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गंगा दशहरा 20 जून 2021 जानिए पौराणिक कथा, शुभ मुहर्त व पूजन विधि

गंगा दशहरा 20 जून 2021 जानिए पौराणिक कथा, शुभ मुहर्त व पूजन विधि

 

गंगा दशहरा 2021 जानिए पौराणिक कथा, शुभ मुहर्त व पूजन विधि
गंगा दशहरा 2021 जानिए पौराणिक कथा, शुभ मुहर्त व पूजन विधि

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि के दिन माँ गंगा का धरती पर अवतरण हुआ था जिस कारण से इस दिन को गंगा दशहरा के रूप में मनाया जाता है इस दिन भगवान शिव व विष्णु जी के साथ माँ गंगा की पूजा की जाती है, पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन गंगा नदी में स्नान कर भगवान शिव, विष्णु व माँ गंगा की पूजा करने करने से व्यक्तियोबक सभी पापों का नाश हो जाता है इस दिन गंगा स्नान के पश्चात दान करने का भी विधान है जिससे व्यक्तियों के सभी पाप धुल जाते हैं व व्यक्ति निर्मल हो जाता है।

 

माँ गंगा के धरती पर अवतरण की पैराणिक कथा:-

 

गंगा दशहरा से जुड़ी पौराणिक कथा
गंगा दशहरा से जुड़ी पौराणिक कथा

 

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ऋषि भागीरथ ने अपने पूर्वजों की मुक्ति (जीवन चक्र से मुक्ति) हेतु माँ गंगा की घंघोर तपस्या की थी जिससे प्रसन्न होकर माँ गंगा ने धरती पर अवतरण का उन्हें वरदान तो दिया था किंतु उनके मन में यह शंका थी कि उनके प्रचंड वेग से धरती व धरती पर रहने वाले ऋषि, मुनि, मनुष्य, जीव, पेड़-पौधे सभी को हानि होगी जिससे सब असमय ही काल के मुख में समा जाएंगे इसलिए माँ गंगा ने भागीरथ को शिव जी की तपस्या करने व् उनसे अपने अवतार में सहयोग करने को कहा था जिसके बाद पुनः ऋषि भागीरथ ने शिव जी की तपस्या की थी और शिव जी ने ऋषि भागीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर माँ गंगा को अपनी जटाओ में समाहित कर एक निश्चित वेग से उनको धरती पर अवतरण में सहयोग किया था, धर्म शास्त्रों के अनुसार उस दिन ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि थी जिस कारण से प्रत्येक वर्ष ज्येष्ठ शुक्ल दशमी तिथि को गंगा दशहरा मनाया जाता है।

 

गंगा दशहरा शुभ मुहर्त:-

 

गंगा दशहरा शुभ मुहर्त
गंगा दशहरा शुभ मुहर्त

 

“ऋषिकेश पंचांग (काशी) अनुसार” १९ जून को दिन के ०२:१० से आरंभ होकर २० जून को दिन के १२:०२ तक रहेगी साथ ही २० जून को चित्रा नक्षत्र दिन के ०३:२७ तक व परिघ योग सायं ०६:२० तक रहेगा अतः गंगा दशहरा पूजन शुभ मुहर्त दिन में ०९:२३ से ११:३६ तक स्थिर लग्न सिंह में करना शुभ रहेगा धर्म शास्त्रों के अनुसार माँ गंगा का अवतरण वृषभ लग्न में हुआ था जो की मध्य रात्रि ०२:५२ से ०४:४८ तक रहेगा अतः इस समय काल में भी पूजन किया जाना शुभ रहेगा।

 

गंगा दशहरा पूजन विधि:-

 

गंगा दशहरा पूजन विधि
गंगा दशहरा पूजन विधि

 

प्रातःकाल नित्य क्रिया से निवृत्त होकर गंगा नदी में श्रद्धा पूर्वक स्नान करना चाहिए (यदि आपके शहर में गंगा नदी न बहती हो तो किसी भी नदी में स्नान कर सकते हैं और यदि आपके पास गंगा जल हो तो उसे आप नहाने के पानी में मिलाकर स्नान कर सकते हैं) तत्पश्चात शिव जी व् विष्णु जी की पंचोपचार पूजन करना चाहिए व माँ गंगा की स्तुति करनी चाहिए और पूजन पश्चात् किसी भी गरीब को श्रद्धानुसार वस्त्र, काली उर्द, चावल, आटा, घी व मिष्ठान इत्यादि कुछ दक्षिणा के साथ दान करना चाहिए।

 

गंगा दशहरा के दिन करें इन दो मंत्रों का जाप:-

 

।।ॐ नम: शिवायै नारायण्यै दशहरायै गंगायै नम:।।

 

।।ॐ नमो भगवते ऐं ह्रीं श्रीं हिलि हिलि मिलि मिलि गंगे मां पावय पावय स्वाहा।।

 

गंगा दशहरा की हार्दिक शुभकामनाएं
गंगा दशहरा की हार्दिक शुभकामनाएं

 

जय श्री राम।

 

Astrologer:- Pooshark Jetly

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Mobile:- 9919367470, 7007245896

Email:- pooshark@astrologysutras.com

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कर्क लग्न कुंडली के प्रथम, द्वितीय व तृतीय भाव में सूर्य का फल

कर्क लग्न कुंडली के प्रथम, द्वितीय व तृतीय भाव में सूर्य का फल

 

कर्क लग्न कुंडली के प्रथम, द्वितीय व तृतीय भाव में सूर्य का फल
कर्क लग्न कुंडली के प्रथम, द्वितीय व तृतीय भाव में सूर्य का फल

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी द्वारा लिखित यह ग्रह फल उनके स्वम् के अनुभव पर आधारित है यहाँ सिर्फ एक ही ग्रह के विभिन्न भावों में फल को बताया गया है अतः अन्य किसी ग्रह के युति व दृष्टि संबंध बनाने या नीचभंग राजयोग बनने से बताए गए फलों में कुछ बदलाव संभव रहेगा।

 

कर्क लग्न कुंडली के प्रथम भाव में सूर्य का फल:-

 

कर्क लग्न कुंडली के प्रथम भाव में सूर्य का फल
कर्क लग्न कुंडली के प्रथम भाव में सूर्य का फल

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार सूर्य के प्रथम भाव अर्थात लग्न (देह स्थान) पर अपने मित्र चंद्र के स्वामित्व वाली कर्क राशि में स्थित होने के कारण से जातक/जातिका को दैहिक परिश्रम द्वारा धन संचय के मार्ग में बड़ी सफलता प्राप्त होगी तथा देह में तेज प्रभाव होगा साथ ही जातक/जातिका दूसरों की दृष्टि में धनवान और इज्जतदार समझे जाएंगे किंतु कुटुंब के कारणों से देह में कुछ घिराव और परेशानी अनुभव होगी तथा सातवीं दृष्टि से सूर्य के सप्तम भाव स्त्री व रोजगार स्थान को अपने शत्रु शनि की मकर राशि में देखने के कारण से जातक/जातिका को स्त्री पक्ष में कुछ झंझट और नीरसता प्राप्त होगी और रोजगार के मार्ग में कुछ परेशानी के साथ धन लाभ होगा।

 

कर्क लग्न कुंडली के द्वितीय भाव में सूर्य का फल:-

 

कर्क लग्न कुंडली के द्वितीय भाव में सूर्य का फल
कर्क लग्न कुंडली के द्वितीय भाव में सूर्य का फल

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार सूर्य के द्वितीय भाव धन व कुटुंब स्थान पर अपने स्वम् की स्वामित्व वाली सिंह राशि में स्थित होने के कारण से जातक/जातिका को धन के कारणों से समाज में प्रभाव व प्रतिष्ठा प्राप्त होगी तथा कुटुंब का पूर्ण सहयोग प्राप्त होगा किंतु जातक/जातिका को धन-जन की स्थिति में कोमलता की कमी अनुभव होगी साथ ही सूर्य के सप्तम दृष्टि से अष्टम भाव आयु-मृत्यु व पुरातत्व स्थान को शत्रु शनि की कुंभ राशि में देखने के कारण से जातक/जातिका को धन-जन की रक्षा और वृद्धि करने के कारणों से जीवन की दिनचर्या में कुछ अशांति अनुभव होगी और पुरातत्व शक्ति के लाभ स्थान में कुछ नीरसता अनुभव होगी किंतु जातक/जातिका धन वृद्धि हेतु सदैव प्रयत्नशील रहेंगे।

 

कर्क लग्न कुंडली के तृतीय भाव में सूर्य का फल:-

 

कर्क लग्न कुंडली के तृतीय भाव में सूर्य का फल
कर्क लग्न कुंडली के तृतीय भाव में सूर्य का फल

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार सूर्य के तृतीय भाव भाई-बहन व पराक्रम स्थान पर मित्र बुध के स्वामित्व वाली कन्या राशि में स्थित होने के कारण से जातक/जातिका को भाई-बहन के सुख-संबंधों में कुछ कमी अनुभव होगी किंतु फिर भी अनेक अवसरों पर भाई-बहन का सहयोग प्राप्त होगा साथ ही जातक/जातिका धन के कारणों से बड़ी हिम्मत व पराक्रम द्वारा समाज में प्रभाव और मान-प्रतिष्ठा प्राप्त करेंगे तथा धन वृद्धि हेतु सदैव प्रयत्नशील रहेंगे और सातवीं दृष्टि से सूर्य के नवम भाव भाग्य व धर्म स्थान को मित्र गुरु के स्वामित्व वाली मीन राशि में देखने के कारण से जातक/जातिका पराक्रम शक्ति के द्वारा भाग्य व धन की वृद्धि करने में सफल रहेंगे तथा धर्म का पालन करेंगे और भाग्य की शक्ति के द्वारा समाज में मान-प्रतिष्ठा, प्रभाव और यश प्राप्त करेंगे तथा भाग्य और पुरुषार्थ दोनो पर विश्वास रखेंगे।

 

जय श्री राम।

 

Astrologer:- Pooshark Jetly

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प्रेत बाधा निवारण के संबंध में अचूक अनुष्ठान

बहुत से व्यक्ति मेरे पास आते हैं कि उनके परिवार जन किसी भूत-प्रेत बाधा के प्रभाव में हैं जिससे उनकी बहुत ही दयनीय स्थिति हो गयी है और बहुत से तांत्रिक व अनेक विद्वानों के पास जाने से भी कोई राहत नही मिलती अतः उन सभी प्रेरणा व अपने आराध्य श्री हनुमान जी की कृपा से आज मैं कुछ ऐसे अचूक उपाय व अनुष्ठान बता रहा हूँ जिसको पूर्ण श्रद्धा से करने से भूत-प्रेत-पिशाच बाधा से तत्काल मुक्ति मिल जाती है तो चलिए जानते हैं उन उपायों के बारे में:-

 

प्रनवउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यानघन।
जासु हिर्दय आगार बसहिं राम सर चाप धर।।

 

प्रतिदिन ११ माला के हिसाब से ४९ दिवस तक इसका जप करना चाहिए साथ ही श्री हनुमान जी की मूर्ति या चित्र के सामने बैठकर पंचोपचार से उनकी पूजा कर के कम से कम ७ शनिवार तक प्रत्येक शनिवार को हनुमान चालीसा का १०८ बार पाठ करना चाहिए।

 

६४ यंत्र
६४ यंत्र

 

इस ६४ यंत्र को भोजपत्र पर लाल चंदन जिसे रक्त चंदन भी कहते हैं से लिखकर उसे मँढ़वा कर सभी कमरों में टाँग देना चाहिए व प्रेत की सद्गति हेतु भागवत का सप्ताह अनुष्ठान के रूप में एक पाठ और श्री विष्णु सहस्रनाम के १०८ पाठ कराने चाहिए।

 

जय श्री राम।

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श्री हनुमान जयंती विशेष: जानिए हनुमान जी की कृपा प्राप्ति के लिए पूजा कब करनी चाहिए

सर्वसाधारण और अधिकतर महात्माओं के मुखारविन्द से सुनने में आता है कि “सवा पहर दिन चढ़ जाने के पहले श्री हनुमान जी का नाम-जप तथा हनुमान चालीसा का पाठ नही करना चाहिए” क्या यह बात यथार्थ है?? इसमें कितनी सच्चाई है?? चलिए इस विषय पर मैंने अपने गुरु से जो सीखा व जाना वह आप सभी के समक्ष रखता हूँ:-

 

सर्वप्रथम तो मैं अपने आराध्य श्री हनुमान जी के चरण कमलों में नमन करता हूँ कि उन्होंने मुझ जैसे तुच्छ दास को इस योग्य समझा कि मैं इस विषय पर लोगों की शंका का समाधान कर सकूँ, आज तक इस दास को न तो किसी ग्रंथ में ऐसा कहीं प्रमाण मिला है कि उपासक को किसी उपास्य देव के स्तोत्रों का पाठ या उनके नाम का जप आदि प्रातः काल सवा पहर तक न कर के उसके बाद करना चाहिए अपितु प्रत्येक ग्रंथ पर इसी बात का प्रमाण मिलता है कि सदा और निरंतर तैल धारावत् अजस्त्र, अखंड भजन-स्मरण करना चाहिए यथा:-

 

कवित्तरामायण
रसना निसि बासर राम रटौ!
सदा राम जपु राम जपु।
जपहि नाम रघुनाथ को चर्चा दूसरी न चालू।
तुलसी तू मेरे कहे रट राम नाम दिन-रात्रि।

 

इसी प्रकार श्री हनुमान जी के संबंध में भी सदा-सर्वदा भजन करने का ही प्रमाण मिलता है यथा:-

 

मर्कटाधीस मृगराज बिक्रम महादेव मुद मंगलालय कपाली।
सिद्ध सुर बृंद जोगीन्द्र सेवित सदा, दास तुलसी प्रनत भय तमारी।।

 

पुनः—-

 

मंगलागार संसारभारापहर बानराकारबिग्रह पुरारी।
राम संभ्राज सोभा सहित सर्बदा, तुलसी मानस रामपुर बिहारी।।

 

कदाचित् किसी को श्री हनुमान जी के इस वचन का ध्यान आ गया हो:-

 

प्रात जो लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिले अहारा।।

 

परंतु कुछ अज्ञानी लोगों ने इसका गलत भावार्थ निकाल दिया जब कि यहाँ “हमारा” शब्द का संबंध ऊपर की चौपाई के “कपिकुल” अर्थात वानर योनि से है, न कि अपने शरीर (श्री हनुमान विग्रह) से वहाँ हनुमान जी कहते हैं:-

 

कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना।

 

अर्थात् विभीषण जी! आप अपने आपको राक्षस कुल का मानकर भय मत करें बताइए मैं ही कौन से बड़े श्रेष्ठ कुल का हूँ, वानर योनि तो चंचल और पशु होने से प्रत्येक प्रकार से हीन है हमारे कुल (वानर) का अगर कोई प्रातः काल नाम ले ले तो उस दिन उसे आहार का ही योग नही लगता:–

 

अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।
किन्हीं कृपा सुमिरि गुन भरे विलोचन नीर।।

 

अर्थात:- ऐसे अधम कुल में मैं हूँ किंतु सखा! सुनिए, मुझ पर श्री राम जी ने कृपा की है इस विरद को स्मरण कर कहते-कहते श्री हनुमान जी के नेत्रों से आँसू भर आए अतः “हमारा” शब्द का भाव यह है कि कुल तो हमारा ऐसा नीच है कि “वानर” शब्द का ही प्रातः मुँह से निकलना अच्छा नही माना जाता परंतु उसी योनि में उत्पन्न मैं जब प्रभु का कृपा पात्र बना लिया गया तब तो—

 

राम कीन्ह आपन जब हीं तें, भयउँ भूषण तबही तें।।

 

मेरे हनुमान, महाबीर, बजरंगी, पवनकुमार आदि नाम प्रातः स्मरणीय हो गए इसका प्रमाण कुछ इस प्रकार से है—

 

अशुभ होई जिन्ह के सुमिरन तें बाहर रीछ बिकारी।
बेद बिदित पावन किए ते सब महिमा नाथ तिहारी।।

 

अतएव श्री रामायण जी के उपर्युक्त पदों से श्री हनुमान जीका नाम प्रातः काल जपने का निषेध कदापि सिद्ध नही होता, उसका तात्पर्य “वानर” शब्द से ही है जो कुल की न्यूनता का घोतक है, स्वम् श्री हनुमान जी की न्यूनता का नहीं, कहीं-कहीं लोग ऐसा तर्क करते हैं कि श्री हनुमान जी रात्रि में जगने के कारण से प्रातः निद्रा मग्न रहते हैं, इसलिए सवा पहर वर्जित है, सो न तो इसका भी कोई प्रमाण इस तुच्छ दास को मिला है और न ही यह बात उचित मालूम होती है कि योगिराज, ज्ञानियों में अग्रगण्य श्री हनुमान जी प्रहर भर दिन चढ़ने तक निद्रा मग्न रहते हैं अथवा उनका अमित दिव्य विग्रह और अमोघ शक्ति वपु एक रूप से सेवा में तत्पर रहते हुए दूसरे अनेक रूपों से अपने भक्तों की सेवा स्वीकार करने में असमर्थ रहता है, जहाँ प्रेमपूर्वक श्री राम नाम का जप और श्री रामायण का पाठ होता है, वहाँ तो श्री मारुति जी सदा ही विद्यमान रहते हैं चाहे वह प्रातः काल हो या अन्य कोई काल हो, फिर इस झगड़े में पड़कर तो श्री हनुमान जी के आराम-विश्राम के लिए सवा प्रहर भगवद्भजन भी छोड़ना पड़ेगा, जिसका छूटना ही उनकी दृष्टि में विपत्तिजनक है—

 

कह हनुमान बिपति प्रभु सोई। जब तब सुमिरन भजन न होई।।

 

अतएव इस दीन तुच्छ दास के तुच्छ विचार से तो सवा प्रहर क्या, एक क्षण भी भाग्यवानों को श्री हनुमत् नाम-भजन और पाठ आदि से विमुख नही रहना चाहिए, प्रातः काल का समय तो भजन के लिए ही है, रुद्रांश श्री हनुमान जी सदा और सब काल में वंदनीय हैं।

श्री हनुमान जयंती विशेष जानिए हनुमान जी की कृपा प्राप्ति के लिए पूजा कब करनी चाहिए

 

।।ॐ सर्वदुःखहराय
विद्यमहे सर्वाभीष्टप्रदाय
धी मही तन्नो हनुमत् प्रचोदयात।।

 

जय श्री राम।
जय सिया राम।
जय केसरी नंदन।

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मिथुन लग्न कुंडली के दशम, एकादश व द्वादश भाव में सूर्य का फल

मिथुन लग्न कुंडली के दशम, एकादश व द्वादश भाव में सूर्य का फल

 

मिथुन लग्न कुंडली के दशम, एकादश व द्वादश भाव में सूर्य का फल
मिथुन लग्न कुंडली के दशम, एकादश व द्वादश भाव में सूर्य का फल

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी द्वारा लिखित यह ग्रहे फल उनके स्वम् के अनुभव पर आधारित है यहाँ सिर्फ एक ही ग्रह के विभिन्न भावों में फल को बताया गया है अतः अन्य किसी ग्रह के युति व दृष्टि संबंध बनाने या नीचभंग राजयोग बनने से बताए गए फलों में कुछ बदलाव संभव रहेगा।

 

मिथुन लग्न कुंडली के दशम भाव में सूर्य का फल:-

 

मिथुन लग्न कुंडली के दशम भाव में सूर्य का फल
मिथुन लग्न कुंडली के दशम भाव में सूर्य का फल

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार सूर्य के दशम भाव पिता व राज्य स्थान पर अपने मित्र गुरु के स्वामित्व वाली मीन राशि में स्थित होने के कारण से जातक/जातिका को पिता का पूर्ण सहयोग प्राप्त होगा और राज-समाज में अच्छा मान-सम्मान प्राप्त होगा तथा कारोबार के क्षेत्र में जातक/जातिका को बड़ी सफलता प्राप्त होगी और भाई-बहन का उत्तम सुख व सहयोग प्राप्त होगा साथ ही सूर्य के सातवीं दृष्टि से चतुर्थ भाव माता व भूमि स्थान को मित्र बुध के स्वामित्व वाली कन्या राशि में देखने के कारण से जातक/जातिका अपनी पराक्रम शक्ति द्वारा सुख के साधनों की वृद्धि करने में सफल रहेंगे और अपने पुरुषार्थ द्वारा बड़ी भारी सफलता प्राप्त करेंगे तथा माता का उत्तम सुख व सहयोग प्राप्त करेंगे।

 

मिथुन लग्न कुंडली के एकादश भाव में सूर्य का फल:-

 

मिथुन लग्न कुंडली के एकादश भाव में सूर्य का फल
मिथुन लग्न कुंडली के एकादश भाव में सूर्य का फल

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार सूर्य के एकादश भाव लाभ स्थान पर अपनी उच्च राशि व मित्र मंगल के स्वामित्व वाली मेष राशि में स्थित होने के कारण से जातक/जातिका अपने पराक्रम द्वारा जीवन में बड़ी भारी उन्नति प्राप्त करेंगे तथा आमदनी की वृद्धि हेतु सदैव प्रयत्नशील रहेंगे और भाई-बहन का उत्तम सुख प्राप्त करेंगे तथा इन सभी कारणों से मन में उत्साह बना रहेगा और सूर्य के सातवीं दृष्टि से पंचम भाव विद्या व संतान स्थान को अपनी नीच राशि व शत्रु शुक्र के स्वामित्व वाली तुला राशि में देखने के कारण से संतान पक्ष से कुछ कष्ट अनुभव होगा और कुछ बाधाओं व कठिन परिस्थितियों से होते हुए शिक्षा पूर्ण होगी साथ ही लाभ के दृष्टिकोण से जातक/जातिका वाणी में कुछ रूखेपन से काम निकालेंगे तथा अत्यंत साहसी होंगे।

 

मिथुन लग्न कुंडली के द्वादश भाव में सूर्य का फल:-

 

मिथुन लग्न कुंडली के द्वादश भाव में सूर्य का फल
मिथुन लग्न कुंडली के द्वादश भाव में सूर्य का फल

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार सूर्य के द्वादश भाव खर्च व बाहरी स्थान पर सूर्य के अपने शत्रु शुक्र के स्वामित्व वाली वृषभ राशि में स्थित होने के कारण से जातक/जातिका को भाई-बहन के सुख-संबंधों में कुछ हानि व कमजोरी प्राप्त होगी और खर्चे की अधिकता के कारण से मन व्यथित रहेगा तथा पराक्रम में कुछ बंधन सा अनुभव होगा किंतु जन्म स्थान व पितृ स्थान से दूर परिश्रम से बड़ी भारी सफलता प्राप्त होगी फिर भी खर्च के वेग को जातक/जातिका रोक नही सकेंगे और सातवीं दृष्टि से सूर्य के षष्ठ भाव रोग व शत्रु स्थान को मित्र मंगल के स्वामित्व वाली वृश्चिक राशि में देखने के कारण से जातक/जातिका शत्रु पक्ष में प्रभाव और मिठास की शक्ति से काम लेंगे किंतु अपने अंदर की कमजोरी को छिपाकर बड़ी हिम्मत व परिश्रम से शत्रुओं पर विजय प्राप्त करेंगे फिर भी उत्साह में कुछ कमी अनुभव होगी।

 

जय श्री राम।

 

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मिथुन लग्न कुंडली के सप्तम, अष्टम व नवम भाव में सूर्य का फल

मिथुन लग्न कुंडली के सप्तम, अष्टम व नवम भाव में सूर्य का फल

 

मिथुन लग्न कुंडली के सप्तम, अष्टम व नवम भाव मे सूर्य का फल
मिथुन लग्न कुंडली के सप्तम, अष्टम व नवम भाव मे सूर्य का फल

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी द्वारा लिखित यह ग्रह फल उनके स्वम् के अनुभव पर आधारित है यहाँ सिर्फ एक ही ग्रह के विभिन्न भावों में फल को बताया गया है अतः अन्य किसी ग्रह के युति व दृष्टि संबंध बनाने या नीचभंग राजयोग बनने से बताए गए फलों में कुछ बदलाव संभव रहेगा।

 

मिथुन लग्न कुंडली के सप्तम भाव में सूर्य का फल:-

 

मिथुन लग्न कुंडली के सप्तम भाव में सूर्य का फल
मिथुन लग्न कुंडली के सप्तम भाव में सूर्य का फल

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार सूर्य के सप्तम भाव स्त्री व रोजगार स्थान पर अपने मित्र गुरु के स्वामित्व वाली धनु राशि में स्थित होने के कारण से जातक/जातिका तेजस्वी कर्म की शक्ति के द्वारा गृहस्थ सुख को प्राप्त करेंगे तथा रोजगार के मार्ग में कठिन परिश्रम से बड़ी सफलता प्राप्त करेंगे साथ ही भाई-बहन का भी उत्तम सुख प्राप्त करेंगे और सूर्य के सातवीं दृष्टि से प्रथम भाव अर्थात लग्न (देह स्थान) को अपने मित्र बुध के स्वामित्व वाली मिथुन राशि में देखने के कारण से जातक/जातिका के जीवनसाथी के स्वभाव में कुछ तेजी और गर्मी रहेगी और भोगादिक पक्ष में शक्ति प्राप्त करेंगे तथा उन्नति हेतु सदैव प्रयत्नशील रहेंगे और समाज में अच्छा मान-सम्मान व प्रभाव प्राप्त करेंगे।

 

मिथुन लग्न कुंडली के अष्टम भाव में सूर्य का फल:-

 

मिथुन लग्न कुंडली के अष्टम भाव में सूर्य का फल
मिथुन लग्न कुंडली के अष्टम भाव में सूर्य का फल

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार सूर्य के अष्टम भाव आयु-मृत्यु व पुरातत्व स्थान पर सूर्य के अपने शत्रु शनि के स्वामित्व वाली मकर राशि में स्थित होने के कारण से जातक/जातिका को भाई-बहन के सुख-संबंधों में कुछ हानि व कमी अनुभव होगी और पुरुषार्थ कर्म के मार्ग में असफलता व कमजोरी प्राप्त होगी तथा कठिन परिश्रम करने के कारण से जीवन में अशांति अनुभव होगी और अपने बाहुबल के कार्यों में निराशाओं के कारण से कभी-कभी जातक/जातिका हिम्मत हार जाएंगे और पुरातत्व संबंध की कुछ नीरसता युक्त शक्ति प्राप्त होगी साथ ही सूर्य के द्वितीय भाव धन व कुटुंब स्थान को मित्र चंद्र के स्वामित्व वाली कर्क राशि मे देखने के कारण से जातक/जातिका धन की वृद्धि करने के लिए थकान पाने वाले परिश्रम से सफलता प्राप्त करेंगे और उत्साह हीन कुटुंब का सुख प्राप्त करेंगे।

 

मिथुन लग्न कुंडली के नवम भाव में सूर्य का फल:-

 

मिथुन लग्न कुंडली के नवम भाव में सूर्य का फल
मिथुन लग्न कुंडली के नवम भाव में सूर्य का फल

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार सूर्य के नवम भाव भाग्य व धर्म स्थान पर अपने शत्रु शनि के स्वामित्व वाली कुंभ राशि में देखने के कारण से जातक/जातिका को भाई-बहन का कुछ अरुचिकर सहयोग प्राप्त होगा और जातक/जातिका अपने पुरुषार्थ द्वारा भाग्य की वृद्धि करने में सफल रहेंगे और कुछ भेद भावना रखते हुए धर्म का पालन करेंगे एवं सूर्य के सातवीं दृष्टि से तृतीय भाव भाई-बहन व पराक्रम स्थान को अपने स्वम् के स्वामित्व वाली सिंह राशि में देखने के कारण से भाग्य की कुछ अरुचिकर सहयोग शक्ति से पराक्रम द्वारा सफलता प्राप्त होगी तथा जातक/जातिका हिम्मत से काम लेंगे और पुरुषार्थ पर भाग्य की अपेक्षा अधिक विश्वास रखेंगे साथ ही भाई-बहन का कुछ सहयोग प्राप्त करेंगे तथा कुछ तेजस्वी कर्म द्वारा उन्नति प्राप्त करेंगे।

 

जय श्री राम।

 

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मिथुन लग्न कुंडली के चतुर्थ, पंचम व षष्ठ भाव में सूर्य का फल

मिथुन लग्न कुंडली के चतुर्थ, पंचम व षष्ठ भाव में सूर्य का फल

 

मिथुन लग्न कुंडली के चतुर्थ, पंचम व षष्ठ भाव में सूर्य का फल
मिथुन लग्न कुंडली के चतुर्थ, पंचम व षष्ठ भाव में सूर्य का फल

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी द्वारा लिखित यह ग्रह फल उनके स्वम् के अनुभव पर आधारित है यहाँ सिर्फ एक ही ग्रह के विभिन्न भावों में फल को बताया गया है अतः अन्य किसी ग्रह के युति व दृष्टि संबंध बनाने या नीचभंग राजयोग बनने से बताए गए फलों में कुछ बदलाव संभव रहेगा।

 

मिथुन लग्न कुंडली के चतुर्थ भाव में सूर्य का फल:-

 

मिथुन लग्न कुंडली के चतुर्थ भाव में सूर्य का फल
मिथुन लग्न कुंडली के चतुर्थ भाव में सूर्य का फल

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार सूर्य के चतुर्थ भाव माता व भूमि स्थान पर सूर्य के अपने मित्र बुध के स्वामित्व वाली कन्या राशि में स्थित होने के कारण से जातक/जातिका पराक्रम शक्ति के द्वारा घरेलू सुख के साधनों में वृद्धि करने में सफल रहेंगे और भाई-बहन का सुख व सहयोग प्राप्त करेंगे और माता का पूर्ण सहयोग प्राप्त करेंगे साथ ही भूमि व मकानादि का भी उत्तम सुख प्राप्त होगा और सूर्य के सातवीं दृष्टि से दशम भाव पिता व राज्य स्थान को अपने मित्र गुरु के स्वामित्व वाली मीन राशि में देखने के कारण से जातक/जातिका पराक्रम शक्ति द्वारा पिता-स्थान में सफलता प्राप्त करेंगे और राज-समाज में मान-प्रतिष्ठा प्राप्त करेंगे तथा कारोबार के मार्ग में बड़ी सफ़लता प्राप्त करेंगे और सुख पूर्वक पराक्रम शक्ति द्वारा अर्थात परिश्रम से उन्नति प्राप्त करेंगे।

 

मिथुन लग्न कुंडली के पंचम भाव में सूर्य का फल:-

 

मिथुन लग्न कुंडली के पंचम भाव में सूर्य का फल
मिथुन लग्न कुंडली के पंचम भाव में सूर्य का फल

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार सूर्य के पंचम भाव विद्या व संतान स्थान पर अपनी नीच राशि व शत्रु शुक्र के स्वामित्व वाली तुला राशि में स्थित होने के कारण से जातक/जातिका को संतान पक्ष में कुछ कष्ट अनुभव होगा और कठिन परिस्थितियों से होते हुए शिक्षा पूर्ण होगी तथा बाहुबल की पराक्रम शक्ति में कुछ कमजोरी अनुभव होगी साथ ही जातक/जातिका बोल-चाल में कुछ छिपाव शक्ति से काम लेंगे और सूर्य के सातवीं दृष्टि से एकादश भाव लाभ स्थान को सूर्य के अपने उच्च राशि व मित्र मंगल के स्वामित्व वाली मेष राशि में देखने के कारण से जातक/जातिका बुद्धि और बाहुबल की शक्ति से धन वृद्धि करने में विशेष रूप से सफल होंगे साथ ही धन वृद्धि हेतु कुछ झूठ और छिपाव शक्ति से काम लेंगे क्योंकि बुद्धि स्थान पर सूर्य नीच राशि में स्थित होकर लाभ भाव को उच्च भावना से देख रहा है, इसलिए लाभ के मुकाबले में जातक/जातिका लाभ के मुकाबले में शब्द शक्ति के सत्य-असत्य की परवाह नही करेंगे और अच्छा धन लाभ प्राप्त करेंगे।

 

मिथुन लग्न कुंडली के षष्ठ भाव में सूर्य का फल:-

 

मिथुन लग्न कुंडली के षष्ठ भाव में सूर्य का फल
मिथुन लग्न कुंडली के षष्ठ भाव में सूर्य का फल

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार सूर्य के षष्ठ भाव रोग व शत्रु स्थान पर सूर्य के अपने मित्र मंगल के स्वामित्व वाली वृश्चिक राशि में बैठा होने के कारण से पराक्रम शक्ति द्वारा जातक/जातिका को शत्रुओं पर विजय प्राप्त होगी तथा विपक्षियों के सामने जातक/जातिका सदैव ही विजय प्राप्त करेंगे और प्रतियोगी परीक्षाओं को अपने पराक्रम द्वारा बड़ी ही सहजता से उत्तीर्ण करने में सफल रहेंगे किंतु भाई-बहन के सुख-संबंधों में कुछ वैमन्यस्ता प्राप्त करेंगे और सातवीं दृष्टि से सूर्य के द्वादश भाव अर्थात खर्च व बाहरी स्थान को अपने शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देखने के कारण से जातक/जातिका को खर्च के मार्ग में कुछ असंतोष रहेगा तथा बाहरी स्थानों में कुछ नीरसता प्राप्त होगी किंतु जातक/जातिका खर्च के मार्ग में शक्ति प्राप्त करने के लिए अत्यधिक कठिन परिश्रम करेंगे और खर्च हेतु धन की व्यवस्था करने में सफल रहेंगे।

 

जय श्री राम।

 

Astrologer:- Pooshark Jetly

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परिवार से सम्मान मिलेगा या अपमान–Astrology Sutras

परिवार से सम्मान मिलेगा या अपमान–Astrology Sutras

 

परिवार से सम्मान मिलेगा या अपमान
परिवार से सम्मान मिलेगा या अपमान

 

भाग:-१

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार कुंडली का चतुर्थ भाव व्यक्ति की मानसिक स्थिति, सोच व पारिवारिक सुख को दर्शाता है और यदि चतुर्थेश पीड़ित होकर सप्तम भाव को देखता है तो माता के कारण से दाम्पत्य जीवन में कलहपूर्ण स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं ग्रंथकारों का मत है कि:-

 

बंधुद्वेषी भवेन्नित्यं पापाक्रांते ग्रहे यदा।
नीचास्तखेतसंयुक्ते शुभदृग्योगवर्जिते।।

 

अर्थात:- यदि चतुर्थेश पाप ग्रहों से पीड़ित हो या नीच राशि का हो या शत्रु राशि का हो या अस्त ग्रहों से युत हो और शुभ ग्रहों से दृष्ट या युत न हो तो व्यक्ति अपने जाति से द्वेष करता है।

 

चलिए इसको एक उदाहरण कुंडली से समझने का प्रयास करते हैं:-

 

उदाहरण कुंडली:-१
उदाहरण कुंडली:-१

 

इस कुंडली में उपरोक्त श्लोक के अनुसार चतुर्थेश सूर्य षष्ठ भाव में अपनी नीच राशि तुला में राहु व लग्नेश शुक्र से युत है यद्यपि यहाँ सूर्य का नीचभंग हो रहा है फिर भी सूर्य के अपने नीच राशि में स्थित होने के कारण से व मनोस्थिति के ग्रह सूर्य का षष्ठ भाव में जाना यह दर्शाता है कि व्यक्ति में द्वेष भावना अत्यधिक बली रहेगी और व्यक्ति प्रायः परेशान रहेंगे और इन्हें परिवार वालों के साथ तालमेल बैठाने में दिक्कतें आएंगी साथ ही लग्नेश का भी षष्ठ भाव में जाना भी इसी चीज को और बली करता है जिस कारण से व्यक्ति का स्वभाव भी लोगों से द्वेष करने वाला रहेगा और राहु से इन दोनों ग्रह (सूर्य व शुक्र) की युति होने के कारण से भ्रामक स्थितियों के कारण से व्यक्ति अपने परिवार से द्वेष करेगा और चिंतित रहेगा, अब यदि यहाँ बात इनके दाम्पत्य जीवन की करी जाए तो सप्तमेश मंगल सप्तम भाव में स्वराशि का चंद्र व गुरु से युत और शनि से दृष्ट है अतः इनके दामपत्य जीवन में भी कलहपूर्ण स्थितियाँ उत्पन्न होंगी किंतु विवाह नही टूटेगा और जन्म स्थान से दूर जाकर व्यक्ति को बड़ी भारी सफलता प्राप्त होगी।

 

इसके अतिरिक्त अन्य ग्रंथकार का मत है कि:-

 

बहुपापसमायुक्ते बन्धौ नाथे तथैव हि।
तत्कारके तथैवात्र बंधूनां कुत्सितं वदेत्।

 

अर्थात:- यदि चतुर्थ भाव में बहुत से पाप ग्रह बैठे हों तथा चतुर्थेश और चतुर्थ का कारक भी पापयुक्त या पाप ग्रहों द्वारा दृष्ट हो तो इस योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति अपने बंधुओं से सम्मानित नही होता; वह नीच, तुच्छ तथा कुत्सित समझा जाता है।

 

चलिए इसको भी एक उदाहरण कुंडली से समझने का प्रयास करते हैं:-

 

उदाहरण कुंडली:-२
उदाहरण कुंडली:-२

 

इस कुंडली में उपरोक्त श्लोक के अनुसार चतुर्थ भाव में दो पाप ग्रह सूर्य व शनि स्थित हैं जिनमें सूर्य अपनी नीच राशि और शनि अपनी उच्च राशि का है और चतुर्थेश तृतीय भाव में अपनी नीच राशि का स्थित है साथ ही चतुर्थ भाव का कारक ग्रह चंद्रमा अष्टम भाव में स्थित है जिस कारण से यह व्यक्ति अपने परिवार में अत्यंत दुखी व परिवार वालों द्वारा प्रताड़ित किए जाते थे यहाँ तक कि इनके परिवार वालों ने इन पर कई मुकदमें भी कर रखे थे जब यह व्यक्ति मेरे पास आए तो मैंने इनको एक ही सलाह दी कि आप मातृस्थान व पितृस्थान से जितने अधिक दूर रहेंगे उतनी अच्छी उन्नति करेंगे व सुखमय जीवन को व्यतीत करेंगे जिसके बाद यह व्यक्ति घर वालों से छुपकर विदेश गए और वहाँ उनको बड़ी सफलता मिली तथा आज सुखमय जीवन व्यतीत कर रहे हैं कुल मिलाकर यदि चतुर्थेश व चतुर्थ भाव और चतुर्थ भाव का कारक पीड़ित हो तो ऐसे व्यक्ति जब तक अपने परिवार वालों के साथ रहते हैं तब तक संघर्ष व अपमानजनक स्थितियों का सामना करते रहते हैं और इनको सुख न्यून के समान ही मिलता है।

 

यह तो बात थी कि कब परिवार वालों से अपमान मिलता है ठीक इसी प्रकार ग्रंथकारों ने कुछ ऐसे भी योग बताए हैं जिनमें परिवार से व्यक्ति को सम्मान की प्राप्ति होती है तथा व्यक्ति परिवार में भाग्यशाली समझा जाता है जिसे मैं अगले भाग में प्रकाशित करूँगा….

 

जय श्री राम।

 

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मिथुन लग्न कुंडली के प्रथम, द्वितीय व तृतीय भाव में सूर्य का फल

मिथुन लग्न कुंडली के प्रथम, द्वितीय व तृतीय भाव में सूर्य का फल

 

मिथुन लग्न कुंडली के प्रथम, द्वितीय व तृतीय भाव में सूर्य का फल
मिथुन लग्न कुंडली के प्रथम, द्वितीय व तृतीय भाव में सूर्य का फल

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी द्वारा लिखित यह ग्रह फल उनके स्वम् के अनुभव पर आधारित है यहाँ सिर्फ एक ही ग्रह के विभिन्न भावों में फल को बताया गया है अतः अन्य किसी ग्रह के युति व दृष्टि संबंध बनाने या नीचभंग राजयोग बनने से बताए गए फलों में कुछ बदलाव संभव रहेगा।

 

मिथुन लग्न कुंडली के प्रथम भाव में सूर्य का फल:-

 

मिथुन लग्न कुंडली के प्रथम भाव में सूर्य का फल
मिथुन लग्न कुंडली के प्रथम भाव में सूर्य का फल

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार सूर्य के प्रथम भाव अर्थात लग्न (देह स्थान) पर सूर्य के अपने मित्र बुध के स्वामित्व वाली मिथुन राशि में स्थित होने के कारण से जातक/जातिका को दैहिक परिश्रम द्वारा समाज में मान-सम्मान प्राप्त होगा साथ ही जातक/जातिका अपने प्रतिष्ठा की वृद्धि हेतु सदैव प्रयत्नशील रहेंगे और भाई-बहन का पूर्ण सहयोग प्राप्त करेंगे साथ ही जातक/जातिका साहसी होंगे और सातवीं दृष्टि से सप्तम भाव स्त्री व रोजगार स्थान को अपने मित्र गुरु के स्वामित्व वाली धनु राशि में देखने के कारण से जातक/जातिका गृहस्थ के भोगादिक पक्ष में पुरुषार्थ शक्ति द्वारा सफलता प्राप्त करेंगे और रोजगार के मार्ग में अत्यधिक परिश्रम से बड़ी सफलता प्राप्त करेंगे और इसी सफलता के कारण से समाज में भाग्यशाली समझे जाएंगे साथ ही जातक/जातिका के देह के अंदर बड़ी हिम्मत और स्फूर्ति तथा क्रोध इत्यादि व्याप्त रहेगा।

 

मिथुन लग्न कुंडली के द्वितीय भाव में सूर्य का फल:-

 

मिथुन लग्न कुंडली के द्वितीय भाव में सूर्य का फल
मिथुन लग्न कुंडली के द्वितीय भाव में सूर्य का फल

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार सूर्य के द्वितीय भाव धन व कुटुम्ब स्थान पर अपने मित्र चंद्र की कर्क राशि में स्थित होने के कारण से भाई-बहन के सुख-संबंधों में कुछ कमी रहेगी तथा जातक/जातिका पुरुषार्थ द्वारा धन की वृद्धि करने में सफल रहेंगे और कुटुंब का सुख प्राप्त करेंगे और धन की वृद्धि करने के कारण से देह के पुरुषार्थ में कुछ कमी अनुभव होगी कहने का आशय यह है कि जातक/जातिका के स्वास्थ्य में कुछ परेशानी या चिंता व्याप्त रहेगी और सातवीं दृष्टि से अष्टम भाव आयु-मृत्यु व पुरातत्व स्थान को अपने शत्रु शनि की मकर राशि में देखने के कारण से जातक/जातिका को जीवन की दिनचर्या में कुछ अशांति अनुभव होगी और पुरातत्व शक्ति का सहयोग कुछ अरुचिकर एवं असंतोष रूप में प्राप्त होगा और अत्यधिक परिश्रम से धन की वृद्धि करने में जातक/जातिका सफल होंगे।

 

मिथुन लग्न कुंडली के तृतीय भाव में सूर्य का फल:-

 

मिथुन लग्न कुंडली के तृतीय भाव में सूर्य का फल
मिथुन लग्न कुंडली के तृतीय भाव में सूर्य का फल

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार सूर्य के तृतीय भाव भाई-बहन व पराक्रम स्थान पर सूर्य के अपने स्वामित्व वाली सिंह राशि में स्थित होने के कारण से जातक/जातिका अत्यधिक पराक्रमी होंगे और पराक्रम शक्ति की सहायता से समाज में मान-प्रतिष्ठा प्राप्त करेंगे तथा भाई-बहन का उत्तम सुख व पूर्ण सहयोग प्राप्त करेंगे साथ ही अपने पराक्रम पर पूर्ण विश्वास रखेंगे और सातवीं दृष्टि से नवम भाव भाग्य व धर्म स्थान को अपने शत्रु शनि की कुंभ राशि में देखने के कारण से जातक/जातिका को भाग्य के प्रति कुछ असंतोष रहेगा और धर्म के मार्ग में कुछ मतभेद समझने की वजह से अपने अलग ढंग से धर्म का पालन करेंगे और बहादुर स्वभाव होने के कारण से भाग्य की कुछ कमजोरी समझते रहने पर भी परवाह नही करेंगे और अपनी पराक्रम शक्ति से कठिन से कठिन कार्यों को भी पूर्ण करने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहेंगे।

 

जय श्री राम।

 

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