नवरात्रि के 9 दिनों के सिद्ध देवी मंत्र, माता के 9 स्वरूप और उनके अचूक लाभ - Astrology Sutras

नवरात्रि के 9 दिनों के सिद्ध देवी मंत्र और उनके अचूक लाभ (शास्त्र प्रमाण सहित)

नवरात्रि में माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों के चमत्कारी मंत्र, श्लोक और जीवन में उनके अद्भुत प्रभाव

Astrology Sutras के सभी पाठकों को जय श्री राम! सनातन धर्म में नवरात्रि का पर्व शक्ति की उपासना का सबसे पवित्र और सिद्ध समय माना गया है। श्री मार्कण्डेय पुराण और श्री दुर्गा सप्तशती जैसे महान शास्त्रों में स्पष्ट उल्लेख है कि नवरात्रि के दौरान माता के नौ स्वरूपों की विशिष्ट मंत्रों के साथ आराधना करने से मनुष्य के जीवन की हर बाधा नष्ट हो जाती है।

आज हम आपको उन प्रामाणिक श्लोकों और मंत्रों के बारे में विस्तार से बता रहे हैं, जिनका जाप नवरात्रि के प्रत्येक दिन किया जाना चाहिए।

1. प्रथम दिन: माँ शैलपुत्री

नवरात्रि का पहला दिन पर्वतराज हिमालय की पुत्री माँ शैलपुत्री को समर्पित है। यह स्वरूप स्थिरता और दृढ़ता का प्रतीक है।

वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥

अर्थ: मैं अपने अभीष्ट लाभ की प्राप्ति के लिए मस्तक पर अर्धचंद्र धारण करने वाली, वृषभ (बैल) पर सवार और हाथ में त्रिशूल धारण करने वाली यशस्विनी माँ शैलपुत्री की वंदना करता हूँ।

प्रभाव: इस श्लोक के जाप से मूलाधार चक्र जाग्रत होता है। जीवन में आने वाली अस्थिरता दूर होती है और मानसिक शांति प्राप्त होती है。

2. द्वितीय दिन: माँ ब्रह्मचारिणी

दूसरा दिन माँ ब्रह्मचारिणी का है, जो तपस्या और वैराग्य की देवी हैं।

दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥

अर्थ: जिनके एक हाथ में अक्षमाला (रुद्राक्ष की माला) और दूसरे हाथ में कमंडल है, ऐसी सर्वोत्तम माँ ब्रह्मचारिणी मुझ पर प्रसन्न हों।

प्रभाव: विद्यार्थियों और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे जातकों के लिए यह अचूक है। इसके प्रभाव से एकाग्रता, संयम और ज्ञान में वृद्धि होती है。

3. तृतीय दिन: माँ चंद्रघंटा

तीसरे दिन माँ चंद्रघंटा की पूजा होती है। इनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र सुशोभित है।

पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥

अर्थ: जो श्रेष्ठ सिंह पर सवार हैं और अत्यंत क्रोधित मुद्रा में अनेक अस्त्र-शस्त्र धारण किए हुए हैं, वे माँ चंद्रघंटा मुझ पर अपनी कृपा करें।

प्रभाव: कुंडली में मंगल दोष या अकारण भय (Fear) होने पर इस मंत्र का जाप अद्भुत लाभ देता है। इससे साहस और पराक्रम की प्राप्ति होती है。

4. चतुर्थ दिन: माँ कूष्मांडा

ब्रह्मांड को उत्पन्न करने वाली माँ कूष्मांडा की पूजा चौथे दिन की जाती है।

सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे॥

अर्थ: जो अपने हाथों में मदिरा से भरा हुआ और रक्त से सना हुआ कलश धारण करती हैं, वे माँ कूष्मांडा मेरे लिए कल्याणकारी हों।

प्रभाव: यह स्वरूप सूर्य ग्रह का नियंत्रण करता है। स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याओं और रोगों के नाश के लिए इस मंत्र का प्रभाव स्वयं सिद्ध है。

5. पंचम दिन: माँ स्कंदमाता

भगवान कार्तिकेय (स्कंद) की माता होने के कारण इन्हें स्कंदमाता कहा जाता है।

सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥

अर्थ: जो सदैव सिंहासन पर विराजमान रहती हैं और जिनके दोनों हाथों में कमल पुष्प सुशोभित हैं, वे यशस्विनी माँ स्कंदमाता सदा शुभ फल प्रदान करें।

प्रभाव: संतान प्राप्ति की कामना रखने वाले दंपत्तियों के लिए यह श्लोक वरदान है। साथ ही, यह बुद्धि और विवेक को प्रखर करता है。

6. षष्ठम दिन: माँ कात्यायनी

महर्षि कात्यायन की पुत्री के रूप में प्रकट हुईं माँ कात्यायनी छठे दिन पूजी जाती हैं।

चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्याद् देवी दानवघातिनी॥

अर्थ: जिनके हाथों में चमकता हुआ चंद्रहास खड्ग है और जो श्रेष्ठ सिंह पर सवार हैं, वे दानवों का नाश करने वाली माँ कात्यायनी मेरा कल्याण करें।

प्रभाव: विवाह में आ रही अड़चनों (विशेषकर कन्याओं के विवाह में) को दूर करने के लिए बृहस्पति ग्रह को बल देने वाला यह श्लोक अत्यंत प्रभावशाली है。

7. सप्तम दिन: माँ कालरात्रि

अज्ञान और अंधकार का नाश करने वाली माँ कालरात्रि की पूजा सातवें दिन होती है।

एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी॥
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा।
वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी॥

अर्थ: खुले बालों वाली, गर्दभ (गधे) पर सवार, भयंकर रूप वाली और दुष्टों का नाश करने वाली माँ कालरात्रि हम सभी के भयों का अंत करें।

प्रभाव: शनि देव के दुष्प्रभावों, तंत्र-मंत्र की बाधाओं और गुप्त शत्रुओं के नाश के लिए यह सबसे उग्र और फलदायी प्रमाण है。

8. अष्टम दिन: माँ महागौरी

आठवें दिन माँ महागौरी की आराधना होती है, जो अत्यंत सौम्य और श्वेत वर्ण की हैं।

श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः।
महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा॥

अर्थ: श्वेत वृषभ पर सवार, श्वेत वस्त्र धारण करने वाली, अत्यंत पवित्र और भगवान शिव को आनंदित करने वाली माँ महागौरी मुझे शुभ फल दें।

प्रभाव: राहु ग्रह की शांति और दांपत्य जीवन में प्रेम व मिठास घोलने के लिए यह श्लोक रामबाण है। यह जीवन से सभी पापों को धो देता है。

9. नवम दिन: माँ सिद्धिदात्री

अंतिम दिन माँ सिद्धिदात्री का है, जो सभी प्रकार की सिद्धियाँ प्रदान करती हैं।

सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि।
सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी॥

अर्थ: सिद्धों, गंधर्वों, यक्षों, असुरों और देवताओं द्वारा भी सदा पूजित होने वाली, सिद्धियां प्रदान करने वाली माँ सिद्धिदात्री मुझ पर कृपा करें।

प्रभाव: केतु के बुरे प्रभावों को नष्ट करने और धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति के लिए यह श्लोक सर्वोच्च माना गया है。

Astrology Sutras का विशेष उपाय: नवरात्रि के इन नौ दिनों में यदि आप नियमित रूप से दुर्गा सप्तशती के सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ उपर्युक्त श्लोकों के साथ करते हैं, तो आपकी कुंडली के नौ ग्रह स्वतः ही शांत और अनुकूल हो जाते हैं।

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नवरात्रि मंत्रों से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: नवरात्रि के 9 दिनों के मंत्र क्या हैं?
उत्तर: नवरात्रि के 9 दिनों में माता के नौ स्वरूपों—शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री के विशिष्ट श्लोकों का जाप किया जाता है, जिनका विस्तृत वर्णन श्री दुर्गा सप्तशती में मिलता है।
प्रश्न 2: क्या बिना दीक्षा के दुर्गा सप्तशती के मंत्रों का जाप कर सकते हैं?
उत्तर: जी हाँ, पूर्ण श्रद्धा और पवित्रता के साथ कोई भी जातक माता के मंत्रों का जाप कर सकता है। शास्त्रों के अनुसार, सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ बिना किसी विशेष दीक्षा या उत्कीलन के भी त्वरित फल प्रदान करता है।
प्रश्न 3: नवरात्रि में मंत्र जाप का सबसे अच्छा समय क्या है?
उत्तर: शास्त्रों और निर्णय सिंधु के अनुसार, किसी भी मंत्र जाप या अनुष्ठान के लिए ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4:00 से 5:30 बजे तक) और गोधूलि वेला (संध्या काल) सबसे श्रेष्ठ और फलदायी माने गए हैं।
प्रश्न 4: क्या मासिक धर्म (Periods) में मानसिक जाप कर सकते हैं?
उत्तर: सनातन धर्म के शास्त्रों के अनुसार, सूतक-पातक या मासिक धर्म की अवस्था में मूर्ति स्पर्श और पूजा-पाठ वर्जित है, परंतु इष्ट देवता या माता का मानसिक जाप (मन ही मन मंत्र जपना) हर अवस्था में किया जा सकता है।