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मंगल दोष क्या सच में इतना बुरा है जितना इसे बताया जाता है? जानिए: मंगल दोष की विस्तृत जानकारी

जब भी विवाह की बात चलती है, तो कुंडली मिलान में सबसे पहला और सबसे डरावना प्रश्न यही होता है— “कहीं लड़का या लड़की मांगलिक तो नहीं?”

आम तौर पर लोग ‘मंगल दोष’ को एक अभिशाप मान लेते हैं। लेकिन प्राचीन ज्योतिष ग्रंथ ‘फलदीपिका’ का अध्ययन करने पर पता चलता है कि मंगल दोष केवल ‘डर’ नहीं, बल्कि ऊर्जा का एक ‘असंतुलन’ है। आज इस लेख में मैं आपको शास्त्रों के उन पन्नों तक ले चलूँगा, जहाँ मंगल दोष और काम-विज्ञान (Sexuality) के गहरे रहस्य छिपे हैं।

🔥 मंगल दोष (कुज योग): डर नहीं, विज्ञान समझें

फलदीपिका के अनुसार, ज्योतिष में 5 ग्रहों को ‘क्रूर’ या ‘पापी’ की श्रेणी में रखा गया है— मंगल, शनि, सूर्य, राहु और केतु। जब ये ग्रह विवाह और सुख से जुड़े भावों (Houses) पर कब्जा कर लेते हैं, तो दांपत्य जीवन की गाड़ी डगमगाने लगती है।

लेकिन याद रखें, इसका विचार केवल लग्न कुंडली से नहीं, बल्कि ‘चंद्र कुंडली’ (मन) और ‘शुक्र’ (विवाह कारक) से भी करना अनिवार्य है।

🏠 कुंडली के वो 5 भाव जहाँ मंगल मचाता है हलचल

मेरे ज्योतिषीय अनुभव में, मंगल दोष का प्रभाव इन पांच स्थानों पर सबसे ज्यादा खतरनाक होता है:

  • द्वितीय भाव (कुटुंब स्थान): लग्न से दूसरा भाव ‘परिवार’ का है। पत्नी घर की नींव होती है। ज्योतिष में कहा गया है कि यदि ‘कुटुंब रूपी शामियाने’ का मुख्य स्तंभ (पत्नी) ही दोषपूर्ण हो जाए, तो पूरा परिवार बिखर सकता है। यहाँ बैठा पाप ग्रह वंश वृद्धि और पारिवारिक सुख को ‘दीमक’ की तरह चाट जाता है।
  • चतुर्थ भाव (सुख स्थान): चौथा घर मकान, वाहन और घरेलू शांति का है। यदि घर की लक्ष्मी (गृहिणी) ही सुखी न हो, तो आलीशान मकान और गाड़ियों का भोग कौन करेगा? चौथे घर का मंगल ‘गृह-क्लेश’ का कारण बनता है।
  • सप्तम, अष्टम और द्वादश भाव:
    • सप्तम: यह सीधे पति-पत्नी का घर है। यहाँ पाप ग्रह अलगाव पैदा करता है।
    • अष्टम: यह आयु और ‘गुप्तांगों’ का भाव है। इसका सीधा संबंध आपकी ‘Sexual Health’ से है।
    • द्वादश (12वां): इसे ‘शैया सुख’ (Bed Comforts) का भाव कहते हैं। यहाँ बैठा मंगल पति-पत्नी के अंतरंग पलों (Intimacy) में आग लगाने का काम करता है।

🛑 क्या आपकी कुंडली में मंगल भारी है?

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❤️ स्त्री और पुरुष: मंगल और शुक्र का ‘सीक्रेट कनेक्शन’

ज्योतिष केवल ग्रहों की चाल नहीं, बल्कि मानव शरीर का विज्ञान है। फलदीपिका में स्त्री और पुरुष की ‘बायोलॉजी’ को ग्रहों से बहुत खूबसूरती से जोड़ा गया है:

  • स्त्रियों का विचार (मंगल से क्यों?): स्त्री के शरीर में ‘रज’ (Menstruation/Blood) की प्रधानता होती है। चूंकि रक्त का रंग लाल है और मंगल भी लाल है, इसलिए स्त्री की कामवासना और स्वास्थ्य का विचार मंगल से किया जाता है।
  • पुरुषों का विचार (शुक्र से क्यों?): पुरुष के शरीर में ‘वीर्य’ (Semen) प्रधान होता है, जिसका रंग श्वेत (सफेद) होता है। इसलिए पुरुष की कामशक्ति का विचार शुक्र से होता है।

यही कारण है कि जब कुंडली में शुक्र और मंगल का मिलन होता है, तो व्यक्ति के अंदर ‘पैशन’ (Passion) की अधिकता होती है।

🏹 कामदेव, मकर और मीन राशि का रहस्य

क्या आपने कभी सोचा है कि कामदेव को ‘मकरध्वज’ और ‘मीनकेतु’ क्यों कहा जाता है? इसके पीछे एक गहरा ज्योतिषीय सिद्धांत है:

  • मंगल (ऊर्जा) ‘मकर राशि’ में उच्च का होता है। (इसलिए मकरध्वज)
  • शुक्र (प्रेम) ‘मीन राशि’ में उच्च का होता है। (इसलिए मीनकेतु)

कामदेव कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि मंगल और शुक्र का वह संतुलन है जो सृष्टि को आगे बढ़ाता है। बसंत पंचमी को कामदेव का जन्मोत्सव इसीलिए मनाया जाता है क्योंकि उस समय प्रकृति में शुक्र (सौंदर्य) अपने चरम पर होता है।

🚩 मंगल दोष का सबसे बड़ा उपाय:

यदि मंगल आपकी कुंडली में भारी है, तो हनुमान जी की शरण ही एकमात्र उपाय है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि हनुमान जी के पाठ का नाम ‘सुंदरकांड’ ही क्यों पड़ा?

यह रहस्य जानकर आप चौंक जाएंगे: [सुंदरकांड का नाम ‘सुंदर’ ही क्यों है? यहाँ क्लिक करें और जानें]

🌸 निष्कर्ष: कामदेव के 5 बाण

शास्त्रों में कहा गया है कि कामदेव के बाण लोहे के नहीं, बल्कि ‘फूलों’ के होते हैं। ये 5 फूल हमारी 5 इंद्रियों (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध) के प्रतीक हैं।

इसलिए, मंगल दोष से घबराएं नहीं। कुंडली का सूक्ष्म विश्लेषण करवाएं, क्योंकि कई बार कुंडली में दोष होता है लेकिन परिहार (Remedy) के कारण उसका असर खत्म हो जाता है।

।। शुभम भवतु ।।
जय श्री राम।

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तीसरे भाव में स्थित शनि का फल भाग 2

यदि तीसरे भाव में उच्च राशि का शनि हो जो कि सिंह लग्न की कुंडली में संभव है तो व्यक्ति उत्तम प्रबंधनकर्ता व अच्छा शासक होता है जो कि अपने ग्रुप को अच्छे से manage करता है सिंह लग्न की कुंडली में शनि सप्तमेश होता है अब यहाँ देखिए कि सप्तमेश उच्च राशि का पराक्रम भाव में बैठा है जो कि यह दर्शाता है कि आपका जीवनसाथी मजबूत दिमाग या इरादों वाला होगा अगर यहाँ शनि वक्री हो जाए तो स्थिति और खराब हो जाएगी क्योंकि ऐसी स्थिति में जीवनसाथी को समझा पाना या उनके आगे अपनी बात अच्छे से रख पाना बहुत मुश्किल होता है क्योंकि आपका लग्न भी सिंह है तो समस्या आती ही है।

शनि का प्रथम भाव में फल भाग:- 1

यदि तीसरे भाव में शनि शुभ वर्ग का हो तो ऐसा व्यक्ति शास्त्रों को जानने वाला और अनुसंधानकर्ता होता है मतलब कि उसकी रुचि रिसर्च में होती है, यदि नीच राशि का शनि तीसरे भाव में हो जो कि कुंभ लग्न में ही संभव है तो व्यक्ति दूषित मन वाला होता है अब यहाँ देखिए कि लग्नेश ही नीच राशि का हो गया तो वह बुरे विचार व्यक्ति के मन में पहले लाता है हालांकि दो सौम्य ग्रह या शुभ ग्रह की दृष्टि शनि पर पड़ जाए तो काफी हद तक इससे छुटकारा मिल जाता है।

शनि का प्रथम भाव में फल भाग:-2

यदि नीच नवांश का शनि तीसरे भाव में हो तो ऐसा व्यक्ति अपनी बातों से लोगों को मूर्ख बनाता है, यदि वर्गोत्तम शनि तीसरे भाव में हो तो व्यक्ति अत्यधिक स्वाभिमानी होता है, यदि पाप वर्ग का शनि तीसरे भाव में हो व्यक्ति भाव रहित होता है अर्थात न काहु से दोस्ती, न काहु से वैर वाली स्थिति होती है जो कि शुभ है।

शनि का द्वितीय भाव में फल

यदि मित्र राशि का शनि तीसरे भाव में हो तो ऐसा व्यक्ति दूसरों को परामर्श देने वाला व न्यायवक्ता होता है, यदि मित्र नवांश का शनि तीसरे भाव में हो तो ऐसा व्यक्ति गुणवान व धनवान दोनों होता है।

शनि का तीसरे भाव में फल भाग:-1

यदि शत्रु राशि का शनि तीसरे भाव में हो तो ऐसे व्यक्ति को किसी न किसी प्रकार की लत अवश्य रहती है भले वो चाय की हो या नशे की या अन्य किसी प्रकार की हो, यदि शत्रु नवांश का शनि तीसरे भाव में हो तो ऐसा व्यक्ति दीनता का प्रदर्शन करने वाला होता है और स्वराशि का शनि व्यक्ति को शत्रुओ पर विजय दिलाने वाला होता है।

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शनि के तीसरे भाव में प्राप्त होने वाले यह फल मेरे अनुभव के आधार पर हैं जिनको कि मैंने आप सभी को समझाने का एक प्रयास किया है उम्मीद करता हूँ आप सभी को शनि के तीसरे भाव में मिलने वाले फल आप सभी को बिना कठिनाई के समझ में आए होंगे।

जय श्री राम।

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दूसरे भाव में शनि का फल

कुंडली का दूसरा भाव वाणी, नेत्र, चेहरा, धन, परिवार/कुटुंब का भाव होता है ऐसी स्थिति में यदि शनि जैसा अलगाववादी ग्रह दूसरे भाव में बैठता है तो यह दर्शाता है कि ऐसे व्यक्ति की वाणी में सत्यता होगी और यदि शनि यदि अग्नि तत्व की राशि में स्थित हो तथा मंगल द्वारा देखा जाता हो तो ऐसी स्थिति में उस व्यक्ति की बोली हुई सत्य बात लोगों को कटु लगती है क्योंकि ऐसे व्यक्ति बोलते समय यह नही सोचते कि मेरे बोले गए वाक्य अर्थात शब्द का दूसरे लोगों पर क्या प्रभाव पड़ेगा, यदि आर्थिक स्थिति के बारे में बात करें तो दूसरे भाव पर बैठा शनि व्यक्ति को खुद की दरिद्रता से लड़ने पर मजबूर कर देता है कहने का आशय यह है कि दूसरा भाव धन का भाव है और दूसरे भाव पर बैठे शनि की दसवीं दृष्टि एकादश भाव पर जाती है जो कि आमदनी का भाव है अर्थात धन के दोनों भाव शनि के प्रभाव में आ जाते हैं और शनि का दूसरा नाम ही मंद है अर्थात ऐसे व्यक्ति जीवन की शुरुवात में कड़ा संघर्ष व उत्तरार्ध में अच्छी उन्नति करते हैं क्योंकि दूसरे भाव में बैठा शनि संकुचित मात्रा में धन देता है कहने का मतलब कि दूसरे भाव में बैठा शनि आपको उतना ही धन देता है जिससे आपका कार्य चलता रहे, दूसरे भाव पर बैठा शनि तकनीकि क्षेत्र से भी आमदनी कराता है।

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यदि परिवार के लिए बात की जाए तो फलदीपिका में लिखा हुआ है कि दूसरे भाव में बैठा शनि बचपन में दुःखी रखता है किंतु आगे का जीवन अच्छा होता है मेरा ऐसा अनुभव है कि यदि दूसरे भाव में शनि हो तो ऐसे व्यक्ति घर से दूर जाकर धनार्जन करते हैं कहने का आशय यह है कि ऐसे व्यक्ति बचपन में कड़ा संघर्ष करते हैं और जन्मस्थान या घर से दूर रहकर धनार्जन करते हैं साथ ही ऐसे व्यक्ति घर के निर्णयों में भाग नही ले पाते हैं कारण शनि दासता देता है साथ ही ऐसे व्यक्ति उस परिवार में रहते हैं जहाँ सदस्य कम हों अर्थात ऐसे व्यक्तियों के परिवार के सदस्यों की संख्या सीमित होती है, यदि दूसरे भाव में शनि पीड़ित अवस्था में हो तो अचानक धन हानि के योग बनते हैं, दूसरे भाव से नेत्रों का भी विचार किया है अतः दूसरे भाव में स्थित शनि नेत्र ज्योति को मंद करता है और यदि यही शनि पीड़ित अवस्था में हो तो नेत्रों की सर्जरी के भी योग बनते हैं।

यदि उच्च राशि का शनि दूसरे भाव में हो जो कि कन्या लग्न की कुंडली में ही संभव है तो ऐसा व्यक्ति आर्थिक स्थिति के मामले में भाग्यशाली होता है तथा बौद्धिक शक्ति द्वारा अच्छा धन अर्जित करता है साथ ही ऋषि कश्यप का मत है कि ऐसा व्यक्ति कुकर्म द्वारा धनार्जन करता है।

यदि उच्च नवांश का शनि दूसरे भाव में तो ऐसा व्यक्ति जोखिम भरे कार्यों से धनार्जन करता है ऋषि कश्यप ने भी यही कहा है कि ऐसा व्यक्ति कष्टपूर्वक कर्मों द्वारा धनार्जन करता है कहने का आशय यह है कि ऐसे व्यक्ति उन कार्यों द्वारा धनार्जन करते हैं जिस कार्य को करने में उनकी दिलचस्पी न हो या जोखिम हो।

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यदि शुभ वर्ग का शनि दूसरे भाव में तो ऐसे व्यक्ति व्यसनों से धन लाभ करते हैं कहने का आशय यह है कि आप कोई ऐसा कार्य करते हैं जिससे दूसरों को उस चीज की आदत लग जाती है, यदि नीच राशि का शनि दूसरे भाव में हो जो कि मीन लग्न की कुंडली में ही संभव है तो ऐसे व्यक्ति धन संचय नही कर पाते हैं ऋषि कश्यप के अनुसार ऐसे व्यक्ति दुःख देकर धनार्जन करते हैं कहने का आशय यह है कि ऐसे व्यक्ति कोई ऐसा कार्य करते हैं जिससे दूसरों को पीड़ा पहुँचे।

यदि नीच नवांश का शनि दूसरे भाव में हो तो ऐसे व्यक्ति निम्न वर्ग से धन की प्राप्ति करते हैं कहने का आशय यह है कि ऐसे व्यक्ति निम्न वर्ग के लोगों जो कि आर्थिक रूप से समृद्ध नही हैं उनके द्वारा या उनसे धनार्जन करते हैं।

यदि पाप वर्ग या शत्रु राशि का शनि दूसरे भाव में हो तो ऐसे व्यक्ति पाप कर्मों द्वारा धनार्जन करते हैं, यदि मित्र राशि का शनि दूसरे भाव में स्थित हो तो ऐसे व्यक्ति अस्थि आदि अर्थात फिजूल के वस्तुओं द्वारा धनार्जन करते हैं कहने का आशय यह है कि ऐसे व्यक्ति ऐसे कार्य (जैसे कबाड़ का काम या ऐसी वस्तु का विक्रय जो उनके काम की न हो किन्तु वही वस्तु दूसरे के काम की हो) कर के धनार्जन करते हैं।

यदि मित्र नवांश का शनि दूसरे भाव में हो तो ऐसे व्यक्ति मिट्टी से जुड़े कार्य उदहारण खेती, खनिज, पेट्रोलियम से जुड़े कार्य के द्वारा धनार्जन करते हैं, यदि वर्गोत्तम स्थिति का शनि दूसरे भाव में स्थित हो तो ऐसे व्यक्ति जलीय पदार्थों द्वारा धनार्जन करते हैं, यदि शत्रु नवांश का शनि दूसरे भाव में हो तो ऐसे व्यक्ति नौकरी से धनार्जन करते हैं।

यदि स्वराशि शनि दूसरे भाव में स्थित हो जो कि धनु लग्न या मकर लग्न की कुंडली में ही संभव है तो ऐसे व्यक्ति ठग कर धनार्जन करते हैं कहने का आशय यह है कि ऐसे व्यक्ति दूसरों को मूर्ख बनाकर धनार्जन करते हैं उदाहरण के तौर पर मार्केटिंग सबसे अच्छा है क्योंकि मार्केटिंग से जुड़ा व्यक्ति अपना कार्य निकालने हेतु हर तरह की विधि अपनाता है व दूसरों को मूर्ख बनाकर धन लाभ करता है।

धनु लग्न की कुंडली में दूसरे भाव में स्थित शनि अपने खुद के प्रयासों से धनार्जन कराता है और यदि मकर लग्न की कुंडली में दूसरे भाव में शनि स्थित है तो ऐसे व्यक्ति अच्छा धनार्जन करने के साथ-साथ अच्छा खर्च भी करते हैं किंतु यहाँ भी उनका धन फिजूल के खर्चों में व्यय नही होता क्योंकि दूसरे भाव में स्थित शनि व्यक्ति को थोड़ा कंजूस बनाता है।

जय श्री राम।

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लग्न में बैठे शनि का फल भाग:-2

पिछले लेख में मैंने लग्न में बैठे शनि के फल पर विस्तार से चर्चा करी थी उसी लेख को आगे बढ़ाते हुए मैं लग्न में बैठे शनि के फल को भाग:-2 में पूरा कर रहा हूँ:-

यदि लग्न में शनि उच्च राशि का हो जो कि तुला लग्न की कुंडली में ही संभव है तो बेहद शुभ होता है तुला लग्न की कुंडली में शनि चतुर्थेश और पंचमेश अर्थात केंद्र व त्रिकोण का स्वामी होकर राजयोगकारक हो जाता है ऐसी स्थिति में व्यक्ति श्याम वर्ण का होता है तथा उसे खुद के घर का सुख अवश्य ही प्राप्त होता है और ऐसे व्यक्तियों की संतान भी अच्छी उन्नति करती है साथ ही संतान की उन्नति में उक्त व्यक्ति का भागीदार भी काफी ज्यादा होता है।

यदि उच्च नवांश का शनि लग्न में हो तो ऐसे व्यक्ति का रंग बदलता रहता है कहने का तात्पर्य यह है कि ऐसा व्यक्ति चेहरे से कुछ और बाकी हिस्सों से कुछ रंग का होगा।

यदि शुभ वर्ग का शनि लग्न में हो तो ऐसे व्यक्ति की अस्थि सन्धियाँ क्षीण होती है अर्थात ऐसे व्यक्तियों को जोड़ों की समस्या रहती है।

यदि पाप वर्ग का शनि लग्न में हो तो ऐसे व्यक्तियों को पित्त रोग होता है कील-मुहांसे काफी होते हैं, यदि नीच राशि का शनि लग्न में हो तो जो कि मेष लग्न की कुंडली में ही सम्भव है तो ऐसे व्यक्ति संघर्ष बहुत करते हैं तथा ऐसे व्यक्ति मेहनती भी होते हैं, ऐसे व्यक्तियों को चक्कर आते हैं साथ ही इन्हें खाँसी की भी शिकायत होती है।

यदि नीच नवांश का शनि लग्न में हो तो ऐसे व्यक्तियों को कफ व वात रोग होता है।

यदि मित्र राशि का शनि लग्न में हो तो व्यक्ति गौरवर्ण का होता है अर्थात ऐसे व्यक्तियों का रंग साफ होता है, यदि मित्र नवांश का शनि लग्न में हो तो ऐसे व्यक्तियों को हड्डियों/अस्थियों में कोई रोग रहता है।

यदि शत्रु राशि का शनि लग्न में हो तो ऐसे व्यक्तियों के नाखून मोटे होते हैं जिसे सामुद्रिक शास्त्र में भी अच्छा नही कहा गया है, यदि शत्रु नवांश का शनि लग्न में हो तो ऐसे व्यक्तियों के दाँत बड़े होते हैं।

यदि वर्गोत्तम शनि लग्न में हो तो व्यक्ति पुष्ट व स्थूल शरीर का होता है।

यदि स्वराशि शनि लग्न में हो तो यह मकर व कुंभ लग्न में ही संभव हो तो ऐसे व्यक्तियों के घुटने लंबे होते हैं, मकर राशि का शनि यदि लग्न में हो तो ऐसे व्यक्ति अपनी सोच पर अडिग रहते हैं इन्हें समझा पाना मुश्किल होता है तथा इनकी आर्थिक स्थिति जीवन के उत्तरार्ध में काफी अच्छी होती है, यदि कुंभ राशि का शनि लग्न में हो तो ऐसे व्यक्ति ज्ञानी होते हैं तथा इनकी आर्थिक स्थिति में उतार-चढ़ाव बना रहता है।

मकर राशि का लग्नस्थ शनि आर्थिक दृष्टिकोण से अच्छा होता है तो कुंभ राशि का लग्नस्थ शनि बौद्धिक दृष्टिकोण से अच्छा होता है, स्वराशि का लग्नस्थ शनि व्यक्तियों को बचपन में व्यथित तो जीवन के उत्तरार्ध में अच्छी स्थिति में पहुँचाता है।

जय श्री राम।

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खाटूश्याम मंदिर की स्थापना कब और कहाँ हुई:—-Astrology Sutras

खाटूश्याम मंदिर की स्थापना कब और कहाँ हुई:—-Astrology Sutras

 

 

माहाभारत ग्रंथ के अनुसार बर्बरीक जो कि अतिबलशाली भीम के पौत्र व घटोत्कच और मोरवी के पुत्र थे, बचपन से ही उनमें एक विलक्षण शक्ति थी तथा इन्होंने युद्ध कला अपनी माता तथा श्री कृष्ण से सीखा था, बर्बरीक ने माता की आज्ञा अनुसार नव दुर्गा की घोर तपस्या की व उनको प्रसन्न कर तीन अमोघ बाण प्राप्त किए जो कि कभी विफल नही हो सकते थे इस प्रकार बर्बरीक “तीन बाणधारी” के नाम से प्रसिद्ध हुए।

 

महाभारत युद्ध के समय बर्बरीक की भी युद्ध में सम्मिलित होने की प्रवल इच्छा जागृत हुई व उन्होंने अपनी माता को वचन दिया कि जो भी पक्ष निर्बल होगा मैं उसकी तरफ से युद्ध करूँगा और नीले घोड़े पर सवार होकर कुरुक्षेत्र की रणभूमि की तरफ चल दिए उस समय श्री कृष्ण ध्यान में लीन थे और उन्होंने अपने योग विद्या से जब यह देखा तो ब्राह्मण रूप धारण कर के बर्बरीक के समक्ष पहुँच कर उन्हें रोक कर उनसे कुरुक्षेत्र की रणभूमि की तरफ जाने का कारण पूछा व बर्बरीक द्वारा यह बताए जाने पर कि वह युद्ध में भाग लेने जा रहे हैं उनकी हँसी उड़ाई और कहा कि केवल यह तीन बाण के साथ आप युद्ध कैसे कर सकेंगे इस पर बर्बरीक ने उत्तर दिया कि उनका एक बाण ही समस्त शत्रुओं का नाश करने के लिए काफी है और शत्रुओं का दमन करने के बाद उनका बाण वापस उनके तुणीर में आ जाएगा और यदि वह इन तीनों बाणों का एक साथ संघान किया तो तीनों बाणों की विध्वंसक शक्ति से समस्त ब्रह्मांड की नाश हो जाएगा, यह जानकर श्री कृष्ण जी ने उन्हें चुनौती दी कि इस पीपल वृक्ष के सभी सूखे पत्तों को भेद कर दिखाओ किंतु वही पत्ते भेदना है जो सूखे हों या उनमें छिद्र हो बर्बरीक ने श्री कृष्ण की चुनौती को स्वीकार किया और अपने एक ही बाण से उस पीपल वृक्ष के सभी सूखे व छिद्रित पत्तों को भेद दिया तत्पश्चात वह बाण श्री कृष्ण के चरणों के पास जाकर रुक गया तब बर्बरीक ने श्री कृष्ण जी से निवेदन किया कि एक पत्ता आपके पैर के नीचे बचा हुआ है अतः आप अपना पैर हटा लें अन्यथा यह बाण आपके पैर पर घात कर देगा क्योंकि दुर्गा जी से प्राप्त बरदान के अनुसार उनका कोई बाण लक्ष्य भेदे बिना वापस नही आता तब भी श्री कृष्ण जी के पैर न हटाने पर माँ दुर्गा प्रकट हुई व श्री कृष्ण जी से प्राथना की कि उनके वरदान की लाज रखने हेतु अपना पैर हटा लें तब श्री कृष्ण जी ने अपना पैर जैसे ही हटाया उस बाण ने उस बचे हुए पत्ते को भी भेद दिया तत्पश्चात श्री कृष्ण जी ने दुर्गा जी को यह वचन दिया कि उनके पैर का निचला हिस्सा आज से उनके शरीर का सबसे कमजोर भाग होगा तथा यही भाग उनके इस शरीर को त्याग कर परमधाम लौटने का कारण बनेगा।

 

 

 

श्री कृष्ण जी इस बात को भली-भांति जानते थे इस महायुद्ध में कौरवों की हार निश्चित है और यदि बर्बरीक को न रोका गया तो यह युद्ध अधर्म के विजय का कारण बन सकता है अतः ब्राह्मण रूपी श्रीं कृष्ण जी ने बर्बरीक से दान माँगने की इच्छा रखी तो बर्बरीक ने उन्हें दान देने का वचन देते हुए दान माँगने को कहा तब श्री कृष्ण जी ने दान रूप में बर्बरीक से उनका शीश माँगा इस पर बर्बरीक चिंतन में पड़ गए और श्री कृष्ण जी के उनकी चिंता का कारण पूछने पर उन्होंने श्री कृष्ण जी से कहा कि मेरी इस युद्ध के साक्षी बनने की प्रवल इच्छा थी इस पर श्री कृष्ण जी ब्राह्मण रूप को त्याग कर अपने वास्तविक रूप में आ गए और बर्बरीक को समझाते हुए कहा कि इस महायुद्ध में धर्म के विजय हेतु तुम्हारे शीश का दान अनिर्वाय है तथा श्री कृष्ण जी ने बर्बरीक को आशीर्वाद दिया कि उनका यह दान अनंत काल तक याद रखा जाएगा तथा उनकी इस महायुद्ध को देखने की इच्छा भी जरूर पूरी होगी इस आशीर्वाद को प्राप्त कर बर्बरीक अत्यंत प्रसन्न हुए व अपना शीश श्री कृष्ण के चरणों में अर्पित कर दिया तत्पश्चात श्री कृष्ण जी ने उनके शीश को युद्धभूमि के समीप एक पर्वत पर स्थापित कर दिया जहाँ से बर्बरीक इस महाभारत युद्ध के प्रत्यक्ष साक्षी बनें।

 

महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद पांडवों में अहंकार की उत्पत्ति देखकर श्री कृष्ण जी मुस्कुराए और पांडवों को उस पर्वत पर ले गए जहाँ “महादानी” बर्बरीक का शीश स्थित था व उन्होंने बर्बरीक से निवेदन किया कि वह ही निर्णय लें कि पाँचों पांडव में से इस युद्ध के विजय का श्रेय किसको देना चाहिए इस पर बर्बरीक खूब हँसे और बोले कि कौन पांडव मैंने तो कुरुक्षेत्र में केवल श्री कृष्ण जी और उनके सुदर्शन चक्र को ही देखा श्री कृष्ण जी ने अकेले ही समस्त अधर्मियों का अंत किया अतः इस युद्ध में विजय श्री कृष्ण की ही हुई है इस बात से श्री कृष्ण जी प्रसन्न होकर बर्बरीक को आशीर्वाद देते हैं कि आज से तुम “श्याम” नाम से जाने जाओगे क्योंकि जो हारे का सहारा हो वही “श्याम” है अतः कलयुग में सभी लोग तुम्हारी मेरे नाम “श्याम” से पूजा करेंगे व जो भक्त तुम्हारी पूजा करेगा उसके सारे कष्ट दूर होंगे व उन्हें हर कार्य में सफलता प्राप्त होगी।

 

 

 

 

बर्बरीक के खाटूश्याम नाम का रहस्य:-

 

बर्बरीक का शीश श्री कृष्ण जी द्वारा  “खाटू नगर” के पर्वत पर स्थित किया गया था जिस कारण से उन्हें खाटूश्याम के नाम से भी जाना जाता है।

 

क्यों की जाती है खाटूश्याम की पूजा:-

 

स्कंद पुराण के अनुसार:-

 

तत्सतथेती तं प्राह केशवो देवसंसदि।

शिरस्ते पूजयिषयन्ति देव्या: पूज्यो भविष्यसि।।

(स्कंद पुराण, कौ. ख. ६६.६५)

 

भावार्थ:- हे वीर! ठीक है तुम्हारे शीश की पूजा होगी और तुम देवरूप में पूजित होकर प्रिसिद्धि को प्राप्त करोगे।

 

खाटूश्याम जी का यह मंदिर राजस्थान राज्य के सीकर जिले में स्थित है तथा इनके प्रमुख देवता श्री कृष्ण जी और प्रमुख उत्सव फाल्गुन महोत्सव है इनके अन्य नाम खाटू नरेश, मोर्विनंदन व मोरछड़ी धारक है, मोर पंखों से बनी छड़ी को हमेशा अपने पास रखने के कारण से इनका नाम मोरछड़ी कहलाया।

 

जय श्री राम।

Astrologer:- Pooshark Jetly

Astrology Sutras (Astro Walk Of Hope)

Mobile:- 9919367470

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संतान भाव में नपुंसक ग्रह शनि भाग २

संतान भाव में नपुंसक ग्रह शनि भाग २

 

पंचम भाव में स्थित शनि का फल
पंचम भाव में स्थित शनि का फल

 

भाग १ पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएं

संतान भाव में नपुंसक ग्रह शनि भाग १

 

 

यदि पंचम भाव में उच्च राशि का शनि स्थित हो जो कि मिथुन लग्न की कुंडली में ही संभव है तो ऐसे व्यक्ति की संतान ईर्ष्यालु होती है अर्थात दूसरों से वैर करने वाली होती है साथ ही ऐसे व्यक्तियों की कुंडली में उच्च शिक्षा प्राप्ति के योग होते हैं व आय की शुरुवात करने के लिए अर्थात नौकरी पाने हेतु कुछ संघर्ष करना पड़ता है, यदि उच्च नवांश का शनि पंचम भाव में हो तो ऐसे व्यक्तियों की संतान अधिकतर बीमार रहती है।

 

यदि पंचम भाव में शुभ वर्ग का शनि स्थित हो तो ऐसे व्यक्तियों की संतान कृतघ्न होती है कहने का आशय यह है कि ऐसे व्यक्ति अपने संतान के लिए सब कुछ त्याग कर देते हैं अर्थात सब चीजों का बलिदान कर देते हैं किंतु उनको संतान से वो सम्मान नही मिल पाता है, यदि पाप वर्ग का शनि पंचम भाव में हो तो ऐसे व्यक्तियों की संतान अकसर किसी न किसी रोग से पीड़ित रहती है।

 

पंचम भाव में स्थित शनि
पंचम भाव में स्थित शनि

 

यदि नीच राशि का शनि पंचम भाव में हो जो कि धनु लग्न की कुंडली में ही संभव है तो ऐसे व्यक्ति अपनी बौद्धिक क्षमता से अच्छा धनार्जन करते है साथ ही एक बार जीवन में धन वृद्धि हेतु कड़ा संघर्ष करते हैं तथा ऐसे व्यक्ति कहानियाँ बहुत बनाते हैं अर्थात बातें बनाना व बातों को दूसरों के समक्ष कुछ इस प्रकार रखते है कि वह एक कहानी की तरह होती है इसके अतिरिक्त पंचम भाव में नीच राशि का शनि संतान सुख में कमी का भी सूचक होता है, यदि नीच नवांश का शनि पंचम भाव में हो तो ऐसे व्यक्तियों की संतान जल्द ही प्रौढ़ हो जाती है कहने का आशय यह है कि ऐसे व्यक्तियों की संतान जल्द ही गंभीर स्वभाव की हो जाती है और उन पर कम उम्र में ही जिम्मेदारियां आ जाती है।

 

भाग १ पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएं

संतान भाव में नपुंसक ग्रह शनि भाग १

 

 

यदि मित्र राशि का शनि पंचम भाव में हो तो ऐसे व्यक्तियों की संतान मेहनती होती है तथा अपने बाहुबल से उन्नति को प्राप्त करती है, यदि मित्र नवांश का शनि पंचम भाव में हो तो ऐसे व्यक्तियों की संतान पशु पालने की शौंकीन होती है अर्थात ऐसे व्यक्तियों की संतान को पालतू पशु से अत्यधिक प्रेम रहता है।

 

यदि वर्गोत्तम स्थिति का शनि पंचम भाव में हो तो ऐसे व्यक्तियों को संतान सुख अवश्य ही प्राप्त होता है किंतु पौत्र प्राप्ति में बाधा आती है।

 

यदि शत्रु राशि का शनि पंचम भाव में हो तो ऐसे व्यक्तियों के कम पुत्र होते हैं या पुत्र सुख में कमी होती है इस स्थिति में अधिकतर ऐसे व्यक्तियों को कन्या संतति की प्राप्ति होती है।

 

यदि स्वराशि शनि पंचम भाव में स्थित हो जो कि कन्या व तुला लग्न की कुंडली में ही संभव है यदि कन्या लग्न की कुंडली में पंचम भाव में शनि स्थित हो तो ऐसे व्यक्तियों की शिक्षा के समय कोई न कोई संघर्ष अवश्य रहता है जो कि समय के साथ कम होता जाता है साथ ही ऐसे व्यक्तियों को प्रतियोगी परीक्षाओं से लाभ मिलता है व उन परीक्षाओं को निकालकर जीवन में सफल होते हैं, यदि तुला लग्न की कुंडली में शनि पंचम भाव में स्थित हो तो ऐसे व्यक्तियों की बौद्धिक क्षमता बहुत अच्छी होती है किंतु इनका मन स्थिर नही रहता साथ ही इन्हें नींद की भी किसी न किसी प्रकार की समस्या रहती है अतः इन्हें योग व ध्यान अवश्य करना चाहिए व पूरी नींद लेनी चाहिए साथ ही ऋषि कश्यप का मत है कि ऐसे व्यक्तियों को पुत्र अवश्य ही प्राप्त होते हैं या ऐसे व्यक्तियों को ऐसी संतान प्राप्त होती है जो अपनी जिम्मेदारियों को अच्छे से समझ कर उनका निर्वहन करती है।

भाग १ पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएं

संतान भाव में नपुंसक ग्रह शनि भाग १

 

 

जय श्री राम।

Astrologer:- Pooshark Jetly

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कन्या लग्न
कन्या लग्न कुंडली

 

कन्या लग्नकन्या राशि वालों के लिए मई 2020 अच्छा रहेगा माह की शुरुवात में सूर्यबुध का गोचर अष्टम भाव से रहेगा सूर्य का अष्टम भाव से उच्च राशि का गोचर विपरीत राजयोग बनाएगा जिस कारण से अचानक कोई सफलता प्राप्त होने के योग बनेंगे, व्यर्थ की यात्राओं को टालने का प्रयास करें, जीवनसाथी के स्वास्थ्य में परेशानी संभव रहेगी अतः उनके स्वास्थ्य का ख्याल रखें, अष्टम भाव जीवनसाथी के वाणी का भी भाव है अतः उनके वाणी में कुछ तेजी रहेगी साथ ही अष्टम भाव आपके ससुराल अर्थात जीवनसाथी के परिवार को दर्शाता है जहाँ से सूर्य का गोचर उनसे विवाद करा सकता है अतः तनाव लेने से बचें, माह के शुरुवात में बुध का भी अष्टम भाव से गोचर रहेगा जिस कारण से आपके स्वास्थ्य में परेशानी व तनाव बना रह सकता है 9 मई को बुध गोचर बदलकर आपके भाग्य स्थान में आ जाएंगे फलस्वरूप मान-प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी, भाग्य का सहयोग मिलेगा, धार्मिक कार्यों में रुचि बढ़ेगी 14 मई को सूर्य भी गोचर बदलकर आपके नवम भाव अर्थात भाग्य स्थान में आ जाएंगे फलस्वरूप धार्मिक कार्यों में धन व्यय होगा, धार्मिक यात्रा के योग बनेंगे, पिता के स्वास्थ्य का ख्याल रखें, छोटे भाई-बहन की उन्नति होगी 24 मई को बुध पुनः गोचर बदलकर आपके दशम भाव में आ जाएंगे फलस्वरूप उन्नति के नए मार्ग खुलेंगे, माता का सहयोग प्राप्त होगा, जिनका कार्य बैंक, फाइनेंस, टीचिंग से जुड़ा हुआ है उनके लिए बुध का यह गोचर बेहद शुभ रहेगा, मान-प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी।

 

कन्या राशिफल
कन्या राशिफल

 

माह के शुरुवात में शुक्र का भाग्य स्थान से गोचर रहेगा जो कि आपके लिए बेहद शुभ रहेगा अतः भाग्य की वृद्धि होगी, किसी महिला से धन लाभ होगा या किसी महिला के सहयोग से उन्नति के नए मार्ग खुलेंगे, आपके जीवनसाथी के यदि छोटे भाई-बहन हैं तो उनकी उन्नति होगी किन्तु उनके स्वास्थ्य में भी कुछ समस्या रह सकती है, कुटुंब का सहयोग प्राप्त होगा, आय में वृद्धि होगी, माह के शुरुवात में गुरु, मंगलशनि का पंचम भाव से गोचर रहेगा फलस्वरूप जो लोग विवाह योग्य हो गए हैं उनके विवाह के लिए कहीं बात चल सकती है, तकनीकी क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए भी यह समय काफी अच्छा रहेगा, संतान का सहयोग प्राप्त होगा व उनकी उन्नति होगी, जिनका विवाह हो गया है व संतान की चाह रखते हैं उनके लिए संतान प्राप्ति के योग बनेंगे 4 मई को मंगल गोचर बदलकर छठे भाव में आ जाएंगे अष्टम भाव के स्वामी का छठे भाव से गोचर स्वास्थ्य के लिहाज से बहुत अच्छा नही कहा जा सकता अतः अपने स्वास्थ्य का ख्याल रखें, जिन्हें रक्त जनित कोई समस्या हो तथा जिनकी उम्र 55-60 के ऊपर हो वह अपने स्वास्थ्य का विशेष ख्याल रखें, विपरीत परिस्थितियों से होते हुए अचानक बड़ी सफलता प्राप्त होगी, शत्रुओं पर विजय प्राप्त होगी, सरकारी कर्मचारियों से फालतू विवाद में न पड़ें, 14 मई से 17 जून तक वाहन सावधानी से चलाएं।

 

कन्या राशिफल
कन्या राशि

 

कुल मिलाकर कन्या लग्नकन्या राशि वालों के लिए मई 2020 अच्छा रहेगा जिसमें उन्नति के नए मार्ग खुलेंगे, यदि आप विवाह योग्य हो गए हैं तो विवाह के योग बनेंगे, तनाव लेने से बचें व व्यर्थ की यात्राओं को टालने का प्रयास करें, मान-प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी, किसी महिला से धन लाभ या महिला के सहयोग से उन्नति के नए मार्ग खुलेंगे, संतान की उन्नति होगी व संतान का सहयोग भी प्राप्त होगा, यदि आपका विवाह हो गया है व संतान की चाह रखते हैं तो संतान प्राप्ति के योग बनेंगे, वाहन सावधानी से चलाएं, जिनकी उम्र 55-60 के अधिक है और रक्त से जुड़ी समस्या है वह अपने स्वास्थ्य का विशेष ख्याल रखें, धार्मिक कार्यों में धन व्यय होगा, भाग्य का सहयोग प्राप्त होगा, फालतू विवाद में न पड़ें, माह की 2, 3, 11, 13, 14, 15, 21, 22, 23 व 28 तिथियों पर विशेष सावधानी बरतें, मेरे अनुसार यदि कन्या लग्नकन्या राशि वाले व्यक्ति यदि नित्य सुंदरकांड का पाठ करें व नित्य सूर्य को जल देकर आदित्य हिर्दय स्तोत्र का पाठ करें तो लाभ होगा।

 

जय श्री राम।

Astrologer:- Pooshark Jetly

Astrology Sutras (Astro Walk Of Hope)

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चतुर्थ भाव में स्थित शनि का फल भाग १

चतुर्थ भाव में स्थित शनि का फल भाग १

 

चतुर्थ भाव में स्थित शनि का फल
चतुर्थ भाव में स्थित शनि का फल

 

कुंडली का चतुर्थ भाव सुख, माता, वाहन, भूमि, मानसिक स्थिति, घर के वातावरण, छाती, प्रारंभिक शिक्षा को दर्शाता है जहाँ बैठा शनि इन सभी को प्रभावित करता है क्योंकि शनि विरक्ति का कारक है चतुर्थ भाव में बैठा शनि व्यक्ति को बचपन में रोग-पीड़ा देने वाला कहा गया है ऐसे व्यक्तियों के बचपन में छाती में दर्द की शिकायत रहती है साथ ही चतुर्थ भाव में स्थित शनि बचपन में सीमित संसाधन देता है जो कि समय व परिश्रम के साथ-साथ बढ़ते जाते हैं, चतुर्थ भाव में स्थित शनि घर से दूर ले जाकर अच्छी उन्नति दिलवाता है ऐसे व्यक्तियों की कुंडली में यदि विदेश यात्रा के योग हैं तो वह और भी प्रवल हो जाता है, बहुत से ग्रंथकारों का मत है कि यदि शनि चतुर्थ भाव में हो तो ऐसे व्यक्तियों को भूमि सुख नही मिल पाता किन्तु मेरा ऐसा मत व अनुभव है कि यदि शनि चतुर्थ भाव में अपनी उच्च राशि, स्वराशि व मूलत्रिकोण राशि अर्थात तुला, मकर व कुंभ राशि में स्थित हो तो ऐसे व्यक्तियों को भूमि सुख अवश्य ही प्राप्त होता है, चतुर्थ भाव में स्थित शनि व्यक्ति का झुकाव आध्यात्म की ओर बढ़ाता है अर्थात ऐसे व्यक्तियों की कुंडली में प्रवज्या योग जिसे सन्यास योग भी कहा जाता है उसकी संभावना अधिक हो जाती है कहने का आशय यह है कि यदि शनि चतुर्थ भाव में स्थित हो तो ऐसा व्यक्ति धर्म-कर्म में अधिक रुचि रखता है, चतुर्थ भाव से घर के वातावरण का भी विचार किया जाता है जहाँ स्थित शनि अकसर घर के माहौल को गरम रखता है कहने का आशय यह है कि यदि चतुर्थ भाव में शनि स्थित हो तो ऐसे व्यक्तियों को मानसिक शांति जल्दी या ज्यादा समय तक अनुभव नही होती ऐसे व्यक्तियों के घर में कलह होते रहते हैं या अन्य किसी कारण से मन दुःखी रहता है।

 

चतुर्थ भाव में शनि
चतुर्थ भाव में शनि

 

चतुर्थ भाव वाहन सुख को भी दर्शाता है जहाँ स्थित शनि वाहन सुख प्रदान करता है किंतु ऐसे व्यक्तियों के वाहन में कोई न कोई समस्या अकसर बनी ही रहती है चाहे वो स्क्रैच की हो या अन्य कोई खराबी की हो, चतुर्थ भाव में स्थित शनि माता के स्वास्थ्य में भी परेशानी देता रहता है ऐसे व्यक्तियों की माता थोड़ी जिद्दी स्वभाव की होती हैं व उनके पैरों, कमर व जोड़ों में दर्द की शिकायत प्रायः देखी जा सकती है, चतुर्थ भाव व्यक्ति के प्रारंभिक शिक्षा को भी दर्शाता है अतः चतुर्थ भाव में बैठा शनि ऐसे व्यक्तियों की प्रारंभिक शिक्षा को भी प्रभावित करता है ऐसे व्यक्तियों की या तो शिक्षा कुछ विलंब से शुरू होती है या फिर ऐसे व्यक्ति अपनी योग्यता के अनुसार परीक्षा में अंक नही प्राप्त कर पाते हैं ऐसे व्यक्तियों को अपने टैलेंट को दिखाने के लिए प्रेरित करना पड़ता है तथा इनका टैलेंट लोगों के सामने आने में समय लगता है क्योंकि ऐसे व्यक्ति खुद के टैलेंट को ही जल्दी नही पहचान पाते हैं, यदि चतुर्थ भाव में शनि स्थित हो तो ऐसे व्यक्तियों को वात व पित्त रोग होने की संभावना बढ़ जाती है, इसके अतिरिक्त यदि शनि चतुर्थ भाव में हो तो भृगु सूत्र के अनुसार ऐसे व्यक्तियों की माता को काफी कष्ट रहता है साथ ही ऐसे व्यक्तियों की कुंडली में दो माता के योग बनते हैं किंतु इसके लिए अन्य ग्रहों की स्थिति पर भी ध्यान देना आवश्यक होता है।

 

 

चतुर्थ भाव में बैठे शनि की तीसरी दृष्टि छठे भाव पर पड़ती है जो यह दर्शाता है कि ऐसे व्यक्ति शत्रुओं पर विजय प्राप्त करते हैं अर्थात शत्रु इनको कोई हानि नही पहुँचा पाते हैं इसके अतिरिक्त ऐसे व्यक्ति प्रतियोगी परीक्षाओं में भी सफल होते हैं, चतुर्थ भाव में बैठे शनि की सातवीं दृष्टि दशम भाव अर्थात कर्म स्थान पर पड़ती है जो यह दर्शाता है कि ऐसे व्यक्तियों को जीवन में बड़ी सफलता प्राप्त करने हेतु कड़ा संघर्ष करना पड़ता है अर्थात ऐसे व्यक्तियों को कड़े परिश्रम से भी बड़ी सफलता व उन्नति प्राप्त होती है, मेरा ऐसा मत व अनुभव है कि यदि चतुर्थ भाव में शनि स्थित हो तो ऐसे व्यक्ति जीवनकाल में एक बार बहुत ऊँचे शिखर पर अवश्य ही पहुँचते हैं, इसके अतिरिक्त चतुर्थ भाव में स्थित शनि की दसवीं दृष्टि लग्न पर पड़ती है जो कि यह दर्शाता है कि ऐसे व्यक्तियों के चेहरे पर किसी प्रकार का कोई निशान (चाहे वह तिल का हो या मस्से का या किसी चोट का या अन्य किसी प्रकार का) रहता है अब यहाँ ध्यान से देखने वाली बात यह है कि चतुर्थ भाव में स्थित शनि कुंडली के छठे भाव जो कि रोग व पीड़ा का भाव है और लग्न जो कि आपका शरीर है दोनों को देखता है साथ ही चतुर्थ भाव में स्थित होने से मानसिक शांति भंग होने के भी योग बना रहा होता है अतः ऐसे व्यक्तियों को कोई ऐसा रोग रहता है जो कि लंबे समय तक चलता है अर्थात ऐसे व्यक्तियों की कुंडली में लंबे समय तक दवाईयाँ खाने के योग बनते हैं।

 

अब जानते हैं कि विभिन्न स्थितियों में चतुर्थ भाव में स्थित शनि किस प्रकार के फल देंगे:-…….

 

पोस्ट की लंबाई को ध्यान में रखते हुए इसका दूसरा भाग जल्द ही प्रकाशित करूँगा।

 

जय श्री राम।

Astrologer:- Pooshark Jetly

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