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वृषभ राशि 2026: जानिए अवसर चुनौतियाँ व उपाय

वृषभ राशि वालों के लिए वर्ष 2026 मिश्रित फल देने वाला रहेगा जहाँ नए अवसरों के साथ अनेक चुनौतियाँ भी आएंगी, गुरु का मिथुन और कर्क राशि से गोचर निःसंदेह व्यवसाय में धनलाभ के योग को दर्शाता है साथ ही किसी संपत्ति के क्रय करने के भी योग बनेंगे और नौकरी पेशा वालों की पदोन्नति होने की अच्छी संभावना रहेगी साथ ही सहयोगियों का भी समर्थन प्राप्त होगा तो वहीं वजन पड़ने या पाचन क्रिया में कुछ दिक्कत की समस्या, तनाव, आकस्मिक धन खर्च में वृद्धि व घर के बड़े-बुजुर्ग या बच्चों की स्वास्थ्य को लेकर कुछ चिंता सी अनुभव हो सकती है, जनवरी माह में खर्चों में वृद्धि की संभावना दिखती है, किसी यात्रा पर जाने के योग बनेंगे, व्यापारियों व नौकरी पेशा लोगों की स्थिति में सुधार भी जनवरी के मध्य भाग से संभव रहेगा और यश की प्राप्ति होगी तो फरवरी माह में ग्रहों की शुभ स्थिति के कारण से धन लाभ व राजकीय व न्यायालय से जुड़े कार्यों में सफलता प्राप्त होगी एवं व्यापार में भी कुछ सुधार होगा किंतु विपरीत परिस्थितियों में धैर्य की परीक्षा भी रहेगी।

मार्च व अप्रैल माह में स्त्री से सुख व सहयोग प्राप्त होगा और धन लाभ के भी साधन बनेंगे और शत्रु पक्ष भी थोड़ा कमजोर बना रहेगा एवं वाणी की चतुराई से कार्य सिद्ध होंगे, विद्यार्थी वर्ग के लिए भी यह समय अच्छा रहेगा और पारिवारिक कार्यों में भी सफलता प्राप्त होगी किंतु क्रोध की अधिकता या स्वाभिमान के वृद्धि के कारण से परिवार में क्षणिक तनाव भी संभव रहेगा, दूसरों के बीच अपनी लोकप्रियता बढ़ाने का यह अच्छा समय रहेगा और कुछ गुप्त युक्तियों के बल पर समाज में अच्छा मान प्राप्त होगा, मई व जून के महीने में स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं जैसे अपच, बुखार, मानसिक चिंता, वाहन या पशु आदि से चोट की संभावना रहेगी तो परिवार के सदस्य से अचानक कलह होने से मन में अशांति अनुभव हो सकती है, व्यवसाय में परिवर्तन जून के मध्य भाग बाद करना शुभ रहेगा और जून माह के प्रथम सप्ताह बाद से ग्रह स्थिति शुभ होने से नए अवसर प्राप्त होंगे एवं परिवार के अंदर भी सुख के साधनों में वृद्धि होगी और किसी प्रकार का शुभ समाचार भी प्राप्त हो सकता है।

वृषभ राशिफल 2026
वृषभ राशिफल 2026

जुलाई व अगस्त माह में व्यापारिक क्षेत्र में किसी मित्र का सहयोग व मित्र के सहयोग से आर्थिक लाभ के योग बनेंगे, भूमि पर निवेश करने के लिए यह अच्छा समय रहेगा, संभव है कि इस समय आप पर कुछ अतिरिक्त कार्यभार भी रहे और आप किसी विशेष विषय पर लोगों का नेतृत्व कर सकते हैं, वरिष्ठ व्यक्तितियों की सलाह से लाभ सम्भव है फिर भी सामाजिक मान-प्रतिष्ठा प्राप्त करने हेतु कड़ा संघर्ष भी बना रहेगा, किसी भी प्रकार के आर्थिक लेन-देन में सावधानी बरतें, सितंबर व अक्टूबर माह में विशेष उथल-पुथल देखने को मिल सकती है और अत्यधिक व्यस्तता व कार्यभार के कारण से शरीर व मन में थकान अनुभव हो सकती है, व्यर्थ की यात्राओं को टालने का प्रयास करें और किसी भी परिस्थिति में धैर्य बनाए रखें, मुकदमे वगैरह में भी यह माह साधारण रहेगा फिर भी शत्रुओ पर प्रभाव बना रहेगा, अपनी कार्यप्रणाली में बदलाव करने से बचें कुल मिलाकर सितंबर और अक्टूबर माह बहुत अच्छा नही है जिसमें क्लेश और मन को असंतोष के योग हैं अतः इस समय पर धैर्य व संयम के साथ लिए फैसले लाभकारी सिद्ध होंगे और गुप्त युक्तियों एवं बुद्धि-विवेक द्वारा लाभ प्राप्त होगा।

नवंबर माह से वृषभ राशि वालों को पुनः राहत मिलने लगेगी, परिवार के माहौल में सुख के साधन में वृद्धि होगी और आप भी कलात्मक कार्यों में रुचि लेंगे साथ ही किसी अनूठे कार्य की तरफ मन का खिंचाव भी संभव रहेगा साथ-साथ आपका आध्यात्मिक पक्ष भी मजबूत होगा और आत्मविश्वास में वृद्धि होगी जिससे आर्थिक लाभ के योग बनेंगे, दिसंबर माह भी शुभ रहने से मन के अंदर कुछ स्थिरता अनुभव होगी व धन लाभ और किसी संपत्ति के क्रय करने के योग बनेंगे, राजनीति क्षेत्र से जुड़े व्यक्तियों को विशेष लाभ होगा एवं शत्रु पक्ष कमजोर होंगे एवं वाणी की चतुराई द्वारा बड़ा मान प्राप्त होगा, अपनी दिनचर्या का ध्यान रखें।

वर्ष 2026 के इन अशुभ दिनों पर रखें विशेष ध्यान

जनवरी:- 2, 3, 7 8, 12, 13, 26 व 27।
फरवरी:- 1, 2, 3, 11, 12, 13, 24, 25, 26, 27 व 28।
मार्च:- 1, 2, 11, 12, 15 व 26।
मई:- 2, 4, 6, 8, 10, 13, 15 व 29।
जून:- 3, 6, 9, 10, 13 व 14।
जुलाई:- 2, 6, 8, 10 व 28।
अगस्त:- 10, 13, 16 व 30।
सितंबर:- 3, 6, 9, 12, 15, 18 व 28।
नवंबर:- 3, 6, 9, 11, 17, 23 व 27।
दिसंबर:- 6, 12, 18, 24, 26, 28 व 29।

वर्ष 2026 के शुभ दिन करें नए कार्य की शुरुवात

अप्रैल:- 12, 14, 15, 28 व 29।
जून:- 16, 18, 21, 26, 29 व 30।
अक्टूबर:- 2, 5, 11, 13, 16, 21, 23, 26 व 29।

उपाय विशेष

1. नित्य विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।
2. प्रदोष व्रत करें।
3. मंगलवार के दिन गाय को रोटी-गुड़ खिलाएं।

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मेष राशि 2026: जानिए अवसर चुनौतियाँ व उपाय

वर्ष 2026 मेष राशि वाले व्यक्तियों के लिए परिवर्तनकारी सिद्ध होगा क्योंकि गुरु का वर्ष भर मिथुन व कर्क राशि से गोचर भाग्य व आमदनी में वृद्धि के अवसर प्रदान करेगा तो शनि का द्वादश भाव से गोचर कुछ अधिक भागा-दौड़ी के साथ धन वृद्धि के एक नए अवसर भी लेकर आएगा, जनवरी से मार्च 2026 के दौरान आप खुद को ऊर्जावान अनुभव करेंगे फिर भी राहु-चंद्र संबंध आपके लिए मन की अस्थिरता और व्यर्थ के तनाव के साथ मन में कुछ उलझनों को भी दर्शाती है जिस कारण से खुद के अंदर कहीं न कहीं कुछ कमजोरी सी अनुभव हो सकती है तो अप्रैल से जुलाई का समय भाग्यवर्धक रहेगा, अगस्त से दिसंबर के समय शनि का शुभ प्रभाव निश्चय ही करिअर उन्नति में सहायक सिद्ध रहेगा, जनवरी माह में उच्च वर्ग के किसी व्यक्ति का सहयोग प्राप्त हो सकता है साथ ही सामाजिक प्रतिष्ठा के साथ किसी नए कार्य के आरंभ व विस्तार के योग रहेंगे तो फरवरी माह में व्यापार की प्रगति एवं धन वृद्धि के अवसर प्राप्त होंगे साथ ही संभव है कि अचानक पिछले काफी समय से रुका कार्य पूर्ण होने की संभावनाएं बनती दिखें, स्थान परिवर्तन के योग भी फरवरी माह से अधिक मजबूत रहेंगे और जो व्यक्ति नौकरी परिवर्तन के प्रयास में लगे हैं उन्हें अच्छी नौकरी मिलने के योग रहेंगे।

मेष राशि वालों के लिए मार्च 2026 सामान्य रहने से इस माह स्वास्थ्य साधारण सा रह सकता है और विद्यार्थी वर्ग का भी शिक्षा से मन हटेगा और चंचलता, तनाव के कारण प्राप्त होंगे जिससे जीवन की दैनिक दिनचर्या भी बाधक रहेगी, अप्रैल माह में भी क्लेश, बिना मतलब झगड़े-झंझट व मन में बैर भावना के कारण से मन अशांत रहेगा लेकिन क्रोध और वाणी पर विशेष नियंत्रण रखने से अप्रैल माह में धन लाभ के योग बनेंगे साथ ही स्वास्थ्य भी कुछ उत्तम रहने से देह में स्फूर्ति बनी रहेगी, मई व जून के महीना पूर्वनियोजित/पहले से प्लान किये हुए कार्यों को करने का यह उत्तम समय रहेगा, कारोबार की वृद्धि हेतु किए गए प्रयास सफल होंगे और कार्य से जुड़ी यात्राएं भी इस समय संभव रहेगी और मन के अंदर स्फूर्ति एवं उत्साह बना रहेगा किंतु पेट और आँखों से जुड़ी समस्या भी कुछ परेशान कर सकती है, इस समय लोगों पर अधिक विश्वास करने से बचना चाहिए और अपनी बातों को गुप्त रखना चाहिए साथ ही मन के अंदर हीन भावना यदि बने तो उसको रोकने का प्रयास करें, जुलाई व अगस्त का समय मेष राशि वाले व्यक्तियों के लिए अच्छा रहेगा जिसमें सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव बनाने में सफल रहेंगे और किसी दैवीय शक्ति के सहयोग से कार्य में सफलता प्राप्त होगी एवं मन के अंदर भी थोड़ा संतोष बनेगा और नए व्यवसाय का आरंभ या कार्यक्षेत्र का विस्तार होगा, इन माह में परिवार के अंदर भी खुशनुमा माहौल रहने से मन प्रसन्न रहेगा और घर के अंदर मनोरंजन के साधन भी प्राप्त होंगे।

मेष राशिफल 2026
मेष राशिफल 2026

मेष राशि वाले व्यक्तियों के लिए सितंबर-अक्टूबर का समय मिला-जुला रहने से पारिवारिक उलझन और रोजगार के मार्ग में कुछ असंतोष बना रहेगा और व्यर्थ विवाद के कारण से कुछ हानि भी संभव रहेगी, इस समय पर यात्राओं को भी टालने का प्रयास करना चाहिए संभव है कि किसी विश्वसनीय द्वारा धोखा या रिश्तेदारों से कुछ तनाव भी इस समय बना रहे अतः इस समय धैर्य और संयम के साथ चलने से लाभ होगा और स्वास्थ्य लाभ हेतु व्यायाम अत्यंत शुभ रहेगा, नवंबर और दिसंबर के माह में पुनः मन में कुछ शांति अनुभव होगी साथ ही आप राजनैतिक प्रभाव बनाए रखने में सफल रहेंगे एवं दैवीय शक्ति के सहयोग से देह के अंदर स्फूर्ति व मन में उत्साह बना रहेगा और कार्यक्षेत्र में विस्तार होने के साथ-साथ आय में वृद्धि के भी साधन प्राप्त होंगे, दिसंबर के दूसरे भाग में खर्च में वृद्धि संभव है और विरोधियों से थोड़ी हानि की संभावना रहेगी अतः विरोधियों से सावधान रहें।

वर्ष 2026 के इन अशुभ दिनों पर रखें विशेष ध्यान

जनवरी:- 2, 3, 5, 9, 10, 11, 22, 29 व 30।
फरवरी:- 2, 3, 4, 2, 13, 25, 26, 27 व 28।
मई:- 7, 9, 12, 14, 16, 18, 21, 23, 25, 27 व 29।
जुलाई:- 2, 4, 7, 10, 13, 15, 21, 24, 25 व 28।
अक्टूबर:- 3, 4, 7, 12, 16, 19, 21, 23, 27, 28 व 30।
नवंबर:- 2, 7, 8, 10, 15, 16, 18, 19, 21, 24, 27 व 30।

वर्ष 2026 के शुभ दिन

मार्च:- 3, 4, 5, 11, 12, 13, 28 व 29।
अप्रैल:- 2, 4, 6, 13, 14, 16, 18, 20, 22, 25 व 28।
जून:- 1, 4, 6, 22, 24 व 30।
अगस्त:- 3, 5, 7, 10, 12, 14, 16, 18, 20, 23, 29, 30 व 31।
सितंबर:- 4, 6, 12, 15, 20 व 22।
दिसंबर:- 5, 10, 15, 20 व 25।

उपाय

1. नित्य सूर्य को जल अर्पित करें।
2. हनुमान चालीसा का नित्य पाठ करें।
3. अमावस्या के दिन मछलियों को दाना डालें।

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दिसंबर 2025 के प्रमुख व्रत-पर्व व त्यौहार

1 दिसंबर 2025:- मेष राशि के चंद्र व पंचक समाप्ति शाम 06:55 पर, एकादशी व्रत सभी के लिए, गीता जयंती, भद्रा समाप्ति दिन 02:21 पर, मूल।

2 दिसंबर 2025:- भौम प्रदोष व्रत, मूल समाप्ति शाम 05:22 पर।

3 दिसंबर 2025:- वृषभ राशि के चंद्र रात्रि 10:21 पर, पिशाच मोचन (काशी) यात्रा।

4 दिसंबर 2025:- स्नान-दान-व्रत की पूर्णिमा, श्री विद्या एवं दत्तात्रेय जयंती, भद्रा दिन 07:40 से शाम 06:29 तक।

5 दिसंबर 2025:- मिथुन राशि के चंद्र रात्रि 12:31 पर, मृत्युबाण आरंभ रात्रि 07:01 से।

6 दिसंबर 2025:- मृत्युबाण समाप्ति शाम 06:35 पर, वज्र योग, द्विपुष्कर योग दिन 11:51 तक।

7 दिसंबर 2025:- कर्क राशि के चंद्र मध्य रात्रि 03:35 पर, भद्रा दिन 11:53 से रात्रि 10:55 तक।

8 दिसंबर 2025:- श्री संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत, चंद्रोदय रात्रि 08:58 पर (काशी)।

9 दिसंबर 2025:- मूल प्रारंभ दिन 08:30 पर।

10 दिसंबर 2025:- सिंह राशि के चंद्र दिन 08:02 पर, भद्रा प्रारंभ रात्रि 07:10 पर, मूल।

11 दिसंबर 2025:- भद्रा समाप्ति दिन 06:59 पर, मूल दिन 07:37 तक।

12 दिसंबर 2025:- कन्या राशि के चंद्र दिन 02:45 पर, रुक्मिणी अष्टमी, अष्टका श्राद्ध।

13 दिसंबर 2025:- उत्पात योग, अन्वष्टका श्राद्ध।

14 दिसंबर 2025:- तुला राशि के चंद्र रात्रि 11:58 पर, भद्रा दिन 09:13 से रात्रि 08:46 तक।

15 दिसंबर 2025:- सफला एकादशी व्रत सभी के लिए।

16 दिसंबर 2025:- सूर्य की धनु संक्रांति व खरमास प्रारंभ।

17 दिसंबर 2025:- वृश्चिक राशि के चंद्र दिन 11:07 पर, प्रदोष व्रत, भद्रा प्रारंभ मध्य रात्रि 02:26 पर।

18 दिसंबर 2025:- मास शिवरात्रि व्रत, भद्रा दिन में 03:31 तक, मूल प्रारंभ रात्रि 08:41 पर।

19 दिसंबर 2025:- धनु राशि के चंद्रमा रात्रि 10:55 पर, स्नान-दान-श्राद्ध की अमावस्या, मूल।

20 दिसंबर 2025:- मूल समाप्ति रात्रि 01:13 पर।

21 दिसंबर 2025:- मित्र योग, बाबा मुकुंद का बासी बनाना।

22 दिसंबर 2025:- मकर राशि के चंद्र दिन 09:32 पर, श्री बाबा मुकुंद का पूजन व बासी खाना।

23 दिसंबर 2025:- वैनायकी गणेश चतुर्थी व्रत, भद्रा प्रारंभ रात्रि 10:43 पर।

24 दिसंबर 2025:- कुंभ राशि के चंद्र व पंचक प्रारंभ शाम 05:55 पर, भद्रा समाप्ति दिन 10:53 पर।

25 दिसंबर 2025:- महामना मालवीय जयंती, बड़ा दिन (क्रिसमस), पंचक।

26 दिसंबर 2025:- मीन राशि के चंद्र रात्रि 11:51 पर, पंचक।

27 दिसंबर 2025:- भद्रा दिन 08:53 से रात्रि 08:09 तक, मूल प्रारंभ रात्रि शेष 04:32 पर, पंचक।

28 दिसंबर 2025:- मेष राशि के चंद्र व पंचक समाप्ति रात्रि 03:49 पर, महाभद्राष्टमी, शाकम्भरी नवरात्रि प्रारंभ, मूल।

29 दिसंबर 2025:- साम्ब दशमी (उड़ीसा), मूल समाप्ति रात्रि 01:48 पर।

30 दिसंबर 2025:- पुत्रदा एकादशी व्रत सभी के लिए, भद्रा दिन 02:20 से रात्रि 01:13 तक, श्री तैलंग स्वामी जयंती।

31 दिसंबर 2025:- वृष राशि के चंद्र प्रातः 06:26 पर, कूर्म द्वादशी।

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Astrology Sutras/Logics

तीसरे भाव में स्थित शनि का फल भाग 2

यदि तीसरे भाव में उच्च राशि का शनि हो जो कि सिंह लग्न की कुंडली में संभव है तो व्यक्ति उत्तम प्रबंधनकर्ता व अच्छा शासक होता है जो कि अपने ग्रुप को अच्छे से manage करता है सिंह लग्न की कुंडली में शनि सप्तमेश होता है अब यहाँ देखिए कि सप्तमेश उच्च राशि का पराक्रम भाव में बैठा है जो कि यह दर्शाता है कि आपका जीवनसाथी मजबूत दिमाग या इरादों वाला होगा अगर यहाँ शनि वक्री हो जाए तो स्थिति और खराब हो जाएगी क्योंकि ऐसी स्थिति में जीवनसाथी को समझा पाना या उनके आगे अपनी बात अच्छे से रख पाना बहुत मुश्किल होता है क्योंकि आपका लग्न भी सिंह है तो समस्या आती ही है।

शनि का प्रथम भाव में फल भाग:- 1

यदि तीसरे भाव में शनि शुभ वर्ग का हो तो ऐसा व्यक्ति शास्त्रों को जानने वाला और अनुसंधानकर्ता होता है मतलब कि उसकी रुचि रिसर्च में होती है, यदि नीच राशि का शनि तीसरे भाव में हो जो कि कुंभ लग्न में ही संभव है तो व्यक्ति दूषित मन वाला होता है अब यहाँ देखिए कि लग्नेश ही नीच राशि का हो गया तो वह बुरे विचार व्यक्ति के मन में पहले लाता है हालांकि दो सौम्य ग्रह या शुभ ग्रह की दृष्टि शनि पर पड़ जाए तो काफी हद तक इससे छुटकारा मिल जाता है।

शनि का प्रथम भाव में फल भाग:-2

यदि नीच नवांश का शनि तीसरे भाव में हो तो ऐसा व्यक्ति अपनी बातों से लोगों को मूर्ख बनाता है, यदि वर्गोत्तम शनि तीसरे भाव में हो तो व्यक्ति अत्यधिक स्वाभिमानी होता है, यदि पाप वर्ग का शनि तीसरे भाव में हो व्यक्ति भाव रहित होता है अर्थात न काहु से दोस्ती, न काहु से वैर वाली स्थिति होती है जो कि शुभ है।

शनि का द्वितीय भाव में फल

यदि मित्र राशि का शनि तीसरे भाव में हो तो ऐसा व्यक्ति दूसरों को परामर्श देने वाला व न्यायवक्ता होता है, यदि मित्र नवांश का शनि तीसरे भाव में हो तो ऐसा व्यक्ति गुणवान व धनवान दोनों होता है।

शनि का तीसरे भाव में फल भाग:-1

यदि शत्रु राशि का शनि तीसरे भाव में हो तो ऐसे व्यक्ति को किसी न किसी प्रकार की लत अवश्य रहती है भले वो चाय की हो या नशे की या अन्य किसी प्रकार की हो, यदि शत्रु नवांश का शनि तीसरे भाव में हो तो ऐसा व्यक्ति दीनता का प्रदर्शन करने वाला होता है और स्वराशि का शनि व्यक्ति को शत्रुओ पर विजय दिलाने वाला होता है।

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शनि के तीसरे भाव में प्राप्त होने वाले यह फल मेरे अनुभव के आधार पर हैं जिनको कि मैंने आप सभी को समझाने का एक प्रयास किया है उम्मीद करता हूँ आप सभी को शनि के तीसरे भाव में मिलने वाले फल आप सभी को बिना कठिनाई के समझ में आए होंगे।

जय श्री राम।

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तीसरे भाव में स्थित शनि का फल

तीसरे भाव में स्थित शनि व्यक्ति को उद्धमी अर्थात मेहनती बनाता है साथ ही ऐसा व्यक्ति राजा या अपने अधिकारी का प्रिय होता है और ऐसे व्यक्ति को संतान कुछ विलंब से होती है चूँकि संतान विलंब से होने के लिए कुछ और भी योग जरूरी है जैसे कि पंचम भाव व पंचमाधिपति दोनों पर शनि की दृष्टि का होना अन्यथा शनि की तीसरी दृष्टि पंचम भाव पर इतनी अशुभ नही होती।

यदि तीसरे भाव में शनि यदि वर्गोत्तम स्थिति में हो तो ऐसा व्यक्ति बहुत अधिक स्वभाविमानी होता है ऐसा कश्यप ऋषि का मत है साथ ही यदि स्वराशि का शनि तीसरे भाव में (ऐसा तभी संभव है जब व्यक्ति का जन्म या तो धनु लग्न में हो या वृश्चिक लग्न में) कुंभ राशि (अर्थात धनु लग्न की कुंडली) का स्थित हो तो भावम-भावत नियम के अनुसार ऐसा व्यक्ति धनवान होता है और यदि मकर राशि (जो कि वृश्चिक लग्न की कुंडली में संभव है) का हो तो ऐसा व्यक्ति जन्मस्थान से दूर रहकर उन्नति प्राप्त करता है।

तीसरे भाव का शनि जीवन के उत्तरार्ध में उन्नति प्रदान करता है एक मजेदार बात बताता हूँ तीसरा भाव काम त्रिकोण का पहला भाव है जब भी शनि काम त्रिकोण (३,७,११) में बैठेगा तो वो आपके त्रिकोण भाव (१,५,९) में से दो त्रिकोण भाव को पकड़ लेगा, तीसरे भाव काम त्रिकोण में बैठा हुआ शनि व्यक्ति को अल्प भोजी अर्थात कम में संतुष्ट होने वाला बनाता है, तीसरे भाव में बैठा शनि व्यक्ति को तकनीकि क्षेत्र में रुचि देता है और उसमें सहजता से सफल बनाता है।

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तीसरे भाव का एक नाम सहज भाव भी है तीसरे भाव से शौक, छोटे भाई-बहन का भी विचार किया जाता है यदि पाप वर्ग का शनि तीसरे भाव में हो तो ऐसा व्यक्ति “न काहु से दोस्ती, न काहु से वैर” वाला होता है जो कि अच्छा है इसके अलावा तीसरे भाव का शनि जीवन के उत्तरार्ध में सफलता देता है क्योंकि वह आपके नवम भाव को देखता है जो कि यह दर्शाता है ऐसे व्यक्ति तत्काल उन्नति नही प्राप्त करते वो खुद के कर्म-अनुभव से सीख कर खुद का भाग्योदय करते हैं यदि यह भी कह दूँ तो गलत नही कि “तीसरे भाव का शनि राजा नही तो बजीर के level तक का काम कर जाएगा” तीसरे भाव में स्थित शनि व्यक्ति को आध्यात्मिक बनाता है ऐसे व्यक्ति की कुंडली में छोटे भाईयों से वैचारिक मतभेद के योग होते हैं।

पोस्ट की लंबाई को ध्यान में रखते हुए इसका दूसरा भाग जल्द ही प्रकाशित करूँगा।

जय श्री राम।

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दूसरे भाव में शनि का फल

कुंडली का दूसरा भाव वाणी, नेत्र, चेहरा, धन, परिवार/कुटुंब का भाव होता है ऐसी स्थिति में यदि शनि जैसा अलगाववादी ग्रह दूसरे भाव में बैठता है तो यह दर्शाता है कि ऐसे व्यक्ति की वाणी में सत्यता होगी और यदि शनि यदि अग्नि तत्व की राशि में स्थित हो तथा मंगल द्वारा देखा जाता हो तो ऐसी स्थिति में उस व्यक्ति की बोली हुई सत्य बात लोगों को कटु लगती है क्योंकि ऐसे व्यक्ति बोलते समय यह नही सोचते कि मेरे बोले गए वाक्य अर्थात शब्द का दूसरे लोगों पर क्या प्रभाव पड़ेगा, यदि आर्थिक स्थिति के बारे में बात करें तो दूसरे भाव पर बैठा शनि व्यक्ति को खुद की दरिद्रता से लड़ने पर मजबूर कर देता है कहने का आशय यह है कि दूसरा भाव धन का भाव है और दूसरे भाव पर बैठे शनि की दसवीं दृष्टि एकादश भाव पर जाती है जो कि आमदनी का भाव है अर्थात धन के दोनों भाव शनि के प्रभाव में आ जाते हैं और शनि का दूसरा नाम ही मंद है अर्थात ऐसे व्यक्ति जीवन की शुरुवात में कड़ा संघर्ष व उत्तरार्ध में अच्छी उन्नति करते हैं क्योंकि दूसरे भाव में बैठा शनि संकुचित मात्रा में धन देता है कहने का मतलब कि दूसरे भाव में बैठा शनि आपको उतना ही धन देता है जिससे आपका कार्य चलता रहे, दूसरे भाव पर बैठा शनि तकनीकि क्षेत्र से भी आमदनी कराता है।

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यदि परिवार के लिए बात की जाए तो फलदीपिका में लिखा हुआ है कि दूसरे भाव में बैठा शनि बचपन में दुःखी रखता है किंतु आगे का जीवन अच्छा होता है मेरा ऐसा अनुभव है कि यदि दूसरे भाव में शनि हो तो ऐसे व्यक्ति घर से दूर जाकर धनार्जन करते हैं कहने का आशय यह है कि ऐसे व्यक्ति बचपन में कड़ा संघर्ष करते हैं और जन्मस्थान या घर से दूर रहकर धनार्जन करते हैं साथ ही ऐसे व्यक्ति घर के निर्णयों में भाग नही ले पाते हैं कारण शनि दासता देता है साथ ही ऐसे व्यक्ति उस परिवार में रहते हैं जहाँ सदस्य कम हों अर्थात ऐसे व्यक्तियों के परिवार के सदस्यों की संख्या सीमित होती है, यदि दूसरे भाव में शनि पीड़ित अवस्था में हो तो अचानक धन हानि के योग बनते हैं, दूसरे भाव से नेत्रों का भी विचार किया है अतः दूसरे भाव में स्थित शनि नेत्र ज्योति को मंद करता है और यदि यही शनि पीड़ित अवस्था में हो तो नेत्रों की सर्जरी के भी योग बनते हैं।

यदि उच्च राशि का शनि दूसरे भाव में हो जो कि कन्या लग्न की कुंडली में ही संभव है तो ऐसा व्यक्ति आर्थिक स्थिति के मामले में भाग्यशाली होता है तथा बौद्धिक शक्ति द्वारा अच्छा धन अर्जित करता है साथ ही ऋषि कश्यप का मत है कि ऐसा व्यक्ति कुकर्म द्वारा धनार्जन करता है।

यदि उच्च नवांश का शनि दूसरे भाव में तो ऐसा व्यक्ति जोखिम भरे कार्यों से धनार्जन करता है ऋषि कश्यप ने भी यही कहा है कि ऐसा व्यक्ति कष्टपूर्वक कर्मों द्वारा धनार्जन करता है कहने का आशय यह है कि ऐसे व्यक्ति उन कार्यों द्वारा धनार्जन करते हैं जिस कार्य को करने में उनकी दिलचस्पी न हो या जोखिम हो।

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यदि शुभ वर्ग का शनि दूसरे भाव में तो ऐसे व्यक्ति व्यसनों से धन लाभ करते हैं कहने का आशय यह है कि आप कोई ऐसा कार्य करते हैं जिससे दूसरों को उस चीज की आदत लग जाती है, यदि नीच राशि का शनि दूसरे भाव में हो जो कि मीन लग्न की कुंडली में ही संभव है तो ऐसे व्यक्ति धन संचय नही कर पाते हैं ऋषि कश्यप के अनुसार ऐसे व्यक्ति दुःख देकर धनार्जन करते हैं कहने का आशय यह है कि ऐसे व्यक्ति कोई ऐसा कार्य करते हैं जिससे दूसरों को पीड़ा पहुँचे।

यदि नीच नवांश का शनि दूसरे भाव में हो तो ऐसे व्यक्ति निम्न वर्ग से धन की प्राप्ति करते हैं कहने का आशय यह है कि ऐसे व्यक्ति निम्न वर्ग के लोगों जो कि आर्थिक रूप से समृद्ध नही हैं उनके द्वारा या उनसे धनार्जन करते हैं।

यदि पाप वर्ग या शत्रु राशि का शनि दूसरे भाव में हो तो ऐसे व्यक्ति पाप कर्मों द्वारा धनार्जन करते हैं, यदि मित्र राशि का शनि दूसरे भाव में स्थित हो तो ऐसे व्यक्ति अस्थि आदि अर्थात फिजूल के वस्तुओं द्वारा धनार्जन करते हैं कहने का आशय यह है कि ऐसे व्यक्ति ऐसे कार्य (जैसे कबाड़ का काम या ऐसी वस्तु का विक्रय जो उनके काम की न हो किन्तु वही वस्तु दूसरे के काम की हो) कर के धनार्जन करते हैं।

यदि मित्र नवांश का शनि दूसरे भाव में हो तो ऐसे व्यक्ति मिट्टी से जुड़े कार्य उदहारण खेती, खनिज, पेट्रोलियम से जुड़े कार्य के द्वारा धनार्जन करते हैं, यदि वर्गोत्तम स्थिति का शनि दूसरे भाव में स्थित हो तो ऐसे व्यक्ति जलीय पदार्थों द्वारा धनार्जन करते हैं, यदि शत्रु नवांश का शनि दूसरे भाव में हो तो ऐसे व्यक्ति नौकरी से धनार्जन करते हैं।

यदि स्वराशि शनि दूसरे भाव में स्थित हो जो कि धनु लग्न या मकर लग्न की कुंडली में ही संभव है तो ऐसे व्यक्ति ठग कर धनार्जन करते हैं कहने का आशय यह है कि ऐसे व्यक्ति दूसरों को मूर्ख बनाकर धनार्जन करते हैं उदाहरण के तौर पर मार्केटिंग सबसे अच्छा है क्योंकि मार्केटिंग से जुड़ा व्यक्ति अपना कार्य निकालने हेतु हर तरह की विधि अपनाता है व दूसरों को मूर्ख बनाकर धन लाभ करता है।

धनु लग्न की कुंडली में दूसरे भाव में स्थित शनि अपने खुद के प्रयासों से धनार्जन कराता है और यदि मकर लग्न की कुंडली में दूसरे भाव में शनि स्थित है तो ऐसे व्यक्ति अच्छा धनार्जन करने के साथ-साथ अच्छा खर्च भी करते हैं किंतु यहाँ भी उनका धन फिजूल के खर्चों में व्यय नही होता क्योंकि दूसरे भाव में स्थित शनि व्यक्ति को थोड़ा कंजूस बनाता है।

जय श्री राम।

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लग्न में बैठे शनि का फल भाग:-2

पिछले लेख में मैंने लग्न में बैठे शनि के फल पर विस्तार से चर्चा करी थी उसी लेख को आगे बढ़ाते हुए मैं लग्न में बैठे शनि के फल को भाग:-2 में पूरा कर रहा हूँ:-

यदि लग्न में शनि उच्च राशि का हो जो कि तुला लग्न की कुंडली में ही संभव है तो बेहद शुभ होता है तुला लग्न की कुंडली में शनि चतुर्थेश और पंचमेश अर्थात केंद्र व त्रिकोण का स्वामी होकर राजयोगकारक हो जाता है ऐसी स्थिति में व्यक्ति श्याम वर्ण का होता है तथा उसे खुद के घर का सुख अवश्य ही प्राप्त होता है और ऐसे व्यक्तियों की संतान भी अच्छी उन्नति करती है साथ ही संतान की उन्नति में उक्त व्यक्ति का भागीदार भी काफी ज्यादा होता है।

यदि उच्च नवांश का शनि लग्न में हो तो ऐसे व्यक्ति का रंग बदलता रहता है कहने का तात्पर्य यह है कि ऐसा व्यक्ति चेहरे से कुछ और बाकी हिस्सों से कुछ रंग का होगा।

यदि शुभ वर्ग का शनि लग्न में हो तो ऐसे व्यक्ति की अस्थि सन्धियाँ क्षीण होती है अर्थात ऐसे व्यक्तियों को जोड़ों की समस्या रहती है।

यदि पाप वर्ग का शनि लग्न में हो तो ऐसे व्यक्तियों को पित्त रोग होता है कील-मुहांसे काफी होते हैं, यदि नीच राशि का शनि लग्न में हो तो जो कि मेष लग्न की कुंडली में ही सम्भव है तो ऐसे व्यक्ति संघर्ष बहुत करते हैं तथा ऐसे व्यक्ति मेहनती भी होते हैं, ऐसे व्यक्तियों को चक्कर आते हैं साथ ही इन्हें खाँसी की भी शिकायत होती है।

यदि नीच नवांश का शनि लग्न में हो तो ऐसे व्यक्तियों को कफ व वात रोग होता है।

यदि मित्र राशि का शनि लग्न में हो तो व्यक्ति गौरवर्ण का होता है अर्थात ऐसे व्यक्तियों का रंग साफ होता है, यदि मित्र नवांश का शनि लग्न में हो तो ऐसे व्यक्तियों को हड्डियों/अस्थियों में कोई रोग रहता है।

यदि शत्रु राशि का शनि लग्न में हो तो ऐसे व्यक्तियों के नाखून मोटे होते हैं जिसे सामुद्रिक शास्त्र में भी अच्छा नही कहा गया है, यदि शत्रु नवांश का शनि लग्न में हो तो ऐसे व्यक्तियों के दाँत बड़े होते हैं।

यदि वर्गोत्तम शनि लग्न में हो तो व्यक्ति पुष्ट व स्थूल शरीर का होता है।

यदि स्वराशि शनि लग्न में हो तो यह मकर व कुंभ लग्न में ही संभव हो तो ऐसे व्यक्तियों के घुटने लंबे होते हैं, मकर राशि का शनि यदि लग्न में हो तो ऐसे व्यक्ति अपनी सोच पर अडिग रहते हैं इन्हें समझा पाना मुश्किल होता है तथा इनकी आर्थिक स्थिति जीवन के उत्तरार्ध में काफी अच्छी होती है, यदि कुंभ राशि का शनि लग्न में हो तो ऐसे व्यक्ति ज्ञानी होते हैं तथा इनकी आर्थिक स्थिति में उतार-चढ़ाव बना रहता है।

मकर राशि का लग्नस्थ शनि आर्थिक दृष्टिकोण से अच्छा होता है तो कुंभ राशि का लग्नस्थ शनि बौद्धिक दृष्टिकोण से अच्छा होता है, स्वराशि का लग्नस्थ शनि व्यक्तियों को बचपन में व्यथित तो जीवन के उत्तरार्ध में अच्छी स्थिति में पहुँचाता है।

जय श्री राम।

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लग्न में बैठे शनि का फल भाग-1

समस्त नव ग्रहों में यदि कोई ग्रह है जो कि सबसे ज्यादा निंदा का पात्र बनता है तो वो बेचारा शनि ही है जब भी किसी की कुंडली में सबसे बुरे ग्रह के बारे में चर्चा करी जाए तो सबसे पहले लोग शनि को ही देखते हैं किंतु मेरा ऐसा मत व अनुभव है कि “लग्न में यदि तुला, धनु, मकर, कुंभ और मीन राशि का शनि हो तो वो बेहद शुभ फलदाई होता है” फलदीपिका व अन्य ग्रंथों ने भी शनि को इन राशियों पर लग्न में बैठे शनि के फल को बेहद शुभ बताया है तो आज मैं शनि के लग्न में बैठे शनि के फल पर विस्तार से चर्चा करता हूँ।

ज्योतिष में किसी भी ग्रह के फल को जानने के पूर्व उसके कारक तत्व के बारे में जानकारी होनी चाहिए जो कि मैं पहले की पोस्ट में बता चुका हूँ कि शनि विरक्ति, नीरसता का कारक होता है लग्न में बैठा शनि व्यक्ति को थोड़ा शर्मीला भी बनाता है ऐसे व्यक्ति अपने टैलेंट का सही तरह से इस्तेमाल नही करते, संकोच कर जाते हैं उदाहरण के तौर पर एक कक्षा में बैठा व्यक्ति जिसे सब कुछ आता है फिर भी वो अध्यापक के कहने पर जल्दी हाथ नही उठाता, शनि स्थायित्व अवश्य देता है ऐसे व्यक्ति अपने कर्तव्य को हमेशा पूरा करते हैं किंतु ऐसे व्यक्तियों की कुंडली में धोखा मिलने की भी संभावना अधिक हो जाती है साथ ही ऐसे व्यक्ति खुद से आगे बढ़कर अपना टैलेंट नही दिखाते इनको प्रेरित करना होता है।

बहुत से लोगों जिनकी कुंडली में लग्न में शनि स्थित हो उनके जीवनसाथी से मैंने सुना है ये अपने परिवार को तो छोड़िए दूसरों के लिए ही कर दें यही बहुत बड़ी बात है कहने का मतलब यह है कि इनको काम बता दीजिए तो बड़ी बखूबी से कर देते हैं लेकिन उम्मीद करिए कि खुद की इच्छा से करें तो इसकी संभावना कम ही है अर्थात ऐसे व्यक्ति निर्णय लेने में जल्दी participate नही लेते कारण शनि को दासत्व कहा गया है, दासता देता है।

शनि यदि धनु, कुंभ व मीन का हो तो व्यक्ति बहुत धार्मिक होते है और यही शनि यदि तुला या मिथुन का हो तो व्यक्ति को वायु जनित रोग देते हैं क्योंकि यह दोनों राशि ही वायु तत्व की है और शनि भी वायु तत्व प्रधान है ऐसे में जब वायु तत्व का ग्रह वायु तत्व की राशि में बैठता है तो वायु जनित रोग देता है ऐसे लोगों को उम्र बढ़ते-बढ़ते गठिया व जोड़ो के दर्द की शिकायत हो जाती है, लग्न में बैठा शनि व्यक्ति को मेहनती बनाता है, लोगों का कहना है कि शनि आलसी है जब कि मैं शनि को आलसी नही मानता क्योंकि एक होता है काम से जी चुराना तो एक होता है कि काम को perfection देना ऐसे व्यक्ति उस कार्य को perfection देने के चक्कर में अपना काफी समय देते हैं और जब कि बाकी लोग उस काम को कम की तरह ही जल्दी से खत्म कर देते हैं किन्तु ऐसा तभी संभव है जब शनि पीड़ित न हो, लग्न में बैठा शनि स्वास्थ के लिए उतना अच्छा नही होता यदि शनि की दृष्टि भी लग्न पर हो और सूर्य के साथ हो तो हम कह सकते हैं कि ऐसा शनि सेहत के लिए अच्छा नही है।

लग्न में बैठा शनि आपके तीसरे भाव को देखता है जो दर्शाता है कि ऐसा व्यक्ति जो ठान ले उसे पूरा कर के ही छोड़ता है और मेहनती होता है जैसा कि मैंने ऊपर भी लिखा इसकी सातवीं दृष्टि सप्तम भाव पर आती है जो यह बताता है कि ऐसे जातक का दाम्पत्य जीवन मिला-जुला रहता है किंतु यदि सप्तमेश भी शनि के प्रभाव में आ जाए तो यह स्थिति और खराब हो जाती है साथ ही सप्तम भाव मित्रता का भी है तो ऐसे व्यक्ति के मित्र सीमित संख्या में होते हैं और सप्तम भाव रोजगार का भी है तो नौकरी में विलंब से ही स्थायित्व मिलता है साथ ही शनि दशम भाव को भी देखेगा तो ऐसे व्यक्ति जीवन के उत्तरार्ध में सफलता को प्राप्त करते हैं कहने का आशय यह है कि जैसे-जैसे उनकी उम्र बढ़ती जाती है उनको सफलता मिलती जाती है साथ ही ऐसे व्यक्तियों का उनके पिता से वैचारिक मतभेद भी रहता है यह स्थिति तब और भी खराब हो जाती है जब शनि और सूर्य की युति या प्रत्युति हो, ऐसे व्यक्ति कुछ उस तरह से दान-पुण्य करते हैं कि किसी को पता भी नही चल पाता कि इन्होंने क्या दान किया है लग्न में बैठा शनि व्यक्ति को स्वाभिमानी भी बनाता है और क्षणिक क्रोध भी देता है।

यह पोस्ट अधिक लंबी न हो इसलिए इस पोस्ट को यहीं विराम देता हूँ समय मिलने पर इसका दूसरा भाग लिखूँगा जिसमें आप सभी को शनि की विभिन्न स्थितियों के अनुसार लग्न में स्थित होने का फल बतायूँगा।

जय श्री राम।

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शनि ग्रह से इतना क्यों डरते हैं लोग जानिए: शनि से जुड़ी संपूर्ण जानकारी

शनि ग्रह एक ऐसा ग्रह है जो पल भर में ही राजा को रंक और रंक को राजा बना देता है शनि न्याय प्रिय ग्रह है जो लोगों को उनके कर्मों के अनुसार फल देता है शनि ग्रह को अब तक के छोटे से जीवन में जितना मैंने जाना और समझा है उसे विस्तार से समझाते हुए बताने का एक प्रयास करता हूँ।

शनि का स्वरूप और गुणधर्म

शनि को काल पुरुष का दुःख कहा गया है, ग्रह परिषद में ये भृत्य अथवा सेवक है इसका रंग कृष्ण (काला) वर्ण है ब्रह्मा को शनि का देवता माना गया है शनि नपुंसक, वायुतत्व, शूद्रवर्ण तथा तमोगुणी है यह लंबा, दुबला, वातप्रकृति, पीली आंखें, कठोर केश तथा बड़े दाँत वाला और आलसी है इसकी धातु स्नायु, निवास कूड़ाघर (कबाड़खाना) तथा काल खंड 1 वर्ष है शनि को कसैला स्वाद पसंद है यह पश्चिम दिशा (सप्तम भाव) में दिगबली, रात्रिबली, कृष्ण पक्ष तथा जब सूर्य दक्षिणायन हो बली होता है, शनि कुत्सित कांटेदार या जहरीले वृक्ष, मैला तथा अनेक रंग के धब्बों से युक्त वस्त्र, शिशिर (शीतकाल/सर्दी) तथा लोहे धातु आदि का स्वामी है, शनि तुला के 20 अंश पर परमोच्च, कुंभ के 0 से 20 अंश तक मूलत्रिकोण तथा तदोपरांत 20 से 30 अंश तक स्वग्रही होता है मकर शनि की अन्य स्वराशि है, शनि के बुध व शुक्र मित्र, गुरु सम (न शत्रु न ही मित्र) तथा सूर्य, चन्द्र और मंगल शत्रु ग्रह होते हैं।

शनि: दुख, न्याय और कर्म का ग्रह

बड़ी अजीब सी बात है कि अनादिकाल से शनि को पापी दुःख, दोष व दारिद्र्य, विघ्न-बाधा और बिलंब तथा अंतहीन विपत्तियों का कारक माना गया है शायद इसका कारण बस इतना ही है कि शनि दुःख देने में उदार और सुख देने में कृपण है किंतु शनि नीति, न्याय व निष्पक्षता का कारक होता है कदाचित सुख-दुःख, यश-अपयश, धन-वैभव और सुख-सुविधाओं में भेद करना शनि को नही आता इसी कारण संसार में राजा भिकारी तो भिकारी राजा बनते देखे जाते हैं शनि दीन-दुःखी व अभावग्रस्त गरीबों का प्रतिनिधि है इसमें ब्रह्मा की सृजन शक्ति है सीमित संसाधन का प्रभावशाली उपयोग कर दुःखों को कम करने का प्रयास, कर्तव्यनिष्ठा, परस्पर सहयोग व अथक परिश्रम शनि के विशिष्ट गुण है कभी-कभी अनीति व अन्याय का प्रतिकार करने के लिए शनि “काम रोको, मजदूर हड़ताल व ताला बंदी” सरीखे उपायों का सहारा लेता है खाद्य वितरण प्रणाली, दिवालिया होना, अनियंत्रित खर्चे, उत्पादन में गिरावट, ऊर्जा संकट, वस्तु या सेवाओं का अभाव या अनुपलब्धि शनि का अधिकार क्षेत्र है।
शनि जीव की विकास यात्रा में बहुत लाभप्रद व उपयोगी होता है यह मनुष्य की अहंता, ममता व लौकिक सुख लिप्सा के प्रति आसक्ति या मोह का नाश कर अनासक्ति, उदासीनता और वैराग्य को पुष्ट करता है शनि श्रम का महत्व समझाकर धर्म व दर्शन के तत्व को जीवन में उतारने की प्रेरणा देता है इसका प्रभाव वृद्ध जन, कृषक तथा भूसंपदा के स्वामी, खदानों, धातु, कोयला, संगमरमर, सीसा, सीमेंट, तिल, मूंगफली, लोहा, जूट, जौं तथा तेल, जूता बनाने की फैक्ट्री, सरकारी इमारतें, जानवरों की खाल व चमड़े पर स्पष्ट दिखता है शनि अभाव का कारक होने से अकाल, अनावृष्टि, जमाखोरी के कारण बाजार से सामान गायब होना तथा महंगाई देता है साथ ही शनि गाड़ियों के हिस्से, कंप्रेसर, पंप सेट, स्टील के कारखाने, आरा मशीन तथा लोहे के सामान व औजारों का भी प्रमुख कारक होता है।

शनि के प्रमुख कारकतत्व:-

. आलस्य, . विघ्न-बाधा या रुकावट, . घोड़ा, . हाथी, . त्वचा/चमड़ी, . लाभ, . नियम व प्रमाण, . कष्ट/विपदा, . रोग, देह कष्ट, १०. भ्रम, ११. गलतफहमी, १२. दुःख/संताप, १३. मृत्यु, १४. स्त्री संबंधी सुख, १५. दासी/नौकरानी, १६. दुर्बल विकृत या पीड़ित अंग या अपंगता, १७. वन में भ्रमण या विचरण, १८. डरावना या भयावह चेहरा, १९. दान, २०. उपहार, २१. स्वामी/मालिक, २२. आयुष्य, २३. नपुंसक, २४. किन्नर, २५. निकृष्ट या हीन जाति में जन्मा बालक, २६. पक्षी, २७. परंपरा व धर्म विरोधी, २८. मिथ्याभाषण, २९. बल, पौरुष या स्वाभिमान की कमी, ३०. क्रोध की अधिकता, ३१. बुरे या दुष्ट विचार, ३२. पकरिश्रम, मेहनत, ३३. जारज पुत्र (जिसके पिता का ज्ञान न हो), ३४. लोहा या लोहे की वस्तुएं, ३५. काला चना या काले रंग के धान्य, ३६. शूद्र, ३७. कंबल, ३८. नागलोक, ३९. भ्रमण, पर्यटन, ४०. लड़ाई, संघर्ष, ४१. उत्तर-पूर्व दिशा का प्रेमी, ४२. माला, ४३. लकड़ी, ४४. ब्राह्मण, ४५. भद्दे या बिखरे हुए बाल, ४६. भैंस, बकरा, ४७. रति सुख लोभी, ४८. जीवन रक्षक या बलवर्धक दवाएं, ४९. पश्चिम दिशा में जिसे मुख करना प्रिय है, ५०. वैश्य।
शनि कुल १०० चीजों का कारक होता है पोस्ट की लंबाई को देखते हुए व समय की उपलब्धता और ज्यादा न हो पाने के कारण मैं शनि के ५० कारक तत्वों को ही लिख रहा हूँ।
विशेष:- उपचय भाव अर्थात 3, 6, 10 और 11 में स्थित शनि क्रमशः परिश्रम, रोग व ऋण से मुक्ति, परोपकार वाले सत्कर्म तथा प्रसिद्धि और यश दिया करता है।
जय श्री राम।