वराह पुराण का ब्रह्मज्ञान: धर्म, मोक्ष और चारों वर्णों का रहस्य (Varaha Purana)
सनातन धर्म के विशाल वाङ्मय में ‘वराह पुराण’ भगवान श्रीहरि की उपासना और धर्म के मर्म को समझाने वाला एक अद्वितीय ग्रन्थ है। सूतजी के मुखारविंद से निःसृत और साक्षात् भगवान नारायण द्वारा पृथ्वी देवी को दिया गया यह ज्ञान केवल पौराणिक कथा नहीं, बल्कि कलयुग में मोक्ष प्राप्ति का राजमार्ग है।
वराह पुराण के उन दुर्लभ सूत्रों का विश्लेषण करना आवश्यक है, जिनमें भगवान नारायण ने स्वयं बताया है कि विभिन्न वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) के लिए धर्म की परिभाषा क्या है और किस प्रकार एक जीवात्मा ‘द्वादशी व्रत’ के माध्यम से वैकुण्ठ का अधिकारी बन सकती है।
🙏 1. क्रिया नहीं, ‘भाव’ प्रधान है: श्रीहरि का मूल संदेश
भगवान नारायण पृथ्वी देवी से स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि धर्म का आधार बाह्य आडंबर नहीं, बल्कि ‘विशुद्ध श्रद्धा’ है।
“मैं श्रद्धारहित प्राणी के सैकड़ों यज्ञों और हजारों प्रकार के दान से संतुष्ट नहीं होता। यदि कोई भक्त धन से हीन भी हो, किन्तु श्रद्धापूर्वक मेरा स्मरण करता है, तो मैं उसके व्यवहार से सदा संतुष्ट रहता हूँ।”
विश्लेषण: यहाँ भगवान ने स्पष्ट कर दिया है कि ईश्वर को धन या यज्ञों की संख्या से नहीं खरीदा जा सकता। जो साधक आधी रात के समय (निशीथ काल में) एकाग्रचित्त होकर नारायण को नमन करता है, वह प्रभु को अत्यंत प्रिय है।
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🌌 2. मोक्ष का द्वार: द्वादशी व्रत और पूजन विधि
वराह पुराण में द्वादशी तिथि की महिमा का विशद वर्णन है। यह व्रत केवल उपवास नहीं, बल्कि साक्षात् नारायण दर्शन की कुंजी है।
साधना की विधि:
- उपवास: द्वादशी के दिन पूर्ण उपवास रखें।
- सूर्य अर्घ्य: हाथ में जल लेकर सूर्यदेव की ओर देखते हुए ‘ॐ नमो नारायणाय’ मंत्र का उच्चारण करें और जल की धारा गिराएं। (फल: जल की जितनी बूंदें गिरती हैं, साधक उतने ही हजार वर्षों तक स्वर्गलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है।)
- पुष्प अर्पण: श्वेत पुष्प और सुगन्धित धूप से प्रभु की अर्चना करें। मन्त्रोच्चारण के साथ प्रभु के शीश पर पुष्प अर्पित करते हुए यह भाव रखें कि व्यापक और अव्यक्त विष्णु मेरी गंध और भक्ति को स्वीकार करें।
सात्विक आहार और चतुर्व्यूह दर्शन: भगवान ने कुछ विशेष अन्नों को ‘परम पवित्र’ बताया है। जो भक्त साँवाँ, सत्तू, गेहूँ, मूँग, धान, यव, और कँगुनी का सेवन करते हैं, उन्हें भगवान के चतुर्व्यूह स्वरूप (शङ्ख, चक्र, हल और मूसल धारी) का दर्शन सुलभ हो जाता है।
⚠️ क्या आप जानते हैं?
द्वादशी का फल तभी मिलता है जब एकादशी का व्रत सही विधि से किया जाए। एकादशी के नियम और पारण का समय जानना बेहद जरुरी है।
जरूर पढ़ें: [एकादशी व्रत के नियम और महत्व]
⚖️ 3. वर्ण धर्म: चारों वर्णों के लिए कर्तव्य और मुक्ति का मार्ग
समाज की व्यवस्था और व्यक्तिगत उत्थान के लिए भगवान ने गुण और कर्म के आधार पर चारों वर्णों के लिए विशिष्ट धर्म निर्धारित किए हैं।
(क) ब्राह्मण का धर्म: त्याग और लोक-कल्याण
एक मोक्षकामी ब्राह्मण के लिए अहंकार का त्याग अनिवार्य है।
- कर्तव्य: अध्यापन आदि छह कर्मों में निरत रहना, इन्द्रिय संयम, और भिक्षावृत्ति से निर्वाह।
- विशेष गुण: चुगली (पिशुनता) से दूरी और ‘इष्टापूर्त कर्म’ (यज्ञ अनुष्ठान के साथ-साथ कुएं, तालाब, बगीचे लगवाना) करना।
- सिद्धांत: बालक, युवा और वृद्ध—सभी के प्रति समभाव रखना ही ब्राह्मण का आभूषण है।
(ख) क्षत्रिय का धर्म: शौर्य और विनय का संगम
मध्यम श्रेणी के क्षत्रिय के लिए भी मोक्ष का मार्ग खुला है, यदि वह इन गुणों को धारण करे:
- व्यवहार: युद्ध में कुशल किन्तु अहंकार शून्य। दान देने में शूरवीर।
- निषेध: विद्यागुरु से द्वेष न करना और निन्दित कर्मों से बचना।
- स्वभाव: कम बोलना (मितभाषी), दूसरों के गुणों का सम्मान करना और कृपणता (कंजूसी) से दूर रहना।
(ग) वैश्य का धर्म: पवित्र व्यापार और सेवा
वैश्य के लिए धन अर्जन मना नहीं है, किन्तु धन का लोभ मना है।
- जीवन शैली: धन के लाभ-हानि में समभाव रखना और मन में शांति बनाए रखना।
- आचरण: अपने सेवकों (कर्मचारियों) पर दया रखना और नित्य गुरु पूजा करना।
- रहस्य: जो वैश्य इन नियमों का पालन करता है, भगवान नारायण कहते हैं— “मैं उसके लिए कभी अदृश्य नहीं होता और हमारा साक्षात् सम्बन्ध स्थापित हो जाता है।”
(घ) शूद्र का धर्म: भक्ति की पराकाष्ठा
वराह पुराण शूद्र वर्ण की महिमा का गान करते हुए एक क्रांतिकारी सत्य उद्घाटित करता है।
- यदि कोई शूद्र दम्पति (स्त्री-पुरुष) रजोगुण और तमोगुण से मुक्त हैं, अहंकार रहित हैं, और अतिथियों की सेवा करते हैं, तो वे हजारों ऋषियों से भी श्रेष्ठ हैं।
- भगवान स्वयं कहते हैं— “मैं ऋषियों को छोड़कर ऐसे पवित्र हृदय वाले शूद्र भक्त पर रीझ जाता हूँ।”
👑 4. क्षत्रियों के लिए विशेष ‘राजयोग’ साधना
साधारण धर्म के अतिरिक्त, क्षत्रियों के लिए एक विशिष्ट ‘योग’ मार्ग का भी उपदेश दिया गया है, जो अत्यंत कठिन तपस्या के समान है।
- वैराग्य: लाभ-हानि, सुख-दुःख, शीत-उष्ण और स्वादिष्ट-अस्वादिष्ट भोजन में समान भाव रखना। यहाँ तक कि उत्तम सिद्धि की कामना भी त्याग देनी चाहिए।
- अनासक्ति: परिवार (पुत्र, पत्नी) को ईश्वर की सेवा का माध्यम मात्र समझना, उनमें आसक्त न होना।
- कठोर आहार तप: कभी कन्दमूल, कभी दूध, कभी केवल जल, तो कभी-कभी उपवास।
- समय सीमा: जो क्षत्रिय सात वर्षों तक इस कठोर नियम का पालन करता है, वह उस ‘योग’ का अधिकारी बनता है, जिसके दर्शन के लिए स्वयं योगी भी लालायित रहते हैं।
🌸 निष्कर्ष
वराह पुराण का यह पावन संवाद हमें सिखाता है कि वर्ण जन्म से अधिक ‘कर्म और स्वभाव’ की शुद्धि है। चाहे आप किसी भी कार्यक्षेत्र में हों, यदि आपके हृदय में नारायण के प्रति अनन्य प्रेम, अहंकार का अभाव और जगत के प्रति करुणा है, तो आप ही सच्चे अर्थों में ‘धर्मात्मा’ हैं।
प्रभु को न मन्त्र चाहिए, न तंत्र—उन्हें केवल भाव चाहिए।
।। ॐ नमो नारायणाय ।।
जय श्री राम।






