वरुथिनी एकादशी 13 अप्रैल 2026: व्रत कथा, महत्व और पूजा विधि के नियम
वरुथिनी एकादशी 13 अप्रैल 2026: 10,000 वर्षों की तपस्या और ‘कन्यादान’ का फल देती है यह एकादशी, जानें भविष्य पुराण का रहस्य
वैशाख मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी को ‘वरुथिनी एकादशी’ (Varuthini Ekadashi) कहा जाता है। संस्कृत भाषा में ‘वरुथिनी’ का अर्थ होता है—’रक्षा करने वाली’ या ‘कवच’। मान्यता है कि जो भी साधक इस एकादशी का व्रत पूर्ण श्रद्धा के साथ करता है, भगवान श्री हरि विष्णु हर संकट से उसकी रक्षा एक अभेद्य कवच की तरह करते हैं।
वर्ष 2026 में वरुथिनी एकादशी का पावन व्रत 13 अप्रैल, दिन सोमवार को रखा जाएगा। चूँकि, वैशाख मास स्वयं भगवान माधव (विष्णु) को अत्यंत प्रिय है, इसलिए इस महीने की एकादशी का फल करोड़ों गुना बढ़ जाता है।
Astrology Sutras के इस विशेष लेख में आज हम भविष्य पुराण के प्रामाणिक श्लोकों के साथ जानेंगे वरुथिनी एकादशी का असीमित महत्व, राजा मान्धाता की अद्भुत कथा, पूजा विधि और इस दिन के सबसे कठोर नियम।
✨ 1. भविष्य पुराण: ‘कन्यादान’ और 10,000 वर्ष की तपस्या का फल
भविष्य पुराण में भगवान श्री कृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को वरुथिनी एकादशी का महत्व समझाते हुए कहा है कि यह एकादशी सौभाग्य प्रदान करने वाली और जन्म-मरण के चक्र से मुक्त करने वाली है। इसके अतिरिक्त, जो फल सूर्य ग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में स्वर्ण दान (Gold Donation) करने से मिलता है, वही फल केवल इस एक एकादशी का व्रत करने से प्राप्त हो जाता है।
📖 भविष्य पुराण का अत्यंत सिद्ध श्लोक
“दशसहस्रवर्षाणि तपस्तप्यति यो नरः।
तत्फलं लभते सम्यग्वरुथिन्यामुपोषणात्॥”
हिंदी अर्थ: भगवान श्री कृष्ण कहते हैं— “जो मनुष्य जंगल में रहकर दस हज़ार (10,000) वर्षों तक कठोर तपस्या करता है, उस तपस्या का जो फल होता है, वही फल वरुथिनी एकादशी का विधिवत उपवास करने से मनुष्य को सहज ही प्राप्त हो जाता है।”
शास्त्रों में ‘कन्यादान’ (Kanyadaan) को सबसे बड़ा दान माना गया है। परंतु, भगवान कहते हैं कि वरुथिनी एकादशी का व्रत कन्यादान से भी अधिक पुण्यदायी है, क्योंकि यह सीधे मोक्ष (वैकुंठ) का मार्ग प्रशस्त करता है।
👑 2. वरुथिनी एकादशी की प्रामाणिक व्रत कथा (राजा मान्धाता)
प्राचीन काल में नर्मदा नदी के तट पर ‘मान्धाता’ नामक एक अत्यंत सत्यवादी और प्रतापी राजा राज्य करते थे। एक बार राजा जंगल में तपस्या कर रहे थे, तभी वहां एक जंगली भालू (Bear) आया और राजा का पैर चबाने लगा। राजा तपस्या में लीन थे, इसलिए उन्होंने क्रोध नहीं किया और न ही कोई शस्त्र उठाया।
भालू राजा को घसीटते हुए जंगल के अंदर ले गया। असहनीय पीड़ा होने पर राजा मान्धाता ने भगवान श्री हरि विष्णु को पुकारा। अपने भक्त की करुण पुकार सुनकर भगवान विष्णु ‘वराह’ रूप में प्रकट हुए और अपने चक्र से भालू का वध कर दिया। चूँकि राजा का पैर भालू खा चुका था, इसलिए भगवान ने उन्हें मथुरा जाकर ‘वरुथिनी एकादशी’ का व्रत करने का आदेश दिया।
भगवान की आज्ञा मानकर राजा ने मथुरा में वरुथिनी एकादशी का कठोर उपवास किया और भगवान वराह (विष्णु) की पूजा की। परिणामस्वरूप, इस एकादशी के प्रभाव से राजा मान्धाता को उनका पैर वापस मिल गया और उनका शरीर पहले से भी अधिक कांतिमय (चमकदार) हो गया।
🚫 3. दशमी से एकादशी तक के अत्यंत कठोर नियम (वर्जित कार्य)
वरुथिनी एकादशी का व्रत सामान्य व्रतों की तरह नहीं है। इसके नियम दशमी तिथि की रात से ही आरंभ हो जाते हैं। शास्त्रों के अनुसार इस दिन निम्नलिखित कार्यों से पूर्णतः बचना चाहिए:
- कांस्य पात्र का निषेध: दशमी और एकादशी के दिन कांसे (Bell-metal) के बर्तन में भोजन करना वर्जित है।
- मांस और मसूर दाल: दशमी तिथि से ही मांस, मदिरा, मसूर की दाल, कोदो और शहद (Honey) का सेवन पूर्णतः छोड़ देना चाहिए।
- दूसरे का अन्न: एकादशी के दिन किसी दूसरे के घर का अन्न (भोजन) ग्रहण नहीं करना चाहिए, इससे व्रत का पुण्य नष्ट हो जाता है।
- क्रोध और निंदा: एकादशी के दिन क्रोध करना, झूठ बोलना, पान खाना और किसी की चुगली (निंदा) करना महापाप माना गया है। इस दिन पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन अनिवार्य है।
🌸 4. भगवान मधुसूदन (विष्णु) की संपूर्ण पूजा विधि
वरुथिनी एकादशी पर भगवान श्री हरि विष्णु के ‘मधुसूदन’ और ‘वराह’ स्वरूप की पूजा की जाती है। पूजा की 100% शास्त्रोक्त विधि इस प्रकार है:
- प्रातः काल स्नान करके स्वच्छ पीले वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें।
- पूजा स्थल पर भगवान मधुसूदन (विष्णु) की प्रतिमा स्थापित करें और उन्हें तुलसी दल, पीले फूल और पंचामृत अर्पित करें।
- दिन भर निराहार (या फलाहार) रहें और ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का निरंतर जाप करते रहें।
- रात्रि के समय भगवान के समक्ष जागरण करें (सोएं नहीं)। अगले दिन द्वादशी को किसी ब्राह्मण को भोजन कराकर और दान-दक्षिणा देकर व्रत का पारण करें।
❓ वरुथिनी एकादशी से जुड़े मुख्य सवाल (FAQs)
Q 1. वरुथिनी एकादशी के व्रत में कौन से देवता की पूजा होती है?
उत्तर: इस एकादशी में भगवान श्री हरि विष्णु के ‘मधुसूदन’ और ‘वराह’ अवतार की विशेष रूप से पूजा की जाती है।
Q 2. यदि व्रत न कर पाएं, तो इस दिन क्या करना चाहिए?
उत्तर: यदि आप किसी कारणवश व्रत नहीं कर सकते, तो एकादशी के दिन पूर्ण सात्विक भोजन (बिना प्याज-लहसुन) ग्रहण करें, चावल न खाएं और भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप अवश्य करें।
Q 3. एकादशी के पारण (Parana) का क्या अर्थ है?
उत्तर: एकादशी का व्रत अगले दिन (द्वादशी तिथि) सूर्योदय के बाद तोड़ा जाता है। व्रत खोलने की इस शुभ प्रक्रिया को ही ‘पारण’ कहा जाता है। पारण हरि वासर (द्वादशी के पहले एक चौथाई भाग) में नहीं करना चाहिए।
निष्कर्ष: वरुथिनी एकादशी केवल एक उपवास नहीं, बल्कि हमारी आत्मा को पापों से मुक्त करने का एक परम पावन अवसर है। राजा मान्धाता की कथा यह प्रमाणित करती है कि भगवान विष्णु की शरण में जाने से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं और मनुष्य को परम सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।






