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तुला राशि: जानिए, तुला राशि वाले व्यक्तियों के जीवन से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें

तुला राशि: जानिए, तुला राशि वाले व्यक्तियों के जीवन से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें

 

तुला राशि वाले व्यक्तियों के जीवन से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें
तुला राशि वाले व्यक्तियों के जीवन से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें

 

तुला राशि वाले व्यक्ति देवताओं और ब्राह्मणों के भक्त किंतु चंचल स्वभाव और कृश शरीर वाले होते हैं, ऐसे व्यक्तियों का कद सामान्यतः लंबा होता है तथा ऐसे व्यक्ति खरीद-फरोख्त में होशियार, धैर्यवान, इंसाफ पसंद करने वाले तथा प्रायः दो नाम वाले होते हैं, तुला राशि वाले व्यक्ति घूमने-फिरने के शौकीन होते हैं, इनकी संतान प्रायः कम ही होती है साथ ही तुला राशि वालों का भाग्योदय कुछ विलंब के साथ होता है, तुला राशि वाले व्यक्ति भोगी, धार्मिक, चतुर, बुद्धिमान, कला में कुशल, राजा प्रिय, पितृ सेवी, वस्तुओं का संग्रह करने वाले, विद्वान, धनी, अत्यंत बोलने वाले, मित्रों से युक्त, संगीत, कविता व युद्ध के प्रेमी, सभा-सोसाइटी और कंपनी इत्यादि में रुचि रखने वाले, अपने जीवन के प्रत्येक कार्य में अन्य किसी पर भरोसा रखने वाले, लंबे कद वाले, बलवान, उन्नत नासिका वाले और वायु प्रकृति से पीड़ित होते हैं, तुला राशि वाले व्यक्तियों को सर, उदर एवं चर्म रोग संभव रहता है साथ ही इन्हें जल भय भी रहता है, तुला राशि वाले व्यक्ति स्त्री के अधीन, बहु स्त्री भोगी अर्थात दो विवाह करने वाले, कृषि करने में चतुर तथा क्रय-विक्रय से लाभ प्राप्त करने वाले होते हैं।

 

तुला राशि वाले व्यक्तियों के लिए १, ३, ५, ६, १५, २५, २६, ३६, ४६ व ५६ वां वर्ष अनिष्टकारी होता है प्रथम वर्ष में ज्वर, तृतीय वर्ष में अग्नि भय, वें वर्ष में ज्वर पीड़ा, १५ वें वर्ष में सामान्य पीड़ा और २५ वें वर्ष में अधिक पीड़ा रहती है, यदि चंद्रमा को शुभ ग्रह देखते हैं और आयु सुख को करने वाले अन्य योग न बनते हो और उपर्युक्त बताए गए वर्षों को पार कर लें तो ८५ वर्ष की औसत आयु प्राप्त करते हैं कुछ ग्रंथकारों के अनुसार तुला राशि वाले व्यक्तियों की आयु ६५ वर्ष ११ माह की होती है तथा इन्हें मृत्यु उपरांत ख्याति अवश्य ही मिलती है, तुला राशि वाले व्यक्तियों के लिए चतुर्थी, नवमी व चतुर्दशी तिथि अनिष्टकारी होती है तथा मिथुन, कन्या, मकर और कुंभ राशि वालों से मित्रता एवं कर्क व सिंह राशि वालों से शत्रुता रहती है, रत्नों में इनके लिए हीरा शुभदायी होता है, वैशाख मास, शुक्ल पक्ष, अष्टमी तिथि, शुक्रवार व आश्लेषा नक्षत्र और दिन का प्रथम प्रहर इनके लिए अनिष्टकारी होता है।

 

जय श्री राम।

 

Astrologer:- Pooshark Jetly

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सिंह राशि: जानिए, सिंह राशि वाले व्यक्तियों के जीवन से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें

सिंह राशि: जानिए, सिंह राशि वाले व्यक्तियों के जीवन से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें

 

सिंह राशि वाले व्यक्तियों से जुड़ी मुख्य बातें

 

सिंह राशि वाले व्यक्तियों की चेहरा कुछ बड़ा और ठोड़ी कुछ मोटी होती है, ऐसे व्यक्ति अभिमानी, पराक्रमी, स्थिर बुद्धि वाले और अपनी माता के विशेष प्यारे होते हैं, सिंह राशि वाले व्यक्ति वनों और पहाड़ों वाले जगहों पर घूमने के शौंकीन होते है साथ ही इनमें क्रोध की अधिकता रहती है, सिंह राशि वाले व्यक्ति धन-धान्य से युक्त, लक्ष्मीवान, विद्वान, सभी कलाओं में निपुण, अहंकारी, निष्ठुर, सत्यवादी, विदेश यात्रा पसंद करने वाले, शत्रु पर विजय प्राप्त करने वाले, तीक्ष्ण स्वभाव, उदार, मानसिक दुःख से पीड़ित, बुद्धिमान, निष्कपट, माता के प्रेमी, वस्त्र व सुगंधित द्रव्यों में रुचि रखने वाले, कला, संगीत व चित्र प्रेमी, उच्च पद प्राप्ति हेतु प्रयत्नशील रहने वाले, किसी की अधीनता जल्द न स्वीकार करने वाले और कभी-कभी कुंडली में ग्रहों द्वारा चतुर्थ भाव को पीड़ित करने की अवस्था में बाल्यकाल में दो स्त्रियों द्वारा दुग्धपान कराए जाने वाले होते हैं, सिंह राशि वाले व्यक्ति शरीर से पुष्ट, पीठ पर तिल या मस्से से युक्त चिन्ह, पेट के वाम भाग में वात रोग, सर, दंत, गला एवं उदर रोग से पीड़ित, भूख-प्यास और मानसिक व्यथा से पीड़ित, स्त्रियों से शत्रुता व अनबन रखने वाले होते हैं, सिंह राशि वाले व्यक्तियों की संतान प्रायः कम होती है, चोर के माध्यम से सिंह राशि वालों को नुकसान उठाना पड़ता है तथा अग्नि से भय रहता है।

 

सिंह राशि वालों के लिए १, ५, ७, २०, २१, २८, ३० और ३२ वर्ष अनिष्टकारी होता है प्रथम वर्ष में प्रेत-पिशाच आदि बाधा से पीड़ा, पाँचवें वर्ष में अग्नि भय, सातवें वर्ष में ज्वर पीड़ा एवं विसूचिका रोग, २० वें वर्ष में सर्प भय, २१ वें वर्ष में पीड़ा, २८ वें वर्ष में अपवाद और ३२ वें वर्ष में पीड़ा होती है, यदि अष्टम, तृतीय, लग्न पर आशुभ ग्रहों का प्रभाव न हो और शनि या चंद्रमा या शुक्र में से कोई एक या दो या तीनों तृतीय व अष्टम भाव में स्थित हो तो व्यक्ति की औसत आयु ८७ वर्ष तक रहती है वहीं कुछ ग्रंथकारों ने बताया है कि ऐसी स्थिति में व्यक्ति की आयु १०० से ११७ वर्ष तक होती है, सिंह राशि वालों के लिए तृतीया, अष्टमी और त्रयोदशी तिथि अशुभ होती है, रविवार किसी भी कार्य के आरंभ हेतु शुभ होता है, मेष, मिथुन, कर्क, कन्या, वृश्चिक, धनु और मीन राशि वाले व्यक्ति सिंह राशि वालों के लिए शुभचिंतक व सहयोगी अर्थात अच्छे मित्र होते हैं किंतु तुला, मकर और कुंभ राशि वाले व्यक्तियों से प्रायः इनकी शत्रुता रहती है, फाल्गुन मास, कृष्ण पक्ष, तृतीया, पंचमी, अष्टमी और त्रयोदशी तिथि, मंगलवार, दोपहर का समय सिंह राशि वालों के लिए अनिष्टकारी रहता है साथ ही सिंह राशि वाले व्यक्तियों को जल से भी मृत्यु भय होता है।

 

जय श्री राम।

 

Astrologer:- Pooshark Jetly

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कोरोना और ज्योतिष जानिए ज्योतिषीय आकलन के अनुसार कब मिलेगी कोरोना से मुक्ति

कोरोना और ज्योतिष जानिए ज्योतिषीय आकलन के अनुसार कब मिलेगी कोरोना से मुक्ति

भाग:-१

 

कोरोना और ज्योतिष: जानिए, कब मिलेगी कोरोना से मुक्ति
कोरोना और ज्योतिष: जानिए, कब मिलेगी कोरोना से मुक्ति

 

कोरोना एक ऐसी महामारी जिसने सिर्फ भारत ही नही अपितु पूरे विश्व में त्राहि-त्राहि मचा रखी है अनगिनत लोग इस महामारी के प्रभाव में आकर असमय ही काल के मुख में समा रहे हैं इस महामारी को लेकर हमारे पंचांगों ने पूर्व में ही सतर्क किया था कि “इस वर्ष (२०१९-२०२०) में विषाणु जनित महामारी का प्रकोप रहेगा।” किंतु यह महामारी इतनी भयानक होगी यह किसी ने नही सोचा था ३ मई २०२१ को प्रातः १० बजकर २१ मिनट पर मुझसे कई वर्षों से जुड़े एक सदस्य के मन में यह जिज्ञासा उत्पन्न हुई कि इस महामारी का अंत कब होगा और कब हम इन परिस्थितियों से बाहर आ सकेंगे तो उस समय के आधान लग्न व आजाद भारत की कुंडली की विवेचना करने का एक प्रयास करता हूँ।

 

इस विवेचना को लिखने से पूर्व सर्वप्रथम मैं अपने इष्ट व अपने आराध्य जिन्हें मैं अपने गुरु रूप में भी पूजता हूँ उनके (श्री हनुमान जी व बाबा महादेव) चरण कमलों में नमन करता हूँ व इस महामारी से मुक्ति की प्राथना करता हूँ और साथ ही यह प्राथना करता हूँ कि मुझ पर अपनी कृपा दृष्टि बनाएं जिससे मैं इस महामारी पर सही विवेचना कर सकूँ🙏🏻

प्रश्न कुंडली से फलकथन:-

 

प्रश्न लग्न कुंडली
प्रश्न लग्न कुंडली

 

३ मई २०२१ को प्रातः १०:२१पर कर्क लग्न जो कि चर लग्न है प्राप्त होता है जिनके स्वामी अर्थात लग्नेश चंद्रमा सप्तम भाव जिसे मारक स्थान भी कहते हैं वहाँ शनि के साथ स्थित होकर विष योग का सृजन कर रहे हैं साथ ही मंगल व राहु से दृष्ट भी हैं अतः इस वर्ष भी कोरोना महामारी को लेकर मन में तनाव, भय का संचार होता रहेगा चूँकि कर्क लग्न की कुंडली में मंगल राजयोगकारक हो जाता है अतः मंगल का सप्तम भाव को अपनी उच्च राशि मकर में देखने के कारण से भारत तकनीकी क्षेत्र में काफी तेजी से आगे बढ़ेगा हालांकि बात कोरोना महामारी की हो रही है तो मंगल व राहु की दृष्टि सप्तम भाव पर आने से मारक स्थान पर एक साथ चार अशुभ योगों (शनि-चंद्र से विष योग, राहु-शनि से पिशाच योग, शनि-मंगल से द्वंद योग व राहु-चंद्र से ग्रहण योग) का बनना विपत्तियों व संघर्षों का सूचक है अतः इस वर्ष भारत को कोरोना महामारी के साथ-साथ अन्य बीमारियों व अनेक प्रकार की विपत्तियों जैसे आतंकवादी घटनाएं, भूकम्प, आग से जान-माल की हानि, तूफान आदि का सामना निकट भविष्य में करना पड़ सकता है हालांकि गुरु भाग्येश होकर अष्टम भाव में बैठे हैं तो यह कुछ हद तक विपरीत परिस्थितियों में कड़े संघर्ष व कुछ कठोर नियमों के साथ राहत प्रदान करने के योग बनाएंगे किंतु कर्क लग्न की कुंडली में गुरु षष्ठेश भी होते हैं अतः गुरु का अष्टम में होना लोगों को स्वास्थ्य जनित समस्याएं देता रहेगा, धन भाव का स्वामी सूर्य दशम भाव में दिग्बली होकर अपनी उच्च राशि मेष में अस्त ग्रह शुक्र के साथ बैठे हैं और चतुर्थ भाव में नीचभंग राजयोग बनने के कारण से भारत दवा व वैक्सीन के क्षेत्र में काफी तेजी से आगे बढ़ेगा और भारत के आर्थिक दृष्टिकोण से भी यह स्थिति शुभ रहेगी जिससे भारत की GDP में पिछले वर्ष की तुलना में कुछ वृद्धि होगी चंद्रमा का श्रवण नक्षत्र के प्रथम चरण से गोचर होने के कारण व वर्तमान में चन्द्र में मंगल की अंतर्दशा होने के कारण से अभी इस बीमारी से बड़ी राहत मिलती नही दिख रही है वर्तमान में १ मार्च २०२१ से १७ अगस्त २०२१ तक गोचर में राहु का प्रभाव काफी अधिक रहने वाला है जिस कारण से इन समय में कोरोना महामारी में अप्रत्याशित वृद्धि होती रहेगी हालांकि अन्य ग्रहों का गोचर में संचार बीच-बीच में ठीक होते रहने के कारण से लोग तेजी से स्वस्थ होते रहेंगे, अगस्त के मध्य भाग में राहु का प्रभाव गोचर में कम होने से कोरोना महामारी में कुछ कमी देखने को मिलेगी किंतु जल्द ही अर्थात १७ अक्टूबर २०२१ की रात्रि के ३ बजकर २७ मिनट पर सूर्य अपनी नीच राशि तुला से गोचर करेंगे व १८ अक्टूबर २०२१ को शुक्र दिन में ७ बजकर ४० मिनट से ज्येष्ठा नक्षत्र और शनि मार्गी अवस्था में उत्तराषाढ़ा नक्षत्र के चतुर्थ चरण से गोचर करेंगे उस समय शुक्र व केतु की युति पुनः कोरोना वृद्धि का सूचक रहेगी जिसमें कोरोना में अप्रत्याशित वृद्धि देखने को मिलेगी जिसे संसार कोरोना की तीसरी लहर के नाम से जानेगा।

 

निष्कर्ष:-

 

१३ फरवरी २०२२ को सूर्य दिन में ७ बजकर ३३ मिनट पर कुंभ राशि में प्रवेश करेंगे तब कोरोना महामारी में कुछ राहत अनुभव होगी हालांकि बीच-बीच में गोचर में ग्रहों की स्थिति ठीक होने पर कोरोना महामारी में कुछ अप्रत्याशित कमी भी देखने को मिल सकती है किंतु १३ फरवरी २०२२ से पूर्व इससे पूर्णतया लाभ मिलता नही दिख रहा है।

 

आर्टिकल की लंबाई को ध्यान में रखते हुए आजाद भारत की कुंडली से कोरोना महामारी पर विवेचना अपने अगले आर्टिकल में प्रकाशित करूँगा।

 

जय श्री राम।

 

Astrologer:- Pooshark Jetly

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होरा शास्त्र में द्वादश भावों की धर्म अर्थ काम मोक्ष के अनुरूप संक्षिप्त व्याख्या भाग-१

होरा शास्त्र में द्वादश भावों की धर्म अर्थ काम मोक्ष के अनुरूप संक्षिप्त व्याख्या भाग-१

 

होरा शास्त्र में द्वादश भावों की धर्म अर्थ काम व मोक्ष के अनुरूप संक्षिप्त व्याख्या
होरा शास्त्र में द्वादश भावों की धर्म अर्थ काम व मोक्ष के अनुरूप संक्षिप्त व्याख्या

 

जैसा कि आप सब जानते हैं कि प्रत्येक कुंडली मे १२ भाव होते हैं और यदि इन भावों को तीन-तीन के समूह में चार भागों में बाँटा जाए तो विभाजन निम्न प्रकार से होता है:-

 

१. धर्म त्रिकोण भाव:-  प्रथम, पंचम व नवम भाव को धर्म त्रिकोण भाव कहते हैं।

 

२. अर्थ त्रिकोण भाव:-  द्वितीय, षष्ठ व दशम भाव को अर्थ त्रिकोण भाव कहते हैं।

 

३. काम त्रिकोण भाव:-  तृतीय, सप्तम व एकादश भाव को काम त्रिकोण भाव कहते हैं।

 

४. मोक्ष त्रिकोण भाव:-  चतुर्थ, अष्टम व द्वादश भाव को मोक्ष त्रिकोण भाव कहते हैं।

 

इन स्थानों पर जो ग्रह तथा नक्षत्र होंगे वह अपने स्वभावानुसार उस व्यक्ति के कर्मों की गति स्पष्ट करते हैं उदाहरणार्थ:- यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में अशुभ या पापी ग्रह, अर्थ व काम अर्थात इच्छाओं के स्थान में बैठे हैं तो उस व्यक्ति की इच्छायें व प्रवृत्ति उसी तरफ अधिक होंगी और उसकी इच्छाएँ व अर्थ रूपये-पैसे संबंधी कार्य उसी समय पूरे होंगे जब उस कुण्डली की गणना के अनुसार उन ग्रहों का समय आयेगा वहीं दूसरी ओर, यदि कोई व्यक्ति धर्म व मोक्ष की प्राप्ति चाहता है, तो उसकी कुण्डली की कुंडली मे शुभ ग्रह धर्म व मोक्ष वाले स्थानों में अवश्य ही बैठे होंगें।

 

कुंडली के धर्म त्रिकोण भाव
कुंडली के धर्म त्रिकोण भाव

 

अब कुंडली के प्रत्येक भावों का विश्लेषण उपरोक्त प्रकार से करते हैं, जैसा कि आप सब जानते हैं कि  इस संसार मे धर्म ही प्रधान है व्यक्ति धर्म का समुचित पालन करके ही जीवन के अंतिम उद्देश्य मोक्ष तक पहुँच सकता है
इस कारण से ही किसी भी कुंडली मे 1, 5, 9 स्थान को मूल त्रिकोण की संज्ञा दी गई है अतएव सर्वप्रथम धर्म भावों के बारे में विस्तार से जानते हैं:-

 

लग्न स्थान प्रथम धर्म त्रिकोण भाव:-

 

कुंडली का प्रथम धर्म त्रिकोण भाव
कुंडली का प्रथम धर्म त्रिकोण भाव

 

इस भाव से व्यक्ति की शरीर पुष्टि, वात-पित्त-कफ प्रकृति, त्वचा का रंग, यश-अपयश, पूर्वज, सुख-दुख, आत्मविश्वास, अहंकार, मानसिकता आदि को जाना जाता है इससे हमें शारीरिक आकृति, स्वभाव, वर्ण चिन्ह, व्यक्तित्व, चरित्र, मुख, गुण व अवगुण, प्रारंभिक जीवन विचार, यश, सुख-दुख, नेतृत्व शक्ति, व्यक्तित्व, मुख का ऊपरी भाग, के संबंध में ज्ञान मिलता है।

पंचम भाव द्वितीय त्रिकोण भाव:-

 

कुंडली का द्वितीय धर्म त्रिकोण भाव
कुंडली का द्वितीय धर्म त्रिकोण भाव

 

इस भाव से संतति, बच्चों से मिलने वाला सुख, विद्या बुद्धि, उच्च शिक्षा, विनय-देशभक्ति, पाचन शक्ति, कला, रहस्य शास्त्रों की रुचि, अचानक धन-लाभ, प्रेम संबंधों में यशनौकरी परिवर्तन आदि का विचार किया जाता है इससे हमें विद्या, विवेक, लेखन, मनोरंजन, संतान, मंत्र-तंत्र, प्रेम, सट्टा, लॉटरी, अकस्मात धन लाभ, पूर्वजन्म, गर्भाशय, मूत्राशय, पीठ, प्रशासकीय क्षमता, आय जानी जाती है।

नवम भाव तृतीय धर्म त्रिकोण भाव:-

 

कुंडली का तृतीय धर्म त्रिकोण भाव
कुंडली का तृतीय धर्म त्रिकोण भाव

 

इस भाव से आध्यात्मिक प्रगति, भाग्योदय, बुद्धिमत्ता, गुरु, परदेश गमन, ग्रंथपुस्तक लेखन, तीर्थ यात्रा, भाई की पत्नी, दूसरा विवाह आदि के बारे में बताया जाता है इससे हमें धर्म, भाग्य, तीर्थयात्रा, संतान का भाग्य, साला-साली, आध्यात्मिक स्थिति, वैराग्य, आयात-निर्यात, यश, ख्याति, सार्वजनिक जीवन, भाग्योदय, पुनर्जन्म, मंदिर-धर्मशाला आदि का निर्माण कराना, योजना विकास कार्य, न्यायालय से संबंधित कार्य का विचार किया जाता है।

 

पोस्ट की लंबाई को ध्यान रखते हुए अगला भाग जल्द ही प्रकाशित होगा।

 

जय श्री राम।

 

ज्योतिर्विद प्रवीण सिंह परमार

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विक्रम संवत २०७८ के मासिक शिवरात्रि व्रत व पूजन विधि

विक्रम संवत २०७८ के मासिक शिवरात्रि व्रत व पूजन विधि

 

विक्रम संवत २०७८ के मासिक शिवरात्रि व्रत
विक्रम संवत २०७८ के मासिक शिवरात्रि व्रत

 

प्रति मास कृष्ण पक्षीय निशीथ काल व्यापिनी चतुर्दशी के दिन मासिक शिवरात्रि व्रत किया जाता है समाज में फाल्गुन तथा श्रावण मास पूजा विशेष प्रचलित है “ईशान संहिता” के अनुसार फाल्गुन मास में ज्योतिर्लिंग का प्रादुर्भाव हुआ था:-

 

शिवलिङ्गतयोद्भूतः कोटि सूर्य समप्रभः।

 

इसलिए उसे महाशिवरात्रि के नाम से जाना जाता है जनश्रुतियों के अनुसार श्रावण मास में शिव जी ने संसार की रक्षा हेतु विषपान किया था और विष की विकलता में इधर-उधर भागने लगे तब सभी ने विष की गर्मी से बचाने हेतु शिव जी का गंगाजल से रुद्राभिषेक किया था तभी से गंगाजल द्वारा रुद्राभिषेक की परंपरा शुरू हुई थी, गंगाजल से शिव अभिषेक आराधना में सर्वोत्तम माना जाता है गंगाजल के अतिरिक्त रत्नोदक, इक्षुरस (गन्ने का रस), दुग्ध, पंचामृत (दूध, दहीं, घी, चीनी, शहद) आदि अनेक द्रव्यों से किया जाता है।

 

वृहद् धर्मपुरण अ. ५७ में तो यहाँ तक लिखा है कि शिवलिङ्ग में सभी देवताओं का पूजन करें:-

 

शिवलिङ्गSपि सर्वेषां देवानां पूजनं भवेत्।

सर्वलोक मये यस्याच्छिव शक्तिविर्भु: प्रभु:।।

 

पंचाक्षर मन्त्र:- “नमः शिवाय”

षडाक्षर मंत्र:- “ॐ नमः शिवाय”

 

मासशिवरात्रि व्रत

 

मासिक शिवरात्रि व्रत तारीखें
मासिक शिवरात्रि व्रत तारीखें

 

१. वैशाख ९ मई २०२१ (रविवार)

२. ज्येष्ठ ८ जून २०२१ (मंगलवार)

३. आषाढ़ ८ जुलाई २०२१ (गुरुवार)

४.श्रावण (विशेष) ६ अगस्त २०२१ (शुक्रवार)

५. भाद्रपद ५ सितंबर २०२१ (रविवार)

६. आश्विन ४ अक्टूबर २०२१ (सोमवार)

७. कार्तिक २ नवंबर २०२१ (मंगलवार)

८. मार्गशीर्ष २ दिसंबर २०२१ (गुरुवार)

९. पौष १ जनवरी २०२२ (शनिवार)

१०. माघ ३० जनवरी २०२२ (रविवार)

११.फाल्गुन महाशिवरात्रि (विशेष)१ मार्च २०२२ (मंगलवार)

१२. चैत्र ३० मार्च २०२२ (बुधवार)

 

शिवरात्रि पूजन विधि:-

 

शिवरात्रि व्रत व पूजन विधि
शिवरात्रि व्रत व पूजन विधि

 

सुबह सूर्योदय से पूर्व उठकर नित्य क्रिया से निवृत्त होकर स्नानादि कर के भगवान शिव का जलाभिषेक व पंचामृत स्नान करना चाहिए तदोपरांत चंदन, भस्म, रोली, जौं, काला तिल, अक्षत शिवलिंग पर अर्पित करना चाहिए तथा जनेऊ, बड़ी सुपाड़ी, वस्त्र, इत्र, गुलाब के पुष्प, विल्वपत्र, दूर्वा, भांग व धतूरा अर्पित करना चाहिए उसके बाद नैवेध अर्पित कर शिव जी का पूजन करना चाहिए और आरती कर पूजा संपन्न करनी चाहिए, अभीष्ट लाभ हेतु रुद्राभिषेक, रुद्रार्चन कर सकते हैं।

 

ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली

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विक्रम संवत 2078 के प्रदोष व्रत

विक्रम संवत 2078 के प्रदोष व्रत

 

विक्रम संवत 2078 के प्रदोष व्रत का विवरण
विक्रम संवत 2078 के प्रदोष व्रत का विवरण

 

प्रदोष व्रत में सूर्यास्त के बाद आशुतोष भगवान शिव जी का पूजन किया जाता है प्रत्येक मास की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत किया जाता है कर्ज मुक्ति के लिए भौम प्रदोष व्रत, शांति व सुरक्षा के लिए सोम प्रदोष व्रत, रोग-व्याधि-पीड़ा व अन्य उपद्रव के शांति हेतु रवि प्रदोष व्रत सर्वश्रेष्ठ माना गया है साथ ही जो व्यक्ति नियमित प्रदोष व्रत करते हैं भगवान शिव उनके सभी कष्टों को दूर करते हैं तथा व्यक्ति के मृत्यु उपरांत अपने चरण कमलों में स्थान देते हैं।

 

प्रदोष व्रत व पूजन विधि:-

 

प्रदोष व्रत व पूजन विधि
प्रदोष व्रत व पूजन विधि

 

सुबह सूर्योदय से पूर्व उठकर नित्य क्रिया से निवृत्त होकर स्नानादि कर के भगवान शिव का जलाभिषेक व पंचामृत स्नान करना चाहिए तदोपरांत नैवेध का भोग लगाकर व्रत का संकल्प लेना चाहिए तथा व्रत के नियमों का पालन करते हुए फलाहार (फल व दूध) का सेवन करना चाहिए तथा प्रदोष काल में शिव जी का पूजन कर भोग लगाना चाहिए व प्रसाद का एक अंश गाय को खिलाकर प्रसाद ग्रहण करना चाहिए।

 

प्रदोष व्रत तिथियाँ:-

 

24 अप्रैल 2021 शनि प्रदोष व्रत

9 मई 2021 रवि प्रदोष व्रत

24 मई 2021 सोम प्रदोष व्रत

7 जून 2021 सोम प्रदोष व्रत

22 जून 2021 भौम प्रदोष व्रत

7 जुलाई 2021 प्रदोष व्रत (बुधवार)

21 जुलाई 2021 प्रदोष व्रत (बुधवार)

5 अगस्त 2021 प्रदोष व्रत (गुरुवार)

20 अगस्त 2021 प्रदोष व्रत (शुक्रवार)

4 सितंबर 2021 शनि प्रदोष व्रत

18 सितंबर 2021 शनि प्रदोष व्रत

4 अक्टूबर 2021 सोम प्रदोष व्रत

18 अक्टूबर 2021 सोम प्रदोष व्रत

2 नवंबर 2021 भौम प्रदोष व्रत

15 नवंबर 2021 सोम प्रदोष व्रत

2 दिसंबर 2021 प्रदोष व्रत (गुरुवार)

16 दिसंबर 2021 प्रदोष व्रत (गुरुवार)

31 दिसंबर 2021 प्रदोष व्रत (शुक्रवार)

15 जनवरी 2021 शनि प्रदोष व्रत

30 जनवरी 2021 रवि प्रदोष व्रत

14 फरवरी 2021 सोम प्रदोष व्रत

28 फरवरी 2021 सोम प्रदोष व्रत

15 मार्च 2021 भौम प्रदोष व्रत

29 मार्च 2021 भौम प्रदोष व्रत

 

जय श्री राम।

 

Astrologer:- Pooshark Jetly

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सीता अष्टमी 2021: इस प्रकार पूजन करने से होती है मनचाहे वर की प्राप्ति

सीता अष्टमी 2021: इस प्रकार पूजन करने से होती है मनचाहे वर की प्राप्ति

 

सीता अष्टमी 2021
सीता अष्टमी 2021

 

फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि सीता अष्टमी के रूप में मनाई जाती है पौराणिक कथाओं के अनुसार फाल्गुन मास की अष्टमी तिथि के दिन ही सीता माता धरती से प्रकट हुई थीं वर्ष २०२१ में सीता अष्टमी ६ मार्च को मनाई जाएगी, सीता अष्टमी के दिन सुहागन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु के लिए व्रत करती हैं ऐसी मान्यता है कि सीता अष्टमी का व्रत करने से दाम्पत्य जीवन की समस्याओं से मुक्ति मिलती है साथ ही जिन कन्याओं के विवाह में बाधाएं आ रही हो उन्हें भी यह व्रत अवश्य करना चाहिए जिससे उनके विवाह में आ रही बाधाएं दूर होती हैं तथा मनचाहे वर की प्राप्ति होती है।

 

पूजन शुभ मुहर्त:-

 

 

ऋषिकेश पंचांग काशी के अनुसार अष्टमी तिथि ५ मार्च २०२१ की रात्रि ११:१६ से ६ मार्च २०२१ की रात्रि ०९:०२ तक  रहेगी निर्णय सिंधु के अनुसार व्रत व पर्व उदया तिथि के अनुसार मनाना चाहिए अतः इस वर्ष सीता जयंती ६ मार्च २०२१ को मनाई जाएगी।

 

पूजन व व्रत विधि:-

 

प्रातः सूर्योदय के पूर्व नित्य क्रिया से निवृत्त होकर स्नानादि कर गणेश जी का पूजन करना चाहिए तदोपरांत भगवान श्री राम व सीता माँ की प्रतिमा के समक्ष व्रत का संकल्प लेकर व्रत का आरंभ करना चाहिए तत्पश्चात माँ गौरी व सीता जी को पीले पुष्प, पीले वस्त्र व पीले मीठे का भोग और १६ श्रृंगार का सामान अर्पित कर “ॐ रामाभ्यां नमः” मंत्र का जप करना चाहिए व सूर्यास्त के समय दुग्ध व गुड़ से बने पदार्थ का भोग लगाकर प्रसाद को दान करना चाहिए व प्रसाद से व्रत का पारण करना चाहिए।

 

जय श्री राम।

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आयु निर्धारण सूत्र—-Astrology Sutras

आयु निर्धारण सूत्र—-Astrology Sutras

 

आयु निर्धारण सूत्र
आयु निर्धारण सूत्र

 

योनि से जातक के बारह वर्ष के भीतर आयु का निश्चय नही हो सकता, क्योंकि माता-पिता के किये हुए कर्मों से बाल ग्रहों से बालक का नाश होता है।

 

जन्म से 12 वर्ष तक चार 2 वर्ष तीन जगह विभाग किया है, चार वर्ष तक का बालक माता के पाप से मरता है, उसके बाद आठ वर्ष तक पिता के पाप से मरता है और अंत के जो वर्ष हैं (आठवें के बाद 12 वर्ष तक) उसमें अपने पापों से मरता है।

 

जन्म से 8 वर्ष तक बालारिष्ट रहता है, उसके बाद 20वें वर्ष तक योगारिष्ट (दुष्ट ग्रहों से उत्पन्न) रहता है, 32वें वर्ष तक अल्पायु, 32 से 70 तक मध्यम आयु और 70 के बाद 100 तक पूर्ण आयु कही गयी है एवं 100 से 120 वर्ष तक परम आयु समझनी चाहिए।

 

आयु निर्धारण सूत्र
आयु निर्धारण सूत्र

 

१. जन्म कुंडली में यदि चंद्रमा छठे, आठवें या बाहरवें भाव में रहकर सूर्य के अतिरिक्त पाप ग्रह (मंगल, शनि, राहु, केतु) से देखा जाता हो तो बृहस्पति के लग्न में रहने पर भी बालक मरता ही है, मतलब यह प्रवल अरिष्ट योग होता है।

 

२. लग्न से पांचवां व नौवां भाव पाप ग्रह की राशि हो उसमें सूर्यादि ग्रह हों तो क्रम से पिता, माता, भाई, मामा, नानी, नाना और बालक जल्द नष्ट होते हैं।

 

३. लग्न और चंद्रमा क्रूर ग्रह से दृष्ट हों तथा शुभ ग्रह से संबंध न रखते हों और यदि बृहस्पति लग्न में न हो तो बालक की माता की मृत्यु निश्चित होती है।

 

४. यदि सूर्य, चंद्रमा चतुर्थ स्थान में स्थित हों और शनि सप्तम में हो तो बालक के माता की मृत्यु होती है और यदि लग्न से छठे भाव में क्रूर ग्रह हो तो भाई का नाश होता है।

 

५. शनि के साथ चंद्रमा और सूर्य बाहरवें भाव में हो, मंगल चौथे भाव में हो तो बालक की माता गर्भ के साथ मरती है।

 

६. लग्न और चंद्रमा एक साथ या अलग-अलग शुभ ग्रह की दृष्टि से रहित हों या पाप ग्रह के मध्य में हो तो बालक की माता गर्भ के साथ मरती है।

 

७. छठे, बाहरवें और आठवें भाव में क्रूर ग्रह हों और इन स्थानों में शुभ ग्रह न हों तथा पाप ग्रह के मध्य में शुक्र व गुरु हों तो प्रसव होते ही स्त्री बालक सहित मरती है।

 

८. चंद्रमा से चौथे या दसवें भाव में पाप ग्रह हों तथा उनको शुभ ग्रह न देखते हों तो बालक की माता की मृत्यु होती है अथवा सूर्य से दसवां भाव पाप ग्रह से देखा जाता हो किन्तु शुभ ग्रह से न देखा जाता हो तो बालक की माता की मृत्यु होती है।

 

९. बली सूर्य शनि से दृष्ट या युत होकर तीसरे भाव में हो अथवा क्षीण चंद्रमा पाप ग्रह के साथ शुक्र से तीसरे भाव में हो तो प्रसव होते ही स्त्री बालक सहित मार जाती है।

 

१०. लग्न से आठवें भाव में सूर्य या मंगल पाप ग्रह हों और शुभ ग्रह से न देखे जाते हों साथ ही चंद्रमा कृष्ण पक्ष का हो तो उस बालक के माता की मृत्यु हो जाती है।

 

११. यदि दिन में जन्म हो शुक्र से सूर्य पांचवे या नौवें में हो और यदि रात्रि का जन्म हो तो चंद्रमा से शनि पांचवें या नौवें भाव में हो और उसे पाप ग्रह देखते हों और शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तथा चंद्रमा बल रहित हो तो बालक की माता की मृत्यु होती है।

 

जय श्री राम।

Astrologer:- Pooshark Jetly

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विक्रम संवत 2078 में वर्षा विचार जानें आनंद संवत्सर में कब होगी वर्षा

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विक्रम संवत २०७८ में वर्षा होने के योग
विक्रम संवत २०७८ में वर्षा होने के योग

 

आर्द्राप्रवेशाङ्ग के विचार से वर्षा मध्यम है, चक्रवात व तूफान का प्रकोप रहेगा, पूर्वोत्तर पर्वतीय क्षेत्रों में वर्षा उत्तम, पूर्वी भाग में सामान्य वर्षा, देश के पश्चिम व मध्य भाग में वर्षा की कमी होगी, दक्षिण भाग में वायु का प्रकोप होगा, जल संकट संभव है।

 

शारदधानयोत्तपत्ति के विचार से उत्पादन संतोषप्रद रहेगा, फसलों के मूल्य सामान्य रहेंगे, पूर्वोत्तर तथा दक्षिण पश्चिम कृषि को क्षति होगी, ग्रैष्मिकधानयोत्तपत्ति के विचार से रवी की फसल का उत्पादन उत्तम रहेगा, फसलों को रोगादि का भय होगा, दक्षिण भाग में कृषि को क्षति होगी, फसलों के मूल्यों में वृद्धि होगी।

 

वर्षा विज्ञान:-

 

वर्षा विज्ञान
वर्षा विज्ञान

 

सूर्य के रोहिणी नक्षत्र में जिस दिन वर्षा होवे उसके ऊपर लिखे दिन तक जलवृष्टि उत्तम ढंग से न होगी।

 

उदाहरण:-

 

यदि रोहिणी नक्षत्र का सूर्य आने के पाँचवें दिन वर्षा हो गयी तो ३१ दिन तक सुंदर ढंग से जल वृष्टि न हो सकेगी, जिस दिशा से बादल रोहिणी नक्षत्र में आते हुए दृष्टिगोचर होगा उसी दिन में जलवृष्टि की आगे न्यूनता रहेगी।

 

वर्षा विचार:-

 

आर्द्रा (२२ जून दिन १/५१ पर)

 

आर्द्रा का केवल तृतीय चरण निर्जल है शेष सभी चरण सजल है अतः तारीख २२ से २८ जून व तारीख ३ से ५ जुलाई तक वर्षा होगी।

 

पुनर्वसु (६ जुलाई दिन ३/३२ पर)

 

पुनर्वसु नक्षत्र का तृतीय व चतुर्थ चरण निर्जल है और प्रथम व द्वितीय चरण सजल है अतः तारीख ६ से १२ जुलाई तक वर्षा होगी।

 

पुष्य (तारीख २० जुलाई सायं ५/० पर)

 

पुष्य नक्षत्र का केवल द्वितीय चरण सजल है शेष सभी चरण निर्जल है अतः तारीख २२ से २६ जुलाई तक वर्षा होगी।

 

आश्लेषा (तारीख ३ अगस्त सायं ५/२४ पर)

 

आश्लेषा नक्षत्र का केवल द्वितीय चरण सजल है शेष सभी चरण निर्जल है अतः तारीख ६ से ११ अगस्त तक वर्षा होगी।

 

मघा (तारीख १७ अगस्त सायं ४/०८ पर)

 

मघा नक्षत्र का केवल द्वितीय चरण सजल है शेष सभी चरण निर्जल है अतः तारीख २० से २३ अगस्त तक वर्षा होगी।

 

पूर्वाफाल्गुनी (तारीख ३१ अगस्त दिन १२/३२ पर)

 

पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र का प्रथम व द्वितीय चरण सजल है शेष तृतीय व चतुर्थ चरण निर्जल है अतः तारीख ३१ अगस्त से ६ सितंबर व तारीख ७ से १० सितंबर तक वर्षा होगी।

 

उत्तराफाल्गुनी (तारीख १४ सितंबर प्रातः ६/२३ पर)

 

उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र का केवल तृतीय चरण सजल व शेष चरण निर्जल है अतः तारीख २१ से २४ सितंबर तक आँधी-तूफान व उमस के साथ वर्षा होगी।

 

हस्त (तारीख २७ सितंबर रात्रि ९/३२ पर)

 

हस्त नक्षत्र का तृतीय व चतुर्थ चरण सजल व शेष प्रथम व द्वितीय चरण निर्जल है अतः तारीख ५ से १० अक्टूबर तक वायु के साथ अच्छी वर्षा होगी।

 

चित्रा (तारीख ११ अक्टूबर दिन ९/५४ पर)

 

चित्रा नक्षत्र का प्रथम व द्वितीय चरण सजल व शेष तृतीय व चतुर्थ चरण निर्जल है अतः तारीख ११ से १७ व २३ अक्टूबर को वर्षा होगी।

 

स्वाती (तारीख २४ अक्टूबर रात्रि ०७/३३ पर)

 

स्वाती नक्षत्र का तृतीय व चतुर्थ चरण सजल व शेष प्रथम व द्वितीय चरण निर्जल है अतः तारीख १ से ६ नवंबर तक अच्छी वर्षा होगी।

 

जय श्री राम।

 

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