Loading...
Categories
Astrology Sutras/Logics

शादी से पहले कुंडली में ‘नाड़ी दोष’ क्यों है खतरनाक? (जानें मृत्यु योग का सच और अचूक परिहार)

नाड़ी दोष व उसका परिहार

नाड़ी दोष:-

कुंडली मिलान की प्रकिया में अष्ट कूट का मिलान किया है वह अष्ट कूट क्रमशः वर्ण, वश्य, तारा, योनी, ग्रह मैत्री, गण, भकूट और नाड़ी होते हैं इन अष्ट कूटों में प्रत्येक का अपना-अपना महत्व होता है, इस लेख में मैं नाड़ी पर चर्चा करता हूँ क्योंकि यह एक ऐसा विषय है जिसको अधिकतर लोग नजरअंदाज कर देते हैं जब कि नाड़ी न मिलने पर दामपत्य जीवन में अनेक प्रकार के दुष्प्रभाव देखने को मिलते हैं।

ज्योतिष ग्रंथों में नाड़ी तीन प्रकार की बताई गई है जो कि क्रमशः आदि नाड़ी, मध्य नाड़ी और अंत्य नाड़ी के नाम से जानी जाती है अब प्रश्न यह उठता है कि यह कैसे ज्ञात किया जाए कि किस व्यक्ति का जन्म किस नाड़ी में हुआ है अतः इस पर मैं विस्तार से वर्णन करता हूँ।

हमारे ज्योतिष शास्त्र में कुल 27 नक्षत्र होते हैं और प्रत्येक नाड़ी में 9 नक्षत्र आते हैं जिसका निर्धारण व्यक्ति के जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में स्थित हो उसके आधार पर किया जाता है जिन्हें मैं विस्तार से लिख रहा हूँ।

🚩 सनातन धर्म का अद्भुत रहस्य:

👉 यहाँ पढ़ें: नवरात्रि 9 दिन की ही क्यों होती है?

नाड़ियों में आने वाले नक्षत्र:-

नाड़ियों में 27 नक्षत्रों का विभाजन (आदि, मध्य, अंत्य) - Nakshatra in Nadi Astrology
आदि, मध्य और अंत्य नाड़ी में 27 नक्षत्रों का शास्त्र-सम्मत विभाजन।

१. आदि नाड़ी:-

अश्विनी, आद्रा, पुनर्वसु, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, ज्येष्ठा, मूल, शतभिषा और पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र में जन्म लेने पर आदि नाड़ी प्राप्त होती है।

२. मध्य नाड़ी:-

भरणी, मृगशिरा, पुष्य, पूर्वाफाल्गुनी, चित्रा, अनुराधा, पूर्वाषाढ़ा, घनिष्ठा और उत्तराभाद्रपद नक्षत्र में जन्म लेने पर मध्य नाड़ी प्राप्त होती है।

३. अंत्य नाड़ी:-

कृतिका, रोहिणी, श्लेषा, मघा, स्वाती, विशाखा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण और रेवती नक्षत्र में जन्म लेने पर अंत्य नाड़ी प्राप्त होती है।

नाड़ी दोष के परिहार:-

उक्त नाड़ी विचार में आदि व अंत्य नाड़ी में से कोई एक नाड़ी ही दोनों की हो तो कुछ विद्वानों का मत है कि रज्जूकूट अनुकूल हो, राशिकूट शुभ हो, दोनों का राशि स्वामी एक हो या दोनों राशियों में मैत्री हो तो नाड़ी दोष विशेष अनिष्टकारक नही होता है।

विशेष:-

मध्य नाड़ी एक हो तो पुरुष की मृत्यु तथा आदि अंत्य में स्त्री की मृत्यु होती है।

✨ कुंडली का एक और भयानक दोष:

👉 यहाँ पढ़ें: मंगल दोष के लक्षण और अचूक उपाय

नक्षत्रानुसार नाड़ी दोष परिहार:-

नक्षत्रानुसार नाड़ी दोष परिहार और अचूक उपाय - Nadi Dosh Cancellation Rules
विशिष्ट नक्षत्रों के संयोग से नाड़ी दोष का कट जाना (दोष परिहार)।
  • विशाखा, अनुराधा, घनिष्ठा, रेवती, हस्त, स्वाती, आद्रा, पूर्वाभाद्रपद इन 8 नक्षत्रों में से किसी भी नक्षत्र में वर, कन्या या दोनों में से एक का ही जन्म हो तो विवाह शुभ होता है अर्थात नाड़ी दोष का परिहार हो जाता है।
  • उत्तराभाद्रपद, रेवती, रोहिणी, विशाखा, आद्रा, श्रवण, पुष्य और मघा इन 8 नक्षत्रों में भी वर व कन्या का जन्म नक्षत्र पड़े तो नाड़ी दोष शांत हो जाता है, भरणी, मृगशिरा, शतभिषा, हस्त, पूर्वाषाढ़ा व श्लेषा इन नक्षत्रों में भी नाड़ी दोष नही रहता है।
  • वर व कन्या की एक राशि हो लेकिन जन्म नक्षत्र अलग हो या जन्म नक्षत्र एक हों व राशियां भिन्न-भिन्न हो तो नाड़ी दोष नही होता है, एक नक्षत्र में भी चरण भेद होने पर अत्यावश्यकता में विवाह किया जा सकता है।
  • कृतिका, रोहिणी, घनिष्ठा, शतभिषा, पुष्य, श्लेषा ये नक्षत्र एक ही राशि में पड़ते हैं, तब भी इन जोड़े नक्षत्रों में यदि वर व कन्या के नक्षत्र हो तो इन्हें छोड़ना चाहिए।
  • रोहिणी, आद्रा, मघा, विशाखा, पुष्य, श्रवण, रेवती, उत्तराभाद्रपद में से किसी एक नक्षत्र में ही दोनो का जन्म हो तब भी नाड़ी दोष नही रहता, नक्षत्र चरण भेद आवश्यक है।
नक्षत्रेक्ये पादभेदे शुभम् स्यात।।
पराशरः प्राह नवांशभेदादेकर्क्षराश्योरपि सौमनस्यम्।।
एकक्षै चैकपादे च विवाह: प्राणहानिद:।।
दम्पत्योरेकपादे तु वर्षान्ते मरणं ध्रुवम्।।

अर्थात:-

चरण व नक्षत्र दोनों एक होने का फल मृत्यु है, नाड़ी कूट सर्व शिरोमणि प्रधान है, इसके गुण 8 माने जाते हैं।

🌟 World’s No. 1 Astrology Channel

फ्री ज्योतिष ज्ञान और कुंडली समाधान!

क्या आप अपनी कुंडली के दोष और उनके अचूक उपाय जानना चाहते हैं? Astrology Sutras के VIP WhatsApp ग्रुप से अभी जुड़ें!

👉 अभी WhatsApp Channel से जुड़ें (Free)


📌 FAQ: नाड़ी दोष से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: नाड़ी कितने प्रकार की होती है?

उत्तर: ज्योतिष शास्त्र के अनुसार नाड़ी तीन प्रकार की होती है— आदि नाड़ी, मध्य नाड़ी और अंत्य नाड़ी।

प्रश्न 2: नाड़ी दोष कब लगता है?

उत्तर: विवाह के समय कुंडली मिलान (अष्टकूट मिलान) में जब वर और कन्या दोनों की नाड़ी एक ही (समान) होती है, तब नाड़ी दोष लगता है।

प्रश्न 3: क्या एक नाड़ी होने पर विवाह किया जा सकता है?

उत्तर: यदि वर व कन्या की राशि एक हो लेकिन जन्म नक्षत्र अलग हो, या जन्म नक्षत्र एक हों व राशियां भिन्न-भिन्न हों, या नक्षत्र चरण में भेद हो, तो नाड़ी दोष का परिहार हो जाता है और विवाह संभव है।

Categories
Astrology Sutras/Logics Recent Post

ग्रहों के कारकतत्व भाग १

ग्रहों के कारकतत्व भाग १

 

ग्रहों के कारकतत्व
ग्रहों के कारकतत्व

 

सूर्य:-

 

तांबा, सोना, पिता, धैर्य, शौर्य, आत्मा, प्रकाश, जंगल, मंदिर, हवन, उत्साह, शक्ति, पहाड़ में यात्रा, भगवान शिव से संबंधित कार्यों का कारक होता है।

 

चंद्र:-

 

अन्न, खेती, जल, गाय, माता का कुशल, फल, पुष्प, मोती, चांदी, वस्त्र, सफेद वस्तु, मुलायम वस्तु, यश, काँसा, दूध, दहीं, स्त्री प्राप्ति, सुखपूर्वक भोजन, रूप (सुंदरता) का कारक होता है।

 

मंगल:-

 

शारीरिक और मानसिक ताकत, पृथ्वी से उत्पन्न होने वाले पदार्थ, भाई-बहन के गुण, रण, साहस, रसोई की अग्नि, सोना, अस्त्र, चोर, शत्रु, उत्साह, दूसरे पुरुष की स्त्री में रति, मिथ्या भाषण, वीर्य (ताकत, पराक्रम), चित का उत्साह, उदारता, बहादुरी, चोट, सेनाधिपत्य का कारक होता है।

 

बुध:-

 

पांडित्य, बोलने की शक्ति, कला, निपुणता, विद्वानों द्वारा स्तुति, मामा, विद्या में बुद्धि का योग, यज्ञ, भगवान विष्णु से संबंधित धार्मिक कार्य, शिल्प, बन्धु, युवराज, मित्र, भांजा, भांजी, चतुरता आदि का कारक होता है।

 

गुरु:-

 

ज्ञान, अच्छे गुण, पुत्र, मंत्री, आचरण, चरित्र, आचार्यत्व (पढ़ाना या दीक्षा लेना), वेद शास्त्र, सदगति, देवताओं और ब्राह्मणों की भक्ति, यज्ञ, तपस्या, श्रद्धा, खजाना, विद्वता, सम्मान, दया, यदि किसी स्त्री की कुंडली हो तो उसके पति का विचार आदि का कारक गुरु होता है।

 

शुक्र:-

 

संपत्ति, सवारी, वस्त्र, भूषण, नाचने, गाने तथा बाजे के योग, सुगंधित पुष्प, रति (स्त्री-पुरुष प्रसंग), शैया (पलंग) और उससे संबंधित व्यापार, मकान, वैभव, विलास, विवाह या अन्य शुभ कर्म, उत्सव, यदि किसी पुरुष की कुंडली हो तो उसकी पत्नी का विचार आदि शुक्र के कारक होते हैं।

 

विशेष:-  वृहस्पति अर्थात गुरु पति का कारक और शुक्र पत्नी का कारक होता है, शुक्र स्त्री का कारक होने के नाते यह भी देखा जा सकता है कि उक्त जातक का स्त्रियों के साथ कैसे संबंध रहेगा।

 

शनि:-

 

आयु, मरण, भय, अपमान, पतन, बीमारी, दुख, दरिद्रता, बदनामी, पाप, मजदूरी, अपवित्रता, निंदा, मन का साफ न होना, मारने का सूतक, स्थिरता, भैस, आलस्य, कर्जा, लोहे की वस्तु, नौकरी, दासता, जेल जाना, खेती के साधन आदि शनि के कारक होते हैं।

 

शनि ग्रह से जुड़ी विस्तृत जानकारी व उनके सभी कारक तत्वों को जानने हेतु इस link पर जाएं।

शनि ग्रह से आखिर क्यों डरते हैं लोग, जाने शनि को– शनि ग्रह की सम्पूर्ण जानकारी:-

 

राहु:-

 

शोध करने की प्रवृ्ति, निष्ठुर वाणी युक्त, विदेश में जीवन, यात्रा, अकाल मृत्यु, इच्छाएं, त्वचा पर दाग, चर्म रोग, सरीसृ्प, सांप और सांप का जहर, विष, महामारी, अनैतिक महिला से संबन्ध, दादा, नानी, व्यर्थ के तर्क, भडकाऊ भाषण, बनावटीपन, विधवापन, दर्द और सूजन, डूबना, अंधेरा, दु:ख पहुंचाने वाले शब्द, निम्न जाति, दुष्ट स्त्री, जुआरी, विधर्मी, चालाकी, संक्रीण सोच, पीठ पीछे बुराई करने वाले, पाखण्डी।

 

केतु:-

 

शोध, निष्ठुर वाणी, चर्म रोग, अतिशूल, दु:ख, चण्डीश्वर, कुत्ता, वायु विकार, क्षयरोग , ब्रह्मज्ञान, संसार से विरक्त, गणेशादि देवताओं की उपासना और मोक्ष का कारक है।

 

सभी ग्रहों के विभिन्न राशियों में अलग-अलग चीजों के कारक होते हैं जिनको मैं आगे भाग में विस्तार से बतायूँगा।

 

जय श्री राम।

Astrologer:- Pooshark Jetly

Astrology Sutras (Astro Walk Of Hope)

Mobile:-9919367470

Categories
Astrology Sutras/Logics Recent Post

ग्रह व उनके भाग्योदय वर्ष: जानें कौन से ग्रह किस आयु में कराते हैं भाग्योदय

ग्रह व उनके भाग्योदय वर्ष: जानें कौन से ग्रह किस आयु में कराते हैं भाग्योदय

 

ग्रह व उनके भाग्योदय वर्ष
ग्रह व उनके भाग्योदय वर्ष

 

सूर्य:-

यह सिंह राशि का स्वामी होता है मेष के 10 अंश पर उच्च स्थान और तुला के 10 अंश पर नीच का होता है यह भाग्योदय 22वें वर्ष में करवाता है इसका रत्न माणिक होता है।

चंद्र:-

यह कर्क राशि का स्वामी होता है वृषभ के 3 अंश पर उच्चवृश्चिक के 3 अंश पर नीच का होता है यह भाग्योदय 24वें वर्ष में करवाता है इसका रत्न मोती होता है।

मंगल:-

यह मेष और वृश्चिक राशि का स्वामी होता है मकर के 28 अंश पर उच्चकर्क के 28 अंश पर नीच का होता है यह 28 वें वर्ष में भाग्योदय करवाता है इसका रत्न मूँगा होता है।

बुध:-

यह मिथुन और कन्या का स्वामी होता है कन्या के 15 अंश पर उच्च और मीन के 15 अंश पर नीच का होता है यह 32वें वर्ष में भाग्योदय करवाता है इसका रत्न पन्ना होता है।

गुरु:-

यह धनु और मीन राशि का स्वामी होता है कर्क के 5 अंश पर उच्च और मकर के 5 अंश पर नीच का होता है यह 16वें वर्ष में भाग्योदय करवाता है इसका रत्न पोखराज होता है।

शुक्र:-

यह वृषभ और तुला राशि का स्वामी होता है मीन के 15 अंश पर उच्च और कन्या के 15 अंश पर नीच का होता है यह 25वें वर्ष में भाग्योदय करवाता है इसका रत्न हीरा होता है।

शनि:-

यह मकर और कुंभ राशि का स्वामी होता है तुला के 20 अंश पर उच्च और मेष के 20 अंश पर नीच का होता है यह 36वें वर्ष में भाग्योदय करवाता है इसका रत्न नीलम होता है।

राहु:-

यह कन्या राशि का स्वामी होता है मिथुन इसकी उच्च कुंभ त्रिकोण संध्याबली, और वृश्चिक नीच राशि होती है कुछ ज्योतिषियों का मत है कि धनु में भी राहु शुरू के 15 अंश तक उच्च का होता है और वृश्चिक में 16 अंश से 30 अंश तक नीच का होता है यह 42वें वर्ष में भाग्योदय करवाता है इसका रत्न गोमेद होता है।

केतु:-

यह मीन राशि का स्वामी होता है धनु में उच्च संध्याबली, सिंह त्रिकोण राशि और मिथुन नीच राशि होती है यह 48वें वर्ष में भाग्योदय करवाता है इसका रत्न लहसुनिया होता है।

जब कोई भी ग्रह खुद की राशि मे बैठता है तो उसे “स्वग्रही” बोलते हैं।

जय श्री राम।

Astrologer:- Pooshark Jetly

Astrology Sutras (Astro Walk Of Hope)

Mobile:- 9919367470

Categories
Astrology Sutras/Logics Recent Post

चतुर्थ भाव में स्थित शनि का फल भाग १

चतुर्थ भाव में स्थित शनि का फल भाग १

 

चतुर्थ भाव में स्थित शनि का फल
चतुर्थ भाव में स्थित शनि का फल

 

कुंडली का चतुर्थ भाव सुख, माता, वाहन, भूमि, मानसिक स्थिति, घर के वातावरण, छाती, प्रारंभिक शिक्षा को दर्शाता है जहाँ बैठा शनि इन सभी को प्रभावित करता है क्योंकि शनि विरक्ति का कारक है चतुर्थ भाव में बैठा शनि व्यक्ति को बचपन में रोग-पीड़ा देने वाला कहा गया है ऐसे व्यक्तियों के बचपन में छाती में दर्द की शिकायत रहती है साथ ही चतुर्थ भाव में स्थित शनि बचपन में सीमित संसाधन देता है जो कि समय व परिश्रम के साथ-साथ बढ़ते जाते हैं, चतुर्थ भाव में स्थित शनि घर से दूर ले जाकर अच्छी उन्नति दिलवाता है ऐसे व्यक्तियों की कुंडली में यदि विदेश यात्रा के योग हैं तो वह और भी प्रवल हो जाता है, बहुत से ग्रंथकारों का मत है कि यदि शनि चतुर्थ भाव में हो तो ऐसे व्यक्तियों को भूमि सुख नही मिल पाता किन्तु मेरा ऐसा मत व अनुभव है कि यदि शनि चतुर्थ भाव में अपनी उच्च राशि, स्वराशि व मूलत्रिकोण राशि अर्थात तुला, मकर व कुंभ राशि में स्थित हो तो ऐसे व्यक्तियों को भूमि सुख अवश्य ही प्राप्त होता है, चतुर्थ भाव में स्थित शनि व्यक्ति का झुकाव आध्यात्म की ओर बढ़ाता है अर्थात ऐसे व्यक्तियों की कुंडली में प्रवज्या योग जिसे सन्यास योग भी कहा जाता है उसकी संभावना अधिक हो जाती है कहने का आशय यह है कि यदि शनि चतुर्थ भाव में स्थित हो तो ऐसा व्यक्ति धर्म-कर्म में अधिक रुचि रखता है, चतुर्थ भाव से घर के वातावरण का भी विचार किया जाता है जहाँ स्थित शनि अकसर घर के माहौल को गरम रखता है कहने का आशय यह है कि यदि चतुर्थ भाव में शनि स्थित हो तो ऐसे व्यक्तियों को मानसिक शांति जल्दी या ज्यादा समय तक अनुभव नही होती ऐसे व्यक्तियों के घर में कलह होते रहते हैं या अन्य किसी कारण से मन दुःखी रहता है।

 

चतुर्थ भाव में शनि
चतुर्थ भाव में शनि

 

चतुर्थ भाव वाहन सुख को भी दर्शाता है जहाँ स्थित शनि वाहन सुख प्रदान करता है किंतु ऐसे व्यक्तियों के वाहन में कोई न कोई समस्या अकसर बनी ही रहती है चाहे वो स्क्रैच की हो या अन्य कोई खराबी की हो, चतुर्थ भाव में स्थित शनि माता के स्वास्थ्य में भी परेशानी देता रहता है ऐसे व्यक्तियों की माता थोड़ी जिद्दी स्वभाव की होती हैं व उनके पैरों, कमर व जोड़ों में दर्द की शिकायत प्रायः देखी जा सकती है, चतुर्थ भाव व्यक्ति के प्रारंभिक शिक्षा को भी दर्शाता है अतः चतुर्थ भाव में बैठा शनि ऐसे व्यक्तियों की प्रारंभिक शिक्षा को भी प्रभावित करता है ऐसे व्यक्तियों की या तो शिक्षा कुछ विलंब से शुरू होती है या फिर ऐसे व्यक्ति अपनी योग्यता के अनुसार परीक्षा में अंक नही प्राप्त कर पाते हैं ऐसे व्यक्तियों को अपने टैलेंट को दिखाने के लिए प्रेरित करना पड़ता है तथा इनका टैलेंट लोगों के सामने आने में समय लगता है क्योंकि ऐसे व्यक्ति खुद के टैलेंट को ही जल्दी नही पहचान पाते हैं, यदि चतुर्थ भाव में शनि स्थित हो तो ऐसे व्यक्तियों को वात व पित्त रोग होने की संभावना बढ़ जाती है, इसके अतिरिक्त यदि शनि चतुर्थ भाव में हो तो भृगु सूत्र के अनुसार ऐसे व्यक्तियों की माता को काफी कष्ट रहता है साथ ही ऐसे व्यक्तियों की कुंडली में दो माता के योग बनते हैं किंतु इसके लिए अन्य ग्रहों की स्थिति पर भी ध्यान देना आवश्यक होता है।

 

 

चतुर्थ भाव में बैठे शनि की तीसरी दृष्टि छठे भाव पर पड़ती है जो यह दर्शाता है कि ऐसे व्यक्ति शत्रुओं पर विजय प्राप्त करते हैं अर्थात शत्रु इनको कोई हानि नही पहुँचा पाते हैं इसके अतिरिक्त ऐसे व्यक्ति प्रतियोगी परीक्षाओं में भी सफल होते हैं, चतुर्थ भाव में बैठे शनि की सातवीं दृष्टि दशम भाव अर्थात कर्म स्थान पर पड़ती है जो यह दर्शाता है कि ऐसे व्यक्तियों को जीवन में बड़ी सफलता प्राप्त करने हेतु कड़ा संघर्ष करना पड़ता है अर्थात ऐसे व्यक्तियों को कड़े परिश्रम से भी बड़ी सफलता व उन्नति प्राप्त होती है, मेरा ऐसा मत व अनुभव है कि यदि चतुर्थ भाव में शनि स्थित हो तो ऐसे व्यक्ति जीवनकाल में एक बार बहुत ऊँचे शिखर पर अवश्य ही पहुँचते हैं, इसके अतिरिक्त चतुर्थ भाव में स्थित शनि की दसवीं दृष्टि लग्न पर पड़ती है जो कि यह दर्शाता है कि ऐसे व्यक्तियों के चेहरे पर किसी प्रकार का कोई निशान (चाहे वह तिल का हो या मस्से का या किसी चोट का या अन्य किसी प्रकार का) रहता है अब यहाँ ध्यान से देखने वाली बात यह है कि चतुर्थ भाव में स्थित शनि कुंडली के छठे भाव जो कि रोग व पीड़ा का भाव है और लग्न जो कि आपका शरीर है दोनों को देखता है साथ ही चतुर्थ भाव में स्थित होने से मानसिक शांति भंग होने के भी योग बना रहा होता है अतः ऐसे व्यक्तियों को कोई ऐसा रोग रहता है जो कि लंबे समय तक चलता है अर्थात ऐसे व्यक्तियों की कुंडली में लंबे समय तक दवाईयाँ खाने के योग बनते हैं।

 

अब जानते हैं कि विभिन्न स्थितियों में चतुर्थ भाव में स्थित शनि किस प्रकार के फल देंगे:-…….

 

पोस्ट की लंबाई को ध्यान में रखते हुए इसका दूसरा भाग जल्द ही प्रकाशित करूँगा।

 

जय श्री राम।

Astrologer:- Pooshark Jetly

Astrology Sutras (Astro Walk Of Hope)

Mobile:- 9919367470

Categories
Astrology Sutras/Logics Recent Post

जानें लड़की का ससुराल व उसका पति कैसा होगा भाग २

जानें लड़की का ससुराल व उसका पति कैसा होगा भाग २

 

जानें विवाह कब होगा
जानें विवाह कब होगा

 

भाग:-२

भाग:-१ पढ़ने के लिए इस link पर जाएं

जानें लड़की का ससुराल व उसका पति कैसा होगा भाग१

 

भाग:-१ में मैंने कन्या का विवाह किस वर्ष में होगा, ससुराल की दिशा क्या होगी, विवाह की आयु क्या होगी पर भृगु संहिता के कुछ सूत्रों को अपने अनुभव के साथ समझाने का प्रयास किया था आज उसी विषय को आगे बढ़ाते हुए कुछ अन्य बातों पर भी चर्चा करते हैं जिससे आप सभी को कन्या के विवाह को लेकर अधिक चिंतित होने की आवश्यकता नही रहेगी व आप बहुत ही सरल विधि से कुछ महत्पूर्ण बातों को इन सूत्रों से ज्ञात कर सकेंगे तो चलिए कुछ अन्य सूत्रों पर चर्चा शुरू करते हैं:-

 

ससुराल की दूरी क्या होगी:-

१. जन्म कुंडली के सप्तम भाव में यदि स्थिर राशियाँ जैसे वृष, सिंह, वृश्चिक व कुंभ राशि हो तो जातिका का विवाह 120 किलोमीटर के अंदर ही होता है।

२. यदि सप्तम भाव में चंद्र, शुक्र व गुरु स्थित हो तो जातिका का विवाह जन्म स्थान के नजदीक ही होता है।

३. जन्म कुंडली के सप्तम भाव में यदि चर राशियाँ जैसे मेष, कर्क, तुला व मकर हो तो जातिका का विवाह 120 से 300 किलोमीटर के अंदर ही होता है।

४. जन्म कुंडली के सप्तम भाव में यदि द्विस्वभाव राशियाँ जैसे मिथुन, कन्या, धनु, मीन हो तो जातिका का विवाह 70 से 130 किलोमीटर के मध्य होता है।

५. यदि सप्तमाधिपति अर्थात सप्तम भाव में जो राशि हो उसका स्वामी सप्तम भाव से द्वादश भाव के मध्य कहीं भी स्थित हो तो जातिका का विवाह विदेश में होता है या लड़का विवाह उपरांत पत्नी के साथ विदेश चला जाता है।

विशेष:-

यहाँ विदेश का आशय सिर्फ देश के बाहर से ही नही अपितु एक राज्य से दूसरे राज्य को भी समझना चाहिए उदाहरण के लिए यदि लड़का उत्तरप्रदेश का रहने वाला है तो विवाह उपरांत व अपनी पत्नी के साथ किसी अन्य राज्य जैसे मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र या अन्य किसी भी राज्य में भी जा सकता है।

 

विवाह से जुड़े कुछ ज्योतिष के सूत्र
विवाह से जुड़े कुछ ज्योतिष के सूत्र

 

पति कैसा होगा:-

१. यदि शुभ ग्रह जैसे चंद्र, बुध, गुरु व शुक्र सप्तम भाव के स्वामी हों या सप्तम भाव में स्थित हों या सप्तम भाव को देखते हैं तो पति सम आयु या 1 से 5 वर्ष के अंतर वाला गोरा व दिखने में सुंदर होगा।

२. यदि पापी ग्रह सूर्य, मंगल, शनि, राहु व केतु सप्तम भाव को देखते हों या सप्तम भाव में स्थित हों कहने का आशय यह है कि सप्तम भाव यदि पापी ग्रह के प्रभाव में हो तो पति 5 वर्ष या उससे अधिक बड़ा होता है।

३. यदि शनि सप्तम भाव में अपनी उच्च राशि का होकर स्थित हो तो पति पतला व सुंदर और लड़की से 6 से 8 वर्ष तक बड़ा हो सकता है और यदि शनि सप्तम भाव में नीच राशि का हो तो पति श्याम वर्ण का व आयु में काफी बड़ा होता है।

विशेष:-

यदि सप्तम भाव में सिंह राशि हो तो पति सुंदर, आकर्षक चेहरे वाला, गोल मुख वाला, क्रोधी, ज्ञानी, चेहरे पर अर्थात ललाट पर एक अलग ही तेज लिए होता है, यदि सप्तम भाव में कर्क राशि हो तो पति सुंदर, सुडौल, मध्यम कद वाला, प्रेम वात्सल्य से भरपूर, व शांत स्वभाव का होता है, यदि सप्तम भाव पर मेष या वृश्चिक राशि हो तो पति क्रोधी, सत्यवादी, छोटे कद वाला, नियम का पालन करने वाला, जिद्दी, शूरवीर व भ्रात प्रेमी होता है, यदि वृष या तुला राशि सप्तम भाव में हो तो पति सुंदर, ज्ञानी, शांत चित्त वाला व मध्यम कद वाला होता है, यदि सप्तम भाव में धनु या मीन राशि हो तो व्यक्ति सुंदर, विद्वान, गुरु व पिता भक्त, धार्मिक, मध्यम कद वाला होता है, यदि मिथुन व कन्या राशि सप्तम भाव में हो तो पति ज्ञानी, चतुर, सुंदर, अकसर भ्रमित रहने वाला, वाचाल अधिक करने वाला होता है।

भाग:-१ पढ़ने के लिए इस link पर जाएं

जानें लड़की का ससुराल व उसका पति कैसा होगा भाग१

 

भृगु संहिता सूत्र
भृगु संहिता सूत्र

 

पति की नौकरी:-

कन्या की लग्न कुंडली का सप्तम भाव पति का व चतुर्थ भाव सप्तम से दशम होने के कारण से पति का राज्य भाव होता है, यदि कन्या की कुंडली का चतुर्थ भाव बली हो या चतुर्थ भाव का स्वामी सूर्य, चन्द्र, मंगल, गुरु, शुक्र को देखता हो साथ ही यह ग्रह (सूर्य, चंद्र, मंगल, गुरु व शुक्र) केंद्र या त्रिकोण में बैठे हों तो पति की अच्छी नौकरी होती है या विवाह बाद पति की अच्छी उन्नति होती है।

पति की आयु:-

१. कन्या की जन्म कुंडली का द्वितीय भाव उसके पति के आयु का भाव होता है क्योंकि द्वितीय भाव सप्तम भाव से अष्टम होता है और अष्टम भाव से आयु का विचार किया जाता है, यदि दूसरे भाव का स्वामी शुभ स्थिति में हो या द्वितीय स्थान को देख रहा हो तो पति दीर्घायु होता है।

२. यदि द्वितीय भाव में शनि स्वग्रही, मित्र राशि, मूलत्रिकोण राशि या उच्च राशि का स्थित हो या गुरु द्वितीय भाव, सप्तम भाव को देख रहा हो तो उस स्थिति में भी पति दीर्घायु होकर 75 वर्ष की आयु प्राप्त करता है।

भाग:-१ पढ़ने के लिए इस link पर जाएं

जानें लड़की का ससुराल व उसका पति कैसा होगा भाग१

जय श्री राम।

Astrologer:- Pooshark Jetly

Astrology Sutras (Astro Walk Of Hope)

Mobile:- 9919367470

Categories
Astrology Sutras/Logics Recent Post

जानें लड़की का ससुराल व उसका पति कैसा होगा भाग१

जानें लड़की का ससुराल व उसका पति कैसा होगा भाग १

 

जानें विवाह कब होगा
जानें विवाह कब होगा

 

भाग:-१

 

सभी माता-पिता अपनी बेटी के विवाह को लेकर काफी चिंतित रहते हैं कि उसका विवाह कब होगा, पति कैसा होगा, ससुराल कैसा होगा, बेटी के ससुराल की दूरी क्या होगी व उसका किस दिशा में विवाह होगा और उनकी यह चिंता स्वभाविक भी है, हमारे महर्षियों ने इस पर अनेक विचार रखें जिनमे से मैं भृगु संहिता के कुछ सूत्र को आप सभी के साथ साझा कर रहा हूँ जिससे आप सभी यह सभी प्रश्नों के उत्तर बहुत ही सरलता से ज्ञात कर सकते हैं।

 

विवाह से जुड़े कुछ ज्योतिष के सूत्र
विवाह से जुड़े कुछ ज्योतिष के सूत्र

 

कुंडली के सप्तम भाव से विवाह का विचार किया जाता है सप्तम भाव में जो राशि होती है उस राशि के स्वामी को सप्तमाधिपति कहा जाता है इसके अतिरिक्त ज्योतिष में गुरु को लड़की के विवाह का कारक माना गया है, विभिन्न लग्नों के अनुसार सप्तमाधिपति अर्थात सप्तम भाव के स्वामी भी बदलते रहते हैं जिसकी सहायता से हम विवाह से जुड़े प्रत्येक संदर्भ पर विचार करते हैं तो चलिए जानते हैं एक-एक कर हर सूत्र के बारे में जिससे हम बहुत ही आसानी से लड़की के पति, पति की आयु, विवाह की दूरी व दिशा, पति की नौकरी, विवाह की आयु के बारे में ज्ञात कर सकते हैं:-

 

भृगु संहिता सूत्र
भृगु संहिता सूत्र

 

विवाह किस वर्ष में होगा:-

 

लग्न कुंडली व चंद्र कुंडली के सप्तम भाव में जो राशि हो उसमें 10 अंक को जोड़ देना चाहिए तदोपरांत जितने भी ग्रह सप्तम भाव को देखते हैं या सप्तम भाव में बैठे हो उन सभी के 4-4 अंको को जोड़ देना चाहिए अब जो योगफल आएगा उस योगफल में कन्या का विवाह होता है।

विशेष:-

उस योगफल की आयु के समय सप्तमाधिपति की महादशा या अंतर्दशा व गुरु का लग्न, तृतीय, पंचम, सप्तम, नवम या एकादश भाव से गोचर होना अनिवार्य है किन्तु गोचरस्थ शनि की लग्न व सप्तम पर दृष्टि न हो तो ही यह सूत्र फलित होता है।

 

ससुराल की दिशा:-

 

१. यदि सप्तम भाव में मेष, सिंह या धनु राशि हो एवं सूर्य और शुक्र ग्रह हो तो पूर्व दिशा में शादी होती है।

२. यदि सप्तम भाव में वृष, कन्या या मकर राशि हो और चंद्र, शनि ग्रह स्थित हो तो दक्षिण दिशा में विवाह होता है।

३. यदि सप्तम भाव में मिथुन, तुला या कुंभ राशि हो और मंगल, राहु, केतु ग्रह स्थित हो तो पश्चिम दिशा में विवाह होता है।

४. यदि सप्तम भाव में कर्क, वृश्चिक या मीन राशि हो और बुध तथा गुरु हो तो उत्तर दिशा में विवाह होता है।

विशेष:-

यदि लग्न कुंडली में सप्तम भाव में कोई भी ग्रह स्थित न हो साथ ही उस भाव पर किसी ग्रह की दृष्टि भी न हो, तो उस स्थिति में जो ग्रह कुंडली में सबसे अधिक बली अवस्था में हो उस ग्रह की राशि जिस दिशा की स्वामी होगी उस दिशा में विवाह होता है।

 

विवाह की आयु:-

 

१. यदि सप्तम भाव में बुध स्वराशि या उच्च राशि का होकर बैठा हो व पाप ग्रह से न तो युत व दृष्ट हो तो ऐसी स्थिति में विवाह 13 से 19 वर्ष की आयु में विवाह होता है।

२. यदि सप्तम भाव में मंगल स्वराशि का होकर स्थित हो व पापी ग्रह से युत या दृष्ट हो तो ऐसी स्थिति में विवाह 24 वर्ष के अंदर होता है।

३. यदि सप्तम भाव में शुक्र स्थित हो व पापी ग्रह से युत या दृष्ट हो तो ऐसी अवस्था में विवाह 24-29 वर्ष की आयु में होता है।

४. यदि सप्तम भाव में चंद्रमा स्वराशि स्थित होकर पापी ग्रह से प्रभावित हो, तो ऐसी स्थिति में विवाह 22-24 वर्ष की आयु में होता है।

५. यदि सप्तम भाव में गुरु स्वराशि का होकर स्थित हो व पापी ग्रह से युत व दृष्ट न हो तो ऐसी स्थिति में विवाह 26-29 वर्ष की आयु में होता है।

६. यदि सप्तम भाव में चर राशि अर्थात मेष, कर्क, तुला व मकर राशि हो व कोई भी शुभ ग्रह सप्तम भाव में स्थित हो साथ ही सप्तम भाव को दो या दो से अधिक ग्रह देखते हैं तो विवाह उचित आयु में हो जाता है।

७. यदि सप्तम भाव में बुध मिथुन व कन्या राशि का स्थित हो व उस पर किसी भी ग्रह की दृष्टि न हो तो ऐसी स्थिति में विवाह बाल्यावस्था में ही संपन्न होने के योग बनते हैं।

 

पोस्ट की लंबाई को ध्यान में रखते हुए इसका भाग:-२ जल्द ही प्रकाशित करूँगा।

 

जय श्री राम।

Astrologer:- Pooshark Jetly

Astrology Sutras (Astro Walk Of Hope)

Mobile:- 9919367470

Categories
Astrology Sutras/Logics Recent Post

शरीर पर उपस्थित मस्से का महत्व

शरीर पर उपस्थित मस्से का महत्व

 

तिल और मस्सों का रहस्य
तिल और मस्सों का रहस्य

 

जिस प्रकार से शरीर पर उपस्थित तिल का शुभाशुभ फल होता है व उनका अपना महत्व होता है ठीक उसी प्रकार शरीर पर उपस्थित मस्से का भी अपना एक अलग महत्व होता है व शरीर के अनेक भागों पर मस्से के होने के अलग-अलग फल हमारे शास्त्रों ने बताए हैं तो चलिए जानते हैं शरीर के किस स्थान पर मस्सा होने का क्या फल होता है:-

१. सिर पर मस्सा होने से धन लाभ होता है।

२. चेहरे के पृष्ठ भाग पर मस्सा हो तो व्यक्ति सौभाग्यशाली होता है।

३. मस्तिष्क पर मस्सा होने से व्यक्ति धनी होता है।

४. भौंह पर मस्से का होना दुर्भाग्य का सूचक होता है, यदि दोनों भौंहों के मध्य मस्सा हो तो ऐसा व्यक्ति दुष्ट होता है परंतु इनका परिचय क्षेत्र काफी बड़ा होता है, यदि महिला के भौंह पर मस्सा हो तो वह महिला जल्द ही वैधव्य को प्राप्त करती है।

५. पलक पर मस्से का होना अनेक प्रकार के दुःख की ओर संकेत करता है।

६. नेत्रों पर मस्सा प्रियजन से मिलाप होने का संकेत देता है।

७. मस्तिष्क, कनपटी या नेत्र हड्डी के जोड़ स्थान पर मस्सा हो तो ऐसा व्यक्ति सब कुछ त्याग कर सन्यासी होता हो जाता है।

८. यदि नाक व कान पर मस्सा हो तो ऐसा व्यक्ति आभूषण प्रिय होता है और ऐसे व्यक्ति धार्मिक प्रवत्ति के होते है।

९. यदि गाल पर मस्सा हो तो उसका पुत्र लुंज होता है।

१०. दाढ़ी पर मस्सा होना धन लाभ का सूचक होता है।

११. गले पर मस्से का होना व्यक्ति को खान-पान का शौकीन बनाता है।

 

शरीर पर तिल व मस्से और आपका व्यक्तित्व
शरीर पर तिल व मस्से और आपका व्यक्तित्व

 

१२. हिर्दय व वक्ष स्थल पर मस्से का होना पुत्र-सुख का सूचक होता है ऐसे व्यक्ति को संतान में एक पुत्र अवश्य ही प्राप्त होता है।

१३. पसली व उसके आस-पास का मस्सा दुःख का सूचक होता है।

१४. कंधे का मस्सा व्यक्ति को आकर्षक व्यक्तित्व परन्तु अकर्मण्य बनाता है।

१५. पीठ पर मस्से का होना दुःख और चिंताओं से मुक्ति प्रदान कराने का सूचक होता है।

१६. बाँह पर मस्से का होना शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने का सूचक होता है ऐसे व्यक्ति प्रत्येक शत्रु का दमन करने में सक्षम होते हैं।

१७. कलाई का मस्सा व्यक्ति के स्वम् के लिए अशुभ होता है ऐसे व्यक्ति अकसर अपने आपको ही कष्ट देते रहते हैं।

१८. हाथ की अंगुलियों का मस्सा सौभाग्य का सूचक होता है।

१९. पेट पर मस्से का होना सर्जरी का सूचक होता है ऐसे व्यक्ति के जीवनकाल में कम से कम एक सर्जरी की संभावना बनी रहती है।

२०. नाभि पर मस्से का होना चोरी व अग्नि से धन नाश का सूचक होता है।

२१. घुटने पर मस्से का होना गठिया रोग या शत्रुओं से पराजित होने का सूचक होता है।

२२. पिंडलियों पर मस्से का होना गठिया रोग व दुर्घटना से चोट लगने का सूचक होता है।

२३. ऐड़ी पर मस्से का होना चरित्र हनन का सूचक होता है।

विशेष:-

पुरुषों के शरीर पर मस्सा, तिल का दक्षिण भाग पर होना शुभ तथा नारियों के लिए बाएं भाग पर होना शुभ माना जाता है।

 

जय श्री राम।

Astrologer:- Pooshark Jetly

Astrology Sutras (Astro Walk Of Hope)

Mobile:- 9919367470

Categories
Astrology Sutras/Logics Recent Post

शरीर पर स्थित और आपका व्यक्तित्व भाग-२

शरीर पर स्थित और आपका व्यक्तित्व भाग-२

शरीर पर तिल और आपका व्यक्तित्व
शरीर पर तिल और आपका व्यक्तित्व

 

शरीर पर स्थित तिल और आपका व्यक्तित्व भाग:-१ की link मैं आप सभी को इस पोस्ट की शुरुवात व अंत दोनों जगह उपलब्ध करा रहा हूँ:-

शरीर पर स्थित तिल और आपका व्यक्तित्व

 

भाग:-२

 

तस्या: शुभ वग्ममरालपदक्ष्य राज्यावृतं कृष्णावंशाल शुक्लम्र।

प्रास्पन्दतैक नयन सुकैशया, मीनाहत नइममिताभिताग्राम।।

सुन्दरकान्डे त्रिशा: सर्गा।।२।।

(श्रीमद वाल्मीकि रामायणै)

 

भावार्थ:-

सुंदर केशों वाली सीता, बांकी बनौलियों से घिरा हुआ परम मनोहर काला तिल, श्वेत और विशाल बायाँ नेत्र फड़कने लगा जैसे कि मानो मीन के आघात से लाल रक्त हिलने लगा हो, आर्या सीता को अशोक वाटिका में, शोकाकुल स्थिति में उपर्युक्त शकुन हुआ, जिससे उनका शोक जाता रहा, मन शांत हो गया और हिर्दय हर्ष से चहक उठा।

तिलों का अपना विशेष महत्व है, शकुन-अपशकुन के अतिरिक्त शरीर के विभिन्न अंगों में स्थित होने से विभिन्न प्रकार के फल प्राप्त होते हैं, मस्सा और तिल के बारे में “वराहमिहिर” जी ने बताया है कि यदि मस्सा शरीर के वर्ण का ही या उज्जवल हो तो ब्राह्मण जाति के लोगों के लिए शुभ होता है तथा क्षत्रिय वर्ग के लिए श्वेत या लालिमा युक्त मस्सा शुभ होता है, वैश्य वर्ग के लिए पीला, श्वेत और लालिमा युक्त मस्सा शुभ होता है, काला मस्सा केवल शूद्र जाति के लिए शुभ होता है।

 

शरीर पर तिल के निशान का महत्व
शरीर पर तिल के निशान का महत्व

 

कमर का तिल:-

 

कमर पर तिल वाले व्यक्ति हमेशा हाजिर जबाब पाए जाते हैं, इनका दिमाग तेज होता है व ऐसे व्यक्ति अपने बाहुबल से उन्नति प्राप्त करते हैं।

 

कूल्हों का तिल:-

 

कूल्हों का तिल व्यक्ति को सहनशील बनाता है ऐसे व्यक्ति हर परिस्थिति का सामना बखूबी कर लेते हैं व ऐसे व्यक्ति जल्दी हार मानकर नही बैठते हैं।

 

पीठ का तिल:-

 

पीठ में तिल का निशान होना बहुत शुभ नही होता अतः ऐसे व्यक्तियों को सोच-समझ कर ही किसी भी समारोह में शामिल होना चाहिए किन्तु पीठ पर तिल या मस्सा शत्रुओं से मुक्ति दिलाता है, ऐसे व्यक्ति सरल हिर्दय के होते हैं साथ रणनीति बनाने में भी निपुण होते हैं।

 

कलाई का तिल:-

 

कलाई पर तिल व्यक्ति को किफायती बनाता है परंतु उसे किसी बंधन (केवल जेल ही नही अपितु सामाजिक बंधन भी) में बाँध सकता है, ऐसे व्यक्ति पर आँख बंद कर के विश्वास नही किया जा सकता, यदि ऐसा तिल महिला की कलाई पर है तो एक विवाह और पुरुष की कलाई पर है तो दो विवाह का सूचक होता है।

 

महिलाओं की कलाई पर तिल का होना उन्हें खुद-गर्ज व मतलब-परस्त बनाता है परंतु ऐसी महिलाएं अच्छी अभिनेत्री या काम निकालने के लिए ड्रामे बाज भी होती हैं, महिलाओं की बाईं कलाई पर तिल धन-दौलत दिलाता है, ऐसी स्त्रियाँ घरेलू काम में दक्ष व निपुण होती हैं, पुरुषों की बाईं कलाई पर तिल होना उन्हें खुददार व्यक्तित्व देता है ऐसे लोग सफल जीवन व्यतीत करते हैं।

 

पेट पर तिल:-

 

पेट पर तिल वाले व्यक्ति सज्जन पुरुष होते हैं, ऐसे व्यक्ति को ऐसी स्त्री से विवाह करना चाहिए जिसके विचार व व्यवहार में पुरुष के लिए लाभकारी सामंजस्य हो जिससे जीवन खुशहाल रहे।

 

बगल में तिल:-

 

बाईं ओर बगल का तिल, चिन्ह संघर्ष का सूचक है, दाईं ओर का तिल बहुत सतर्क व सावधान होने की चेतावनी देता है, यदि सावधानी न बरती तो ऐसे व्यक्तियों को अधिक नुकसान उठाना पड़ता है।

 

तिल के निशान का फलकथन

 

अंगुलियों का तिल:-

 

किसी भी अंगुली पर तिल का होना व्यक्ति को बेईमान व परिश्रम से दिल चुराने का संकेत देता है।

 

हाथ पर तिल:-

 

महिलाओं के हाथों में तिल धन-दौलत, प्रतिष्ठा व मान-सम्मान प्रदान करवाता है परंतु पुरुषों के हाथ में तिल एक से अधिक विवाह के योग बनाता है जीवन रेखा, भाग्य रेखा व मस्तक के योग से बने त्रिकोण या घनागार का तिल पुरुषों को भाग्यवान, धनवान व राजयोग प्रदान करवाता है।

 

घुटनों पर तिल या मस्सा:-

 

दाईं ओर के घुटने पर पाया जाने वाला तिल या मस्सा खुशहाल जीवन व अच्छे भाग्य का प्रतीक होता है, इनका स्वभाव भी अच्छा होता है परंतु बाएं घुटने का तिल या मस्सा व्यक्ति को बेहद फिजूल खर्च करने वाला बनाता है किंतु ऐसे व्यक्ति व्यापार, व्यवहार व व्यवसाय में बहुत सूज-बूझ से कार्य करते हैं।

 

भाग:- १ पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएं।

शरीर पर स्थित तिल और आपका व्यक्तित्व

जल्द ही इसका तीसरा भाग प्रकाशित करूँगा जिस पर मस्से के बारे में लिखूँगा।

 

जय श्री राम।

Astrologer:- Pooshark Jetly

Astrology Sutras (Astro Walk Of Hope)

Mobile:- 9919367470

Categories
Astrology Sutras/Logics Recent Post

शरीर पर स्थित तिल और आपका व्यक्तित्व

शरीर पर स्थित तिल और आपका व्यक्तित्व

 

भाग:-१

 

शरीर पर तिल और आपका व्यक्तित्व
शरीर पर तिल और आपका व्यक्तित्व

 

हमारे शरीर पर पाए जाने वाले तिल व मस्से विभिन्न प्रकार के होते हैं जिसमें गोलाकार मस्से उत्तम प्रकार के व्यक्तित्व के परिचायक हैं, नुकीले और तिरछे तिल व मस्से अच्छे नही होते हैं यदि तिलों का रंग हल्का भूरा है तो उसे सौभाग्य का प्रतीक मानते हैं, शरीर पर पाया जाने वाला प्रत्येक तिल अपनी अलग-अलग विशेषता और महत्व रखता है, अत्यधिक काले तिल को जीवन में कठिनाई और समस्याओं का प्रतीक माना गया है शरीर पर पाए जाने वाले तिलों की स्थिति से आप अपने व दूसरों के स्वभाव व व्यवहार का सरलता से अनुमान लगा सकते हैं:-

 

तिल के निशान का फलकथन
तिल के निशान का फलकथन

 

माथे पर तिल:-

 

माथे पर, सीधी तरफ तिल महिलाओं की सफलता, ऐश्वर्य व प्रतिष्ठा का प्रतीक है ऐसे व्यक्ति को क्रोध अधिक आता है व बहुत तीव्र गति से आता है, ऐसे व्यक्ति आत्मविश्वासी होते हैं साथ ही ऐसे व्यक्ति धनवान भी होते हैं परंतु फिजूल खर्चों पर अपना धन भी व्यय करते रहते हैं, यदि तिल या मस्सा बाईं ओर हो तो वह समस्याओं व कठिनाइयों का प्रतीक होता है।

 

आँख का तिल:-

 

आँख के ऊपर का तिल व्यक्ति के ठंडे स्वभाव का प्रतीक है किंतु ऐसे व्यक्ति धोखेबाज भी होते हैं।

 

भौंह का तिल:-

 

भौंह का तिल व्यक्ति के जीवन में संघर्ष परंतु सफलता बताता है, ऐसे व्यक्ति को अपने घर में तथा घर के बाहर भी सफलता मिलती हैं, आँख के बाहरी कोने का तिल व्यक्ति के ईमानदार होने का सूचक होता है तथा बाईं ओर का तिल आराम का सूचक होता है।

 

नाक का तिल:-

 

नाक पर स्थित तिल व्यक्ति को सरल चित्त बनाता है ऐसे व्यक्ति जीवन में सफल भी होते हैं, इनका विवाह अच्छी जगह, अच्छे खानदान में होता है, अचानक ऐसे व्यक्तियों को कल्पना से अधिक धन प्राप्त होता है, नाक के सीधी (दाईं) ओर का तिल यात्राओं की सूचना देता है, नाक पर बाई ओर का तिल बताता है कि ऐसा व्यक्ति विश्वास के काबिल नही होता है क्योंकि ऐसे व्यक्ति धोखा-धड़ी में निपुण होते हैं, नाक की नोक का तिल अत्यधिक क्रोध व झगड़ालू प्रवृत्ति का सूचक होता है।

 

गाल पर तिल:-

 

यदि महिला के दाएं गाल पर तिल हो तो अच्छा होता है जिससे उन्हें अच्छा घर-बार मिलता है, उनका मित्रों/सहेलियों में सम्मान होता है, यदि तिल महिला के बाईं गाल पर लाल रंग का हो तो उसे धन दौलत मिलती है परंतु यदि इसी भाग पर काला तिल हो तो मन-पसंद जगह पर विवाह होता है और यदि गाल के दोनों तरफ तिल हो तो उन्हें प्रत्येक कार्य में सफलता मिलती है।

 

शरीर पर तिल के निशान का महत्व
शरीर पर तिल के निशान का महत्व

 

होंठ पर तिल:-

 

महिलाओं के ऊपरी होंठ पर तिल उन्हें खुशहाल जीवन व धन प्रदान करता है, वैसे भी ऐसी महिला हंसमुख स्वभाव वाली होती हैं, महिलाओं के निचले होंठ पर तिल का होना अशुभ होता है।

 

कानों पर तिल:-

 

कानों पर तिल का होना धन-दौलत से संपन्न किन्तु घुमक्कड़ प्रवृत्ति के व्यक्तित्व की निशानी होती है ऐसे लोगों को प्रसिद्धि भी प्राप्त होती है, यदि तिल कान के अंदर स्थित है तो यह व्यक्ति की ऐश-परस्ती, मौज-मस्ती परंतु धोखा व फरेब पसंदी का सूचक है परंतु, महिलाओं के कानों पर तिल का होना अच्छे घर-बार व धन-दौलत का प्रतीक होता है।

 

गर्दन पर तिल:-

 

गर्दन पर तिल का होना अच्छा होता है यह तिल जीवन भर खुशहाली व धन-दौलत प्रदान करता है।

 

सीने पर तिल:-

 

सीने का तिल बुद्धिमत्ता व उत्तम सोच-विचार का सूचक होता है, महिलाओं के दाएं पुश्त पर तिल अधिक संतान की इच्छा बताता है ऐसे तिल वाली स्त्रियों की मृत्यु अक्सर अपने पति से पहले हुआ करती है, ऐसे व्यक्ति आराम-तलब व झगड़ालू भी होते हैं, यदि तिल बाईं तरह है तो ऐसे व्यक्ति के जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं परंतु उनका भाग्य हमेशा उत्तम ही रहता है।

 

ठोड़ी पर तिल:-

 

पुरुष की ठोड़ी पर तिल उसके अच्छे भाग्य का सूचक होता है, “शास्त्रों के अनुसार श्री राम चन्द्र जी के ठोड़ी पर भी तिल था” जिन स्त्रियों के ठोड़ी पर तिल हो वो अकसर अधिक संतान की इच्छा रखा करती हैं।

 

पसलियों पर तिल:-

 

जिन लोगों की पसलियों पर तिल होता है उनको सफलता पाने के लिए अत्यधिक परिश्रम करना पड़ता है।

 

कंधों पर तिल:-

 

ऐसे लोग फितरती, घूमने-फिरने के लिए हमेशा बेचैन रहते हैं ऐसे व्यक्तियों का अधिक समय तक एक ही स्थान पर टिक पाना संभव नही होता है, सैर-सपाटा और अधिकतर यात्राएं करते रहते हैं, यदि तिल दाएं कंधे पर हो तो अच्छी जगह, अच्छे खानदान में विवाह का सूचक होता है, पुरुषों के बाएं कंधे पर तिल उसे मस्त-मौला स्वभाव का बनाता है परंतु ऐसे व्यक्ति विषम परिस्थितियों में भी प्रसन्नचित्त पाए जाते हैं और घबराहट इनसे दूर भागती है।

 

“पोस्ट की लंबाई को ध्यान में रखते हुए इस लेख को दो भागों में प्रकाशित करूँगा।”

 

जय श्री राम।

Astrologer:- Pooshark Jetly

Astrology Sutras (Astro Walk Of Hope)

Mobile:- 9919367470