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दूसरे भाव में शनि का फल

कुंडली का दूसरा भाव वाणी, नेत्र, चेहरा, धन, परिवार/कुटुंब का भाव होता है ऐसी स्थिति में यदि शनि जैसा अलगाववादी ग्रह दूसरे भाव में बैठता है तो यह दर्शाता है कि ऐसे व्यक्ति की वाणी में सत्यता होगी और यदि शनि यदि अग्नि तत्व की राशि में स्थित हो तथा मंगल द्वारा देखा जाता हो तो ऐसी स्थिति में उस व्यक्ति की बोली हुई सत्य बात लोगों को कटु लगती है क्योंकि ऐसे व्यक्ति बोलते समय यह नही सोचते कि मेरे बोले गए वाक्य अर्थात शब्द का दूसरे लोगों पर क्या प्रभाव पड़ेगा, यदि आर्थिक स्थिति के बारे में बात करें तो दूसरे भाव पर बैठा शनि व्यक्ति को खुद की दरिद्रता से लड़ने पर मजबूर कर देता है कहने का आशय यह है कि दूसरा भाव धन का भाव है और दूसरे भाव पर बैठे शनि की दसवीं दृष्टि एकादश भाव पर जाती है जो कि आमदनी का भाव है अर्थात धन के दोनों भाव शनि के प्रभाव में आ जाते हैं और शनि का दूसरा नाम ही मंद है अर्थात ऐसे व्यक्ति जीवन की शुरुवात में कड़ा संघर्ष व उत्तरार्ध में अच्छी उन्नति करते हैं क्योंकि दूसरे भाव में बैठा शनि संकुचित मात्रा में धन देता है कहने का मतलब कि दूसरे भाव में बैठा शनि आपको उतना ही धन देता है जिससे आपका कार्य चलता रहे, दूसरे भाव पर बैठा शनि तकनीकि क्षेत्र से भी आमदनी कराता है।

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यदि परिवार के लिए बात की जाए तो फलदीपिका में लिखा हुआ है कि दूसरे भाव में बैठा शनि बचपन में दुःखी रखता है किंतु आगे का जीवन अच्छा होता है मेरा ऐसा अनुभव है कि यदि दूसरे भाव में शनि हो तो ऐसे व्यक्ति घर से दूर जाकर धनार्जन करते हैं कहने का आशय यह है कि ऐसे व्यक्ति बचपन में कड़ा संघर्ष करते हैं और जन्मस्थान या घर से दूर रहकर धनार्जन करते हैं साथ ही ऐसे व्यक्ति घर के निर्णयों में भाग नही ले पाते हैं कारण शनि दासता देता है साथ ही ऐसे व्यक्ति उस परिवार में रहते हैं जहाँ सदस्य कम हों अर्थात ऐसे व्यक्तियों के परिवार के सदस्यों की संख्या सीमित होती है, यदि दूसरे भाव में शनि पीड़ित अवस्था में हो तो अचानक धन हानि के योग बनते हैं, दूसरे भाव से नेत्रों का भी विचार किया है अतः दूसरे भाव में स्थित शनि नेत्र ज्योति को मंद करता है और यदि यही शनि पीड़ित अवस्था में हो तो नेत्रों की सर्जरी के भी योग बनते हैं।

यदि उच्च राशि का शनि दूसरे भाव में हो जो कि कन्या लग्न की कुंडली में ही संभव है तो ऐसा व्यक्ति आर्थिक स्थिति के मामले में भाग्यशाली होता है तथा बौद्धिक शक्ति द्वारा अच्छा धन अर्जित करता है साथ ही ऋषि कश्यप का मत है कि ऐसा व्यक्ति कुकर्म द्वारा धनार्जन करता है।

यदि उच्च नवांश का शनि दूसरे भाव में तो ऐसा व्यक्ति जोखिम भरे कार्यों से धनार्जन करता है ऋषि कश्यप ने भी यही कहा है कि ऐसा व्यक्ति कष्टपूर्वक कर्मों द्वारा धनार्जन करता है कहने का आशय यह है कि ऐसे व्यक्ति उन कार्यों द्वारा धनार्जन करते हैं जिस कार्य को करने में उनकी दिलचस्पी न हो या जोखिम हो।

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यदि शुभ वर्ग का शनि दूसरे भाव में तो ऐसे व्यक्ति व्यसनों से धन लाभ करते हैं कहने का आशय यह है कि आप कोई ऐसा कार्य करते हैं जिससे दूसरों को उस चीज की आदत लग जाती है, यदि नीच राशि का शनि दूसरे भाव में हो जो कि मीन लग्न की कुंडली में ही संभव है तो ऐसे व्यक्ति धन संचय नही कर पाते हैं ऋषि कश्यप के अनुसार ऐसे व्यक्ति दुःख देकर धनार्जन करते हैं कहने का आशय यह है कि ऐसे व्यक्ति कोई ऐसा कार्य करते हैं जिससे दूसरों को पीड़ा पहुँचे।

यदि नीच नवांश का शनि दूसरे भाव में हो तो ऐसे व्यक्ति निम्न वर्ग से धन की प्राप्ति करते हैं कहने का आशय यह है कि ऐसे व्यक्ति निम्न वर्ग के लोगों जो कि आर्थिक रूप से समृद्ध नही हैं उनके द्वारा या उनसे धनार्जन करते हैं।

यदि पाप वर्ग या शत्रु राशि का शनि दूसरे भाव में हो तो ऐसे व्यक्ति पाप कर्मों द्वारा धनार्जन करते हैं, यदि मित्र राशि का शनि दूसरे भाव में स्थित हो तो ऐसे व्यक्ति अस्थि आदि अर्थात फिजूल के वस्तुओं द्वारा धनार्जन करते हैं कहने का आशय यह है कि ऐसे व्यक्ति ऐसे कार्य (जैसे कबाड़ का काम या ऐसी वस्तु का विक्रय जो उनके काम की न हो किन्तु वही वस्तु दूसरे के काम की हो) कर के धनार्जन करते हैं।

यदि मित्र नवांश का शनि दूसरे भाव में हो तो ऐसे व्यक्ति मिट्टी से जुड़े कार्य उदहारण खेती, खनिज, पेट्रोलियम से जुड़े कार्य के द्वारा धनार्जन करते हैं, यदि वर्गोत्तम स्थिति का शनि दूसरे भाव में स्थित हो तो ऐसे व्यक्ति जलीय पदार्थों द्वारा धनार्जन करते हैं, यदि शत्रु नवांश का शनि दूसरे भाव में हो तो ऐसे व्यक्ति नौकरी से धनार्जन करते हैं।

यदि स्वराशि शनि दूसरे भाव में स्थित हो जो कि धनु लग्न या मकर लग्न की कुंडली में ही संभव है तो ऐसे व्यक्ति ठग कर धनार्जन करते हैं कहने का आशय यह है कि ऐसे व्यक्ति दूसरों को मूर्ख बनाकर धनार्जन करते हैं उदाहरण के तौर पर मार्केटिंग सबसे अच्छा है क्योंकि मार्केटिंग से जुड़ा व्यक्ति अपना कार्य निकालने हेतु हर तरह की विधि अपनाता है व दूसरों को मूर्ख बनाकर धन लाभ करता है।

धनु लग्न की कुंडली में दूसरे भाव में स्थित शनि अपने खुद के प्रयासों से धनार्जन कराता है और यदि मकर लग्न की कुंडली में दूसरे भाव में शनि स्थित है तो ऐसे व्यक्ति अच्छा धनार्जन करने के साथ-साथ अच्छा खर्च भी करते हैं किंतु यहाँ भी उनका धन फिजूल के खर्चों में व्यय नही होता क्योंकि दूसरे भाव में स्थित शनि व्यक्ति को थोड़ा कंजूस बनाता है।

जय श्री राम।

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लग्न में बैठे शनि का फल भाग:-2

पिछले लेख में मैंने लग्न में बैठे शनि के फल पर विस्तार से चर्चा करी थी उसी लेख को आगे बढ़ाते हुए मैं लग्न में बैठे शनि के फल को भाग:-2 में पूरा कर रहा हूँ:-

यदि लग्न में शनि उच्च राशि का हो जो कि तुला लग्न की कुंडली में ही संभव है तो बेहद शुभ होता है तुला लग्न की कुंडली में शनि चतुर्थेश और पंचमेश अर्थात केंद्र व त्रिकोण का स्वामी होकर राजयोगकारक हो जाता है ऐसी स्थिति में व्यक्ति श्याम वर्ण का होता है तथा उसे खुद के घर का सुख अवश्य ही प्राप्त होता है और ऐसे व्यक्तियों की संतान भी अच्छी उन्नति करती है साथ ही संतान की उन्नति में उक्त व्यक्ति का भागीदार भी काफी ज्यादा होता है।

यदि उच्च नवांश का शनि लग्न में हो तो ऐसे व्यक्ति का रंग बदलता रहता है कहने का तात्पर्य यह है कि ऐसा व्यक्ति चेहरे से कुछ और बाकी हिस्सों से कुछ रंग का होगा।

यदि शुभ वर्ग का शनि लग्न में हो तो ऐसे व्यक्ति की अस्थि सन्धियाँ क्षीण होती है अर्थात ऐसे व्यक्तियों को जोड़ों की समस्या रहती है।

यदि पाप वर्ग का शनि लग्न में हो तो ऐसे व्यक्तियों को पित्त रोग होता है कील-मुहांसे काफी होते हैं, यदि नीच राशि का शनि लग्न में हो तो जो कि मेष लग्न की कुंडली में ही सम्भव है तो ऐसे व्यक्ति संघर्ष बहुत करते हैं तथा ऐसे व्यक्ति मेहनती भी होते हैं, ऐसे व्यक्तियों को चक्कर आते हैं साथ ही इन्हें खाँसी की भी शिकायत होती है।

यदि नीच नवांश का शनि लग्न में हो तो ऐसे व्यक्तियों को कफ व वात रोग होता है।

यदि मित्र राशि का शनि लग्न में हो तो व्यक्ति गौरवर्ण का होता है अर्थात ऐसे व्यक्तियों का रंग साफ होता है, यदि मित्र नवांश का शनि लग्न में हो तो ऐसे व्यक्तियों को हड्डियों/अस्थियों में कोई रोग रहता है।

यदि शत्रु राशि का शनि लग्न में हो तो ऐसे व्यक्तियों के नाखून मोटे होते हैं जिसे सामुद्रिक शास्त्र में भी अच्छा नही कहा गया है, यदि शत्रु नवांश का शनि लग्न में हो तो ऐसे व्यक्तियों के दाँत बड़े होते हैं।

यदि वर्गोत्तम शनि लग्न में हो तो व्यक्ति पुष्ट व स्थूल शरीर का होता है।

यदि स्वराशि शनि लग्न में हो तो यह मकर व कुंभ लग्न में ही संभव हो तो ऐसे व्यक्तियों के घुटने लंबे होते हैं, मकर राशि का शनि यदि लग्न में हो तो ऐसे व्यक्ति अपनी सोच पर अडिग रहते हैं इन्हें समझा पाना मुश्किल होता है तथा इनकी आर्थिक स्थिति जीवन के उत्तरार्ध में काफी अच्छी होती है, यदि कुंभ राशि का शनि लग्न में हो तो ऐसे व्यक्ति ज्ञानी होते हैं तथा इनकी आर्थिक स्थिति में उतार-चढ़ाव बना रहता है।

मकर राशि का लग्नस्थ शनि आर्थिक दृष्टिकोण से अच्छा होता है तो कुंभ राशि का लग्नस्थ शनि बौद्धिक दृष्टिकोण से अच्छा होता है, स्वराशि का लग्नस्थ शनि व्यक्तियों को बचपन में व्यथित तो जीवन के उत्तरार्ध में अच्छी स्थिति में पहुँचाता है।

जय श्री राम।

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लग्न में बैठे शनि का फल भाग-1

समस्त नव ग्रहों में यदि कोई ग्रह है जो कि सबसे ज्यादा निंदा का पात्र बनता है तो वो बेचारा शनि ही है जब भी किसी की कुंडली में सबसे बुरे ग्रह के बारे में चर्चा करी जाए तो सबसे पहले लोग शनि को ही देखते हैं किंतु मेरा ऐसा मत व अनुभव है कि “लग्न में यदि तुला, धनु, मकर, कुंभ और मीन राशि का शनि हो तो वो बेहद शुभ फलदाई होता है” फलदीपिका व अन्य ग्रंथों ने भी शनि को इन राशियों पर लग्न में बैठे शनि के फल को बेहद शुभ बताया है तो आज मैं शनि के लग्न में बैठे शनि के फल पर विस्तार से चर्चा करता हूँ।

ज्योतिष में किसी भी ग्रह के फल को जानने के पूर्व उसके कारक तत्व के बारे में जानकारी होनी चाहिए जो कि मैं पहले की पोस्ट में बता चुका हूँ कि शनि विरक्ति, नीरसता का कारक होता है लग्न में बैठा शनि व्यक्ति को थोड़ा शर्मीला भी बनाता है ऐसे व्यक्ति अपने टैलेंट का सही तरह से इस्तेमाल नही करते, संकोच कर जाते हैं उदाहरण के तौर पर एक कक्षा में बैठा व्यक्ति जिसे सब कुछ आता है फिर भी वो अध्यापक के कहने पर जल्दी हाथ नही उठाता, शनि स्थायित्व अवश्य देता है ऐसे व्यक्ति अपने कर्तव्य को हमेशा पूरा करते हैं किंतु ऐसे व्यक्तियों की कुंडली में धोखा मिलने की भी संभावना अधिक हो जाती है साथ ही ऐसे व्यक्ति खुद से आगे बढ़कर अपना टैलेंट नही दिखाते इनको प्रेरित करना होता है।

बहुत से लोगों जिनकी कुंडली में लग्न में शनि स्थित हो उनके जीवनसाथी से मैंने सुना है ये अपने परिवार को तो छोड़िए दूसरों के लिए ही कर दें यही बहुत बड़ी बात है कहने का मतलब यह है कि इनको काम बता दीजिए तो बड़ी बखूबी से कर देते हैं लेकिन उम्मीद करिए कि खुद की इच्छा से करें तो इसकी संभावना कम ही है अर्थात ऐसे व्यक्ति निर्णय लेने में जल्दी participate नही लेते कारण शनि को दासत्व कहा गया है, दासता देता है।

शनि यदि धनु, कुंभ व मीन का हो तो व्यक्ति बहुत धार्मिक होते है और यही शनि यदि तुला या मिथुन का हो तो व्यक्ति को वायु जनित रोग देते हैं क्योंकि यह दोनों राशि ही वायु तत्व की है और शनि भी वायु तत्व प्रधान है ऐसे में जब वायु तत्व का ग्रह वायु तत्व की राशि में बैठता है तो वायु जनित रोग देता है ऐसे लोगों को उम्र बढ़ते-बढ़ते गठिया व जोड़ो के दर्द की शिकायत हो जाती है, लग्न में बैठा शनि व्यक्ति को मेहनती बनाता है, लोगों का कहना है कि शनि आलसी है जब कि मैं शनि को आलसी नही मानता क्योंकि एक होता है काम से जी चुराना तो एक होता है कि काम को perfection देना ऐसे व्यक्ति उस कार्य को perfection देने के चक्कर में अपना काफी समय देते हैं और जब कि बाकी लोग उस काम को कम की तरह ही जल्दी से खत्म कर देते हैं किन्तु ऐसा तभी संभव है जब शनि पीड़ित न हो, लग्न में बैठा शनि स्वास्थ के लिए उतना अच्छा नही होता यदि शनि की दृष्टि भी लग्न पर हो और सूर्य के साथ हो तो हम कह सकते हैं कि ऐसा शनि सेहत के लिए अच्छा नही है।

लग्न में बैठा शनि आपके तीसरे भाव को देखता है जो दर्शाता है कि ऐसा व्यक्ति जो ठान ले उसे पूरा कर के ही छोड़ता है और मेहनती होता है जैसा कि मैंने ऊपर भी लिखा इसकी सातवीं दृष्टि सप्तम भाव पर आती है जो यह बताता है कि ऐसे जातक का दाम्पत्य जीवन मिला-जुला रहता है किंतु यदि सप्तमेश भी शनि के प्रभाव में आ जाए तो यह स्थिति और खराब हो जाती है साथ ही सप्तम भाव मित्रता का भी है तो ऐसे व्यक्ति के मित्र सीमित संख्या में होते हैं और सप्तम भाव रोजगार का भी है तो नौकरी में विलंब से ही स्थायित्व मिलता है साथ ही शनि दशम भाव को भी देखेगा तो ऐसे व्यक्ति जीवन के उत्तरार्ध में सफलता को प्राप्त करते हैं कहने का आशय यह है कि जैसे-जैसे उनकी उम्र बढ़ती जाती है उनको सफलता मिलती जाती है साथ ही ऐसे व्यक्तियों का उनके पिता से वैचारिक मतभेद भी रहता है यह स्थिति तब और भी खराब हो जाती है जब शनि और सूर्य की युति या प्रत्युति हो, ऐसे व्यक्ति कुछ उस तरह से दान-पुण्य करते हैं कि किसी को पता भी नही चल पाता कि इन्होंने क्या दान किया है लग्न में बैठा शनि व्यक्ति को स्वाभिमानी भी बनाता है और क्षणिक क्रोध भी देता है।

यह पोस्ट अधिक लंबी न हो इसलिए इस पोस्ट को यहीं विराम देता हूँ समय मिलने पर इसका दूसरा भाग लिखूँगा जिसमें आप सभी को शनि की विभिन्न स्थितियों के अनुसार लग्न में स्थित होने का फल बतायूँगा।

जय श्री राम।

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नव ग्रहों की प्रसन्नता हेतु नहाने पूर्व करें यह उपाय

नव ग्रहों की प्रसन्नता हेतु नहाने पूर्व करें यह उपाय

 

नव ग्रह की प्रसन्नता हेतु नहाने के पूर्व करें यह उपाय
नव ग्रह की प्रसन्नता हेतु नहाने के पूर्व करें यह उपाय

 

हमारे जीवन में नव ग्रहों की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका होती है सूर्यादि नव ग्रहों की शुभ स्थिति से व्यक्ति को अनेक प्रकार के सुख व वैभव की प्राप्ति होती है हमारे महर्षियों ने नव ग्रहों को प्रसन्न करने हेतु अनेक उपाय बताए हैं आज मैं उन्ही में से प्रत्येक ग्रहों को प्रसन्न करने के खास उपाय बता रहा हूँ जिन्हें आपको नहाने के पूर्व करना होता है तो चलिए जानते हैं उन उपायों के बारे में जिनसे हम नव ग्रहों को प्रसन्न कर सकते हैं:-

 

१. सूर्य को प्रसन्न करने हेतु पानी में लाल चंदन, मुलेठी, इलायची, केसर या गुलाब के फूल डालकर स्नान करना चाहिए ऐसा करने से सूर्य के अशुभ फलों में कमी आती है।

 

२. चंद्रमा को प्रसन्न करने हेतु नहाने के पानी में श्वेत चंदन, श्वेत पुष्प, कपूर या इत्र आदि डालकर स्नान करना चाहिए ऐसा करने से व्यक्ति का मन स्थिर रहता है तथा चंद्रमा के अशुभ फलों में कमी आती है।

 

३. मंगल को प्रसन्न करने हेतु लाल चंदन, हींग या गुलाब की पंखुड़ियाँ डालकर स्नान करना चाहिए ऐसा करने से मंगल के अशुभ फलों में कमी आती है।

 

४. बुध को प्रसन्न करने हेतु जल में जायफल, चंदन, गोरोचन, दूर्वा घास या अक्षत डालकर स्नान करना चाहिए ऐसा करने से बुध के अशुभ प्रभावों में कमी आती है।

 

५. गुरु को प्रसन्न करने हेतु जल में हल्दी, केसर, पीला चंदन या पीले पुष्प डालकर स्नान करना चाहिए ऐसा करने से गुरु के अशुभ फलों में कमी आती है।

 

६. शुक्र को प्रसन्न करने के लिए जल में कच्चा दूध, इलायची, श्वेत चंदन या श्वेत पुष्प डालकर स्नान करना चाहिए ऐसा करने से शुक्र के अशुभ फलों में कमी आती है।

 

७. शनि को प्रसन्न करने हेतु जल में काला तिल, सौंफ या सरसों तेल की कुछ बूंदे डालकर स्नान करना चाहिए ऐसा करने से शनि के अशुभ फलों में कमी आती है।

 

८. राहु को प्रसन्न करने हेतु जल में दूर्वा घास, कस्तूरी, लोबान या गज दंत आदि डालकर स्नान करना चाहिए ऐसा करने से राहु के अशुभ फलों में कमी आती है।

 

९. केतु को प्रसन्न करने हेतु जल में लाल चंदन, सरसों के दाने या कुशा डालकर स्नान करना चाहिए ऐसा करने से केतु के अशुभ फलों में कमी आती है।

 

जय श्री राम।

 

Astrologer:- Pooshark Jetly

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Mobile:- 9919367470, 7007245896

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शनि जयंती 10 जून 2021: शनि के अशुभ फल में कमी लाने हेतु करें यह खास उपाय

शनि जयंती 10 जून 2021: शनि के अशुभ फल में कमी लाने हेतु करें यह खास उपाय

 

शनि के अशुभ फल में कमी लाने हेतु करें यह खास उपाय
शनि के अशुभ फल में कमी लाने हेतु करें यह खास उपाय

 

१० जून २०२१ को शनि जयंती पड़ रही है शनि को न्याय का देवता कहा गया है शनि हमें हमारे कर्मों के अनुसार फल प्रदान करते हैं जिन लोगों की कुंडली में शनि की स्थिति अशुभ हो उन्हें जीवन में बहुत सी परेशानियों का सामना करना पड़ता है उनके कार्यों में बाधाएं आती हैं तथा किसी भी काम में पूरी एकाग्रता नहीं बन पाती है समस्त नव ग्रहों में शनि बहुत धीमी गति से भ्रमण करते है जिस कारण उन्हें एक राशि पार करने में ढाई वर्ष लगते हैं वर्तमान में शनि मकर राशि में वक्री अवस्था में गोचर कर रहे हैं।

 

जिन लोगों की कुंडली में शनि अशुभ होता है, उनके दैनिक जीवन में कुछ खास घटनाएं होने लगती हैं जिनसे हम बिना कुंडली देखे ही ये अंदाजा लगा सकते हैं कि शनि हमारी कुंडली में शुभ है या अशुभ तो आइए जानते हैं उन घटनाओं के बारे में:-

 

कुंडली में शनि के अशुभ होने की पहचान
कुंडली में शनि के अशुभ होने की पहचान

 

१. जिसकी कुंडली में शनि अशुभ होता है उनके जूते-चप्पल बार-बार टूट जाते हैं या गुम हो जाते हैं।

 

२. यदि शनि अशुभ हो तो व्यक्ति नया ज्ञान प्राप्त नहीं कर पाता है, पढ़ाई में मन नहीं लगता और इस क्षेत्र में उसे कोई उपलब्धि भी प्राप्त नहीं हो पाती है।

 

३. यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में शनि अशुभ हो तो उसका विवाह होते ही ससुराल पक्ष में कोई हानि हो सकती है।

 

४. यदि कोई व्यक्ति घर बनवा रहा है और कोई अशुभ घटना घर बनवाते वक्त हो जाए तो यह शनि के अशुभ होने का संकेत है।

 

५. कुंडली में शनि अशुभ हो तो व्यक्ति का मन बुराई की ओर, कुसंगति, नशे की ओर झुकने लगता है।

 

६. शनि यदि अशुभ हो तो जमा धन का नाश होता है, कोई बीमारी हो जाती है और शरीर कमजोर होने लगता है।

 

७. कुंडली में शनि की विपरीत स्थिति के कारण व्यक्ति आलसी हो जाता है इस कारण उसके काम ठीक तरह से नहीं हो पाते हैं और सफलता दूर होती जाती है।

 

८. जब किसी व्यक्ति के चेहरे पर हमेशा थकान, तनाव दिखाई देने लगे तो यह भी शनि के अशुभ होने का संकेत है।

 

९. शनि यदि अशुभ हो तो जवानी में ही व्यक्ति के बाल सफेद हो जाते हैं और बाल झड़ने लगते हैं और व्यक्ति को जोड़ों में दर्द रहता है।

 

१०. शनि अशुभ होने पर आंखें कमजोर हो जाती हैं, कमर दर्द की शिकायत रहती है।

 

शनि जयंती पर करें यह विशेष उपाय निश्चित ही लाभ होगा:-

 

शनि जयंती के खास उपाय
शनि जयंती के खास उपाय

 

१. काली उर्द, काला तिल, सरसों का तेल किसी निम्न वर्ग के प्राणी को दक्षिणा के साथ दान करें।

 

२. सरकारी अस्पतालों में दवाईयां दान करें।

 

३. हनुमान जी को तिल के तेल में सिंदूर घोलकर लगाएं तथा सुंदरकांड का पाठ करे व ११ बार हनुमान चालीसा का पाठ करें।

 

४. २१ आम के पत्तों पर चंदन से “राम” लिखकर उन पत्तो को एक के ऊपर एक रखें उसके बाद उस आम के पत्ते को मौली से लपेटकर २१ गांठ लगाएं तथा शनि मंत्रों का १ माला जाप कर के उन पत्तों को किसी पीपल वृक्ष के पास रखें या नदी में प्रवाहित करें तथा पीपल वृक्ष को सरसों के तेल का दिया अर्पित कर के १०८ बार “नमः शिवाय” मन्त्र का जाप करें।

 

५. छाया दान करें।

 

जय श्री राम।

 

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ग्रह पीड़ा निवारण हेतु वैदिक उपाय, दान व व्रत

ग्रह पीड़ा निवारण हेतु वैदिक उपाय, दान व व्रत

 

नव ग्रह पीड़ा निवारणार्थ उपाय
नव ग्रह पीड़ा निवारणार्थ उपाय

 

बहुत से लोग ज्योतिषी के पास जाते हैं तो वह बताते हैं कि आपका अमुक ग्रह खराब है अतः आज मैं आप सभी को सभी ग्रहों के दान व व्रत बताता हूँ जिन्हें आप सरलता से कर के जो ग्रह आपकी कुंडली में अशुभ हों उनको प्रसन्न कर सकते हैं तो चलिए जानते हैं वैदिक ज्योतिष में विभिन्न ग्रहों के सरल उपायों के बारे में जिन्हें आप बहुत ही सरलता से कर के ग्रहों को प्रसन्न कर सकते हैं:-

 

सूर्य ग्रह के उपाय:-

 

सूर्य ग्रह के उपाय
सूर्य ग्रह के उपाय

 

१. गेहूँ, माणिक, सोना, लाल वस्त्र, ताम्रपात्र का राविवार के दिन दान करने से सूर्य प्रसन्न होते हैं।

 

२. शुक्ल पक्ष के राविवार के दिन से आरंभ कर नित्य सूर्योदय से 1 घंटे तक स्नानादि कर सूर्य को जल देने व अदित्यहिर्दय स्तोत्र का पाठ करने से सूर्य प्रसन्न होते हैं।

 

३. नित्य कपिला गाय को रोटी व गुड़ खिलाने से सूर्य ग्रह प्रसन्न होते हैं।

 

४. राविवार के दिन किसी भी मंदिर में रक्त चंदन दान करने से भी सूर्य प्रसन्न होते हैं।

 

५. शुक्ल पक्ष के राविवार से व्रत का आरंभ कर 11 या 21 राविवार तक व्रत करने से भी सूर्य प्रसन्न होते हैं।

 

चंद्र ग्रह के उपाय:-

 

चंद्र ग्रह के उपाय
चंद्र ग्रह के उपाय

 

१.  चीनी, चावल, श्वेत वस्त्र, दूध, दहीं, मिश्री, चांदी, मोती का दान करने से चंद्र ग्रह प्रसन्न होते हैं।

 

. प्रदोष का व्रत करने से भी चंद्र ग्रह प्रसन्न होते हैं।

 

३. शंख में जल भरकर स्नान करने से भी चंद्र ग्रह प्रसन्न होते हैं।

 

४. सोमवार के दिन किसी भी मंदिर में श्वेत चंदन दान करने से भी चंद्र ग्रह प्रसन्न होते हैं।

 

नोट:- माता-पिता की सेवा करने से सूर्य व चंद्र दोनों ग्रह प्रसन्न होते हैं क्योंकि ज्योतिष में सूर्य को पिता व चंद्र को माता का कारक माना गया है।

 

मंगल ग्रह के उपाय:-

 

मंगल ग्रह के उपाय
मंगल ग्रह के उपाय

 

१. गेहूँ, गुड़, ताम्रपात्र, मूँगा, केसर का दान करने से मंगल ग्रह प्रसन्न होते हैं।

 

२. मंगलवार के दिन किसी भी मंदिर में लाल पुष्प व रक्त चंदन दान करने से मंगल ग्रह प्रसन्न होते हैं।

 

३. गणेश चतुर्थी व विनायक चतुर्थी का व्रत करने से भी मंगल ग्रह प्रसन्न होते हैं।

 

नोट:- बड़े भाई की सेवा करने से मंगल ग्रह प्रसन्न होते हैं क्योंकि ज्योतिष में मंगल ग्रह को बड़े भाई का कारक माना गया है।

 

बुध ग्रह के उपाय:-

 

बुध ग्रह के उपाय
बुध ग्रह के उपाय

 

१. पन्ना, हरी वस्तु, हरा वस्त्र, हरी मूँग, कपूर, फल का दान करने से बुध ग्रह प्रसन्न होते हैं।

 

. बुधवार के दिन किन्नर को हरी चूड़ी व हरी साड़ी दान करने से भी बुध ग्रह प्रसन्न होते हैं।

 

३. बुधवार के दिन गाय को हरा साग खिलाने से भी बुध ग्रह प्रसन्न होते हैं।

 

४. बुधवार का व्रत करने से भी बुध ग्रह प्रसन्न होते हैं।

 

गुरु ग्रह के उपाय:-

 

गुरु ग्रह के उपाय
गुरु ग्रह के उपाय

 

१. पीली वस्तु, पीला वस्त्र, केला, पोखराज, पीला मीठा, हल्दी का दान करने से गुरु ग्रह प्रसन्न होते हैं।

 

२. किसी विद्यार्थी को गुरुवार के दिन पुस्तक, पेन, पेंसिल का दान करने से भी गुरु ग्रह प्रसन्न होते हैं।

 

३. गुरुवार के दिन चने की दाल खिलाने से भी गुरु ग्रह प्रसन्न होते हैं।

 

४. एकादशी का व्रत करने से भी गुरु ग्रह प्रसन्न होते हैं।

 

शुक्र ग्रह के उपाय:-

 

शुक्र ग्रह के उपाय
शुक्र ग्रह के उपाय

 

१. चावल, दूध, दहीं, मिश्री, हीरा, स्फटिक का दान करने से शुक्र ग्रह प्रसन्न होते हैं।

 

२. शुक्रवार के दिन गाय को चावल और चीनी पकाकर खिलाने से भी शुक्र ग्रह प्रसन्न होते हैं।

 

३. 14 वर्ष से छोटी कन्या को चॉकलेट, चिप्स, परफ्यूम, हेयर क्लिप का दान करने से भी शुक्र ग्रह प्रसन्न होते हैं।

 

४. शुक्रवार के दिन सफेद पुष्प का किसी भी मंदिर में दान करने से शुक्र ग्रह प्रसन्न होते हैं।

 

५. शुक्रवार का व्रत करने से भी शुक्र ग्रह प्रसन्न होते हैं।

 

शनि ग्रह के उपाय:-

 

शनि ग्रह के उपाय
शनि ग्रह के उपाय

 

. गाय को सरसों के तेल की बनी रोटी व गुड़ खिलाने से शनि ग्रह प्रसन्न होते हैं।

 

२. शनिवार के दिन काला वस्त्र, काली उर्द, शहद, आम का अचार, काली चप्पल, काला छाता, नीलम, लोहा, काला तिल कस्तूरी का दान करने से भी शनि ग्रह प्रसन्न होते है।

 

३. शनिवार के दिन पीपल वृक्ष के समकक्ष तेल का दीपक अर्पित कर “ॐ नमः शिवाय:” मंत्र का जाप व शनि स्तोत्र का पाठ करने से भी शनि ग्रह प्रसन्न होते हैं।

 

. शनिवार का व्रत करने से भी शनि ग्रह प्रसन्न होते हैं।

 

राहु ग्रह के उपाय:-

 

राहु ग्रह के उपाय
राहु ग्रह के उपाय

 

१. गेहूँ, गोमेद, काला वस्त्र, सरसों तेल, काला कंबल, काला तिल का दान करने से शुक्र ग्रह प्रसन्न होते हैं।

 

२. बुधवार व शनिवार के दिन मछली को आटा और काला तिल मिलाकर खिलाने से भी राहु ग्रह प्रसन्न होते हैं।

 

३. पिंजरे में बंद पक्षी को स्वतंत्र करने से भी राहु ग्रह प्रसन्न होते हैं।

 

. शिवलिंग पर चाँदी के सर्प के जोड़े को अर्पित करने से राहु प्रसन्न होते हैं।

 

विशेष:- राहु के उपाय बुधवार के दिन करना चाहिए।

 

केतु ग्रह के उपाय:-

 

केतु ग्रह
केतु ग्रह के उपाय

 

१. काला वस्त्र, लहसुनिया, सोना, लोहा का दान करने से केतु ग्रह प्रसन्न रहते हैं।

 

२. नित्य चीटियों को नारियल का बुरादा डालने से भी केतु ग्रह प्रसन्न होते हैं।

 

३. रुद्राक्ष, चाँदी की बनी कोई वस्तु धारण करने से भी केतु के अशुभ फल में कमी आती है।

 

विशेष:-

 

१. दान की वस्तु आपके श्रद्धा व सामर्थ्य अनुसार है।

 

२. शनि, राहु व केतु के उपाय सूर्यास्त बाद करना चाहिए।

 

३. व्रत का तात्पर्य अन्न के त्याग से है अतः व्रत के दिन आप दूध व जल का ही सेवन करें।

 

जय श्री राम।

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