है ध्यान देने योग्य बात यह है वहाँ बैठे इन दोनों ग्रह की सप्तम दृष्टि द्वितीय भाव जो आपका कुटुंब व वाणी का भाव है पर दृष्टि होती है अतः ऐसे व्यक्तियों का दाम्पत्य जीवन न्यून होता और यदि सप्तमेश अर्थात सप्तम भाव का स्वामी भी इनसे संबंध बनाता हो या त्रिक भाव में बैठा हो तो ऐसी स्थिति में दाम्पत्य जीवन को बचाना और भी मुश्किल हो जाता है साथ ही ऐसे व्यक्तियों को जीवन में कई बार शल्य चिकित्सा भी करानी पड़ सकती है तथा ऐसे व्यक्तियों को उदर व मूत्र विकार भी रहता है साथ ही ऐसे व्यक्तियों की आयुष्य पर भी अनेक बार संकट आते हैं व ऐसे व्यक्तियों के अनैतिक संबंध बनने की भी संभावना रहती है।
९. यदि नवम भाव में शनि व राहु की युति हो तो ऐसा व्यक्ति धर्म के विपरीत आचरण करने वाला होता है तथा ऐसे व्यक्तियों के भाग्य में निरंतर उतार-चढ़ाव आते रहते हैं साथ ही ऐसे व्यक्तियों के पिता को भी किसी प्रकार का कष्ट रहता है किंतु यदि भाग्येश की दृष्टि नवम भाव पर हो तो व्यक्ति को कड़े संघर्ष उपरांत सफलता प्राप्त होती है।
१०. यदि दशम भाव में शनि व राहु की युति हो तो व्यक्ति के घरेलू सुख में कुछ कमी व माता-पिता को कष्ट रहता है तथा ऐसे व्यक्तियों के कारोबार में निरंतर उतार-चढ़ाव आते रहते हैं साथ ही किसी राजा या उच्चाधिकारी से दंड भी प्राप्त होने की संभावना रहती है।
११. एकादश भाव को लाभ भाव भी कहा जाता है ज्योतिष का एक सर्वमान्य नियम है कि एकादश भाव में क्रूर से क्रूर ग्रह भी शुभ फल प्रदान करते है क्योंकि एकादश भाव का दूसरा नाम ही लाभ भाव है इस स्थिति में यदि शनि व राहु की युति एकादश भाव में हो तो व्यक्ति को जुए-सट्टे व किसी गलत कार्य द्वारा धन की प्राप्ति होती है किंतु ऐसे व्यक्तियों के भाई-बहन को किसी प्रकार का कष्ट अवश्य ही रहता है तथा ऐसे व्यक्तियों को संतान का पूर्ण सुख नही प्राप्त हो पाता है।
१२. द्वादश भाव में यदि शनि व राहु की युति हो तो व्यक्ति के अनैतिक संबंध बनने की अधिक संभावना रहती है साथ ही ऐसे व्यक्तियों के गृहस्थ सुख में कुछ कमी रहती है तथा ऐसे व्यक्तियों को जीवन में कई बार धोखा मिलता है तथा किसी असाध्य रोग से पीड़ा होती है।
नोट:-
१. शनि व राहु की युति के अतिरिक्त उपरोक्त बताए गए अन्य प्रकार से संबंध बनाने पर भी प्राप्त होते हैं।
२. यदि शनि व राहु की युति या प्रतियुति (शनि से सप्तम भाव में राहु या राहु से सप्तम भाव में शनि हो) शनि की मकर या कुंभ राशि में हो तो स्थितियाँ धैर्य के साथ अत्यधिक प्रयास करने पर नियंत्रण में आ जाती है।
३. कुंडली के प्रथम अर्थात लग्न से सप्तम तक के भाव रात्रि बली होते हैं अतः इन भावों में शनि व राहु का संबंध बनना अत्यधिक कष्टदाई होता है।
मैंने द्वादश भावों में पिशाच योग बनने के फल को विस्तार से बताया है अब प्रश्न यह उठता है कि इस दोष के क्या उपाय होते हैं तो सर्वप्रथम मैं यहाँ यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि किसी भी प्रकार के दोष का उपाय पूर्ण विधि व शास्त्रोचित तरह से करने पर ही लाभ मिलता है अतः मैं यहाँ कुछ उपाय बता रहा हूँ जिन्हें करने से निश्चय ही लाभ प्राप्त होगा:-
१. दुर्गा सप्तशती का विधि पूर्वक पाठ व दशांश कराने से पिशाच योग के दुष्प्रभाव से मुक्ति मिलती है।
२. नित्य संकटमोचन हनुमाष्टक व सुंदरकांड का पाठ करने से पिशाच योग के दुष्प्रभाव से मुक्ति मिलती है।
३. शनि व राहु के हवनात्मक जप से भी पिशाच योग के दुष्प्रभाव में कमी आती है।
४. नित्य शनि स्तोत्र का पाठ करने व अमावस्या के दिन सूर्यास्त के समय बहते पानी में नारियल प्रवाहित करने से भी पिशाच योग के दुष्प्रभाव में कमी आती है।