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पौराणिक कथाएं

अक्षय नवमी से जुड़ी पौराणिक कथाएं

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कार्तिक शुक्ल नवमी तिथि के दिन माँ लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण कर रही थीं तभी उनके मन में भगवान विष्णु और भगवान शिव की पूजा एक साथ करने का विचार आया जिससे प्रेरित होकर माँ लक्ष्मी ने आंवले वृक्ष को भगवान विष्णु और भगवान शिव का प्रतीक मानकर पूर्ण विधि-विधान से पूजा करी, उनकी पूजा से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु और भगवान शिव दोनों प्रकट हुए और माँ लक्ष्मी ने आंवले वृक्ष के नीचे ही दोनों देवताओं के लिए भोजन पका कर दोनों देवताओं को परोसा और बाद में स्वयं भी भोजन किया तभी से यह मान्यता है कि अक्षय नवमी पर आंवले के वृक्ष की पूजा और वृक्ष के नीचे भोजन करने से भक्त को भगवान विष्णु, शिव जी और माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है।

वहीं ऐसी मान्यता भी है कि इस दिन सत्त युग व द्वापर युग का आरंभ हुआ था जिस कारण से अक्षय नवमी को सत्य, धर्म और नए युग के आरंभ का प्रतीक माना जाता है और इस दिन के स्नान-दान-व्रत से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।

राजा आंवल्या की कथा

आंवलया राजा की कथा एक लोकप्रिय पौराणिक कथा है, जो आंवला नवमी से जुड़ी है और इसके महत्व को सरलता से समझाती है इस कथा के अनुसार, एक समय की बात है कि एक राजा थे, जिसे आंवलया राजा कहा जाता था क्योंकि उसने यह प्रण किया था कि वह रोजाना सवा मन आंवले का दान करने के बाद ही भोजन करेगा जो उसकी धार्मिक और सामाजिक जिम्मेदारी भी थी अतः राजा अपने इस प्रण का सख्ती से पालन करता था और अपने प्रजा में भी दान करता था।​

राजा के बेटे और बहू को यह बात पसंद नही थी, क्योंकि वह सोचते थे कि इतना अधिक दान करने से राज्य का खजाना जल्द खत्म हो जाएगा जिस कारण से उन दोनों ने राजा को दान न देने सलाह दी, राजा को यह बात सुनकर बहुत दुख हुआ और उन्होंने रानी के साथ मिलकर अपना महल छोड़ जंगल चले जाने का फैसला किया, जंगल में दोनों सात दिन तक भूखे-प्यासे रहे क्योंकि राजा ने अपने प्रण का पालन करते हुए दान किए बिना भोजन नहीं किया उनकी इस तपस्या और दृढ़ता को देखकर भगवान विष्णु ने उन पर कार्तिक शुक्ल नवमी के दिन दया कर जंगल में ही उनके लिए महल, बाग-बगीचे और आंवले के पेड़ उन्हें वरदान में दिए, जो उनके पुराने राज्य से भी भव्य था।​

राजा और रानी ने फिर से आंवले का दान किया और खुशहाल होकर नए राज्य में रहने लगे वहीं, राजा के बेटे-बहू का दुर्भाग्य आया क्योंकि उनके बुरे कर्मों के कारण उनका राज्य छीन लिया गया और वे दाने-दाने को मोहताज हो गए अंत में पुत्र और बहू को अपनी भूल का एहसास हुआ और वह लौटकर अपने माता-पिता के पास आकर दान और सत्कर्मों का महत्व समझ कर वह भी दान-पुण्य करने लगे।

इस प्रकार, आंवलया राजा की कथा धर्म, त्याग और दान की महत्ता को दर्शाती है, जो अक्षय नवमी के त्यौहार की धार्मिक महत्ता बताती है।

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अक्षय नवमी 2025: जानिए अक्षय नवमी का महत्व व शुभ मुहूर्त्त

कार्तिक माह में देवउठनी एकादशी से दो दिन पहले पड़ने वाली नवमी को आंवला नवमी, इच्छा नवमी और अक्षय नवमी के नाम से जाना जाता है, इस दिन भगवान विष्णु के साथ-साथ आंवले के पेड़ की भी पूजा की जाती है अक्षय का अर्थ ही है कभी न नष्ट होने वाला अतः अक्षय नवमी पर किए गए दान-पुण्य, व्रत व अन्य शुभ कार्यों से अक्षय पुण्यों की प्राप्ति होती है।

अक्षय नवमी शुभ मुहूर्त्त

“ऋषिकेश पंचांग (काशी)” अनुसार वर्ष 2025 में कार्तिक शुक्ल नवमी तिथि 29 अक्टूबर की मध्य रात्रि 04:52 पर लगेगी जो कि 30 अक्टूबर की मध्य रात्रि 04:41 तक रहेगी अतः अक्षय नवमी 30 अक्टूबर को मनाई जाएगी इस दिन प्रातः 07:46 से 10:02 तक वृश्चिक लग्न और श्रवण नक्षत्र में पूजन मुहूर्त्त है।

इसके अतिरिक्त स्थिर लग्न कुंभ दोपहर 01:56 से 03:27 और वृषभ लग्न शाम 06:32 से रात्रि 08:28 का समय भी पूजन के लिए उत्तम है।

अक्षय नवमी का महत्व

धर्म शास्त्रों के अनुसार मान्यता है कि अक्षय नवमी के दिन किया गया पुण्य, दान या जप-तप कभी नष्ट नहीं होता तथा इस दिन आंवले के वृक्ष के नीचे बैठकर भोजन पकाकर करने से उत्तम स्वास्थ्य प्राप्त होता है और सुख-समृद्धि के रास्ते बनते हैं।​

अक्षय नवमी के दिन आंवले वृक्ष, भगवान विष्णु व माता लक्ष्मी के साथ तुलसी की पूजा करने से परिवार में सुख-शांति, अक्षय पुण्य फल और सौभाग्य की प्राप्ति होती है साथ ही आर्थिक स्थिरता भी बनी रहती है।