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मेष राशि वाले व्यक्तियों के जीवन से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें
मेष राशि: जानिए, मेष राशि वाले व्यक्तियों के जीवन से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें
मेष राशि वाले व्यक्तियों के जीवन से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें
मेष राशि वाले व्यक्ति धनवान, पुत्रवान, तेजस्वी, परोपकारी, सुशील, राज प्रिय, देव-गुरु भक्त, गर्म भोजन की चाह रखने वाले, अल्पहारी, भीरु, कठोर चित्त, शुभ कार्यों में धन व्यय करने वाले, जल से कुछ भय अनुभव करने वाले, मुश्किल परिस्थितयों से न घबड़ाने वाले, चंचल युक्त धनी अर्थात कभी अच्छा धन हो तो कभी कम धन हो कहने का आशय यह है कि आय में उतार-चढ़ाव वाले व कभी-कभी चिड़चिड़े स्वभाव वाले होते हैं, ऐसे व्यक्तियों जल से भय रहता है तथा ऐसे व्यक्तियों का कभी-कभी उच्च स्थान से पतन हो जाता है, मेष राशि वाले व्यक्ति वात की समस्या से परेशान रहते हैं तथा ऐसे व्यक्तियों की गोल आँखें होती है तथा उनके घुटने कुछ कमजोर होते हैं, इनके स्वभाव में उग्रता प्रायः बनी रहती है, मेष राशि वाले व्यक्ति चपल और घूमने के शौकीन होते हैं साथ ही इनमें काम वासना भी अधिक होती है साथ ही मिथ्याभाषण भी करते हैं, यदि मेष राशि वालों के सप्तम भाव में अशुभ ग्रह की दृष्टि हो तो प्रायः इनकी दो शादी होती है और इन्हें अजीर्ण एवं उदर रोग से भय होता है, मेष राशि के जातक प्रायः स्त्री के वशीभूत और पुत्रादि सुख-संबंध प्राप्त करते हैं, मेष राशि वालों की माता प्रायः सुख रहित अथवा पुत्र पर निर्दयी होती हैं, मेष राशि वाले व्यक्ति युद्ध विभाग या कोई स्वतंत्र व्यवसाय में उन्नति प्राप्त करते हैं और अनेक मनुष्यों पर अधिकार रखने वाले व्यवसाय में तीव्र उन्नति प्राप्त करते हैं कहने का आशय यह है कि मेष राशि वाले व्यक्तियों की उन्नति प्रायः व्यवसाय द्वारा होती है, इन्हें कर्क, सिंह, वृश्चिक, धन और मीन राशि वाले मनुष्यों के साथ व्यवसाय करने में अति शुभ फल प्राप्त होता है।
प्रतिपदा, षष्ठी और एकादशी तिथियाँ मेष राशि वालों के लिए अनिष्टकारी होती हैं तीसरा, छठवां, आठवां, बाहरवां और पंद्रहवाँ वर्ष अशुभ अथवा अनिष्टकारी रहता है, प्रथम, सप्तम, अष्टम एवं त्रयोदश वर्ष में ज्वर पीड़ा, सोलहवें और सतरहवें वर्ष में विषूचिका, तीसरे और बाहरवें वर्ष में जल भय, २५वें वर्ष में संतानोत्पति (यदि शुभ ग्रहों का सहयोग कुंडली में प्राप्त हो तब) एवं रतौंधी तथा ३२वें वर्ष में शस्त्र भय होता है, ऐसे व्यक्तियों के लिए मंगलवार किसी भी कार्य के आरंभ हेतु शुभ होता है, बुधवार सर्वदा अनिष्टकारी होता है, यदि चंद्रमा शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो व्यक्ति की आयु ९० वर्ष तक की हो सकती है, कार्तिक मास, कृष्ण पक्ष, नवमी तिथि, बुधवार और अर्धरात्रि मेष राशि वालों के लिए अनिष्टकारी होते हैं।
शनिवत राहु अर्थात राहु सरीखा होने से दुःख-स्वरूप, सेना, चंडाल, जाति, रात्रि बली, कृष्ण पक्ष व दक्षिणायन में बली तथा वल्मीक (दीमक वाला पिंड) में वास करने वाला ग्रह होता है, अनेक पैबंद या अनेक रंग की कथली इसका वस्त्र तथा सीसा इसका धातु है, मतांतर से राहु वृषभ के २०° पर राहु परमोच्च तथा मिथुन में ०° से २०° तक मूल त्रिकोण में होता है, राहु की उच्च राशि वृषभ, मूल त्रिकोण राशि मिथुन व स्वराशि कन्या होती है, कूड़ा बटोरने वाले या कबाड़ी भी राहु से प्रभावित माने जाते हैं।
सत्यजातकम् के अनुसार राहु कृष्ण वर्ण, दीर्घ काय तथा कुष्ठ या त्वचा रोगों से पीड़ित होने के साथ-साथ नास्तिक या विधर्मी भी है, परनिंदा व पाखंड इसका स्वभाव है कहने का तात्पर्य यह है माया से सभी को भ्रमित करना ही राहु का स्वभाव है, राहु की दिशा दक्षिण पश्चिम है, बृहत्त्पराशर होराशास्त्र के अनुसार गुरु, शुक्र व शनि इत्यादि ग्रह राहु के मित्र, मंगल व बुध सम अर्थात न मित्र और न ही शत्रु और सूर्य व चंद्र इत्यादि ग्रह राहु के शत्रु होते हैं।
फलदीपिका के अनुसार “सर्पेणैव पितामहं तु शिखिना मातामहं चिंतयेत्” अर्थात राहु दादा, नानी, रेंगने वाले सर्प सरीखे जीव, बन्धन, नीचजन से मैत्री, सत्ता अधिकार, चोरी, काला जादू, साहस-शौर्य तथा मुसलमानों का कारक है, हफ्ता वसूलने वाले कर्मचारी, उपद्रवी या उत्पाती गुंडे-मवालियों को भी राहु से नियंत्रित माना गया है तथा राहु के रोगों में मिर्गी, चेचक, फाँसी से आत्महत्या, भुखमरी, प्रेत बाधा, अपच, कुष्ठ, भूख मर जाना, वमन या उल्टियाँ, क्षय, विष संक्रमण, भय, पागलपन या पक्षघात अथवा स्नायु तंत्र की दुर्बलता को शामिल किया जाता है।
राहु के कारकतत्व:-
१. छत्र, २. चँवर (चमार), ३. राज्य-सत्ता, ४. संग्रह या संचय कुशल, ५. कुतर्क, ६. कठोर व दुःखदाई वचन, ७. निम्नतम जाति के व्यक्ति, ८. दुष्ट या दुराचारिणी महिला, ९. सुसज्जित वाहन, १०. नास्तिक, अधार्मिक व्यक्ति, ११. जुआ, १२. वेश्यागमन, १३. विदेश यात्रा, १४. गन्दगी व अपवित्रता, १५. हड्डी व अस्थि मंडल, १६. झूठ व मिथ्या आचरण, १७. भ्रम, १८. उलझन, १९. नीचजन का आश्रय, २०. सूजन व शोथ, २१. बड़ा जंगल, २२. दुर्गम स्थानों की यात्रा, २३. पीड़ा-वेदना, २४. कक्षा या बैठक से बाहर रहना व संसद या विधानसभा का वहिष्कार करना, २५. दक्षिण पश्चिम दिशा प्रेमी, २६. वात जन्य रोग, २७. कफ या बलगम, २८. दुःख-क्लेश, २९. सर्प, ३०. रात्रि के समय चलने वाली ठंडी हवा (दक्षिण दिशा की ओर बहने वाली पवन), ३१. तीक्ष्णता, ३२. दीर्घ या लंबा शरीर, ३३. यात्रा-पर्यटन, ३४. बुढापा, ३५. मुहूर्त, ३६. मृत्यु का समय, ३७. वाहन, ३८. तूफान, ३९. तीव्र पीड़ा, ४०. खाँसी, ४१. श्वास रोग-दमा, ४२. साहस, ४३. महान प्रताप, ४४. वन, ४५. दुर्गा माता का उपासक, ४६. दुराचार, ४७. दुष्टता, ४८. पशु मैथुन, ४९. उर्दू की लखाई या लिखावट, ५०. कटु व कठोर वाणी इत्यादि राहु के कारकतत्व हैं।
कुंडली मिलान के नियम, अष्टकूट मिलान व विभिन्न दोषों के परिहार
कुंडली मिलान के नियम, अष्टकूट मिलान व विभिन्न दोषों के परिहार
कुंडली मिलान के नियम, अष्टकूट मिलान व विभिन्न दोषों के परिहार
इस लेख को आरंभ करने के पूर्व मैं सर्वप्रथम अपने गुरु, अपने आराध्य व अपने इष्ट (श्री हनुमान जी और बाबा महादेव )के श्री चरणों में नमन करता हूँ, बहुत लोगों के मन में कुंडली मिलान को लेकर अनेक प्रश्न रहते हैं जिन्हें मैं अपने इस लेख के माध्यम से संतुष्ट करने का एक प्रयास कर रहा हूँ, हमारे धर्म शास्त्र में गर्भाधानादि (जन्म से मृत्यु पर्यन्त) षोडश संस्कारों में विवाह संस्कार सर्वश्रेष्ठ संस्कार माना गया है शास्त्र सम्मत विधिवत विवाह संपन्न होने पर जीवात्मा मनुष्य जीवन के सर्वोपरीय उद्देश्य (धर्म, अर्थ व काम) का यथावत पालन करते हुए मोक्ष को प्राप्त कर सकता है।
कुंडली मिलान के नियम:-
कुंडली मिलान के नियम
जीवनकाल चारआश्रमों में विभजित है यथा ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास, इन चारों आश्रमों का मुख्य आधार “गृहस्थ” है, स्त्री को मुख्य रूप से धर्म, अर्थ, कामकी प्रदात्री मानने के साथ ही संतान सिद्धि का प्रमुख मानकर विवाह के लिए समय शुद्धि का विचार किया जाता है यथा:-
“तस्माद्विवाहसमय: परिचिन्त्यते हि तान्नध्नतामुपगता: सुतशीलधर्मा:।।”
सृष्टि के आदिकाल से वसुंधरा पर अनेक महापुरुष ऋषि-महर्षि व विद्वान ज्योतिषाचार्यों व विज्ञान वेत्ताओं ने इस विषय पर गहन अध्यन चिंतन मनन कर के ग्रहादिकों के प्रभावादिका सही आकलन कर कुछ नियम निश्चित किए हैं यथा विद्याध्यन काल पूर्ण होने पर जब लड़के व लड़की की उम्र विवाह योग्य हो जाए तब माता-पिता को अपने कुल की परंपरानुसार लड़की के अनुरूप सुयोग्य वर को टीका (वाग्दान) करना चाहिए।
विशेष:-
शादी तय (वाग्दान वाणी द्वारा संकल्प सगाई) करने से पहले योग ज्योतिर्विद से वर-कन्या की जन्मकुंडली का मिलान अवश्य करा लेना चाहिए जन्मकुंडली में शुभाशुभ योगों पर ध्यान देना चाहिए और वर्णादि अष्टकूट तथा राशियों का शुभ संयोग देखकर ही विवाह का निर्णय लेना चाहिए।
अष्टकूट मिलान:-
अष्टकूट मिलान
हमारे पूर्वजों ने दिव्य दृष्टि से विवाह के विषय में (जो एक धार्मिक संबंध है) पर गहन अध्यन किया है एक कन्या किसी दूसरे वर के साथ सर्वदा के लिए गृहणी बनने को जाती है इन दोनों के शारीरिक एवं मानसिक विभिन्नताओं पर आजन्म के लिए उन लोगों का सुख-दुःख निर्भर करता है इन शारीरिक व मानसिक गुण-दोषों को और इसके तारतम्य को जानने के लिए “वर्ण”, “वश्य”, “योनि”, “गण”, “तारा”, “नाड़ी”, “ग्रहमैत्री” व “भकूट” कहा गया है।
वर्ण:-
मनुष्य के जन्म नक्षत्र के अनुसार महर्षियों ने इस बात के जानने की विधि बतलाई है कौन जीव जन्म से (वंश से उत्पन्न नही) ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र है, यदि वर व कन्या दोनो का वर्ण एक हो या कन्या से वर उच्च वर्ण का हो तो उसे अच्छा माना जाता है।
वश्य:-
साधारण भाषा में वश्य का अर्थ है कि एक व्यक्ति पर दूसरे व्यक्ति का ऐसा प्रभाव पड़ता है कि दूसरा व्यक्ति उसके साथ जो चाहे वह कर सके या उससे जो चाहे वह करा सके, ऋषियों ने राशि मात्र को रूप के अनुसार ५ भागों में बांटा है चतुष्पद, मानव, जलचर, वनचर और कीट को वश्य कहते हैं, वर-कन्या के इसी वश्य विभाग के अनुसार उनका फल होता है जैसे दोनो चतुष्पद हो या दोनों मानव हों अर्थात दोनो का वश्य एक ही हो तो २बल आता है और यदि वश्य भिन्न हो तो १ बल आता है।
योनि:-
नक्षत्रों को १४ योनियों में बांटा गया है अश्व, गज, मेष, सर्प, श्वान, मार्ज़ार, मूषक, गौ, महिष, व्याघ्र, मृग, वानर, नफुल (नेवल) और सिंह, साधारण व्यवहार से देखने में आता है कि घोड़ा और महिष में, हरिण और हाथी में, बकरा और वानर में, नकुल और सर्प में, सिंह और श्वान में, मार्जार और मूषक में, व्याघ्र और गौ में वैर होता है अतएव महर्षियों का सिद्धांत है कि एक योगी से अत्यंत उत्तम और वैर योनि से अत्यंत निकृष्ट और अन्य योनिओं में साधारण फल होते हैं।
गण:-
यह सभी जानते हैं कि देवता, मनुष्य और राक्षस यही तीन गण माने गए हैं यह तो प्रसिद्ध बात है कि अपने-अपने गण में पूर्ण प्रीति होती है, देव-मनुष्य में समता, देव-राक्षस में वैर और मनुष्य-राक्षस में मृत्यु होती है, ऋषियों ने नक्षत्रों के भेद से इन तीन गणों को माना है और वर-कन्या के संबंध को इसी गण भेद से शुभ और अशुभ फल बताया है।
नाड़ी:-
नाड़ी शब्द का प्रयोग प्रायः योग शास्त्र व वैधक शास्त्र में पाया जाता है इस शब्द का भाव यही है कि वह शारीरिक नली, नस इत्यादि जो रुधिर प्रवाह होते-होते स्वच्छ हो जाता है और इसी प्रवाह के गमनानुसार वैधक शास्त्रों में स्वास्थ्य का अनुमान होता है अर्थात नाड़ी से मनुष्य की शारीरिक अवस्था का पता चलता है, ऋषियों ने ज्योतिष शास्त्र के लिए जन्म नक्षत्र भेदानुसार तीन नाड़ियां (आश्विनी से आरंभ कर के आदि, अन्त्य व मध्य से क्रमबद्ध २७ नक्षत्रों तक की नाड़ियां) होती है, वर-कन्या की एक नाड़ी होने से विवाह शुभ नही माना जाता है, ऋषियों के अनुसार यदि वर-कन्या की भिन्न-भिन्न नाड़ियां हों तो फल शुभ होता है अन्यथा फल अशुभ होता है।
तारा:-
नक्षत्र, तारा समुदाय का नाम है इस कारण वर के नक्षत्र से कन्या के नक्षत्र तक गिनकर उसे ९ से भाग देने पर यदि शेष ३, ५ व७ हो तो शुभ अन्यथा अशुभ होता है, यदि ९ से भाग न पड़ सके तो उसी संख्या से शुभ-अशुभ का विचार होता है, इसी प्रकार कन्या के नक्षत्र से वर के नक्षत्र तक गिनकर भी विचार करना चाहिए।
भकूट:-
भकूट वर-कन्या की जन्म राशियों की आपस की स्थिति के अनुसार माना गया है अर्थात वर-कन्या की राशियाँ परस्पर २, ५, ६, ८, ९ व १२ हों तो शुभ फल नही होता पर यदि दोनों की परस्पर राशियाँ १, ३, ४, ७, १० व ११हों तो उत्तम माना जाता है।
ग्रहमैत्री:-
वर-कन्या के राशि स्वामी की नैसर्गिक मित्रता-शत्रुता के आधार पर भेद किया जाता है यदि दोनों के राशि स्वामी मित्र हों तो शुभ और यदि नैसर्गिक शत्रु हों तो अशुभ फल होता है।
गुण विचार:-
कुशाग्र बुद्धि द्वारा ऋषियों ने यह देखा है कि साधारण बुद्धि वाले मनुष्य इन ८ प्रकार के फलों को आसानी से नही समझ सकेंगे इसलिए प्रत्येक प्रकार से गुण (बल ) की विधि को बताया है, इस विधि से सबसे उत्तम कुंडली मिलान करने पर ३५ गुण ही आता है (जैसे वर का जन्म पुनर्वसु के चतुर्थ चरण व कन्या का जन्म पुष्य नक्षत्र के किसी भी चरण में हो।) इसी प्रकार कम से कम ३ गुण आता है (जैसे वर का जन्म ज्येष्ठा नक्षत्र के किसी भी चरण का हो और कन्या का जन्म आर्द्रा नक्षत्र के किसी भी चरण में हुआ हो।), इस कारण से ऋषियों का सिद्धांथ है कि यदि अष्टकूट मिलान १८ से अधिक हो तो ऐसे वर-कन्या के विवाह में साधारण रूप से कोई आपत्ति नही होती है।
विभिन्न दोषों के परिहार:-
विभिन्न दोषों के परिहार
नाड़ी व गण दोष परिहार:-
यदि वर-कन्या की एक ही राशि हो पर नक्षत्र भिन्न-भिन्न हों या एक ही नक्षत्र हो किंतु राशियाँ भिन्न-भिन्न हों या नक्षत्र एक हो किंतु उनके चरण भिन्न-भिन्न हों तो ऐसी स्थिति में नाड़ी दोष व गण दोष का परिहार हो जाता है।
नाड़ी दोष परिहार पर विस्तृत जानकारी हेतु इस link पर जाएं
जब वर और कन्या की राशियों के स्वामी एक हो (जैसे वर की मेष व कन्या की वृश्चिक राशि या वर कक वृष व कन्या की तुला राशि हो, यह दोनों राशियाँ एक दूसरे की परस्पर ६-८ हैं) तो भकूट दोष का परिहार हो जाता है, इसके अतिरिक्त वर-कन्या के राशि स्वामी यदि आपस में मित्र हों तो भकूट दोष का परिहार हो जाता है।
जन्मकुंडली में पुत्र योग ज्ञात करने के सरल व अचूक सूत्र
जन्मकुंडली में पुत्र योग ज्ञात करने के सरल व अचूक सूत्र
जन्मकुंडली में पुत्र योग ज्ञात करने के सरल व अचूक सूत्र
धर्म शास्त्र में विवाह संस्कार के बाद संतानोत्पादन का विचार बतलाया गया है हिन्दू धर्मशास्त्र अनुसार जिस मनुष्य को पुत्र नही रहता उसकी मुक्ति नही होती है पुत्र शब्द का अक्षरार्थ भी ऐसा ही होता है इन्ही सब कारणों से पुत्र संबंधी अनेकानेक योगादि ज्योतिष शास्त्रों में वर्णित हैं उनमें से कुछ सरल व अचूक सूत्रों को मैं यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ।
पुत्र के सुख-दुखादि का विचार सप्तमेश, नवमेश, पंचमेश तथा गुरु से करना चाहिए, लग्न से सप्तम स्थान जाया स्थान है पुत्र का गुणादि जाया के गुणादि से बहुत संबंध रखता है इस कारण से पुत्र के गुणादि के विचार में सप्तमेश पर भी विचार करना बतलाया है, नवम स्थान जातक/जातिका का भाग्य स्थान है और पंचम, पुत्र स्थान से पंचम स्थान नवम होता है अतएव पुत्र कारक ग्रह बृहस्पति का भी विचार करना बतलाया है।
फलदीपिकानामक पुस्तक में लिखा है कि यदि स्त्री की कुंडली से विचार करना हो तो उस जातिका के जन्म समय का बृहस्पति, चन्द्रमा व मंगल के स्फुटों को जोड़कर जो योगफल आए(यदि १२ से अधिक आए तो १२ से भाग देकर जो शेष बचे उसको लेना चाहिए।)यदि वह सम राशि हो और नवमांश विषम हो तो संतानोत्पति शक्ति उस स्त्री की अच्छी होती है ठीक इसी प्रकार यदि वह विषम राशि हो और नवमांश सम राशि का हो तो उस स्त्री की संतानोत्पति शक्ति अच्छी नही होती अर्थात उपचार एवं औषधादि प्रयोग उपरांत संतान प्राप्ति होती है।
यदि पुरुष की कुंडली हो तो सूर्य, शुक्र एवं बृहस्पति के स्फुट को जोड़कर जो योगफल आए यदि वह विषम राशि और विषम नवमांश भी हो तो ऐसे जातक में पुत्रोत्पादन शक्ति बहुत अच्छी होती है परंतु इसके विपरीत होने पर फल उत्तम नही होता है।
पुत्र योग ज्ञात करने के सरल व अचूक सूत्र:-
पुत्र योग ज्ञात करने के सरल व अचूक सूत्र
१. पंचम भाव, पंचमेश व गुरु यदि शुभ ग्रहों द्वारा देखे जाते हों या युत हों तो पुत्र सुख निश्चय ही प्राप्त होता है।
२. बली गुरु यदि पंचम भाव में हो और लग्नेश से दृष्ट हो तो पुत्र सुख अवश्य ही प्राप्त होता है।
३. यदि पंचम भाव में वृष, कर्क या तुला राशि में शुक्र या चंद्र स्थित हों और उनको कोई अशुभ ग्रह न देखता हो तो इस स्थिति में बहु पुत्र योग बनता है किंतु यदि क्रूर ग्रह मुख्यतः शनि व मंगल पंचम भाव को देखें तो यह अनिष्टकारी होता है अतः उस स्थिति में संतान सुख कठिन प्रयासों से ही प्राप्त होता है।
४. यदि लग्नेश और पंचमेश एक साथ हों या एक-दूसरे को परस्पर देखते हैं या स्वग्रही हों या मित्रग्रही हों या उच्च राशि के अंतर्गत स्थित हों तो पुत्र सुख अवश्य ही प्राप्त होता है।
५. यदि पंचम भाव पर पंचमेश, भाग्येश व लग्नेश की दृष्टि हो तो पुत्र सुख अवश्य ही प्राप्त होता है।
६. यदि चंद्रमा पंचम भाव में मंगल के नवमांश का होकर स्थित हो और शनि से दृष्ट हो परंतु अन्य ग्रहों से दृष्ट न हो तो जातक गुढोत्पन्न अर्थात उसकी स्त्री को किसी अन्य पुरुष के माध्यम से पुत्र प्राप्त होता है।
७. यदि पंचम भाव चन्द्रमा के नवमांश में हो और चंद्रमा से दृष्ट भी हो तो ऐसे व्यक्तियों को दास/दासी से पुत्र सुख प्राप्त होता है।
८. यदि पंचम भाव सूर्य के वर्ग का हो और चंद्रमा से दृष्ट हो अथवा पंचम भाव चंद्रमा के वर्ग का हो और सूर्य से दृष्ट हो साथ ही शुक्र की दृष्टि भी पंचम भाव पर पड़ती हो तो जातक को सहोदर पुत्र अर्थात वैसी स्त्री से पुत्र प्राप्त होता है जो विवाह समय ही गर्भिणी हो।
९. यदि पंचम भाव सूर्य के षोडशांश का हो और पंचम भाव में सूर्य स्थित हो या पंचम भाव को देखता हो तो जातक को कानिन अर्थात अविवाहिता स्त्री से पुत्र सुख प्राप्त होता है।
१०. यदि पंचम स्थान शनि के वर्ग का हो या पंचम स्थान में सूर्य स्थित हो और मंगल से दृष्ट हो तो जातक को अधमप्रभव अर्थात शुद्री द्वारा (अपने से अलग कुल की लड़की) पुत्र प्राप्त होता है।
व्यक्ति की कद-काठी को बताने वाले कुछ अनोखे व सरल सूत्र
ज्योतिष शास्त्र के कुछ ऐसे अनोखे और दुलभ सूत्र जो व्यक्ति की काठी को दर्शाते हैं
व्यक्ति की कद-काठी को बताने वाले कुछ अनोखे व सरल सूत्र
ज्योतिष के कुछ प्राचीनतम ग्रंथों में से मुझे कुछ सूत्र प्राप्त हुए थे जिनको मैंने शत-प्रतिशत लागू होते देखें है कुछ ही समय पूर्व एक व्यक्ति ने मुझसे इस विषय पर काफी चर्चा की थी व मुझसे इन सूत्रों को ज्योतिष के विद्यार्थियों के साथ साझा करने के लिए कहा था आज मैं उनमें से १६ सूत्रों को आप सभी के समक्ष रखता हूँ।
ज्योतिष के १६ अनोखे व दुर्लभ सूत्र:-
ज्योतिष शास्त्र के 16 अनोखे व दुर्लभ सूत्र
१. यदि शुष्क ग्रह (सूर्य, शनि व मंगल) लग्न में हो तो शरीर कृश तथा दुर्बल होता है कहने का आशय यह है कि ऐसे व्यक्ति दुबले-पतले होते हैं।
२. यदि लग्न निर्जल राशि में हो तो शरीर कृश होता है।
३. यदि लग्नेश शुष्क ग्रह (सूर्य, शनि व मंगल) के साथ हो अथवा निर्जल राशि का हो तो शरीर दुबला होता है।
४. यदि लग्नेश अष्टम या द्वादश भाव में हो तो शरीर दुबला-पतला होता है।
५. यदि लग्नेश का नवांशेश (लग्नेश नवमांश कुंडली में जिस राशि पर स्थित हो उसका स्वामी) शुष्क ग्रह (सूर्य, शनि व मंगल) के साथ हो तो शरीर दुबला-पतला होता है।
६. यदि लग्न निर्जल राशि में रहे और उसमें पाप ग्रह बैठे हों तो शरीर दुबला होता है।
७. यदि लग्न जल राशि हो और उसमें शुभ ग्रह स्थित हों तो शरीर स्थूल होता है।
८. यदि लग्नेश जल ग्रह हो साथ ही बली भी हो और शुभ ग्रह के साथ हो तो शरीर पुष्ट होता है।
९. यदि लग्नेश जल राशि में हो और शुभ ग्रह अथवा जल ग्रह के साथ हो तथा उस पर जल ग्रह की दृष्टि हो तो शरीर पुष्ट होता है।
१०. लग्न का स्वामी अर्थात लग्नेश जिस नवमांश में हो उसका स्वामी यदि जल राशि में हो तथा लग्न शुभ राशि में हो तो शरीर स्थूल होता है।
११. लग्न में बृहस्पति हो या लग्न पर जल राशिगत बृहस्पति की दृष्टि हो या लग्न जल राशि हो या लग्न पर शुभ ग्रह की दृष्टि या संयोग हो तो शरीर असाधारण रूप से स्थूल होता है।
१२. लग्नेश शुष्क ग्रह होने से, शुष्क ग्रह के साथ रहने से, शुष्क ग्रह के क्षेत्र में स्थित होने से, शुष्क राशि तथा वायु और अग्नि राशि में स्थित होने से या लग्नेश के अष्टम या द्वादश में स्थित होने से जातक/जातिका शुष्क देह तथा दुर्बल होते हैं।
१३. यदि लग्न शुष्क राशि हो और उसमें पाप ग्रह हों (सूर्य, मंगल व शनि शुष्क ग्रह होने के साथ-साथ पाप ग्रह भी हैं) तो जातक का शरीर दुबला होता है।
१४. लग्नेश जल राशिगत हो या जल ग्रह से युक्त हों तो शरीर स्थूल होता है।
१५. यदि लग्नेश जल ग्रह हो और बली हो साथ ही अन्य जल ग्रह के साथ हो तो जातक/जातिका स्थूल शरीर वाले होते हैं।
१६. लग्न में बृहस्पति के रहने से, जो जल ग्रह हैं और आकाश या तेज तत्वों का स्वामी हो या लग्न पर बृहस्पति की पूर्ण दृष्टि होने से और यदि लग्न जल राशि भी हो तो असाधारण (अत्यंत मोटा) होता है।
जन्म कुंडली में ग्रहों से संबंधित दोषों से मुक्ति पाने का यह सर्वश्रेष्ठ अवसर है ईशान, ईश्वर, शिव, रुद्र, शंकर, महादेव आदि सभी ब्रह्म के ही पर्यायवाची शब्द हैं, ब्रह्म का विग्रह रूप शिव है तथा शिव की शक्ति शिवा है इसमें सतोगुण जगत पालन विष्णु हैं और रजोगुण सृष्टिकर्ता ब्रह्मा हैं, श्वास वेद, सूर्य-चंद्र नेत्र, तीनों लोक और चौदह भुवन इनके वक्षस्थल हैं जिनके विशाल जटाओं में सभी नदियों, पर्वतों और तीर्थों का वास है जहाँ सृष्टि के सभी ऋषि, मुनि, योगी आदि तपस्यागत रहते हैं, वेद ब्रह्मा के विग्रह के रूप अपौरुकेय, अनादि अजन्मा, ईश्वर शिव के श्वास से विनिर्गत हुए हैं, इसलिए वेद मंत्रों के द्वारा शिव का पूजन-अर्चन, अभिषेक, जप, यज्ञ आदि कर के प्राणी इनकी कृपा सहजता से प्राप्त कर लेता है।
रुद्राभिषेक से लाभ:-
रुद्राभिषेक से लाभ
श्री महारुद्र जी का अभिषेक स्वम् के द्वारा करने या वेदपाठी विद्वानों द्वारा करवाने के बाद प्राणी को फिर किसी भी पूजा की आवश्यकता नही रहती है “शिव महापुराण” के अनुसार, वेदों का सारत्व “रुष्ट्राध्यायी” है, जिसमें ८ अध्यायों में १७६ मंत्र है, इन मंत्रों द्वारा त्रिगुण स्वरूपा रुद्र का पूजन अभिषेक किया जाता है, वेदों का सार है रुद्राष्टध्यायी जिसके प्रथम अध्याय के “शिव संकल्प सूत्र मंत्रों” से “श्री गणेश” का स्तवन किया गया है, द्वितीय अध्याय “पुरुष सूक्त” में “विष्णु जी” का स्तवन है, तृतीय अध्याय से “देवराज इंद्र” और चतुर्थ अध्याय में “सूर्य” का स्तवन किया जाता है, पंचम अध्याय स्वम् “रुद्र” रूप है इस अध्याय को “शतरुद्रीय” भी कहा जाता है, षष्ठ अध्याय में “शिव” के मस्तक पर विराजमान “सोम अर्थात चंद्र” का स्तवन है, इसी प्रकार सप्तम अध्याय में “मरुथ” और अष्टम अध्याय में “अग्नि देव” का स्तवन किया गया है, इसके साथ ही अन्य सभी देवी-देवताओं के स्तवन भी इन्ही पाठ मंत्रों में समाहित है।
एक-एक क्षण का सदुपयोग करना चाहिए:-
मान्यता है शिवरात्रि के दिन शिवलिंग पर विल्वपत्र अर्पित करने से व्यापार में उन्नति होती है और सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ती है, भाँग अर्पित करने से घर की अशांति दूर होती है, मंदार पुष्प अर्पित करने से नेत्र और हिर्दय विकार दूर रहते हैं, धतूरे के पुष्प अर्पित करने से विषैले जीवों के प्रभाव देवताओं के क्रोध से रक्षा होती है, शमी पत्र चढ़ाने से शनि की साढ़ेसाती, मारकेश और अशुभ ग्रह-गोचर से हानि नही होती है इसलिए “महाशिवरात्रि” व “मासशिवरात्रि” के दिन के एक-एक क्षण का सदुपयोग कर अपने मनोरथ को सिद्ध करने हेतु भूतनाथ भगवान “शिव” जी का विधिवत पूजन-अर्चन करना चाहिए।
मनोकामना पूर्ति हेतु रुद्राभिषेक अत्यंत लाभकारी:-
“रुद्राभिषेक” में सृष्टि की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करने की शक्ति है अतः अपनी आवश्यकता अनुसार अलग-अलग पदार्थों से रुद्राभिषेक कर के प्राणी इच्छित फल प्राप्त कर सकता है, इनमें दुग्ध के द्वारा अभिषेक करने से उत्तम संतान की प्राप्ति, गन्ने के रस से यश कीर्ति व उत्तम जीवनसाथी की प्राप्ति, शहद के द्वारा अभिषेक करने से कर्ज मुक्ति, घी के द्वारा अभिषेक करने से व्यापार वृद्धि, दुग्ध और मिश्री को मिलाकर अभिषेक करने से उत्तम विद्या और प्रतियोगिता में सफलता, कुश और जल से अभिषेक से रोग मुक्ति आदि प्राप्त होती है इसके अतिरिक्त पंचामृत से अष्ट लक्ष्मी और तीर्थों का जल से मोक्ष की प्राप्ति होती है तथा सभी द्वादश ज्योतिर्लिंगोंवपर अभिषेक करने से प्राणी जीवन-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है।
मनोकामनेश्वर महादेव
प्रति मास कृष्ण पक्षीय निशीथ काल व्यापिनी चतुर्दशी के दिन “मासिक शिवरात्रि व्रत” किया जाता है, समाज में फाल्गुन तथा श्रावण मास में पूजा विशेष प्रचलित है, “ईशान संहिता” के अनुसार फाल्गुन मास में ज्योतिर्लिंग का प्रादुर्भाव हुआ था इसलिए उसे “महाशिवरात्रि” के नाम से जाना जाता है, जनश्रुतियों के अनुसार श्रवण मास में शिव जी ने संसार की रक्षा हेतु विषपान किया था और विष की विकलता में इधर-उधर भागने लगे तब सभी ने विष की गर्मी से राहत दिलाने हेतु शिव जी का गंगाजल से रुद्राभिषेक किया था तभी से गंगाजल द्वारा रुद्राभिषेक की परंपरा शुरू हुई थी, गंगाजल से शिव अभिषेक आराधना अत्यंत उत्तम माना गया है, गंगाजल के अतिरिक्त रत्नोंदक, इच्छु रस (गन्ने का रस), दुग्ध, पंचामृत (दुग्ध, दहीं, घी, शहद, शकर) आदि अनेक द्रव्यों से किया जाता है।
काशी के ब्राह्मणों द्वारा रुद्राभिषेक करवाने हेतु आप नीचे दिए गए नंबर पर सम्पर्क कर सकते हैं:-
आचार्य प्रतीक जेतली:- 7905559687
ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली:-9919367470, 7007245896
विक्रम संवत २०७८ के मासिक व महाशिवरात्रि व्रत की विस्तृत जानकारी हेतु इस link पर जाएं:-
वट सावित्री व्रत ९ जून २०२१ जानिए शुभ मुहर्त तथा व्रत व पूजन विधि
वट सावित्री व्रत शुभ मुहर्त व पूजनऔर व्रत विधि
ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या को वट सावित्री व्रत होता है वट सावित्री व्रत त्रयोदशी से तीन दिनों का व्रत होता है, इस व्रत में अमावस्या सूर्यास्तकाल से पूर्व तीन मुहर्त व्यापिनी विद्धा ग्राह्म है, इस वर्ष ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी दिन में१:११तक है तथा इसके बाद अमावस्या लग जाती है जो सूर्यास्तकाल से पूर्व तीन मुहर्त से भी अधिक मिल रही है अतः दिनांक९ जून बुधवार को ही वट सावित्री व्रत होगा व व्रत का आरंभ७ जून २०२१ सोमवार से होगा, वट सावित्री व्रत के दिन वट वृक्षकी पूजा का विधान है इसके साथ ही महिलाएं सत्यवान, सावित्री और यमराज की पूजा भी करती हैं व्रती महिलाओं को इस दिन सत्यवान और सावित्री की कथा विशेष तौर पर पढ़ना और सुनना चाहिए।
वट सावित्री व्रत की हार्दिक शुभकामनाएं
वट सावित्री व्रत पूजन सामग्री:-
वट सावित्री व्रत पूजन सामग्री
सत्यवान-सावित्री की मूर्ति, धूप, मिट्टी का दीपक, घी, फूल, फल, २४ पूरियां, २४ बरगद फल (आटे या गुड़ के) बांस का पंखा, लाल धागा, कपड़ा, सिंदूर, जल से भरा हुआ पात्र और रोली इत्यादि।
वट सावित्री व्रत व पूजन विधि:-
वट सावित्री व्रत पूजन विधि
सर्वप्रथम व्रती महिलाओं को सुबह सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण कर १६ श्रृंगार करना चाहिए तथा अपने इष्ट देव के समक्ष व्रत करने का संकल्प लेना चाहिए तदोपरांत बरगद पेड़ का पूजन करना चाहिए पूजन में २४ बरगद के फल (आटे या गुड़ के) व २४ पूड़ियों को अपने आंचल में रखकर वट वृक्ष का पूजन करना चाहिए पूजा में १२ पूड़ियों व १२ बरगद फल (आटे या गुड़ के) को हाथ में लेकर वट वृक्ष पर अर्पित करना चाहिए।
तत्पश्चात एक लोटा शुद्ध जल चढ़ाएं व वृक्ष पर हल्दी, रोली और अक्षत से स्वास्तिक बनाकर पूजन करें साथ ही धूप-दीप दान करने के बाद कच्चे सूत को लपेटते हुए १२ बार बरगद वृक्ष की परिक्रमा करनी चाहिए एक परिक्रमा के बाद एक चने का दाना भी छोड़ते रहना चाहिए व वट वृक्ष की परिक्रमा पूरी होने के बाद सत्यवान और सावित्री की कथा पढ़नी या सुननी चाहिए फिर १२ कच्चे धागे वाली माला वृक्ष पर चढ़ाकर दूसरी स्वम् पहन लेनी चाहिए तदोपरान्त ६ बारमाला को वृक्ष से बदलें और अंत में एक माला वृक्ष को चढ़ाएं और एक अपने गले में पहन लें तत्पश्चात संध्याकाल व्रत खोलने से पूर्व ११ चने के दाने और वट वृक्षकी लाल रंग की कली को पानी से निगलकर अपना व्रत खोलना चाहिए।
वट सावित्री व्रत शुभ मुहर्त:-
वट सावित्री व्रत शुभ मुहर्त
इस वर्ष ९ जून २०२१ को वट सावित्री व्रत के दिन चतुर्दशी तिथि दिन के १:११ तक तदोपरांत अमावस्या तिथि रहेगी साथ ही इस दिन कृत्तिका नक्षत्र दिन के ०९:११ तक तदोपरांत रोहिणी नक्षत्र रहेगा साथ ही इस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग संपूर्ण दिन-रात्रि रहने से यह एक अद्भुद संयोग रहेगा अतः ९ जून २०२१ को संपूर्ण दिन-रात्रि पूजन का शुभ मुहर्त रहेगा इसके अतिरिक्त दिन में ५:१४ से ५:३६, १०:०८ से १२:२२ व सायं काल में ४:५५ से ७:२२ तक का मुहर्त अत्यंत शुभ रहेगा।
खग्रास चंद्र ग्रहण २६ मई २०२१ जानिए किन राशियों पर क्या पड़ेगा प्रभाव
खग्रास चंद्रग्रह जानें राशिफल
विक्रम संवत २०७८ “आनंद संवत्सर” का प्रथम ग्रहण खग्रास चंद्र ग्रहण वैशाख शुक्ल १५ (पूर्णिमा) बुधवार २६ मई २०२१ को चंद्रोदय के समय आंशिक रूप से भारत के सुदूर पूर्वोत्तर भाग और पश्चिम बंगाल के कुछ भाग के साथ उत्तर-दक्षिण अमेरिका, एशिया, ऑस्ट्रेलिया, अंटार्कटिका, प्रशांत महासागर व हिन्द महासागर में दिखाई देगा इनके अतिरिक्त विश्व के अन्य किसी भाग में यह ग्रहण नही दिखाई देगा अतः इन जगहों पर ही ग्रहण व सूतक का मान रहेगा अन्य किसी स्थान पर नही इस ग्रहण का ग्रासमान १.०१६ रहेगा।
ग्रहण काल के दिन पूर्णिमा तिथि, तथा अनुराधा नक्षत्ररहेगा साथ ही इस दिन चंद्रमा का गोचर वृश्चिक राशिसे रहेगा तो चलिए जानते हैं इस गोचर का विभिन्न राशियों पर क्या प्रभाव पड़ेगा:-
मेष राशि:-
मेष राशिफल
मेष राशि वालों के यह यह ग्रहण अष्टम भाव पर लगेगा जिस कारण से स्वास्थ्य जनित समस्याएं उत्पन्न हो सकती है अतः स्वास्थ्य के प्रति पूर्णतया सचेत रहें, मानसिक तनाव में वृद्धि होगी, जीवनसाथी या किसी महिला पर धन व्यय होने के योग बनेंगे, महिलाओं से सतर्क रहें अन्यथा महिलाओं द्वारा अपमानित होने के योग बनेंगे।
उपाय:- सुंदरकांड का पाठ करें।
वृषभ राशि:-
वृषभ राशिफल
वृषभ राशि वालों के लिए यह ग्रहण सप्तम भाव में होने से अशुभ है अतः स्वास्थ्य के प्रति पूर्णतया सतर्क रहें, जीवनसाथी से विवाद संभव है, कुटुंब में मतभेद रहने से मन अशांत रहेगा, भाग्य में कड़े संघर्ष उपरांत वृद्धि होगी, रोजगार के क्षेत्र से जुड़े व्यक्तियों को बेहद सतर्कता बरतनी होगी चूँकि गुरु का आपकी राशि से दशम में गोचर है अतः कुछ संघर्ष के उपरांत रोजगार के क्षेत्र में लाभ भी होगा, माता-पिता के स्वास्थ्य का ख्याल रखें, जिन्हें रक्त जनित समस्याएं हैं वह और भी सतर्क रहें, आपकी राशि के मारक स्थान पर लगने वाला यह गोचर सुख-शांति की हानि व रोग, व्याधि और पीड़ा में वृद्धि वाला रहेगा।
उपाय:- दुर्गा सप्तशती का पाठ करें।
मिथुन राशि:-
मिथुन राशिफल
मिथुन राशि वालों के लिए यह ग्रहण षष्ठ भाव में होगा अतः मिथुन राशि वालों को भी स्वास्थ्य के प्रति पूर्णतया सतर्क रहना होगा, कुंडली के षष्ठ भाव से रोग, शत्रु व ऋण का विचार किया जाता है अतः इस ग्रहण के प्रभाव से इन तीनों में वृद्धि होगी चूँकि गोचरस्थ गुरु की लग्न, तृतीय व पंचम भाव पर दृष्टि है अतः किसी प्रकार के अनिष्ट की संभावना कम है फिर भी सतर्क रहें, निकट भविष्य में किसी यात्रा के संकेत मिल रहें जो कि अनिष्टकारी रहने वाली है अतः यात्रा को टालने का प्रयास करें, मामा पक्ष को कष्ट संभव है, मन व्यथित रह सकता है, ठंडी चीजों से परहेज करें।
उपाय:- गणेश संकटनाशन स्तोत्र का पाठ करें।
कर्क राशि:-
कर्क राशिफल
कर्क राशि वालों के लिए यह ग्रहण पंचम भाव से रहेगा अतः संतान को कष्ट संभव है, विद्यार्थियों के लिए यह समय शुभ नही रहेगा, प्रेमी-प्रेमिकाओं में विवाद की संभावना रहेगी, मन व्यथित रहेगा, दाम्पत्य जीवन में विवाद संभव है, बड़ी बहन से विवाद संभव है, अचानक किसी महिला से लाभ प्राप्त होगा।
उपाय:- विल्वाष्टकम् का पाठ करें।
सिंह राशि:-
सिंह राशिफल
सिंह राशि वालों के लिए यह ग्रहण चतुर्थ भाव से रहेगा अतः घर के सुख-संबंधों में कुछ कमी रहेगी, यदि आपके घर में वास्तु दोष है तो यह ग्रहण प्रत्येक प्रकार से अनिष्टकारी सिद्ध हो सकता है, माता-पिता को कष्ट संभव है, धोखा मिलने की संभावना रहेगी अतः किसी पर अधिक विश्वास करने से बचें, कार्यक्षेत्र में चतुराई के माध्यम से कुछ कड़े संघर्ष उपरांत बड़ी सफलता मिलने के पूर्ण योग है अतः इस अवसर का लाभ अवश्य उठाएं।
उपाय:- आदित्य हिर्दय स्तोत्र का पाठ करें।
कन्या राशि:-
कन्या राशिफल
कन्या राशि वालों के लिए यह ग्रहण तृतीय भाव से रहेगा अतः छोटे भाई-बहन को कष्ट संभव है, तृतीय भाव से आयुष्य का भी विचार किया जाता है अतः कन्या राशि वालों के स्वास्थ्य में समस्याएं रह सकती है, कार्य के सिलसिले से निकट भविष्य में यात्राओं के योग बनेंगे, पंचम भाव पर शुक्र, राहु, बुध व सूर्य की युति यात्राओं के अवसर, संतान सुख, महिलाओं से लाभ, स्थान परिवर्तन के साथ भाग्य वृद्धि के योग बनाएंगे ही गुरु की दशम भाव पर दृष्टि कार्यक्षेत्र में उन्नतिदायक रहेगी किंतु मन व्यथित रहेगा, बड़े भाई-बहन को कष्ट संभव है।
उपाय:- गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करें व गणेश गायत्री की 1 माला मंत्र जाप करें।
तुला राशि:-
तुला राशिफल
तुला राशि वालों के धन व कुटुंब भाव से यह ग्रहण रहेगा अतः कुटुंब में कुछ मतभेद रहेंगे व धन संचय में कठिनाई आएंगी, वाणी पर नियंत्रण रखें, शुक्र के अष्टम से गोचर के कारण से आयुष्य की रक्षा होगी किंतु राहु का अष्टम भाव से गोचर स्वास्थ्य के लिहाज से अच्छा नही है अतः स्वास्थ्य का ख्याल रखें विशेषतः पेट, नासिक व गर्दन में समस्याएं रह सकती हैं जिन व्यक्तियों को थाइरॉइड या हार्मोन्स में असंतुलन की समस्या हो उनको इस ग्रहण से विशेष कष्ट प्राप्त होने के योग बन रहे हैं अतः स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहें।
उपाय:- सिद्धकुंजिका स्तोत्र व नवचंडी का पाठ करें।
वृश्चिक राशि:-
वृश्चिक राशिफल
वृश्चिक राशि वालों के लिए लग्न से यह ग्रहण रहेगा अतः स्वास्थ्य के प्रति सतर्क रहें तथा मन में नियंत्रण को बनाएं रखें, इस ग्रहण के प्रभाव के कारण से तनाव में वृद्धि व चोटादि लगने के योग बन रहे हैं, जीवनसाथी से विवाद संभव है किंतु आप चतुराई से परिस्थितियों को नियंत्रण में ला सकेंगे, माता के स्वास्थ्य का ख्याल रखें, नौकरी पेशा लोगों को कुछ समस्याओं के साथ संघर्ष करने पर सफलता प्राप्त होगी, व्यर्थ की यात्राओं को टालने का प्रयास करें।
उपाय:- हनुमान बाहुक व सुंदरकांड का नित्य पाठ करें।
धनु राशि:-
धनु राशिफल
धनु राशि वालों के द्वादश भाव से यह ग्रहण रहेगा अतः व्यर्थ मन व्यथित रहने से तनावपूर्ण स्थितियाँ उत्पन्न होंगी, अनिष्टकारी यात्राओं के योग बनेंगे, व्यय में वृद्धि होगी, स्वास्थ्य के प्रति सतर्क रहें, जीवनसाथी से विवाद संभव रहेगा, भाग्य में व्रद्धि होगी, छुपे हुए शत्रुओं से सावधान रहें, किसी महिला द्वारा तनावपूर्ण स्थितियाँ उत्पन्न होंगी।
उपाय:- राम रक्षा स्तोत्र व विष्णु सहस्त्र नाम का पाठ करें।
मकर राशि:-
मकर राशिफल
मकर राशि वालों के एकादश भाव से यह ग्रहण रहेगा अतः निकट भविष्य में आय को लेकर अस्थिरता बनने के योग बनेंगे जिसमें अचानक से धन लाभ होगा वहीं अचानक धन हानि या धन व्यय के योग बनेंगे, धन संचय में कुछ त्रुटि रहेगी, संतान व बड़ी बहन, माता, मामी, बुआ को कष्ट संभव रहेगा, विद्यार्थियों के लिए भी यह ग्रहण अत्यधिक शुभदायक नही रहेगा।
उपाय:- मधुराष्टकं व राम रक्षा स्तोत्र का पाठ करें।
कुंभ राशि:-
कुंभ राशिफल
कुंभ राशि वालों के लिए यह ग्रहण दशम भाव में रहेगा अतः पिता के स्वास्थ्य का ख्याल रखें, कार्यक्षेत्र व पिता के स्वास्थ्य को लेकर तनाव में वृद्धि होगी, घर के सुख-संबंधों में कुछ त्रुटि रहेगी, यदि आपके घर में किसी प्रकार का वास्तु दोष है तो यह ग्रहण प्रत्येक प्रकार से अनिष्टकारी सिद्ध होगा, बड़े भाई से पूर्ण सहयोग प्राप्त होगा व जो व्यक्ति पुलिस, चिकित्सा, विज्ञान, रसायन आदि क्षेत्र से जुड़े हुए हैं उनके लिए यह ग्रहण शुभफलदाई रहेगा, स्वास्थ्य के प्रति सतर्क रहें।
उपाय:- हनुमान बाहुक व सुंदरकांड का पाठ करें।
मीन राशि:-
मीन राशिफल
मीन राशि वालों के लिए यह ग्रहण नवम भाव से रहेगा अतः छोटे भाई-बहन के स्वास्थ्य के प्रति सतर्क रहें, संतान को कष्ट संभव है, विद्यार्थियों की शिक्षा में अवरोध उत्पन्न हो सकते हैं, तृतीय भाव से आयुष्य का भी विचार करते हैं वहाँ शुक्र, राहु, बुध व सूर्य की युति स्वास्थ्य में अचानक से किसी समस्या को उत्पन्न कर सकती है, धन व्यय में वृद्धि होगी, प्रेमियों के मध्य विवादपूर्ण स्थिति उत्पन्न होगी, किसी महिला के स्वास्थ्य में अचानक समस्या उत्पन्न होने के कारण से तनाव बना रहेगा।
उपाय:- विष्णु सहस्रनाम व राम रक्षा स्तोत्र का पाठ करें।
कोरोना से बचाव हेतु ज्योतिष शास्त्र व धर्म शास्त्र के कुछ अचूक उपाय
कोरोना और ज्योतिष: जानिए ज्योतिष शास्त्र व धर्म शास्त्र के अनुसार कुछ ऐसे उपाय जिनसे कोरोना से बचा जा सकता है
कोरोना से बचाव हेतु ज्योतिष शास्त्र व धर्म शास्त्र के कुछ अचूक उपाय
पिछले लेख में मैंने अपने इष्ट, आराध्य व अपने गुरु (श्री हनुमान जी व बाबा महादेव) की कृपा से कोरोना महामारी पर सूक्ष्म विवेचना की थी जिसमें मुझे यह ज्ञात हुआ था कि कोरोना महामारी का प्रकोप २०२१ पूर्ण वर्ष रहेगा तथा २० अगस्त २०२१ और १३ फरवरी २०२२ को गोचर में ग्रहों की स्थिति सुधरने पर इनमे कुछ कमी दिखाई देगी व १३ फरवरी २०२२ के बाद कोरोना से काफी हद तक राहत मिलती दिख रही है चूँकि आजाद भारत की कुंडली (जिसका फलादेश शीघ्र ही उपलब्ध करायूँगा।) के अध्यन से यह ज्ञात होता है कि वर्ष २०२२ भी अनेक प्रकार की विपत्तियों, बीमारियों, चोरी व अग्नि से जान-माल की हानि, उपद्रव, हिंसा, चक्रवात वाला होगा क्योंकि आजाद भारत की कुंडली के द्वादश भाव से राहु व षष्ठ भाव से केतु का गोचर रहने वाला होगा।
कोरोना एक ऐसी बीमारी है जो कि किसी भी प्रकार से समझ नही आ रही यदि विज्ञान के नजरिए से भी देखें तो जाँच में इस बीमारी के शरीर में होने का नही पता चलता बल्कि इस बीमारी से शरीर में जो बदलाव हुए हैं उनके बारे में पता चलता है कारण यह कि कोरोना महामारी राहु द्वारा जनित है मुझे पता है यहाँ बहुत से लोग यह प्रश्न जरूर उठाएंगे कि गोचर में शनि, केतु व गुरु की युति के समय इस बीमारी का उद्गम हुआ था तो मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि मैं इस बात को नही नकार रहा कि यह बीमारी उपरोक्त ग्रहों की गोचर में युति से उत्पन्न हुई है, मैंने अपने पूर्व के लेख जिसमें मैंने राहु व केतु के गोचर परिवर्तन के विषय पर लेख लिखा था कि इस गोचर की सबसे विचित्र बात यह रहने वाली है कि हमेशा राहु को नियंत्रण में करने वाला ग्रह केतु इस बार खुद नियंत्रण के बाहर रहेगा जिसे नियंत्रित इस बार राहु करेंगे अतः इस बीमारी के उत्पन्न होने का मुख्य कारण राहु ही हैं चूँकि राहु अपने गुरु, शुक्र की राशि वृषभ से गोचर कर रहे हैं तो और भी बली अवस्था में गोचर रहे हैं और प्रश्न कुंडली (जिसका फलादेश पूर्व के आर्टिकल में किया था।) उसके हिसाब से मारक स्थान पर एक साथ ४ अशुभ योग का बनना कोरोना से भयावह स्थिति उत्पन्न करने की ओर दर्शा रहा था अतः कल की प्रश्न कुंडली को ध्यान में रखते हुए व साथ ही धर्मशास्त्रों के कुछ अचूक उपायों को मैं आप सभी के समक्ष रखता हूँ जिन्हें करने से आपको निश्चय ही लाभ होगा।
विशेष:-
“कर्म प्रधान विश्व रचि राखा।”
“जो जस करहिं सो तसि फल चाखा।।”
अर्थात:- यह ब्रह्मांड कर्म प्रधान है जो व्यक्ति जिस प्रकार के कर्म करता है उसको उसी के अनुरूप फल की प्राप्ति होती है।
कहने का आशय यह है कि इन उपायों के साथ आपको स्वम् की सुरक्षा भी करनी होगी तभी यह उपाय कारगर सिद्ध होगा।
ज्योतिष व धर्म शास्त्र के अनुसार कोरोना बीमारी से बचाव हेतु उपाय:-
१. नित्य शिवलिंग पर जल मिश्रित दुग्धाभिषेक कर चावल, काला तिल, विल्वपत्र, दूर्वा, तुलसी, पुष्प एक साथ अर्पित करते हुए महामृत्युंजय मंत्र का जाप करना चाहिए इससे शनि व राहु के अशुभ फल में कमी तो आएगी ही साथ ही आयुष्य की भी रक्षा होगी।
२. नित्य शनि व राहु के मंत्रों का २१-२१ बार जप करने से भी शनि व राहु के अशुभ फल को कुछ कम कर इस बीमारी से बचा जा सकता है।
३. धर्म शास्त्रों के अनुसार पंचगव्य (दूध, दहीं, घी, गोबर व गौमूत्र से निर्मित होने के कारण से इसे पंचगव्य कहा गया है।) का सेवन करने से बड़ी से बड़ी बीमारी को सही किया जा सकता है।
४. पद्म पुराण के अनुसार जो व्यक्ति नित्य सुंदरकांड का पाठ करता है वह सभी प्रकार के रोग, व्याधि व पीड़ा से मुक्त रहता है।
५. हनुमान बाहुक व बजरंगबाण के पाठ से सभी प्रकार के रोग, व्याधि व पीड़ा का अंत हो जाता है।
६. दुर्गा कवच, सुदर्शन कवच, राम रक्षा स्तोत्र, आदित्य हिर्दय स्तोत्र का पाठ व्यक्ति को हर ओर से रक्षित करता है।
७. गुरुवार के दिन गाय को चने की दाल व केला खिलाने से भी कोरोना से काफी राहत अनुभव होगी।
विशेष:-
जिनके घर-परिवार के सदस्य या रिशेदार कोरोना ग्रसित हो गए हों व स्थिति निरंतर बिगड़ती जा रही हो ऐसी स्थिति में अविलंब कुंडली दिखाकर अशुभ ग्रह के उपाय करने चाहिए किंतु उससे भी पूर्व उक्त व्यक्ति के लिए तत्काल राहु व शनि के मन्त्र जाप को करवाना चाहिए।