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विक्रम संवत २०७८ के वर्ष प्रवेश लग्न से भारत में घटित होने वाली प्रमुख घटनाएं

विक्रम संवत २०७८ के वर्ष प्रवेश लग्न से भारत में घटित होने वाली प्रमुख घटनाएं

 

विक्रम संवत 2078 में वर्ष प्रवेश लग्न से भारत का भविष्य
विक्रम संवत 2078 में वर्ष प्रवेश लग्न से भारत का भविष्य

 

भारत के प्रवेश वर्ष प्रवेश लग्न के विचार से वर्ष प्रवेश लग्न मेष व द्रव्येश शुक्र है अतः मनोरंजन जगत एवं श्रृंगार संबधी व्यापार में थोड़ा लाभ होगा, पराक्रमेश बुध के होने से भारत की नीतियों से अंतराष्ट्रीय क्षेत्र में सफलता प्राप्त होगी, सुखेश चंद्रमा के होने के कारण से लोक कल्याण के कार्य से जनता सुखी रहेगी तथा बुध के कष्टेश होने के कारण से अनावश्यक समस्याओं का सामना करना पड़ेगा, मारकेश मंगल के होने के कारण से कई जगह अहिंसक उपद्रव होंगे व भाग्येश गुरु के होने के कारण से शिक्षा के क्षेत्र में उन्नति होगी, कर्मेश शनि से कानून व्यवस्था अच्छी दीर्घकालिक योजनाओं का शुभारंभ होगा, आयेश शनि के होने से राष्ट्रीय कोष में वृद्धि होगी तथा व्ययेश गुरु के होने के कारण से शिक्षा, ऊर्जा व योग के क्षेत्र में विस्तार होगा।

 

आनंद संवत्सर की हार्दिक शुभकामनाएं
आनंद संवत्सर की हार्दिक शुभकामनाएं

 

जय श्री राम।

 

Astrologer:- Pooshark Jetly

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Mobile:- 9919367470, 7007245896

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राहु और शनि से बनने वाला अशुभ योग: जानिए कौन सा है यह अशुभ योग व उसके फल और उपाय

राहु और शनि से बनने वाला अशुभ योग: जानिए कौन सा है यह अशुभ योग व उसके फल और उपाय

 

शनि व राहु से बनने वाला पिशाच योग
शनि व राहु से बनने वाला पिशाच योग

 

शनि और राहु इन दोनों को वैदिक ज्योतिष में पाप ग्रह की श्रेणी में रखा गया है जब यह दो ग्रह आपस में संबंध बनाते हैं तो पिशाच नामक योग बनता है अब प्रश्न यह उठता है कि किस प्रकार से शनि व राहु संबंध बनाएं तो यह योग बनता है उससे पूर्व हमारे लिए यह जानना आवश्यक है कि आखिर शनि व राहु से ही क्यों पिशाच योग बनता है व पिशाच योग का क्या अर्थ है इसके लिए हमें पहले शनि व राहु को समझना होगा शनि व राहु रात्रि बली होते हैं शनि का वर्ण श्याम है और शनि अंधेरे का ग्रह है और राहु एक माया अर्थात जादू है जब भी शनि और राहु के बीच संबंध बनता है तो एक नकारात्मक शक्ति का सृजन होता है जिसे पराशरी ज्योतिष में “पिशाच योग” की संज्ञा प्राप्त है।

 

राहु व शनि के चार प्रकार से संबंध बनने पर व्यक्ति को पिशाच योग का फल प्राप्त होता है वह इस प्रकार है:-

 

१. शनि व राहु एक साथ युति कर के किसी भी भाव में स्थित हों।

 

२. शनि व राहु एक दूसरे को परस्पर देखतें हों।

 

३. शनि की राहु या राहु की शनि पर दृष्टि हो।

 

४. गोचर वश जब शनि जन्म के राहु या राहु जन्म के शनि पर से गोचर करता हो।

 

इन चार प्रकार के शनि व राहु के मध्य संबंध बनने पर पिशाच योग बनता है अब प्रश्न यह उठता है कि इस पिशाच योग के क्या होते हैं तो चलिए मैं विभिन्न भावों में बनने वाले पिशाच योग के फल को बताता हूँ:-

 

पिशाच योग
पिशाच योग

 

१. यदि लग्न में शनि व राहु की युति हो तो ऐसे व्यक्ति के ऊपर तांत्रिक क्रियाओं का अधिक प्रभाव रहता है तथा ऐसे व्यक्ति हमेशा चिंतित रहते हैं और इनके मस्तिष्क में नकारात्मक विचार सबसे पहले आते हैं साथ ही ऐसे व्यक्तियों को कोई न कोई रोग निरंतर बना रहता है।

 

२. यदि द्वितीय भाव में शनि व राहु की युति हो तो व्यक्ति के घर वाले ही उसके शत्रु रहते हैं तथा इनको हर कार्य में बाधाओं का सामना करना पड़ता है और इनकी वाणी में कुछ दोष रहता है साथ ही धन संचय में कठिनाई व जुए-सट्टे आदि में धन हानि होती है तथा ऐसे व्यक्ति नशीले पदार्थों या तामसिक पदार्थों या दोनों का सेवन करते हैं।

 

३. यदि तृतीय भाव में शनि व राहु की युति हो तो ऐसे व्यक्ति अधिकतर भ्रमित रहते हैं व ऐसे व्यक्तियों का छोटा भाई नही होता या छोटे भाई को किसी प्रकार कोई कष्ट रहता है कहने का आशय यह है कि तृतीय भाव का पिशाच योग छोटे भाई के सुख की हानि करता है साथ ही ऐसे व्यक्तियों को समय-समय पर भारी उतार-चढ़ाव के समय से गुजरना पड़ता है साथ ही यदि पंचमेश पर भी शनि या राहु की या दोनों की दृष्टि हो या युति हो तो ऐसे व्यक्तियों को संतान नही होती या होकर मर जाती है कहने का आशय यह है कि ऐसे व्यक्तियों को संतान सुख नही प्राप्त होता है।

 

४. यदि चतुर्थ भाव में शनि व राहु की युति हो तो यह और भी खराब स्थिति होती है क्योंकि चतुर्थ भाव भूमि, मकान, माता व सुख का भाव होता है अतः ऐसी स्थिति में व्यक्तियों को माता का पूर्ण सुख नही मिल पाता तथा इनके घर में नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव रहता है प्रायः ऐसे व्यक्तियों के घर में वास्तु दोष अवश्य ही रहता है साथ ही ऐसे व्यक्तियों को मकान का सुख भी मुश्किल से ही प्राप्त होता है क्योंकि शनि निर्माण का कारक होता है और राहु माया, भ्रम व बाधाओं का कारक होता है ऐसे व्यक्ति जब भी किसी मकान का निर्माण आरंभ करवाते है तो उनके परिवार में रोग, व्याधि व पीड़ा प्रायः बनी रहती है या ऐसे व्यक्तियों को बड़ा आर्थिक नुकसान सहन करना पड़ता है।

 

५. यदि पंचम भाव में शनि व राहु की युति हो तो व्यक्ति के मस्तिष्क में नकारात्मक विचार आते रहते हैं साथ ही ऐसे व्यक्तियों की शिक्षा भी कठिन परिस्थितियों से होते हए पूर्ण होती है व बड़े भाई-बहन को किसी प्रकार का कष्ट रहता है तथा ऐसे व्यक्तियों की संतान को कष्ट रहता है और यदि पंचमेश का भी शनि व राहु या दोनों में से किसी एक से भी संबंध बनता हो तो ऐसे व्यक्तियों की संतान हीन अर्थात देह के किसी भाग में दुर्बलता लिए हुए होती है या होकर मर जाती है कहने का आशय यह है कि ऐसे व्यक्तियों को संतान सुख नही प्राप्त होता है।

 

६. यदि षष्ठ भाव में शनि व राहु की युति हो तो ऐसे व्यक्तियों के छुपे हुए शत्रु अधिक होते हैं षष्ठ भाव से रोग, रिपु और ऋण का विचार करते हैं अतः ऐसे व्यक्तियों की बीमारी का रहस्य जल्दी ज्ञात नही हो पाता और किसी जुए व सट्टे में हारने या नशे के कारण से धन हानि व ऋण की वृद्धि होती है ऐसे व्यक्तियों को हिर्दय घात होने या अन्य किसी प्रकार की दिल की बीमारी, रक्त जनित विकार, एक्सीडेंट से देह के किसी भाग में कमजोरी की संभावना रहती है और मामा पक्ष से विवाद बना रहता है।

 

७. यदि सप्तम भाव में शनि व राहु की युति हो तो ऐसी स्थिति में व्यक्ति को अनेक प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है क्योंकि सप्तम भाव से रोजगार, जीवनसाथी, दाम्पत्य जीवन, मित्र, साझेदारी आदि का विचार किया है अतः इस भाव में शनि व राहु की युति होने पर व्यक्ति को अपने मित्रों व साझेदारियों से धोखा मिलने की संभावना रहती है तथा किसी दूसरे व्यक्ति के कारण से घर के वातावरण में कलह का माहौल बना रहता है साथ ही ऐसे व्यक्तियों को किसी महिला के कारण से अपमानजनक स्थितियों का भी सामना करना पड़ता है और रोजगार के मार्ग में अनेक प्रकार की परेशानियों का सामना करते हुए धैर्य व संयम रखते हुए सफलता प्राप्त होती है।

 

८. अष्टम भाव से ससुराल, आयु, मृत्यु, पुरातत्व, रहस्मई कार्य, गूढ़ विद्या, जीवनसाथी की वाणी आदि का विचार किया जाता है अतः ऐसे स्थिति में अष्टम भाव में यदि शनि व राहु की युति हो तो व्यक्ति के दाम्पत्य जीवन में कलह की स्थितियाँ प्रायः बनी रहती है ध्यान देने योग्य बात यह है वहाँ बैठे इन दोनों ग्रह की सप्तम दृष्टि द्वितीय भाव जो आपका कुटुंब व वाणी का भाव है पर दृष्टि होती है अतः ऐसे व्यक्तियों का दाम्पत्य जीवन न्यून होता और यदि सप्तमेश अर्थात सप्तम भाव का स्वामी भी इनसे संबंध बनाता हो या त्रिक भाव में बैठा हो तो ऐसी स्थिति में दाम्पत्य जीवन को बचाना और भी मुश्किल हो जाता है साथ ही ऐसे व्यक्तियों को जीवन में कई बार शल्य चिकित्सा भी करानी पड़ सकती है तथा ऐसे व्यक्तियों को उदर व मूत्र विकार भी रहता है साथ ही ऐसे व्यक्तियों की आयुष्य पर भी अनेक बार संकट आते हैं व ऐसे व्यक्तियों के अनैतिक संबंध बनने की भी संभावना रहती है।

 

९. यदि नवम भाव में शनि व राहु की युति हो तो ऐसा व्यक्ति धर्म के विपरीत आचरण करने वाला होता है तथा ऐसे व्यक्तियों के भाग्य में निरंतर उतार-चढ़ाव आते रहते हैं साथ ही ऐसे व्यक्तियों के पिता को भी किसी प्रकार का कष्ट रहता है किंतु यदि भाग्येश की दृष्टि नवम भाव पर हो तो व्यक्ति को कड़े संघर्ष उपरांत सफलता प्राप्त होती है।

 

१०. यदि दशम भाव में शनि व राहु की युति हो तो व्यक्ति के घरेलू सुख में कुछ कमी व माता-पिता को कष्ट रहता है तथा ऐसे व्यक्तियों के कारोबार में निरंतर उतार-चढ़ाव आते रहते हैं साथ ही किसी राजा या उच्चाधिकारी से दंड भी प्राप्त होने की संभावना रहती है।

 

११. एकादश भाव को लाभ भाव भी कहा जाता है ज्योतिष का एक सर्वमान्य नियम है कि एकादश भाव में क्रूर से क्रूर ग्रह भी शुभ फल प्रदान करते है क्योंकि एकादश भाव का दूसरा नाम ही लाभ भाव है इस स्थिति में यदि शनि व राहु की युति एकादश भाव में हो तो व्यक्ति को जुए-सट्टे व किसी गलत कार्य द्वारा धन की प्राप्ति होती है किंतु ऐसे व्यक्तियों के भाई-बहन को किसी प्रकार का कष्ट अवश्य ही रहता है तथा ऐसे व्यक्तियों को संतान का पूर्ण सुख नही प्राप्त हो पाता है।

 

१२. द्वादश भाव में यदि शनि व राहु की युति हो तो व्यक्ति के अनैतिक संबंध बनने की अधिक संभावना रहती है साथ ही ऐसे व्यक्तियों के गृहस्थ सुख में कुछ कमी रहती है तथा ऐसे व्यक्तियों को जीवन में कई बार धोखा मिलता है तथा किसी असाध्य रोग से पीड़ा होती है।

 

नोट:-

 

१. शनि व राहु की युति के अतिरिक्त उपरोक्त बताए गए अन्य प्रकार से संबंध बनाने पर भी प्राप्त होते हैं।

 

२. यदि शनि व राहु की युति या प्रतियुति (शनि से सप्तम भाव में राहु या राहु से सप्तम भाव में शनि हो) शनि की मकर या कुंभ राशि में हो तो स्थितियाँ धैर्य के साथ अत्यधिक प्रयास करने पर नियंत्रण में आ जाती है।

 

३. कुंडली के प्रथम अर्थात लग्न से सप्तम तक के भाव रात्रि बली होते हैं अतः इन भावों में शनि व राहु का संबंध बनना अत्यधिक कष्टदाई होता है।

 

मैंने द्वादश भावों में पिशाच योग बनने के फल को विस्तार से बताया है अब प्रश्न यह उठता है कि इस दोष के क्या उपाय होते हैं तो सर्वप्रथम मैं यहाँ यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि किसी भी प्रकार के दोष का उपाय पूर्ण विधि व शास्त्रोचित तरह से करने पर ही लाभ मिलता है अतः मैं यहाँ कुछ उपाय बता रहा हूँ जिन्हें करने से निश्चय ही लाभ प्राप्त होगा:-

 

१. दुर्गा सप्तशती का विधि पूर्वक पाठ व दशांश कराने से पिशाच योग के दुष्प्रभाव से मुक्ति मिलती है।

 

२. नित्य संकटमोचन हनुमाष्टक व सुंदरकांड का पाठ करने से पिशाच योग के दुष्प्रभाव से मुक्ति मिलती है।

३. शनि व राहु के हवनात्मक जप से भी पिशाच योग के दुष्प्रभाव में कमी आती है।

 

४. नित्य शनि स्तोत्र का पाठ करने व अमावस्या के दिन सूर्यास्त के समय बहते पानी में नारियल प्रवाहित करने से भी पिशाच योग के दुष्प्रभाव में कमी आती है।

 

जय श्री राम।

Astrologer:- Pooshark Jetly

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भृगु सूत्र आधारित सूर्य का तृतीय भाव में फल

भृगु सूत्र आधारित सूर्य का तृतीय भाव में फल

 

तृतीय भाव में सूर्य का फल
तृतीय भाव में सूर्य का फल

 

अनेक ग्रंथों में सूर्यादि सभी ग्रहों के विभिन्न स्थानों में फल बताएं गए हैं पिछले लेख में मैंने भृगु सूत्र आधारित सूर्य के प्रथम भाव व द्वितीय में फल को बताया था अतः उसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए सूर्य के तृतीय भाव में फल को लिख रहा हूँ:-

 

 

भृगु सूत्र आधारित प्रथम भाव में सूर्य के फल को पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएं:-

 

भृगु सूत्र आधारित  प्रथम भाव में सूर्य का फल

 

१. यदि कुंडली के तृतीय भाव में सूर्य हो तो व्यक्ति बुद्धिमान होता है किंतु ऐसे व्यक्तियों को अनुजों (छोटे भाइयों) का अभाव रहता है साथ ही बड़ा भाई तो होता है किंतु बड़े भाई के सुखों में त्रुटि रहती है और ऐसे व्यक्तियों को उम्र के ४, ५, ८ अथवा १२वें वर्ष में कुछ पीड़ा होती है।

 

२. यदि कुंडली के तृतीय भाव में सूर्य पाप ग्रह से युक्त होकर बैठा हो तो व्यक्ति क्रूर कर्मों को करने वाला होता है तथा उसके दो भ्राता होते हैं साथ ही ऐसा व्यक्ति पराक्रमी तथा लड़ाई-झगड़े से न घबराने वाला और कीर्तिमान व अपने द्वारा अर्जित धन का भोग करने वाला होता है।

 

३. यदि तृतीय भाव में सूर्य शुभ ग्रहों से युक्त हो तो व्यक्ति के सहोदर भाइयों की अच्छी उन्नति व वृद्धि होती है।

 

४. यदि तृतीय भाव में सूर्य हो और तृतीयेश/पराक्रमेश बली अवस्था में बैठा हो या तृतीय भाव में सूर्य स्वराशि स्थित हो तो व्यक्ति अत्यंत पराक्रमी, खुद के पराक्रम से संपूर्ण सुख भोगने वाला, उच्च पद पर आसीन होने वाला, राजा या उच्चाधिकारी द्वारा सम्मानित होता है तथा ऐसे व्यक्तियों के भाई दीर्घायु होते हैं।

 

५. यदि तृतीय भाव में सूर्य स्थित हो और तृतीयेश/पराक्रमेश पाप ग्रहों से युक्त व दृष्ट हों तो व्यक्ति आलस्य करने वाला व पाप कर्म करने वाला होता है तथा ऐसे व्यक्तियों के भाइयों का नाश होता है।

 

६. यदि तृतीय भाव में सूर्य स्थित हो और उस पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो व्यक्ति धनवान, भोगी तथा सुखी होता है।

 

भृगु सूत्र आधारित द्वितीय भाव में सूर्य के फल को पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएं:-

 

भृगु सूत्र आधारित सूर्य का द्वितीय भाव में फल

 

जय श्री राम।

 

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भौम प्रदोष व्रत कथा—Astrology Sutras

भौम प्रदोष व्रत कथा—Astrology Sutras

 

भौम प्रदोष व्रत
भौम प्रदोष व्रत

 

हर माह की त्रयोदशी तिथि के दिन प्रदोष व्रत रखा जाता है जब त्रयोदशी तिथि मंगलवार के दिन पड़ती है तो उसे भौम प्रदोष व्रत के नाम से जाना जाता है शास्त्रों के अनुसार भौम प्रदोष व्रत करने से व्यक्ति को कर्ज से शीघ्र मुक्ति मिलती है, शास्त्रों के अनुसार जो भी व्यक्ति भौम प्रदोष का व्रत करते हुए मंगल के २१ नामों का जप करते हुए व कथा पढ़ते हुए शिव जी व हनुमान जी की उपासना करता है उसके सभी अमंगल दूर हो जाते हैं तथा कर्ज से शीघ्र छुटकारा मिल जाता है।

 

व्रत विधि:-

 

भौम प्रदोष व्रत विधि व मंगल के २१ नाम

 

प्रातः स्नानादि कर दाहिने हाथ में लाल पुष्प, रोली, अक्षत, सुपाड़ी, जल व कुछ दक्षिणा लेकर व्रत का संकल्प लेना चाहिए तदोपरांत पूरे दिन निराहार व्रत रखना चाहिए और संध्या में प्रदोष काल के समय भगवान शिव जी और हनुमान जी की पूजा अर्चना करनी चाहिए और मंगल के २१ या १०८ नामों का उच्चारण व भौम प्रदोष व्रत कथा का वाचन करना चाहिए व प्रसाद के सेवन पश्चात अन्न ग्रहण करना चाहिए।

 

मंगल के कल्याणकारी २१ नाम:-

 

 

१. मंगल
२. भूमिपुत्र
३. ऋणहर्ता
४. धनप्रदा
५. स्थिरासन
६. महाकाय
७. सर्वकामार्थ साधक
८. लोहित
९. लोहिताक्ष
१०. सामगानंकृपाकर
११. धरात्मज
१२. कुंजा
१३. भूमिजा
१४. भूमिनंदन
१५. अंगारक
१६. भौम
१७. यम
१८. सर्वरोगहारक
१९. वृष्टिकर्ता
२०. पापहर्ता
२१. सर्वकामफलदाता।

 

भौम प्रदोष व्रत कथा:-

 

भौम प्रदोष व्रत कथा
भौम प्रदोष व्रत कथा

 

एक नगर में एक वृद्ध महिला अपने पुत्र के साथ रहती थी वृद्ध महिला को हनुमान जी के प्रति गहरी आस्था थी व वह प्रत्येक मंगलवार के दिन व्रत रखकर हनुमान जी की उपासना करती थीं एक बार हनुमान जी ने उस वृद्ध महिला की श्रद्धा व भक्ति भाव की परीक्षा लेने का सोचा और साधु रूप धारण कर वृद्ध महिला के घर पधारे और कहने लगे कि क्या कोई हनुमान जी भक्त है जो मेरी एक इच्छा पूर्ण करेगा यह वचन सुनकर वृद्ध महिला द्वार पर आ गयी और बोली हे साधु महाराज आज्ञा करें मैं आपकी किस प्रकार से सहायता कर सकती हूँ तब साधु वेशधारी हुनमान जी कहने लगे कि मुझे तीव्र क्षुधा लगी है, मैं भोजन करना चाहता हूँ अतः आप जमीन पर मिट्टी का लेप लगाकर चूल्हा तैयार कर दें इस पर वह वृद्ध महिला बोलीं कि हे साधु आप मिट्टी से जमीन को लीपने व गड्ढा खोदने के अतिरिक्त अन्य कोई आज्ञा दे दें मैं उसे अवश्य पूर्ण करूँगी।

 

साधु वेशधारी हनुमान जी ने वृद्ध महिला को तीन बार प्रतिज्ञा दिलवाई और कहा कि आप अपने पुत्र को बुला दीजिए मैं उसकी पीठ पर अग्नि प्रज्वलित कर भोजन बनाऊँगा इतना सुनते ही वृद्ध महिला घबरा गयीं किंतु प्रतिज्ञा में बँधे होने के कारण उन्होंने अपने पुत्र को बुलाकर साधु वेशधारी हनुमान जी को सौंप दिया व पुनः अंदर चली गयी कुछ समय पश्चात साधु वेशधारी हनुमान जी ने वृद्ध महिला को पुनः बुलाकर कहा कि भोजन तैयार हो गया है आप भी अपने पुत्र को बाहर बुला लें ताकि वो भी इस भोजन को ग्रहण कर सके यह सुनकर वृद्ध महिला हाथ जोड़कर निवेदन करने लगीं कि हे साधु महाराज मेरे मृत पुत्र का नाम लेकर मुझे और कष्ट न दें किंतु साधु महाराज के न मानने पर उन्होंने अपने पुत्र को आवाज दी और अपने पुत्र को जीवित पाकर अचंभित हो साधु वेशधारी हनुमान जी के चरणों में गिर पड़ीं तब हनुमान जी अपने मूल स्वरूप में आए व कहने लगे कि मैं आपकी श्रद्धा और भक्ति की परीक्षा लेने आया था और उसमें आप सफल हुईं व हनुमान जी ने उन महिला को सभी अमंगल से मुक्ति व अपनी भक्ति का आशीर्वाद दिया।

 

शास्त्रों के अनुसार यदि कोई व्यक्ति कर्ज में डूब गया हो या उसके साथ निरंतर कुछ न कुछ अमंगल हो रहा हो तो उसे भौम प्रदोष व्रत अवश्य करना चाहिए ऐसा करने से हनुमान जी व शिव जी की कृपा से व्यक्ति के सभी अमंगल दूर हो जातें हैं व वह कर्ज से शीघ्र ही मुक्त हो जाता है।

 

जय श्री राम।

 

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भृगु सूत्र आधारित सूर्य का द्वितीय भाव में फल

भृगु सूत्र आधारित सूर्य का द्वितीय भाव में फल

 

द्वितीय भाव में सूर्य का फल
द्वितीय भाव में सूर्य का फल

 

अनेक ग्रंथों में सूर्यादि सभी ग्रहों के विभिन्न स्थानों में फल बताएं गए हैं पिछले लेख में मैंने भृगु सूत्र आधारित सूर्य के प्रथम भाव में फल को बताया था अतः उसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए सूर्य के द्वितीय भाव में फल को लिख रहा हूँ:-

 

 

१.यदि कुंडली के द्वितीय भाव में सूर्य हो तो व्यक्ति प्रायः मुख के रोगों से पीड़ित रहता है साथ ही उसके जीवन के २५ वें वर्ष में राजदंड के कारण (न्यायालय की आज्ञा से) से धन की हानि होती है यह सामान्य फल है किंतु यदि सूर्य अपनी उच्च राशि (मेष) या स्वराशि (सिंह) का होकर द्वितीय भाव में स्थित हो तो मुख रोग तथा राजदंड से धन का नाश नही होता है।

 

२.यदि द्वितीय भाव में सूर्य के साथ पाप ग्रह बैठे हों तो व्यक्ति नेत्र रोगी होता है साथ ही थोड़ा विद्वान तथा रोगी शरीर वाला होता है।

 

३.यदि द्वितीय भाव में स्थित सूर्य पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो व्यक्ति धनी होता है और उसकी कुंडली के अनेक दोषों (बुरे फल) का नाश हो जाता है तथा उसके नेत्रों में भी कोई रोग नही होता है।

 

४.यदि द्वितीय भाव में सूर्य अपनी उच्च राशि (मेष) या स्वराशि (सिंह) का होकर स्थित हो तो ऐसा व्यक्ति बहुत धनवान होता है और उसे प्रचुर सम्पन्नता तथा वैभव की प्राप्ति होती है।

 

५.यदि द्वितीय भाव में सूर्य के साथ बुध भी स्थित हो तो व्यक्ति शीघ्रता पूर्वक बोलता है (यहाँ मूल में पवनवाक शब्द का प्रयोग हुआ है इसका अर्थ है कि जैसे तेज हवा चलती है ठीक उसी प्रकार तेज रफ्तार से बातचीत करने वाला)

 

६.यदि द्वितीय भाव में सूर्य स्थित हो व द्वितीय भाव का स्वामी स्वराशि या उच्च राशि में स्थित हो तो व्यक्ति वाग्मी (वार्तालाप में कुशल) होता है साथ ही इस योग में जन्मा व्यक्ति विविध विज्ञानों एवं कलाओं में निष्णात होता है ऐसा व्यक्ति ज्ञानवान तथा अच्छे नेत्र दृष्टि वाला होता है और राजयोग का पूर्ण सुख प्राप्त करता है।

 

जय श्री राम।

 

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ज्योतिष के कुछ प्रसिद्ध व सर्वमान्य सूत्र

ज्योतिष के कुछ प्रसिद्ध व सर्वमान्य सूत्र:-

 

ज्योतिष के कुछ प्रमाणित व प्रसिद्ध सूत्र
ज्योतिष के कुछ प्रमाणित व प्रसिद्ध सूत्र

 

१. यदि सौम्य ग्रह (बुध, गुरु, शुक्र और पूर्णिमा का चंद्र) केंद्र के स्वामी हों तो शुभ फल नही प्रदान करते हैं।

 

२. यदि क्रूर ग्रह (सूर्य, मंगल, शनि, क्षीण अर्थात अमावस्या का चंद्र व पाप ग्रह से ग्रस्त बुध) केंद्र के स्वामी हो तो अशुभ फल नही प्रदान करते हैं।

 

३. अष्टम भाव में कोई भी ग्रह हो चाहे व स्वग्रही हो या उच्च के स्वास्थ्य संबंधित समस्याएं अवश्य ही प्रदान करते हैं।

 

४. कर्क व सिंह लग्न वालों के लिए मंगल अधिक शुभ होता है क्योंकि इन कुंडलियों में मंगल त्रिकोण व केंद्र के स्वामी होकर राजयोगकारक हो जाते हैं।

 

५. राहु और केतु को छाया ग्रह कहा गया है अतः यह ग्रह जिन ग्रहों के साथ या जिन राशि पर बैठते हैं उनके फल के अनुसार ही अपना फल प्रदान करते हैं।

 

६. त्रिकोण और केंद्र के स्वामी भले दोषयुक्त हों किंतु यदि ये आपस में संबंध बनाते हैं तो योगकारक बनकर शुभ फल प्रदान करते हैं।

 

७. राहु में केतु की अंतर्दशा सदैव ही कष्टदायक होती है।

 

८. योगकारक ग्रह की दशा में राजयोग समान सुख की प्राप्ति होती है किंतु यदि योगकारक ग्रह पाप ग्रह से युत या दृष्ट हो या त्रिक भाव में स्थित हो तो कुछ संघर्ष के साथ उन्नति व सफलता देते हैं।

 

९. यदि कोई क्रूर ग्रह योगकारक ग्रह से संबंध बनाता है तो क्रूर ग्रह की दशा के अंदर योगकारक ग्रह की अंतर्दशा शुभ फलदाई होती है।

 

१०. यदि कोई क्रूर ग्रह योगकारक ग्रह से संबंध बनाता है तो योगकारक ग्रह की दशा के अंदर क्रूर ग्रह की अंतर्दशा संघर्ष का सूचक होती है।

 

११. यदि योगकारक ग्रह त्रिकोण में स्थित हो या त्रिकोण भाव के स्वामी से संबंध बना ले तो अत्यंत शुभफलदाई होता है जिसमें राजा के समान सुख की प्राप्ति होती है।

 

१२. अष्टम भाव का शनि आयुष्य की वृद्धि करता है किंतु वाणी दोष के कारण से दाम्पत्य सुख की हानि करता है।

 

१३. यदि राहु या केतु केंद्र में बैठे हों और केंद्र या त्रिकोण के स्वामी से युत या दृष्ट हों तो राहु व केतु भी योगकारक हो जाते हैं।

 

१४. कुंडली का अष्टम भाव आयुष्य का भाव होता है और अष्टम से अष्टम भाव अर्थात लग्न कुंडली का तीसरा भाव भी आयुष्य का भाव होता है।

 

१५. लग्न कुंडली का द्वितीय, सप्तम व द्वादश भाव मारक भाव होते हैं क्योंकि सप्तम व द्वितीय भाव आयुष्य भाव के व्यय भाव व द्वादश भाव लग्न का व्यय भाव होता है।

 

ज्योतिष के कुछ प्रसिद्ध व सर्वमान्य सूत्र
ज्योतिष के कुछ प्रसिद्ध व सर्वमान्य सूत्र

 

१६. यदि मारक ग्रहों की दशा में मृत्यु न हो तो कुंडली में जो भी पाप ग्रह अधिक बलवान होगा उसकी दशा में व्यक्ति की मृत्यु होती है।

 

१७. यदि शनि मारक भाव से संबंध बनाता है तो प्रवल मारक बन जाता है।

 

१८. कोई भी ग्रह अपनी महादशा के अंदर अपनी ही अंतर्दशा में कभी शुभ फल प्रदान नही करते हैं।

 

१९. मारक ग्रहों की दशा में योगकारक ग्रह की अंतर्दशा में व्यक्ति को प्रसिद्धि अवश्य प्राप्त होती है किंतु पूर्ण सुख नही मिल पाता है।

 

२०. शुक्र की दशा में शनि की अंतर्दशा हो तो व्यक्ति को शुक्र ग्रह के ही फल की प्राप्ति होती है ठीक इसी प्रकार शनि की महादशा में शुक्र की अंतर्दशा हो तो व्यक्ति को शनि के ही फल प्राप्त होते हैं।

 

२१. यदि लग्न का स्वामी दशम में हो और दशम का स्वामी लग्न में हो तो यह बहुत ही शुभ फलदाई होता है ऐसा व्यक्ति खुद के परिश्रम से अनेक सफलताएं प्राप्त कर प्रसिद्ध हो जाता है और राजा या राज्य सरकार या किसी उच्च अधिकारी से सम्मान प्राप्त करता है।

 

२२. यदि नवम का स्वामी दशम में हो और दशम का स्वामी नवम में हो तो ऐसा व्यक्ति निश्चय ही बड़ी उन्नति प्राप्त करता है।

 

२३. यदि नवम का स्वामी दशम में हो और दशम का स्वामी लग्न में हो तो ऐसे व्यक्ति को दशम भाव में जो राशि हो उसके स्वामी से संबंधित वस्तुओं का व्यापार करना चाहिए।

 

२४. यदि नवम का स्वामी एकादश में हो तो ऐसा व्यक्ति निश्चय ही धनवान होता है।

 

२५. यदि एकदाश भाव का स्वामी लग्न में हो तो ऐसे व्यक्तियों को हर ११वें दिन कोई न कोई लाभ अवश्य मिलता है।

 

जय श्री राम।

 

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Astrology Sutras Remedies Recent Post कुछ अचूक टोटके व शाबर मंत्र

मकर सक्रांति के 10 अचूक उपाय—Astrology Sutras

मकर सक्रांति के 10 अचूक उपाय—Astrology Sutras

 

मकर सक्रांति के अचूक उपाय
मकर सक्रांति के अचूक उपाय

 

शास्त्रों के अनुसार सूर्य के गोचर परिवर्तन को सूर्य की सक्रांति के नाम से जाना जाता है जब सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने उनके घर अर्थात मकर राशि में प्रवेश करते हैं तो मकर की सक्रांति अर्थात मकर सक्रांति का पर्व मनाया जाता है मकर सक्रांति के साथ ही खरमास का समापन व मांगलिक कार्यक्रमों का आरंभ हो जाता है चूँकि इस बार गुरु व शुक्र के अस्त रहने के कारण से मांगलिक कार्यक्रम के लिए शुभ मुहर्त 22 अप्रैल से प्राप्त होंगे, शास्त्रों में मकर सक्रांति के दिन कुछ विशेष उपायों का वर्णन मिलता है जिनसे अनेक परेशानियों से मुक्ति मिलती है तो चलिए जानते हैं कि ऐसे कौन से उपाय है जिनको करने से अनेक परेशानियों से मुक्ति मिलती है:-

 

१.  मकर सक्रांति के दिन सूर्योदय के पूर्व तिल स्नान (नहाने के पानी में तिल मिलाकर स्नान) करना चाहिए तथा उगते हुए सूर्य को ताँबे के पात्र में जल, कुमकुम, अक्षत, तिल, गुण व लाल पुष्प मिलाकर “ॐ घृणि सूर्याय नमः” मन्त्र का जाप करने से सूर्य देव की कृपा से आरोग्यता की प्राप्ति होती है।

 

२.  मकर सक्रांति के दिन गरीबों व ब्राह्मणों को भोजन कराने से घर में अन्न की कभी कमी नही होती है।

 

३.  मकर सक्रांति के दिन गुण व कच्चा चावल बहते पानी में प्रवाहित करने से नजर दोष से मुक्ति व आरोग्यता की प्राप्ति होती है।

 

४.  मकर सक्रांति के दिन साफ लाल वस्त्र में गेहूँ और गुण को बाँधकर कुछ दक्षिणा के साथ ब्राह्मण व गरीबों को दान करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

 

५.  जिस किसी की कुंडली में सूर्य अशुभ स्थिति में हो उन्हें ताँबे का सिक्का या ताँबे का चौकोर टुकड़ा बहते पानी में सूर्य के मंत्र “ॐ घृणि सूर्याय नमः” का जप करते हुए प्रवाहित करने से लाभ मिलता है।

 

६.  मकर सक्रांति के दिन तिल युक्त जल पितरों को अर्पित करने, तिल से अग्नि में हवन करने, गरीबों को तिल का दान व भोजन (तिल युक्त खिचड़ी) कराने से अनन्य पुण्य की प्राप्ति होती है।

 

७. मकर सक्रांति के दिन गाय को तिल युक्त खिचड़ी खिलाने से सभी ग्रहों से उत्पन्न दोषों से मुक्ति मिलती है।

 

८. यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में सूर्य नीच राशि के हैं तो उन्हें मकर सक्रांति के दिन सूर्य यंत्र की विधि पूर्वक स्थापना करनी चाहिए तथा उस यंत्र को नित्य ताँबे के पात्र में जल, अक्षत, कुमकुम व लाल पुष्प मिलाकर अर्पित करते हुए 501 की संख्या में सूर्य मंत्र “ॐ घृणि सूर्याय नमः” का जप करना चाहिए इस उपाय से लाभ अवश्य प्राप्त होगा व धन, स्वास्थ्य, रक्त जनित विकार जैसी समस्याओं से मुक्ति मिलेगी तथा सामाजिक प्रतिष्ठा व मान-सम्मान की प्राप्ति होगी।

 

९.  मकर सक्रांति के दिन गरीबों को खिचड़ी, कंबल, गरम वस्त्र, लकड़ी (अलाव जलाने हेतु), घी, दाल-चावल इत्यादि वस्तुओं का दान करने से सभी मनोकामनाओं की पूर्ति होती है।

 

१०.  मकर सक्रांति के दिन प्रातः स्नानादि कर के सूर्य को तांबे के पात्र से जल, कुमकुम, लाल पुष्प, अक्षत, तिल इत्यादि को मिलाकर अर्पित करने व अदित्यहिर्दय स्तोत्र का पाठ करने से सभी कष्टों से मुक्ति व कार्य में सफलता प्राप्त होती है।

 

जय श्री राम।

Astrologer:- Pooshark Jetly

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Mobile:- 9919367470

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राहु व केतु गोचर परिवर्तन 23 सितंबर 2020 भाग:-४ जानिए किन राशियों पर राहु व केतु की कृपा बरसेगी

राहु व केतु गोचर परिवर्तन 23 सितंबर 2020 भाग:-४ जानिए किन राशियों पर राहु व केतु की कृपा बरसेगी

 

राहु व केतु राशि परिवर्तन
राहु व केतु राशि परिवर्तन

 

भाग:-४

 

राहु व केतु गोचर परिवर्तन 23 सितंबर 2020 भाग:-१ जानिए किन राशियों पर राहु की कृपा बरसेगी

राहु व केतु गोचर परिवर्तन 23 सितंबर 20290: राहु को सदैव ही नियंत्रित करने वाले केतु इस बार खुद ही नियंत्रण के बाहर रहेंगे जिनको नियंत्रित राहु करेंगे जानिए, राहु व केतु गोचर परिवर्तन से किन-किन राशियों पर राहु व केतु की कृपा बरसेगी।

 

राहु व केतु का 12 राशियों पर प्रभाव
राहु व केतु का 12 राशियों पर प्रभाव

 

मकर राशि:-

 

मकर राशिफल
मकर राशिफल

 

मकर राशि वालों के लिए राहु व केतु का यह गोचर सामान्य रहेगा क्योंकि वर्तमान में अभी शनि के साढ़ेसाती का दूसरा चरण भी आपकी राशि पर चल रहा है हालांकि तुला, मकर व कुंभ राशि वालों पर शनि की साढ़ेसाती का उतना अशुभ प्रभाव नही पड़ता है किंतु यदि चंद्रमा का किसी भी प्रकार से शनि से संबंध बने तो साढ़ेसाती परेशानी देती है अन्यथा इन तीन राशि वालों के लिए शनि की साढ़ेसाती उतनी अशुभ नही होती हालांकि हम यहाँ राहु व केतु के गोचर परिवर्तन पर चर्चा कर रहे है अतः प्रेम संबंधों में कमी आएगी, प्रेमी व प्रेमिका से विवाद होते रहेंगे तथा यदि आप दोनों के मध्य काफी समय से विवाद चल रहा है तो वह विवाद संबधों को विच्छेद करा कर समाप्त होगा, प्रेमियों के मध्य गलतफहमियों के चलते विवाद होंगे, संतान को कष्ट, संतान से विवाद, संतान की शिक्षा में बाधाएं आएंगी, विद्यार्थियों के लिए राहु व केतु का यह गोचर मिला-जुला रहेगा शिक्षा में व्यवधान आएंगे, विद्यार्थियों के मन में क्या करें व क्या न करें को लेकर मन में संशय बना रहेगा, कुछ देर ध्यान करें इससे मन को एकाग्र करने में मदद मिलेगी हालांकि लाभ के लिहाज से यह गोचर शुभ सिद्ध होगा फलस्वरूप लाभ के अन्य माध्यम बनेंगे, लाभ में वृद्धि होगी, लंबे समय से कार्यक्षेत्र में (चाहे वह नौकरी पेशा व्यक्ति हों या व्यापारी) उन्नति के मार्ग में जो बाधाएं आ रही थी वह दूर होंगी, शेयर बाजार, जुआ व सट्टे से अकास्मिक धन लाभ के योग बनेंगे, राजनीति के क्षेत्र से जुड़े लोगों को भी लाभ होगा आपकी वाणी का लोगों पर अच्छा प्रभाव भी पड़ेगा तथा उन्नति के अवसर भी प्राप्त होंगे, भाग्य का पूर्ण सहयोग प्राप्त होगा, भाग्य में वृद्धि होगी, पिता से वैचारिक मतभेद व पिता के स्वास्थ्य में समस्या रहेगी, भ्रम की स्थितियाँ बनेंगी, मकर राशि वाले जातक/जातिकाओं के लिए इस गोचर काल की सबसे बड़ी समस्या भ्रामक स्थिति रहेगी अतः धैर्य व संयम से कार्य करें व कोई भी निर्णय बहुत सोच समझ कर लें तथा आवेश में आने से बचें यदि आपने भ्रामक स्थिति न बनने दी तो राहु व केतु का यह गोचर आपके लिए शुभ सिद्ध होगा, आय में वृद्धि होगी, नौकरी पेशा लोगों के प्रमोशन के योग बनेंगे, बेरोजगारों को नौकरी प्राप्त होगी, यदि आपकी कुंडली में चंद्रमा का शनि से संबंध बन रहा है तो आपको बुद्धि व विवेक से हर कार्य करना होगा क्योंकि राहु आपके चित्त को शांत नही होने देंगे जिससे बनते कार्य बिगड़ेंगे, वहिं केतु आपको सही दिशा में प्रयत्न नही करने देंगे जिससे व्यापार व दामपत्य जीवन के सुख में बाधाएं आएंगी, यह गोचर आपके लिए 48% शुभ तथा 52% अशुभ रहेगा।

 

उपाय:- सुंदरकांड व बटुक भैरव स्तोत्र का नित्य पाठ करें तथा जिनकी कुंडली में चंद्रमा शनि से संबंध रखता हो वह इन उपायों के साथ प्रत्येक शनिवार को 108 बार हनुमान चालीसा का पाठ करें लाभ होगा।

 

राहु व केतु गोचर परिवर्तन 23 सितंबर 2020 भाग:-२ जानिए किन राशियों पर राहु व केतु की कृपा बरसेगी

राहु व केतु गोचर परिवर्तन 23 सितंबर 2020 भाग:-२ जानिए, कर्क से कन्या राशि वालों के लिए राहु-केतु का यह गोचर कितना शुभ रहेगा।

 

कुंभ राशि:-

 

कुंभ राशिफल
कुंभ राशिफल

 

कुंभ राशि वालों के लिए राहु व केतु का यह गोचर मिला-जुला रहेगा जिनकी कुंडली में चंद्रमा का शनि से संबंध बन रहा हो उनके लिए मुश्किलें ज्यादा रहेंगी अतः घर में कलह-क्लेश होंगे, मानसिक अशांति अनुभव होगी, कार्यक्षेत्र में हानि संभव है, नौकरी पेशा लोग बहुत ही सतर्कता के साथ कार्य करें, आपको अपने प्रियजनों का सहयोग कम मिलेगा, वाणी में तेजी रहेगी अतः वाणी व क्रोध पर नियंत्रण रखें, धैर्य व संयम से कार्य करें, स्वास्थ्य का ख्याल रखें, शत्रुओं से सावधान रहें, किसी से ऋण लेने से बचें, जिनकी कुंडली में चंद्रमा का शनि से संबंध नही है उनके लिए यह गोचर कुछ राहत देगा, कार्यक्षेत्र में विकास होगा, नौकरी परिवर्तन व स्थान परिवर्तन के योग बनेंगे, जिनका कार्य कमीशन, फाइनेंस, बैंकिंग, टीचिंग से जुड़ा हुआ है उनके लिए यह गोचर लाभप्रद सिद्ध होगा हालाँकि घर में कलह-क्लेश होते रहेंगे फिर भी चंद्रमा का शनि से संबंध न होने के कारण से आपकी सोच-विचार करने की शक्ति जागृत रहेगी, राजनीति से या सामाजिक वर्ग से जुड़े लोग अपनी वाणी पर विशेष नियंत्रण करें तथा शराब, माँसाहार का सेवन न करें क्योंकि इनका सेवन आपके लिए मुश्किलें बढ़ाने वाला सिद्ध होगा, शत्रुओं से सावधान रहें, यह गोचर आपके लिए 50% शुभ तथा 50% अशुभ रहेगा।

 

उपाय:- हनुमान जी, गणेश जी व भैरव जी की नित्य पूजा करें व गणेश अथर्वशीर्ष, संकटमोचन हनुमाष्टक और भैरव स्तोत्र का नित्य पाठ करने से लाभ होगा।

 

राहु व केतु गोचर परिवर्तन 23 सितंबर 2020 भाग:-३ जानिए किन राशियों पर राहु व केतु की कृपा बरसेगी

राहु व केतु गोचर परिवर्तन 23 सितंबर 2020: *भाग:-३* राहु को सदैव ही नियंत्रित करने वाले केतु इस बार खुद नियंत्रण के बाहर रहेंगे जिनको नियंत्रित राहु करेंगे जानिए, राहु व केतु के गोचर परिवर्तन से तुला, वृश्चिक व धनु राशि में से किन पर राहु की कृपा बरसेगी व आपको क्या-क्या सावधानी बरतनी चाहिए तथा उपाय।

 

मीन राशि:-

 

मीन राशिफल
मीन राशिफल

 

मीन राशि वालों के लिए राहु व केतु का यह गोचर शुभ रहेगा बशर्ते आपकी कुंडली में राहु पीड़ित अवस्था में हो फलस्वरूप पराक्रम में वृद्धि होगी, भाग्य में वृद्धि होगी व भाग्य का पूर्ण सहयोग भी प्राप्त होगा, व्यापार में भी लाभ होगा व व्यापार की वृद्धि होगी, नए कार्य की शुरुवात होने के योग बनेंगे, बेरोजगारों को नौकरी प्राप्त होगी, यदि आप क्रिकेट, फुटबॉल, कबड्डी, हॉकी, पुलिस, आर्मी से जुड़े हुए हैं तो यह गोचर आपके लिए बेहद शुभ सिद्ध होगा, छोटे भाई-बहन से वैचारिक मतभेद संभव रहेंगे, दामपत्य जीवन में क्षणिक विवाद होते रहेंगे, बड़े भाई-बहन का सम्मान करें, मन में भ्रम की स्थिति उत्पन्न होगी अतः अपने विवेक से कार्य करें व कोई भी निर्णय बहुत सोच-समझ कर ही लें, दिमाग आपका तेजी से कार्य करेगा, आपके ज्ञान में भी वृद्धि के योग बनेंगे, विद्यार्थियों के लिए भी यह गोचर बेहद शुभ रहेगा, रुका हुआ धन प्राप्त होगा व ऐसे सभी कार्य जो लंबे समय से रुके हुए हैं अब पूर्ण होंगे, सरकारी नौकरी की जो लोग लंबे समय से तैयारी कर रहे हैं उन्हें सरकारी नौकरी प्राप्त होने के योग बनेंगे, यात्राएं चाहे लंबी हो या छोटी लाभप्रद सिद्ध होंगी, धर्म का पालन करें व अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें, बीते समय में आपको जो भी नुकसान हुए अब उनकी भरपाई होने के योग बनेंगे, यह गोचर आपके लिए 80% शुभ व 20% अशुभ रहेगा।

 

उपाय:- दशांश करें यहाँ दशांश का तात्पर्य अपने कमाई का दसवाँ हिस्सा किसी अनाथालय या वृद्धाश्रम में दान करने से हैं तथा शिव जी की पूजा व शिव परिवार की सेवा करें।

 

जय श्री राम।

 

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राहु व केतु गोचर परिवर्तन 23 सितंबर 2020 भाग:-२ जानिए किन राशियों पर राहु व केतु की कृपा बरसेगी

राहु व केतु गोचर परिवर्तन 23 सितंबर 2020 भाग:-२ जानिए किन राशियों पर राहु व केतु की कृपा बरसेगी

 

राहु व केतु राशि परिवर्तन
राहु व केतु राशि परिवर्तन

 

कर्क राशि:-

 

कर्क राशिफल
कर्क राशिफल

 

कर्क राशि वाले के लिए राहु व केतु का यह गोचर शुभ सिद्ध होगा फलस्वरूप लाभ प्राप्त होगा, आय में वृद्धि होगी तथा आय के नए स्त्रोत बनेंगे, लॉटरी, जुआ, शेयर बाजार से लाभ प्राप्त होगा, रुका हुआ धन प्राप्त होगा, पराक्रम में वृद्धि होगी, छोटे भाई-बहन से क्षणिक विवाद संभव है, विद्यार्थियों के लिए राहु-केतु का यह गोचर मिला-जुला सिद्ध होगा, विद्यार्थियों में एकाग्रता की कमी देखने को मिलेगी, विद्यार्थियों के मन में भ्रम बना रहेगा, गर्भवती महिलाएं स्वास्थ्य का विशेष ख्याल रखें, नए व्यापार की शुरुवात कर सकते हैं लाभ होगा, जीवनसाथी के स्वास्थ्य में परेशानी संभव है, पार्टनरशिप में नुकसान हो सकता है, जीवनसाथी के कमर, जोड़ों व पैर में समस्या संभव है, दामपत्य जीवन में क्षणिक विवाद संभव है, भाग्य में वृद्धि होगी, क्रोध पर नियंत्रण रखें, आध्यात्म की ओर झुकाव बड़ेगा, यह गोचर आपके लिए 90% शुभ तथा 10% अशुभ रहेगा।

 

उपाय:- नित्य सुंदरकांड का पाठ करें, एकादशी का व्रत करें।

 

सिंह राशि:-

 

सिंह राशिफल
सिंह राशिफल

 

सिंह राशि वालों के लिए राहु-केतु का यह गोचर शुभ सिद्ध होगा फलस्वरूप राजनीति क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए यह गोचर शुभ सिद्ध होगा, नौकरी पेशा लोगों के लिए राहु-केतु का यह गोचर बेहद शुभ सिद्ध होगा, सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे लोगों के लिए सरकारी नौकरी लगने के योग बनेंगे, बेरोजगारों को नौकरी प्राप्त होगी, जो लोग नया व्यापार आरंभ करना चाहते हैं उनके लिए भी यह गोचर शुभ सिद्ध होगा, आय में वृद्धि होगी, पैतृक संपत्ति को लेकर चल रहे विवाद का अंत होगा, जिनका कार्य वाणी से संबंधित है उनके लिए राहु-केतु का यह सर्वश्रेष्ठ सिद्ध होगा, घर में कलह-क्लेश का माहौल रहने से मन अप्रसन्न रहेगा, माता के स्वास्थ्य का विशेष ख्याल रखें, माता से विवाद संभव है, मित्रों या किसी भरोसेमंद व्यक्ति से धोखा मिल सकता है, शत्रुओं पर विजय प्राप्त होगी, भूमि व मकान सतर्कता के साथ खरीदें, भ्रष्टाचारियों के लिए यह गोचर शुभ नही है अतः कुछ समय के लिए इससे दूर रहें अन्यथा जेल यात्रा के योग बनेंगे, माता के जोड़ों में दर्द, थाइराइड की समस्या हो सकती है, लंबे समय से चली आ रही बीमारी दूर होगी, ऋण से मुक्ति मिलेगी, राजनीति से जुड़े लोगों के लिए यह गोचर बेहद शुभ सिद्ध होगा व सम्मान की प्राप्ति होगी, आध्यात्म की ओर झुकाव बढ़ेगा, आय के साथ व्यय में भी वृद्धि होगी, यह गोचर आपके लिए 93% शुभ तथा 7% अशुभ रहेगा।

 

उपाय:- माता-पिता का सम्मान करें, गणेश जी के मंत्रों का जाप करें।

 

कन्या राशि:-

 

कन्या राशिफल
कन्या राशिफल

 

कन्या राशि वालों के लिए राहु-केतु का यह गोचर शुभ रहेगा फलस्वरूप भाग्य में वृद्धि होगी व भाग्य का पूर्ण सहयोग भी प्राप्त होगा, विद्यार्थियों का मन अशांत रह सकता है, पराक्रम में वृद्धि होगी, मन मे भ्रम की स्थिति बन रही होगी, मन में नए विचार आएंगे, नौकरी परिवर्तन या किसी नए कार्य की शुरुवात संभव है, आय में उतार-चढ़ाव आएंगे किंतु लाभ निश्चित होगा, घर में मांगलिक कार्यक्रम होने के योग बनेंगे, जो लोग विवाह योग्य हो गए हैं उनके विवाह के योग बनेंगे, छोटे भाई-बहन से वैचारिक मतभेद संभव है, आध्यात्म की ओर झुकाव बढ़ेगा, लंबे समय से चली आ रही उदासीनता दूर होगी, यह गोचर आपके लिए 90% शुभ तथा 10% अशुभ रहेगा।

 

उपाय:- हनुमान चालीसा व गणेश चालीसा का नित्य पाठ करें तथा नित्य हनुमान की को एक घी का दीपक अर्पित करते हुए 11 बार हनुमान गायत्री मंत्र का जाप करें लाभ होगा।

 

……शेष अगले भाग में।

जय श्री राम।

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