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लग्न कुंडली के एकादश भाव में सूर्य का फल–Astrology Sutras

लग्न कुंडली के एकादश भाव में सूर्य का फल–Astrology Sutras

 

लग्न कुंडली के एकादश भाव में सूर्य का फल
लग्न कुंडली के एकादश भाव में सूर्य का फल

 

यदि लग्न कुंडली के एकादश भाव में सूर्य हो तो ग्रंथकारों का मत है कि ऐसे व्यक्ति रूपवान, निरोगी, ज्ञानी, विनीत, गान विद्या में रुचि रखने वाले, कीर्तिमान, यशस्वी, सत्कर्मी, प्रसिद्ध, वाहन युत और अनेक शत्रुओं से युक्त होते हैं तथा ऐसे व्यक्ति धन-धान्य से युत व प्रायः सरकारी नौकरी वाले या सरकार से सम्मान प्राप्त करने वाले एवं सेवक जनों से प्रेम रखने वाले होते हैं, ऐसे व्यक्तियों को प्रायः २५ वें वर्ष में वाहन सुख प्राप्त होता है यदि लग्न कुंडली के एकादश भाव में सूर्य उच्च राशि मेष या स्वराशि सिंह का हो तो व्यक्ति कलह के कारण से तनावयुक्त किंतु राजा या उच्चपदाधिकारी द्वारा सम्मानित व लाभ प्राप्त करने वाला और चतुष्पद से धन लाभ प्राप्त करने वाला और अत्यधिक वलवान होता है साथ ही यदि सूर्य के साथ लग्न कुंडली के चतुर्थ भाव का स्वामी भी बैठा हो तो व्यक्ति का अनेक संपत्तियों पर अधिकार होता है किंतु ऐसे व्यक्तियों का भाग्य उतार-चढ़ाव से भरपूर रहता है।

 

यदि लग्न कुंडली के एकादश भाव में सूर्य हो तो व्यक्ति राजा के समान सुख व अधिकार प्राप्त करने वाला और लोगों को दंड देने का अधिकार रखने वाला होता है प्रायः ऐसे व्यक्ति जज के पद पर आसीन होते हैं या किसी ऊँचे पद पर आसीन होते हैं साथ ही ऐसे व्यक्तियों को प्रायः भारत रत्न भी प्राप्त होने की संभावना रहती है तथा इन्हें अनेक प्रकार के वाहनों व सवारी का सुख प्राप्त होता है मानसागरी में कहा गया है कि:-

 

बहुतरधनभागी चायसंस्थे दिनेशे नरपति गृहसेवी भोगहीनो गुणज्ञ:।
कृशतनु धनयुक्त: कामिनिचित्तहारी भवति चपलमूर्ति: जातिवर्ग प्रमोदी।।

 

अर्थात यदि लग्न कुंडली के एकादश भाव में सूर्य हो तो व्यक्ति को बहुधनवान होने का सौभाग्य प्राप्त होता है तथा ऐसे व्यक्ति राजसेवक होते हैं कहने का आशय यह है कि इन्हें राज कर्मचारी बनने का अवसर प्राप्त होता है तथा ऐसे व्यक्ति गुणवान होने के साथ-साथ दूसरों के गुणों की कदर करने वाले होते हैं किंतु इनका शरीर दुबला-पतला होता है और ऐसे व्यक्ति इतने रूपवान और मनोहर होते हैं कि इन्हें देखते ही कामिनी किशोरियों का चित्त फड़क उठता है और सुंदर स्त्रियाँ इनकी ओर खिंची हुई स्वम् ही चली आती है अर्थात ऐसे व्यक्ति मूर्तिमान कामदेव ही होते हैं, मंत्रेश्वर महाराज जी ने फलदीपिका में कहा है कि जिन व्यक्तियों की लगन कुंडली के एकादश भाव में सूर्य हो वह धनी और दीर्घायु होते हैं किंतु इन्हें अपने किसी अत्यधिक प्रिय की मृत्यु से अत्यधिक शोक सहन करना पड़ता है और ऐसे व्यक्ति राजा अथवा जनगण के मुखिया होते हैं साथ ही ऐसे व्यक्ति नेक सलाह देने वाले, सुंदर नेत्रों वाले व गायन विद्या में रुचि रखने वाले होते हैं।

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुभव व मत अनुसार यदि लग्न कुंडली के एकादश भाव में सूर्य हो तो ऐसे व्यक्ति अत्यधिक धनी, २५ वें वर्ष में वाहन सुख प्राप्त करने वाले, अनेक नौकर-चाकर से युक्त किंतु सूर्य का पापी ग्रह से संबंध बनाने पर अत्यधिक धन व्यय करने वाले होते हैं, ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार यदि लग्न कुंडली के एकादश भाव में सूर्य हो तो और पाप ग्रह से दृष्ट हो तो व्यक्ति को कोई न कोई दुःख प्रायः बना ही रहता है जैसे कभी संपत्ति का अभाव तो कभी संतति का अभाव होता है साथ ही एकादश भाव का सूर्य बड़े भाई के लिए शुभ नही होता है, एकादश भाव में यदि सूर्य मेष राशि का हो तो संतति का अभाव रहता है, मिथुन राशि का हो तो पुत्र का सुख नही मिलता कहने का आशय यह है कि या तो पुत्र से वैचारिक मतभेद रहता है या पुत्र को किसी प्रकार का कष्ट रहता है या पुत्र कहीं दूसरे स्थान में वास करता है या पुत्र की मृत्यु हो जाती है, यदि सिंह राशि का सूर्य हो तो अत्यधिक परिश्रम करने पर ही बड़ी सफलता मिलती है तथा कन्या संतति अधिक रहती है, यदि तुला राशि का हो तो धन, सम्मान, कीर्ति आदि सभी मिलते हैं लेकिन मन शांत नही रहता, यदि धनु राशि का सूर्य एकादश भाव में हो तो व्यक्ति कानून का विशेषज्ञ होता है, यदि कुंभ राशि का सूर्य हो तो कठिन परिश्रम से सफलताएं मिलती है किंतु पुत्र सुख उत्तम रहता है।

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार यदि लग्न कुंडली के एकादश भाव में सूर्य किसी भी पुरुष राशि का हो वह बड़े भाई के लिए अशुभ रहता है अर्थात या तो बड़े भाई की मृत्यु हो जाती है या बड़े भाई को कोई कष्ट रहता है या बड़े भाई से झगड़े होते रहते हैं साथ ही ऐसे व्यक्तियों को संपत्ति अवश्य ही मिलती है किंतु उसके लिए इन्हें अत्यधिक परिश्रम करना पड़ता है, यदि स्त्री राशि का सूर्य एकादश भाव में हो तो व्यक्ति को संतति व संपत्ति दोनो ही सुख मिलते हैं तथा संपत्ति अचानक से मिलती है।

 

जय श्री राम।

 

Astrologer:- Pooshark Jetly

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लग्न कुंडली के दशम भाव में सूर्य का फल–Astrology Sutras

लग्न कुंडली के दशम भाव में सूर्य का फल–Astrology Sutras

 

लग्न कुंडली के दशम भाव में सूर्य का फल
लग्न कुंडली के दशम भाव में सूर्य का फल

 

यदि लग्न कुंडली के दशम भाव में सूर्य हो तो ग्रंथकारों का मत है कि ऐसे व्यक्ति स्वस्थ, शूरवीर, अच्छी बुद्धि वाले, साधुजनों से प्रीति रखने वाले, प्रसिद्ध, बुद्धिमान, धन उपार्जन करने में चतुर, अति साहसी, संगीत प्रिय और भूमि व भवन के मालिक होते हैं साथ ही ऐसे व्यक्ति पुत्रवान, भूषण और वाहन युक्त होते हैं १८वें वर्ष में इन्हें विद्या के प्रताप से प्रसिद्धि व १९वें वर्ष में किसी से वियोग होता है साथ ही यदि सूर्य पर तीन ग्रहों की दृष्टि पड़ती हो तो व्यक्ति राजा का प्रिय, अच्छा कार्य करने में कुशल, पराक्रमी और प्रसिद्ध होता है, लग्न कुंडली के दशम भाव में यदि सूर्य उच्च राशि मेष या स्वराशि का सिंह का हो तो व्यक्ति बली, यशस्वी और प्रसिद्ध होता है किंतु यदि सूर्य पर पाप ग्रह की दृष्टि हो तो व्यक्ति के प्रत्येक कार्य में बाधाएं उत्पन्न होती रहती है।

 

यदि लग्न कुंडली के दशम भाव में सूर्य हो तो व्यक्ति की माता को किसी प्रकार के रोग प्रायः बने रहते हैं और ऐसे व्यक्तियों के मन में ग्लानि प्रायः बनी रहती है साथ ही ऐसे व्यक्तियों का मित्र व स्त्री आदि प्रियजनों से वियोग होता है, मानसागरी में कहा गया है कि:-

 

दशमभुवन संस्थे तीव्रभानौ मनुष्यो गुणगणसुखभागी दानशीलोऽभिमानी।
मृदुल: शुचियुक्तो नृत्यगीतानुरागी नरपति रतिपूज्य: शेषकाले च रोगी।।

 

अर्थात यदि लग्न कुंडली के दशम भाव में सूर्य हो तो व्यक्ति बहुगुणी होता है साथ ही ऐसे व्यक्ति सुखी, दानी, अभिमानी, कोमल, पवित्र, नाचने-गाने में रुचि रखने वाले और उच्चपदाधिकारी द्वारा सम्मानित होते किंतु जीवन के उत्तरार्ध में स्वास्थ्य समस्या से पीड़ित रहते हैं, मंत्रेश्वर महाराज जी ने फलदीपिका में कहा है कि यदि लग्न कुंडली के दशम भाव में सूर्य हो तो ऐसे व्यक्ति राजा के समान सुख प्राप्त करने वाले, पुत्रवान और अनेक सवारी का सुख प्राप्त करने वाले होते हैं साथ ही लोग इनकी प्रशंसा करते हैं और ऐसे व्यक्ति मतिमान, बलवान तथा कीर्तिमान होते हैं।

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार यदि लग्न कुंडली के दशम भाव में सूर्य हो तो व्यक्ति बुद्धिमान, प्रसिद्धि प्राप्त करने वाला, धन संचय में निपुण, सूर्य को 3 शुभ ग्रह देखते हों तो राजा द्वारा सम्मान प्राप्त करने वाला, तालाब-कुएं-मंदिर का निर्माण करवाने वाला तथा शुभ कार्यों में रुचि लेने वाला होता है, यदि लग्न कुंडली के दशम भाव में सूर्य मेष, कर्क, सिंह, वृश्चिक तथा धनु राशि का हो तो पुलिस, सेना व आबकारी के माध्यम से अच्छा धन लाभ प्राप्त करता है या बैंकिंग, फाइनेंस, मार्केटिंग के क्षेत्र में अच्छी उन्नति प्राप्त करता है, यदि सूर्य दशम भाव में वृषभ, कन्या, मकर, कुंभ या मिथुन राशि का हो तो व्यक्ति उच्चाधिकारी होता है साथ ही यदि अन्य शुभ ग्रहों का सहयोग हो व मंगल भी दशम भाव में सूर्य के साथ हो तो व्यक्ति राजनीति के क्षेत्र में ऊँचे शिखर पर पहुँचता है, तुला राशि का सूर्य यदि दशम भाव में हो तो कुछ झंझटों के साथ उन्नति प्राप्त होती है किंतु यदि सूर्य का नीचभंग हो रहा हो तो व्यक्ति जज, मिनिस्टर आदि के समान किसी पद को प्राप्त करता है।

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार यदि लग्न कुंडली के दशम भाव में सूर्य वृश्चिक राशि का हो तो व्यक्ति प्रसिद्ध डॉक्टर हो सकता है, दशम भाव का सूर्य एकदम से बड़ी सफलता नही देता ऐसे व्यक्ति धीरे-धीरे उन्नति प्राप्त करते हैं ऊंचे शिखर तक पहुँचते हैं किंतु जीवन के अंतिम भाग में रोगी होते हैं और बंधु-बांधवों से कलह व वियोग का दुःख प्राप्त करते हैं।

 

जय श्री राम।

 

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सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण का वर्णन श्रीमद्देवीभागवत महापुराण अनुसार

सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण का वर्णन श्रीमद्देवीभागवत महापुराण अनुसार

 

सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण का वर्णन
सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण का वर्णन

 

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण के तृतीय स्कंध के अष्टम अध्याय में ब्रह्मा जी कहते हैं:-

 

ब्रह्मोवाच

सर्गोऽयं कथितस्तात यत्पृष्टोऽहं त्वयाधुना।
गुणानां रूपसंस्थां वै श्रृणुष्वैकाग्रमानस:।।
सत्त्वं प्रीत्यात्मकं ज्ञेयं सुखात्प्रीतिसमुद्भव:।
आर्जवं च तथा सत्यं शौचं श्रद्धा क्षमा धृति:।।
अनुकम्पा तथा लज्जा शांति: संतोष एव च।
एतै: सत्त्वप्रतीतिश्च जायते निश्चला सदा।।

 

अर्थात ब्रह्मा जी बोले– हे तात! आपने जो मुझसे पूछा था वह सृष्टि का वर्णन मैंने कर दिया अतः अब गुणों का स्वरूप कहता हूँ, उसे एकाग्रचित्त होकर सुनो।

 

सत्वगुण को प्रीति स्वरूप समझना चाहिए, वह प्रीति सुख से संपन्न होती है सरलता, सत्य, शौच, श्रद्धा, क्षमा, धैर्य, कृपा, लज्जा, शांति और संतोष इन लक्षणों से निश्चल सत्वगुण की प्रीति होती है, सत्वगुण का वर्ण श्वेत है यह सर्वदा धर्म के प्रति प्रीति उत्पन्न करता है, सत्-श्रद्धा का आविर्भाव करता है तथा असत्-श्रद्धा को समाप्त करता है, तत्त्वदर्शी मुनियों ने तीन प्रकार की श्रद्धा बताई है– सात्त्विकी, राजसी एवं तीसरी तामसी।

 

रक्तवर्णं रज: प्रोक्तमप्रीतिकरमद्भुतम्।
अप्रीतिर्दु:खयोगत्वाद्भवत्येव सुनिश्चिता।।
प्रद्वेषोऽथ तथा द्रोहो मत्सर: स्तंभ एव च।
उत्कण्ठा च तथा निद्रा श्रद्धा तत्र च राजसी।
मानो मदस्तथा गर्वो रजसा किल जायते।
प्रत्येवयं रजस्त्वेतैर्लक्षणैश्च विचक्षणै:।।

 

अर्थात रजोगुण रक्तवर्ण वाला कहा गया है यह आश्चर्य एवं अप्रीति को उत्पन्न करता है दुःख से योग के कारण ही निश्चित रूप से अप्रीति उत्पन्न होती है जहाँ ईर्ष्या, द्रोह, मत्सर, स्तंभन, उत्कण्ठा एवं निद्रा होती है वहॉं राजसी श्रद्धा रहती है अभिमान, मद और गर्व ये सब भी राजसी श्रद्धा से ही उत्पन्न होते हैं अतः विद्वान् मनुष्यों को चाहिए कि वे इन लक्षणों द्वारा राजसी श्रद्धा समझ लें।

 

कृष्णवर्णं तम: प्रोक्तं मोहनं च विषादकृत्।
आलस्यं च तथाज्ञानं निद्रा दैन्यं भयं तथा।।
विवादश्चैव कार्पण्यं कौटिल्यं रोष एव च।
वैषम्यं वातिनास्तिक्यं परदोषानुदर्शनम्।।
प्रत्येतव्यं तमस्त्वेतैर्लक्षणै: सर्वथा बुधै:।
तामस्या श्रद्धया युक्तं परतापोपपादकम्।।

 

अर्थात तमोगुण का वर्ण कृष्ण होता है यह मोह और विषाद उत्पन्न करता है आलस्य, अज्ञान, निद्रा, दीनता, भय, विवाद, कायरता, कुटिलता, क्रोध, विषमता, अत्यंत नास्तिकता और दूसरों के दोषों को देखने का स्वभाव ये तीन तामसिक श्रद्धा के लक्षण हैं, तामसी श्रद्धा से युक्त ये सभी लक्षण परपीड़ादायक हैं।

 

सत्त्वं प्रकाशयितव्यं नियन्तव्यं रज: सदा।
संहर्तव्यं तम: कामं जनेन शुभमिच्छता।।

 

अर्थात आत्मकल्याण की इच्छा रखने वालों को अपने में निरंतर सत्वगुण का विकास करना चाहिए, रजोगुण पर नियंत्रण रखना चाहिए तथा तमोगुण का नाश करना चाहिए, ये तीनों गुण एक-दूसरे का उत्कर्ष होने की दशा में परस्पर विरोध करने लगते हैं ये सभी एक-दूसरे के आश्रित हैं, निराश्रय होकर नही रहते, तीनों गुण सत्त्वगुण, रजोगुण तथा तमोगुण में से कोई एक अकेला कभी नही रह सकता ये सभी सदैव मिलकर रहते हैं इसलिए ये अन्योन्याश्रय संबंध वाले कहे गए हैं।

 

सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण के अन्योन्याश्रय संबंध होने का वर्णन अगले भाग में…..

 

जय श्री राम।

 

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श्रीमद्देवीभागवत महापुराण के अनुसार बुध के जन्म की कथा

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण के अनुसार बुध के जन्म की कथा

 

बुध के जन्म की कथा
बुध के जन्म की कथा

 

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण के प्रथम स्कंध के ग्याहरवें अध्याय में बुध के जन्म की सुंदर कथा मिलती है जिन्हें ४ भाग में प्रकाशित करूँगा तो चलिए जानते हैं कि श्रीमद्देवीभागवत महापुराण के अनुसार बुध के जन्म की क्या कथा है:-

 

ऋषय ऊचु:

कोऽसौ पुरुरवा राजा कोर्वशी देवकन्याका।
कथं कष्टं च सम्प्राप्तं तेन राज्ञा महात्मना।।
सर्वं कथानकं ब्रूहि लोमहर्षणजाधुना।
श्रोतुकामा वयं सर्वे त्वन्मुखाब्जच्युतं रसम्।।
अमृतादपि मिष्टा ते वाणी सूत रसात्मिका।
न तृप्यामो वयं सर्वे सुधया च यथामरा:।।

 

अर्थात ऋषिगण बोले– हे सूत जी! वे राजा पुरुरवा कौन थे तथा वह देवकन्या उर्वशी कौन थी? उस मनस्वी राजा ने किस प्रकार संकट प्राप्त किया? हे लोमहर्षणतनय! आप इस समय पूरा कथानक विस्तारपूर्वक कहें हम सभी लोग आपके मुखारविंद से निःसृत रसमयी वाणी को सुनने के इच्छुक हैं, हे सूत जी! आपकी वाणी अमृत से भी बढ़कर मधुर एवं रसमयी है, जिस प्रकार देवगण अमृत पान से कभी तृप्त नही होते ठीक उसी प्रकार आपके कथा श्रवण से हम तृप्त नही होते।

 

सूत उवाच

श्रृणुध्वं मुनयः सर्वे कथां दिव्यां मनोरमाम्।
वक्ष्याम्यहं यथाबुद्धया श्रुतां व्यावरोत्तमात्।।
गुरोस्तु दयिता भार्या तारा नामेति विश्रुता।
रूपयौवनयुक्ता सा चार्वङ्गी मदविह्वला।।
गतैकदा विधोर्धाम यजमानस्य भामिनि।
दृष्टा च शशिनात्यर्थं रूपयौवनशालिनी।।
कामातुरस्तदा जात: शशी शशिमुखीं प्रति।
सापि वीक्ष्य विधुं कामं जाता मदनपीड़िता।।

अर्थात सूत जी बोले– हे मुनियों! अब आप लोग उस दिव्य तथा मनोहर कथा को सुनिए, जिसे मैंने परम श्रेष्ठ व्यासा जी के मुख से सुना है, मैं उसे अपनी बुद्धि के अनुसार कहूँगा।

 

सुर गुरु बृहस्पति की पत्नी का नाम “तारा” था, वह रूप-यौवन से संपन्न तथा सुंदर अंगों वाली थी एक बार वह सुंदरी अपने यजमान चंद्रमा के घर गईं उस रूप तथा यौवन से संपन्न चंद्रमुखी कामिनी को देखते ही चंद्रमा उस पर आसक्त हो गए तथा देवी तारा भी चंद्रमा को देखकर आसक्त हो गईं इस प्रकार दोनों तारा व चंद्रमा एक-दूसरे को देखकर प्रेमविभोर हो गए, ये दोनों प्रेमोन्मत्त एक-दूसरे को चाहने की इच्छा से युक्त हो विहार करने लगे इस प्रकार उनके कुछ दिन व्यतीत हुए तब बृहस्पति ने देवी तारा को घर लाने के लिए अपना एक शिष्य भेजा परंतु वह न आ सकी, जब चंद्रमा ने बृहस्पति के शिष्य को कई बार लौटाया तो बृहस्पति क्रोधित होकर चंद्रमा के पास स्वम् गए और चंद्रमा के घर जाकर उदार चित्त बृहस्पति ने अभिमान के साथ मुस्कुराते हुए उस चंद्रमा से कहा:-

 

गत्वा सोमगृहं तत्र वाचस्पतिरुदारधी:।
उवाच शशिनं क्रुद्ध: स्मयमानं मदान्वितम्।।
किं कृतं किल शीतांशो कर्म धर्मविगर्हितम्।
रक्षिता मम भार्येयं सुन्दरी केन हेतुना।।

 

अर्थात हे चंद्रमा! तुमने यह धर्मविरुद्ध कार्य क्यों किया और मेरी इस परम सुंदरी पत्नी को अपने घर में क्यों रख लिया? हे देव! मैं तुम्हारा गुरु हूँ और तुम मेरे यजमान हो तब हे मूर्ख! तुमने गुरु पत्नी को अपने घर में क्यों रख लिया? ब्रह्म हत्या करने वाला, सुवर्ण चुराने वाला, मदिरापान करने वाला, गुरूपत्नीगामी तथा पाँचवा इन पापियों के साथ संसर्ग रखने वाला– ये “महापातकी” है, तुम महापापी, दुराचारी एवं अत्यंत निन्दनीय हो यदि तुमने मेरी पत्नी के साथ अनाचर किया है तो तुम देवलोक में रहने योग्य नही हो, हे दुष्टात्मन्! असितापांगी मेरी इस पत्नी को छोड़ दो जिससे मैं इसे अपने घर ले जायूँ अन्यथा गुरु पत्नी का अपहरण करने वाले तुझको मैं श्राप दे दूँगा, इस प्रकार बोलते हुए स्त्री विरह से कातर तथा क्रोधाकुल देव गुरु बृहस्पति से रोहिणी पति चंद्रमा ने कहा:-

 

शेष अगले भाग:-२ में……

 

जय श्री राम।

 

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लग्न कुंडली के नवम भाव में सूर्य का फल–Astrology Sutras

लग्न कुंडली के नवम भाव में सूर्य का फल–Astrology Sutras

 

लग्न कुंडली के नवम भाव में सूर्य का फल
लग्न कुंडली के नवम भाव में सूर्य का फल

 

यदि लग्न कुंडली के नवम भाव में सूर्य हो तो ग्रंथकारों का मत है कि ऐसे व्यक्ति धर्म-कर्म में निरत, श्रेष्ठ बुद्धि वाले, मातृकुल के विरोधी, पुत्रवान, सुखी और पुत्र तथा मित्रों से सुखी रहते हैं साथ ही ऐसे व्यक्ति सूर्य और शिव आदि देवताओं का पूजन करने वाले तथा पिता से विरोध करने वाले होते हैं, यदि लग्न कुंडली के नवम भाव में सूर्य हो तो व्यक्ति उत्कृष्ट विषय और सूर्य मंडल की अद्भुत घटना वली से प्रेम रखने वाला, उदार, साधारण संपत्ति अर्जित करने वाला, अच्छी सूझ-बूझ वाला तथा पैतृक संपत्ति का त्याग करने वाले होते हैं साथ ही इन्हें प्रायः पहले और दसवें वर्ष में तीर्थ यात्रा का सौभाग्य भी प्राप्त होता है किंतु यदि सिंह राशि का सूर्य नवम भाव में हो तो प्रायः व्यक्ति के भाई नही होते या भाई से वैचारिक मतभेद रहते हैं या भाई को किसी प्रकार से स्वास्थ्य में समस्या रहती है तथा यदि लग्न कुंडली के नवम भाव में सूर्य अपनी मित्र राशि का हो तो व्यक्ति सात्विक, अनुष्ठान शील और धार्मिक होता है।

 

यदि लग्न कुंडली के नवम भाव में सूर्य अपनी उच्च राशि अर्थात मेष या मित्र राशि के होकर स्थित हो तो व्यक्ति के पिता दीर्घायु होते हैं साथ ही ऐसे व्यक्ति धनवान और ईश्वर का भजन तथा भक्ति करने वाले होते हैं और इन्हें गुरु व देवताओं से अत्यधिक प्रेम रहता है किंतु यदि सूर्य लग्न कुंडली के नवम भाव में अपनी नीच राशि अर्थात तुला के होकर स्थित हों तो यह स्थिति भाग्य एवं धर्मानुष्ठान दोनो के लिए अनिष्टकर होता है और चिंता तथा विरक्ति प्रदान करता है, मंत्रेश्वर महाराज जी ने फलदीपिका में कहा है कि यदि लग्न कुंडली के नवम भाव में सूर्य स्थित हो तो ऐसे व्यक्तियों को पिता व गुरु का पूर्ण सुख नही मिल पाता है किंतु ऐसे व्यक्तियों को पुत्र एवं बांधवों से अवश्य ही सुख मिलता है साथ ही ऐसे व्यक्ति देव व ब्राह्मण के भक्त होते हैं, मानसागरी में कहा गया है कि:-

 

ग्रहगतदिननाथे सत्यवादी सुकेशी कुलजनहितकारी देवविप्रानुरक्त:।
प्रथमवसि रोगी यौवनेस्थैयुक्तो बहुतरधनयुक्तो दीर्घजीवी सुमुर्ति:।

 

अर्थात यदि लग्न कुंडली के नवम भाव में सूर्य हो तो व्यक्ति सत्यवक्ता, सुंदर केशों वाला, कुल के लोगों का हित चाहने वाला, देवताओं व ब्राह्मणों में श्रद्धा रखने वाला होता है साथ ही ऐसे व्यक्तियों का बचपन में स्वास्थ्य प्रायः उतार-चढ़ाव युक्त तथा युवावस्था में स्थिरता होती है तथा ऐसे व्यक्ति धनाढ्य, दीर्घायु तथा रूपवान होते हैं, आचार्य वराहमिहिर के अनुसार यदि लग्न कुंडली के नवम भाव में में सूर्य हो तो व्यक्ति सुखी होता है तथा इन्हें धन, पुत्र एवं शौर्य तीनों सुख प्राप्त होते हैं।

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुभव व मत के अनुसार यदि लग्न कुंडली के नवम भाव में सूर्य हो तो व्यक्ति को केवल शुभ फल ही प्राप्त हों ऐसा नही होता है सभी ग्रंथकारों ने नवमस्थ सूर्य के कुछ शुभ तो कुछ अशुभ फल बताए हैं वैधनाथ जी ने तो यहाँ तक कहा है कि यदि लग्न कुंडली के नवम भाव में सूर्य हो तो व्यक्ति धर्मान्तर कर लेता है जो कि अत्यंत अशुभ फल है वैधनाथ जी के मत के अनुसार व्यक्ति नवमस्थ सूर्य की अन्त: प्रेरणा से अपना परंपरागत श्रुति-स्मृति-प्रतिपादित धर्म जो छोड़कर विधर्मियों के धर्म को स्वीकार करता है ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार यह फल तभी मिलते हैं जब नवम भाव का स्वामी पाप प्रभाव युक्त हो, यदि लग्न कुंडली के नवम भाव में सूर्य हो व्यक्ति को जीवन के प्रथम भाग में दुःख तथा अंतिम भाग में सुख मिलता है किंतु ऐसे व्यक्तियों को बुढापे में भी प्रायः कोई दुःख रहता है।

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार यदि लग्न कुंडली के नवम भाव में सूर्य मिथुन, तुला या कुंभ राशि का हो तो व्यक्ति लेखक, प्रकाशक या प्राध्यापक हो सकते हैं, यदि मेष, सिंह व धनु राशि का सूर्य नवम भाव में हो तो ऐसे व्यक्ति सेना, पुलिस या अन्य किसी प्रकार के सुरक्षा विभाग में कार्य करते हैं या फिर इंजीनियर होते हैं, यदि लग्न कुंडली के नवम भाव में सूर्य कर्क, वृश्चिक या मीन के हो तो व्यक्ति कवि, नाटककार, रसायन विद्या का संशोधक या धर्म से जुड़ा हुआ कार्य करने वाला होता है, यदि लग्न कुंडली के नवम भाव में सूर्य वृषभ, कन्या या मकर राशिगत हो तो व्यक्ति खेती या व्यापार का मालिक होता है, ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार यदि लग्न कुंडली के नवम भाव में सूर्य हों तो व्यक्ति धार्मिक, देवताओं व ब्राह्मणों का भक्त होता है किंतु ऐसे व्यक्ति बहुत भाग्यशाली नही होते, ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार यदि लग्न कुंडली के नवम भाव में सूर्य हो तो व्यक्ति को स्त्री व पुत्र दोनो सुख उत्तम मिलते हैं तथा यदि सूर्य उच्च राशि मेष का हो तो पिता की अच्छी उन्नति व पिता से अत्यधिक प्रेम आदि फल भी मिलते हैं और ऐसे व्यक्तियों के पिता दीर्घायु होते हैं किंतु यदि सूर्य नवम भाव में नीच राशि तुला का हो तो व्यक्ति के पिता से वैचारिक मतभेद रहते हैं तथा पिता को कोई कष्ट अथवा पिता की मृत्यु आदि फल मिलते हैं।

 

जय श्री राम।

 

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भागवत महापुराण के अनुसार आद्याशक्ति के प्रभाव का वर्णन एवं ब्रह्मांड के आविर्भाव की कथा

भागवत महापुराण के अनुसार आद्याशक्ति के प्रभाव का वर्णन एवं ब्रह्मांड के आविर्भाव की कथा

 

आद्याशक्ति के प्रभाव का वर्णन एवं ब्रह्मांड के आविर्भाव की कथा
आद्याशक्ति के प्रभाव का वर्णन एवं ब्रह्मांड के आविर्भाव की कथा

 

श्रीमद्देवी भागवत महापुराण के तृतीय स्कंध के द्वितीय अध्याय में व्यास जी कहते हैं कि:-

 

व्यास उवाच

यत्त्वया च महाबाहो पृष्टोऽहं कुरुसत्तम।
तान्प्रश्नान्नारद: प्राह मया पृष्टो मुनिश्वरः।।

 

अर्थात व्यास जी बोले हे महाबाहो! हे कुरुश्रेष्ठ! आपने मुझसे जो प्रश्न पूछे हैं, उन्ही प्रश्नों को मेरे द्वारा मुनिराज नारद जी से पूछे जाने पर उन्होंने इस विषय पर ऐसा कहा था:-

 

नारद उवाच

व्यास किं ते ब्रवीम्यद्य पुरायं संशयो मम।
उत्पन्नो हिर्दयेऽत्यर्थं संदेहसारपीड़ित:।।

गत्वाहं पितरं स्थाने ब्रम्हाणममितौजसम्।
अपृच्छं यत्त्वया पृष्टं व्यासाद्य प्रश्नमुत्तमम्।।

 

अर्थात नारद जी बोले हे व्यास जी! मैं आपसे इस समय क्या कहूँ? प्राचीन काल में यही शंका मेरे भी मन में उत्पन्न हुई थी और संदेह को बहुलता से मेरा मन उद्वेलित हो गया था, हे व्यास जी! तदन्तर मैंने ब्रह्म लोक में अपने अमित तेजस्वी पिता ब्रह्मा जी के पास पहुँचकर यही प्रश्न पूछा था जो उत्तम प्रश्न आपने मुझसे पूछा है।

 

पित: कुत: समुत्पन्नं ब्रह्मांडमखिलं विभो।
भवत्कृतेन वा सम्यक किं विष्णुकृतं तत्विदम्।।

रुद्रकृतं वा विश्वात्मन् ब्रूहि सत्यं जगत्पते।
आराधनीय: क: कामं सर्वोत्कृष्टश्च क: प्रभु:।।

 

अर्थात हे पिता जी! इस संपूर्ण ब्रह्मांड का आविर्भाव कैसे हुआ? हे विभो! इसका निर्माण आपने किया है अथवा विष्णु ने अथवा शिव ने इसकी रचना की है? हे विश्वात्मन्! मुझे सही-सही बताइए, हे जगत्पते! सर्वश्रेष्ठ ईश्वर कौन है और किसकी आराधना करनी चाहिए?

 

हे ब्रह्मन! वह सब बताइए और मेरे संदेहों को दूर करिए, हे निष्पाप! मैं असत्य तथा दुःख रूप संसार में डूबा हुआ हूँ, संदेहों से दोलायमान मेरा मन तीर्थों में, देवताओं में तथा अन्य साधनों में कहीं भी नही शांत हो पा रहा है, मैं किसका स्मरण करूँ, किसका यजन करूँ, कहाँ जायूँ, किसकी अर्चना करूँ और किसकी स्तुति करूँ? हे देव! मैं उस सर्वेश्वर परमात्मा को जानता भी नही हूँ, हे सत्यवतीतनय व्यास जी! मेरे द्वारा किए गए दुरूह प्रश्नों को सुनकर लोकपितामह ब्रह्मा जी ने तब मुझसे ऐसा कहा—

 

ब्राह्मोवाच

किं ब्रबीमि सुताद्याहं दुर्बोधनं प्रश्नमुक्तमम्।
त्वयाशक्यं महाभाग विष्णोरपि सुनिश्चयात्।।

रागी कोऽपि न जानाति संसारेऽस्मिन्महामते।
विरक्तश्च विजानाति निरीहो यो विमत्सरः।।

एकार्णवे पुरा जाते नष्टे स्थावरजङ्गमे।
भूतमात्रे समुत्पन्ने सञ्जज्ञे कमलादहम्।।

 

अर्थात ब्रह्मा जी बोले हे पुत्र! तुमने आज एक दुरूह तथा उत्तम प्रश्न किया है, उसके विषय में मैं क्या कहूँ हे महाभाग! साक्षात् विष्णु जी द्वारा भी इसका निश्चित उत्तर दिया जाना संभव नही है, हे महामते! इस संसार के क्रियाकलापों में आसक्त कोई भी ऐसा नही है जो इस तत्व का ज्ञान रखता हो कोई विरक्त, निःस्पृह तथा विद्वेषरहित ही इसे जान सकता है।

 

प्राचीनकाल में जल प्रलय होने पर स्थावर-जंगमादिक प्राणियों के नष्ट हो जाने तथा मात्र पंचमहाभूतों की उत्पत्ति होने पर मैं कमल में आविर्भूत हुआ तथा उस समय मैंने सूर्य, चंद्र, वृक्षों तथा पर्वतों को नही देखा और कमल कर्णिका पर बैठा हुआ विचार करने लगा:-

 

कस्मादहं सुमुद्भूत: सलिलेऽस्मिन्महार्णवे।
को मे त्राता प्रभु: कर्ता संहर्ता वा युगात्यये।।

 

अर्थात कि इस महासागर के जल में में मेरा प्रादुर्भाव किससे हुआ? मेरा निर्माण करने वाला, रक्षा करने वाला तथा युगांत के समय संहार करने वाला प्रभु कौन है? कहीं भूमि भी स्पष्ट नही दिखाई दे रही है, जिसके आधार पर यह जल टिका है तो फिर यह कमल कैसे उत्पन्न हुआ, जिसकी उत्पत्ति जल और पृथ्वी के संयोग से ही प्रसिद्ध है, आज मैं इस कमल का मूल आधार पंक अवश्य देखूँगा; और फिर उस पंक की आधार स्वरूपा भूमि भी अवश्य मिल जाएगी, इसमें संदेह नही है।

 

उत्तरन्सलिले तत्र यावद्वर्षसहस्त्रकम्।
अन्वेषामाणो धरणीं नावाप तां यदा तदा।।

तपस्तपेति चाकाशे वागभूदशरीरिणी।
ततो मया तपस्तप्तं पद्मे वर्षसहस्त्रकम्।।

 

अर्थात:- ब्रह्मा जी बोले, हे महामते! तदन्तर मैं जल में नीचे उतरकर हजारों वर्षों तक पृथ्वी को खोजता रहा, किंतु जब उसे नही पाया तब आकाशवाणी हुई कि “तपस्या करो” तत्पश्चात मैं उसी कमल पर आसीन होकर हजारों वर्षों तक घोर तपस्या करता रहा, इसके बाद पुनः एक अन्य आकाशवाणी उत्पन्न हुई “सृष्टि करो” इसे मैंने साफ-साफ सुना उसे सुनकर व्याकुल चित्त वाला मैं सोचने लगा किसका सृजन करूँ और किस प्रकार करूँ, उसी समय:-

 

तदा दैत्यावपि प्राप्तौ दारुणौ मधुकैटभौ।
ताभ्यां विभिषितश्चाहं युद्धाय मकरालये।।

 

मधु-कैटभ नाम वाले दो भयानक दैत्य मेरे सम्मुख आ गए, उस महासागर में युद्ध के लिए तत्पर उन दोनों दैत्यों से मैं अत्यधिक भयभीत हो गया तत्पश्चात मैं उसी कमल की नाल का आश्रय लेकर जल के भीतर उतरा और वहाँ एक अत्यंत अद्भुत पुरुष को मैंने देखा।

 

मेघश्यामशरीरस्तु पीत्वासाश्चतुर्भुज:।
शेषशायी जगन्नाथो वनमालाविभूषित:।।

 

अर्थात उनका शरीर मेघ के समान श्याम वर्ण वाला था, वे पीत वस्त्र धारण किए हुए थे और उनकी चार भुजाएं थीं, वे जगत्पति वनमाला से अलंकृत थे तथा शेषशय्या पर सो रहे थे, वे शंख, चक्र, गदा, पद्म आदि आयुध धारण किए हुए थे इस प्रकार मैंने शेषनाग की शय्या पर शयन करते हुए उन महाविष्णु को देखा।

 

हे नारद जी! योगनिद्रा के वशीभूत होने के कारण निष्पंद पड़े उन भगवान् अच्युत को शेषनाग के ऊपर सोया हुआ देखकर मुझे अद्भुत चिंता हुई और मैं सोचने लगा कि अब मैं क्या करूँ? तब मैंने निद्रास्वरूपा भगवती का स्मरण किया और मैं उनकी स्तुति करने लगा, मेरी स्तुति से वे कल्याणकारी भगवती विष्णु भगवान जी के शरीर से निकलकर आकाश में विराजमान हुईं, उस समय दिव्य आभूषणों से अलंकृत वे भगवती कल्पनाओं से परे विग्रह वाली प्रतीत हो रही थीं इस प्रकार विष्णु जी का शरीर तत्काल छोड़कर जब वे आकाश में विराजित हो गईं तब उनके द्वारा मुक्त किए गए अनंतात्मा वे जनार्दन उठ गए।

 

पञ्चवर्षसहस्त्राणि कृतवान्युद्धमुक्तमम्।
तदा विलोकितौ दैत्यौ हरिणा विनिपातीतौ।।

 

अर्थात तत्पश्चात उन्होंने पाँच हजार वर्षों तक युद्ध किया, पुनः उन महामाया भगवती के दृष्टिपात से मोहित किए गए उन दोनों दैत्यों को भगवान विष्णु ने अपनी जांघों को विस्तृत कर के उनका वध कर दिया, उसी समय जहाँ हम दोनों थे वहीं पर शंकर जी भी आ गए, तब हम तीनों ने गगन-मंडल में विराजमान उन मनोहर देवी को देखा, हम लोगों के द्वारा उन परम शक्ति की स्तुति किए जाने पर अपनी पवित्र कृपा दृष्टि से हम लोगों को प्रसन्न कर के उन्होंने वहाँ स्थित हम लोगों से कहा:-

 

देवयुवाच

काजेशा: स्वानि कार्याणि कुरुध्वं समतन्द्रिता:।।

सृष्टिस्थितिविशिष्टानि हतावेतौ महासुरौ।
कृत्वा स्वानि निकेतानि वसध्यं विगतज्वरा:।।

प्रजाश्चतुर्विद्या: सर्वा: सृजध्वं स्वविभूतिभि:।

 

अर्थात देवी बोलीं- हे ब्रह्मा, विष्णु, महेश! अब आप लोग सृष्टि, पालन एवं संहार के अपने-अपने कार्य प्रमाद रहित होकर कीजिए अब आप लोग अपना-अपना निवास बनाकर निर्भीकता पूर्वक रहिए क्योंकि उन दोनों महादैत्यों का संहार हो गया है अतः आप लोग अपनी विभूतियों से अण्डज, पिण्डज, उद्भिज्ज और स्वदेज चारों प्रकार की प्रजाओं का सृजन कीजिए।

 

तब ब्रह्मा, विष्णु व महेश ने उन भगवती का वह मनोहर, सूखकर तथा मधुर वचन सुनकर उनसे कहा हे माता! हम लोग शक्तिहीन हैं, अतः इन प्रजाओं का सृजन कैसे करें? अभी विस्तृत पृथ्वी ही नही है और सभी ओर जल ही जल भरा हुआ है, सृष्टि कार्य के लिए आवश्यक पंचतत्व, गुण, तन्मात्राएँ और इन्द्रियाँ ये कुछ भी नही है हम लोगों के वचन सुनकर भगवती का मुखमंडल मुस्कान से भर उठा तथा उसी समय वहाँ आकाश से रमणी विमान आ पहुँचा तत्पश्चात् उन भगवती ने कहा हे देवताओं! आप लोग निर्भीक होकर इस विमान में इच्छानुसार बैठ जाएँ।

 

हे ब्रह्मा, विष्णु और शिव! मैं आप लोगों को आज इस विमान में एक अद्भुत दृश्य दिखाऊँगी, उनका यह वचन सुनकर हम तीनों उनकी बात स्वीकार कर के रत्नजटित, मोतियों की झालरों से शोभायान, घंटियों की ध्वनि से गुंजित तथा देव भवन के तुल्य उस रमणीक विमान पर संशय रहित भाव से चढ़कर बैठ गए तब भगवती ने हम जितेंद्रिय देवताओं को बैठा हुआ देखकर उस विमान को अपनी शक्ति से आकाशमण्डल में उड़ाया।

 

शेष इसके आगे की कथा अगले लेख में श्रीमद्देवी भागवत महापुराण के तृतीय स्कंध के तृतीय अध्याय भागवत महापुराण के अनुसार देवी लोक के दर्शन व ब्रह्मा, विष्णु और शिव जी का आश्चर्यचकित होना में…….

 

जय श्री राम।

 

Astrologer:- Pooshark Jetly

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मंगल का कर्क राशि से गोचर 4 जून 2021 जानिए विभिन्न राशियों पर पड़ने वाले प्रभाव–Astrology Sutras

मंगल का कर्क राशि से गोचर 4 जून 2021 जानिए विभिन्न राशियों पर पड़ने वाले प्रभाव–Astrology Sutras

 

मंगल का कर्क राशि से गोचरमंगल का कर्क राशि से गोचर
मंगल का कर्क राशि से गोचर

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार भूमि पुत्र मंगल, लोहितांग के नाम से भी जाने जाते हैं जो कि शिव जी के पसीने से उत्पन्न हुए थे और देवी पृथ्वी के आग्रह करने पर शिव जी ने उन्हें सौंपा था, मंगल ग्रह को नव ग्रहों में सेनापति के नाम से जाना जाता है जो कि शक्ति, पराक्रम व ऊर्जा के ग्रह हैं इनका वर्ण रक्त अर्थात लाल है यदि मंगल किसी व्यक्ति की कुंडली में द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम व द्वादश भाव में हो तो कुज दोष जिसे हम सभी मंगल दोष के नाम से जानते हैं बनता है जो कि दामपत्य जीवन के लिए शुभ नही माना जाता है किंतु यदि यही मंगल राजयोगकारक हो जाए तो अनेक प्रकार शुभ प्रभावी हो जाता है, मेष व वृश्चिक मंगल की स्वराशि है अर्थात मेष व वृश्चिक राशि का स्वामित्व मंगल ग्रह के पास है, मंगल ग्रह मकर राशि में उच्च के तो कर्क राशि में नीच के हो जाते हैं “ऋषिकेश पंचांग (काशी)” के अनुसार मंगल ग्रह ४ जून २०२१ को नवमी तिथि शुक्रवार के दिन प्रातः ०५:२० पर मिथुन राशि को छोड़कर अपनी नीच राशि कर्क जो कि चंद्रमा के स्वामित्व वाली राशि है में प्रवेश करेंगे तो चलिए जानते हैं मंगल के कर्क राशि से गोचर के दौरान विभिन्न राशियों पर क्या प्रभाव पड़ेंगे:-

 

मेष राशि:-

 

मेष राशिफल
मेष राशिफल

 

मेष राशि वालों के लिए मंगल प्रथम भाव अर्थात लग्न एवं अष्टम भाव के स्वामी होकर चतुर्थ भाव से गोचर करेंगे ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार मंगल के कर्क राशि से गोचर के दौरान माता-पिता के स्वास्थ्य में समस्याएं उत्पन्न हो सकती है अतः माता-पिता के स्वास्थ्य का विशेष ख्याल रखें, घर के माहौल में तनावपूर्ण स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती है, यदि आप घर खरीदने या बदलने का सोच रहे हैं तो अभी कुछ समय रुक जाएं, जिन व्यक्तियों को स्किन से जुड़ी समस्या या रक्त जनित कोई समस्या हो उन्हें अपने स्वास्थ्य के प्रति सतर्क रहना चाहिए, जीवनसाथी के मध्य विवादपूर्ण स्थितियाँ उत्पन्न होंगी, व्यापारियों के लिए मंगल का यह गोचर कुछ झंझटों के साथ उन्नति के अवसर प्रदान करने वाला रहेगा, बड़े भाई-बहन का सहयोग प्राप्त होगा व उनकी उन्नति भी होगी।

 

उपाय:- नित्य सुंदरकांड का पाठ करें।

 

वृषभ राशि:-

 

वृषभ राशिफल
वृषभ राशिफल

 

वृषभ राशि वालों के लिए मंगल सप्तम व द्वादश भाव के स्वामी होकर तृतीय भाव से गोचर करेंगे ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार छोटे भाई-बहन से वैचारिक मतभेद होने की संभावना रहेगी, आलस्य का त्याग करें, मंगल के इस गोचर काल के दौरान आप में क्रोध की अधिकता रहेगी व आप शीघ्र ही आवेश में आकर कोई ऐसा कार्य कर सकते हैं जिसका आपको बाद में अफसोस होगा अतः आवेश में आने से बचें, तनावपूर्ण स्थितियाँ उत्पन्न होंगी अतः तनाव लेने से बचें, जो व्यक्ति सेना, पुलिस, ईंधन, विज्ञान या वैध के कार्यक्षेत्र से जुड़े हुए हैं उनके लिए यह गोचर बेहद शुभ रहेगा, फोड़े-फुंसी व घाव के अतिरिक्त स्किन से जुड़ी एलर्जी एवं रक्त जनित कोई समस्या संभव रहेगी, भुजाओं में कुछ कमजोरी अनुभव हो सकती है, भाग्य वृद्धि हेतु अतिरिक्त परिश्रम करना होगा व अत्यधिक परिश्रम करने पर कार्यक्षेत्र में बड़ी सफलता प्राप्त होगी।

 

उपाय:- सिद्धकुंजिका स्तोत्र का नित्य पाठ करें।

 

मिथुन राशि:-

 

मिथुन राशिफल
मिथुन राशिफल

 

मिथुन राशि वालों के लिए मंगल षष्ठ एवं एकादश भाव के स्वामी होकर द्वितीय भाव से गोचर करेंगे ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार मंगल के इस गोचर काल के दौरान मिथुन राशि वाले व्यक्तियों को अपनी वाणी पर विशेष नियंत्रण रखना चाहिए अन्यथा बनते हुए कार्य बिगड़ जाएंगे व लोग आपके शत्रु बन जाएंगे, दवाईयों व शत्रुओं पर धन व्यय होने के योग बनेंगे, आय वृद्धि हेतु अधिक प्रयास करना पड़ेगा, अकास्मिक धन लाभ के योग बनेंगे, जीवनसाथी व ससुराल पक्ष के लोगों की वाणी में कुछ कटुता आएगी जिस कारण से ससुराल पक्ष व जीवनसाथी के साथ विवादपूर्ण स्थितियाँ उत्पन्न होंगी, धर्म-आध्यात्म में रुचि बढ़ेगी, भाग्य का सहयोग प्राप्त होगा।

 

उपाय:- नित्य गणेश संकटनाशन स्तोत्र का पाठ करें व चतुर्थी का व्रत करें।

 

कर्क राशि:-

 

कर्क राशिफल
कर्क राशिफल

 

कर्क राशि वालों के लिए मंगल पंचम व दशम भाव के स्वामी होकर राजयोगकारक ग्रह हो जाते हैं जो आपके लग्न अर्थात प्रथम भाव से गोचर करेंगे ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार मंगल के इस गोचर काल के दौरान आपको अपने क्रोध पर विशेष तौर पर नियंत्रण रखना होगा अन्यथा कलह-क्लेश व झगड़े-विवाद के साथ जेल यात्रा के योग बन सकते हैं, जीवनसाथी व ससुराल पक्ष के लोगों की वाणी कुछ कटु अनुभव होगी, माता के स्वास्थ्य का ख्याल रखें, विद्यार्थियों के लिए मंगल यह गोचर काल मिला-जुला फल देने वाला रहेगा, प्रेमियों के मध्य विवादपूर्ण स्थितियाँ उत्पन्न होंगी, आय में वृद्धि के योग बनेंगे, वाहन सावधानी से चलाएं व स्वास्थ्य के प्रति सतर्क रहें, मंगल का यह गोचर काल बेरोजगारों को नौकरी के अवसर प्रदान करने वाला रहेगा।

 

उपाय:- नित्य सुंदरकांड का पाठ करें व गाय को गुड़ खिलाएं।

 

सिंह राशि:-

 

सिंह राशिफल
सिंह राशिफल

 

सिंह राशि वालों के लिए मंगल चतुर्थ व नवम भाव के स्वामी होकर राजयोगकारक ग्रह हो जाते हैं जो कि आपके द्वादश भाव से गोचर करेंगे ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार मंगल के इस गोचर काल के दौरान आपको अपनी माता के स्वास्थ्य का विशेष ख्याल रखना चाहिए, माता व धर्म से जुड़े कार्यों पर धन व्यय होगा, इस गोचरकल के दौरान आपको कार्यक्षेत्र में बेहद सतर्क रहने की आवश्यकता होगी, धैर्य व संयम से कोई भी निर्णय लें, शत्रुओं पर विजय प्राप्त होगी, प्रेमियों और विद्यार्थियों के लिए मंगल का यह गोचर मिला-जुला रहेगा, कलह-क्लेश व झगड़े-झंझटों के कारण से आपका मन अशांत रहेगा हालांकि शत्रु आपका कुछ बिगाड़ नही पाएंगे फिर भी आपको घर-परिवार के साथ खुलकर जीवन का आनंद लेने में दिक्कतें आएंगी व आप खुद असहज अनुभव करेंगे, छोटे भाई-बहन से संबंध मधुर होंगे, जीवनसाथी को समझने का प्रयास करें।

 

उपाय:- नित्य गाय को रोटी और गुड़ खिलाएं व हनुमान चालीसा का पाठ करें।

 

कन्या राशि:-

 

कन्या राशिफल
कन्या राशिफल

 

कन्या राशि वालों के लिए मंगल तृतीय व अष्टम भाव के स्वामी होकर एकादश भाव अर्थात लाभ स्थान से गोचर करेंगे ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार मंगल के इस गोचर काल के दौरान आपको अपने बड़े भाई के स्वास्थ्य का ख्याल रखना चाहिए, आय में कुछ परिश्रम से वृद्धि के योग बनेंगे, स्वभाव में कुछ तेजी आएगी, क्रोध व वाणी पर नियंत्रण रखें, संतान से वैचारिक मतभेद संभव रहेंगे, प्रेमियों के मध्य विवादपूर्ण स्थितियाँ उत्पन्न होंगी, शत्रुओं पर विजय प्राप्त होगी, स्थान परिवर्तन या नौकरी परिवर्तन हेतु किए जाने वाले प्रयास सार्थक सिद्ध होंगे, व्यय में वृद्धि होगी, किसी भी प्रकार के जुए व सट्टे में पैसा लगाने से बचें, पशु, हथियार, अग्नि एवं वाहनादि से चोट लगने की संभावना रहेगी।

 

उपाय:- नित्य गाय को रोटी व गुड़ खिलाएं।

 

तुला राशि:-

 

तुला राशिफल
तुला राशिफल

 

तुला राशि वालों के लिए मंगल द्वितीय व सप्तम भाव के स्वामी होकर दशम भाव से गोचर करेंगे ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार मंगल के इस गोचरकाल के दौरान पिता को किसी प्रकार का कष्ट संभव रहेगा, कार्यक्षेत्र में अत्यधिक परिश्रम करने पर उन्नति के अवसर प्राप्त होंगे, किसी उच्चपदाधिकारी से मुलाकात संभव है, आपके जीवनसाथी की माता के स्वास्थ्य में कुछ समस्या संभव है साथ ही उनका स्वभाव भी कुछ चिड़चिड़ा सा अनुभव होगा, क्रोध व वाणी पर नियंत्रण रखें, आय के साथ व्यय में वृद्धि होगी, इस गोचर काल दौरान आपको अपने कार्यक्षेत्र में किसी भी विषय पर बहुत सोच-समझकर निर्णय लेना चाहिए क्योंकि मंगल का कर्म स्थान में नीच राशि से गोचर कुछ झंझटों को अचानक से उत्पन्न करने वाला रहेगा, प्रेम संबंधों में मधुरता आएगी, जीवनसाथी के साथ विवाद संभव रहेगा।

 

उपाय:- नित्य श्री सूक्त का पाठ करें।

 

वृश्चिक राशि:-

 

वृश्चिक राशिफल
वृश्चिक राशिफल

 

वृश्चिक राशि वालों के लिए मंगल प्रथम भाव अर्थात लग्न व षष्ठ भाव के स्वामी होकर नवम भाव अर्थात भाग्य भाव से गोचर करेंगे ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार मंगल के इस गोचरकाल के दौरान शत्रु आपकी उन्नति में बाधक बनने का प्रयास करेंगे, पिता के स्वास्थ्य में समस्या रह सकती है, भाई-बहन के मध्य वैचारिक मतभेद उत्पन्न होंगे, घर में तनावपूर्ण स्थितियाँ उत्पन्न होने से मन व्यथित रहेगा, तनाव लेने से बचें, मंगल के इस गोचरकाल के दौरान आपके किए गए प्रत्येक प्रयास सार्थक सिद्ध होंगे, आलस्य का त्याग करें, मन को क्षणिक सुख देने वाले साधनों तथा वाहनादि पर धन व्यय होगा, उच्चपदाधिकारी व्यक्ति से मुलाकात संभव है जिनसे निकट भविष्य में आपके अटके हुए कार्य पूर्ण होंगे।

 

उपाय:- प्रत्येक मंगलवार हनुमान बाहुक व सुंदरकांड का पाठ करें।

 

धनु राशि:-

 

धनु राशिफल
धनु राशिफल

 

धनु राशि वालों के लिए मंगल पंचम व द्वादश भाव के स्वामी होकर अष्टम भाव से गोचर करेंगे ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार मंगल के इस गोचर काल के दौरान आपको शत्रुओं से सतर्क रहना चाहिए तथा शीघ्र ही किसी की बातों में आने व लोगों पर अधिक विश्वास करने से बचना चाहिए, यात्राओं के योग बनेंगे, इस गोचरकल के दौरान यात्रा, दवा व परिवार पर धन व्यय होने के योग बनेंगे, भाग्य का सहयोग प्राप्त होगा, क्रोध व वाणी पर नियंत्रण रखें, फोड़े-फुंसी, घाव, अग्नि भय, ज्वरादि की समस्या रह सकती है, खान-पान का विशेष ख्याल रखें व तेज मिर्च-मसाले वाले भोजन से परहेज करें, यदि आपने कहीं ऋण के लिए आवेदन किया हुआ है तो वह स्वीकृत हो जाएगा, दाम्पत्य जीवन में अनेक अवसर पर विवादपूर्ण स्थितियाँ उत्पन्न होंगी, जीवनसाथी के उदर व कमर के निचले हिस्सों में या एलर्जी की समस्या रह सकती है।

 

उपाय:- नित्य विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें व गाय को गुड़ खिलाएं।

 

मकर राशि:-

 

मकर राशिफल
मकर राशिफल

 

मकर राशि वालों के लिए मंगल चतुर्थ व एकादश भाव के स्वामी होकर सप्तम भाव से गोचर करेंगे ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार इस गोचरकाल के दौरान छोटे भाई-बहन के विवाह हेतु यदि कहीं बात चल रही है तो उसमें अचानक से कोई बाधा आ सकती है, क्रोध व वाणी पर नियंत्रण रखें अन्यथा काम त्रिकोण में अग्नि तत्व ग्रह के जल तत्व राशि से गोचर करने के कारण से जीवनसाथी के साथ क्षणिक विवाद होने की संभावना रहेगी, ससुराल पक्ष के लोगों से विवाद संभव रहेगा, जो लोग पार्टनरशिप में कोई कार्य करते हैं उनके लिए मंगल का यह गोचर मिला-जुला रहेगा, स्वास्थ्य का ख्याल रखें, तेज ज्वर, सिर में पीड़ा, मूत्रेन्दीय संबंधित कोई समस्या संभव रहेगी, व्यापारियों के लिए मंगल का यह गोचर उन्नति के नए अवसर प्रदान करने वाला रहेगा, आप इस दौरान स्पष्ट रूप से वार्ता करने पर विश्वास रखेंगे जिस कारण से अनेक अवसर ओर आपकी कही हुई बातें लोगों को बुरी लग सकती है, उदर में कोई समस्या संभव है अतः तेज मिर्च-मसाले वाले व्यंजनों से परहेज करें, शत्रुओं पर विजय प्राप्त होगी, वाहन सावधानी से चलाएं।

 

उपाय:- मंगलवार के दिन गाय को मसूर की दाल भीगा कर खिलाएं।

 

कुंभ राशि:-

 

कुंभ राशिफल
कुंभ राशिफल

 

कुंभ राशि वालों के लिए मंगल तृतीय व दशम भाव के स्वामी होकर षष्ठ भाव से गोचर करेंगे ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार मंगल के इस गोचरकाल के दौरान आपको अपने क्रोध व वाणी पर विशेष रूप से नियंत्रण रखना चाहिए, सरकारी कर्मचारियों विशेषतः सुरक्षा बलों के साथ व्यर्थ विवाद में पड़ने से बचें अन्यथा जेल यात्रा के योग बनेंगे, शत्रुओं पर विजय प्राप्त होगी, विपरीत परिस्थितियों में कड़े संघर्ष के उपरांत उन्नति के नए अवसर प्राप्त होंगे, अकास्मिक व्यय में वृद्धि होने से तनावपूर्ण स्थितियाँ उत्पन्न होगी अतः तनाव लेने से बचें, दाम्पत्य जीवन में विवादपूर्ण स्थितियाँ उत्पन्न होंगी, स्वास्थ्य के लिहाज से मंगल का यह गोचर आपके लिए सामान्य रहेगा अतः स्वास्थ्य के प्रति सतर्क रहें, मामा पक्ष में किसी को स्वास्थ्य जनित समस्या रह सकती है।

 

उपाय:- गाय को रोटी व गुड़ नित्य खिलाएं।

 

मीन राशि:-

 

मीन राशिफल
मीन राशिफल

 

मीन राशि वालों के लिए मंगल द्वितीय व नवम भाव के स्वामी होकर पंचम भाव से गोचर करेंगे ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार मंगल के इस गोचरकाल के दौरान प्रेम संबंधों में प्रगाढ़ता आएगी किंतु अनेक अवसर पर विवादपूर्ण स्थितियाँ भी उत्पन्न होंगी, संतान को किसी प्रकार का कष्ट संभव है, विद्यार्थियों का मन शिक्षा की जगह खेल-कूद या अन्य किसी मनोरंजन के साधनों पर लगेगा, क्रोध पर नियंत्रण रखें व शांत होकर धैर्य से काम लें, उदर जनित कोई समस्या संभव रहेगी, ससुराल पक्ष व जीवनसाथी की वाणी में कुछ तेजी अनुभव होगी जिस कारण उनसे विवाद होने की संभावना रहेगी, आय के साथ व्यय में वृद्धि होगी।

 

उपाय:- नित्य शिवलिंग पर दुग्धाभिषेक करें व मंगलवार के दिन हनुमान जी को सिंदूर अर्पित कर हनुमान चालीसा का पाठ करें।

 

जय श्री राम।

 

Astrologer:- Pooshark Jetly

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लग्न कुंडली के अष्टम भाव में सूर्य का फल–Astrology Sutras

लग्न कुंडली के अष्टम भाव में सूर्य का फल–Astrology Sutras

 

लग्न कुंडली के अष्टम भाव में सूर्य का फल
लग्न कुंडली के अष्टम भाव में सूर्य का फल

 

यदि लग्न कुंडली के अष्टम भाव में सूर्य हो तो ग्रंथकारों का मत है कि ऐसे व्यक्ति शरीर से दुबले, छोटे नेत्रों वाले, क्रोधी किंतु उदार प्रकृति वाले, अल्प संतान वाले, नेत्र रोगी और दीर्घजीवी होते हैं तथा धनार्जन हेतु इनको अथक परिश्रम करना पड़ता है साथ ही ऐसे व्यक्तियों के शत्रु अधिक होते हैं साथ ही यदि अष्टम स्थान का स्वामी बली ग्रह के साथ हो तो ऐसे व्यक्ति इच्छानुसार खेती करने वाले अर्थात कृषक होते हैं, यदि लग्न कुंडली के अष्टम भाव में सूर्य हो तो व्यक्ति चतुर होता है और प्रायः इनको अनेक कष्ट भोगने पड़ते हैं और अनेक स्त्रियों से संबंध जोड़ने वाले होते है साथ ही अभक्ष्य वस्तुओं का सेवन करने वाले होते हैं तथा इनका धन शीघ्र चोरी हो जाता है एवं कभी-कभी ऐसे व्यक्तियों पर कठिन और गुप्त विपत्ति भी आ पड़ती है क्योंकि अष्टम भाव कुंडली का सबसे अशुभ स्थान होता है जिसे मृत्यु स्थान भी कहते है अतः इस भाव में सूर्य के स्थित होने के अशुभ फल ही मिलते हैं ऐसे व्यक्तियों को दूसरे को ठगने में बहुत आनंद आता है किंतु अष्टम भाव का सूर्य विदेश यात्रा भी करवाता है और ऐसे व्यक्ति अत्यधिक कामी होने के कारण से परदेश में परदेशीय स्त्रियों से अवैध संबंध भी जोड़ते हैं और स्त्रियों को प्रसन्न रखने के लिए या उनके कहने पर अभक्ष्य तथा अग्राह्य पदार्थों का आनंद लेते हैं जिस कारण इन्हें गुह्यरोग भी होने की संभावना रहती है, ऐसे व्यक्तियों की शक्ति क्षीण हो जाती है और ऐसे व्यक्ति आलस्य में डूबे रहते हैं और अपने आपकी व अपने धन की रक्षा कर सकने में असमर्थ रहते हैं जिस कारण से इनका धन भी चोरी होने की संभावना रहती है तथा यदि अष्टम भाव का स्वामी भी पीड़ित हो तो ऐसे व्यक्तियों की अकाल मृत्यु भी हो जाती है।

 

मंत्रेश्वर महाराज जी ने फलदीपिका में कहा है कि यदि लग्न कुंडली के अष्टम भाव में सूर्य हो तो व्यक्ति को थोड़ा धन व थोड़ी आयु प्राप्त होती है व इनके मित्र भी कम ही होते हैं साथ ही ऐसे व्यक्तियों की नजर भी कमजोर होती है वहीं वैधनाथ जी ने कहा है कि यदि लग्न कुंडली के अष्टम भाव में सूर्य हो तो व्यक्ति मनोहर होता है और लड़ने-झगड़ने में विशेष चतुर होता है किंतु ऐसे व्यक्ति कभी भी संतुष्ट नही होते हैं, मानसागरी में कहा गया है कि यदि लग्न कुंडली के अष्टम भाव में सूर्य हो तो:-

 

निधनगतदिनेशे चंचल: त्यागशील: किलबुधगणसेवी सर्वदारोगयुक्त:।
वितथ बहुलभाषी भाग्यहीनों विशीलो मतियुतचिरंजीवी नीचसेवीप्रवासी।।

 

अर्थात जिस व्यक्ति के अष्टम भाव में सूर्य हो वह चंचल स्वभाव वाला, दानी, पंडित, विद्वानों की सेवा में रहने वाला, रोगी, मिथ्याभाषण करने वाला, अभागा, आचरणहीन, मतियुक्त तथा लंबी उम्र वाला होता है और ऐसे व्यक्तियों को नीचवृत्ति के लोगों की सेवा करनी पड़ती है साथ ही ऐसे व्यक्ति परदेश में वास करते हैं।

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के मत व अनुभव के अनुसार यदि लग्न कुंडली के अष्टम भाव में सूर्य हो तो व्यक्ति किसी भी विषय पर जल्दी संतुष्ट नही होता जिस कारण से इनके पास धन होते हुए भी इन्हें धन संबंधी चिंता प्रायः बनी रहती है और इनका धन औषधि, पिता व परिवार पर अधिक व्यय होता है और यदि अष्टम भाव का स्वामी भी पीड़ित हो तो ऐसे व्यक्तियों को मध्यम आयु योग प्राप्त होता है और इन्हें कुछ वैमन्यस्ता के साथ पुत्र सुख प्राप्त होता है और ऐसे व्यक्तियों को प्रायः नेत्र व उदर संबंधित रोग के साथ-साथ मूत्रेन्दीय में भी कोई विकार संभव रहता है तथा इनके ससुराल पक्ष के लोगों की वाणी कुछ कटु होती है किंतु ऐसे व्यक्ति ज्ञानी, विद्वान, पंडित और ब्राह्मणों की सेवा करने वाले होते हैं तथा इन्हें पिता का पूर्ण सुख नही मिल पाता या इनके पिता को कोई कष्ट प्रायः बना ही रहता है, ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार सभी ग्रंथकारों ने अष्टम भाव में स्थित सूर्य के अशुभ फल को देने वाला बताया है क्योंकि अष्टम भाव नाश-स्थान माना जाता है लेकिन ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के मत व अनुभव के अनुसार यदि सूर्य अष्टम भाव में मेष, सिंह व धनु राशि के हों तो बुरे फल अत्यधिक मिलते हैं किंतु मेष व सिंह राशि का सूर्य अष्टम भाव में हो तो आयुष्य की रक्षा होती है साथ ही यदि लग्न कुंडली के अष्टम भाव में सूर्य यदि मिथुन, तुला व कुंभ राशि का सूर्य हो तो बुरे फल कुछ कम मिलते हैं तथा यदि लग्न कुंडली के अष्टम भाव में सूर्य यदि स्त्री राशि का हो तो सामान्य फल मिलते हैं।

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार यदि लग्न कुंडली के अष्टम भाव में सूर्य यदि मिथुन, कर्क, धनु और मीन राशि का हो तो व्यक्ति की असावधानी के कारण उनकी मृत्यु होती है तथा यदि मेष व सिंह राशि का सूर्य अष्टम भाव में हों तो व्यक्ति की झटके से मृत्यु होती है किंतु यदि लग्न कुंडली के अष्टम भाव में सूर्य यदि शेष अन्य राशियों में हो तो व्यक्ति की किसी लंबी बीमारी के चलते मृत्यु होती है, ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार यदि लग्न कुंडली के अष्टम भाव में सूर्य यदि पुरुष राशि का हो तो व्यक्ति के घर की गुप्त बातें नौकरों द्वारा बाहर निकल जाती है अथवा स्त्री के द्वारा भी गुप्त बातें दूसरे जान लेते हैं साथ ही यदि पुरुष राशि का सूर्य अष्टम भाव में हो तो अनुभव में आया है कि प्रायः स्त्री स्वम् पैसे के लिए अथवा पति की पैसे के जरूरत को पूरा करने के लिए या अपना कोई कार्य निकालने के लिए परपुरुषगामिनी भी होती है किंतु इसके लिए अन्य ग्रहों का भी सहयोग आवश्यक होता है, यदि किसी महिला की लग्न कुंडली के अष्टम भाव में सूर्य हो तो उक्त महिला से पहले उसके पति की मृत्यु हो जाती है किंतु यदि किसी महिला की कुंडली के द्वितीय भाव में सूर्य हो तो उसे प्रायः अखण्ड सौभाग्य की प्राप्ति होने की संभावना बली हो जाती है, ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार यदि सूर्य अष्टम भाव में हो तो वृद्धावस्था में दरिद्रता योग उत्पन्न करता है अर्थात जैसे-जैसे सूर्य का अस्त होता है वैसे ही व्यक्ति के भाग्य का भी अस्त हो जाता है और ऐसा योग ५० वर्ष की आयु के बाद होना आरंभ होता है साथ ही स्त्री राशि का अष्टमस्थ सूर्य अधिक संतति व पुरुष राशि का अष्टमस्थ सूर्य कम संतति देता है।

 

जय श्री राम।

 

Astrologer:- Pooshark Jetly

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लग्न कुंडली के सप्तम भाव में सूर्य का फल–Astrology Sutras

लग्न कुंडली के सप्तम भाव में सूर्य का फल–Astrology Sutras

 

लग्न कुंडली के सप्तम भाव में सूर्य का फल
लग्न कुंडली के सप्तम भाव में सूर्य का फल

 

यदि लग्न कुंडली के सप्तम भाव में सूर्य हो तो ग्रंथकारों का मत है कि व्यक्ति दुबला, मझोले कद वाला, भूरे रंग के केश और नेत्र से युक्त, चंचल, भय युत, स्त्री सहवास तथा सुख भोगने में आसक्त, स्त्रियों से विरोध करने वाला तथा स्त्रियों से अनादर पाने वाला, परस्त्री प्रेमी एवं परगृही भोजी होता है तथा ऐसे व्यक्तियों की प्रायः दो स्त्रियाँ होती है और विवाह विलंब से होता है साथ ही ऐसे व्यक्ति धनहीन, राज कोप से दुःखी तथा कदन्न भोजी होते हैं तथा यदि ऐसे व्यक्तियों का शीघ्र विवाह हो तो १४ वें या ३४ वे वर्ष में स्त्री का नाश और २५ वें वर्ष में परदेश यात्रा होती है, यदि सप्तम भाव में सिंह राशि का सूर्य हो तो एक स्त्री होती है किंतु यदि सूर्य पर शत्रु ग्रह की दृष्टि हो अथवा सूर्य शत्रु ग्रह के साथ अथवा पाप ग्रह से युक्त हो तो बहुत सी स्त्रियाँ होती है।

 

मंत्रेश्वर महाराज जी ने फलदीपिका में कहा है कि यदि सप्तम भाव में सूर्य हो तो व्यक्ति राजा से विरोध रखता है अर्थात ऐसे व्यक्तियों के आचरण से राजा इनके विरुद्ध हो जाते हैं और ऐसा व्यक्ति राजा द्वारा दंड को प्राप्त करने वाला होता है जिससे ऐसे व्यक्तियों की प्रतिष्ठा धूल में मिल जाती है साथ ही ऐसे व्यक्ति पैदल चलते हैं और ऐसे व्यक्ति स्त्रीहीन या स्त्रियों से विरोध सहने वाला तथा स्त्री के अभाव में पुरुष धर्म-अर्थ और काम से वंचित रहता है, मानसागरी में कहा गया है कि यदि सप्तम भाव में सूर्य हो तो:-

 

युवतिभवन संस्थे भास्करे स्त्रीविलसी, न भवति सुखभागी चंचल: पापशील:।
उदरसमशरीरो नातिदीर्घो न ह्रस्व:, कपिलनयनरूप: पिंगकेश: कुमुर्ति:।।

 

अर्थात यदि सप्तम भाव में सूर्य हो तो व्यक्ति को स्त्री का भोग-उपभोग मिलता है किंतु वह सुखी नही होता है तथा ऐसे व्यक्ति अस्थिर स्वभाव के और पापकर्म कर्ता होते हैं साथ ही इनके उदर और देह एक बराबर होते हैं साथ ही ऐसे व्यक्ति न तो बहुत लंबा होता है और न ही बहुत छोटा होता है, ऐसे व्यक्तियों का रूप-रंग और आँखें कपिल होती हैं तथा केश कुछ पीले होते है मानसागरी के अनुसार सप्तम का सूर्य पति-पत्नी का सौमनस्य कायम रखता है अन्यथा व्यक्ति को स्त्री का उपभोग अच्छा मिलता है तो वहीं वराहमिहिर जी ने कहा है कि यदि लग्न कुंडली के सप्तम भाव में सूर्य हो तो “स्त्रीभी: गत: परिभवं मगदे पतंगे” अर्थात स्त्रियों से तिरस्कार अर्थात अनादर पाने वाला और स्त्रियों का घृणापात्र होता है।

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के मत व अनुभव के अनुसार यदि सप्तम भाव में सूर्य मेष, सिंह व मकर राशि का हो तो ही उपरोक्त ग्रंथकारों द्वारा बताए गए अशुभ फल प्राप्त होते हैं, यदि सप्तम भाव में सूर्य मिथुन, तुला या कुंभ राशि का हो तो व्यक्ति शिक्षा विभाग में अच्छी प्रगति करता है साथ ही कानून का विशेषज्ञ होता है और संगीत, नाट्य व रेडियो आदि साधनों में प्रगति करता है ऐसे व्यक्तियों को एक या दो ही संतान होती है, यदि मेष, सिंह या धनु राशि का सूर्य सप्तम भाव में हो तो प्रायः व्यक्ति के दो विवाह होते हैं या एक ही विवाह बहुत विलंब से होता है तथा ऐसे व्यक्ति स्वतंत्रता प्रिय होते हैं अर्थात ऐसे व्यक्ति नौकरी करना पसंद नही करते हैं, यदि सप्तम भाव में सूर्य वृषभ, कन्या या मकर राशि का हो तो ऐसे व्यक्तियों को व्यापार में अच्छा लाभ होता है और ऐसे व्यक्ति जनपद या विधानसभा चुनाव में भी विजयी होते हैं, यदि लग्न कुंडली के सप्तम भाव में सूर्य कर्क, वृश्चिक या मीन राशि का हो तो व्यक्ति वैध/डॉक्टर होता है या विज्ञान विषयक पदवी को प्राप्त करता है या किसी नहर का अधिकारी होता है, यदि लग्न कुंडली के सप्तम भाव में सूर्य वृषभ, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर या मीन राशि का हो तो व्यक्ति ५० वें वर्ष तक अच्छी उन्नति प्राप्त करता है किंतु इसके उपरांत संघर्ष करता है, पुरुष राशि का सूर्य यदि लग्न कुंडली के सप्तम भाव में स्थित हो तो व्यक्ति के जीवन में प्रायः उतार-चढ़ाव बने रहते हैं और ५०-५२ वर्ष की आयु के पास उनके जीवनसाथी की मृत्यु हो जाती है या मृत्यु तुल्य कष्ट प्राप्त होता है और ऐसे व्यक्तियों को अनेक प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है साथ ही इन्हें संतान कम ही होती है किंतु स्त्री राशि का सूर्य लग्न कुंडली के सप्तम भाव में हो तो संतान अधिक होती है।

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार यदि लग्न कुंडली के सप्तम भाव में सूर्य हो तो व्यक्ति की पत्नी प्रभावशालिनी, व्यवहार और बर्ताव में अच्छी, विपत्ति के समय पति का साथ देने वाली, अतिथि सत्कार करने वाली, दयालु, नौकरों से अच्छा काम निकाल लेने वाली और धन प्रिया और रूपवती होती है, ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार यदि लग्न कुंडली के सप्तम भाव में सूर्य मेष, सिंह, धनु और मीन राशि का हो तो व्यक्ति को प्रायः अपमानजनक स्थितियों का सामना करना पड़ता है और प्रेम विवाह होने के बाद भी पति-पत्नी में संबंध विच्छेद हो जाता है या पत्नी अपने पति को उनके श्वसुर के घर पर रहने को या पति के श्वसुर द्वारा दिए गए घर पर रहने को मजबूर करती है।

 

विशेष:-

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार आज से कई वर्ष पूर्व यवनराज्य सत्ता में अविवाहित लड़कियों का अपहरण हो जाने के कारण से कन्याओं का विवाह “अष्टवर्षा भवेद् गौरी दशवर्षा च रोहिणी” के अनुसार १०-१२ वर्ष में हो जाता था शायद इसी कारण से विभिन्न ग्रंथकारों ने सप्तमस्थ सूर्य के अशुभ फल को बताया है यहाँ एक विचारीय विषय यह है कि क्या केवल सप्तम भाव में सूर्य को देखकर यह फलकथन कहना उचित होता है? ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार भृगुसूत्र में बताया गया है कि यदि लग्न कुंडली के सप्तम भाव में सूर्य हो तो विवाह देरी से होता है क्या यह पूर्णतया तर्क संगत लगता है?? यह एक विचारणीय विषय है, ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुभव के अनुसार यदि सिंह राशि का सूर्य सप्तम भाव में हो या सप्तम भाव को शुभ बली ग्रह देखते हों तो एक ही विवाह होता है।

 

जय श्री राम।

 

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