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16 फरवरी 2021 को मनाई जाएगी बसंत पंचमी: जानें शुभ मुहर्त 

16 फरवरी 2021 को मनाई जाएगी बसंत पंचमी: जानें शुभ मुहर्त

 

बसंत पंचमी
बसंत पंचमी

 

माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि बसंत पंचमी के नाम से विख्यात है इस वर्ष माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि १५ फरवरीकी मध्य रात्रि २ बजकर ४५ मिनट से १६ फरवरी की मध्य रात्रि ४ बजकर ३४ मिनट तक रहेगी शास्त्रों में सूर्योदय व्याप्त तिथि के अनुसार पर्व मनाने का विधान है अतः इस वर्ष १६ फरवरी को बसंत पंचमी मनाई जाएगी।

 

शास्त्रों के अनुसार बसंत पंचमी को श्री पंचमी भी कहा जाता है इस दिन अबूझ मुहर्त होने के कारण से किसी भी मांगलिक कार्यक्रम को करने के साथ किसी नई वस्तु का क्रय या किसी नए कार्य का आरंभ भी किया जा सकता है बसंत पंचमी के दिन विद्या की देवी माता सरस्वती के पूजन का विधान है इस दिन माता सरस्वती की पूजा करने से अत्यंत शुभ फल की प्राप्ति होती है तथा जिन विद्यार्थियों की शिक्षा में अवरोध उत्पन्न हो रहे हों उन्हें बसंत पंचमी के दिन माता सरस्वती की विधि पूर्वक पूजा करनी चाहिए।

 

पूजा शुभ मुहर्त:-

 

बसंत पंचमी के दिन अबूझ मुहर्त रहने के कारण किसी भी समय माता सरस्वती की पूजा की जा सकती है।

 

१६ फरवरी का अति सूक्ष्म पंचांग:-

 

 

दिनमान:- २८:००

नक्षत्र:- रेवती ३४ घड़ी १९ पल अर्थात रात्रि ०८:०८ तक।

करण:- वव २३ घड़ी ०८ पल उपरांत वालव

चंद्र गोचर:- मीन रात्रि ०८:०७ तक मेष ०८:०८ से

सूर्योदय:- ०६:३४

सूर्यास्त:- ०५:३६ 

सूर्य औदयिक स्पष्ट:- ०३:१५:१२

सूर्य गोचर:- कुंभ राशि

चन्द्रास्त:- ०९:५८

 

उपरोक्त सभी विवरण “ऋषिकेश पंचांग (काशी)” अनुसार है।

 

१६ फरवरी विशेष:-

 

चंद्रमा मेष राशि में रात्रि ०८:०८ से, श्री बसंत पंचमी, तक्षक पूजा, सरस्वती पूजन, रतिकाम महोत्सव, पंचक समाप्ति रात्रि ०८:०८ पर, मंगल को रेवती में पुंसवनसीमंत सूतिस्नान लाल वस्त्र धारण पश्चिम दिशा की यात्रा वस्तु क्रय मुहर्त है। रात्रि ०८:०८ के बाद अश्विनी में उत्तर दिशा को छोड़कर अन्य दिशा की यात्रा, ऑपरेशन करवाने का मुहर्त है।

 

जय श्री राम।

 

Astrologer:- Pooshark Jetly

 

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विक्रम संवत 2078 में वर्षा विचार जानें आनंद संवत्सर में कब होगी वर्षा

विक्रम संवत 2078 में वर्षा विचार जानें आनंद संवत्सर में कब होगी वर्षा

 

विक्रम संवत २०७८ में वर्षा होने के योग
विक्रम संवत २०७८ में वर्षा होने के योग

 

आर्द्राप्रवेशाङ्ग के विचार से वर्षा मध्यम है, चक्रवात व तूफान का प्रकोप रहेगा, पूर्वोत्तर पर्वतीय क्षेत्रों में वर्षा उत्तम, पूर्वी भाग में सामान्य वर्षा, देश के पश्चिम व मध्य भाग में वर्षा की कमी होगी, दक्षिण भाग में वायु का प्रकोप होगा, जल संकट संभव है।

 

शारदधानयोत्तपत्ति के विचार से उत्पादन संतोषप्रद रहेगा, फसलों के मूल्य सामान्य रहेंगे, पूर्वोत्तर तथा दक्षिण पश्चिम कृषि को क्षति होगी, ग्रैष्मिकधानयोत्तपत्ति के विचार से रवी की फसल का उत्पादन उत्तम रहेगा, फसलों को रोगादि का भय होगा, दक्षिण भाग में कृषि को क्षति होगी, फसलों के मूल्यों में वृद्धि होगी।

 

वर्षा विज्ञान:-

 

वर्षा विज्ञान
वर्षा विज्ञान

 

सूर्य के रोहिणी नक्षत्र में जिस दिन वर्षा होवे उसके ऊपर लिखे दिन तक जलवृष्टि उत्तम ढंग से न होगी।

 

उदाहरण:-

 

यदि रोहिणी नक्षत्र का सूर्य आने के पाँचवें दिन वर्षा हो गयी तो ३१ दिन तक सुंदर ढंग से जल वृष्टि न हो सकेगी, जिस दिशा से बादल रोहिणी नक्षत्र में आते हुए दृष्टिगोचर होगा उसी दिन में जलवृष्टि की आगे न्यूनता रहेगी।

 

वर्षा विचार:-

 

आर्द्रा (२२ जून दिन १/५१ पर)

 

आर्द्रा का केवल तृतीय चरण निर्जल है शेष सभी चरण सजल है अतः तारीख २२ से २८ जून व तारीख ३ से ५ जुलाई तक वर्षा होगी।

 

पुनर्वसु (६ जुलाई दिन ३/३२ पर)

 

पुनर्वसु नक्षत्र का तृतीय व चतुर्थ चरण निर्जल है और प्रथम व द्वितीय चरण सजल है अतः तारीख ६ से १२ जुलाई तक वर्षा होगी।

 

पुष्य (तारीख २० जुलाई सायं ५/० पर)

 

पुष्य नक्षत्र का केवल द्वितीय चरण सजल है शेष सभी चरण निर्जल है अतः तारीख २२ से २६ जुलाई तक वर्षा होगी।

 

आश्लेषा (तारीख ३ अगस्त सायं ५/२४ पर)

 

आश्लेषा नक्षत्र का केवल द्वितीय चरण सजल है शेष सभी चरण निर्जल है अतः तारीख ६ से ११ अगस्त तक वर्षा होगी।

 

मघा (तारीख १७ अगस्त सायं ४/०८ पर)

 

मघा नक्षत्र का केवल द्वितीय चरण सजल है शेष सभी चरण निर्जल है अतः तारीख २० से २३ अगस्त तक वर्षा होगी।

 

पूर्वाफाल्गुनी (तारीख ३१ अगस्त दिन १२/३२ पर)

 

पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र का प्रथम व द्वितीय चरण सजल है शेष तृतीय व चतुर्थ चरण निर्जल है अतः तारीख ३१ अगस्त से ६ सितंबर व तारीख ७ से १० सितंबर तक वर्षा होगी।

 

उत्तराफाल्गुनी (तारीख १४ सितंबर प्रातः ६/२३ पर)

 

उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र का केवल तृतीय चरण सजल व शेष चरण निर्जल है अतः तारीख २१ से २४ सितंबर तक आँधी-तूफान व उमस के साथ वर्षा होगी।

 

हस्त (तारीख २७ सितंबर रात्रि ९/३२ पर)

 

हस्त नक्षत्र का तृतीय व चतुर्थ चरण सजल व शेष प्रथम व द्वितीय चरण निर्जल है अतः तारीख ५ से १० अक्टूबर तक वायु के साथ अच्छी वर्षा होगी।

 

चित्रा (तारीख ११ अक्टूबर दिन ९/५४ पर)

 

चित्रा नक्षत्र का प्रथम व द्वितीय चरण सजल व शेष तृतीय व चतुर्थ चरण निर्जल है अतः तारीख ११ से १७ व २३ अक्टूबर को वर्षा होगी।

 

स्वाती (तारीख २४ अक्टूबर रात्रि ०७/३३ पर)

 

स्वाती नक्षत्र का तृतीय व चतुर्थ चरण सजल व शेष प्रथम व द्वितीय चरण निर्जल है अतः तारीख १ से ६ नवंबर तक अच्छी वर्षा होगी।

 

जय श्री राम।

 

Astrologer:- Pooshark Jetly

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विक्रम संवत २०७८ के वर्ष प्रवेश लग्न से भारत में घटित होने वाली प्रमुख घटनाएं

विक्रम संवत २०७८ के वर्ष प्रवेश लग्न से भारत में घटित होने वाली प्रमुख घटनाएं

 

विक्रम संवत 2078 में वर्ष प्रवेश लग्न से भारत का भविष्य
विक्रम संवत 2078 में वर्ष प्रवेश लग्न से भारत का भविष्य

 

भारत के प्रवेश वर्ष प्रवेश लग्न के विचार से वर्ष प्रवेश लग्न मेष व द्रव्येश शुक्र है अतः मनोरंजन जगत एवं श्रृंगार संबधी व्यापार में थोड़ा लाभ होगा, पराक्रमेश बुध के होने से भारत की नीतियों से अंतराष्ट्रीय क्षेत्र में सफलता प्राप्त होगी, सुखेश चंद्रमा के होने के कारण से लोक कल्याण के कार्य से जनता सुखी रहेगी तथा बुध के कष्टेश होने के कारण से अनावश्यक समस्याओं का सामना करना पड़ेगा, मारकेश मंगल के होने के कारण से कई जगह अहिंसक उपद्रव होंगे व भाग्येश गुरु के होने के कारण से शिक्षा के क्षेत्र में उन्नति होगी, कर्मेश शनि से कानून व्यवस्था अच्छी दीर्घकालिक योजनाओं का शुभारंभ होगा, आयेश शनि के होने से राष्ट्रीय कोष में वृद्धि होगी तथा व्ययेश गुरु के होने के कारण से शिक्षा, ऊर्जा व योग के क्षेत्र में विस्तार होगा।

 

आनंद संवत्सर की हार्दिक शुभकामनाएं
आनंद संवत्सर की हार्दिक शुभकामनाएं

 

जय श्री राम।

 

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राहु और शनि से बनने वाला अशुभ योग: जानिए कौन सा है यह अशुभ योग व उसके फल और उपाय

राहु और शनि से बनने वाला अशुभ योग: जानिए कौन सा है यह अशुभ योग व उसके फल और उपाय

 

शनि व राहु से बनने वाला पिशाच योग
शनि व राहु से बनने वाला पिशाच योग

 

शनि और राहु इन दोनों को वैदिक ज्योतिष में पाप ग्रह की श्रेणी में रखा गया है जब यह दो ग्रह आपस में संबंध बनाते हैं तो पिशाच नामक योग बनता है अब प्रश्न यह उठता है कि किस प्रकार से शनि व राहु संबंध बनाएं तो यह योग बनता है उससे पूर्व हमारे लिए यह जानना आवश्यक है कि आखिर शनि व राहु से ही क्यों पिशाच योग बनता है व पिशाच योग का क्या अर्थ है इसके लिए हमें पहले शनि व राहु को समझना होगा शनि व राहु रात्रि बली होते हैं शनि का वर्ण श्याम है और शनि अंधेरे का ग्रह है और राहु एक माया अर्थात जादू है जब भी शनि और राहु के बीच संबंध बनता है तो एक नकारात्मक शक्ति का सृजन होता है जिसे पराशरी ज्योतिष में “पिशाच योग” की संज्ञा प्राप्त है।

 

राहु व शनि के चार प्रकार से संबंध बनने पर व्यक्ति को पिशाच योग का फल प्राप्त होता है वह इस प्रकार है:-

 

१. शनि व राहु एक साथ युति कर के किसी भी भाव में स्थित हों।

 

२. शनि व राहु एक दूसरे को परस्पर देखतें हों।

 

३. शनि की राहु या राहु की शनि पर दृष्टि हो।

 

४. गोचर वश जब शनि जन्म के राहु या राहु जन्म के शनि पर से गोचर करता हो।

 

इन चार प्रकार के शनि व राहु के मध्य संबंध बनने पर पिशाच योग बनता है अब प्रश्न यह उठता है कि इस पिशाच योग के क्या होते हैं तो चलिए मैं विभिन्न भावों में बनने वाले पिशाच योग के फल को बताता हूँ:-

 

पिशाच योग
पिशाच योग

 

१. यदि लग्न में शनि व राहु की युति हो तो ऐसे व्यक्ति के ऊपर तांत्रिक क्रियाओं का अधिक प्रभाव रहता है तथा ऐसे व्यक्ति हमेशा चिंतित रहते हैं और इनके मस्तिष्क में नकारात्मक विचार सबसे पहले आते हैं साथ ही ऐसे व्यक्तियों को कोई न कोई रोग निरंतर बना रहता है।

 

२. यदि द्वितीय भाव में शनि व राहु की युति हो तो व्यक्ति के घर वाले ही उसके शत्रु रहते हैं तथा इनको हर कार्य में बाधाओं का सामना करना पड़ता है और इनकी वाणी में कुछ दोष रहता है साथ ही धन संचय में कठिनाई व जुए-सट्टे आदि में धन हानि होती है तथा ऐसे व्यक्ति नशीले पदार्थों या तामसिक पदार्थों या दोनों का सेवन करते हैं।

 

३. यदि तृतीय भाव में शनि व राहु की युति हो तो ऐसे व्यक्ति अधिकतर भ्रमित रहते हैं व ऐसे व्यक्तियों का छोटा भाई नही होता या छोटे भाई को किसी प्रकार कोई कष्ट रहता है कहने का आशय यह है कि तृतीय भाव का पिशाच योग छोटे भाई के सुख की हानि करता है साथ ही ऐसे व्यक्तियों को समय-समय पर भारी उतार-चढ़ाव के समय से गुजरना पड़ता है साथ ही यदि पंचमेश पर भी शनि या राहु की या दोनों की दृष्टि हो या युति हो तो ऐसे व्यक्तियों को संतान नही होती या होकर मर जाती है कहने का आशय यह है कि ऐसे व्यक्तियों को संतान सुख नही प्राप्त होता है।

 

४. यदि चतुर्थ भाव में शनि व राहु की युति हो तो यह और भी खराब स्थिति होती है क्योंकि चतुर्थ भाव भूमि, मकान, माता व सुख का भाव होता है अतः ऐसी स्थिति में व्यक्तियों को माता का पूर्ण सुख नही मिल पाता तथा इनके घर में नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव रहता है प्रायः ऐसे व्यक्तियों के घर में वास्तु दोष अवश्य ही रहता है साथ ही ऐसे व्यक्तियों को मकान का सुख भी मुश्किल से ही प्राप्त होता है क्योंकि शनि निर्माण का कारक होता है और राहु माया, भ्रम व बाधाओं का कारक होता है ऐसे व्यक्ति जब भी किसी मकान का निर्माण आरंभ करवाते है तो उनके परिवार में रोग, व्याधि व पीड़ा प्रायः बनी रहती है या ऐसे व्यक्तियों को बड़ा आर्थिक नुकसान सहन करना पड़ता है।

 

५. यदि पंचम भाव में शनि व राहु की युति हो तो व्यक्ति के मस्तिष्क में नकारात्मक विचार आते रहते हैं साथ ही ऐसे व्यक्तियों की शिक्षा भी कठिन परिस्थितियों से होते हए पूर्ण होती है व बड़े भाई-बहन को किसी प्रकार का कष्ट रहता है तथा ऐसे व्यक्तियों की संतान को कष्ट रहता है और यदि पंचमेश का भी शनि व राहु या दोनों में से किसी एक से भी संबंध बनता हो तो ऐसे व्यक्तियों की संतान हीन अर्थात देह के किसी भाग में दुर्बलता लिए हुए होती है या होकर मर जाती है कहने का आशय यह है कि ऐसे व्यक्तियों को संतान सुख नही प्राप्त होता है।

 

६. यदि षष्ठ भाव में शनि व राहु की युति हो तो ऐसे व्यक्तियों के छुपे हुए शत्रु अधिक होते हैं षष्ठ भाव से रोग, रिपु और ऋण का विचार करते हैं अतः ऐसे व्यक्तियों की बीमारी का रहस्य जल्दी ज्ञात नही हो पाता और किसी जुए व सट्टे में हारने या नशे के कारण से धन हानि व ऋण की वृद्धि होती है ऐसे व्यक्तियों को हिर्दय घात होने या अन्य किसी प्रकार की दिल की बीमारी, रक्त जनित विकार, एक्सीडेंट से देह के किसी भाग में कमजोरी की संभावना रहती है और मामा पक्ष से विवाद बना रहता है।

 

७. यदि सप्तम भाव में शनि व राहु की युति हो तो ऐसी स्थिति में व्यक्ति को अनेक प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है क्योंकि सप्तम भाव से रोजगार, जीवनसाथी, दाम्पत्य जीवन, मित्र, साझेदारी आदि का विचार किया है अतः इस भाव में शनि व राहु की युति होने पर व्यक्ति को अपने मित्रों व साझेदारियों से धोखा मिलने की संभावना रहती है तथा किसी दूसरे व्यक्ति के कारण से घर के वातावरण में कलह का माहौल बना रहता है साथ ही ऐसे व्यक्तियों को किसी महिला के कारण से अपमानजनक स्थितियों का भी सामना करना पड़ता है और रोजगार के मार्ग में अनेक प्रकार की परेशानियों का सामना करते हुए धैर्य व संयम रखते हुए सफलता प्राप्त होती है।

 

८. अष्टम भाव से ससुराल, आयु, मृत्यु, पुरातत्व, रहस्मई कार्य, गूढ़ विद्या, जीवनसाथी की वाणी आदि का विचार किया जाता है अतः ऐसे स्थिति में अष्टम भाव में यदि शनि व राहु की युति हो तो व्यक्ति के दाम्पत्य जीवन में कलह की स्थितियाँ प्रायः बनी रहती है ध्यान देने योग्य बात यह है वहाँ बैठे इन दोनों ग्रह की सप्तम दृष्टि द्वितीय भाव जो आपका कुटुंब व वाणी का भाव है पर दृष्टि होती है अतः ऐसे व्यक्तियों का दाम्पत्य जीवन न्यून होता और यदि सप्तमेश अर्थात सप्तम भाव का स्वामी भी इनसे संबंध बनाता हो या त्रिक भाव में बैठा हो तो ऐसी स्थिति में दाम्पत्य जीवन को बचाना और भी मुश्किल हो जाता है साथ ही ऐसे व्यक्तियों को जीवन में कई बार शल्य चिकित्सा भी करानी पड़ सकती है तथा ऐसे व्यक्तियों को उदर व मूत्र विकार भी रहता है साथ ही ऐसे व्यक्तियों की आयुष्य पर भी अनेक बार संकट आते हैं व ऐसे व्यक्तियों के अनैतिक संबंध बनने की भी संभावना रहती है।

 

९. यदि नवम भाव में शनि व राहु की युति हो तो ऐसा व्यक्ति धर्म के विपरीत आचरण करने वाला होता है तथा ऐसे व्यक्तियों के भाग्य में निरंतर उतार-चढ़ाव आते रहते हैं साथ ही ऐसे व्यक्तियों के पिता को भी किसी प्रकार का कष्ट रहता है किंतु यदि भाग्येश की दृष्टि नवम भाव पर हो तो व्यक्ति को कड़े संघर्ष उपरांत सफलता प्राप्त होती है।

 

१०. यदि दशम भाव में शनि व राहु की युति हो तो व्यक्ति के घरेलू सुख में कुछ कमी व माता-पिता को कष्ट रहता है तथा ऐसे व्यक्तियों के कारोबार में निरंतर उतार-चढ़ाव आते रहते हैं साथ ही किसी राजा या उच्चाधिकारी से दंड भी प्राप्त होने की संभावना रहती है।

 

११. एकादश भाव को लाभ भाव भी कहा जाता है ज्योतिष का एक सर्वमान्य नियम है कि एकादश भाव में क्रूर से क्रूर ग्रह भी शुभ फल प्रदान करते है क्योंकि एकादश भाव का दूसरा नाम ही लाभ भाव है इस स्थिति में यदि शनि व राहु की युति एकादश भाव में हो तो व्यक्ति को जुए-सट्टे व किसी गलत कार्य द्वारा धन की प्राप्ति होती है किंतु ऐसे व्यक्तियों के भाई-बहन को किसी प्रकार का कष्ट अवश्य ही रहता है तथा ऐसे व्यक्तियों को संतान का पूर्ण सुख नही प्राप्त हो पाता है।

 

१२. द्वादश भाव में यदि शनि व राहु की युति हो तो व्यक्ति के अनैतिक संबंध बनने की अधिक संभावना रहती है साथ ही ऐसे व्यक्तियों के गृहस्थ सुख में कुछ कमी रहती है तथा ऐसे व्यक्तियों को जीवन में कई बार धोखा मिलता है तथा किसी असाध्य रोग से पीड़ा होती है।

 

नोट:-

 

१. शनि व राहु की युति के अतिरिक्त उपरोक्त बताए गए अन्य प्रकार से संबंध बनाने पर भी प्राप्त होते हैं।

 

२. यदि शनि व राहु की युति या प्रतियुति (शनि से सप्तम भाव में राहु या राहु से सप्तम भाव में शनि हो) शनि की मकर या कुंभ राशि में हो तो स्थितियाँ धैर्य के साथ अत्यधिक प्रयास करने पर नियंत्रण में आ जाती है।

 

३. कुंडली के प्रथम अर्थात लग्न से सप्तम तक के भाव रात्रि बली होते हैं अतः इन भावों में शनि व राहु का संबंध बनना अत्यधिक कष्टदाई होता है।

 

मैंने द्वादश भावों में पिशाच योग बनने के फल को विस्तार से बताया है अब प्रश्न यह उठता है कि इस दोष के क्या उपाय होते हैं तो सर्वप्रथम मैं यहाँ यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि किसी भी प्रकार के दोष का उपाय पूर्ण विधि व शास्त्रोचित तरह से करने पर ही लाभ मिलता है अतः मैं यहाँ कुछ उपाय बता रहा हूँ जिन्हें करने से निश्चय ही लाभ प्राप्त होगा:-

 

१. दुर्गा सप्तशती का विधि पूर्वक पाठ व दशांश कराने से पिशाच योग के दुष्प्रभाव से मुक्ति मिलती है।

 

२. नित्य संकटमोचन हनुमाष्टक व सुंदरकांड का पाठ करने से पिशाच योग के दुष्प्रभाव से मुक्ति मिलती है।

३. शनि व राहु के हवनात्मक जप से भी पिशाच योग के दुष्प्रभाव में कमी आती है।

 

४. नित्य शनि स्तोत्र का पाठ करने व अमावस्या के दिन सूर्यास्त के समय बहते पानी में नारियल प्रवाहित करने से भी पिशाच योग के दुष्प्रभाव में कमी आती है।

 

जय श्री राम।

Astrologer:- Pooshark Jetly

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भृगु सूत्र आधारित सूर्य का चतुर्थ भाव में फल

भृगु सूत्र आधारित सूर्य का चतुर्थ भाव में फल

 

चतुर्थ भाव में सूर्य का फल
चतुर्थ भाव में सूर्य का फल

 

अनेक ग्रंथों में सूर्यादि सभी ग्रहों के विभिन्न स्थानों में फल बताएं गए हैं पिछले लेख में मैंने भृगु सूत्र आधारित सूर्य के प्रथम भाव, द्वितीय भाव व तृतीय भाव में फल को बताया था अतः उसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए सूर्य के चतुर्थ भाव में फल को लिख रहा हूँ:-

 

भृगु सूत्र आधारित प्रथम भाव में सूर्य के फल को पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएं👇🏻

 

भृगु सूत्र आधारित  प्रथम भाव में सूर्य का फल

 

१. यदि कुंडली के चतुर्थ भाव में सूर्य सामान्य स्थिति में बैठा हो तो व्यक्ति अहंकारी, समाज हित के विपरीत आचरण करने वाला, गर्म शरीर वाला तथा मानसिक पीड़ा से युक्त होता है और उसे ३२वें वर्ष की आयु में सभी कार्यों में सफलता प्राप्त होती है।

 

२. यदि चतुर्थ भाव में सूर्य अपनी उच्च राशि (मेष) या स्वराशि (सिंह) का होकर स्थित हो तो व्यक्ति को बहुत मान-प्रतिष्ठा, सफलता, सत्ता प्राप्ति व पद प्राप्ति आदि होती है तथा ऐसा व्यक्ति ज्ञानवान व वीर होता है।

 

भृगु सूत्र आधारित द्वितीय भाव में सूर्य के फल को पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएं👇🏻

 

भृगु सूत्र आधारित सूर्य का द्वितीय भाव में फल

 

३. यदि चतुर्थ भाव में सूर्य अपनी नीच राशि (तुला) का होकर स्थित हो तो ऐसा व्यक्ति धन, धान्य आदि की समृद्धि से रहित होता है।

 

चतुर्थ भाव में सूर्य
चतुर्थ भाव में सूर्य

 

४. यदि चतुर्थ भाव में सूर्य स्थित हो और/सुखेश बलवान होकर स्वराशि, त्रिकोण अथवा केंद्र में बैठा हो तो व्यक्ति को आन्दोलिका (उत्तम वाहन) की प्राप्ति होती है जो कि लक्षणान्वित (लाल बत्ती आदि चिन्हों से युक्त) होती है।

 

५. यदि कुंडली के चतुर्थ भाव में सूर्य स्थित हो और चतुर्थेश/सुखेश पाप ग्रहों से युक्त अथवा दृष्ट होकर दुष्ट स्थान में बैठा हो तो व्यक्ति को दुर्वाहन (बुरे वाहन आदि) प्राप्त होते हैं तथा ऐसा व्यक्ति खेत, भूखण्ड एवं भवन आदि से हीन होता है और वह किसी दूसरे द्वारा दिए गए आवास में पराश्रित होकर रहता है।

 

भृगु सूत्र आधारित तृतीय भाव में सूर्य के फल को पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएं👇🏻

 

भृगु सूत्र आधारित सूर्य का तृतीय भाव में फल

जय श्री राम।

 

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भृगु सूत्र आधारित सूर्य का तृतीय भाव में फल

भृगु सूत्र आधारित सूर्य का तृतीय भाव में फल

 

तृतीय भाव में सूर्य का फल
तृतीय भाव में सूर्य का फल

 

अनेक ग्रंथों में सूर्यादि सभी ग्रहों के विभिन्न स्थानों में फल बताएं गए हैं पिछले लेख में मैंने भृगु सूत्र आधारित सूर्य के प्रथम भाव व द्वितीय में फल को बताया था अतः उसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए सूर्य के तृतीय भाव में फल को लिख रहा हूँ:-

 

 

भृगु सूत्र आधारित प्रथम भाव में सूर्य के फल को पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएं:-

 

भृगु सूत्र आधारित  प्रथम भाव में सूर्य का फल

 

१. यदि कुंडली के तृतीय भाव में सूर्य हो तो व्यक्ति बुद्धिमान होता है किंतु ऐसे व्यक्तियों को अनुजों (छोटे भाइयों) का अभाव रहता है साथ ही बड़ा भाई तो होता है किंतु बड़े भाई के सुखों में त्रुटि रहती है और ऐसे व्यक्तियों को उम्र के ४, ५, ८ अथवा १२वें वर्ष में कुछ पीड़ा होती है।

 

२. यदि कुंडली के तृतीय भाव में सूर्य पाप ग्रह से युक्त होकर बैठा हो तो व्यक्ति क्रूर कर्मों को करने वाला होता है तथा उसके दो भ्राता होते हैं साथ ही ऐसा व्यक्ति पराक्रमी तथा लड़ाई-झगड़े से न घबराने वाला और कीर्तिमान व अपने द्वारा अर्जित धन का भोग करने वाला होता है।

 

३. यदि तृतीय भाव में सूर्य शुभ ग्रहों से युक्त हो तो व्यक्ति के सहोदर भाइयों की अच्छी उन्नति व वृद्धि होती है।

 

४. यदि तृतीय भाव में सूर्य हो और तृतीयेश/पराक्रमेश बली अवस्था में बैठा हो या तृतीय भाव में सूर्य स्वराशि स्थित हो तो व्यक्ति अत्यंत पराक्रमी, खुद के पराक्रम से संपूर्ण सुख भोगने वाला, उच्च पद पर आसीन होने वाला, राजा या उच्चाधिकारी द्वारा सम्मानित होता है तथा ऐसे व्यक्तियों के भाई दीर्घायु होते हैं।

 

५. यदि तृतीय भाव में सूर्य स्थित हो और तृतीयेश/पराक्रमेश पाप ग्रहों से युक्त व दृष्ट हों तो व्यक्ति आलस्य करने वाला व पाप कर्म करने वाला होता है तथा ऐसे व्यक्तियों के भाइयों का नाश होता है।

 

६. यदि तृतीय भाव में सूर्य स्थित हो और उस पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो व्यक्ति धनवान, भोगी तथा सुखी होता है।

 

भृगु सूत्र आधारित द्वितीय भाव में सूर्य के फल को पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएं:-

 

भृगु सूत्र आधारित सूर्य का द्वितीय भाव में फल

 

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भौम प्रदोष व्रत कथा—Astrology Sutras

भौम प्रदोष व्रत कथा—Astrology Sutras

 

भौम प्रदोष व्रत
भौम प्रदोष व्रत

 

हर माह की त्रयोदशी तिथि के दिन प्रदोष व्रत रखा जाता है जब त्रयोदशी तिथि मंगलवार के दिन पड़ती है तो उसे भौम प्रदोष व्रत के नाम से जाना जाता है शास्त्रों के अनुसार भौम प्रदोष व्रत करने से व्यक्ति को कर्ज से शीघ्र मुक्ति मिलती है, शास्त्रों के अनुसार जो भी व्यक्ति भौम प्रदोष का व्रत करते हुए मंगल के २१ नामों का जप करते हुए व कथा पढ़ते हुए शिव जी व हनुमान जी की उपासना करता है उसके सभी अमंगल दूर हो जाते हैं तथा कर्ज से शीघ्र छुटकारा मिल जाता है।

 

व्रत विधि:-

 

भौम प्रदोष व्रत विधि व मंगल के २१ नाम

 

प्रातः स्नानादि कर दाहिने हाथ में लाल पुष्प, रोली, अक्षत, सुपाड़ी, जल व कुछ दक्षिणा लेकर व्रत का संकल्प लेना चाहिए तदोपरांत पूरे दिन निराहार व्रत रखना चाहिए और संध्या में प्रदोष काल के समय भगवान शिव जी और हनुमान जी की पूजा अर्चना करनी चाहिए और मंगल के २१ या १०८ नामों का उच्चारण व भौम प्रदोष व्रत कथा का वाचन करना चाहिए व प्रसाद के सेवन पश्चात अन्न ग्रहण करना चाहिए।

 

मंगल के कल्याणकारी २१ नाम:-

 

 

१. मंगल
२. भूमिपुत्र
३. ऋणहर्ता
४. धनप्रदा
५. स्थिरासन
६. महाकाय
७. सर्वकामार्थ साधक
८. लोहित
९. लोहिताक्ष
१०. सामगानंकृपाकर
११. धरात्मज
१२. कुंजा
१३. भूमिजा
१४. भूमिनंदन
१५. अंगारक
१६. भौम
१७. यम
१८. सर्वरोगहारक
१९. वृष्टिकर्ता
२०. पापहर्ता
२१. सर्वकामफलदाता।

 

भौम प्रदोष व्रत कथा:-

 

भौम प्रदोष व्रत कथा
भौम प्रदोष व्रत कथा

 

एक नगर में एक वृद्ध महिला अपने पुत्र के साथ रहती थी वृद्ध महिला को हनुमान जी के प्रति गहरी आस्था थी व वह प्रत्येक मंगलवार के दिन व्रत रखकर हनुमान जी की उपासना करती थीं एक बार हनुमान जी ने उस वृद्ध महिला की श्रद्धा व भक्ति भाव की परीक्षा लेने का सोचा और साधु रूप धारण कर वृद्ध महिला के घर पधारे और कहने लगे कि क्या कोई हनुमान जी भक्त है जो मेरी एक इच्छा पूर्ण करेगा यह वचन सुनकर वृद्ध महिला द्वार पर आ गयी और बोली हे साधु महाराज आज्ञा करें मैं आपकी किस प्रकार से सहायता कर सकती हूँ तब साधु वेशधारी हुनमान जी कहने लगे कि मुझे तीव्र क्षुधा लगी है, मैं भोजन करना चाहता हूँ अतः आप जमीन पर मिट्टी का लेप लगाकर चूल्हा तैयार कर दें इस पर वह वृद्ध महिला बोलीं कि हे साधु आप मिट्टी से जमीन को लीपने व गड्ढा खोदने के अतिरिक्त अन्य कोई आज्ञा दे दें मैं उसे अवश्य पूर्ण करूँगी।

 

साधु वेशधारी हनुमान जी ने वृद्ध महिला को तीन बार प्रतिज्ञा दिलवाई और कहा कि आप अपने पुत्र को बुला दीजिए मैं उसकी पीठ पर अग्नि प्रज्वलित कर भोजन बनाऊँगा इतना सुनते ही वृद्ध महिला घबरा गयीं किंतु प्रतिज्ञा में बँधे होने के कारण उन्होंने अपने पुत्र को बुलाकर साधु वेशधारी हनुमान जी को सौंप दिया व पुनः अंदर चली गयी कुछ समय पश्चात साधु वेशधारी हनुमान जी ने वृद्ध महिला को पुनः बुलाकर कहा कि भोजन तैयार हो गया है आप भी अपने पुत्र को बाहर बुला लें ताकि वो भी इस भोजन को ग्रहण कर सके यह सुनकर वृद्ध महिला हाथ जोड़कर निवेदन करने लगीं कि हे साधु महाराज मेरे मृत पुत्र का नाम लेकर मुझे और कष्ट न दें किंतु साधु महाराज के न मानने पर उन्होंने अपने पुत्र को आवाज दी और अपने पुत्र को जीवित पाकर अचंभित हो साधु वेशधारी हनुमान जी के चरणों में गिर पड़ीं तब हनुमान जी अपने मूल स्वरूप में आए व कहने लगे कि मैं आपकी श्रद्धा और भक्ति की परीक्षा लेने आया था और उसमें आप सफल हुईं व हनुमान जी ने उन महिला को सभी अमंगल से मुक्ति व अपनी भक्ति का आशीर्वाद दिया।

 

शास्त्रों के अनुसार यदि कोई व्यक्ति कर्ज में डूब गया हो या उसके साथ निरंतर कुछ न कुछ अमंगल हो रहा हो तो उसे भौम प्रदोष व्रत अवश्य करना चाहिए ऐसा करने से हनुमान जी व शिव जी की कृपा से व्यक्ति के सभी अमंगल दूर हो जातें हैं व वह कर्ज से शीघ्र ही मुक्त हो जाता है।

 

जय श्री राम।

 

Astrologer:- Pooshark Jetly

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भृगु सूत्र आधारित सूर्य का द्वितीय भाव में फल

भृगु सूत्र आधारित सूर्य का द्वितीय भाव में फल

 

द्वितीय भाव में सूर्य का फल
द्वितीय भाव में सूर्य का फल

 

अनेक ग्रंथों में सूर्यादि सभी ग्रहों के विभिन्न स्थानों में फल बताएं गए हैं पिछले लेख में मैंने भृगु सूत्र आधारित सूर्य के प्रथम भाव में फल को बताया था अतः उसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए सूर्य के द्वितीय भाव में फल को लिख रहा हूँ:-

 

 

१.यदि कुंडली के द्वितीय भाव में सूर्य हो तो व्यक्ति प्रायः मुख के रोगों से पीड़ित रहता है साथ ही उसके जीवन के २५ वें वर्ष में राजदंड के कारण (न्यायालय की आज्ञा से) से धन की हानि होती है यह सामान्य फल है किंतु यदि सूर्य अपनी उच्च राशि (मेष) या स्वराशि (सिंह) का होकर द्वितीय भाव में स्थित हो तो मुख रोग तथा राजदंड से धन का नाश नही होता है।

 

२.यदि द्वितीय भाव में सूर्य के साथ पाप ग्रह बैठे हों तो व्यक्ति नेत्र रोगी होता है साथ ही थोड़ा विद्वान तथा रोगी शरीर वाला होता है।

 

३.यदि द्वितीय भाव में स्थित सूर्य पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो व्यक्ति धनी होता है और उसकी कुंडली के अनेक दोषों (बुरे फल) का नाश हो जाता है तथा उसके नेत्रों में भी कोई रोग नही होता है।

 

४.यदि द्वितीय भाव में सूर्य अपनी उच्च राशि (मेष) या स्वराशि (सिंह) का होकर स्थित हो तो ऐसा व्यक्ति बहुत धनवान होता है और उसे प्रचुर सम्पन्नता तथा वैभव की प्राप्ति होती है।

 

५.यदि द्वितीय भाव में सूर्य के साथ बुध भी स्थित हो तो व्यक्ति शीघ्रता पूर्वक बोलता है (यहाँ मूल में पवनवाक शब्द का प्रयोग हुआ है इसका अर्थ है कि जैसे तेज हवा चलती है ठीक उसी प्रकार तेज रफ्तार से बातचीत करने वाला)

 

६.यदि द्वितीय भाव में सूर्य स्थित हो व द्वितीय भाव का स्वामी स्वराशि या उच्च राशि में स्थित हो तो व्यक्ति वाग्मी (वार्तालाप में कुशल) होता है साथ ही इस योग में जन्मा व्यक्ति विविध विज्ञानों एवं कलाओं में निष्णात होता है ऐसा व्यक्ति ज्ञानवान तथा अच्छे नेत्र दृष्टि वाला होता है और राजयोग का पूर्ण सुख प्राप्त करता है।

 

जय श्री राम।

 

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भृगु सूत्र आधारित  प्रथम भाव में सूर्य का फल

भृगु सूत्र आधारित  प्रथम भाव में सूर्य का फल

 

अनेक ग्रंथों में सूर्यादि सभी ग्रहों के विभिन्न स्थानों में फल बताएं गए हैं अतः मैं भृगु सूत्र आधारित सूर्य के विभिन्न भावों में फल को १२ लेख में लिख रहा हूँ यह सभी सूत्र अकाट्य व अचूक होने के साथ-साथ दुर्लभ भी है तो चलिए सर्वप्रथम हम सूर्य के प्रथम भाव के फल के बारे में जानते हैं:-

 

 

भृगु सूत्र आधारित सूर्य का प्रथम भाव में फल:-

 

भृगु सूत्र आधारित प्रथम भाव में सूर्य का फल
भृगु सूत्र आधारित प्रथम भाव में सूर्य का फल

 

१. यदि लग्न में सूर्य हो तो व्यक्ति सामान्यतः निरोगी रहता है।

 

२. यदि लग्न में सूर्य हो तो व्यक्ति पित्त प्रकृति का होता है तथा ऐसे व्यक्तियों को नेत्रों में विकार उत्पन्न होता है (प्रायः दृष्टि मंद होती है तथा चश्मा शीघ्र ही लग जाता है)।

 

३. यदि सूर्य लग्न में तो व्यक्ति मेधावी (अच्छी स्मरण शक्ति तथा ऊहापोह से युक्त) होता है तथा उसका चरित्र दृढ़ होता है।

 

४. यदि लग्न में सूर्य हो तो व्यक्ति के उदर में उष्णता रहती है (जिसके कारण उसे भूख बहुत लगती है तथा कब्ज नही रहता और पेट साफ रहता है)।

 

५. यदि लग्न में सूर्य हो तो व्यक्ति की संतान मूर्ख होती है अथवा व्यक्ति पुत्रहीन होता है (प्रायः संतति के कारण दुःखी एवं परिश्रान्त रहता है)।

 

६. यदि लग्न में सूर्य हो तो व्यक्ति तीक्ष्ण बुद्धि (किसी बात को शीघ्र समझ लेने वाला) होता है।

 

७. यदि लग्न में सूर्य हो तो व्यक्ति कम वाचाल करने वाला अर्थात कम बात करने वाला, सदैव प्रवास (यात्रा-पर्यटन-घुमक्कड़ी) करता रहता है तथा सुखी रहता है।

 

८. यदि लग्न में सूर्य अपनी उच्च राशि (मेष) का हो तो व्यक्ति कीर्तिमान (लोकप्रिय तथा यशस्वी) व स्वाभिमानी एव तेजस्वी होता है।

 

९. यदि लग्न में सूर्य अपनी उच्च राशि (मेष) का हो और उस पर बलवान ग्रहों की दृष्टि हो तो जातक विद्वान होता है तथा क्रमांक ८ में बताए गए सभी फल में वृद्धि करता है।

 

१०. यदि लग्न में सूर्य अपनी नीच राशि (तुला) का हो तो व्यक्ति प्रतापवान (रौबीला तथा दबंग), ज्ञानद्वेषी (अध्ययन, सत्संग, ज्ञानार्जन आदि से द्वेष करने वाला), दरिद्र (धन से हीन, साधन हीन) तथा अंधक (मंद दृष्टि अथवा काना) होता है।

 

११. यदि लग्न में सूर्य अपनी नीच राशि (तुला) का हो और उस ओर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो क्रमांक १० में बताए गए फल में कमी होती है अर्थात ऐसा व्यक्ति ज्ञानद्वेषी, दरिद्र एवं मंद दृष्टि वाला आदि फल नही होता है अथवा दोष कम हो जाता है।

 

१२. यदि सूर्य लग्न में सिंह राशि का होकर अपने ही नवांश (नवमांश कुंडली में भी सिंह राशि का सूर्य) का हो तो व्यक्ति उच्चपद पर आसीन (मुख्य, प्रधान या मुखिया) होता है तथा मान-सम्मान प्राप्त करता है और ऐश्वर्य युक्त होता है।

 

१३. यदि कर्क राशि का सूर्य लग्न में हो तो व्यक्ति ज्ञानी होता है किंतु साथ ही रोगी तथा बुद्बुदाक्ष (बुलबुले की तरह नेत्र वाला अथवा उसके नेत्रों के ढेले बड़े-बड़े तथा बाहर को निकले हुए) होता है और ऐसे व्यक्तियों को रक्तदोष व चर्मरोग होने की संभावना रहती है।

 

सूत्र क्रमांक संख्या १३ की उदाहरण कुंडली
सूत्र क्रमांक संख्या १३ की उदाहरण कुंडली

 

१४. यदि लग्न में सूर्य मकर राशि का हो तो व्यक्ति को हिर्दय रोग (दिल की बीमारी) व लकवा आदि होने की संभावना रहती है।

 

१५. यदि लग्न में सूर्य मीन राशि का हो तो ऐसा व्यक्ति स्त्रियों से अधिक संपर्क में रहता है तथा ऐसे व्यक्ति विलास मुक्त स्वभाव वाले होते हैं।

 

१६. यदि सूर्य लग्न में कन्या राशि का हो तो व्यक्ति को कन्या संतति अधिक होती है तथा ऐसे व्यक्तियों के जीवन में पत्नी सुख का अभाव होता है और ऐसे व्यक्ति कृतघ्न (अपने प्रति किए गए अहसान को न मानने वाले) होते हैं।

 

१७. यदि लग्न में सूर्य स्वराशि (सिंह राशि) का हो तो जो कि सिंह लग्न की पत्रिका में ही संभव है तो व्यक्ति का स्वास्थ्य अच्छा रहता है साथ ही यदि शुभ ग्रहों से सूर्य युत हो तो व्यक्ति को उच्च पद की प्राप्ति होती है।

 

१८. यदि लग्न में सूर्य नीच राशि (तुला) का हो या शत्रु राशि का हो और उसके साथ पाप ग्रह बैठे हों तो व्यक्ति को ३ वर्ष की आयु में विशेष कष्ट होता है किंतु इस योग में यदि शुभ ग्रहों की दृष्टि सूर्य पर हो तो कष्ट नही होता है।

 

सूत्र क्रमांक संख्या १८ की उदाहरण कुंडली
सूत्र क्रमांक संख्या १८ की उदाहरण कुंडली

 

जय श्री राम।

 

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