Loading...
Categories
Festivals

डाला छठ (सूर्य षष्ठी) महापर्व 2026: नहाय-खाय से उषा अर्घ्य तक 4 दिवसीय तिथियां, सटीक अर्घ्य मुहूर्त, संकल्प मंत्र व संपूर्ण शास्त्रोक्त विधि

सनातन धर्म में आत्मशुद्धि, प्रकृति-संरक्षण, आरोग्य और संतान की दीर्घायु का सबसे कठिन और नियमनिष्ठ महापर्व ‘डाला छठ’ (कार्तिक शुक्ल षष्ठी, सूर्य षष्ठी महाव्रत) है। यह केवल एक लोकपर्व नहीं, अपितु श्रुति (वेद), उपनिषद और पुराणों में वर्णित प्रत्यक्ष देवता भगवान सूर्यनारायण और उनकी मानस शक्ति माता षष्ठी (छठी मइया) की साक्षात वैदिक उपासना है।

“ऋषिकेश पंचांग” (काशी मान) के अनुसार, वर्ष 2026 में यह चार दिवसीय महापर्व 13 नवंबर 2026 (शुक्रवार) से 16 नवंबर 2026 (सोमवार) तक अखंड आस्था के साथ मनाया जाएगा। विशेष बात यह है कि इस वर्ष संध्या अर्घ्य का मुख्य पर्व रविवार (15 नवंबर) को पड़ रहा है, जो भगवान सूर्य का ही वार होने से ‘रवि-षष्ठी महायोग’ का दुर्लभ फल प्रदान करेगा।

Astrology Sutras (ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी) के इस विशेष शोधपरक आलेख में ब्रह्मवैवर्त पुराण, स्कन्द पुराण, निर्णय सिन्धु और मुहूर्त चिन्तामणि के अकाट्य प्रमाणों के आलोक में प्रस्तुत है—चारों दिनों की पंचांगीय समय-सारणी, सूर्य अर्घ्य का सटीक समय, प्रामाणिक संकल्प मंत्र, ठेकुआ व सूप सजावट और पारण की संपूर्ण विधि।

💡 निर्णय सिन्धु अनुसार 4 दिवसीय तिथियों का अकाट्य गणित

ऋषिकेश पंचांग (काशी मान) के अनुसार डाला छठ 2026 की तिथियों और अनुष्ठानों का शास्त्रीय निर्धारण निम्नलिखित है:

  • दिवस 1: नहाय-खाय (13 नवंबर 2026, शुक्रवार): चतुर्थी तिथि 12 नवंबर सायं 04:06 से शुरू होकर 13 नवंबर सायं 06:13 तक रहेगी। उदयाकालीन चतुर्थी में पवित्र स्नान और कद्दू-भात का सात्विक भोजन होगा।
  • दिवस 2: खरना / लोहंडा (14 नवंबर 2026, शनिवार): पंचमी तिथि 13 नवंबर सायं 06:13 से 14 नवंबर रात्रि 08:21 तक रहेगी। उदयातिथि पंचमी में निर्जला व्रत रखकर सूर्यास्त (05:25 PM) के बाद गुड़-खीर का नैवेद्य ग्रहण किया जाएगा।
  • दिवस 3: संध्या अर्घ्य / पहला अर्घ्य (15 नवंबर 2026, रविवार): षष्ठी तिथि 14 नवंबर रात्रि 08:21 से 15 नवंबर रात्रि 10:21 तक रहेगी। 15 नवंबर को संपूर्ण दिन और अस्ताचलगामी सूर्य के समय पूर्ण षष्ठी तिथि व्याप्त रहेगी। रविवार होने से ‘रवि-षष्ठी’ का महापुण्य प्राप्त होगा।
  • दिवस 4: उषा अर्घ्य व पारण (16 नवंबर 2026, सोमवार): सप्तमी तिथि 15 नवंबर रात्रि 10:21 से 16 नवंबर रात्रि 12:05 तक रहेगी। उदयाकालीन सप्तमी में उगते सूर्य को अर्घ्य देकर 36 घंटे के निर्जला व्रत का पारण किया जाएगा।

डाला छठ 2026: चारों दिनों की पंचांगीय समय सारणी (ऋषिकेश पंचांग, काशी)

ऋषिकेश पंचांग (काशी मान) के अनुसार सूर्योदय, सूर्यास्त और अर्घ्य के सटीक समय निम्नलिखित हैं:

छठ महापर्व का चरण दिनांक एवं वार सूर्योदय / सूर्यास्त व अर्घ्य समय
पहला दिन: नहाय-खाय 13 नवंबर 2026, शुक्रवार सूर्योदय: 06:35 AM | सूर्यास्त: 05:25 PM
दूसरा दिन: खरना (लोहंडा) 14 नवंबर 2026, शनिवार सूर्योदय: 06:35 AM | सूर्यास्त (खीर भोग): 05:25 PM
तीसरा दिन: संध्या अर्घ्य (डूबते सूर्य को) 15 नवंबर 2026, रविवार (रवि-षष्ठी) सूर्यास्त: सायं 05:24 बजे (अर्घ्य: सायं 04:45 से 05:24)
चौथा दिन: उषा अर्घ्य व पारण (उगते सूर्य को) 16 नवंबर 2026, सोमवार सूर्योदय: प्रातः 06:37 बजे (अर्घ्य: प्रातः 06:37 से 07:15)

📜 सनातन शास्त्रों में छठ पूजा के प्रामाणिक श्लोक व संदर्भ

छठी मइया (देवसेना) और भगवान सूर्य की उपासना का विस्तृत प्रमाण ब्रह्मवैवर्त पुराण (प्रकृति खंड) और वेदों में मिलता है:

शास्त्रोक्त मूल श्लोक प्रामाणिक अर्थ एवं आध्यात्मिक रहस्य

“षष्ठांशा प्रकृतेर्या च सा च षष्ठी प्रकीर्तिता।
बालानां रक्षणकर्त्री च पुत्रदात्री धनप्रदा॥”

ब्रह्मवैवर्त पुराण (प्रकृति खंड, अ. 43)

अर्थ: जो मूल प्रकृति के छठे अंश से प्रकट हुई हैं, वे ही भगवती ‘षष्ठी’ (छठी मइया) के नाम से विख्यात हैं। वे बालकों की जीवन-रक्षा करने वाली, निःसंतानों को संतान देने वाली और अखंड धन-धान्य व आरोग्य प्रदान करने वाली जगदम्बा हैं।

“एहि सूर्य सहस्रांशो तेजोराशे जगत्पते।
अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणार्घ्यं दिवाकर॥”

सूर्य अर्घ्य महामंत्र (स्कन्द पुराण)

अर्थ: हे सहस्र किरणों वाले, तेज के असीम पुंज, संपूर्ण जगत के स्वामी भगवान दिवाकर! मुझ दीन भक्त पर कृपा करते हुए मेरे द्वारा पूर्ण श्रद्धा से अर्पित इस पावन अर्घ्य को स्वीकार करें।

“नमः सवित्रे जगदेकचक्षुषे जगत्प्रसूतिस्थितिनाशनहेतवे।
त्रयीमयाय त्रिगुणात्मधारिणे विरिञ्चिनारायणशंकरात्मने॥”

सूर्य स्तुति श्लोक

अर्थ: संपूर्ण जगत के एकमात्र दिव्य नेत्र, सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार के आदि कारण, ऋक-यजुः-साम तीनों वेदों के स्वरूप और ब्रह्मा, विष्णु व महेश के साक्षात संयुक्त रूप भगवान सवितानारायण को नमस्कार है।

🌊 डाला छठ का 4 दिवसीय शास्त्रीय अनुष्ठान क्रम

डाला छठ का अनुष्ठान केवल उपवास नहीं, अपितु कायिक, वाचिक और मानसिक तपस्या की पराकाष्ठा है:

1. नहाय-खाय (13 नवंबर 2026, शुक्रवार): शुचिता का संकल्प

इस दिन व्रती गंगा अथवा किसी पवित्र नदी/सरोवर में स्नान करते हैं। घर की पूर्ण स्वच्छता की जाती है। इस दिन भोजन में शुद्ध गाय के घी और सेंधा नमक से निर्मित कद्दू (घिया/लौकी) की सब्जी, अरवा चावल (चने की दाल युक्त) का भोग लगाकर व्रती एक बार सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं।

2. खरना / लोहंडा (14 नवंबर 2026, शनिवार): 36 घंटे के निर्जला व्रत का प्रारंभ

व्रती पूरे दिन निर्जल उपवास रखते हैं। सायं काल सूर्यास्त (05:25 PM) के बाद नए मिट्टी के चूल्हे पर आम की लकड़ी से गन्ने के रस अथवा गुड़ में बनी खीर (रसियाव) और गेहूं की रोटी (रोटी-खीर) का नैवेद्य तैयार किया जाता है। केले के पत्ते पर छठी मइया को भोग लगाने के बाद व्रती इसे शांत मन से एकांत में ग्रहण करते हैं। इसके साथ ही 36 घंटे का कठिन निर्जला व्रत प्रारंभ हो जाता है।

3. संध्या अर्घ्य (15 नवंबर 2026, रविवार): अस्ताचलगामी सूर्य को नमन

पूरे विश्व में डाला छठ ही एकमात्र ऐसा पर्व है जहाँ डूबते हुए सूर्य की सर्वप्रथम पूजा की जाती है। बांस के सूप और दौरा (दउरा) में ठेकुआ, मालपुआ, नारियल, गन्ना, संतरा, सुथनी, अदरक का पौधा और ऋतुफल सजाए जाते हैं। सायं 04:45 से 05:24 के मध्य कमर तक जल में खड़े होकर अस्ताचलगामी भगवान सूर्य को दूध और गंगाजल की धारा के साथ प्रथम अर्घ्य अर्पित किया जाता है।

4. उषा अर्घ्य व पारण (16 नवंबर 2026, सोमवार): पूर्णाहुति

भोर में सूर्योदय से पूर्व ही व्रती और परिजन पुनः घाट पर पहुंचते हैं। प्रातः 06:37 बजे जैसे ही भगवान भुवनभास्कर की रश्मियां प्रस्फुटित होती हैं, जल में खड़े होकर उगते हुए सूर्य को दूसरा अर्घ्य दिया जाता है। इसके पश्चात छठी मइया से संतान रक्षा का आंचल पसारकर आशीर्वाद मांगा जाता है और कच्चे दूध, अदरक तथा प्रसाद खाकर 36 घंटे के निर्जला व्रत का पारण किया जाता है।

🕉️ डाला छठ के प्रामाणिक संकल्प एवं अर्घ्य मंत्र

1. छठ व्रत का मुख्य संकल्प मंत्र:

खरना के दिन अथवा संध्या अर्घ्य से पूर्व हाथ में जल, अक्षत, सुपारी और पुष्प लेकर संकल्प करें:

“ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः… अद्य कार्तिकमासे शुक्लपक्षे षष्ठ्यां तिथौ… (गोत्र/नाम)… ममोपात्तदुरितक्षयपूर्वकं श्रीसूर्यनारायण-षष्ठीदेवीप्रीत्यर्थं मम सकल-परिवारस्य आयुर्बलारोग्य-पुत्रपौत्राद्यभिवृद्धये च छठमहापर्वव्रतकर्म अहं कारयिष्ये।”

2. सूर्य अर्घ्य अर्पण मंत्र (जल देते समय):

“ॐ ऐहि सूर्य सहस्रांशो तेजोराशे जगत्पते। अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते॥
।।ॐ घृणि सूर्याय नमः॥”

3. छठी मइया (षष्ठी देवी) ध्यान मंत्र:

“ॐ षष्ठी देव्यै नमः। सुपुत्रं देहि मे देवि यशो देहि बलं च मे। धर्मं देहि धनं देहि सर्वान् कामान् प्रपूरय॥”

🧺 डाला, सूप और 5 प्रमुख नैवेद्य सामग्रियों का रहस्य

पूजन सामग्री आध्यात्मिक व आयुर्वेदिक महत्व
1. ठेकुआ व खजूर शुद्ध गेहूं के आटे, गुड़ और गाय के घी से निर्मित ठेकुआ सूर्य देव का महाप्रसाद है। गुड़ और गेहूं शीत ऋतु के प्रारंभ में शरीर को ऊर्जा और ओज प्रदान करते हैं।
2. डाभ नींबू व गन्ना बड़ा डाभ नींबू और पत्तों सहित गन्ना आरोग्य और वंश-वृद्धि का प्रतीक है। गन्ने का छत्र बनाकर घाट पर अर्घ्य वेदी की रक्षा की जाती है।
3. बांस का सूप व दौरा बांस को वंश-वृद्धि और शुद्धता का प्रतीक माना गया है। सूप छानने का कार्य करता है, जो जीवन से दुर्गुणों को छानकर केवल सद्गुणों को ग्रहण करने की सीख देता है।
4. कच्ची हल्दी व अदरक पौधों सहित कच्ची हल्दी और अदरक का अर्घ्य सूप में रखा जाता है। यह प्रकृति के प्रति सम्मान और औषधीय गुणों के माध्यम से निरोगी काया का वरदान मांगना है।

⚠️ डाला छठ के 5 कठोर नियम एवं वर्जनाएं

  1. जूठा व अशुद्ध सामग्री निषेध: छठ पूजा की किसी भी सामग्री (फल, सूप, ठेकुआ) को बच्चे या पक्षी भी जूठा न करें। सामग्री तैयार करते समय व्रती और सहयोगी मौन अथवा केवल छठ गीतों का उच्चारण करें।
  2. तामसिक पदार्थों का पूर्ण त्याग: पूरे चार दिनों तक घर में लहसुन, प्याज, मांस, मदिरा तो क्या, साधारण नमक का प्रयोग भी रसोई में वर्जित रहता है। केवल सेंधा नमक ही नहाय-खाय में प्रयुक्त होता है।
  3. नए चूल्हे का विधान: खरना और ठेकुआ का प्रसाद केवल नए मिट्टी के चूल्हे पर अथवा पीतल/स्टील के सर्वथा नए गैस चूल्हे पर आम की लकड़ी से बनाया जाता है।
  4. भूमि शयन: व्रती इन चार दिनों में चारपाई या गद्देदार पलंग पर नहीं सोते। वे चटाई या कंबल बिछाकर शुद्ध भूमि पर शयन करते हैं।
  5. बिना सिला वस्त्र: अर्घ्य के समय व्रती महिलाएं पीली या लाल रंग की शुद्ध सूती साड़ी (बिना सिली) और पुरुष धोती धारण करते हैं।

💬 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Google FAQs)

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न प्रामाणिक शास्त्रीय उत्तर
डूबते हुए सूर्य को पहला अर्घ्य क्यों दिया जाता है? सनातन धर्म केवल उगते सूरज को सलाम करना नहीं सिखाता। अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देकर यह कृतज्ञता प्रकट की जाती है कि पूरे दिन उन्होंने हमें जीवन, अन्न और ऊर्जा दी। साथ ही अस्ताचलगामी सूर्य की किरणें माता षष्ठी (प्रत्यूषा) की शक्ति से ओतप्रोत होती हैं।
क्या पुरुष भी डाला छठ का व्रत रख सकते हैं? हाँ, बिल्कुल। डाला छठ कोई स्त्री-विशेष व्रत नहीं है। यह सूर्योपासना का महायज्ञ है। पुरुष भी उतनी ही निष्ठा, निर्जला उपवास और सूप उठाकर जल में खड़े रहकर अर्घ्य दे सकते हैं। महाभारत में सूर्यपुत्र कर्ण ने भी जल में खड़े होकर सूर्य आराधना की थी।
छठ पूजा में सिंदूर नाक से मांग तक लंबा क्यों लगाते हैं? पीला/नारंगी सिंदूर सूर्य के तेज और बृहस्पति के मांगलिक प्रभाव का प्रतीक है। नाक से लेकर सिर की चोटी तक लंबा सिंदूर लगाने से पति की अकाल मृत्यु का भय समाप्त होता है और सौभाग्य अक्षुण्ण बना रहता है।
यदि नदी या तालाब का घाट न मिले तो अर्घ्य कैसे दें? घर की छत या आंगन में साफ बड़े टब अथवा जलकुंड बनाकर उसमें गंगाजल मिश्रित शुद्ध जल भरें। उसी जल में खड़े होकर सूर्यदेव के सम्मुख अर्घ्य दिया जा सकता है। शास्त्र भाव और शुचिता को प्रधान मानते हैं।

निष्कर्ष: डाला छठ 2026 प्रकृति, सविता देवता और षष्ठी देवी के प्रति समर्पण का अलौकिक महापर्व है। 15 नवंबर को रविवार (रवि-षष्ठी) के पावन संयोग में डूबते सूर्य को और 16 नवंबर को उगते सूर्य को दिया गया अर्घ्य आपके कुल को तेजस्विता, निरोगी काया और संतानों को अखंड दीर्घायु का वरदान प्रदान करता है।

✨ Exclusive Spiritual Updates

सनातन महापर्व, छठ पूजा और वैदिक पंचांग के गुप्त रहस्य पाएं!

सटीक अर्घ्य मुहूर्त, दैनिक पंचांग और प्रामाणिक शास्त्रोक्त शोध आलेखों के लिए Astrology Sutras के VIP WhatsApp चैनल से आज ही निःशुल्क जुड़ें।