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शिवमहापुराण के अनुसार शिव जी का हनुमान जी के रूप में अवतार तथा उनके चरित्र का वर्णन

शिवमहापुराण के अनुसार शिव जी का हनुमान जी के रूप में अवतार तथा उनके चरित्र का वर्णन

 

शिवमहापुराण के अनुसार हनुमान जी के रूप में शिव जी का अवतार व हनुमान जी की लीलाएं
शिवमहापुराण के अनुसार हनुमान जी के रूप में शिव जी का अवतार व हनुमान जी की लीलाएं

 

शिवमहापुराण के शतरुद्रसंहिता में बीसवें अर्थात विंशोध्याय में शिव जी का हनुमान जी के रूप में अवतरित होना व उनके चरित्रों का विस्तृत वर्णन मिलता है शिवमहापुराण के अनुसार नंदीश्वर ने मुनियों से कहा:-

 

अतः परं श्रृणु प्रीत्या हनुमच्चरितं मुने।
यथा चकाराशु हरो लीलास्तद्रूपतो वरा:।।

अर्थात नंदीश्वर बोले हे मुने! अब इसके पश्चात् शिव जी ने जिस प्रकार हनुमान जी के रूप में अवतार लेकर मनोहर लीलाएं की उस हनुमच्चरित्र को प्रेमपूर्वक सुनिए।

चकार सुहितं प्रीत्या रामस्य परमेश्वरः।
तत्सर्वं चरितं विप्र श्रृणु सर्वसुखावहम्।।

 

अर्थात उन परमेश्वर ने प्रेमपूर्वक (हनुमद रूप से) श्रीराम का परम हित किया है, हे विप्र! सर्वसुखकारी उस संपूर्ण चरित्र का श्रवण कीजिए।

एकस्मिन्समये शम्भुरद्भुतोतिकर: प्रभु:।
ददर्श मोहिनी रूपं विष्णो: स हि वसेद्गुण:।।
चक्रे स्वं क्षुभितं शम्भु: कामबाणहतो यथा।
स्वं वीर्यं पातमायास रामकार्यार्थमीश्वरः।।
तद्विर्यं स्थापयामासु: पत्रे सप्तर्षयश्च ते।
प्रेरिता मनसा तेन रामकार्यार्थमादरात्।।

 

अर्थात एक बार अत्यंत अद्भुत लीला करने वाले तथा सर्वगुण संपन्न उन भगवान शिव ने जब विष्णु के मोहिनी रूप को देखा तो उस मोहिनी रूप को देखते ही कामबाण से आहत की भाँति शम्भु ने अपने को विक्षुब्ध कर दिया और उन ईश्वर ने श्रीराम के कार्य के लिए अपने तेज का उत्सर्ग कर दिया शिव जी के मन की प्रेरणा से प्रेरित होकर सप्तर्षियों ने उनके तेज को राम कार्य हेतु आदरपूर्वक पत्ते पर स्थापित कर दिया तत्पश्चात उन महर्षियों ने शभु के उस तेज को श्री राम के कार्य हेतु गौतम की कन्या अंजनी में कान के माध्यम से स्थापित कर दिया, समय आने पर वह शम्भुतेज महान बल तथा पराक्रम वाला और वानर शरीर वाला होकर हनुमान के नाम से प्रकट हुआ।

 

शिवमहापुराण के अनुसार वे महाबलवान कपीश्वर हनुमान जब शिशु ही थे उसी समय प्रातः काल उदय होते हुए सूर्य बिम्ब को छोटा फल जानकर निगल गए थे तब देवताओं की प्राथना से उन्होंने सूर्य को उगल दिया, उन्हें महाबली शिवावतार जानकर देवताओं तथा ऋषियों के प्रदत्त वरों को उन्होंने प्राप्त किया तत्पश्चात् अत्यंत प्रसन्न हनुमान जी अपनी माता के निकट गए और आदरपूर्वक उनसे वह वृत्तांत कह सुनाया, इसके बाद माता की आज्ञा से नित्य प्रति सूर्य के पास जाकर धैर्यशाली हनुमान जी ने बिना यत्न के ही उनसे सारी विद्याएं पढ़ लीं और उसके बाद माता की आज्ञा प्राप्त कर रुद्र के अंशभूत कपिश्रेष्ठ हनुमान जी सूर्य की आज्ञा पर उनके अंश से उत्पन्न हुए सुग्रीव के पास गए, सुग्रीव अपने ज्येष्ठ भ्राता वालि से तिरस्कृत हो ऋष्यमूक पर्वत पर हनुमान जी के साथ निवास करने लगे और तब हनुमान जी को उन्होंने अपने मंत्री होने की उपाधि दी।

 

शिव जी के अंश से उत्पन्न परम् बुद्धिमान कपिश्रेष्ठ हनुमान जी ने सब प्रकार से सुग्रीव का हित किया और लक्ष्मण जी के साथ वहाँ आए हुए अपहृत पत्नी वाले दुःखी प्रभु श्री राम जी के साथ उनकी सुखदाई मित्रता करवाई, श्री रामचंद्र जी ने भाई की स्त्री के साथ रमण करने वाले महापापी एवं अपने को वीर मानने वाले कपिराज वालि का वध कर दिया।

 

ततो रामाज्ञया तात हनूमान्वारेश्वर:।
स सीतान्वेषणं चक्रे बहुभिर्वानरेः सुधी:।।
ज्ञात्वा लंकागतां सीतां गतस्तत्र कपीश्वरः।
द्रुतमुल्लंघ्यं सिंधु तमनिस्तीर्यं परै: स वै।।

 

अर्थात नन्दीश्वर जी कहते हैं हे तात! तदन्तर वे महाबुद्धिमान वानरेश्वर हनुमान श्री रामचन्द्र जी की आज्ञा से बहुत से वानरों के साथ सीता माता की खोज में लग गए और सीता माता को लंका में विद्यमान जानकर वे कपीश्वर दूसरों के द्वारा न लांघे जा सकने वाले समुद्र को बड़ी शीघ्रता से लांघ लिया और वहाँ जाकर उन्होंने पराक्रम युक्त अद्भुत कार्य किया और जानकी माता को प्रीति पूर्वक अपने प्रभु का उत्तम (मुद्रिका रूप) चिन्ह प्रदान किया तथा जानकी माता के प्राणों की रक्षा करने वाला रामवृत्त सुनाकर उन वीर वानर नायक ने शीघ्र ही उनके समस्त शोकों का निवारण कर दिया व रावण की अशोकवाटिका उजाड़कर बहुत से राक्षसों का वध कर लंका में महान उपद्रव किया, नंदीश्वर जी कहते हैं कि:-

 

यदा दग्धो रावणेनावगुण्ठ्य वसनानि च।
तैलाभ्यक्तानि सुदृढं महावलवता मुने।।

उत्प्लुत्योत्प्लुत्य च तदा महादेवांशज: कपि:।
ददाह लंकां निखिलां कृत्वा व्याजं तमेव हि।

 

अर्थात हे मुने! जब महाबलशाली रावण ने तेल से सने हुए वस्त्रों को उनकी पूँछ में दृढ़तापूर्वक लपेटकर उसमें आग लगा दी तब महादेव के अंश से उत्पन्न हनुमान जी ने इसी बहाने से कूद-कूद कर समस्त लंका को जला दिया तदनन्तर वे कपिश्रेष्ठ वीर हनुमान केवल विभीषण के घर के छोड़कर सारी लंका जला कर के समुद्र में कूद पड़े और वहाँ अपनी पूँछ बुझाकर शिव के अंश से उत्पन्न वे समुद्र के दूसरे किनारे पर आए और प्रसन्न होकर श्री राम जी के पास गए, सुंदर वेग वाले कपिश्रेष्ठ हनुमान जी ने शीघ्रतापूर्वक श्री राम के निकट जाकर उन्हें सीता जी की चूड़ामणि प्रदान की तत्पश्चात श्री राम जी की आज्ञा से वानरों के साथ उन बलवान वीर हनुमान जी ने अनेक विशाल पर्वतों को लाकर समुद्र पर सेतु बना दिया तब श्री राम जी ने विजय प्राप्त करने की इच्छा से शिवलिंग को यथाविधि प्रतिष्ठित कर उसका पूजन किया व पूज्यतम शिव जी से विजय का वरदान प्राप्त कर के समुद्र पार कर वानरों के साथ लंका को घेर कर राक्षसों से युद्ध किया।

शिवमहापुराण के अनुसार:-

 

जघानाथासुरान्वीरो रामसैन्यं ररक्ष स:।
शक्तिक्षतं लक्ष्मणं च संजीविन्या ह्यजीवयत्।।

 

अर्थात उन वीर हनुमान जी ने अनेक राक्षसों का वध किया और श्री रामचन्द्र जी की सेना की रक्षा की तथा शक्ति से घायल लक्ष्मण जी को संजीवनी बूटी के द्वारा पुनः जीवित कर दिया।

 

सर्वथा सुखिनं चक्रे सरामं लक्ष्मणं हि स:।
सर्वसैन्यं ररक्षासौ महादेवात्मज: प्रभु:।।

 

अर्थात इस प्रकार से महादेव के अंश प्रभु हनुमान जी ने लक्ष्मण सहित श्रीराम जी को सब प्रकार से सुखी बनाया और संपूर्ण सेना की रक्षा करी, महान बल धारण करने वाले उन कपि ने बिना श्रम के परिवार सहित रावण का विनाश किया और देवताओं को सुखी बनाया साथ ही उन्होंने महिरावण नामक राक्षस को मारकर लक्ष्मण सहित श्री राम जी की रक्षा कर के उसके स्थान (पाताल लोक) से अपने स्थान पर ले आए, इस प्रकार श्री हनुमान जी ने सब प्रकार से श्री राम जी का कार्य शीघ्र ही संपन्न किया, असुरों का वध किया एवं नाना प्रकार की लीलाएं की, सीता-राम को सुख देने वाले वानर राज ने स्वम् श्रेष्ठ भक्त होकर भूलोक में रामभक्ति की स्थापना की, शिवमहापुराण के अनुसार हनुमान जी लक्ष्मण जी के प्राणों का रक्षक, सभी देवताओं का गर्व चूर करने वाले, रुद्र के अवतार, भगवत्स्वरूप और भक्तों का उद्धार करने वाले, सदा राम कार्य सिद्ध करने वाले, लोक में रामदूत नाम से विख्यात, दैत्यों का संहार करने वाले भक्तवत्सल हैं नंदीश्वर जी कहते हैं:-

 

इति ते कथितं तात हनुमच्चरितं वरम्।
धन्यं यशस्यमायुष्यं सर्वकामफलप्रदम्।।

य इदं श्रृणुयाद्भक्त्या श्रावयेद्वा समाहित:।
स भुक्तवेहाखिलान्कामान् अन्ते मोक्षं लभेत्परम्।।

 

अर्थात नंदीश्वर जी कहते हैं हे तात! इस प्रकार मैंने श्री हनुमान जी के श्रेष्ठ चरित्र को कहा जो धन, यश, आयु तथा संपूर्ण कामनाओं का फल देने वाला है जो भी सावधान होकर भक्तिपूर्वक इसे सुनता या सुनाता है वह इस लोक में सभी सुखों को भोगकर अंत में परम मोक्ष को प्राप्त करता है।

 

जय श्री सीता-राम।

जय श्री राम।

जय आंजनेय हनुमान।

 

Astrologer:- Pooshark Jetly

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लग्न कुंडली के तृतीय भाव में सूर्य का फल–Astrology Sutras

लग्न कुंडली के तृतीय भाव में सूर्य का फल–Astrology Sutras

 

लग्न कुंडली के तृतीय भाव में सूर्य का फल
लग्न कुंडली के तृतीय भाव में सूर्य का फल

 

यदि लग्न कुंडली के तृतीय भाव में हो तो शास्त्रकारों का मत है कि ऐसा व्यक्ति कुशाग्र बुद्धि वाला, पराक्रमी, बली, प्रिय भाषी अर्थात मधुर वचन बोलने वाला, साफ मन वाला अर्थात स्वच्छ चित्त वाला, वाहन व नौकरों से सुशोभित व तेजस्वी होता है और इनके भाईयों की संख्या प्रायः कम ही होती है, यदि तृतीय भाव में सूर्य हो तो अग्रज भाई का नाश होता है व सहोदर भाई की अल्पता और चचेरे भाई बहु संख्यक होते हैं, ऐसे व्यक्ति धनवान और द्रव्य विशिष्ट होते हैं उसे वें वर्ष में पशु से भय और २० वें वर्ष में अर्थ की प्राप्ति होती है।

 

मंत्रेश्वर महाराज जी ने फलदीपिका में कहा है कि यदि लग्न कुंडली के तृतीय भाव में सूर्य हो तो व्यक्ति बलवान, शूरवीर, धनी और उदार होता है किंतु अपने (संबंधी) लोगों से शत्रुता रखता है, मानसागरी में कहा गया है कि यदि लग्न कुंडली के द्वितीय भाव में सूर्य हो तो:-

 

सहजभुवनसंस्थे भास्करे भ्रातृनाश: प्रियजन हितकारी पुत्रधाराभियुक्त:।

भवति च धनयुक्तो धैर्ययुक्त: सहिष्णु: विपुल धनविहारी नागरीप्रीतिकारी।।

 

अर्थात यदि लग्न कुंडली के तृतीय भाव में सूर्य हो तो उसके भाइयों का नाश होता है किंतु ऐसे व्यक्ति अपने प्रियजनों का हित चाहने वाले होते हैं और इन्हें स्त्री व पुत्र दोनो सुख प्राप्त होते हैं, ऐसे व्यक्ति धनवान, धैर्यवान तथा दूसरों का उत्कर्ष देखकर प्रसन्न होने वाले होते हैं तथा ऐसे व्यक्ति अतिव्ययी होते हैं तथा सुंदर लड़कियों का इनके प्रति आकर्षण रहता है।

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के मत व अनुभव के अनुसार यदि लग्न कुंडली के तृतीय भाव में सूर्य हो तो व्यक्ति अत्यंत धनी, समाज सेवा हेतु सदैव तत्पर, दयालु, उदार, अत्यधिक धन खर्च करने वाला, अत्यंत आकर्षक शक्ति वाला, प्रतापी, पराक्रमी, तीर्थ यात्रा करने वाला, शत्रुओं पर विजयी किंतु अग्रज के सुखों से वंचित रहता है, वृहत्त्पराशर होराशास्त्र में लिखा है कि “अग्रेजातं रवि: हन्ति” अर्थात तृतीय भाव का सूर्य बड़े भाई के लिए मारक होता है, यदि तृतीय भाव में सूर्य यदि मेष राशि का हो तो व्यक्ति दुर्बल विचारों वाला, आलसी, शरीर को कष्ट न देने वाला, बातूनी, निरुधमी और उपद्रवकारी होता है किंतु शेष पुरुष राशि का सूर्य यदि तृतीय भाव में हो तो व्यक्ति शांत, विचारशील, बुद्धिमान, सामाजिक, शिक्षासंबंधी तथा राजकीय कार्यों में भाग लेने वाला, नेता, स्थानीय स्तर पर स्वराज्य संस्था चलाने वाला, लोकल बोर्ड आदि में चुनाव लड़ने वाला, अध्यक्ष या उपाध्यक्ष पद की प्राप्ति करने वाला, बड़ी कम्पनियों में उच्च पद पर आसीन, तथा राजा के समान कर्म व पराक्रम करने वाला होता है और इनके नीचे कार्यरत व्यक्ति इनसे प्रसन्न रहते हैं, पुरुष राशि का तृतीय भावगत सूर्य बड़े भाई के लिए मारक होता है जिस कारण से प्रायः बड़े भाई की मृत्यु २२ वें वर्ष तक हो जाती है किंतु यदि बड़े भाई की जन्म कुंडली में दीर्घायु योग हों तो ऐसी अवस्था में बड़े भाई की मृत्यु नही होती अपितु कुछ कष्ट बने रहते हैं या दोनो भाईयों में वैचारिक मतभेद होते रहते हैं तथा दोनो भाईयों के एक ही स्थान पर रहने से उन्नति न होती व घर के वातावरण में तनावपूर्ण माहौल बना ही रहता है, यदि पुरुष राशि का सूर्य तृतीय भाव में हो तो संपत्ति विभाजन शांतिपूर्ण तरह से हो जाता है किंतु यदि स्त्री राशि का सूर्य तृतीय भाव में हो तो संपत्ति विभाजन के लिए कोर्ट में मुकदमें चलते हैं, यदि तृतीय भाव में सूर्य मिथुन, तुला व धनु राशि का हो तो व्यक्ति लेखक, प्रकाशक, प्रोफेसर और वकील होता है या इनमें रुचि रखता है, यदि कुंडली के तृतीय भाव में सूर्य हो तो प्रायः व्यक्ति अपने माता-पिता का या तो सबसे बड़ी संतान होती है या फिर वह इकलौती संतान होती है, स्त्री राशि का सूर्य यदि तृतीय भाव में हो शुभ फल मिलते हैं किंतु संपत्ति विभाजन के लिए कोर्ट में मुकदमा लड़ते हैं।

 

जय श्री राम।

 

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लग्न कुंडली के द्वितीय भाव में सूर्य का फल–Astrology Sutras

लग्न कुंडली के द्वितीय भाव में सूर्य का फल–Astrology Sutras

 

लग्न कुंडली के द्वितीय भाव में सूर्य का फल
लग्न कुंडली के द्वितीय भाव में सूर्य का फल

 

यदि कुंडली के दूसरे भाव में सूर्य हो तो व्यक्ति भाग्यवान होता है तथा इन्हें प्रायः चतुष्पात अर्थात गाय, भैंस, बकरी आदि के माध्यम से सुख प्राप्त होता है कहने का आशय यह है कि दूसरे भाव में यदि सूर्य हो और व्यक्ति यदि खेती बाड़ी करता हो तो बैलों की जोड़ी का सुख मिलता है और यदि व्यक्ति दूध विक्रेता है तो उसके पास अनेक मात्रा में गाय, भैंस व बकरी होंगी व उनसे लाभ होगा आदि फल होता है, यदि सूर्य कुंडली के दूसरे भाव में हो तो व्यक्ति का द्रव्य अच्छे कामों में व्यय होता है तथा स्त्री के निमित्त से अपने कुटुंब में भी कलह-क्लेश होता है किंतु ऐसे व्यक्तियों के वह सभी कार्य जिन्हें वो द्रव्य का निमित्त करना चाहते हैं उसमें इनको प्रायः नुकसान ही होता है, दूसरे भाव में यदि सूर्य हो तो व्यक्ति दंभी, कलह सहने वाला, मित्र विरोधी, पुत्रवान, वाणी दोष, नौकर-चाकर से युक्त, मुख रोगी व धन हानि आदि फल प्राप्त होते हैं, ऐसे व्यक्तियों की शिक्षा में अड़चनें आती है साथ ही ऐसे व्यक्ति हठी व चिड़चिड़े स्वभाव के होते हैं।

 

मंत्रेश्वर महाराज जी ने फलदीपिका में कहा है कि यदि सूर्य द्वितीय भाव में हो तो मनुष्य विद्या, विनय और धन से हीन होता है तथा उसकी वाणी में भी कुछ दोष रहता है, मानसागरी के अनुसार यदि दूसरे भाव में सूर्य हो तो:-

 

धनगतदिननाथे पुत्रदारै: विहीन:।
कृशतनु रतिदीनोरक्तनेत्र: कुकेश:।।
भवति च धनयुक्त: लोह ताम्रेण सत्यं।
न भवति ग्रहमेधी मानवो दुःखभागी।।

 

अर्थात यदि सूर्य दूसरे भाव में हो तो व्यक्ति को स्त्री सुख व पुत्र सुख नही मिलता है तथा इनका शरीर दुबला-पतला होता है और इन्हें रति सुख नही मिलता, ऐसे व्यक्तियों की आँखे लाल व केश बुरे होते हैं किंतु व्यक्ति धनवान होता है साथ ही लोहे और ताँबे से संपन्न होता है तथा ऐसे व्यक्ति गृहस्थी होकर भी किसी एक स्थान में घर बनाकर नही रहते अतएव दुःखी होते हैं।

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के मत व अनुभव के अनुसार यदि लग्न कुंडली के दूसरे भाव में सूर्य बैठा हो तो व्यक्ति धनी होता है किंतु इनके धन की हानि भी प्रायः होती रहती है, साथ ही यदि दूसरे भाव में सूर्य वृषभ, कन्या या मकर राशि का हो तो व्यक्ति कभी धन का संचय नही कर पाता चाहे उसके लिए भी वो जितना भी यत्न कर ले और ऐसे व्यक्ति स्वतंत्र व्यापार करने के इच्छुक होते हैं तथा नौकरी पसंद नही करते हैं किंतु यदि धनेश बलवान हो अर्थात वक्री, अस्त, मंदगामी व अतिचारी न हो और किसी पाप ग्रह से संबंध न बनाता हो तो ही यह इच्छाएं व्यक्ति की पूर्ण होती है परंतु पिता और पुत्र के मध्य वैचारिक मतभेद बने रहते हैं, वकीलों और डॉक्टरों के लिए यह सूर्य शुभफलदाई होता है, यदि किसी ज्योतिषी के द्वितीय भासव में सूर्य हो तो उनके बताए अशुभ फल शीघ्र ही अनुभव में आते हैं किंतु शुभ फल अनुभव में बहुत ही विलंब से अनुभव में आते हैं प्रायः ज्योतिषी को अपयश ही मिलता है, यदि दूसरे भाव में मिथुन, तुला व कुंभ का सूर्य हो तो व्यक्ति अत्यंत धनी होता है किंतु लोगों की सहानुभूति से वंचित रहता है क्योंकि ऐसे व्यक्ति धन व्यय के विषय में कृपण होते हैं अर्थात कंजूस होते हैं, दूसरे भाव में सूर्य यदि कर्क, वृश्चिक व मीन राशि का हो तो व्यक्ति अधिकारी या किसी उच्च पद पर कार्य करने वाला होता है तथा दूसरे भाव में सूर्य यदि मेष, सिंह और धनु राशि का सूर्य हो तो व्यक्ति बहुत स्वार्थी होता है तथा अपने आपको बड़ा आदमी बनाने की अदम्य इच्छा रखता है किंतु कार्य से मन चुराता है अर्थात ऐसे व्यक्तियों को कार्य करना कम ही पसंद आता है, इसके अतिरिक्त यदि सूर्य दूसरे भाव में हो तो ऐसे व्यक्तियों के नेत्र, हाथ व पैर प्रायः गर्म ही रहते हैं और इन्हें उत्तम भोजन करने में बड़ी रुचि होती है, कपड़ों को स्वच्छ रखने में इनका विशेष ध्यान जाता है तथा इनके वार्ता करने के तरीकों में बड़पन्न झलकता है।

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के मत व अनुभव अनुसार यदि वृश्चिक, धनु, मकर या कुंभ लग्न कुंडली के द्वितीय भाव में सूर्य बैठा हो और धन स्थान का स्वामी वक्री हो या १२-४-६-८-१२ वें स्थान में हो तो यह महा दरिद्र योग होता है यह योग जिन व्यक्ति की कुंडली में होता है उन्हें अत्यंत गरीबी को भी झेलना पड़ता है तथा कई बार इन्हें भोजन के लिए भी तरसना पड़ता है, साथ ही यदि दूसरे भाव में सूर्य हो और उसे शनि न देखता हो तो व्यक्ति धनी होता है किंतु यदि शनि से दृष्ट हो तो धन सामान्य मात्रा एवं शनि से दृष्ट हो किंतु अन्य ग्रहों से नही तो व्यक्ति निर्धन होता है, साधारण रूप से ऐसे व्यक्तियों का धन चोरी होने के योग होते हैं, १७ वें व २५ वें वर्ष में धनहानि संभव होती है।

 

जय श्री राम।

 

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बुध का मिथुन राशि से गोचर 26 मई 2021: जानिए, विभिन्न राशियों में पड़ने वाले प्रभाव

बुध का मिथुन राशि से गोचर 26 मई 2021: जानिए, विभिन्न राशियों में पड़ने वाले प्रभाव

 

बुध का मिथुन राशि से गोचर
बुध का मिथुन राशि से गोचर

 

वैदिक ज्योतिष में बुध को राजकुमार का पद प्राप्त है जो कि हमेशा सूर्य के सानिध्य में ही रहते हैं, बुध २६ मई की प्रातः ०६ बजकर ४४ मिनट पर वृषभ राशि को छोड़कर मिथुन राशि में चले जाएंगे जहाँ २४ जुलाई की दिन में १० बजकर २१ मिनट 58 सेकंड तक रहेंगे, बुध मिथुन व कन्या राशि के स्वामी होते हैं और कन्या राशि में ही उच्च के भी होते हैं मीन राशि बुध की नीच राशि होती है, बुध बुद्धि व विवेक के कारक होते हैं अतः बुध के कन्या राशि से गोचर के दौरान विभिन्न राशियों पर विभिन्न प्रकार से प्रभाव पड़ेंगे तो चलिए जानते हैं बुध के इस गोचर के दौरान विभिन्न राशियों पर क्या प्रभाव पड़ेगा:-

 

मेष राशि:-

 

मेष राशिफल
मेष राशिफल

 

मेष राशि वालों के लिए बुध तृतीय व षष्ठ भाव के स्वामी होकर तृतीय भाव से गोचर करेंगे ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार मेष राशि वालों के लिए बुध का यह गोचर शुभ फल देने वाला होगा फलस्वरूप प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे लोगों के लिए यह अच्छा समय रहेगा, शत्रुओं पर युक्ति व चतुराई के माध्यम से सफलता प्राप्त होगी, भाग्य की वृद्धि होगी, धर्म-आध्यात्म की ओर झुकाव बढेगा, बहन-बुआ व मासी के स्वास्थ्य में परेशानी संभव है।

 

वृषभ राशि:-

 

वृषभ राशिफल
वृषभ राशिफल

 

वृषभ राशि वालों के लिए बुध द्वितीय व पंचम भाव के स्वामी होकर द्वितीय से गोचर करेंगे ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार वृषभ राशि वालों के लिए बुध का यह गोचर शुभ फल देने वाला होगा फलस्वरूप बुद्धि व विवेक द्वारा आय वृद्धि के नए स्त्रोत बनेंगे, जो लोग बैंकिंग, फाइनेंस, टीचिंग, एल. आई. सी. व दूरसंचार माध्यम से जुड़ा हुआ कार्य करते हैं उनके लिए बुध का यह गोचर श्रेष्ठम फल देने वाला रहेगा, संतान की उन्नति होगी व संतान का सहयोग भी प्राप्त होगा, विद्यार्थियों के लिए यह अच्छा अवसर रहेगा, कोरोना के कारण से जिनकी नौकरी छूट गयी थी उन्हें पुनः किसी नौकरी का अवसर प्राप्त हो सकता है, प्रेमियों के मध्य प्रेम बना रहेगा तथा दोनो अपनी समझ का परिचय देते हुए एक-दूसरे के साथ आनन्दमयी जीवन व्यतीत करेंगे।

 

मिथुन राशि:-

 

मिथुन राशिफल
मिथुन राशिफल

 

मिथुन राशि वालों के लिए बुध प्रथम भाव अर्थात लग्न व चतुर्थ भाव के स्वामी होकर लग्न से ही गोचर करेंगे ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार मिथुन राशि वालों के लिए बुध का यह गोचर बेहद ही शुभ फल देने वाला होगा फलस्वरूप माता का पूर्ण सहयोग प्राप्त होगा, अपनी युक्ति के बल पर आप कार्यक्षेत्र में उन्नति के नए अवसर निर्मित करने में सफल होंगे, स्थान परिवर्तन के योग बनेंगे, अच्छा रहेगा, लोगों पर अधिक विश्वास करने से बचें, आकस्मिक धन लाभ के योग बनेंगे तथा आय में वृद्धि के पूर्ण योग प्राप्त होते हैं।

 

कर्क राशि:-

 

कर्क राशिफल
कर्क राशिफल

 

कर्क राशि वालों के लिए बुध द्वादश व तृतीय भाव के स्वामी होकर द्वादश भाव से गोचर करेंगे ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार कर्क राशि वालों के लिए बुध का यह गोचर मिला-जुला फल देने वाला होगा फलस्वरूप यात्राओं के योग बनेंगे, यात्रा हो सकती है, पुराने मित्रों से मुलाकात संभव है, आपके फोन में बुध के इस गोचरकाल के दौरान कुछ समस्या रह सकती है, छोटे भाई-बहन की उन्नति होगी या उनके कार्यक्षेत्र का कुछ विस्तार होगा।

 

सिंह राशि:-

 

सिंह राशिफल
सिंह राशिफल

 

सिंह राशि वालों के लिए बुध धनेश व लाभेश होकर लाभ स्थान से गोचर करेंगे ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार सिंह राशि वालों के लिए बुध का यह गोचर बेहद ही शुभ फल देने वाला होगा फलस्वरूप आय में वृद्धि होगी, कोरोना के कारण जिनकी नौकरी चली गयी थी उनको पुनः नए अवसर प्राप्त होंगे, जिन व्यक्तियों का कार्य बैंकिंग, फाइनेंस, टीचिंग, एल. आई. सी. व दूरसंचार माध्यम आदि से जुड़ा हुआ कार्य करते हैं उनके लिए बुध का यह गोचर बेहद शुभ फल देने वाला होगा, प्रेमियों के मध्य प्रेम बना रहेगा, नवदम्पत्तियों को संतान से जुड़ा शुभ समाचार प्राप्त हो सकता है।

 

कन्या राशि:-

 

कन्या राशिफल
कन्या राशिफल

 

कन्या राशि वालों के लिए बुध पहले व दशम भाव के स्वामी होकर दशम भाव से गोचर करेंगे ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार कन्या राशि वालों के लिए बुध का यह गोचर शुभ फल देने वाला होगा फलस्वरूप कार्यक्षेत्र का विस्तार होगा, बेरोजगारों तथा कोरोना के चलते जिनकी नौकरी चली गयी थी उन्हें नौकरी मिलने के पूर्ण योग बनते हैं, व्यापारियों के मुनाफे में वृद्धि होगी, माता के स्वास्थ्य का ख्याल रखें, संतान की उन्नति होगी, प्रेमियों व जीवनसाथी के लिए बुध का यह गोचर क्षणिक विवाद के योग बना रहा है अतः एक-दूसरे को समझने का प्रयास करें व अपने प्रेमी और जीवनसाथी को कुछ समय दें, स्थान परिवर्तन के योग बनेंगे, नौकरी व व्यवसाय में उन्नति होगी।

 

तुला राशि:-

 

तुला राशिफल
तुला राशिफल

 

तुला राशि वालों के लिए नवम व द्वादश भाव के स्वामी होकर नवम भाव से गोचर करेंगे ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार तुला राशि वालों के लिए बुध का यह गोचर सामान्य फल देने वाला होगा फलस्वरूप धर्म-आध्यात्म की ओर झुकाव बढेगा, धर्मिक यात्राओं के योग हैं या धर्म-कर्म आदि में धन व्यय होने के योग बनेंगे, स्थान परिवर्तन के योग बनेंगे, कार्यक्षेत्र का विस्तार होगा, पिता के स्वास्थ्य का ख्याल रखें, प्रेमियों के लिए बुध का यह गोचर शुभफलदाई होगा तथा उनके प्रेम संबंधों में प्रगाढ़ता आएगी, दाम्पत्य जीवन में कुछ उतार-चढ़ाव संभव रहेगा।

 

वृश्चिक राशि:-

 

वृश्चिक राशिफल
वृश्चिक राशिफल

 

वृश्चिक राशि वालों के लिए बुध अष्टम व एकादश भाव के स्वामी होकर अष्टम भाव से गोचर करेंगे ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार वृश्चिक राशि वालों के लिए बुध का यह गोचर सामान्य फल देने वाला होगा फलस्वरूप कार्यक्षेत्र में विस्तार होगा व आय में वृद्धि होगी किंतु स्वास्थ्य के प्रति पूर्णतया सतर्क रहें, स्थान परिवर्तन के योग हैं, जो लोग ज्योतिष, बैंकिंग, फाइनेंस एल.आई.सी., टीचिंग व दूरसंचार माध्यम आदि से जुड़े हुए हैं उनके लिए बुध का यह गोचर आर्थिक दृष्टिकोण से बेहद शुभ रहने वाला होगा, प्रेमियों के लिहाज से बुध का यह गोचर कुछ झंझटों के साथ प्रेम संबंधों में मधुरता लाने वाला होगा, विद्यार्थियों को उनकी मेहनत का पूर्ण फल प्राप्त होगा।

 

धनु राशि:-

 

धनु राशिफल
धनु राशिफल

 

धनु राशि वालों के लिए बुध सप्तम व दशम भाव के स्वामी होकर सप्तम भाव से गोचर करेंगे ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार धनु राशि वालों के लिए बुध का यह गोचर बेहद ही शुभ फल देने वाला होगा फलस्वरूप कार्यक्षेत्र का विस्तार, नौकरी में उन्नति, मित्रों से लाभ, पिता का सहयोग व मन में प्रसन्नता का अनुभव आदि शुभ फल प्राप्त होंगे, कोरोना के कारण जिनकी नौकरी चली गयी थी उन्हें नौकरी के नए अवसर प्राप्त होंगे, आय में वृद्धि होगी, दाम्पत्य जीवन में चले आ रहे विवाद समाप्त होंगे, प्रेमियों के मध्य प्रेम में प्रगाढ़ता आएगी, विद्यार्थियों के लिए बुध का यह गोचर सामान्य फल देगा, अत्यधिक परिश्रम करने पर बड़ी सफलता प्राप्ति के योग बनेंगे।

 

मकर राशि:-

 

मकर राशिफल
मकर राशिफल

 

मकर राशि वालों के लिए षष्ठ और नवम भाव के स्वामी होकर षष्ठ भाव से गोचर करेंगे ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार मकर राशि वालों के लिए बुध का यह गोचर सामान्य फल देने वाला होगा फलस्वरूप भाग्य की शक्ति व चतुराई युक्त युति के द्वारा शत्रुओं पर विजय प्राप्त होगी व प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे व्यक्तियों को उनकी मेहनत का पूर्ण फल प्राप्त होगा, जिनको स्वास्थ्य की समस्या लम्बे समय से चली आ रही थी उनके स्वास्थ्य में सुधार होगा, गुप्त शत्रुओं से सावधान रहें व अपनी वाणी पर नियंत्रण रखें अन्यथा आपके गुप्त शत्रु आप पर हावी होने का पूर्ण प्रयास करेंगे, प्रेमियों के मध्य तनावपूर्ण स्थितियाँ उत्पन्न होंगी, विद्यार्थियों के लिए बुध का यह गोचर शुभफलदाई रहेगा।

 

कुंभ राशि:-

 

कुंभ राशिफल
कुंभ राशिफल

 

कुंभ राशि वालों के लिए बुध पंचम व अष्टम भाव के स्वामी होकर पंचम भाव से गोचर करेंगे ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार कुंभ राशि वालों के लिए बुध का यह गोचर सामान्यतः शुभ फल देने वाला होगा फलस्वरूप जो लोग ज्योतिष, बैंकिंग, फाइनेंस एल.आई.सी., टीचिंग व दूरसंचार माध्यम आदि से जुड़े हुए हैं उनके लिए बुध का यह गोचर उन्नतिकारक होगा, संतान को किसी प्रकार का कष्ट संभव है, प्रेमियों के लिए यह समय मिला-जुला रहेगा, विद्यार्थियों को कुछ नया सीखने को मिलेगा जिसमें वो रुचि भी लेंगे, धर्म-आध्यात्म की ओर झुकाव बढेगा, नवदम्पत्तियों को संतान से जुड़ा शुभ समाचार मिल सकता है, किसी अप्रिय घटना घटित होने की संभावना रहेगी।

 

मीन राशि:-

 

मीन राशिफल
मीन राशिफल

 

मीन राशि वालों के लिए बुध चतुर्थ व सप्तम भाव के स्वामी होकर चतुर्थ भाव से गोचर करेंगे ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार मीन राशि वालों के लिए बुध का यह गोचर सामान्यतः शुभ फल देने वाला होगा फलस्वरूप दाम्पत्य जीवन में चले आ रहे विवाद समाप्त होंगे, नौकरी में उन्नति होगी, माता के स्वास्थ्य का ख्याल रखें, जो लोग विवाह योग्य हो गए हैं उनके विवाह हेतु कहीं से प्रस्ताव आ सकता है, जो लोग प्रेम विवाह करना चाहते हैं उनके लिए भी यह गोचर शुभ रहेगा, कार्यक्षेत्र का विस्तार होगा व आय में वृद्धि होगी, घर में किसी महिला मेहमान के आने की संभावना रहेगी।

 

जय श्री राम।

 

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लग्न कुंडली के प्रथम भाव में सूर्य का फल–Astrology Sutras

लग्न कुंडली के प्रथम भाव में सूर्य का फल–Astrology Sutras

 

लग्न कुंडली के प्रथम भाव में सूर्य का फल
लग्न कुंडली के प्रथम भाव में सूर्य का फल

 

सूर्य यदि प्रथम भाव अर्थात लग्न में हो तो ऐसे व्यक्ति प्रायः रूप में विचित्र, नेत्रों की समस्या से युक्त, कंठ या गुदा में ब्रण अथवा तिल युक्त, शूरवीर, क्षमाशील, घृणा रहित, कुशाग्र बुद्धि, उदार प्रकृति, साहसी व आत्मसम्मानी होते हैं परंतु ऐसे व्यक्ति निर्दयी, क्रोधी और क्रोध में कुछ भी कर गुजरने वाले होते हैं और उनको वात व पित्त के प्रकोप से पीड़ा रहती है तथा ऐसे व्यक्ति आकार में लंबे, गर्म शरीर वाले और थोड़े केश वाले होते हैं तथा ऐसे व्यक्तियों को अपनी बाल्यावस्था में अनेक पीड़ायें भोगनी पड़ती है और सर पर चोटादि लगने की संभावना रहती है, १५ वें वर्ष में अंग पीड़ा और वर्ष की आयु में ज्वर पीड़ा होती है यदि लग्न में सूर्य के साथ अन्य पापग्रह भी हों या सूर्य लग्न में नीच राशि का बैठा हो जो कि तुला लग्न की कुंडली में ही संभव है या शत्रु राशि के लग्न में स्थित हो तो सूर्य के अनिष्ट फल होते हैं।

 

लग्न में मेष राशि का सूर्य हो तो व्यक्ति नेत्र रोगी परंतु धनवान और कीर्तिमान होता है तथा यदि सूर्य को मित्र बली ग्रह देखते हों तो व्यक्ति विद्वान भी होता है, लग्न में तुला राशि का सूर्य हो तो व्यक्ति निर्धन तथा मानरहित होता है किंतु यदि सूर्य शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो अशुभता में कमी आती है, मंत्रेश्वर महाराज जी ने फलदीपिका में यहाँ तक कहा है कि यदि लग्न अर्थात प्रथम भाव में तुला राशि का सूर्य हो तो मनुष्य दरिद्र ही रहता है और उसके पुत्र नष्ट हो जाते हैं, यदि लग्न में सूर्य मकर या सिंह राशि हो तो व्यक्ति रतौंधी एवं हिर्दय रोग से पीड़ित होता है किंतु यदि सिंह का नवमांश भी हो और वहाँ भी प्रथम भाव अर्थात लग्न में ही सूर्य बैठे तो व्यक्ति किसी स्थान का मालिक होता है तथा शुभ ग्रह देखते हैं तो निरोगी होता है, यदि कर्क राशि का सूर्य प्रथम भाव अर्थात लग्न में हो तो व्यक्ति रोगी किंतु ज्ञानी होता है, यदि लग्न अर्थात प्रथम भाव में सूर्य हो तो व्यक्ति कार्य करने में आलसी, क्रोधी, प्रचंड, लंबा, मानी अर्थात घमंडी, शूर, क्रूर, जल्दी क्षमा न करने वाला होता है और ऐसे व्यक्तियों के नेत्र कुछ रूखे होते हैं, मानसागरी के अनुसार:-

 

“सवितरि तनुसंस्थे शैशव व्याधियुक्तो नयनगदसुदुःखी नीचसेवानुरक्त:।

न भवति गृह मेधी दैवयुक्तो मनुष्यो भ्रमति विकलमूर्ति: पुत्र पौत्रे: विहीन:।।”

 

अर्थात यदि लग्न अर्थात प्रथम भाव में सूर्य स्थित हो तो व्यक्ति बाल्यावस्था में रोगी होता है तथा उसके नेत्रों में विकार रहता है साथ ही ऐसे व्यक्ति नीच लोगों की नौकरी करते हैं और एक जगह घर बसाकर नही रह पाते और हमेशा घूमते-फिरते रहते हैं तथा इन्हें पुत्र व पौत्र का सुख नही मिल पाता है तो वहीं वैधनाथ जी का मत है कि यदि सूर्य प्रथम भाव अर्थात लग्न में हो तो उसकी संतति कम होती है और ऐसे व्यक्ति जन्म से ही सुखी, निर्दय, कम खाने वाले, चक्षुरोगी, सुशील, सुहावनी आँखों वाले, सब कामों में यशस्वी तथा बलवान होता है।

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के मत व अनुभव के अनुसार यदि सूर्य प्रथम भाव अर्थात लग्न में हो तो व्यक्ति युद्ध में आगे होकर लड़ने वाला, स्वतंत्रता में अधिक उन्नति करने वाला, पित्त, वायु व रक्तविकार के रोगों से पीड़ित व चर्म रोगी होता है इसके अतिरिक्त यदि स्त्री राशि का सूर्य प्रथम भाव अर्थात लग्न में हो तो सुखदाई होता है तथा पुरुष राशि का सूर्य यदि प्रथम भाव अर्थात लग्न में हो तो थोड़ा दुःखदाई होता है साथ ही यदि धनु लग्न हो और प्रथम भाव में सूर्य स्थित हो तो व्यक्ति विद्वान, धर्मशास्त्रों को जानने वाला व उच्चाधिकारी होता है किंतु स्त्री सुख से वंचित रहता है या इसी तरह के अन्य किसी दुःख से पीड़ित होता है, यदि कर्क लग्न हो और प्रथम भाव में सूर्य स्थित हो तो व्यक्ति साधारण धनी, स्त्री सुख युक्त तथा संतति संपन्न होता है किंतु यशस्वी नही होता कहने का आशय यह है कि इस स्थिति में व्यक्ति के पास धन अच्छा रहता है किंतु व्यक्ति ऊँचे पद पर आसीन नही हो पाता है तथा दक्षिणायण का सूर्य इनके लिए शुभ होता है व उत्तरायण का सूर्य प्रायः लड़ाई-झगड़े, अपना स्वामित्व स्थापित करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देता है साधारण शब्दों में प्रथम भाव में यदि सूर्य शुभ स्थिति में हो तो अच्छा फल देता है किंतु स्वास्थ्य समस्याएं भी देता है।

 

जय श्री राम।

 

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नामकरण संस्कार: जानिए, बच्चों के नाम कब और किस प्रकार से रखना शुभ होता है

नामकरण संस्कार: जानिए, बच्चों के नाम कब और किस प्रकार से रखना शुभ होता है

 

नामकरण संस्कार विधि
नामकरण संस्कार विधि

 

जातानन्तरमेव नामकरणं त्वेकादशाहे स्फुटं,

पुत्रस्यैव समाक्षरं तु युवते: कार्य ततो व्यत्ययम्।

शुद्धिर्जातकवच्च नाम्नि सकलैस्तद् द्वादशेषोडशे,

द्बाविंशेऽप्यथ विंशके हि विहितं जातिव्यस्थां बिना।।

 

अर्थात:-

 

जातकर्म संस्कार के पश्चात ग्याहरवें दिन बच्चे का नामकरण करना चाहिए, पुत्र का नाम सम संख्या अक्षरों वाला तथा पुत्री का नाम विषम संख्याक्षरों से रखना चाहिए।

 

मुहर्त व दिनादि का निश्चय जातकर्म के समान ही करना चाहिए अथवा बाहरवें, सोहलवें, बीसवें तथा बाइसवें दिन भी सूतक समाप्ति के बाद नामकरण कर सकते हैं, इसमें वर्ग भेद से काल भेद नही होता है अर्थात चारों वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र) के लोगों पर यह नियम समान रूप से लागू है।

 

नामकरण सदैव सूतक समाप्त होने पर ही होता है, दस दिन बीत जाने पर सूतक समाप्त हो जाता है बहुत से आचार्यों ने दसवें, अठाहरवें या मसोपरांत भी कहे हैं अतः देश, काल व परंपरा अनुसार नामकरण का निश्चय करते हुए शुभ वार, तिथि, नक्षत्रादि का विचार कर रिक्ता तिथि अर्थात चतुर्थी, नवमी व चतुर्दशी तथा अमावस्या को छोड़कर शेष सभी तिथियाँ किंतु तिथि क्षय न हो रही हो आदि का ध्यान रखना चाहिए यदि पूर्णा तिथि हो तो विशेष ठीक रहती है, उस दिन शुभ वार में, लग्न शुद्धि का विचार कर के दोपहर से पूर्व जातक का नामकरण करना चाहिए किंतु यदि उस दिन व्यतिपात योग, सक्रांति, रिक्ता तिथि, जया तिथि, भद्रा, ग्रहण, वैधृति योग, श्राद्ध दिन पड़ता हो तो नामकरण संस्कार की तिथि आगे बढ़ा देनी चाहिए यदि इन कारणों से उपरोक्त मुहर्त निकल जाए तो सूर्य के उत्तरायण समय व गुरु और शुक्र के अस्त समय को छोड़कर कभी भी शुभ दिन में नामकरण कर सकते हैं

देशकालोपघाताद्यै: कालातिक्रमणं यदि।

अनस्तगे भृगावीज्ये तत्कालं चोत्तरायणे।।

 

मुहर्त चिंतामणि में नामकरण संस्कार विधि के लिए कहा गया है कि

 

तज्ज़ातकर्मादि शिशोर्विधेयं पर्वाख्यरिक्तोनतिथौशुभेऽह्वि।

एकादशे द्वादशकेऽ पिघस्त्रे मृदुध्रुवक्षिप्रचरोडुषु स्यात्।।

 

अर्थात:- पर्व के दिन और रिक्ता तिथि को छोड़कर अन्य तिथियों में, शुभ दिन में, जन्मकाल से ११ वें व १२ वें दिन में, मृदुसंज्ञक, ध्रुवसंज्ञक, क्षिप्रसंज्ञक नक्षत्रों में, बच्चे का नामकरण करना शुभ रहता है।

 

जय श्री राम।

 

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मीन लग्न और आप: जानिए, मीन लग्न वालों का व्यक्तित्व

मीन लग्न और आप: जानिए, मीन लग्न वालों का व्यक्तित्व

 

मीन लग्न वालों का व्यक्तित्व
मीन लग्न वालों का व्यक्तित्व

 

मीन लग्न वाले व्यक्तियों का शरीर सुंदर व सुडौल होता है तथा इनको पित्त की समस्या प्रायः बनी ही रहती है, मीन लग्न वाले व्यक्तियों को जल से अत्यधिक प्रेम होता है और प्रेमवश कभी-कभी जल का अत्यधिक सेवन भी करते हैं तथा विलासी होते हैं, इनको सुख, शांतिमय और भोग-विलास युक्त जीवन वाले सिध्दांत पर चलना पसंद होता है इस कारण मीन लग्न वाले व्यक्ति आँख मूंद कर पानी की तरह धन व्यय करते हैं तथा ऐसे व्यक्ति कुशल कवि और लेखक भी होते हैं साथ ही इनमें रुचि भी रखते हैं, मीन लग्न वाले व्यक्ति कभी भी समय फालतू में नष्ट नही करते अर्थात सदैव ही क्रियाशील रहते हैं कहने का आशय यह है कि मीन लग्न वाले व्यक्ति निरंतर कोई न कोई कार्य करते ही रहते हैं इनको खाली बैठकर समय बर्बाद करना नही पसंद होता है भले ही वह सचमुच में कार्य में व्यस्त न भी हो, अंग्रेजी भाषा में ऐसे जातकों के लिए एक कहावत है Busily Idle अर्थात बहुत समुचित होता है, मीन लग्न वाले व्यक्ति बहुत सी बातों को जानने वाले, हर बात की खबर रखने वाले, बहुत सी बातों में अंधविश्वासी, कीर्ति संपन्न, दक्ष, अल्पाहारी, चपल, धूर्त और धन समृद्धि वाले होते हैं, ऐसे व्यक्तियों को बचपन एवं युवावस्था के प्रारंभ में अनेक दुर्घटनाओं का सामना करना पड़ता है पर उनसे वह बच जाता है तथा इनके धन की हानि शत्रु द्वारा और पारस्परिक राग-द्वेष से होती है, मीन लग्न वाले व्यक्ति कहीं-कहीं पर साहसी तो कहीं-कहीं पर भीरु सिद्ध होते हैं, अनिश्चित विचार, दृढ़ संकल्प अथवा संकल्प विकल्प में पड़ कर बहुत सा अच्छा समय इनके हाथ से निकल जाता है, इन्हें संगीत, नाटक, चित्र, नृत्य तथा अन्य सुललित कलाओं में अभिरुचि और प्रेम होता है, मीन लग्न वाले व्यक्ति मेधावी, उत्तम स्मरण शक्ति वाले, बहुत सी कन्या वाले, स्त्री से प्रेम रखने वाले और प्रसिद्ध व कीर्तिशाली व्यक्ति से मित्रता रखने वाले होते हैं।

 

मीन लग्न की महिलाओं में उपरोक्त गुण के अतिरिक्त अन्य गुण जैसे रूपवती, सुंदर नेत्र व केश वाली, आज्ञाकारिणी, पति से अत्यधिक प्रेम रखने वाली, करुणामयी, पुत्र-पौत्रादि वाली तथा पूजा-पाठ में प्रेम रखने वाली होती है, मीन लग्न वाले व्यक्ति सदैव ही स्वास्थ्य के प्रति असावधान रहते हैं, इन्हें छूत-छात वाली बीमारी, पैर में ठंड लगने से कोई रोग आदि होने की संभावना रहती है, मादक तथा नशीली चीजों से इन्हें सख्त परहेज करना चाहिए, तनाव लेना इनके लिए हानिकारक होता है, मीन लग्न वालों की कुंडली में बृहस्पति और मंगल के संबंध बनने से राजयोग होता है, मंगल व चंद्रमा का संबंध भी उत्तम फल प्रदान करता है, बृहस्पति के साधारण फल होते हैं, मीन लग्न वालों के लिए शनि प्रवल मारक होता है उसके बाद शुक्र व मंगल मारक होते हैं किंतु मंगल स्वम् मारकेश नही होता, मीन लग्न वालों को शनि, सूर्य, शुक्र व बुध से शुभ फल नही मिलते किंतु यदि शनि द्वादश भाव में हो तो शुभ होता है, ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के मतानुसार कुंडली के तृतीय, षष्ठ व एकादश में भी शनि हो तो व्यक्ति बड़ा धनी बनता है किंतु प्रायः दुःखी ही रहता है और यदि चंद्रमा द्वादश में हो तो प्रायः मीन लग्न वालों को कन्या संतति अधिक होती है किंतु एक पुत्र प्राप्ति के भी योग रहते हैं (कुंडली में ग्रहों की भूमिका के आधार पर), यदि वृश्चिक का नवमांश हो तो व्यक्ति में प्राकृतिक गुणों का पूर्ण विकास होता है।

 

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कुंभ लग्न और आप: जानिए, कुंभ लग्न वालों का व्यक्तित्व

कुंभ लग्न और आप: जानिए, कुंभ लग्न वालों का व्यक्तित्व

 

कुंभ लग्न वालों का व्यक्तित्व
कुंभ लग्न वालों का व्यक्तित्व

 

कुंभ लग्न में जन्मे व्यक्तियों का शरीर तथा हिर्दय सुंदर होता है साथ है ऐसे व्यक्ति दयालु प्रकृति और परोपकार परायण होते हैं तथा दूसरों की भावना, विचार और मन की बातों को जानने के लिए सर्वदा यत्न करते हैं, दूसरों के दुःख को देखकर कुंभ लग्न वाले व्यक्ति रह नही पाते तथा दूसरों के दुःखो के निवारण हेतु उपाय में लगे रहते हैं तथा सुख व आनंद से जीवन व्यतीत करते हैं, कुंभ लग्न वाले व्यक्ति ईश्वर, धर्म तथा ज्ञान में अपनी रुचि रखते हैं और पाप व दुराचार से दूर रहना पसंद करते हैं, ऐसे व्यक्ति यशस्वी, धनी, मिलनसार, महान, सुगमता पूर्वक कार्य करने में निपुण, सर्व जन प्रिय, मित्रों से प्रीति रखने वाले और सबका मान-सम्मान करने वाले परंतु दंभी होते हैं साथ ही कुंभ लग्न वाले व्यक्ति अत्यंत कामी और कभी-कभी पर स्त्री गमन के इच्छुक होते हैं, बड़े लोगों से इनकी मित्रता रहती है और सभी लोगों में इनकी मान मर्यादा विशेष होती है, ठंडे जल का सेवन इन्हें अत्यधिक प्रिय होता है कुछ ग्रंथकारों में कुंभ लग्न को अच्छा नही माना है किंतु मेरा (ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली) यह मत व अनुभव है कि कुंभ लग्न वाले व्यक्ति अपने जीवन के अंतिम भाग में किसी न किसी रूप का अपयश तथा लांछन व बड़ी हानि प्राप्त करते हैं किंतु धनी, दयालु, धार्मिक, विद्वान, सज्जन, कभी-कभी दुर्जन लोगों से मित्रता रखने वाले, स्त्रियों के वशीभूत व स्त्रियों में प्रीति रखने वाले, एकाधिक प्रेम-प्रसंग करने वाले, कुछ कठोर, अपने सुख व लाभ को सर्वप्रथम देखने वाले, मित्रों से युक्त, जीवन के मध्य भाग में अच्छी सफलता प्राप्त करने वाले व माता के प्रिय होते हैं।

 

कुंभ लग्न वाले व्यक्ति यदि महिला हों तो उपरोक्त गुणों के अतिरिक्त पुत्रों की अपेक्षा पुत्रियों से अत्यधिक प्रेम करने वाली, आनंदमय जीवन तथा शुभ संगीत में जीवन व्यतीत करने वाली, अच्छे विचारों वाली, धार्मिका, जनों से प्रेम करने वाली और कृतज्ञा किंतु रुधिर रोगों से पीड़ित होती है, कुंभ लग्न वाले व्यक्तियों को प्रायः वात प्रकृति की समस्या व सिर दर्द, पेट दर्द, अपच, कोष्ट बद्धता तथा उदर जनित अनेक विकारों से ग्रसित ही रहते हैं, कुंभ लग्न वाले व्यक्तियों का रोग कुछ देर ही रहता है या फिर उनको एक ही रोग एकाधिक बार एक ही समय में हो जाता है या आजन्म रोग बना ही रहता है, इन्हें रुधिर का विशेष ध्यान रखना चाहिए तथा थोड़ा सा भी अस्वस्थ होने पर तुरंत औषधि लेनी चाहिए, स्वच्छ वायु, खुले स्थान का व्यायाम, सादा भोजन इनके लिए उत्तम रहता है, मानसिक व्यथा से बचना चाहिए तथा नेत्रों का पूर्ण सतर्कता से ध्यान रखना चाहिए क्योंकि कुंभ लग्न वालों को नेत्र में समस्या प्रायः बनी ही रहती है।

 

कुंभ लग्न वाले व्यक्तियों के लिए शुक्र अत्यधिक शुभ ग्रह व राजयोगकारक ग्रह होता है, मंगल भी इन्हें शुभ फल प्रदान करता है, कुंडली में मंगल व शुक्र का संबंध इनको उत्तम राजयोग तुल्य सुख प्रदान करता है, बुध व शनि साधारण फल देने वाले ग्रह होते है तथा बृहस्पति और चंद्रमा मारक ग्रह होते हैं किंतु बृहस्पति स्वम् मारक नही होता, यदि सूर्य और शुक्र लग्न में हो तथा राहु दशम भाव में हो तो व्यक्ति को बृहस्पति के अंदर राहु की अंतर्दशा में बेहद शुभ फल मिलते हैं तथा यदि सूर्य और बुध पंचम भाव में स्थित हो तो अच्छी उन्नति के योग बनाते हैं, मिथुन का नवमांश होने और व्यक्ति के प्राकृतिक गुणों का पूर्ण विकास होता है।

 

जय श्री राम।

 

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मकर लग्न और आप: जानिए, मकर लग्न वालों का व्यक्तित्व

मकर लग्न और आप: जानिए, मकर लग्न वालों का व्यक्तित्व

 

मकर लग्न वालों का व्यक्तित्व
मकर लग्न वालों का व्यक्तित्व

 

मकर लग्न काल पुरुष के क्रम स्थान की राशि का लग्न होता है जिसके स्वामी शनि होते हैं अतः मकर लग्न वाले व्यक्ति सदैव क्रियाशील रहते हैं कहने का आशय यह है ऐसे व्यक्ति एक जगह खाली नही बैठते, मकर लग्न वालों जा स्वभाव थोड़ा रूखा होता है साथ ही इनके शरीर का निचला अर्ध भाग कुछ दुबला होता है तथा इन्हें कफ प्रकृति की समस्याएं प्रायः बनी ही रहती है, मकर लग्न वाले व्यक्ति बड़े उत्साही, परिश्रमी, खुले तौर से अपने विचार व्यक्त करने वाले, मिजाज के शक्की, कुछ अहंकारी व कभी-कभी भयक्रांत हो जाने वाले, पुण्य कर्मों में सदैव तत्पर, ईश्वर के प्रति असीम आस्था और अपने आश्रितों से कार्य लेने वाले होते हैं, मकर लग्न के व्यक्ति प्रत्येक कार्य बड़ी सावधानी तथा विचार कर करते है, अपने मित्र मंडली में प्रमुख बने रहने की इच्छा रखने वाले व अपनी ख्याति हेतु सदैव प्रयत्नशील रहते हैं, मकर लग्न वाले पुरुष प्रायः स्त्री वर्ग से दुःखी ही रहते हैं तथा प्रायः दुःख भोगते हैं और किसी-किसी अवसर में दानशील भी होते हैं।

 

मकर लग्न की व्यक्ति यदि महिला हैं तो उपरोक्त गुणों के अतिरिक्त धार्मिक, सत्य प्रिया, विचारशीला, मितव्ययी, सुविख्यात, शत्रु रहिता तथा बहु पुत्रों वाली होती है, मकर लग्न वाले व्यक्तियों को चर्म रोग प्रायः दुःखी करता है तथा ठंडे पदार्थों के सेवन को सीमित मात्रा में करना चाहिए और अपने भोजन आदि व व्यायाम का सदैव ध्यान रखना चाहिए, मकर लग्न वालों के लिए शुक्र और बुध उत्तम फल देने वाले ग्रह होते हैं इनमे भी शुक्र विशेष शुभफलदाई होता है तथा राजयोगकारक ग्रह होने के कारण से राज योग तुल्य सुख प्रदान करता है, शुक्र और बुध का कुंडली में संबंध राजयोग समान फल देता है, बृहस्पति और चंद्रमा शुभ फल नही देते यह दोनों मारकेश भी होते हैं, शनि मारक ग्रह होकर भी मृत्यु नही देता, सूर्य भी मारक नही होता तथा सूर्य के साधारण फल मिलते हैं, यदि मकर लग्न वालों की कुंडली के लग्न में मंगल व सप्तम में चंद्र हो तो यह राजयोग होता है जिससे व्यक्ति अनेक प्रकार के सुखों को भोगता है परंतु यदि अष्टम भाव में बुध व लग्न में गुरु हो और उस पर शुक्र की दृष्टि न हो तो व्यक्ति का स्वास्थ्य तो अच्छा रहता है किंतु व्यक्ति स्वम् दरिद्र होता है, मकर का नवमांश रहने से व्यक्ति में प्राकृतिक गुणों का पूर्ण विकास होता है।

 

जय श्री राम।

 

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