आप सभी को राम-राम आज मैं आप सभी को ज्योतिष के 7 ऐसे सूत्र बताने जा रहा हूँ जो बहुत ही सरल व प्रमाणित हैं और ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुभव में भी यह सूत्र शत-प्रतिशत सत्य प्रमाणित हुए हैं तो चलिए जानते हैं उन सूत्रों के बारे में:-
१. यदि लग्न कुंडली के प्रथम भाव का स्वामी द्वितीय भाव में हो व द्वितीय भाव का स्वामी एकादश भाव में हो साथ ही एकादश भाव का स्वामी लग्न में हो तो महालक्ष्मी योग बनता है इस योग में जन्मे व्यक्ति को कभी धन की कमी नही रहती अर्थात ऐसे व्यक्ति अत्यंत धनी होते हैं।
२. यदि गोचरवश शनि पंचम भाव में आ जाएं तो यह साढ़ेसाती व ढैया से भी अधिक कष्टकारी फल देने वाले होते हैं।
३. यदि पंचम व नवम भाव के स्वामी सप्तम भाव में हो और सप्तम भाव का स्वामी केंद्र में कहीं भी बैठा हो तो ऐसे व्यक्तियों का भाग्योदय बाल्यकाल में ही हो जाता है।
४. यदि लग्न कुंडली के द्वितीय भाव में सूर्य स्थित हो और उसको शनि देखता हो तो ऐसी स्थिति में व्यक्ति को आर्थिक रूप से कड़ा संघर्ष करना पड़ता है।
५. यदि लग्न कुंडली के तृतीय, षष्ठ व एकादश भाव में शनि स्थित हो तो व्यक्ति जीवन के प्रारंभिक भाग अर्थात 36 वर्ष की आयु तक कड़ा संघर्ष करते हैं किंतु उत्तरार्ध में अत्यंत धनी होते हैं।
६. यदि गोचरवश शनि तृतीय, षष्ठ व एकादश भाव में आ जाएं तो कुछ परिवर्तन (नौकरी/स्थान) के साथ अच्छी उन्नति होती है।
७. यदि पंचम का स्वामी सप्तम में हो, सप्तम का स्वामी नवम में हो और नवम का स्वामी एकादश भाव में हो तो ऐसे व्यक्तियों का भाग्योदय विवाह उपरांत होता है व ऐसे व्यक्तियों की संतान जब इनके कार्य मे सहयोग करती है तो ऐसे व्यक्तियों के कार्यक्षेत्र में निश्चय ही वृद्धि होती है।
जय श्री राम। Astrologer:- Pooshark Jetly Astrology Sutras(Astro Walk Of Hope) Mobile:- 7007245896, 9919367470 Email:- pooshark@astrologysutras.com
चतुर्थ भाव में स्थित शनि के फल मैंने दो भागों में विभक्त किया था जिसके पहले भाग की link को मैं इस पोस्ट में उपलब्ध करा रहा हूँ साथ ही उसी विषय पर आगे चर्चा करते हुए शनि के चतुर्थ भाव में विभिन्न स्थितियों में स्थित होने के फल को विस्तार से समझाते हुए पूर्ण करता हूँ।
चतुर्थ भाव में स्थित शनि का फल भाग:-१ पढ़ने के लिए इस link पर जाएं:-
यदि उच्च राशि का शनि चतुर्थ भाव में स्थित हो जो कि केवल कर्क लग्न की कुंडली में ही संभव है तो ऐसे व्यक्ति दूसरों को अनुशासित करने में लगे रहते हैं कहने का आशय यह है कि ऐसे व्यक्तियों की चाह होती है कि उनके इच्छा अनुसार लोग कार्य करें ऋषि कश्यप का मत है कि ऐसे व्यक्ति पक्षियों को बंधन में रखने से सुखी होते हैं ऐसे व्यक्तियों को भूमि व वाहन सुख प्राप्त होता है साथ ही इनको बहुत मजबूत विचारों वाले जीवनसाथी की प्राप्ति होती है, यदि उच्च नवांश का शनि चतुर्थ भाव में हो तो ऐसे व्यक्ति माँसाहारी होते हैं तथा माँसाहार भोजन करने में इन्हें बहुत आनंद आता है।
यदि शुभ वर्ग का शनि चतुर्थ भाव में स्थित हो तो ऐसे व्यक्ति खेती से जुड़े कार्य से सुख की प्राप्ति करते हैं कहने का आशय यह है कि ऐसे व्यक्ति जहाँ कच्चे माल को बनाने या खरीदने-बेचने का कार्य होता हो वहाँ अधिक सफल होते हैं, यदि पाप वर्ग का शनि चतुर्थ भाव में हो तो ऐसे व्यक्ति नकारात्मक चीजों की ओर जल्दी आकर्षित होते हैं ऋषि कश्यप का मत है कि ऐसे व्यक्ति दोषों को अपनाकर सुख का अनुभव करते हैं अतः ऐसे व्यक्तियों को कोई भी निर्णय बहुत सोच समझकर लेना चाहिए।
चतुर्थ भाव में शनि
यदि नीच राशि का शनि चतुर्थ भाव में स्थित हो जो कि मकर लग्न की कुंडली में ही संभव है तो ऐसे व्यक्ति अधिकांश समय अकेले रहना पसंद करते हैं व इन्हें भूमि और वाहन का उत्तम सुख प्राप्त होता है और ऐसे व्यक्तियों के जीवनसाथी उच्च पद पर नौकरी करते हैं, यदि नीच नवांश का शनि चतुर्थ भाव में स्थित हो तो ऐसे व्यक्ति बोलते कुछ व करते कुछ हैं कहने का आशय यह है कि ऐसे व्यक्ति वंचक होते हैं साथ ही ऐसे व्यक्ति लोगों की मदद कर के सुख को अनुभव करते हैं।
चतुर्थ भाव में स्थित शनि का फल भाग:-१ पढ़ने के लिए इस link पर जाएं:-
यदि चतुर्थ भाव में मित्र राशि का शनि स्थित हो तो ऐसे व्यक्तियों का कार्यस्थल पर अधिक मन लगता है व ऐसे व्यक्ति परिवार से अधिक अपने कार्य को महत्व देते हैं, यदि शत्रु राशि का शनि चतुर्थ भाव में स्थित हो तो ऐसे व्यक्ति दूसरों को ठगने से सुखी होते हैं कहने का आशय यह है कि ऐसे सभी कार्य जिसमें बुद्धि-विवेक द्वारा मुनाफा अधिक कमाया जा सकता है उन सभी कार्यों जैसे मार्केटिंग, बिज़नेस में अधिक सफल होते हैं।
यदि मित्र नवांश का शनि चतुर्थ भाव में स्थित हो तो ऐसे व्यक्तियों के घरेलू सुख में कुछ तनाव की स्थिति बनी रहती है साथ ही ऐसे व्यक्तियों को भूमि सुख अवश्य प्राप्त होता है, शत्रु नवांश का शनि चतुर्थ भाव हो तो ऐसे व्यक्ति जीवों को बेचकर सुखी होते हैं कहने का आशय यह है कि ऐसे व्यक्ति जीवों को बेचकर धनार्जन करते हैं अब आज के समय में dog cannel खोलना वगैरह इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।
यदि वर्गोत्तम स्थिति का शनि चतुर्थ भाव में हो तो ऐसे व्यक्ति दूसरों को हानि पहुँचा कर सुख का अनुभव करते हैं कहने का आशय यह है कि ऐसे व्यक्ति कुछ इस तरह का कार्य करते हैं जिससे दूसरों को हानि या दुःख पहुँचे उदाहरण के तौर पर जैसे वकालत का कार्य क्योंकि इसमें व्यक्ति अपने पक्ष के व्यक्ति को विजय दिलवाकर उनसे सुख के साधन प्राप्त करता है किंतु उसके इस कृत्य से दूसरे पक्ष को कुछ हानि व दुःख पहुँचता है।
यदि स्वराशिशनि चतुर्थ भाव में हो जो कि तुला व वृश्चिक लग्न की कुंडली में ही संभव है तो व्यक्ति रस पदार्थ बेचकर सुखी होता है कहने का आशय यह है कि ऐसा व्यक्ति कोई ऐसा कार्य करता है जिससे दूसरों को सुख की अनुभूति हो साथ ही ऐसे व्यक्तियों भूमि सुख निश्चय ही प्राप्त होता है, यदि तुला लग्न की कुंडली में शनि चतुर्थ भाव में हो तो अधिक लाभकारी होता है क्योंकि तुला लग्न की कुंडली में राजयोगकारक हो जाता है और दसवीं दृष्टि से लग्न को अपनी उच्च राशि में देखता है अतः तुला लग्न की कुंडली में चतुर्थ भाव में स्थित शनि व्यक्ति की मान-प्रतिष्ठा में वृद्धि करता है व बड़ी सफलता दिलवाता है वहीं वृश्चिक लग्न की कुंडली में चतुर्थ भाव में स्थित शनि दर्शाता है कि ऐसे व्यक्तियों की परिश्रम अधिक करना पड़ेगा क्योंकि शनि तीसरे भाव अर्थात पराक्रम भाव का भी स्वामी होता है साथ ही ऐसे व्यक्ति अत्यधिक परिश्रम कर के जीवन में बड़ी सफलता को प्राप्त करते हैं।
चतुर्थ भाव में स्थित शनि का फल भाग:-१ पढ़ने के लिए इस link पर जाएं:-