आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि यानी 11 अक्टूबर 2026 (रविवार) से शक्ति उपासना के महापर्व शारदीय नवरात्रि का शुभारंभ हो रहा है। इस वर्ष ऋषिकेश पंचांग के अनुसार प्रतिपदा तिथि के साथ-साथ पूरे दिन चित्रा नक्षत्र एवं वैधृति योग की व्याप्ति बन रही है। धर्मशास्त्रों में सामान्यतः चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग में घटस्थापना को वर्जित माना गया है, जिसके कारण श्रद्धालुओं और आचार्यों के मन में संशय उत्पन्न होना स्वाभाविक है।
Astrology Sutras (ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी) के इस विशेष शोधपरक आलेख में हम निर्णय सिन्धु, मुहूर्त चिन्तामणि, धर्मसिन्धु तथा देवी पुराण के अकाट्य प्रमाणों के आलोक में इस संशय का प्रामाणिक समाधान, घटस्थापना का सर्वश्रेष्ठ अभिजित मुहूर्त, 9 दिवसीय नवदुर्गा भोग विधान और मातामह श्राद्ध समन्वय की संपूर्ण शास्त्रोक्त विधि प्रस्तुत कर रहे हैं।
11 अक्टूबर 2026: पंचांगीय विवरण (ऋषिकेश पंचांग अनुसार)
ऋषिकेश पंचांग (काशी मान) के अनुसार कलश स्थापना दिवस का सूक्ष्म गणितीय विवरण निम्नलिखित है:
| पंचांग अंग / विवरण |
मान एवं समय (काशी पंचांग मान) |
| दिनांक एवं वार |
11 अक्टूबर 2026, रविवार |
| संवत्सर |
विक्रम संवत् 2083 (रौद्र), शक संवत् 1948 |
| तिथि |
प्रतिपदा (रात्रि 08:37 बजे तक) |
| नक्षत्र |
चित्रा (रात्रि 10:49 बजे तक) |
| योग |
वैधृति (रात्रि 10:25 बजे तक) |
| करण |
किंस्तुघ्न (प्रातः काल), उपरांत बव |
| सूर्योदय / सूर्यास्त |
प्रातः 06:13 / सायं 05:47 |
| चन्द्र राशि |
कन्या (प्रातः 10:26 तक), तत्पश्चात तुला |
| सर्वश्रेष्ठ अभिजित मुहूर्त |
पूर्वाह्न 11:37 से दोपहर 12:23 तक |
| धनु लग्न (द्विस्वभाव) |
पूर्वाह्न 11:15 से दोपहर 01:21 तक |
| राहुकाल (पूर्णतः वर्जित) |
सायं 04:21 से सायं 05:47 तक |
📜 चित्रा नक्षत्र एवं वैधृति योग: निषेध और शास्त्रोक्त परिहार
धर्मशास्त्रों में सामान्य स्थिति में चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग का निषेध करते हुए कहा गया है:
| शास्त्रोक्त निषेध श्लोक |
प्रामाणिक भावार्थ |
|
“चित्रानक्षत्रयुक्तायां वैधृत्यां च न कारयेत्।
कलशस्थापनं तत्र पुत्रदारधनक्षयः॥”
देवीपुराण |
भावार्थ: चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग में घटस्थापना करने से कुल और ऐश्वर्य की हानि होती है। |
⚖️ शास्त्रोक्त अपवाद एवं अकाट्य समाधान (निर्णय सिन्धु व मुहूर्त चिन्तामणि)
यदि प्रतिपदा पूरे दिन हो और चित्रा नक्षत्र तथा वैधृति योग भी अहोरात्र (पूरे दिन) व्याप्त रहे, तब क्या किया जाए? इसके लिए ‘निर्णय सिन्धु’ और ‘मुहूर्त चिन्तामणि’ स्पष्ट निर्देश देते हैं:
| दोष परिहार मूल श्लोक |
शास्त्रीय व्यवस्था एवं समाधान |
|
“यदा त्वेवंविधा न स्यात् प्रतिपच्चोभयान्विता।
चित्रापादं परित्यज्य वैधृतेश्च तथांशकम्॥
मध्याह्नेऽभिजिति प्रोक्तं घटस्थापनमुत्तमम्।
अभिजित् सर्वदोषघ्नं सर्वसिद्धिकरं परम्॥”
मुहूर्त चिन्तामणि / निर्णय सिन्धु |
शास्त्रीय नियम: यदि पूरे दिन चित्रा और वैधृति हो, तो चित्रा के प्रारंभिक चरणों और वैधृति के प्रारंभिक अंश का त्याग करके मध्याह्न में अभिजित मुहूर्त में घटस्थापना करना सर्वोत्तम है। अभिजित मुहूर्त समस्त दोषों का शमन कर सिद्धि प्रदान करता है। |
|
“न कालनियमो यत्र नोपवासो न वा विधिः।
अभिजित्प्रविभागे तु दोषो नैवात्र कश्चन॥”
धर्मसिन्धु / देवी पुराण |
अभिजित की शक्ति: अभिजित मुहूर्त साक्षात भगवान विष्णु का चक्र स्वरूप है। इस मुहूर्त में घटस्थापना करने पर चित्रा, वैधृति अथवा विष्टि का कोई भी दोष प्रभावी नहीं रहता। |
अकाट्य शास्त्रीय व्यवस्था के 3 प्रमुख स्तंभ:
- प्रारंभिक अंश का त्याग: दोपहर तक चित्रा नक्षत्र के पूर्वार्ध और वैधृति के प्रथम अंश का स्वतः व्यतीत हो जाना दोष को समाप्त करता है।
- अभिजित मुहूर्त सर्वदोषनाशक: मध्याह्न 11:37 से 12:23 के मध्य भगवान विष्णु का चक्र स्वरूप अभिजित मुहूर्त समस्त कुयोगों को भस्म कर देता है।
- द्विस्वभाव धनु लग्न: मध्याह्न काल में स्थिर व द्विस्वभाव धनु लग्न (11:15 से 13:21) विद्यमान रहेगा, जिसमें कलश स्थापना करने से अभीष्ट कार्य में अक्षय स्थिरता और विजय प्राप्त होती है।
⏰ शारदीय नवरात्रि 2026: कलश स्थापना के शुभ मुहूर्त
11 अक्टूबर 2026 को घटस्थापना के लिए सुनिश्चित शास्त्रसम्मत मुहूर्त निम्नलिखित हैं:
| मुहूर्त प्रकार |
समय अवधि |
स्थिति / फल |
| सर्वश्रेष्ठ अभिजित वेला |
पूर्वाह्न 11:37 से दोपहर 12:23 तक |
सर्वदोषनाशक (सर्वोत्तम) |
| शुभ चौघड़िया |
दोपहर 01:47 से 03:14 तक |
श्रेष्ठ (मांगलिक फल) |
| राहुकाल |
सायं 04:21 से 05:47 तक |
पूर्णतः वर्जित |
विशेष निर्देश: यदि चित्रा नक्षत्र व वैधृति योग संपूर्ण दिन हो तो धर्मशास्त्रों ने अभिजित मुहूर्त (11:37 AM – 12:23 PM) को सर्वोच्च प्राथमिकता प्रदान की है।
🛠️ शास्त्रोक्त घटस्थापना (कलश स्थापना) संपूर्ण विधि व वैदिक मंत्र
आवश्यक पूजन सामग्री:
मिट्टी की वेदी या चौड़ा पात्र, सप्तमृत्तिका (या शुद्ध बालू/मिट्टी), सप्तधान्य (जौ, गेहूं, तिल आदि), तांबे या पीतल का कलश, गंगाजल, शुद्ध जल, सुपारी, सिक्का, दूर्वा, पल्लव (आम या अशोक के 5 पत्ते), जटा वाला नारियल, लाल वस्त्र/कलावा, मौली, रोली, अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य।
क्रमबद्ध स्थापन विधान:
1. पवित्रीकरण व आचमन: कुशासन पर पूर्व या उत्तर मुख होकर बैठें। तीन बार आचमन करें और स्वयं को पवित्रीकृत करें:“ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥”
2. भूमि व धान्य संस्कार: पूजा चौकी के पूर्व या ईशान कोण में शुद्ध मिट्टी बिछाकर उसमें सप्तधान्य (विशेषकर जौ) बोएं:
“ॐ ओषधयः संवदन्ते सोमेन सह राज्ञा। यस्मै कृणोति ब्राह्मणस्तं राजन् पारयामसि॥”
3. कलश स्थापन एवं जल भरण: मिट्टी की वेदी या चौड़ा पात्र, सप्तमृत्तिका (या शुद्ध बालू/मिट्टी), सप्तधान्य (जौ, गेहूं, तिल आदि), तांबे या पीतल का कलश, गंगाजल, शुद्ध जल, सुपारी, सिक्का, दूर्वा, पल्लव (आम या अशोक के 5 पत्ते), जटा वाला नारियल, लाल वस्त्र/कलावा, मौली, रोली, अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य।
मिट्टी की वेदी पर कलश स्थापित करें और तीर्थों का आवाहन करें:
“कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रुद्रः समाश्रितः। मूले त्वस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणाः स्मृताः॥”
“गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु॥”
4. द्रव्य प्रक्षेप एवं पल्लव स्थापना: कलश में गंध, अक्षत, दूर्वा, सुपारी, सर्वौषधि और सिक्का डालें। कलश के मुख पर आम अथवा अशोक के 5 या 7 पत्ते रखें।
5. नारियल प्रतिष्ठा (श्रीफल संस्कार): नारियल पर मौली लपेटकर लाल वस्त्र बांधें। नारियल का मुख अपनी ओर (पूजक की ओर) रखते हुए कलश के ऊपर पूर्णपात्र (चावल से भरी कटोरी) पर स्थापित करें।
शास्त्रोक्त नियम: नारियल का मुख सदैव अपनी ओर होना चाहिए। अधोमुख होने से शत्रुवृद्धि और ऊर्ध्वमुख होने से धनहानि का दोष लगता है।
6. वरुण एवं नवग्रह आवाहन: हाथ में अक्षत-पुष्प लेकर कलश पर वरुण देव का ध्यान करें:
“तन्त्वा यामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदा शास्ते यजमानो हविर्भिः। अहेडमानो वरुणेह बोध्युरुशंस मा न आयुः प्र मोषीः॥” कलश पर “ॐ भूर्भुवः स्वः वरुणाय नमः, कलशदेवताभ्यो नमः” कहकर पुष्प अर्पित करें।
7. अखंड ज्योति स्थापना (यदि संकल्प हो): घटस्थापना के पश्चात दीप प्रज्वलित करें। दीप के नीचे अक्षत रखें और प्रार्थना करें:
“शुभं करोति कल्याणमारोग्यं धनसंपदाम्। शत्रुबुद्धिविनाशिवाय दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते॥”
🌸 नवदुर्गा: 9 दिवसीय पूजन क्रम, स्वरूप एवं भोग विधान
11 अक्टूबर से 19 अक्टूबर 2026 तक मां भगवती के नौ स्वरूपों की तिथि, स्वरूप और प्रिय नैवेद्य की संपूर्ण सूची:
| तिथि व देवी स्वरूप |
स्वरूप व प्रिय भोग |
शास्त्रोक्त मंत्र |
| 11 अक्टूबर: मां शैलपुत्री |
वृषभ सवारी। भोग: गाय का शुद्ध घी (आरोग्य लाभ हेतु)। |
ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः॥ |
| 12 अक्टूबर: मां ब्रह्मचारिणी |
कमंडल व अक्षमाला। भोग: शक्कर, मिश्री या पंचामृत। |
ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः॥ |
| 13 अक्टूबर: मां चंद्रघंटा |
मस्तक पर अर्धचंद्र। भोग: दूध की खीर या मिष्ठान्न। |
ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः॥ |
| 14 अक्टूबर: मां कूष्मांडा |
अष्टभुजा देवी। भोग: मालपुआ (बुद्धि व यश प्राप्ति)। |
ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः॥ |
| 15 अक्टूबर: मां स्कंदमाता |
वात्सल्यमयी। भोग: केला (संतान सुख व रक्षा)। |
ॐ देवी स्कन्दमातायै नमः॥ |
| 16 अक्टूबर: मां कात्यायनी |
महिषासुरमर्दिनी। भोग: शहद (विवाह बाधा निवारण)। |
ॐ देवी कात्यायन्यै नमः॥ |
| 17 अक्टूबर: मां कालरात्रि |
अंधकार नाशिनी। भोग: गुड़ या गुड़ के पदार्थ (भय मुक्ति)। |
ॐ देवी कालरात्र्यै नमः॥ |
| 18 अक्टूबर: मां महागौरी |
महाष्टमी व्रत। भोग: नारियल (दरिद्रता नाश हेतु)। |
ॐ देवी महागौर्यै नमः॥ |
| 19 अक्टूबर: मां सिद्धिदात्री |
महानवमी। भोग: तिल, खीर, हलवा-पूरी (मनोरथ सिद्धि)। |
ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः॥ |
💬 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Google FAQs)
| प्रश्न |
शास्त्रोक्त समाधान |
| जब पंचांग में लिखा है चित्रा-वैधृति में मुहूर्त नहीं, तो स्थापना कैसे होगी? |
पंचांग का यह निर्देश लौकिक कार्यों (विवाह, गृहप्रवेश) के लिए होता है। नवरात्रि नैमित्तिक महापर्व है। निर्णय सिन्धु के अनुसार प्रतिपदा में पूरे दिन चित्रा-वैधृति होने पर अभिजित मुहूर्त में घटस्थापना सर्वथा निर्दोष व मान्य है। |
| क्या रविवार को अभिजित मुहूर्त मान्य होता है? |
हाँ। नवरात्रि घटस्थापना में अभिजित को ‘सर्वदोषघ्न’ माना गया है। साथ ही इस समय द्विस्वभाव धनु लग्न भी उपस्थित है, जो इसे पूर्ण बल प्रदान करता है। |
| क्या कलश स्थापना शाम को की जा सकती है? |
कदापि नहीं। शास्त्रों में रात्रि या गोधूलि के बाद घटस्थापना का कड़ा निषेध है: “कुर्यान्निशि न कुर्वीत कदाचिदपि साधनम्”। स्थापना सदैव सूर्यास्त से पूर्व ही संपन्न होनी चाहिए। |
| कलश में नारियल किस दिशा में रखें? |
नारियल का मुख (नेत्र वाला भाग) सदैव अपनी ओर (पूजक के सम्मुख) होना चाहिए। अधोमुख होने से शत्रुवृद्धि और ऊर्ध्वमुख होने से धनहानि होती है। |
निष्कर्ष: 11 अक्टूबर 2026 को शारदीय नवरात्रि पर संपूर्ण भक्ति-भाव से अभिजित मुहूर्त (11:37 AM से 12:23 PM) में मां जगदम्बा की घटस्थापना करें। शास्त्रोक्त विधान से किया गया पूजन संपूर्ण परिवार के लिए मंगल, समृद्धि और आरोग्यता लेकर आता है।
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