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स्वप्न में इन 5 चीजों का दिखना देता है अनहोनी के संकेत–Astrology Sutras

स्वप्न में इन 5 चीजों का दिखना देता है अनहोनी के संकेत–Astrology Sutras

 

स्वप्न में इन 5 चीजों का दिखना देता है अनहोनी के संकेत
स्वप्न में इन 5 चीजों का दिखना देता है अनहोनी के संकेत

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार प्रत्येक स्वप्न का अर्थ होता है जिनमें कुछ स्वप्न शुभ संकेत देते हैं तो वही कुछ स्वप्न अनहोनी के संकेत देते हैं तो चलिए जानते हैं सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार ऐसे 5 स्वप्न के बारे में जो निकट भविष्य में अनहोनी के संकेत देते हैं:-

 

कौआ व उल्लू का दिखना:-

 

स्वप्न में कौआ व उल्लू का दिखना
स्वप्न में कौआ व उल्लू का दिखना

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार यदि व्यक्ति को स्वप्न में कौआ दिखाई देता है तो निकट भविष्य में किसी अशुभ घटना के घटित होने की संभावना रहती है साथ ही यदि किसी व्यक्ति को स्वप्न में उल्लू दिखाई देता है तो निकट भविष्य में व्यक्ति को गंभीर बीमारी या अशुभ समाचार प्राप्त होने की संभावना रहती है।

 

पेड़ को कटते हुए देखना:-

 

स्वप्न में पेड़ कटते हुए देखना
स्वप्न में पेड़ कटते हुए देखना

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार यदि व्यक्ति को स्वप्न में पेड़ कटते हुए दिखाई दे तो यह एक अशुभ संकेत होता है सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार यह स्वप्न स्वास्थ्य संबंधित समस्या व धन हानि का सूचक होता है।

 

झाड़ू का दिखना:-

 

स्वप्न में झाड़ू देखना
स्वप्न में झाड़ू देखना

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार झाड़ू को देवी लक्ष्मी का प्रतीक माना गया है किंतु सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार स्वप्न में झाड़ू दिखना अशुभ होता है यदि व्यक्ति को स्वप्न में झाड़ू दिखाई दे तो इसका अर्थ होता है कि निकट भविष्य में आपको धन हानि होने की संभावना है।

 

खुद को गिरते हुए देखना:-

 

स्वप्न में खुद को ऊंचाई से गिरते देखना
स्वप्न में खुद को ऊंचाई से गिरते देखना

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार यदि व्यक्ति को स्वप्न में व्यक्ति यदि स्वम् को पहाड़ या किसी ऊंचे स्थान से गिरते हुए देखें तो सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार निकट भविष्य में स्वास्थ्य संबंधित समस्या व मान-सम्मान में हानि होने की संभावना रहती है।

 

रेगिस्तान में चलना:-

 

स्वप्न मे खुद को रेगिस्तान में चलते देखना
स्वप्न मे खुद को रेगिस्तान में चलते देखना

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार यदि व्यक्ति को स्वप्न में स्वम् को रेगिस्तान में चलते हुए देखें तो सामुद्रिक शास्त्र में बताया गया है कि ऐसे व्यक्तियों को निकट भविष्य में शत्रुओं से भारी परेशानी व झंझट प्राप्त ह्यो सकते हैं।

 

जय श्री राम।

 

Astrologer:- Pooshark Jetly

Astrology Sutras (Astro Walk Of Hope)

Mobile:- 9919367470, 7007245896

Email:- pooshark@astrologysutras.com

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कर्क लग्न कुंडली सप्तम, अष्टम व नवम भाव में सूर्य का फल

कर्क लग्न कुंडली सप्तम, अष्टम व नवम भाव में सूर्य का फल

 

कर्क लग्न कुंडली के सप्तम, अष्टम व नवम भाव में
कर्क लग्न कुंडली के सप्तम, अष्टम व नवम भाव में सूर्य का फल

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी द्वारा लिखित यह ग्रह फल उनके स्वम् के अनुभव पर आधारित है यहाँ सिर्फ एक ही ग्रह के विभिन्न भावों में फल को बताया गया है अतः अन्य किसी ग्रह के युति व दृष्टि संबंध बनाने या नीचभंग राजयोग बनने से बताए गए फलों में कुछ बदलाव संभव रहेगा।

 

कर्क लग्न कुंडली के सप्तम भाव में सूर्य का फल:-

 

कर्क लग्न कुंडली के सप्तम भाव में सूर्य का फल
कर्क लग्न कुंडली के सप्तम भाव में सूर्य का फल

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार सूर्य के सप्तम भाव स्त्री व रोजगार स्थान शत्रु शनि की मकर राशि में बैठा होने के कारण से जातक/जातिका को जीवनसाथी स्थान के सुख स्थान में कुछ कमी अनुभव होगी तथा दाम्पत्य जीवन में अनेक अवसर पर कलह-क्लेश की स्थितियों का सामना करना पड़ेगा और रोजगार के मार्ग में कुछ परेशानियों के साथ सफलता प्राप्त होगी साथ ही कुछ झंझटों के साथ कुटुंब व गृहस्थ सुख प्राप्त होगा साथ ही मूत्रेन्द्रिय के अंदर भी कभी-कभी बीमारी या परेशानी अनुभव होगी और भोगादिक सुखों को प्राप्त करने के लिए धन की शक्ति का प्रयोग करने पर भी कुछ नीरसता रहेगी एवं सूर्य के सातवीं दृष्टि से प्रथम भाव अर्थात लग्न (देह स्थान) को मित्र चंद्र की कर्क राशि में देखने के कारण से जातक/जातिका को देह में स्फूर्ति बनी रहेगी तथा समाज में इज्जत प्राप्त होगी।

 

कर्क लग्न कुंडली के अष्टम भाव में सूर्य का फल:-

 

कर्क लग्न कुंडली के अष्टम भाव में सूर्य का फल
कर्क लग्न कुंडली के अष्टम भाव में सूर्य का फल

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार सूर्य के अष्टम भाव आयु-मृत्यु व पुरातत्व स्थान पर अपने शत्रु शनि की कुंभ राशि में देखने के कारण से जातक/जातिका को कुटुंब सुख के स्थान में कुछ क्लेश और कमी प्राप्त होगी तथा जीवन की दिनचर्या में कुछ बंधन या घिराव सा प्रतीत होगा और आयु स्थान में भी कभी-कभी विशेष संकट का योग प्राप्त होगा तथा जातक/जातिका जीवन को कुछ अमीरता के ढंग से व्यतीत करना पसंद करेंगे किंतु जीवन के वास्तविक आनंद में कुछ कमी अनुभव होगी और दवाईयों पर धन व्यय होगा और सातवीं दृष्टि से सूर्य के द्वितीय भाव धन व कुटुंब स्थान को अपने स्वम् की स्वामित्व वाली सिंह राशि में देखने के कारण से जातक/जातिका को धन और जन की शक्ति का कुछ सहारा प्राप्त होगा और उदर के अंदर कुछ परेशानी या बीमारी रहेगी।

 

कर्क लग्न कुंडली के नवम भाव में सूर्य का फल:-

 

कर्क लग्न कुंडली के नवम भाव में सूर्य का फल
कर्क लग्न कुंडली के नवम भाव में सूर्य का फल

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार सूर्य के नवम भाव भाग्य व धर्म स्थान पर अपने मित्र गुरु के स्वामित्व वाली मीन राशि में स्थित होने के कारण से जातक/जातिका भाग्य की शक्ति द्वारा धन के कोष की वृद्धि करने में सफल रहेंगे साथ ही कुटुंब का भी सुख प्राप्त करेंगे तथा समाज में बड़े प्रभावशाली और भाग्यवान समझे जाएंगे और धन की शक्ति से धर्म का पालन करेंगे जिस कारण से समाज में इज्जत, मान, प्रभाव तथा यश भी जातक/जातिका को प्राप्त होगा किंतु फिर भी कभी-कभी मन में एक प्रकार का असंतोष बना रहेगा तथा अत्यधिक परिश्रम करने पर उत्तरार्ध में बड़ी सफलता प्राप्त होगी और सूर्य के सातवीं दृष्टि से तृतीय भाव भाई-बहन व पराक्रम स्थान को आने मित्र बुध के स्वामित्व वाली कन्या राशि में बैठे होने के कारण से जातक/जातिका पराक्रम शक्ति द्वारा धन लाभ और सफलता प्राप्त करेंगे इसलिए उनमें बड़ी हिम्मत शक्ति रहेगी और जातक/जातिका स्वार्थ तथा परस्वार्थ दोनो का ठीक तरह से पालन करेंगे तथा भाई-बहन का कुछ सहयोग व सुख प्राप्त करेंगे।

 

जय श्री राम।

 

Astrologer:- Pooshark Jetly

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कालपुरुष और राशियों की परिकल्पना–Astrology Sutras

कालपुरुष और राशियों की परिकल्पना–Astrology Sutras

काल पुरुष और राशियों की परिकल्पना
काल पुरुष और राशियों की परिकल्पना

 

बहुत से लोगों के मन में यह जिज्ञासा प्रायः बनी रहती है कि राशि चक्र का आरंभ मेष राशि ही से क्यों होता है तो चलिए आज ज्योतिषीय दृष्टिकोण से कालपुरुष के बारे में चर्चा करते हैं ज्योतिर्विद प्रवीण सिंह पारमार जी के अनुसार सृष्टि के प्रारंभ में जब माता सती ने अपनी योगाग्नि से स्वयं को पिता दक्ष प्रजापति के यज्ञकुण्ड में, भस्मीभूत कर लिया था तब परमब्रह्म शिव के साक्षात स्वरूप भगवान महादेव ने महारुद्र का रूप धारण किया था उनके विशालकाय रूप ने समस्त सौरमंडल को अधिकार में ले लिया था (जैसा कि हम जानते है राशियाँ आकाश में फैले हुए तारों का समूह हैं।) उनके इसी विशालकाय रूप को कालपुरुष की संज्ञा दी गयी है ज्योतिषीय द्रष्टिकोण से बारह राशियों के गुण धर्म भी कालपुरुष के शरीर पर निर्भर हैं।

उदाहरणार्थ- मेष राशि कालपुरूष का सिर पर आती है, महादेव का त्रिनेत्र परमाग्नि है, यह परम विनाश के साथ-साथ सृजन की भी क्षमता रखता है इसी कारण से मेष राशि अग्नि तत्व की मानी गयी है ज्योतिष शास्त्र में बारह भावों से मानव शरीर के विचार के लिए भी कालपुरूष का ही सहारा लिया जाता है।

जय श्री राम।

Astrologer:- Praveen Singh Parmar

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Mobile:- 9415732067

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कर्क लग्न कुंडली के चतुर्थ, पंचम व षष्ठ भाव में सूर्य का फल

कर्क लग्न कुंडली के चतुर्थ, पंचम व षष्ठ भाव में सूर्य का फल

 

कर्क लग्न कुंडली के चतुर्थ, पंचम व षष्ठ भाव मे सूर्य का फल
कर्क लग्न कुंडली के चतुर्थ, पंचम व षष्ठ भाव मे सूर्य का फल

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी द्वारा लिखित यह ग्रह फल उनके स्वम् के अनुभव पर आधारित है यहाँ सिर्फ एक ही ग्रह के विभिन्न भावों में फल को बताया गया है अतः अन्य किसी ग्रह के युति व दृष्टि संबंध बनाने या नीचभंग राजयोग बनने से बताए गए फलों में कुछ बदलाव संभव रहेगा।

 

कर्क लग्न कुंडली के चतुर्थ भाव में सूर्य का फल:-

 

कर्क लग्न कुंडली के चतुर्थ भाव में सूर्य का फल
कर्क लग्न कुंडली के चतुर्थ भाव में सूर्य का फल

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार सूर्य के चतुर्थ भाव माता व भूमि स्थान पर सूर्य के अपनी नीच राशि व शत्रु शुक्र के स्वामित्व वाली तुला राशि में स्थित होने के कारण से जातक/जातिका को धन संग्रह शक्ति के अभाव से दुःख अनुभव होगा अर्थात धन कोष में कुछ कमी रहेगी और माता के सुख-संबंधों में कुछ कमी और वियोग रहेगा तथा कुटुम्बिक सुख की कमी रहेगी साथ ही रहने के स्थान में सुख की कुछ कमी रहेगी और सूर्य के सातवीं दृष्टि से दशम भाव पिता व राज्य स्थान को अपनी उच्च राशि व मित्र मंगल के स्वामित्व वाली मेष राशि में देखने के कारण से पिता का पूर्ण सहयोग प्राप्त होगा और राज-समाज में प्रभाव व मान-प्रतिष्ठा प्राप्त होगी साथ ही कारोबार के क्षेत्र में बड़ी सफलता प्राप्त होगी और जातक/जातिका प्रतिष्ठा और उन्नति प्राप्त करने के लिए धन और सुख शांति की परवाह नही करेंगे।

 

कर्क लग्न कुंडली के पंचम भाव में सूर्य का फल:-

 

कर्क लग्न कुंडली के पंचम भाव में सूर्य का फल
कर्क लग्न कुंडली के पंचम भाव में सूर्य का फल

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार सूर्य के पंचम भाव विद्या व संतान स्थान पर अपने मित्र मंगल के स्वामित्व वाली वृश्चिक राशि में स्थित होने के कारण से जातक/जातिका को संतान पक्ष के सुख-संबंधों में कुछ बाधा अनुभव होगी किंतु प्रभावशाली संतान प्राप्त होगी और उच्च शिक्षा प्राप्त होगी तथा वाणी के अंदर बड़ा भारी प्रभाव रहेगा साथ ही स्वभाव में कुछ गर्मी रहेगी तथा जातक/जातिका धन के कोष की वृद्धि का विशेष ध्यान रखेंगे और सूर्य के सातवीं दृष्टि से एकादश भाव लाभ स्थान को शत्रु शुक्र के स्वामित्व वाली वृषभ राशि में देखने के कारण से जातक/जातिका लाभ की शक्ति प्राप्त करते हुए भी लाभ की अधिक परवाह नही करेंगे तथा जातक/जातिका की बातें विशेष रूप से वजनदार और कीमती रहेंगी जिस कारण से समाज में जातक/जातिका इज्जत, मान-प्रतिष्ठा प्राप्त करेंगे।

 

कर्क लग्न कुंडली के षष्ठ भाव में सूर्य का फल:-

 

कर्क लग्न कुंडली के षष्ठ भाव में सूर्य का फल
कर्क लग्न कुंडली के षष्ठ भाव में सूर्य का फल

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार सूर्य के षष्ठ भाव रोग व शत्रु स्थान पर मित्र गुरु के स्वामित्व वाली गुरु राशि में स्थित होने के कारण से जातक/जातिका को शत्रुओं पर विजय प्राप्त होगी और दवाईयों व शत्रुओं के कारण से धन संग्रह की शक्ति में कुछ कमजोरी अनुभव होगी तथा कुटुंब कुछ कुछ वैमन्यस्ता के साथ प्राप्त होगा साथ ही जातक/जातिका कुछ झगड़े-झंझट युक्त परिश्रमी और प्रभावशाली मार्ग द्वारा धन की वृद्धि करने में सफल होंगे और सातवीं दृष्टि से सूर्य के द्वादश भाव खर्च व बाहरी स्थान पर मित्र बुध के स्वामित्व वाली मिथुन राशि में देखने के कारण से जातक/जातिका खर्चा खूब करेंगे और जन्म स्थान व मातृ स्थान से दूर रहकर विशेष उन्नति प्राप्त करेंगे साथ ही धन ख़र्च करने में गौरव अनुभव करेंगे इसलिए धनकोष का संग्रह करने की परवाह नही करेंगे।

 

जय श्री राम।

 

Astrologer:- Pooshark Jetly

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गंगा दशहरा 20 जून 2021 जानिए पौराणिक कथा, शुभ मुहर्त व पूजन विधि

गंगा दशहरा 20 जून 2021 जानिए पौराणिक कथा, शुभ मुहर्त व पूजन विधि

 

गंगा दशहरा 2021 जानिए पौराणिक कथा, शुभ मुहर्त व पूजन विधि
गंगा दशहरा 2021 जानिए पौराणिक कथा, शुभ मुहर्त व पूजन विधि

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि के दिन माँ गंगा का धरती पर अवतरण हुआ था जिस कारण से इस दिन को गंगा दशहरा के रूप में मनाया जाता है इस दिन भगवान शिव व विष्णु जी के साथ माँ गंगा की पूजा की जाती है, पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन गंगा नदी में स्नान कर भगवान शिव, विष्णु व माँ गंगा की पूजा करने करने से व्यक्तियोबक सभी पापों का नाश हो जाता है इस दिन गंगा स्नान के पश्चात दान करने का भी विधान है जिससे व्यक्तियों के सभी पाप धुल जाते हैं व व्यक्ति निर्मल हो जाता है।

 

माँ गंगा के धरती पर अवतरण की पैराणिक कथा:-

 

गंगा दशहरा से जुड़ी पौराणिक कथा
गंगा दशहरा से जुड़ी पौराणिक कथा

 

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ऋषि भागीरथ ने अपने पूर्वजों की मुक्ति (जीवन चक्र से मुक्ति) हेतु माँ गंगा की घंघोर तपस्या की थी जिससे प्रसन्न होकर माँ गंगा ने धरती पर अवतरण का उन्हें वरदान तो दिया था किंतु उनके मन में यह शंका थी कि उनके प्रचंड वेग से धरती व धरती पर रहने वाले ऋषि, मुनि, मनुष्य, जीव, पेड़-पौधे सभी को हानि होगी जिससे सब असमय ही काल के मुख में समा जाएंगे इसलिए माँ गंगा ने भागीरथ को शिव जी की तपस्या करने व् उनसे अपने अवतार में सहयोग करने को कहा था जिसके बाद पुनः ऋषि भागीरथ ने शिव जी की तपस्या की थी और शिव जी ने ऋषि भागीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर माँ गंगा को अपनी जटाओ में समाहित कर एक निश्चित वेग से उनको धरती पर अवतरण में सहयोग किया था, धर्म शास्त्रों के अनुसार उस दिन ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि थी जिस कारण से प्रत्येक वर्ष ज्येष्ठ शुक्ल दशमी तिथि को गंगा दशहरा मनाया जाता है।

 

गंगा दशहरा शुभ मुहर्त:-

 

गंगा दशहरा शुभ मुहर्त
गंगा दशहरा शुभ मुहर्त

 

“ऋषिकेश पंचांग (काशी) अनुसार” १९ जून को दिन के ०२:१० से आरंभ होकर २० जून को दिन के १२:०२ तक रहेगी साथ ही २० जून को चित्रा नक्षत्र दिन के ०३:२७ तक व परिघ योग सायं ०६:२० तक रहेगा अतः गंगा दशहरा पूजन शुभ मुहर्त दिन में ०९:२३ से ११:३६ तक स्थिर लग्न सिंह में करना शुभ रहेगा धर्म शास्त्रों के अनुसार माँ गंगा का अवतरण वृषभ लग्न में हुआ था जो की मध्य रात्रि ०२:५२ से ०४:४८ तक रहेगा अतः इस समय काल में भी पूजन किया जाना शुभ रहेगा।

 

गंगा दशहरा पूजन विधि:-

 

गंगा दशहरा पूजन विधि
गंगा दशहरा पूजन विधि

 

प्रातःकाल नित्य क्रिया से निवृत्त होकर गंगा नदी में श्रद्धा पूर्वक स्नान करना चाहिए (यदि आपके शहर में गंगा नदी न बहती हो तो किसी भी नदी में स्नान कर सकते हैं और यदि आपके पास गंगा जल हो तो उसे आप नहाने के पानी में मिलाकर स्नान कर सकते हैं) तत्पश्चात शिव जी व् विष्णु जी की पंचोपचार पूजन करना चाहिए व माँ गंगा की स्तुति करनी चाहिए और पूजन पश्चात् किसी भी गरीब को श्रद्धानुसार वस्त्र, काली उर्द, चावल, आटा, घी व मिष्ठान इत्यादि कुछ दक्षिणा के साथ दान करना चाहिए।

 

गंगा दशहरा के दिन करें इन दो मंत्रों का जाप:-

 

।।ॐ नम: शिवायै नारायण्यै दशहरायै गंगायै नम:।।

 

।।ॐ नमो भगवते ऐं ह्रीं श्रीं हिलि हिलि मिलि मिलि गंगे मां पावय पावय स्वाहा।।

 

गंगा दशहरा की हार्दिक शुभकामनाएं
गंगा दशहरा की हार्दिक शुभकामनाएं

 

जय श्री राम।

 

Astrologer:- Pooshark Jetly

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कर्क लग्न कुंडली के प्रथम, द्वितीय व तृतीय भाव में सूर्य का फल

कर्क लग्न कुंडली के प्रथम, द्वितीय व तृतीय भाव में सूर्य का फल

 

कर्क लग्न कुंडली के प्रथम, द्वितीय व तृतीय भाव में सूर्य का फल
कर्क लग्न कुंडली के प्रथम, द्वितीय व तृतीय भाव में सूर्य का फल

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी द्वारा लिखित यह ग्रह फल उनके स्वम् के अनुभव पर आधारित है यहाँ सिर्फ एक ही ग्रह के विभिन्न भावों में फल को बताया गया है अतः अन्य किसी ग्रह के युति व दृष्टि संबंध बनाने या नीचभंग राजयोग बनने से बताए गए फलों में कुछ बदलाव संभव रहेगा।

 

कर्क लग्न कुंडली के प्रथम भाव में सूर्य का फल:-

 

कर्क लग्न कुंडली के प्रथम भाव में सूर्य का फल
कर्क लग्न कुंडली के प्रथम भाव में सूर्य का फल

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार सूर्य के प्रथम भाव अर्थात लग्न (देह स्थान) पर अपने मित्र चंद्र के स्वामित्व वाली कर्क राशि में स्थित होने के कारण से जातक/जातिका को दैहिक परिश्रम द्वारा धन संचय के मार्ग में बड़ी सफलता प्राप्त होगी तथा देह में तेज प्रभाव होगा साथ ही जातक/जातिका दूसरों की दृष्टि में धनवान और इज्जतदार समझे जाएंगे किंतु कुटुंब के कारणों से देह में कुछ घिराव और परेशानी अनुभव होगी तथा सातवीं दृष्टि से सूर्य के सप्तम भाव स्त्री व रोजगार स्थान को अपने शत्रु शनि की मकर राशि में देखने के कारण से जातक/जातिका को स्त्री पक्ष में कुछ झंझट और नीरसता प्राप्त होगी और रोजगार के मार्ग में कुछ परेशानी के साथ धन लाभ होगा।

 

कर्क लग्न कुंडली के द्वितीय भाव में सूर्य का फल:-

 

कर्क लग्न कुंडली के द्वितीय भाव में सूर्य का फल
कर्क लग्न कुंडली के द्वितीय भाव में सूर्य का फल

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार सूर्य के द्वितीय भाव धन व कुटुंब स्थान पर अपने स्वम् की स्वामित्व वाली सिंह राशि में स्थित होने के कारण से जातक/जातिका को धन के कारणों से समाज में प्रभाव व प्रतिष्ठा प्राप्त होगी तथा कुटुंब का पूर्ण सहयोग प्राप्त होगा किंतु जातक/जातिका को धन-जन की स्थिति में कोमलता की कमी अनुभव होगी साथ ही सूर्य के सप्तम दृष्टि से अष्टम भाव आयु-मृत्यु व पुरातत्व स्थान को शत्रु शनि की कुंभ राशि में देखने के कारण से जातक/जातिका को धन-जन की रक्षा और वृद्धि करने के कारणों से जीवन की दिनचर्या में कुछ अशांति अनुभव होगी और पुरातत्व शक्ति के लाभ स्थान में कुछ नीरसता अनुभव होगी किंतु जातक/जातिका धन वृद्धि हेतु सदैव प्रयत्नशील रहेंगे।

 

कर्क लग्न कुंडली के तृतीय भाव में सूर्य का फल:-

 

कर्क लग्न कुंडली के तृतीय भाव में सूर्य का फल
कर्क लग्न कुंडली के तृतीय भाव में सूर्य का फल

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार सूर्य के तृतीय भाव भाई-बहन व पराक्रम स्थान पर मित्र बुध के स्वामित्व वाली कन्या राशि में स्थित होने के कारण से जातक/जातिका को भाई-बहन के सुख-संबंधों में कुछ कमी अनुभव होगी किंतु फिर भी अनेक अवसरों पर भाई-बहन का सहयोग प्राप्त होगा साथ ही जातक/जातिका धन के कारणों से बड़ी हिम्मत व पराक्रम द्वारा समाज में प्रभाव और मान-प्रतिष्ठा प्राप्त करेंगे तथा धन वृद्धि हेतु सदैव प्रयत्नशील रहेंगे और सातवीं दृष्टि से सूर्य के नवम भाव भाग्य व धर्म स्थान को मित्र गुरु के स्वामित्व वाली मीन राशि में देखने के कारण से जातक/जातिका पराक्रम शक्ति के द्वारा भाग्य व धन की वृद्धि करने में सफल रहेंगे तथा धर्म का पालन करेंगे और भाग्य की शक्ति के द्वारा समाज में मान-प्रतिष्ठा, प्रभाव और यश प्राप्त करेंगे तथा भाग्य और पुरुषार्थ दोनो पर विश्वास रखेंगे।

 

जय श्री राम।

 

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प्रेत बाधा निवारण के संबंध में अचूक अनुष्ठान

बहुत से व्यक्ति मेरे पास आते हैं कि उनके परिवार जन किसी भूत-प्रेत बाधा के प्रभाव में हैं जिससे उनकी बहुत ही दयनीय स्थिति हो गयी है और बहुत से तांत्रिक व अनेक विद्वानों के पास जाने से भी कोई राहत नही मिलती अतः उन सभी प्रेरणा व अपने आराध्य श्री हनुमान जी की कृपा से आज मैं कुछ ऐसे अचूक उपाय व अनुष्ठान बता रहा हूँ जिसको पूर्ण श्रद्धा से करने से भूत-प्रेत-पिशाच बाधा से तत्काल मुक्ति मिल जाती है तो चलिए जानते हैं उन उपायों के बारे में:-

 

प्रनवउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यानघन।
जासु हिर्दय आगार बसहिं राम सर चाप धर।।

 

प्रतिदिन ११ माला के हिसाब से ४९ दिवस तक इसका जप करना चाहिए साथ ही श्री हनुमान जी की मूर्ति या चित्र के सामने बैठकर पंचोपचार से उनकी पूजा कर के कम से कम ७ शनिवार तक प्रत्येक शनिवार को हनुमान चालीसा का १०८ बार पाठ करना चाहिए।

 

६४ यंत्र
६४ यंत्र

 

इस ६४ यंत्र को भोजपत्र पर लाल चंदन जिसे रक्त चंदन भी कहते हैं से लिखकर उसे मँढ़वा कर सभी कमरों में टाँग देना चाहिए व प्रेत की सद्गति हेतु भागवत का सप्ताह अनुष्ठान के रूप में एक पाठ और श्री विष्णु सहस्रनाम के १०८ पाठ कराने चाहिए।

 

जय श्री राम।

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श्री हनुमान जयंती विशेष: जानिए हनुमान जी की कृपा प्राप्ति के लिए पूजा कब करनी चाहिए

सर्वसाधारण और अधिकतर महात्माओं के मुखारविन्द से सुनने में आता है कि “सवा पहर दिन चढ़ जाने के पहले श्री हनुमान जी का नाम-जप तथा हनुमान चालीसा का पाठ नही करना चाहिए” क्या यह बात यथार्थ है?? इसमें कितनी सच्चाई है?? चलिए इस विषय पर मैंने अपने गुरु से जो सीखा व जाना वह आप सभी के समक्ष रखता हूँ:-

 

सर्वप्रथम तो मैं अपने आराध्य श्री हनुमान जी के चरण कमलों में नमन करता हूँ कि उन्होंने मुझ जैसे तुच्छ दास को इस योग्य समझा कि मैं इस विषय पर लोगों की शंका का समाधान कर सकूँ, आज तक इस दास को न तो किसी ग्रंथ में ऐसा कहीं प्रमाण मिला है कि उपासक को किसी उपास्य देव के स्तोत्रों का पाठ या उनके नाम का जप आदि प्रातः काल सवा पहर तक न कर के उसके बाद करना चाहिए अपितु प्रत्येक ग्रंथ पर इसी बात का प्रमाण मिलता है कि सदा और निरंतर तैल धारावत् अजस्त्र, अखंड भजन-स्मरण करना चाहिए यथा:-

 

कवित्तरामायण
रसना निसि बासर राम रटौ!
सदा राम जपु राम जपु।
जपहि नाम रघुनाथ को चर्चा दूसरी न चालू।
तुलसी तू मेरे कहे रट राम नाम दिन-रात्रि।

 

इसी प्रकार श्री हनुमान जी के संबंध में भी सदा-सर्वदा भजन करने का ही प्रमाण मिलता है यथा:-

 

मर्कटाधीस मृगराज बिक्रम महादेव मुद मंगलालय कपाली।
सिद्ध सुर बृंद जोगीन्द्र सेवित सदा, दास तुलसी प्रनत भय तमारी।।

 

पुनः—-

 

मंगलागार संसारभारापहर बानराकारबिग्रह पुरारी।
राम संभ्राज सोभा सहित सर्बदा, तुलसी मानस रामपुर बिहारी।।

 

कदाचित् किसी को श्री हनुमान जी के इस वचन का ध्यान आ गया हो:-

 

प्रात जो लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिले अहारा।।

 

परंतु कुछ अज्ञानी लोगों ने इसका गलत भावार्थ निकाल दिया जब कि यहाँ “हमारा” शब्द का संबंध ऊपर की चौपाई के “कपिकुल” अर्थात वानर योनि से है, न कि अपने शरीर (श्री हनुमान विग्रह) से वहाँ हनुमान जी कहते हैं:-

 

कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना।

 

अर्थात् विभीषण जी! आप अपने आपको राक्षस कुल का मानकर भय मत करें बताइए मैं ही कौन से बड़े श्रेष्ठ कुल का हूँ, वानर योनि तो चंचल और पशु होने से प्रत्येक प्रकार से हीन है हमारे कुल (वानर) का अगर कोई प्रातः काल नाम ले ले तो उस दिन उसे आहार का ही योग नही लगता:–

 

अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।
किन्हीं कृपा सुमिरि गुन भरे विलोचन नीर।।

 

अर्थात:- ऐसे अधम कुल में मैं हूँ किंतु सखा! सुनिए, मुझ पर श्री राम जी ने कृपा की है इस विरद को स्मरण कर कहते-कहते श्री हनुमान जी के नेत्रों से आँसू भर आए अतः “हमारा” शब्द का भाव यह है कि कुल तो हमारा ऐसा नीच है कि “वानर” शब्द का ही प्रातः मुँह से निकलना अच्छा नही माना जाता परंतु उसी योनि में उत्पन्न मैं जब प्रभु का कृपा पात्र बना लिया गया तब तो—

 

राम कीन्ह आपन जब हीं तें, भयउँ भूषण तबही तें।।

 

मेरे हनुमान, महाबीर, बजरंगी, पवनकुमार आदि नाम प्रातः स्मरणीय हो गए इसका प्रमाण कुछ इस प्रकार से है—

 

अशुभ होई जिन्ह के सुमिरन तें बाहर रीछ बिकारी।
बेद बिदित पावन किए ते सब महिमा नाथ तिहारी।।

 

अतएव श्री रामायण जी के उपर्युक्त पदों से श्री हनुमान जीका नाम प्रातः काल जपने का निषेध कदापि सिद्ध नही होता, उसका तात्पर्य “वानर” शब्द से ही है जो कुल की न्यूनता का घोतक है, स्वम् श्री हनुमान जी की न्यूनता का नहीं, कहीं-कहीं लोग ऐसा तर्क करते हैं कि श्री हनुमान जी रात्रि में जगने के कारण से प्रातः निद्रा मग्न रहते हैं, इसलिए सवा पहर वर्जित है, सो न तो इसका भी कोई प्रमाण इस तुच्छ दास को मिला है और न ही यह बात उचित मालूम होती है कि योगिराज, ज्ञानियों में अग्रगण्य श्री हनुमान जी प्रहर भर दिन चढ़ने तक निद्रा मग्न रहते हैं अथवा उनका अमित दिव्य विग्रह और अमोघ शक्ति वपु एक रूप से सेवा में तत्पर रहते हुए दूसरे अनेक रूपों से अपने भक्तों की सेवा स्वीकार करने में असमर्थ रहता है, जहाँ प्रेमपूर्वक श्री राम नाम का जप और श्री रामायण का पाठ होता है, वहाँ तो श्री मारुति जी सदा ही विद्यमान रहते हैं चाहे वह प्रातः काल हो या अन्य कोई काल हो, फिर इस झगड़े में पड़कर तो श्री हनुमान जी के आराम-विश्राम के लिए सवा प्रहर भगवद्भजन भी छोड़ना पड़ेगा, जिसका छूटना ही उनकी दृष्टि में विपत्तिजनक है—

 

कह हनुमान बिपति प्रभु सोई। जब तब सुमिरन भजन न होई।।

 

अतएव इस दीन तुच्छ दास के तुच्छ विचार से तो सवा प्रहर क्या, एक क्षण भी भाग्यवानों को श्री हनुमत् नाम-भजन और पाठ आदि से विमुख नही रहना चाहिए, प्रातः काल का समय तो भजन के लिए ही है, रुद्रांश श्री हनुमान जी सदा और सब काल में वंदनीय हैं।

श्री हनुमान जयंती विशेष जानिए हनुमान जी की कृपा प्राप्ति के लिए पूजा कब करनी चाहिए

 

।।ॐ सर्वदुःखहराय
विद्यमहे सर्वाभीष्टप्रदाय
धी मही तन्नो हनुमत् प्रचोदयात।।

 

जय श्री राम।
जय सिया राम।
जय केसरी नंदन।

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मिथुन लग्न कुंडली के दशम, एकादश व द्वादश भाव में सूर्य का फल

मिथुन लग्न कुंडली के दशम, एकादश व द्वादश भाव में सूर्य का फल

 

मिथुन लग्न कुंडली के दशम, एकादश व द्वादश भाव में सूर्य का फल
मिथुन लग्न कुंडली के दशम, एकादश व द्वादश भाव में सूर्य का फल

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी द्वारा लिखित यह ग्रहे फल उनके स्वम् के अनुभव पर आधारित है यहाँ सिर्फ एक ही ग्रह के विभिन्न भावों में फल को बताया गया है अतः अन्य किसी ग्रह के युति व दृष्टि संबंध बनाने या नीचभंग राजयोग बनने से बताए गए फलों में कुछ बदलाव संभव रहेगा।

 

मिथुन लग्न कुंडली के दशम भाव में सूर्य का फल:-

 

मिथुन लग्न कुंडली के दशम भाव में सूर्य का फल
मिथुन लग्न कुंडली के दशम भाव में सूर्य का फल

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार सूर्य के दशम भाव पिता व राज्य स्थान पर अपने मित्र गुरु के स्वामित्व वाली मीन राशि में स्थित होने के कारण से जातक/जातिका को पिता का पूर्ण सहयोग प्राप्त होगा और राज-समाज में अच्छा मान-सम्मान प्राप्त होगा तथा कारोबार के क्षेत्र में जातक/जातिका को बड़ी सफलता प्राप्त होगी और भाई-बहन का उत्तम सुख व सहयोग प्राप्त होगा साथ ही सूर्य के सातवीं दृष्टि से चतुर्थ भाव माता व भूमि स्थान को मित्र बुध के स्वामित्व वाली कन्या राशि में देखने के कारण से जातक/जातिका अपनी पराक्रम शक्ति द्वारा सुख के साधनों की वृद्धि करने में सफल रहेंगे और अपने पुरुषार्थ द्वारा बड़ी भारी सफलता प्राप्त करेंगे तथा माता का उत्तम सुख व सहयोग प्राप्त करेंगे।

 

मिथुन लग्न कुंडली के एकादश भाव में सूर्य का फल:-

 

मिथुन लग्न कुंडली के एकादश भाव में सूर्य का फल
मिथुन लग्न कुंडली के एकादश भाव में सूर्य का फल

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार सूर्य के एकादश भाव लाभ स्थान पर अपनी उच्च राशि व मित्र मंगल के स्वामित्व वाली मेष राशि में स्थित होने के कारण से जातक/जातिका अपने पराक्रम द्वारा जीवन में बड़ी भारी उन्नति प्राप्त करेंगे तथा आमदनी की वृद्धि हेतु सदैव प्रयत्नशील रहेंगे और भाई-बहन का उत्तम सुख प्राप्त करेंगे तथा इन सभी कारणों से मन में उत्साह बना रहेगा और सूर्य के सातवीं दृष्टि से पंचम भाव विद्या व संतान स्थान को अपनी नीच राशि व शत्रु शुक्र के स्वामित्व वाली तुला राशि में देखने के कारण से संतान पक्ष से कुछ कष्ट अनुभव होगा और कुछ बाधाओं व कठिन परिस्थितियों से होते हुए शिक्षा पूर्ण होगी साथ ही लाभ के दृष्टिकोण से जातक/जातिका वाणी में कुछ रूखेपन से काम निकालेंगे तथा अत्यंत साहसी होंगे।

 

मिथुन लग्न कुंडली के द्वादश भाव में सूर्य का फल:-

 

मिथुन लग्न कुंडली के द्वादश भाव में सूर्य का फल
मिथुन लग्न कुंडली के द्वादश भाव में सूर्य का फल

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार सूर्य के द्वादश भाव खर्च व बाहरी स्थान पर सूर्य के अपने शत्रु शुक्र के स्वामित्व वाली वृषभ राशि में स्थित होने के कारण से जातक/जातिका को भाई-बहन के सुख-संबंधों में कुछ हानि व कमजोरी प्राप्त होगी और खर्चे की अधिकता के कारण से मन व्यथित रहेगा तथा पराक्रम में कुछ बंधन सा अनुभव होगा किंतु जन्म स्थान व पितृ स्थान से दूर परिश्रम से बड़ी भारी सफलता प्राप्त होगी फिर भी खर्च के वेग को जातक/जातिका रोक नही सकेंगे और सातवीं दृष्टि से सूर्य के षष्ठ भाव रोग व शत्रु स्थान को मित्र मंगल के स्वामित्व वाली वृश्चिक राशि में देखने के कारण से जातक/जातिका शत्रु पक्ष में प्रभाव और मिठास की शक्ति से काम लेंगे किंतु अपने अंदर की कमजोरी को छिपाकर बड़ी हिम्मत व परिश्रम से शत्रुओं पर विजय प्राप्त करेंगे फिर भी उत्साह में कुछ कमी अनुभव होगी।

 

जय श्री राम।

 

Astrologer:- Pooshark Jetly

Astrology Sutras (Astro Walk Of Hope)

Mobile:- 9919367470, 7007245896

Email:- pooshark@astrologysutras.com