बसंत पंचमी, जिसे ‘श्री पंचमी’, ‘ज्ञान पंचमी’ या ‘ऋषि पंचमी’ भी कहा जाता है, भारतीय संस्कृति में एक विशेष स्थान रखती है। यह केवल ऋतु परिवर्तन का उत्सव नहीं, बल्कि अज्ञान के अंधकार को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश फैलाने का महापर्व है, इस वर्ष यह पावन पर्व 23 जनवरी को मनाया जाएगा।
पौराणिक कथा: माँ सरस्वती का अवतरण
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बसंत पंचमी के दिन ही माता सरस्वती का जन्म (प्राकट्य) हुआ था, इसके पीछे सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा से जुड़ी एक रोचक कथा है।
सृष्टि में मौन: जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की, तो उन्होंने देखा कि चारों ओर सन्नाटा है। पेड़-पौधे, जीव-जंतु सब मौन थे, इस निस्तब्धता को देखकर ब्रह्मा जी ने अपने कमंडल से जल छिड़का।
वीणावादिनी का प्रकट होना: जल कणों के पड़ते ही एक चतुर्भुजी देवी प्रकट हुईं, जिनके हाथों में वीणा, पुस्तक और माला थी। ब्रह्मा जी के अनुरोध पर जैसे ही देवी ने वीणा के तार छेड़े, समस्त संसार में ध्वनि का संचार हो गया। जलधारा कोलाहल करने लगी, हवा सरसराने लगी और जीवों को वाणी मिल गई।
नामकरण: चूँकि उन्होंने संसार को स्वर और वाणी (सरस + वती) प्रदान की, इसलिए उनका नाम ‘सरस्वती’ पड़ा। यही कारण है कि बसंत पंचमी के दिन विशेष रूप से विद्या, संगीत और कला की देवी की पूजा की जाती है।
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पीले रंग का गहरा धार्मिक रहस्य
बसंत पंचमी पर पीला रंग पहनने और उपयोग करने के पीछे केवल परंपरा नहीं, बल्कि गहरा धार्मिक व ज्योतिषीय महत्व भी हैं:
सात्त्विकता का प्रतीक: हिंदू धर्म में पीले रंग को ‘सत्त्व गुण’ (पवित्रता और सत्य) का प्रतीक माना जाता है, यह रंग मस्तिष्क को सक्रिय करता है और मन में अच्छे विचारों का संचार करता है।
माँ सरस्वती को पीला रंग अत्यंत प्रिय है, इसलिए उन्हें प्रसन्न करने के लिए पीलें वस्त्र, पीले फूल (जैसे गेंदा) और पीला चंदन अर्पित किया जाता है।
भगवान विष्णु और बृहस्पति: पीला रंग भगवान विष्णु को भी प्रिय है (उन्हें ‘पीतांबरधारी’ कहा जाता है)। ज्योतिष शास्त्र में पीला रंग देवगुरु बृहस्पति (Jupiter) का कारक है, जो ज्ञान और भाग्य के देवता हैं, अतः इस दिन पीला पहनने से कुंडली में गुरु ग्रह मजबूत होता है।
सौभाग्य का सूचक: भारतीय परंपरा में हल्दी और केसर को बेहद शुभ माना गया है। विवाह हो या पूजा, पीले रंग की उपस्थिति अनिवार्य है, बसंत पंचमी पर पीला पहनना आने वाले समय के लिए सुख-समृद्धि और सौभाग्य को आमंत्रित करना है।
सांस्कृतिक परंपराएँ और भोग
इस दिन केवल वस्त्र ही नहीं, बल्कि खान-पान में भी पीले रंग की प्रधानता होती है:
देवी का भोग: माँ सरस्वती को केसरिया भात (मीठे चावल), बेसन के लड्डू, बूंदी या राजभोग का नैवेद्य चढ़ाया जाता है।
अक्षरांभ संस्कार: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, बच्चों की शिक्षा प्रारंभ करने (अक्षर ज्ञान या पाटी पूजन) के लिए बसंत पंचमी का दिन सबसे शुभ माना जाता है। इसे ‘विद्यारंभ संस्कार’ भी कहते हैं।
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बसंत पंचमी केवल एक तिथि नहीं, बल्कि ज्ञान, भक्ति और प्रकृति के संगम का उत्सव है। जहाँ एक ओर हम पीले वस्त्र धारण कर प्रकृति के साथ एकाकार होते हैं, वहीं दूसरी ओर माँ सरस्वती की आराधना कर बुद्धि और विवेक का वरदान माँगते हैं।
जय श्री राम।
