सनातन धर्म में संतान की दीर्घायु, उत्तम आरोग्य, विद्या-बुद्धि और जीवन-रक्षा के लिए कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को ‘अहोई अष्टमी’ (अहोई आठे) का निर्जला व्रत रखा जाता है। वर्ष 2026 में यह पावन महापर्व 01 नवंबर 2026 (रविवार) को अत्यंत दुर्लभ और कल्याणकारी पुष्य नक्षत्र तथा साध्य व शुभ योग के महासंयोग में मनाया जाएगा।
Astrology Sutras (ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी) के इस विशेष शोधपरक आलेख में हम निर्णय सिन्धु, मुहूर्त चिन्तामणि, धर्मसिन्धु, स्कंद पुराण और पद्म पुराण के अकाट्य प्रमाणों के साथ जानेंगे तिथि निर्णय का शास्त्रोक्त रहस्य, पूजा का सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त, तारा दर्शन से पारण का नियम, स्याहू माता व चांदी के मनकों (साया) की परंपरा, दो रानियों की मार्मिक व्रत कथा, मथुरा के राधा कुंड स्नान का दुर्लभ श्लोक, देश के 38 प्रमुख शहरों में चंद्रोदय समय और व्रत के अनिवार्य नियम।
⭐ 1 या 2 नवंबर 2026: तिथि निर्णय और निर्णय सिन्धु का अकाट्य नियम
अहोई अष्टमी व्रत के निर्णय को लेकर श्रद्धालुओं में भ्रम होना स्वाभाविक है। “ऋषिकेश पंचांग” (काशी मान) के अनुसार कार्तिक कृष्ण अष्टमी तिथि 01 नवंबर 2026 की रात्रि 07:04 बजे प्रारंभ होगी और 02 नवंबर 2026 की सायं 04:54 बजे समाप्त हो जाएगी। धर्मसिन्धु तथा निर्णय सिन्धु का स्पष्ट शास्त्रोक्त वचन है:
“कार्तिककृष्णाष्टम्यां सायं नक्षत्रावलोकनेन पारणं कुर्वन्ति। सा च प्रदोषव्यापिनी निशीथव्यापिनी वा ग्राह्या॥” — निर्णय सिन्धु
अर्थ: अहोई अष्टमी का व्रत प्रदोष व्यापिनी और रात्रि व्यापिनी अष्टमी में किया जाता है, जिसमें सायं काल तारों को देखकर अर्घ्य दिया जाता है।
02 नवंबर को अष्टमी तिथि सायं 04:54 बजे ही समाप्त हो रही है, जबकि सूर्यास्त सायं 05:32 बजे होगा। यानी 2 नवंबर की शाम को प्रदोष काल, तारा दर्शन और रात्रि काल में नवमी तिथि रहेगी। वहीं 01 नवंबर को रात्रि 07:04 बजे से पूरी रात अष्टमी तिथि विद्यमान रहेगी तथा इसी रात्रि चंद्रोदय और तारा दर्शन होंगे। अतः पूरे भारतवर्ष में अहोई अष्टमी का निर्जला व्रत 01 नवंबर 2026 (रविवार) को ही शास्त्रसम्मत व मान्य है।
अहोई अष्टमी 2026: सूक्ष्म पंचांग विवरण (ऋषिकेश पंचांग अनुसार)
01 नवंबर 2026 का गणितीय पंचांग मान निम्नलिखित है:
🌟 पारण का मुख्य नियम: तारा दर्शन या चंद्र दर्शन?
सर्वमान्य शास्त्रोक्त विधान: अहोई अष्टमी का व्रत मुख्य रूप से ‘तारा (नक्षत्र) दर्शन’ करके ही खोला जाता है।
- तारा दर्शन (मुख्य नियम): करवा चौथ पर चंद्र दर्शन मुख्य होता है, किंतु अहोई अष्टमी पर सायं काल आकाश में तारों के निकलते ही (06:12 से 06:40 PM के मध्य) करवे के जल से तारों को अर्घ्य देकर माताएं व्रत का पारण करती हैं।
- चंद्र दर्शन (केवल विशेष कुल-परंपरा): चूँकि इस रात चंद्रोदय बहुत विलंब से (रात 11:18 बजे के बाद) होता है, अतः जिन परिवारों में पीढ़ियों से केवल चंद्रमा को देखकर ही पारण की परंपरा बंधी हो, केवल वही माताएं मध्यरात्रि में चंद्र दर्शन कर अर्घ्य देंगी। सामान्यतः तारा अर्घ्य ही सर्वमान्य और धर्मसम्मत है।
📜 शास्त्रों के अनुसार प्रमाण: श्लोक, ध्यान व अर्घ्य मंत्र
अहोई अष्टमी पर अहोई माता (पार्वती स्वरूप), तारों और चंद्रमा के पूजन हेतु प्रामाणिक शास्त्रोक्त मंत्र निम्नलिखित हैं:
📿 स्याहू माता, सेही की कथा और चांदी की अहोई (साया) का रहस्य
📜 पद्म पुराण प्रमाण: राधा कुंड स्नान का दुर्लभ श्लोक व फल
मथुरा के गोवर्धन पर्वत की तलहटी में स्थित ‘राधा कुंड’ में अहोई अष्टमी (बहुलाष्टमी) की मध्यरात्रि को स्नान करने का विधान है। पद्म पुराण (पाताल खंड) में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने राधा कुंड की महिमा का वर्णन करते हुए कहा है:
📖 अहोई अष्टमी की पावन व्रत कथा: दो रानियां और महात्मा का बाल-परीक्षण
प्राचीन काल में एक नगर में दो रानियां निवास करती थीं। दोनों ही अत्यंत दुखी थीं—एक रानी ऐसी थी जिसके संतान का जन्म तो होता था, किंतु जन्म लेते ही या कुछ समय बाद उसकी संतान की मृत्यु हो जाती थी। वहीं दूसरी रानी ऐसी थी जिसे कभी संतान का सुख प्राप्त ही नहीं हुआ था, वह पूर्णतः निःसंतान थी।
एक दिन उस नगर में एक पहुंचे हुए सिद्ध महात्मा (साधु बाबा) पधारे। दोनों रानियां अपनी व्यथा लेकर साधु के आश्रम पहुंचीं और चरणों में गिरकर रोने लगीं। पहली रानी ने हाथ जोड़कर कहा—“महाराज! मेरी कोख से बच्चे जन्म तो लेते हैं, पर जीवित नहीं रहते। मेरी गोद सदा उजड़ जाती है।” वहीं दूसरी रानी बोली—“बाबा! मुझे तो विधाता ने मातृत्व का सुख ही नहीं दिया, मेरी कोख बांझ है।”
महात्मा जी ने दोनों की परीक्षा लेने का निर्णय किया। उन्होंने कहा—“तुम दोनों कल प्रातः काल मेरे पास पुनः आना, किंतु आते समय मार्ग में जो नन्हे बच्चे खेल रहे हों, उनमें से किसी एक बालक के सिर के बाल नोचकर मेरे पास ले आना। तभी तुम्हारी मनोकामना पूर्ण होगी।”
अगले दिन प्रातः काल जब दोनों आश्रम की ओर चलीं, तो मार्ग में अबोध बालक खेल रहे थे। जिस रानी को कभी संतान नहीं हुई थी, वह स्वार्थ और हठ में अंधी हो गई। उसने दौड़कर एक खेलते हुए निर्दोष बालक को पकड़ा और क्रूरता से उसके सिर के बाल नोच लिए। बालक चीखता-रोता रहा, पर उस रानी का हृदय नहीं पसीजा।
दूसरी ओर, जिस रानी की संतानें बार-बार मर जाती थीं, वह जब बालकों के समीप पहुंची, तो उसका हृदय कांप उठा। उसने सोचा—“संतान की एक खरोंच पर मां की छाती फट जाती है। मैंने अपनी संतानों को खोने का असह्य दर्द झेला है। अपने स्वार्थ के लिए मैं किसी दूसरे की कोख के लाल को यह पीड़ा कैसे दे सकती हूँ?” वह रोती हुई खाली हाथ आश्रम पहुंच गई।
महात्मा जी ने पूछा—“कहो, बाल कहाँ हैं?” निःसंतान रानी ने तुरंत बाल आगे बढ़ा दिए। महात्मा जी ने दूसरी रानी से पूछा—“तुम खाली हाथ क्यों आई?” तब उस ममतामयी रानी ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से कहा—“बाबा! जिस प्रकार मुझे अपनी संतानों के मरने पर असहनीय पीड़ा होती है, उसी प्रकार यदि मैं किसी पराए बच्चे के बाल नोचती तो उसकी मां और उस बालक को भारी कष्ट होता। मुझसे यह पाप नहीं हुआ। भले ही मेरी गोद सदा के लिए सूनी रह जाए, पर मैं किसी अबोध को रुला नहीं सकती।”
महात्मा जी उस रानी के निष्कपट वात्सल्य और करुणा से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने आशीर्वाद देते हुए कहा—“पुत्री! जिसके भीतर दूसरे की संतान के प्रति ऐसी ममता और दया है, साक्षात जगदम्बा उसकी रक्षा करती हैं। तू कार्तिक कृष्ण अष्टमी को विधिपूर्वक ‘अहोई माता’ का निर्जला व्रत करना। भगवती अहोई की कृपा से तेरी आगामी संतानें चिरायु, तेजस्वी और यशस्वी होंगी।”
इसके बाद उन्होंने बाल नोचकर लाने वाली क्रूर रानी से कहा—“जो स्त्री किसी अबोध बालक के दर्द को नहीं समझ सकती, वह मातृत्व की अधिकारी नहीं हो सकती। तेरे भीतर दया नहीं, केवल स्वार्थ है।”
उस दयावती रानी ने कार्तिक कृष्ण अष्टमी को पूर्ण श्रद्धा से अहोई माता का व्रत किया और अहोई माता की कृपा से उसे गुणवान और दीर्घायु पुत्रों की प्राप्ति हुई।
🛠️ प्रामाणिक अहोई माता पूजन विधि एवं अर्घ्य विधान
प्रातः सूर्योदय से पूर्व स्नानादि कर हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर संतान रक्षा का संकल्प लें।
क्रमबद्ध पूजन प्रक्रिया:
- अहोई माता का अंकन: घर की उत्तर या पूर्व दिशा की दीवार पर गेरू से अहोई माता, उनके 8 कोष्ठक, 7 पुत्र, साही (स्याहू) तथा सूर्य-चंद्रमा का चित्र बनाएं अथवा रेडीमेड अहोई चित्र स्थापित करें।
- कलश व करवा स्थापना: एक मिट्टी अथवा तांबे के लोटे में जल भरकर उस पर मौली बांधें और करवे पर स्वस्तिक बनाएं। लोटे के मुख पर सिंघाड़े, गेहूं और करवे के ढक्कन में मीठे पुए (गुलगुले) रखें।
- चांदी की अहोई का पूजन: चांदी की अहोई और साया (मनके) को कच्चे दूध व गंगाजल से स्नान कराकर रोली, अक्षत अर्पित करें।
- कथा श्रवण व गेहूं के 7 दाने: हाथ में गेहूं के 7 दाने और दूर्वा लेकर अहोई अष्टमी की पावन व्रत कथा सुनें। कथा के बाद यह दाने पल्लू में बांध लें।
- तारा दर्शन एवं अर्घ्य (पारण): सायं काल 06:12 से 06:40 के मध्य आकाश में तारों के उदित होने पर लोटे के जल से तारों को अर्घ्य दें। जो माताएं चंद्रोदय देखकर व्रत खोलती हैं, वे रात्रि 11:18 (काशी मान अनुसार) पर चंद्रदेव को अर्घ्य देकर अपनी संतान के हाथों से जल ग्रहण कर व्रत का पारण करें।
- सासू जी को बायना: पूजा के उपरांत 8 पुए, 8 पूरी, फल और वस्त्र किसी थाली में रखकर सासू जी या घर की वरिष्ठ महिला के चरण छूकर बायना भेंट करें।
🌕 भारत के 38 प्रमुख शहरों में चंद्रोदय समय सारणी (01 नवंबर 2026)
ऋषिकेश पंचांग के काशी चंद्रोदय (रात्रि 11:18 बजे) को आधार मानकर रेखांशीय देशांतर गणना अनुसार 01 नवंबर की रात देश के 38 प्रमुख नगरों में चाँद निकलने का समय निम्नलिखित रहेगा:
⚠️ अहोई अष्टमी के 5 कठोर नियम: भूलकर भी न करें ये गलतियां
💬 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Google FAQs)
निष्कर्ष: अहोई अष्टमी का व्रत मातृ-हृदय के अगाध वात्सल्य, त्याग और करुणा का महापर्व है। 01 नवंबर 2026 को पुष्य नक्षत्र के पावन संयोग में सायं 07:04 से 08:15 के मध्य किया गया पूजन संतान के जीवन के समस्त संकटों को दूर कर उसे दीर्घायु और आरोग्य प्रदान करता है।
