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गोवर्धन पूजा (अन्नकूट) 2026: 10 नवंबर को मनेगा महापर्व, जानें काशी सहित 12 प्रमुख शहरों में पूजन शुभ मुहूर्त्त, 56 भोग रहस्य, पौराणिक प्रमाण व शास्त्रोक्त विधि

सनातन धर्म में कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को ‘गोवर्धन पूजा’, ‘अन्नकूट महोत्सव’ तथा ‘बलि प्रतिपदा’ के पावन महापर्व के रूप में मनाया जाता है। यह दिव्य पर्व प्रकृति, गौ-वंश, पर्वत और भगवान श्रीकृष्ण के साक्षात स्वरूप गिरिराज गोवर्धन के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का महापर्व है।

वर्ष 2026 में यह महापर्व 10 नवंबर 2026 (मंगलवार) को भरणी नक्षत्र, सिद्धि योग और सूर्योदय व्यापिनी प्रतिपदा के परम मंगलकारी संयोग में मनाया जाएगा।

Astrology Sutras (ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी) के इस विशेष शोधपरक आलेख में हम श्रीमद्भागवत महापुराण, विष्णु पुराण, स्कन्द पुराण, निर्णय सिन्धु और मुहूर्त चिन्तामणि के अकाट्य प्रमाणों के आलोक में जानेंगे—तिथि निर्णय का यथार्थ, वाराणसी (काशी) सहित देश के 12 प्रमुख शहरों में देशांतर अनुसार पूजा के सटीक मुहूर्त्त, 56 भोग का रहस्य, गौ-माता पूजन और घर पर गोवर्धन निर्माण की संपूर्ण प्रामाणिक विधि।

💡 9 या 10 नवंबर: तिथि निर्णय और निर्णय सिन्धु का अकाट्य नियम

ऋषिकेश पंचांग (काशी मान) के अनुसार कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा तिथि 09 नवंबर 2026 को दिन में 11:32 बजे प्रारंभ होगी और 10 नवंबर 2026 को दिन में 12:37 बजे समाप्त होगी।

  • पूर्वाह्न व्यापिनी ग्राह्यता: निर्णय सिन्धु एवं धर्मसिन्धु का स्पष्ट शास्त्रीय निर्देश है—“कार्तिकशुक्लप्रतिपदि प्रातःकाले गोवर्धनपूजा बलीपूजा च कार्या।।” अर्थात् गोवर्धन पूजा, अन्नकूट और बलि पूजा दिवाकाल (विशेषकर प्रातःकाल व मध्याह्न) में की जाती है।
  • 10 नवंबर ही क्यों सर्वमान्य? 09 नवंबर को सूर्योदय के समय अमावस्या थी (जो दीपावली का दिन था)। 10 नवंबर को सूर्योदय (प्रातः 06:24 बजे) प्रतिपदा तिथि में हो रहा है और यह तिथि दोपहर 12:37 बजे तक रहेगी। धर्मशास्त्रों का अकाट्य नियम है कि उदयाकालीन व पूर्वाह्न व्यापिनी प्रतिपदा में ही गोवर्धन पूजन, अन्नकूट भोग व परिक्रमा संपन्न की जाती है। अतः पूरे भारतवर्ष में गोवर्धन पूजा 10 नवंबर 2026 (मंगलवार) को ही शास्त्रसम्मत है।

सूक्ष्म पंचांग विवरण (ऋषिकेश पंचांग, काशी अनुसार)

10 नवंबर 2026 का सुनिश्चित गणितीय पंचांग मान निम्नलिखित है:

पंचांगीय अंग / विवरण सटीक समय व मान (ऋषिकेश पंचांग, काशी)
पर्व / दिनांक गोवर्धन पूजा (अन्नकूट) / 10 नवंबर 2026, मंगलवार
प्रतिपदा तिथि प्रारंभ 09 नवंबर 2026, दिन में 11:32 बजे से
प्रतिपदा तिथि समाप्त 10 नवंबर 2026, दिन में 12:37 बजे तक
सूर्योदय / सूर्यास्त (काशी) प्रातः 06:24 बजे / सायं 05:25 बजे
नक्षत्र संचरण भरणी नक्षत्र सायं 06:18 तक, उपरांत कृत्तिका नक्षत्र
योग संचरण सिद्धि योग दोपहर 02:00 तक, उपरांत व्यतीपात योग
अभिजित मुहूर्त (काशी मान) पूर्वाह्न 11:36 बजे से दोपहर 12:20 बजे तक
राहुकाल (पूजन वर्जित) दोपहर 02:40 बजे से सायं 04:02 बजे तक

⏰ वाराणसी (काशी) सहित 12 प्रमुख शहरों में गोवर्धन पूजा के शुभ मुहूर्त्त

मुहूर्त चिन्तामणि अनुसार स्थानीय सूर्योदय व देशांतर-संस्कार करके 10 नवंबर 2026 को वाराणसी सहित देश के 12 प्रमुख शहरों में गोवर्धन व अन्नकूट पूजन के सुनिश्चित समय निम्नलिखित हैं:

शहर का नाम एवं राज्य प्रातः शुभ चौघड़िया मुहूर्त अभिजित मुहूर्त (प्रतिपदा अंत पूर्व)
1. वाराणसी / काशी (उ.प्र.) प्रातः 07:35 से 10:20 तक पूर्वाह्न 11:36 से 12:20 तक
2. नई दिल्ली / NCR प्रातः 07:55 से 10:40 तक पूर्वाह्न 11:43 से 12:26 तक
3. लखनऊ (उ.प्र.) प्रातः 07:42 से 10:28 तक पूर्वाह्न 11:32 से 12:16 तक
4. कानपुर (उ.प्र.) प्रातः 07:45 से 10:30 तक पूर्वाह्न 11:34 से 12:18 तक
5. बरेली (उ.प्र.) प्रातः 07:49 से 10:34 तक पूर्वाह्न 11:38 से 12:21 तक
6. रामपुर (उ.प्र.) प्रातः 07:51 से 10:36 तक पूर्वाह्न 11:40 से 12:23 तक
7. जयपुर (राजस्थान) प्रातः 08:00 से 10:45 तक पूर्वाह्न 11:49 से 12:32 तक
8. सालासर बालाजी (राज.) प्रातः 08:04 से 10:49 तक पूर्वाह्न 11:52 से 12:35 तक
9. पटना (बिहार) प्रातः 07:28 से 10:14 तक पूर्वाह्न 11:18 से 12:02 तक
10. गया (बिहार) प्रातः 07:29 से 10:15 तक पूर्वाह्न 11:19 से 12:03 तक
11. कोलकाता (प. बंगाल) प्रातः 07:12 से 09:58 तक पूर्वाह्न 11:02 से 11:46 तक
12. बेंगलुरु (कर्नाटक) प्रातः 07:40 से 10:25 तक पूर्वाह्न 11:44 से 12:28 तक

📜 सनातन शास्त्रों में गोवर्धन पूजा के प्रामाणिक श्लोक व मंत्र

पुराणों में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा इंद्र-यज्ञ त्यागकर प्रकृति रूपी गोवर्धन और गो-माता के पूजन का स्पष्ट निर्देश मिलता है:

शास्त्रोक्त मूल श्लोक प्रामाणिक अर्थ एवं आध्यात्मिक संदर्भ

“गोवर्धनो धराधार गोकुलत्राणकारक।
विष्णुबाहुकृतच्छाय गवां कोटिप्रदो भव॥”

स्कन्द पुराण (गोवर्धन प्रार्थना मंत्र)

अर्थ: हे पृथ्वी को धारण करने वाले, गोकुल की रक्षा करने वाले और भगवान श्रीविष्णु की भुजाओं की छत्रछाया में विश्राम पाने वाले गिरिराज गोवर्धन! आप मुझ पर प्रसन्न हों और मुझे कोटि-कोटि गो-धन व सुख-समृद्धि प्रदान करें।

“तस्माद् गावो द्विजाश्चैव गोवर्धनमहीधरम्।
यज्ञैः संवत्सरेऽतीते पूजयन्तु समन्ततः॥”

विष्णु पुराण (5.10.42)

अर्थ: भगवान श्रीकृष्ण ब्रजवासियों से कहते हैं—अतः वर्ष की समाप्ति पर ब्रजवासी गौ-माताओं, वेदपाठी ब्राह्मणों और साक्षात अन्नदाता गिरिराज गोवर्धन का विविध पकवानों व यज्ञों द्वारा संपूर्ण श्रद्धा से पूजन करें।

“सर्वकामदुधे देवि सर्वतीर्थीकृते शिवे।
पावनि सुरभिश्रेष्ठे देवि तुभ्यं नमोऽस्तु ते॥”

पद्म पुराण (गो-माता प्रार्थना)

अर्थ: समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली, सभी तीर्थों को अपने भीतर धारण करने वाली, परम कल्याणमयी और जगत को पवित्र करने वाली सुरभि स्वरूपा गौ-माता! आपको मेरा कोटिशः नमन है।

“बलिराज नमस्तुभ्यं विरोचनसुत प्रभो।
भविष्येन्द्र सुराराते पूजेयं प्रतिगृह्यताम्॥”

भविष्योत्तर पुराण (बलि पूजा मंत्र)

अर्थ: हे विरोचन के पुत्र, भविष्य के इंद्र और दानवीर राजा बलि! आपको नमस्कार है। भगवान वामन के वचनानुसार कार्तिक प्रतिपदा को समर्पित हमारी इस पूजा को स्वीकार करें।

🌟 गोवर्धन पूजा क्यों मनाते हैं? (इंद्र-मानभंग एवं प्रकृति-दर्शन)

श्रीमद्भागवत महापुराण (दशम स्कंध, अध्याय 24-25) के अनुसार द्वापर युग में देवराज इंद्र के अभिमान को चूर्ण करने और प्रकृति-पूजा की स्थापना हेतु भगवान श्रीकृष्ण ने यह लीला रची थी:

  • इंद्र यज्ञ का निषेध: बालकृष्ण ने नंदबाबा और गोपों से कहा कि इंद्र कोई प्रत्यक्ष देवता नहीं जो हमें अन्न देते हैं। हमारा प्रत्यक्ष भरण-पोषण यह गोवर्धन पर्वत करता है, जिसकी कंदराओं से औषधियां, नदियां और गौ-माताओं के लिए हरी घास मिलती है। अतः पूजा प्रत्यक्ष प्रकृति की होनी चाहिए।
  • संवर्तक मेघों का प्रकोप: जब ब्रजवासियों ने इंद्र-पूजा बंद कर दी, तो कुपित होकर इंद्र ने प्रलयंकारी ‘संवर्तक मेघों’ को ब्रज को जलमग्न करने का आदेश दिया। लगातार 7 दिन और 7 रात मूसलाधार वर्षा हुई।
  • कनिष्ठिका पर गिरिराज धारण: भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी बाएं हाथ की छोटी उंगली (कनिष्ठिका) पर संपूर्ण 21 किलोमीटर के गोवर्धन पर्वत को एक छत्र के समान उठा लिया। समस्त गोकुलवासी, गोप-गोपियां और गौ-वंश उसके नीचे सुरक्षित आ गए।
  • इंद्र की पराजय व सुरभि अभिषेक: अंततः इंद्र का गर्व टूट गया। वे कामधेनु (सुरभि) गाय के साथ आए और श्रीकृष्ण से क्षमा मांगी। कामधेनु ने अपने दुग्ध से प्रभु का अभिषेक किया और उन्हें ‘गोविंद’ (गौओं और इंद्रियों के स्वामी) की उपाधि दी।

🍲 अन्नकूट 56 भोग का रहस्य: 7 दिन और 8 पहर का दिव्य गणित

गोवर्धन पूजा पर भगवान को ‘अन्नकूट’ और ‘छप्पन भोग’ लगाने की परंपरा का सीधा संबंध श्रीकृष्ण की गोवर्धन लीला से है:

भगवान श्रीकृष्ण बाल्यकाल में एक दिन में 8 पहर (8 बार) भोजन करते थे। गोवर्धन पर्वत को उठाए रखने के दौरान 7 दिनों तक प्रभु ने जल की एक बूंद भी ग्रहण नहीं की और न ही कुछ खाया।

दिव्य गणित: 7 दिन × 8 पहर = 56 पहर का भोजन!

जब आठवें दिन वर्षा थमी और भगवान ने पर्वत को नीचे रखा, तब माता यशोदा और संपूर्ण ब्रजवासियों ने वात्सल्य प्रेम में विह्वल होकर 7 दिनों के छूटे हुए 56 पहर के निमित्त 56 प्रकार के दिव्य व्यंजन तैयार कर प्रभु को अर्पित किए। यही परंपरा आज ‘अन्नकूट’ और ’56 भोग’ कहलाती है।

🛠️ घर पर गोवर्धन निर्माण एवं संपूर्ण शास्त्रोक्त पूजन विधि

10 नवंबर 2026 की प्रातः काल शुभ चौघड़िया (07:35 से 10:20) अथवा अभिजित मुहूर्त्त में पूजन करें:

  1. गोबर से गिरिराज निर्माण: घर के आंगन अथवा मुख्य द्वार के पास शुद्ध देशी गाय के गोबर से लेटे हुए पुरुष रूप में गिरिराज गोवर्धन का विग्रह बनाएं। उनके नाभि स्थान पर एक मिट्टी का दीपक या कटोरी रखें।
  2. श्रृंगार: गोवर्धन जी को खील, बताशे, रोली, अक्षत, गेंदे के पुष्प और दूर्वा से सजाएं। वृक्षों की शाखाएं लगाकर पर्वत का स्वरूप दें।
  3. दुग्ध अभिषेक (नाभि में): नाभि पर रखे दीपक में गंगाजल, कच्चा दूध, दही, शहद और शक्कर (पंचामृत) अर्पित करें।
  4. अन्नकूट भोग: अनेक प्रकार की ऋतु सब्जियों को मिलाकर बनी ‘कढ़ी-बाजरा’, अन्नकूट की मिक्स सब्जी, पूरी, खीर और मिष्ठान्न का भोग लगाएं।
  5. गो-माता पूजन: गायों को स्नान कराकर उनके सींगों पर तेल व गेरू लगाएं, गले में घंटियां बांधें। गाय को गुड़, हरा चारा और अन्नकूट का प्रसाद खिलाकर आरती उतारें।
  6. 7 बार परिक्रमा: हाथ में जल का लोटा लेकर परिवार सहित “गोवर्धन धराधार…” मंत्र बोलते हुए गोवर्धन जी की 7 बार घड़ी की दिशा (क्लॉकवाइज) में परिक्रमा करें और जल अर्पित करते जाएं।

⚠️ क्या करें और क्या न करें: शास्त्रोक्त नियम

क्या अवश्य करें? (परम शुभ) क्या कदापि न करें? (सर्वथा वर्जित)
1. गोवर्धन पूजन खुले आंगन या छत के नीचे करें।
2. गौ-माता की सेवा करें और पहली रोटी गाय को दें।
3. अन्नकूट में कढ़ी-चावल और बाजरा अवश्य बनाएं।
4. पूरे परिवार सहित 7 परिक्रमा पूरी करें।
5. राजा बलि के निमित्त दीप प्रज्वलित करें।
1. बंद कमरे में गोवर्धन पूजा न करें।
2. भैंस के गोबर से गोवर्धन कदापि न बनाएं (गाय का ही लें)।
3. परिक्रमा बीच में अधूरी न छोड़ें और उल्टी न करें।
4. अन्नकूट प्रसाद में प्याज-लहसुन का प्रयोग वर्जित है।
5. इस दिन किसी भी जीव या पशु को प्रताड़ित न करें।

💬 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Google FAQs)

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न प्रामाणिक शास्त्रीय उत्तर
यदि गाय का गोबर न मिले तो गोवर्धन पूजा कैसे करें? यदि गाय का ताजा गोबर उपलब्ध न हो, तो सूखी गोबर की कंडे/राख, शुद्ध बालू मिट्टी अथवा पीतल/तांबे की चौकी पर गेहूं-चावल की ढेरी बनाकर गिरिराज शिला या शालिग्राम जी को स्थापित कर पूजन किया जा सकता है।
गोवर्धन जी की नाभि में दूध क्यों डाला जाता है? नाभि संपूर्ण शरीर की प्राण-ऊर्जा का केंद्र है। गोवर्धन जी साक्षात श्रीकृष्ण स्वरूप हैं। नाभि में कच्चा दूध अर्पित करने से परिवार में वंश-वृद्धि, शांति और आरोग्य का संचार होता है। इस दूध को बाद में चरणामृत रूप में ग्रहण किया जाता है।
गोवर्धन पूजा के दिन बलि पूजा क्यों होती है? स्कन्द पुराण के अनुसार भगवान वामन ने दानवीर राजा बलि को पाताल लोक का राज्य देते हुए वर दिया था कि कार्तिक प्रतिपदा के दिन जो मनुष्य बलि का स्मरण कर दीपदान करेगा, उसके घर में वर्ष भर दरिद्रता नहीं आएगी।
गोवर्धन परिक्रमा 7 बार ही क्यों की जाती है? भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को 7 दिनों तक उठाए रखा था। उन 7 दिनों के स्मरण और प्रकृति के 7 लोकों के सम्मान में घर पर गोवर्धन जी की 7 बार परिक्रमा की जाती है।

निष्कर्ष: गोवर्धन पूजा 2026 प्रकृति, गौ-वंश और परमात्मा के अगाध समन्वय का महापर्व है। 10 नवंबर 2026 को उदयाकालीन प्रतिपदा में शास्त्रोक्त विधि से किया गया गिरिराज पूजन आपके कुल को अन्न, धन, आरोग्य और गोपाल श्रीकृष्ण की शाश्वत छत्रछाया प्रदान करता है।

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