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कर्क राशि वाले व्यक्तियों के जीवन से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें
कर्क राशि: जानिए, कर्क राशि वाले व्यक्तियों के जीवन से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें
कर्क राशि वाले व्यक्तियों के जीवन से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें
कर्क राशि वाले व्यक्ति स्त्री निर्जित अर्थात स्त्रियों से जीता हुआ या स्त्रियों के वशीभूत , स्थूल गले वाला और मित्रवान होता है, ऐसे व्यक्ति धनवान होते हैं तथा इनके पास एक से अधिक मकान होते हैं (चतुर्थ भाव पर शुभ ग्रहों का संबंध होने पर ही यह योग फलित होगा।) साथ ही ऐसे व्यक्तियों की कमर मोटी किंतु कद छोटा होता है, कर्क राशि में जन्मे व्यक्ति बुद्धिमान और जलविहार के शौंकीन होते हैं तथा अपेक्षाकृत तेज चलते हैं, इनको थोड़े पुत्र होते हैं तथा ऐसे व्यक्ति कुटिल भी होते हैं, कर्क राशि वाले व्यक्ति परोपकारी, वस्तुओं के संग्रह में कुशल, गुणी, माता-पिता व गुरु के भक्त, सुगंधित वस्त्रुओं के प्रति आकर्षिक होने वाले, जल क्रीड़ा प्रेमी, मित्रों में प्रिय, वाटिका प्रेमी, दयालु, मिलनसार, प्रेमी एवं अधिकारी होते हैं, इनके शरीर के बाएं भाग में अग्नि भय और मस्तक पीड़ा से व्यथा होती है, ऊंचे स्थान से गिरकर चोट लगने की संभावना भी रहती है या अग्नि, जल से चोट तथा किसी उच्च अधिकारी द्वारा दोषी निश्चय किया जाने का भय रहता है, इनका कद मंझोला और गाल पुष्ट होते हैं, कर्क राशि वाले व्यक्ति सुंदर तथा कफ प्रकृति और स्त्री के वशीभूत रहते हैं, कर्क राशि वाले व्यक्तियों के जीवनसाथी उनके प्रति समर्पित किंतु कुछ बंधन सा अनुभव करने वाले और इसी कारण से विवादपूर्ण स्थिति के उत्पन्न होने से मानसिक तनाव लेने वाले होते हैं, स्त्री संतति की अधिकता रहती है साथ ही कर्क राशि वालों की संतानों में कोई एक संतान विशेष उन्नति प्राप्त करने वाली होती है साथ ही ऐसे व्यक्ति अपनी इच्छा के विरुद्ध विपरीत लिंगी व्यक्ति से संबंध बनाने वाले और उससे भयभीत रहने वाले होते हैं, कर्क राशि वालों की व्यवसाय के माध्यम से अधिक उन्नति होती है किंतु धन को लेकर चिंता हमेशा बनी रहती है, कर्क राशि वाले व्यक्ति जलाशय के समीप निवास करने की चाह रखने वाले या जल की यात्रा करने के शौंकीन या तरल पदार्थों के व्यापारी और गणित एवं ज्योतिष के प्रेमी होते हैं।
कर्क राशि वालों के लिए १, ३, १२, २१, ३१, ३२, ४१, ५१, ६१ वां वर्ष आशुभ रहता है प्रथम वर्ष में रोग, तृतीय वर्ष में लिंग स्थान में पीड़ा, ३१ वें वर्ष में सर्प भय तथा ३२ वें वर्ष में रोग का भय रहता है, कुंडली में शुभ योग होने पर कर्क राशि वालों की औसत आयु ८५ वर्ष तो कुछ ग्रंथों के अनुसार ८८ से ९६ तक होती है, द्वितीया, सप्तमी एवं द्वादशी तिथियाँ इनके लिए अशुभ होती है, सिंह, मिथुन और कन्या राशि वाले व्यक्ति इनके लिए अच्छे और मेष, वृषभ, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ व मीन राशि वाले व्यक्ति साधारण मित्र होते हैं साथ ही कर्क राशि वालों के लिए माघ मास, शुक्ल पक्ष, नवमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र व शुक्रवार अनिष्टकारी होता है।
मिथुन राशि वाले व्यक्तियों के जीवन से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें
मिथुन राशि: जानिए, मिथुन राशि वाले व्यक्तियों के जीवन से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें
मिथुन राशि वाले व्यक्तियों के जीवन से जुड़ी महत्वपूर्ण बाते
मिथुन राशि वाले व्यक्तियों के नेत्र काले व बाल कुछ घुंघराले होते हैं साथ ही ऐसे व्यक्ति स्त्री विलास में बहुत अनुरक्त रहते हैं परंतु बुद्धिमान भी होते हैं और दूसरे की मंशा को बड़ी सहजता से समझ जाते हैं, मिथुन राशि वालों की नाक ऊंची होती है और इन्हें नाच-गाना अत्यंत प्रिय होता है, ऐसे व्यक्ति अपने मकान में (कमरे के अंदर) ही रहना अधिक पसंद करते हैं अर्थात मेष राशि वालों की तरह इन्हें भ्रमण पसंद नही होता है, मिथुन राशि वाले व्यक्ति ग्रामीण स्त्रियों के लिए चतुर, विद्वान, दृढ़ मित्र, मिष्ठान के प्रेमी, सुशील, कम बोलने वाले, कुटुंब के प्रति समर्पित, कौतुक प्रेमी, रति प्रिय, गुणी, भोगी, दानी, धार्मिक कार्यों में रुचि रखने वाले, चतुर, शास्त्रों के ज्ञाता, शांतचित्त परंतु मिश्रित स्वभाव वाले, कुशाग्र बुद्धि वाले, पुस्तक प्रेमी, मानसिक एवं शारीरिक कार्य में तत्पर रहने वाले, सर्व प्रिय व सर्व प्रेमी, गौरव युक्त, दूत कर्म करने वाले, अधिक भोजन करने वाले, रूपवान और हास्यशील होते हैं, मिथुन राशि वाले व्यक्तियों की आँखे गुलाबी रंग की होती है और शरीर पर तिल, लहसन आदि का निशान रहता है, ऐसे व्यक्ति काम शास्त्र में निपुण अतएव स्त्री सुखों व स्त्रियों का इच्छुक होते हैं जिस कारण से कभी-कभी इनकी दो शादी भी होती है किंतु संतानों की संख्या अपेक्षाकृत कम रहती है, मिथुन राशि वाले व्यक्ति भाग्यवान होते है और कदापि ही (अशुभ ग्रहों के योग के कारण) धनहीन होते हैं, ऐसे व्यक्तियों को अचानक किसी अपरिचित स्थान से धन मिलना संभव होता है और ऐसे व्यक्तियों के एक से अधिक व्यवसाय होते हैं कहने का आशय यह है कि ऐसे व्यक्तियों की आय एकाधिक माध्यमों से होती है साथ ही ऐसे व्यक्तियों के व्यवसाय में परिवर्तन भी होता रहता है।
५, ८, १०, १६, १८, २०, २८, ५२ व ९४ वें वर्ष अनिष्टकारी होते हैं, ५ वें वर्ष में वृक्ष, १६ वें वर्ष में शत्रु, १८ वें वर्ष में कर्ण पीड़ा, २० वें वर्ष में अत्यंत पीड़ा और ४८ वें वर्ष में मृत्यु तुल्य कष्ट होता है, मिथुन राशि वाले व्यक्ति बाल्यावस्था में अति सुखी, मध्यमावस्था में अल्प सुखी और वृद्धावस्था में दुःखी होते हैं, यदि चंद्रमा की शुभ दृष्टि हो तो ऐसे व्यक्तियों की औसत आयु ८० वर्ष तक की रहती है, प्रतिपदा, सप्तमी और द्वादशी तिथि मिथुन राशि वालों के लिए अनिष्टकारी होती है, वृषभ, सिंह, कन्या व तुला राशि वाले व्यक्तियों से इन्हें सहयोग प्राप्त होता रहता है, कर्क राशि वालों से इनकी शत्रुता रहती है, मिथुन राशि वालों के लिए पन्ना अत्यंत शुभकारी रहता है किंतु वैशाख मास, शुक्ल पक्ष, द्वादशी तिथि, बुधवार, हस्त नक्षत्र एवं दोपहर का समय इनके लिए अनिष्टकारी रहता है।
वृषभ राशि वाले व्यक्तियों से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें
वृषभ राशि: जानिए, वृषभ राशि वाले व्यक्तियों से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें
वृषभ राशि वाले व्यक्तियों से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें
वृषभ राशि वाले व्यक्तियों की जांघें बड़ी होती है तथा व्यक्ति अल्प तेजस्वी, आलस्य से भरपूर, सत्यवादी, धनी, आयुष्यमान अर्थात दीर्घायु, परोपकारी, माता-पिता व गुरु का भक्त किंतु श्रेष्ठ कर्म त्यागने वाला, राज प्रिय, संतोषी, शांतचित्त, वीर तथा सहनशील, बुद्धिमान, सुशील, उत्तम वस्त्र धारण व उत्तम भोजन करने वाला, अपने कार्य के प्रति समर्पित, मित्र संपन्न, उदार, स्वजनों से दूर रहने वाला, कुशल, दिखने में सुंदर, क्लेश सहने वाला, नेत्र रोगी, शीर्ण एवं अजीर्ण आदि रोग से दुःखी, पशुओं से कुछ डरने वाला, स्त्री की आज्ञा मानने वाला, कामी, कभी-कभी दो या तीन विपरीत लिंग के व्यक्ति से संबंध रखने वाला (यदि कुंडली के काम त्रिकोण भाव बली हों तभी), कन्या संतति अधिक प्राप्त करने वाला, तथा कृषि कर्म करने वाला होता है यदि वृषभ राशि वाले व्यक्तियों के जीवन को तीन भागों में विभक्त किया जाए तो जीवन के अंतिम दो भाग सुख से व्यतीत होते हैं, ऐसे व्यक्ति प्रमदा प्रिय (स्त्रियों के शौकीन), परिश्रमी तथा गोधन (गाय, बैल आदि) से युक्त होते हैं।
वृषभ राशि वाले व्यक्तियों के पीठ, चेहरे या बगल में मस्से, लहसन या व्रण का निशान होता है, ऐसे व्यक्तियों को अचानक धन प्राप्त होते हैं तथा व्यक्ति सुखमय एवं अधिकार पूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं तथा वृषभ राशि वाले व्यक्तियों को धन, गृह और भूमि आदि की प्राप्ति होती है किंतु इनका बाल्यावस्था दुःख पूर्ण व्यतीत होता है, १, ३, ७, ९, १०, १२, १६, १९, २५, ३०, ३२, ५५ वां वर्ष वृषभ राशि वालों के लिए अशुभ होता है, प्रथम वर्ष में पीड़ा, तृतीय वर्ष में अग्नि भय, सातवें वर्ष में विसूचिका, नवम वर्ष में व्यथा, दशम वर्ष वर्ष में रुधिर प्रकोप, बाहरवें वर्ष नें वृक्ष या किसी ऊंचे स्थान से चोट , सोहलवें वर्ष में सर्प भय, उन्नीसवें वर्ष में पीड़ा, २५वें वर्ष में जल भय और ३०वें तथा ३२वें वर्ष में कफ प्रकोप एवं पीड़ा रहती है, यदि चंद्रमा शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो कुछ ग्रंथों के अनुसार ७८ तो कुछ ग्रंथों के अनुसार ९६ वर्ष की आयु रहती है, वृषभ राशि वाले व्यक्तियों के लिए वृषभ, मिथुन, कन्या, मकर व कुंभ राशि वाले व्यक्ति व्यवहार एवं मित्रता के लिए अच्छे होते हैं, कर्क एवं सिंह राशि वाले व्यक्तियों से प्रायः शत्रुता होती रहती है, माघ मास, शुक्ल पक्ष, नवमी तिथि, शुक्रवार व रोहिणी नक्षत्र वृषभ राशि वालों के लिए अनिष्टकारी होते हैं।
तीन ऐसे राशि के जोड़े जिनके मध्य अकसर होते है टकराव
जानिए ऐसे तीन राशि वाले लोगों के जोड़े जिनके रिश्तों में हमेशा होते हैं टकराव
तीन ऐसे राशि के जोड़े जिनके मध्य अकसर होते है टकराव
सभी राशि वाले व्यक्तियों का अलग-अलग व्यक्तित्व होता है उनमें से कुछ ऐसी राशियाँ हैं जिनका व्यक्तित्व एक-दूसरे से बिल्कुल विपरीत होना जिसके कारण ये राशि वाले जोड़ों के मध्य अकसर ही टकराव की स्थिति उत्पन्न हो जाती है तो चलिए जानते हैं उन राशि के जोड़ों के बारे में:-
मेष व कर्क राशि
मेष और कर्क राशि
मेष राशि अग्नि तत्व राशि होती है जिसके स्वामी मंगल होते हैं मेष राशि वाले व्यक्ति सहज और तुरंत मन की बात को बोल देने वाले होते हैं मेष राशि वाले व्यक्ति जोखिम लेने से नही डरते वहीं कर्क राशि जल तत्व राशि है जिसके स्वामी चंद्रमा होते हैं कर्क राशि वाले व्यक्तियों के मन में उतार-चढ़ाव आने के कारण से उनका मन स्थिर नही रहता तथा उनके मन में प्रायः भय बना रहता है साथ ही कर्क राशि वाले व्यक्ति संवेदन शील होते हैं जिस कारण से दोनों के मध्य टकराव अधिक होते हैं।
वृषभ और धनु राशि
वृषभ और धनु राशि
वृषभ राशि पृथ्वी तत्व राशि होती है जिसके स्वामी शुक्र होते हैं ऐसे व्यक्तियों को स्थिरता पसंद होती है ऐसे व्यक्ति अपने जीवन को अपने व्यक्तिगत स्थान में खींचने में अधिक विश्वास करते हैं जब कि धनु राशि अग्नि तत्व राशि होती है जिसके स्वामी गुरु होते हैं ऐसे व्यक्तियों का स्वभाव वृषभ राशि वालों के बिल्कुल विपरीत स्वतंत्रता के आरती सदैव उत्साहित रहने वाले व अनेक यात्राएं करने वाले होते हैं इनका मन स्थिर नही होता तथा इन्हें एक ही जगह पर अधिक समय तक रहना अच्छा नही लगता जिस कारण से इन दो राशि वालों के मध्य टकराव की स्थिति प्रायः उत्पन्न होती रहती है।
कन्या और मीन राशि
कन्या और मीन राशि
कन्या राशि पृथ्वी तत्व राशि है जिसके स्वामी बुध होते हैं ऐसे व्यक्ति अपनी भावनाओं को किसी के समक्ष जल्दी उजागर नही होने देते हैं ऐसे व्यक्ति अपनी प्रत्येक बातों को गुप्त रखते हैं जब कि मीन राशि जल तत्व राशि होती है जिसके स्वामी गुरु होते हैं ऐसे व्यक्तियों का व्यक्तित्व कन्या राशि वाले व्यक्तियों के बिल्कुल विपरीत होता है ऐसे व्यक्तियों में सहानुभूति रहती है जो दूसरे व्यक्तियों के मन की बात को जानने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं जिस कारण से मीन राशि वाले व्यक्ति कन्या राशि वालों को सहानुभूति दिखाकर तनाव पूर्ण स्थितियों को उत्पन्न कर लेते हैं।
मेष राशि वाले व्यक्तियों के जीवन से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें
मेष राशि: जानिए, मेष राशि वाले व्यक्तियों के जीवन से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें
मेष राशि वाले व्यक्तियों के जीवन से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें
मेष राशि वाले व्यक्ति धनवान, पुत्रवान, तेजस्वी, परोपकारी, सुशील, राज प्रिय, देव-गुरु भक्त, गर्म भोजन की चाह रखने वाले, अल्पहारी, भीरु, कठोर चित्त, शुभ कार्यों में धन व्यय करने वाले, जल से कुछ भय अनुभव करने वाले, मुश्किल परिस्थितयों से न घबड़ाने वाले, चंचल युक्त धनी अर्थात कभी अच्छा धन हो तो कभी कम धन हो कहने का आशय यह है कि आय में उतार-चढ़ाव वाले व कभी-कभी चिड़चिड़े स्वभाव वाले होते हैं, ऐसे व्यक्तियों जल से भय रहता है तथा ऐसे व्यक्तियों का कभी-कभी उच्च स्थान से पतन हो जाता है, मेष राशि वाले व्यक्ति वात की समस्या से परेशान रहते हैं तथा ऐसे व्यक्तियों की गोल आँखें होती है तथा उनके घुटने कुछ कमजोर होते हैं, इनके स्वभाव में उग्रता प्रायः बनी रहती है, मेष राशि वाले व्यक्ति चपल और घूमने के शौकीन होते हैं साथ ही इनमें काम वासना भी अधिक होती है साथ ही मिथ्याभाषण भी करते हैं, यदि मेष राशि वालों के सप्तम भाव में अशुभ ग्रह की दृष्टि हो तो प्रायः इनकी दो शादी होती है और इन्हें अजीर्ण एवं उदर रोग से भय होता है, मेष राशि के जातक प्रायः स्त्री के वशीभूत और पुत्रादि सुख-संबंध प्राप्त करते हैं, मेष राशि वालों की माता प्रायः सुख रहित अथवा पुत्र पर निर्दयी होती हैं, मेष राशि वाले व्यक्ति युद्ध विभाग या कोई स्वतंत्र व्यवसाय में उन्नति प्राप्त करते हैं और अनेक मनुष्यों पर अधिकार रखने वाले व्यवसाय में तीव्र उन्नति प्राप्त करते हैं कहने का आशय यह है कि मेष राशि वाले व्यक्तियों की उन्नति प्रायः व्यवसाय द्वारा होती है, इन्हें कर्क, सिंह, वृश्चिक, धन और मीन राशि वाले मनुष्यों के साथ व्यवसाय करने में अति शुभ फल प्राप्त होता है।
प्रतिपदा, षष्ठी और एकादशी तिथियाँ मेष राशि वालों के लिए अनिष्टकारी होती हैं तीसरा, छठवां, आठवां, बाहरवां और पंद्रहवाँ वर्ष अशुभ अथवा अनिष्टकारी रहता है, प्रथम, सप्तम, अष्टम एवं त्रयोदश वर्ष में ज्वर पीड़ा, सोलहवें और सतरहवें वर्ष में विषूचिका, तीसरे और बाहरवें वर्ष में जल भय, २५वें वर्ष में संतानोत्पति (यदि शुभ ग्रहों का सहयोग कुंडली में प्राप्त हो तब) एवं रतौंधी तथा ३२वें वर्ष में शस्त्र भय होता है, ऐसे व्यक्तियों के लिए मंगलवार किसी भी कार्य के आरंभ हेतु शुभ होता है, बुधवार सर्वदा अनिष्टकारी होता है, यदि चंद्रमा शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो व्यक्ति की आयु ९० वर्ष तक की हो सकती है, कार्तिक मास, कृष्ण पक्ष, नवमी तिथि, बुधवार और अर्धरात्रि मेष राशि वालों के लिए अनिष्टकारी होते हैं।
शनिवत राहु अर्थात राहु सरीखा होने से दुःख-स्वरूप, सेना, चंडाल, जाति, रात्रि बली, कृष्ण पक्ष व दक्षिणायन में बली तथा वल्मीक (दीमक वाला पिंड) में वास करने वाला ग्रह होता है, अनेक पैबंद या अनेक रंग की कथली इसका वस्त्र तथा सीसा इसका धातु है, मतांतर से राहु वृषभ के २०° पर राहु परमोच्च तथा मिथुन में ०° से २०° तक मूल त्रिकोण में होता है, राहु की उच्च राशि वृषभ, मूल त्रिकोण राशि मिथुन व स्वराशि कन्या होती है, कूड़ा बटोरने वाले या कबाड़ी भी राहु से प्रभावित माने जाते हैं।
सत्यजातकम् के अनुसार राहु कृष्ण वर्ण, दीर्घ काय तथा कुष्ठ या त्वचा रोगों से पीड़ित होने के साथ-साथ नास्तिक या विधर्मी भी है, परनिंदा व पाखंड इसका स्वभाव है कहने का तात्पर्य यह है माया से सभी को भ्रमित करना ही राहु का स्वभाव है, राहु की दिशा दक्षिण पश्चिम है, बृहत्त्पराशर होराशास्त्र के अनुसार गुरु, शुक्र व शनि इत्यादि ग्रह राहु के मित्र, मंगल व बुध सम अर्थात न मित्र और न ही शत्रु और सूर्य व चंद्र इत्यादि ग्रह राहु के शत्रु होते हैं।
फलदीपिका के अनुसार “सर्पेणैव पितामहं तु शिखिना मातामहं चिंतयेत्” अर्थात राहु दादा, नानी, रेंगने वाले सर्प सरीखे जीव, बन्धन, नीचजन से मैत्री, सत्ता अधिकार, चोरी, काला जादू, साहस-शौर्य तथा मुसलमानों का कारक है, हफ्ता वसूलने वाले कर्मचारी, उपद्रवी या उत्पाती गुंडे-मवालियों को भी राहु से नियंत्रित माना गया है तथा राहु के रोगों में मिर्गी, चेचक, फाँसी से आत्महत्या, भुखमरी, प्रेत बाधा, अपच, कुष्ठ, भूख मर जाना, वमन या उल्टियाँ, क्षय, विष संक्रमण, भय, पागलपन या पक्षघात अथवा स्नायु तंत्र की दुर्बलता को शामिल किया जाता है।
राहु के कारकतत्व:-
१. छत्र, २. चँवर (चमार), ३. राज्य-सत्ता, ४. संग्रह या संचय कुशल, ५. कुतर्क, ६. कठोर व दुःखदाई वचन, ७. निम्नतम जाति के व्यक्ति, ८. दुष्ट या दुराचारिणी महिला, ९. सुसज्जित वाहन, १०. नास्तिक, अधार्मिक व्यक्ति, ११. जुआ, १२. वेश्यागमन, १३. विदेश यात्रा, १४. गन्दगी व अपवित्रता, १५. हड्डी व अस्थि मंडल, १६. झूठ व मिथ्या आचरण, १७. भ्रम, १८. उलझन, १९. नीचजन का आश्रय, २०. सूजन व शोथ, २१. बड़ा जंगल, २२. दुर्गम स्थानों की यात्रा, २३. पीड़ा-वेदना, २४. कक्षा या बैठक से बाहर रहना व संसद या विधानसभा का वहिष्कार करना, २५. दक्षिण पश्चिम दिशा प्रेमी, २६. वात जन्य रोग, २७. कफ या बलगम, २८. दुःख-क्लेश, २९. सर्प, ३०. रात्रि के समय चलने वाली ठंडी हवा (दक्षिण दिशा की ओर बहने वाली पवन), ३१. तीक्ष्णता, ३२. दीर्घ या लंबा शरीर, ३३. यात्रा-पर्यटन, ३४. बुढापा, ३५. मुहूर्त, ३६. मृत्यु का समय, ३७. वाहन, ३८. तूफान, ३९. तीव्र पीड़ा, ४०. खाँसी, ४१. श्वास रोग-दमा, ४२. साहस, ४३. महान प्रताप, ४४. वन, ४५. दुर्गा माता का उपासक, ४६. दुराचार, ४७. दुष्टता, ४८. पशु मैथुन, ४९. उर्दू की लखाई या लिखावट, ५०. कटु व कठोर वाणी इत्यादि राहु के कारकतत्व हैं।
कुंडली मिलान के नियम, अष्टकूट मिलान व विभिन्न दोषों के परिहार
कुंडली मिलान के नियम, अष्टकूट मिलान व विभिन्न दोषों के परिहार
कुंडली मिलान के नियम, अष्टकूट मिलान व विभिन्न दोषों के परिहार
इस लेख को आरंभ करने के पूर्व मैं सर्वप्रथम अपने गुरु, अपने आराध्य व अपने इष्ट (श्री हनुमान जी और बाबा महादेव )के श्री चरणों में नमन करता हूँ, बहुत लोगों के मन में कुंडली मिलान को लेकर अनेक प्रश्न रहते हैं जिन्हें मैं अपने इस लेख के माध्यम से संतुष्ट करने का एक प्रयास कर रहा हूँ, हमारे धर्म शास्त्र में गर्भाधानादि (जन्म से मृत्यु पर्यन्त) षोडश संस्कारों में विवाह संस्कार सर्वश्रेष्ठ संस्कार माना गया है शास्त्र सम्मत विधिवत विवाह संपन्न होने पर जीवात्मा मनुष्य जीवन के सर्वोपरीय उद्देश्य (धर्म, अर्थ व काम) का यथावत पालन करते हुए मोक्ष को प्राप्त कर सकता है।
कुंडली मिलान के नियम:-
कुंडली मिलान के नियम
जीवनकाल चारआश्रमों में विभजित है यथा ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास, इन चारों आश्रमों का मुख्य आधार “गृहस्थ” है, स्त्री को मुख्य रूप से धर्म, अर्थ, कामकी प्रदात्री मानने के साथ ही संतान सिद्धि का प्रमुख मानकर विवाह के लिए समय शुद्धि का विचार किया जाता है यथा:-
“तस्माद्विवाहसमय: परिचिन्त्यते हि तान्नध्नतामुपगता: सुतशीलधर्मा:।।”
सृष्टि के आदिकाल से वसुंधरा पर अनेक महापुरुष ऋषि-महर्षि व विद्वान ज्योतिषाचार्यों व विज्ञान वेत्ताओं ने इस विषय पर गहन अध्यन चिंतन मनन कर के ग्रहादिकों के प्रभावादिका सही आकलन कर कुछ नियम निश्चित किए हैं यथा विद्याध्यन काल पूर्ण होने पर जब लड़के व लड़की की उम्र विवाह योग्य हो जाए तब माता-पिता को अपने कुल की परंपरानुसार लड़की के अनुरूप सुयोग्य वर को टीका (वाग्दान) करना चाहिए।
विशेष:-
शादी तय (वाग्दान वाणी द्वारा संकल्प सगाई) करने से पहले योग ज्योतिर्विद से वर-कन्या की जन्मकुंडली का मिलान अवश्य करा लेना चाहिए जन्मकुंडली में शुभाशुभ योगों पर ध्यान देना चाहिए और वर्णादि अष्टकूट तथा राशियों का शुभ संयोग देखकर ही विवाह का निर्णय लेना चाहिए।
अष्टकूट मिलान:-
अष्टकूट मिलान
हमारे पूर्वजों ने दिव्य दृष्टि से विवाह के विषय में (जो एक धार्मिक संबंध है) पर गहन अध्यन किया है एक कन्या किसी दूसरे वर के साथ सर्वदा के लिए गृहणी बनने को जाती है इन दोनों के शारीरिक एवं मानसिक विभिन्नताओं पर आजन्म के लिए उन लोगों का सुख-दुःख निर्भर करता है इन शारीरिक व मानसिक गुण-दोषों को और इसके तारतम्य को जानने के लिए “वर्ण”, “वश्य”, “योनि”, “गण”, “तारा”, “नाड़ी”, “ग्रहमैत्री” व “भकूट” कहा गया है।
वर्ण:-
मनुष्य के जन्म नक्षत्र के अनुसार महर्षियों ने इस बात के जानने की विधि बतलाई है कौन जीव जन्म से (वंश से उत्पन्न नही) ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र है, यदि वर व कन्या दोनो का वर्ण एक हो या कन्या से वर उच्च वर्ण का हो तो उसे अच्छा माना जाता है।
वश्य:-
साधारण भाषा में वश्य का अर्थ है कि एक व्यक्ति पर दूसरे व्यक्ति का ऐसा प्रभाव पड़ता है कि दूसरा व्यक्ति उसके साथ जो चाहे वह कर सके या उससे जो चाहे वह करा सके, ऋषियों ने राशि मात्र को रूप के अनुसार ५ भागों में बांटा है चतुष्पद, मानव, जलचर, वनचर और कीट को वश्य कहते हैं, वर-कन्या के इसी वश्य विभाग के अनुसार उनका फल होता है जैसे दोनो चतुष्पद हो या दोनों मानव हों अर्थात दोनो का वश्य एक ही हो तो २बल आता है और यदि वश्य भिन्न हो तो १ बल आता है।
योनि:-
नक्षत्रों को १४ योनियों में बांटा गया है अश्व, गज, मेष, सर्प, श्वान, मार्ज़ार, मूषक, गौ, महिष, व्याघ्र, मृग, वानर, नफुल (नेवल) और सिंह, साधारण व्यवहार से देखने में आता है कि घोड़ा और महिष में, हरिण और हाथी में, बकरा और वानर में, नकुल और सर्प में, सिंह और श्वान में, मार्जार और मूषक में, व्याघ्र और गौ में वैर होता है अतएव महर्षियों का सिद्धांत है कि एक योगी से अत्यंत उत्तम और वैर योनि से अत्यंत निकृष्ट और अन्य योनिओं में साधारण फल होते हैं।
गण:-
यह सभी जानते हैं कि देवता, मनुष्य और राक्षस यही तीन गण माने गए हैं यह तो प्रसिद्ध बात है कि अपने-अपने गण में पूर्ण प्रीति होती है, देव-मनुष्य में समता, देव-राक्षस में वैर और मनुष्य-राक्षस में मृत्यु होती है, ऋषियों ने नक्षत्रों के भेद से इन तीन गणों को माना है और वर-कन्या के संबंध को इसी गण भेद से शुभ और अशुभ फल बताया है।
नाड़ी:-
नाड़ी शब्द का प्रयोग प्रायः योग शास्त्र व वैधक शास्त्र में पाया जाता है इस शब्द का भाव यही है कि वह शारीरिक नली, नस इत्यादि जो रुधिर प्रवाह होते-होते स्वच्छ हो जाता है और इसी प्रवाह के गमनानुसार वैधक शास्त्रों में स्वास्थ्य का अनुमान होता है अर्थात नाड़ी से मनुष्य की शारीरिक अवस्था का पता चलता है, ऋषियों ने ज्योतिष शास्त्र के लिए जन्म नक्षत्र भेदानुसार तीन नाड़ियां (आश्विनी से आरंभ कर के आदि, अन्त्य व मध्य से क्रमबद्ध २७ नक्षत्रों तक की नाड़ियां) होती है, वर-कन्या की एक नाड़ी होने से विवाह शुभ नही माना जाता है, ऋषियों के अनुसार यदि वर-कन्या की भिन्न-भिन्न नाड़ियां हों तो फल शुभ होता है अन्यथा फल अशुभ होता है।
तारा:-
नक्षत्र, तारा समुदाय का नाम है इस कारण वर के नक्षत्र से कन्या के नक्षत्र तक गिनकर उसे ९ से भाग देने पर यदि शेष ३, ५ व७ हो तो शुभ अन्यथा अशुभ होता है, यदि ९ से भाग न पड़ सके तो उसी संख्या से शुभ-अशुभ का विचार होता है, इसी प्रकार कन्या के नक्षत्र से वर के नक्षत्र तक गिनकर भी विचार करना चाहिए।
भकूट:-
भकूट वर-कन्या की जन्म राशियों की आपस की स्थिति के अनुसार माना गया है अर्थात वर-कन्या की राशियाँ परस्पर २, ५, ६, ८, ९ व १२ हों तो शुभ फल नही होता पर यदि दोनों की परस्पर राशियाँ १, ३, ४, ७, १० व ११हों तो उत्तम माना जाता है।
ग्रहमैत्री:-
वर-कन्या के राशि स्वामी की नैसर्गिक मित्रता-शत्रुता के आधार पर भेद किया जाता है यदि दोनों के राशि स्वामी मित्र हों तो शुभ और यदि नैसर्गिक शत्रु हों तो अशुभ फल होता है।
गुण विचार:-
कुशाग्र बुद्धि द्वारा ऋषियों ने यह देखा है कि साधारण बुद्धि वाले मनुष्य इन ८ प्रकार के फलों को आसानी से नही समझ सकेंगे इसलिए प्रत्येक प्रकार से गुण (बल ) की विधि को बताया है, इस विधि से सबसे उत्तम कुंडली मिलान करने पर ३५ गुण ही आता है (जैसे वर का जन्म पुनर्वसु के चतुर्थ चरण व कन्या का जन्म पुष्य नक्षत्र के किसी भी चरण में हो।) इसी प्रकार कम से कम ३ गुण आता है (जैसे वर का जन्म ज्येष्ठा नक्षत्र के किसी भी चरण का हो और कन्या का जन्म आर्द्रा नक्षत्र के किसी भी चरण में हुआ हो।), इस कारण से ऋषियों का सिद्धांथ है कि यदि अष्टकूट मिलान १८ से अधिक हो तो ऐसे वर-कन्या के विवाह में साधारण रूप से कोई आपत्ति नही होती है।
विभिन्न दोषों के परिहार:-
विभिन्न दोषों के परिहार
नाड़ी व गण दोष परिहार:-
यदि वर-कन्या की एक ही राशि हो पर नक्षत्र भिन्न-भिन्न हों या एक ही नक्षत्र हो किंतु राशियाँ भिन्न-भिन्न हों या नक्षत्र एक हो किंतु उनके चरण भिन्न-भिन्न हों तो ऐसी स्थिति में नाड़ी दोष व गण दोष का परिहार हो जाता है।
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जब वर और कन्या की राशियों के स्वामी एक हो (जैसे वर की मेष व कन्या की वृश्चिक राशि या वर कक वृष व कन्या की तुला राशि हो, यह दोनों राशियाँ एक दूसरे की परस्पर ६-८ हैं) तो भकूट दोष का परिहार हो जाता है, इसके अतिरिक्त वर-कन्या के राशि स्वामी यदि आपस में मित्र हों तो भकूट दोष का परिहार हो जाता है।
जन्मकुंडली में पुत्र योग ज्ञात करने के सरल व अचूक सूत्र
जन्मकुंडली में पुत्र योग ज्ञात करने के सरल व अचूक सूत्र
जन्मकुंडली में पुत्र योग ज्ञात करने के सरल व अचूक सूत्र
धर्म शास्त्र में विवाह संस्कार के बाद संतानोत्पादन का विचार बतलाया गया है हिन्दू धर्मशास्त्र अनुसार जिस मनुष्य को पुत्र नही रहता उसकी मुक्ति नही होती है पुत्र शब्द का अक्षरार्थ भी ऐसा ही होता है इन्ही सब कारणों से पुत्र संबंधी अनेकानेक योगादि ज्योतिष शास्त्रों में वर्णित हैं उनमें से कुछ सरल व अचूक सूत्रों को मैं यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ।
पुत्र के सुख-दुखादि का विचार सप्तमेश, नवमेश, पंचमेश तथा गुरु से करना चाहिए, लग्न से सप्तम स्थान जाया स्थान है पुत्र का गुणादि जाया के गुणादि से बहुत संबंध रखता है इस कारण से पुत्र के गुणादि के विचार में सप्तमेश पर भी विचार करना बतलाया है, नवम स्थान जातक/जातिका का भाग्य स्थान है और पंचम, पुत्र स्थान से पंचम स्थान नवम होता है अतएव पुत्र कारक ग्रह बृहस्पति का भी विचार करना बतलाया है।
फलदीपिकानामक पुस्तक में लिखा है कि यदि स्त्री की कुंडली से विचार करना हो तो उस जातिका के जन्म समय का बृहस्पति, चन्द्रमा व मंगल के स्फुटों को जोड़कर जो योगफल आए(यदि १२ से अधिक आए तो १२ से भाग देकर जो शेष बचे उसको लेना चाहिए।)यदि वह सम राशि हो और नवमांश विषम हो तो संतानोत्पति शक्ति उस स्त्री की अच्छी होती है ठीक इसी प्रकार यदि वह विषम राशि हो और नवमांश सम राशि का हो तो उस स्त्री की संतानोत्पति शक्ति अच्छी नही होती अर्थात उपचार एवं औषधादि प्रयोग उपरांत संतान प्राप्ति होती है।
यदि पुरुष की कुंडली हो तो सूर्य, शुक्र एवं बृहस्पति के स्फुट को जोड़कर जो योगफल आए यदि वह विषम राशि और विषम नवमांश भी हो तो ऐसे जातक में पुत्रोत्पादन शक्ति बहुत अच्छी होती है परंतु इसके विपरीत होने पर फल उत्तम नही होता है।
पुत्र योग ज्ञात करने के सरल व अचूक सूत्र:-
पुत्र योग ज्ञात करने के सरल व अचूक सूत्र
१. पंचम भाव, पंचमेश व गुरु यदि शुभ ग्रहों द्वारा देखे जाते हों या युत हों तो पुत्र सुख निश्चय ही प्राप्त होता है।
२. बली गुरु यदि पंचम भाव में हो और लग्नेश से दृष्ट हो तो पुत्र सुख अवश्य ही प्राप्त होता है।
३. यदि पंचम भाव में वृष, कर्क या तुला राशि में शुक्र या चंद्र स्थित हों और उनको कोई अशुभ ग्रह न देखता हो तो इस स्थिति में बहु पुत्र योग बनता है किंतु यदि क्रूर ग्रह मुख्यतः शनि व मंगल पंचम भाव को देखें तो यह अनिष्टकारी होता है अतः उस स्थिति में संतान सुख कठिन प्रयासों से ही प्राप्त होता है।
४. यदि लग्नेश और पंचमेश एक साथ हों या एक-दूसरे को परस्पर देखते हैं या स्वग्रही हों या मित्रग्रही हों या उच्च राशि के अंतर्गत स्थित हों तो पुत्र सुख अवश्य ही प्राप्त होता है।
५. यदि पंचम भाव पर पंचमेश, भाग्येश व लग्नेश की दृष्टि हो तो पुत्र सुख अवश्य ही प्राप्त होता है।
६. यदि चंद्रमा पंचम भाव में मंगल के नवमांश का होकर स्थित हो और शनि से दृष्ट हो परंतु अन्य ग्रहों से दृष्ट न हो तो जातक गुढोत्पन्न अर्थात उसकी स्त्री को किसी अन्य पुरुष के माध्यम से पुत्र प्राप्त होता है।
७. यदि पंचम भाव चन्द्रमा के नवमांश में हो और चंद्रमा से दृष्ट भी हो तो ऐसे व्यक्तियों को दास/दासी से पुत्र सुख प्राप्त होता है।
८. यदि पंचम भाव सूर्य के वर्ग का हो और चंद्रमा से दृष्ट हो अथवा पंचम भाव चंद्रमा के वर्ग का हो और सूर्य से दृष्ट हो साथ ही शुक्र की दृष्टि भी पंचम भाव पर पड़ती हो तो जातक को सहोदर पुत्र अर्थात वैसी स्त्री से पुत्र प्राप्त होता है जो विवाह समय ही गर्भिणी हो।
९. यदि पंचम भाव सूर्य के षोडशांश का हो और पंचम भाव में सूर्य स्थित हो या पंचम भाव को देखता हो तो जातक को कानिन अर्थात अविवाहिता स्त्री से पुत्र सुख प्राप्त होता है।
१०. यदि पंचम स्थान शनि के वर्ग का हो या पंचम स्थान में सूर्य स्थित हो और मंगल से दृष्ट हो तो जातक को अधमप्रभव अर्थात शुद्री द्वारा (अपने से अलग कुल की लड़की) पुत्र प्राप्त होता है।
व्यक्ति की कद-काठी को बताने वाले कुछ अनोखे व सरल सूत्र
ज्योतिष शास्त्र के कुछ ऐसे अनोखे और दुलभ सूत्र जो व्यक्ति की काठी को दर्शाते हैं
व्यक्ति की कद-काठी को बताने वाले कुछ अनोखे व सरल सूत्र
ज्योतिष के कुछ प्राचीनतम ग्रंथों में से मुझे कुछ सूत्र प्राप्त हुए थे जिनको मैंने शत-प्रतिशत लागू होते देखें है कुछ ही समय पूर्व एक व्यक्ति ने मुझसे इस विषय पर काफी चर्चा की थी व मुझसे इन सूत्रों को ज्योतिष के विद्यार्थियों के साथ साझा करने के लिए कहा था आज मैं उनमें से १६ सूत्रों को आप सभी के समक्ष रखता हूँ।
ज्योतिष के १६ अनोखे व दुर्लभ सूत्र:-
ज्योतिष शास्त्र के 16 अनोखे व दुर्लभ सूत्र
१. यदि शुष्क ग्रह (सूर्य, शनि व मंगल) लग्न में हो तो शरीर कृश तथा दुर्बल होता है कहने का आशय यह है कि ऐसे व्यक्ति दुबले-पतले होते हैं।
२. यदि लग्न निर्जल राशि में हो तो शरीर कृश होता है।
३. यदि लग्नेश शुष्क ग्रह (सूर्य, शनि व मंगल) के साथ हो अथवा निर्जल राशि का हो तो शरीर दुबला होता है।
४. यदि लग्नेश अष्टम या द्वादश भाव में हो तो शरीर दुबला-पतला होता है।
५. यदि लग्नेश का नवांशेश (लग्नेश नवमांश कुंडली में जिस राशि पर स्थित हो उसका स्वामी) शुष्क ग्रह (सूर्य, शनि व मंगल) के साथ हो तो शरीर दुबला-पतला होता है।
६. यदि लग्न निर्जल राशि में रहे और उसमें पाप ग्रह बैठे हों तो शरीर दुबला होता है।
७. यदि लग्न जल राशि हो और उसमें शुभ ग्रह स्थित हों तो शरीर स्थूल होता है।
८. यदि लग्नेश जल ग्रह हो साथ ही बली भी हो और शुभ ग्रह के साथ हो तो शरीर पुष्ट होता है।
९. यदि लग्नेश जल राशि में हो और शुभ ग्रह अथवा जल ग्रह के साथ हो तथा उस पर जल ग्रह की दृष्टि हो तो शरीर पुष्ट होता है।
१०. लग्न का स्वामी अर्थात लग्नेश जिस नवमांश में हो उसका स्वामी यदि जल राशि में हो तथा लग्न शुभ राशि में हो तो शरीर स्थूल होता है।
११. लग्न में बृहस्पति हो या लग्न पर जल राशिगत बृहस्पति की दृष्टि हो या लग्न जल राशि हो या लग्न पर शुभ ग्रह की दृष्टि या संयोग हो तो शरीर असाधारण रूप से स्थूल होता है।
१२. लग्नेश शुष्क ग्रह होने से, शुष्क ग्रह के साथ रहने से, शुष्क ग्रह के क्षेत्र में स्थित होने से, शुष्क राशि तथा वायु और अग्नि राशि में स्थित होने से या लग्नेश के अष्टम या द्वादश में स्थित होने से जातक/जातिका शुष्क देह तथा दुर्बल होते हैं।
१३. यदि लग्न शुष्क राशि हो और उसमें पाप ग्रह हों (सूर्य, मंगल व शनि शुष्क ग्रह होने के साथ-साथ पाप ग्रह भी हैं) तो जातक का शरीर दुबला होता है।
१४. लग्नेश जल राशिगत हो या जल ग्रह से युक्त हों तो शरीर स्थूल होता है।
१५. यदि लग्नेश जल ग्रह हो और बली हो साथ ही अन्य जल ग्रह के साथ हो तो जातक/जातिका स्थूल शरीर वाले होते हैं।
१६. लग्न में बृहस्पति के रहने से, जो जल ग्रह हैं और आकाश या तेज तत्वों का स्वामी हो या लग्न पर बृहस्पति की पूर्ण दृष्टि होने से और यदि लग्न जल राशि भी हो तो असाधारण (अत्यंत मोटा) होता है।