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कोरोना और ज्योतिष जानिए ज्योतिषीय आकलन के अनुसार कब मिलेगी कोरोना से मुक्ति

कोरोना और ज्योतिष जानिए ज्योतिषीय आकलन के अनुसार कब मिलेगी कोरोना से मुक्ति

भाग:-१

 

कोरोना और ज्योतिष: जानिए, कब मिलेगी कोरोना से मुक्ति
कोरोना और ज्योतिष: जानिए, कब मिलेगी कोरोना से मुक्ति

 

कोरोना एक ऐसी महामारी जिसने सिर्फ भारत ही नही अपितु पूरे विश्व में त्राहि-त्राहि मचा रखी है अनगिनत लोग इस महामारी के प्रभाव में आकर असमय ही काल के मुख में समा रहे हैं इस महामारी को लेकर हमारे पंचांगों ने पूर्व में ही सतर्क किया था कि “इस वर्ष (२०१९-२०२०) में विषाणु जनित महामारी का प्रकोप रहेगा।” किंतु यह महामारी इतनी भयानक होगी यह किसी ने नही सोचा था ३ मई २०२१ को प्रातः १० बजकर २१ मिनट पर मुझसे कई वर्षों से जुड़े एक सदस्य के मन में यह जिज्ञासा उत्पन्न हुई कि इस महामारी का अंत कब होगा और कब हम इन परिस्थितियों से बाहर आ सकेंगे तो उस समय के आधान लग्न व आजाद भारत की कुंडली की विवेचना करने का एक प्रयास करता हूँ।

 

इस विवेचना को लिखने से पूर्व सर्वप्रथम मैं अपने इष्ट व अपने आराध्य जिन्हें मैं अपने गुरु रूप में भी पूजता हूँ उनके (श्री हनुमान जी व बाबा महादेव) चरण कमलों में नमन करता हूँ व इस महामारी से मुक्ति की प्राथना करता हूँ और साथ ही यह प्राथना करता हूँ कि मुझ पर अपनी कृपा दृष्टि बनाएं जिससे मैं इस महामारी पर सही विवेचना कर सकूँ🙏🏻

प्रश्न कुंडली से फलकथन:-

 

प्रश्न लग्न कुंडली
प्रश्न लग्न कुंडली

 

३ मई २०२१ को प्रातः १०:२१पर कर्क लग्न जो कि चर लग्न है प्राप्त होता है जिनके स्वामी अर्थात लग्नेश चंद्रमा सप्तम भाव जिसे मारक स्थान भी कहते हैं वहाँ शनि के साथ स्थित होकर विष योग का सृजन कर रहे हैं साथ ही मंगल व राहु से दृष्ट भी हैं अतः इस वर्ष भी कोरोना महामारी को लेकर मन में तनाव, भय का संचार होता रहेगा चूँकि कर्क लग्न की कुंडली में मंगल राजयोगकारक हो जाता है अतः मंगल का सप्तम भाव को अपनी उच्च राशि मकर में देखने के कारण से भारत तकनीकी क्षेत्र में काफी तेजी से आगे बढ़ेगा हालांकि बात कोरोना महामारी की हो रही है तो मंगल व राहु की दृष्टि सप्तम भाव पर आने से मारक स्थान पर एक साथ चार अशुभ योगों (शनि-चंद्र से विष योग, राहु-शनि से पिशाच योग, शनि-मंगल से द्वंद योग व राहु-चंद्र से ग्रहण योग) का बनना विपत्तियों व संघर्षों का सूचक है अतः इस वर्ष भारत को कोरोना महामारी के साथ-साथ अन्य बीमारियों व अनेक प्रकार की विपत्तियों जैसे आतंकवादी घटनाएं, भूकम्प, आग से जान-माल की हानि, तूफान आदि का सामना निकट भविष्य में करना पड़ सकता है हालांकि गुरु भाग्येश होकर अष्टम भाव में बैठे हैं तो यह कुछ हद तक विपरीत परिस्थितियों में कड़े संघर्ष व कुछ कठोर नियमों के साथ राहत प्रदान करने के योग बनाएंगे किंतु कर्क लग्न की कुंडली में गुरु षष्ठेश भी होते हैं अतः गुरु का अष्टम में होना लोगों को स्वास्थ्य जनित समस्याएं देता रहेगा, धन भाव का स्वामी सूर्य दशम भाव में दिग्बली होकर अपनी उच्च राशि मेष में अस्त ग्रह शुक्र के साथ बैठे हैं और चतुर्थ भाव में नीचभंग राजयोग बनने के कारण से भारत दवा व वैक्सीन के क्षेत्र में काफी तेजी से आगे बढ़ेगा और भारत के आर्थिक दृष्टिकोण से भी यह स्थिति शुभ रहेगी जिससे भारत की GDP में पिछले वर्ष की तुलना में कुछ वृद्धि होगी चंद्रमा का श्रवण नक्षत्र के प्रथम चरण से गोचर होने के कारण व वर्तमान में चन्द्र में मंगल की अंतर्दशा होने के कारण से अभी इस बीमारी से बड़ी राहत मिलती नही दिख रही है वर्तमान में १ मार्च २०२१ से १७ अगस्त २०२१ तक गोचर में राहु का प्रभाव काफी अधिक रहने वाला है जिस कारण से इन समय में कोरोना महामारी में अप्रत्याशित वृद्धि होती रहेगी हालांकि अन्य ग्रहों का गोचर में संचार बीच-बीच में ठीक होते रहने के कारण से लोग तेजी से स्वस्थ होते रहेंगे, अगस्त के मध्य भाग में राहु का प्रभाव गोचर में कम होने से कोरोना महामारी में कुछ कमी देखने को मिलेगी किंतु जल्द ही अर्थात १७ अक्टूबर २०२१ की रात्रि के ३ बजकर २७ मिनट पर सूर्य अपनी नीच राशि तुला से गोचर करेंगे व १८ अक्टूबर २०२१ को शुक्र दिन में ७ बजकर ४० मिनट से ज्येष्ठा नक्षत्र और शनि मार्गी अवस्था में उत्तराषाढ़ा नक्षत्र के चतुर्थ चरण से गोचर करेंगे उस समय शुक्र व केतु की युति पुनः कोरोना वृद्धि का सूचक रहेगी जिसमें कोरोना में अप्रत्याशित वृद्धि देखने को मिलेगी जिसे संसार कोरोना की तीसरी लहर के नाम से जानेगा।

 

निष्कर्ष:-

 

१३ फरवरी २०२२ को सूर्य दिन में ७ बजकर ३३ मिनट पर कुंभ राशि में प्रवेश करेंगे तब कोरोना महामारी में कुछ राहत अनुभव होगी हालांकि बीच-बीच में गोचर में ग्रहों की स्थिति ठीक होने पर कोरोना महामारी में कुछ अप्रत्याशित कमी भी देखने को मिल सकती है किंतु १३ फरवरी २०२२ से पूर्व इससे पूर्णतया लाभ मिलता नही दिख रहा है।

 

आर्टिकल की लंबाई को ध्यान में रखते हुए आजाद भारत की कुंडली से कोरोना महामारी पर विवेचना अपने अगले आर्टिकल में प्रकाशित करूँगा।

 

जय श्री राम।

 

Astrologer:- Pooshark Jetly

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स्वप्न में इन चीजों का दिखना देता है धन लाभ के संकेत—Astrology Sutras

स्वप्न में इन चीजों का दिखना देता है धन लाभ के संकेत—Astrology Sutras

 

स्वप्न में इन चीजों का दिखना देता है धन लाभ के संकेत
स्वप्न में इन चीजों का दिखना देता है धन लाभ के संकेत

 

सामुद्रिक शास्त्र में अनेक प्रकार के स्वप्नों के अर्थ बताए गए हैं स्वप्न मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं एक जो इष्ट फल को बताते हैं और द्वितीय जो अशुभ फलों को बताते हैं आज के इस लेख में मैं आप सभी को कुछ ऐसे स्वप्नों के बारे में बताने जा रहा हूँ जो कि शीघ्र धन लाभ को दर्शाते हैं तो चलिए जानते हैं वह कौन से स्वप्न है जो शीघ्र धन लाभ को दर्शाते हैं:-

 

१. यदि स्वप्न में आपके दाहिने हाथ पर सफेद सर्प काटते हुए दिखाई दे तो सामुद्रिक शास्त्र में बताया गया है कि ऐसे व्यक्ति को 10 दिन के अंदर ही धन लाभ होता है।

 

२. यदि स्वप्न में दूध दिखाई दे तो ऐसे व्यक्तियों को शीघ्र ही धन लाभ होता है।

 

३. यदि कोई व्यक्ति स्वप्न में वट वृक्ष या फलों से लदे हुए किसी भी वृक्ष पर खुद को चढ़ते हुए देखे तो सामुद्रिक शास्त्र में बताया गया है कि ऐसे व्यक्ति को शीघ्र ही धन लाभ होता है।

 

४. यदि व्यक्ति स्वप्न में खुद को बैल के रथ पर अकेला बैठे हुए देखे और उसके बाद तुरंत ही वह अपनी निद्रा से बाहर आ जाए तो ऐसे व्यक्ति को निश्चय ही शीघ्र धन लाभ होता है।

 

५. यदि कोई व्यक्ति स्वप्न में खुद को किसी वाहन, आसन, बिछौने या पालकी में चलते हुए देखे तो सामुद्रिक शास्त्र में बताया गया है कि ऐसे व्यक्ति को चहूँ ओर अर्थात हर तरफ से धन लाभ होता है।

 

६. यदि कोई व्यक्ति स्वप्न में पान का बीड़ा, कपूर, अगरबत्ती, श्वेत चंदन, श्वेत पुष्प देखता है तो सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार ऐसे व्यक्ति को शीघ्र ही किसी संपत्ति का लाभ होता है।

 

७. यदि कोई व्यक्ति स्वप्न में अनार, गेहूँ का ढेर देखता है तो सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार ऐसे व्यक्तियों को शीघ्र ही धन लाभ होता है।

 

जय श्री राम।

 

Astrologer:- Pooshark Jetly

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सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार 25 मुख्य स्वप्नों के अर्थ

सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार 25 मुख्य स्वप्नों के अर्थ

 

सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार स्वप्नों के अर्थ
सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार स्वप्नों के अर्थ

 

सामुद्रिक शास्त्र में स्वप्नों के अनेक फल बतलाए गए हैं वेद व पुराणों में भी स्वप्न फल का उल्लेख मिलता है विशेष रूप से अग्नि पुराण में शकुन-अपशकुन के बारे में विस्तृत वर्णन है, रात्रि के 4 प्रहर के अनुसार निद्रा की 4 प्रकार की अवस्थाएं होती हैं इनमें से रात्रि के अंतिम प्रहर में आने वाले स्वप्न का विशेष अर्थ होता है आज के इस लेख में मैं ऐसे ही कुछ स्वप्नों का अर्थ बताने जा रहा हूँ जिनसे आप भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं अर्थात शकुन-अपशकुन का विचार कर सकते हैं:-

 

१. यदि व्यक्ति को स्वप्न में हरे भरे खेत-खलियान आदि दिखाई दें तो सामुद्रिक शास्त्र में बताया गया है कि ऐसे व्यक्तियों को शीघ्र ही संतान सुख प्राप्त होने वाला है।

 

२. यदि व्यक्ति को स्वप्न में कोई मृत व्यक्ति कपड़ा या कोई फल देता दिखाई देता है तो सामुद्रिक शास्त्र में बताया गया है कि ऐसे व्यक्तियों को शीघ्र ही संतान सुख प्राप्त होने वाला है।

 

३. यदि कोई विवाहित व्यक्ति स्वप्न में अंडा देखता है तो सामुद्रिक शास्त्र में ऐसे व्यक्तियों को शीघ्र ही संतान सुख प्राप्त होने वाला बताया गया है।

 

४. यदि अविवाहित व्यक्ति स्वप्न में अंडा देखता है तो सामुद्रिक शास्त्र में बताया गया है कि व्यक्ति को निकट भविष्य में शुभ समाचार प्राप्त होने वाला है।

 

५. यदि कोई व्यक्ति स्वप्न में किसी कुम्हार को घड़ा बनाते हुए देखता है तो सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार यह स्वप्न उक्त व्यक्ति के लिए समृद्धिदायक रहता है।

 

६. यदि स्वप्न में गधे की चीख सुनाई दे तो सामुद्रिक शास्त्र में इसे शुभ नही माना गया है ऐसे व्यक्ति पर किसी प्रकार के कष्ट या विपत्ति की संभावना रहती है।

 

७. यदि स्वप्न में व्यक्ति खुद को चावल खाते हुए देखता है तो सामुद्रिक शास्त्र में बताया गया है कि ऐसे व्यक्ति को अत्यधिक परिश्रम करने पर भी जो कार्य सिद्धि में वह लगा हुआ है उसमें असफलता प्राप्त होगी।

 

८. यदि स्वप्न में कोई व्यक्ति चांदी को गलाते हुए देखता है तो सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार यह मित्रों से बैर, हानि, चिंता और दुख का सूचक है।

 

९. यदि स्वप्न में चांदी की खान दिखाई दे तो सम्मान हानि का सूचक होती है।

 

१०. यदि स्वप्न में कोई व्यक्ति खुद को रोटी बनाते हुए देखता है तो सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार यह स्वप्न किसी गंभीर बीमारी का सूचक होती है अतः ऐसे व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य हेतु बेहद सतर्क रहना चाहिए।

 

११. यदि कोई विवाहित महिला स्वयं में खुद को बच्चे के लिए स्वेटर बनाते हुए देखे तो सामुद्रिक शास्त्र में बतलाया गया है कि उक्त महिला को शीघ्र ही संतान सुख प्राप्त होने वाला है।

 

१२. यदि किसी विवाहित व्यक्ति को स्वप्न में सुंदर व नवजात बालक दिखाई दे तो स्वप्न शास्त्र में बताया गया है कि उक्त व्यक्ति को शीघ्र ही संतान सुख प्राप्त होने वाला है।

 

१३. स्वप्न में चारों तरफ हरियाली या हरे-भरे खेत देखना भी सामुद्रिक शास्त्र में संतान सुख को बताया गया है।

 

१४. सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार स्वप्न में श्वेत महल, श्वेत तोरण, श्वेत रंग से रंगी छत दिखाई दे तो व्यक्ति को शीघ्र ही धन व संतान या दोनों का सुख प्राप्त होता है।

 

१५. सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार स्वप्न में अपने नाखून बड़े हुए देखना भी धन व संतान सुख का सूचक है।

 

१६. यदि स्वप्न में कोई व्यक्ति दर्पण में अपना मुख देखता है तो सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार ऐसे व्यक्ति को शीघ्र ही संतान सुख प्राप्त होता है।

 

१७. सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार स्वप्न में तिल, चावल, सरसों, जौ, अन्न, कलश, शंख, स्वर्ण के गहने आदि देखना समृद्धि का सूचक बतलाया गया है।

 

१८. स्वप्न में खोई हुई वस्तु की प्राप्ति को देखना भी सुख व समृद्धि का सूचक होता है।

 

१९. यदि कोई व्यक्ति स्वप्न में मकान मालिक द्वारा किराये की मांग करते हुए देखे तो सामुद्रिक शास्त्र में बताया गया है कि उक्त व्यक्ति को शीघ्र ही स्वम् के मकान का सुख प्राप्त होने वाला है यह स्वप्न सुख व समृद्धि का सूचक होता है।

 

२०. यदि स्वप्न में कोई व्यक्ति नाक को साफ करते हुए देखे तो सामुद्रिक शास्त्र में बतलाया गया है कि निकट भविष्य में उक्त व्यक्ति के आय में वृद्धि होगी तथा आय के नए साधन भी प्राप्त होंगे।

 

२१. यदि कोई व्यक्ति स्वप्न में किसी बच्चे को गोद में लेते हुए देखते हैं तो सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार उक्त व्यक्ति को शीघ्र ही अप्रत्याशित धन लाभ होने की संभावना रहती है।

 

२२. स्वप्न में भालू को पेड़ पर चढ़ते हुए देखना मनचाहा जीवनसाथी मिलने का सूचक होता है।

 

२३. यदि स्वप्न में सर पर सर्प दंश होते हुए दिखे तो सामुद्रिक शास्त्र में बतलाया गया है कि उक्त व्यक्ति को शीघ्र की उच्च पद की प्राप्ति होगी।

 

२४. यदि स्वप्न में कोई व्यक्ति खुद को गधे पर बैठे हुए देखता है तो सामुद्रिक शास्त्र में बताया गया है कि उक्त व्यक्ति को शीघ्र ही उच्च पद की प्राप्ति होने वाली है।

 

२५. यदि कोई व्यक्ति स्वप्न में गधे की पीठ पर खुद को सामान रखते हुए देखता है तो सामुद्रिक शास्त्र में इसे अत्यंत शुभ बताया गया है इस स्वप्न का अर्थ सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति व नए मित्र की प्राप्ति होती है।

 

जय श्री राम।

 

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चैत्र नवरात्रि 2021: जानें माता की सवारी, घट स्थापना शुभ मुहर्त व पूजन विधि

चैत्र नवरात्रि 2021: जानें माता की सवारी, घट स्थापना शुभ मुहर्त व पूजन विधि

 

चैत्र नवरात्रि 2021 जानें पूजन विधि व शुभ मुहर्त
चैत्र नवरात्रि 2021 जानें पूजन विधि व शुभ मुहर्त

 

शक्ति की अधिष्ठात्री माता जगदंबा की आराधना का विशेष पर्व चैत्र शुक्ल प्रतिपदा माना गया है धर्म शास्त्रों के अनुसार इसी दिन ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की थी इस वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि 12 अप्रैल 2021 को प्रातः 6 बजकर 59 मिनट पर लग रही है जो कि 13 अप्रैल 2021 को प्रातः 8 बजकर 47 मिनट तक रहेगी इस बार चैत्र शुक्ल पक्ष 15 दिनों का होने से इस बार नवरात्र 9 दिनों का अर्थात 13 से 21 अप्रैल तक रहेगा वासंतिक नवरात्र में नौ दुर्गा के साथ नौ गौरी के दर्शन का विशेष महत्व होता है इस बार माता अश्व पर आगमन कष्टकारी व गमन मानव कंधे पर होने से सुखदाई व चतुर्दिक लाभकारी रहेगा।

 

महानिशा पूजन:-

 

चैत्र नवरात्रि 2021 महानिशा पूजन
चैत्र नवरात्रि 2021 महानिशा पूजन

 

महानिशा पूजन सप्तमी युक्त अष्टमी में करने का विधान है निशीथ व्यापिनी अष्टमी योग 19 अप्रैल की रात्रि को मिल रहा है जिसमें महानिशा पूजन आदि किया जाएगा, महाअष्टमी व्रत 20 अप्रैल को रखा जाएगा वहीं चैत्र शुक्ल नवमी 21 की शाम 6 बजकर 59 मिनट तक है इस दिन महानवमी व श्री रामनवमी के व्रत के साथ दोपहर में श्री राम का प्राकट्योत्सव मनाया जाएगा, नवरात्रि का होम आदि 21 की शाम 6 बजकर 59 मिनट से कर लेना श्रेयष्कर रहेगा क्योंकि संध्या के 7 बजे दशमी लग जाएगी, नवरात्र व्रत का पारण 22 अप्रैल को किया जाएगा।

 

आगमन व प्रस्थान विधान:-

 

चैत्र नवरात्रि 2021 आगमन व गमन विधान
चैत्र नवरात्रि 2021 आगमन व गमन विधान

 

शास्त्रों में कहा गया है:-

 

“शशिसूर्ये गजारुढ़ा, शनिभौमे तुरंगमे।”

“गुरौ शुक्रे च डोलायाम, बुधे नौका प्रकीर्तिता।।”

 

अर्थात नवरात्र के प्रथम दिन रविवार या सोमवार हो तो माता हाथी पर सवार होकर आती हैं, यदि प्रथम दिन शनिवार या मंगलवार हो तो माता घोड़े पर सवार होकर आती हैं, प्रथम दिन गुरुवार या शुक्रवार हो तो माता पालकी से आती हैं, प्रथम दिन बुधवार हो तो माता नौका पर सवार होकर आती हैं तथा इसी प्रकार माता का गमन रविवार व सोमवार को भैंसा पर, मंगलवार व शनिवार को मुर्गा पर, बुधवार व शुक्रवार को हाथी पर और गुरुवार को मानव कंधे पर होता है।

 

घट स्थापना वेला:-

 

चैत्र नवरात्रि 2021 घट स्थापना वेला
चैत्र नवरात्रि 2021 घट स्थापना वेला

 

घट स्थापना के लिए प्रातः वेला शुभ मानी गयी है इस बार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि 12 अप्रैल 2021 को प्रातः 6 बजकर 59 मिनट पर लग रही है जो कि 13 अप्रैल 2021 को प्रातः 8 बजकर 47 मिनट तक रहेगी अतः 13 अप्रैल को प्रातः 5 बजकर 43 मिनट से 8 बजकर 47 मिनट तक घट स्थापना करना बेहद शुभ रहेगा।

 

इसके अतिरिक्त द्विस्वभाव मिथुन लग्न में दिन के 09:46 से 12:00 बजे तक एवं अभिजित समय दोपहर 12:07 से 12:55 तक भी घट् स्थापना की जा सकती है चौघड़ियों के हिसाब से घट् स्थापना करने वाले दिन के 09:20 से दोपहर बाद 14:05 बजे तक भी चर, लाभ व अमृत के चौघड़ियों में घट् स्थापना कर सकते हैं।

 

चौघड़ियों के हिसाब से घट् स्थापना:-

 

चर :- 09:20 से 10:55 तक
लाभ :- 10:55 से 12:39 तक
अमृत :- 12:39 से 14:05 तक

 

श्री कृष्ण ने अर्जुन को दिया था देवी माँ की आराधना का निर्देश:-

 

श्री कृष्ण जी का अर्जुन को निर्देश
श्री कृष्ण जी का अर्जुन को निर्देश

 

आत्मा की शक्ति को देवी कहते हैं समस्त भूत, भौतिक जगत को प्रकाशित करने वाली चेतना शक्ति ही पराम्बा भगवती दुर्गा हैं वैसे तो इनकी उपासना हर दिन होती है और त्रिदेव जगत की रक्षा हेतु इनकी आराधना करते हैं, महाभारत युद्ध में विजय प्राप्ति के लिए स्वम् भगवान श्री कृष्ण जी ने अर्जुन को देवी माता पराम्बा की उपासना का निर्देश दिया था, वासंतिक नवरात्र शास्त्रों में वर्णित है, नौ रात्रियों का समूह होने से इसे नवरात्र कहा जाता है।

 

पूजन विधान:-

 

चैत्र नवरात्रि 2021 पूजन विधि
चैत्र नवरात्रि 2021 पूजन विधि

 

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि विशेष पर प्रातः नित्य कर्मादि-स्नानादि कर हाथ में गंध, अक्षत, पुष्प, जल लेकर संकल्पित होकर ब्रह्मा जी का आवहान करना चाहिए आगमन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, यज्ञोपवीत, गंध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेध, ताम्बूल, नमस्कार पुष्पांजलि व प्रार्थना आदि उपचारों से पूजन करना चाहिए, नवीन पंचांग से नव वर्ष के राजा, मंत्री, सेनाध्यक्ष, धनाधीप, दुर्गाधीप, संवत्सर निवास और फलाधीप आदि का फल श्रवण, निवास स्थान को ध्वजा, पताका व तोरण आदि से सुशोभित करना चाहिए।

 

जय श्री राम।

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Astrology Sutras/Logics Recent Post कुछ अचूक टोटके व शाबर मंत्र

माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने के 7 अचूक उपाय

माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने के 7 अचूक उपाय

 

माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने के 7 अचूक उपाय
माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने के 7 अचूक उपाय

 

प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं धर्म शास्त्रों के अनुसार यदि देवी लक्ष्मी रुष्ठ हो जाएं तो घर सुख-शांति नही रहती अतः आज मैं आप सभी को देवी लक्ष्मी जी को प्रसन्न करने के 7 ऐसे अचूक उपाय बता रहा हूँ जिन्हें करने से माता लक्ष्मी शीघ्र प्रसन्न हो जाती हैं व घर में सुख-शांति और धन-संपदा बनी रहती है तो चलिए जानते हैं उन 7 अचूक उपाय के बारे में:-

 

१. घर के ईशान कोण में ताम्रपत्र, रजत पत्र या भोजपत्र पर श्री यंत्र की प्राण प्रतिष्ठा कर के श्री यंत्र की नित्य पूजा करने से माता लक्ष्मी की असीम कृपा प्राप्त होती है।

 

२. सुबह स्नानादि कर के देवी लक्ष्मी जी को दहीं का भोग लगाना चाहिए व कहीं भी जाते समय दहीं रूपी प्रसाद को सेवन करना चाहिए ऐसा करने से माता लक्ष्मी जी की कृपा से सभी कार्य शीघ्र पूर्ण होते हैं।

 

३. नित्य लक्ष्मी जी को गाय के देसी घी से बने हुए दो मुँह वाले दीपक को अर्पित कर श्री सूक्त का पाठ करने से देवी लक्ष्मी जी की असीम कृपा प्राप्त होती है।

 

४. पूर्णिमा के दिन चावल, दूध, शकर किसी गरीब महिला या भिकारी को दान करने से देवी माता लक्ष्मी जी की कृपा प्राप्त होती है।

 

५. धर्म शास्त्रों के अनुसार शंख, गोबर व आंवले में लक्ष्मी जी का वास होता है अतः नित्य स्नानादि कर लक्ष्मी जी की मूर्ति/प्रतिमा/श्री यंत्र के समक्ष इन्हें स्थापित कर इनका भी विधिवत पूजन करने से लक्ष्मी माता की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

 

६. देवी लक्ष्मी जी को नित्य कमल पुष्प अर्पित कर श्री सूक्त का पाठ करने व किसी गरीब को भोजन कराने से माता लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

 

७. लक्ष्मी जी की मूर्ति के साथ शिवलिंग पर एक साथ विल्वपत्र अर्पित करने से लक्ष्मी जी व शिव जी की असीम कृपा प्राप्त होती है।

 

विशेष:-

 

इन सभी उपायों के साथ नारी सम्मान सर्वोपरि है जहाँ नारी का सम्मान नही होता वहाँ लक्ष्मी जी का कभी वास नही होता अतः नारी का सम्मान हमेशा करना चाहिए।

 

जय श्री राम।

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स्वप्न में ईश्वर दर्शन का फल–Astrology Sutras

स्वप्न में ईश्वर दर्शन का फल–Astrology Sutras

 

स्वप्न में ईश्वर दर्शन का फल
स्वप्न में ईश्वर दर्शन का फल

 

अधिकांश लोगों को स्वप्न में ईश्वर दिखाई देते हैं शास्त्रों के अनुसार स्वप्न में ईश्वर का दिखना बेहद शुभ होता है तो चलिए जानते हैं स्वप्न में ईश्वर के दिखाई देने के क्या फल होते हैं:-

 

१. यदि आप मुश्किल दौर से गुजर रहे हों तो उस स्थिति में ईश्वर का स्वप्न में दिखाई देना बेहद शुभ होता है इसका अर्थ यह होता है कि ईश्वर आपको धैर्य व संयम के साथ प्रयास करने और उम्मीद न खोने के संकेत दे रहे हैं।

 

२. यदि आप भक्ति के मार्ग से भटक गए हों और उस स्थिति में यदि स्वप्न में ईश्वर दिखाई दें तो इसका तात्पर्य यह होता है कि ईश्वर आपको भक्ति के मार्ग पर चलने का संकेत दे रहे हैं जो कि आपके कार्य सफलता में लाभप्रद सिद्ध होगा।

 

३. यदि आप स्वप्न में ईश्वर को अपने घर में ही दर्शन देते देखते हैं तो यह बेहद शुभ संकेत होता है जिसका तात्पर्य यह होता है कि आपके पूरे परिवार पर ईश्वर की कृपा बनी हुई है।

 

४. यदि आप स्वप्न में ईश्वर को अपने कार्यस्थल या स्कूल/कॉलेज पर दर्शन देते देखते हैं तो इसका तात्पर्य यह होता है कि आपको कार्यक्षेत्र में कड़ी मेहनत के उपरांत बड़ी सफलता प्राप्त होगी।

 

५. यदि स्वप्न में ईश्वर आपको कोई सलाह दे रहे हैं तो इसका तात्पर्य यह होता है कि ईश्वर आपको अपने अंतर्मन की बात सुनने का संकेत दे रहे हैं।

 

६. यदि स्वप्न में ईश्वर आप पर क्रोधित दिखाई देते हैं तो इसका तात्पर्य यह होता है कि आप कोई ऐसा कार्य कर रहे हैं जिससे ईश्वर आपसे रुष्ठ हैं तथा ईश्वर आपको वह कार्य न करने की सलाह दे रहे हैं।

 

जय श्री राम।

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होलाष्टक 2021: होलाष्टक के साथ शुरू हुए रंग पर्व के विधान—Astrology Sutras

होलाष्टक 2021: होलाष्टक के साथ शुरू हुए रंग पर्व के विधान—Astrology Sutras

 

 

होलाष्टक 2021
होलाष्टक 2021

 

होलाष्टक फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से फाल्गुन माह की पूर्णिमा तक के समय को कहा जाता है होलाष्टक का अर्थ होता है होली से पहले के 8 दिवस होलाष्टक के समय सभी शुभ कार्य व मांगलिक कार्यक्रम वर्जित होते हैं इन 8 दिवसों में सभी मांगलिक कार्यक्रम जैसे विवाह, गृह प्रवेश व नई दुकानों को खोलना इत्यादि जैसे शुभ कार्यों को करना वर्जित माना गया है फाल्गुन मास की पूर्णिमा को होली का पर्व मनाया जाता है, और इसी दिन होलाष्टक की समाप्ति भी होती है।

 

2021 में कब से कब तक है होलाष्टक:-

 

होलाष्टक की शुरुआत 21 मार्च 2021 को फाल्गुन शुक्ल अष्टमी रविवार से हो रही है जो कि 28 मार्च 2021 रविवार तक है।

 

आमलकी एकादशी:-

 

आमलकी एकदशी को रंग भरी एकादशी भी कही जाती है फाल्गुन शुक्ल एकादशी के दिन रंग भरी एकादशी अर्थात आमलकी एकादशी मनाई जाती है इस बार एकादशी तिथि 24 मार्च 2021 को प्रातः 5 बजकर 46 मिनट पर लग रही है जो कि 25 मार्च 2021 को प्रातः 5 बजकर 38 मिनट तक रहेगी अतः 24 मार्च 2021 को रंग भरी एकादशी मनाई जाएगी।

 

होलिका दहन शुभ मुहर्त:-

 

फाल्गुन पूर्णिमा पर 28 मार्च 2021 को होलिका दहन किया जाएगा पूर्णिमा तिथि 27 मार्च 2021 को देर रात्रि 2 बजकर 28 मिनट पर लग रही है जो कि 28 मार्च 2021 को रात्रि 12 बजकर 39 मिनट तक रहेगी शास्त्रों के अनुसार भद्रा मुक्त पूर्णिमा में होलिका दहन का विधान है इस दिन भद्रा दोपहर में 1 बजकर 33 मिनट तक रहेगी होलिका दहन के संदर्भ में कहा गया है “निशामुखे प्रदोषे” सूर्यास्त के 48 मिनट बाद तक के समय को प्रदोष काल कहा जाता है 28 मार्च 2021 को सूर्यास्त शाम के 6 बजकर 11 मिनट पर हो रहा है हालांकि पूर्णिमा तिथि रात्रि 12 बजकर 39 मिनट तक है अतः प्रदोष काल से रात्रि 12:39 के पूर्व होलिका दहन किया जा सकता है इनमें भी होलिका दहन हेतु सबसे शुभ मुहर्त रात्रि 9 से 11 तक का है, 29 मार्च 2021 को चैत्र कृष्ण प्रतिपदा तिथि के दिन धूलि वंदन कर रंग पर्व होली मनाई जाएगी।

 

जय श्री राम।

Astrologer:- Pooshark Jetly

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होरा शास्त्र में द्वादश भावों की धर्म अर्थ काम मोक्ष के अनुरूप संक्षिप्त व्याख्या भाग-१

होरा शास्त्र में द्वादश भावों की धर्म अर्थ काम मोक्ष के अनुरूप संक्षिप्त व्याख्या भाग-१

 

होरा शास्त्र में द्वादश भावों की धर्म अर्थ काम व मोक्ष के अनुरूप संक्षिप्त व्याख्या
होरा शास्त्र में द्वादश भावों की धर्म अर्थ काम व मोक्ष के अनुरूप संक्षिप्त व्याख्या

 

जैसा कि आप सब जानते हैं कि प्रत्येक कुंडली मे १२ भाव होते हैं और यदि इन भावों को तीन-तीन के समूह में चार भागों में बाँटा जाए तो विभाजन निम्न प्रकार से होता है:-

 

१. धर्म त्रिकोण भाव:-  प्रथम, पंचम व नवम भाव को धर्म त्रिकोण भाव कहते हैं।

 

२. अर्थ त्रिकोण भाव:-  द्वितीय, षष्ठ व दशम भाव को अर्थ त्रिकोण भाव कहते हैं।

 

३. काम त्रिकोण भाव:-  तृतीय, सप्तम व एकादश भाव को काम त्रिकोण भाव कहते हैं।

 

४. मोक्ष त्रिकोण भाव:-  चतुर्थ, अष्टम व द्वादश भाव को मोक्ष त्रिकोण भाव कहते हैं।

 

इन स्थानों पर जो ग्रह तथा नक्षत्र होंगे वह अपने स्वभावानुसार उस व्यक्ति के कर्मों की गति स्पष्ट करते हैं उदाहरणार्थ:- यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में अशुभ या पापी ग्रह, अर्थ व काम अर्थात इच्छाओं के स्थान में बैठे हैं तो उस व्यक्ति की इच्छायें व प्रवृत्ति उसी तरफ अधिक होंगी और उसकी इच्छाएँ व अर्थ रूपये-पैसे संबंधी कार्य उसी समय पूरे होंगे जब उस कुण्डली की गणना के अनुसार उन ग्रहों का समय आयेगा वहीं दूसरी ओर, यदि कोई व्यक्ति धर्म व मोक्ष की प्राप्ति चाहता है, तो उसकी कुण्डली की कुंडली मे शुभ ग्रह धर्म व मोक्ष वाले स्थानों में अवश्य ही बैठे होंगें।

 

कुंडली के धर्म त्रिकोण भाव
कुंडली के धर्म त्रिकोण भाव

 

अब कुंडली के प्रत्येक भावों का विश्लेषण उपरोक्त प्रकार से करते हैं, जैसा कि आप सब जानते हैं कि  इस संसार मे धर्म ही प्रधान है व्यक्ति धर्म का समुचित पालन करके ही जीवन के अंतिम उद्देश्य मोक्ष तक पहुँच सकता है
इस कारण से ही किसी भी कुंडली मे 1, 5, 9 स्थान को मूल त्रिकोण की संज्ञा दी गई है अतएव सर्वप्रथम धर्म भावों के बारे में विस्तार से जानते हैं:-

 

लग्न स्थान प्रथम धर्म त्रिकोण भाव:-

 

कुंडली का प्रथम धर्म त्रिकोण भाव
कुंडली का प्रथम धर्म त्रिकोण भाव

 

इस भाव से व्यक्ति की शरीर पुष्टि, वात-पित्त-कफ प्रकृति, त्वचा का रंग, यश-अपयश, पूर्वज, सुख-दुख, आत्मविश्वास, अहंकार, मानसिकता आदि को जाना जाता है इससे हमें शारीरिक आकृति, स्वभाव, वर्ण चिन्ह, व्यक्तित्व, चरित्र, मुख, गुण व अवगुण, प्रारंभिक जीवन विचार, यश, सुख-दुख, नेतृत्व शक्ति, व्यक्तित्व, मुख का ऊपरी भाग, के संबंध में ज्ञान मिलता है।

पंचम भाव द्वितीय त्रिकोण भाव:-

 

कुंडली का द्वितीय धर्म त्रिकोण भाव
कुंडली का द्वितीय धर्म त्रिकोण भाव

 

इस भाव से संतति, बच्चों से मिलने वाला सुख, विद्या बुद्धि, उच्च शिक्षा, विनय-देशभक्ति, पाचन शक्ति, कला, रहस्य शास्त्रों की रुचि, अचानक धन-लाभ, प्रेम संबंधों में यशनौकरी परिवर्तन आदि का विचार किया जाता है इससे हमें विद्या, विवेक, लेखन, मनोरंजन, संतान, मंत्र-तंत्र, प्रेम, सट्टा, लॉटरी, अकस्मात धन लाभ, पूर्वजन्म, गर्भाशय, मूत्राशय, पीठ, प्रशासकीय क्षमता, आय जानी जाती है।

नवम भाव तृतीय धर्म त्रिकोण भाव:-

 

कुंडली का तृतीय धर्म त्रिकोण भाव
कुंडली का तृतीय धर्म त्रिकोण भाव

 

इस भाव से आध्यात्मिक प्रगति, भाग्योदय, बुद्धिमत्ता, गुरु, परदेश गमन, ग्रंथपुस्तक लेखन, तीर्थ यात्रा, भाई की पत्नी, दूसरा विवाह आदि के बारे में बताया जाता है इससे हमें धर्म, भाग्य, तीर्थयात्रा, संतान का भाग्य, साला-साली, आध्यात्मिक स्थिति, वैराग्य, आयात-निर्यात, यश, ख्याति, सार्वजनिक जीवन, भाग्योदय, पुनर्जन्म, मंदिर-धर्मशाला आदि का निर्माण कराना, योजना विकास कार्य, न्यायालय से संबंधित कार्य का विचार किया जाता है।

 

पोस्ट की लंबाई को ध्यान रखते हुए अगला भाग जल्द ही प्रकाशित होगा।

 

जय श्री राम।

 

ज्योतिर्विद प्रवीण सिंह परमार

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विक्रम संवत २०७८ के मासिक शिवरात्रि व्रत व पूजन विधि

विक्रम संवत २०७८ के मासिक शिवरात्रि व्रत व पूजन विधि

 

विक्रम संवत २०७८ के मासिक शिवरात्रि व्रत
विक्रम संवत २०७८ के मासिक शिवरात्रि व्रत

 

प्रति मास कृष्ण पक्षीय निशीथ काल व्यापिनी चतुर्दशी के दिन मासिक शिवरात्रि व्रत किया जाता है समाज में फाल्गुन तथा श्रावण मास पूजा विशेष प्रचलित है “ईशान संहिता” के अनुसार फाल्गुन मास में ज्योतिर्लिंग का प्रादुर्भाव हुआ था:-

 

शिवलिङ्गतयोद्भूतः कोटि सूर्य समप्रभः।

 

इसलिए उसे महाशिवरात्रि के नाम से जाना जाता है जनश्रुतियों के अनुसार श्रावण मास में शिव जी ने संसार की रक्षा हेतु विषपान किया था और विष की विकलता में इधर-उधर भागने लगे तब सभी ने विष की गर्मी से बचाने हेतु शिव जी का गंगाजल से रुद्राभिषेक किया था तभी से गंगाजल द्वारा रुद्राभिषेक की परंपरा शुरू हुई थी, गंगाजल से शिव अभिषेक आराधना में सर्वोत्तम माना जाता है गंगाजल के अतिरिक्त रत्नोदक, इक्षुरस (गन्ने का रस), दुग्ध, पंचामृत (दूध, दहीं, घी, चीनी, शहद) आदि अनेक द्रव्यों से किया जाता है।

 

वृहद् धर्मपुरण अ. ५७ में तो यहाँ तक लिखा है कि शिवलिङ्ग में सभी देवताओं का पूजन करें:-

 

शिवलिङ्गSपि सर्वेषां देवानां पूजनं भवेत्।

सर्वलोक मये यस्याच्छिव शक्तिविर्भु: प्रभु:।।

 

पंचाक्षर मन्त्र:- “नमः शिवाय”

षडाक्षर मंत्र:- “ॐ नमः शिवाय”

 

मासशिवरात्रि व्रत

 

मासिक शिवरात्रि व्रत तारीखें
मासिक शिवरात्रि व्रत तारीखें

 

१. वैशाख ९ मई २०२१ (रविवार)

२. ज्येष्ठ ८ जून २०२१ (मंगलवार)

३. आषाढ़ ८ जुलाई २०२१ (गुरुवार)

४.श्रावण (विशेष) ६ अगस्त २०२१ (शुक्रवार)

५. भाद्रपद ५ सितंबर २०२१ (रविवार)

६. आश्विन ४ अक्टूबर २०२१ (सोमवार)

७. कार्तिक २ नवंबर २०२१ (मंगलवार)

८. मार्गशीर्ष २ दिसंबर २०२१ (गुरुवार)

९. पौष १ जनवरी २०२२ (शनिवार)

१०. माघ ३० जनवरी २०२२ (रविवार)

११.फाल्गुन महाशिवरात्रि (विशेष)१ मार्च २०२२ (मंगलवार)

१२. चैत्र ३० मार्च २०२२ (बुधवार)

 

शिवरात्रि पूजन विधि:-

 

शिवरात्रि व्रत व पूजन विधि
शिवरात्रि व्रत व पूजन विधि

 

सुबह सूर्योदय से पूर्व उठकर नित्य क्रिया से निवृत्त होकर स्नानादि कर के भगवान शिव का जलाभिषेक व पंचामृत स्नान करना चाहिए तदोपरांत चंदन, भस्म, रोली, जौं, काला तिल, अक्षत शिवलिंग पर अर्पित करना चाहिए तथा जनेऊ, बड़ी सुपाड़ी, वस्त्र, इत्र, गुलाब के पुष्प, विल्वपत्र, दूर्वा, भांग व धतूरा अर्पित करना चाहिए उसके बाद नैवेध अर्पित कर शिव जी का पूजन करना चाहिए और आरती कर पूजा संपन्न करनी चाहिए, अभीष्ट लाभ हेतु रुद्राभिषेक, रुद्रार्चन कर सकते हैं।

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली

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