नवरात्रि 9 दिन की ही क्यों होती है? जानें शरीर विज्ञान, 9 चक्र और नवदुर्गा का अद्भुत गणित
नवरात्रि 9 दिन की ही क्यों होती है? 8 या 10 दिन की क्यों नहीं? (जानें इसका वैज्ञानिक और गुप्त रहस्य)
क्या आपने कभी सोचा है? भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म में ‘नवरात्रि’ केवल एक पर्व नहीं, बल्कि शक्ति की उपासना का एक संपूर्ण विज्ञान है। अक्सर मन में यह प्रश्न उठता है कि यह 9 दिन ही क्यों होती है, 8 या 10 दिन क्यों नहीं?
अधिकतर लोग इसे केवल एक धार्मिक मान्यता समझते हैं। लेकिन सत्य यह है कि सनातन धर्म में कुछ भी बिना तर्क के नहीं होता। वेदों, उपनिषदों और पुराणों के आलोक में इसके पीछे अत्यंत गूढ़ गणितीय, आध्यात्मिक और खगोलीय कारण विद्यमान हैं।
Astrology Sutras के इस विशेष लेख में आइए इस विषय पर एक विस्तृत और शास्त्र-सम्मत विश्लेषण करते हैं:-
1. वैदिक और पौराणिक पृष्ठभूमि: अंक ‘9’ की पूर्णता
सनातन शास्त्र ‘9’ के अंक को ‘पूर्ण अंक’ मानते हैं। गणितीय दृष्टि से भी 9 के बाद अंक पुनः शून्य से शुरू होकर पुनरावृत्ति करते हैं।
श्रीमद्देवीभागवत पुराण के अनुसार, प्रकृति स्वयं नौ रूपों में अभिव्यक्त होती है। देवी भागवत के तृतीय स्कंध में उल्लेख है:-
“शरत्काले महापूजा क्रियते या च वार्षिकी। तस्यां ममैतन्माहात्म्यं श्रुत्वा भक्तिसमन्वितः॥”
यहाँ स्पष्ट है कि देवी ने स्वयं शरद ऋतु की इस महापूजा (नवरात्रि) का विधान किया है। नौ की संख्या ‘नवाक्षर मंत्र’ (ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे) से भी जुड़ी है, जिसमें प्रत्येक अक्षर प्रकृति के एक विशिष्ट तत्व को जाग्रत करता है।
2. नवधा प्रकृति और शरीर का विज्ञान
उपनिषदों, विशेषकर ‘सौभाग्यलक्ष्मी उपनिषद’ और ‘भावनोपनिषद’ में मानव शरीर को नौ द्वारों वाला दुर्ग (पुर) कहा गया है:-
- दो आँखें, दो कान, दो नासिका छिद्र, एक मुख, और दो उत्सर्जन अंग।
इन नौ द्वारों की शुद्धि के लिए नौ दिनों का तप आवश्यक है। यदि यह 8 दिन होता, तो एक केंद्र अशुद्ध रह जाता, और 10 दिन होने पर अतिरेक हो जाता। नवरात्रि का प्रत्येक दिन शरीर के एक विशिष्ट चक्र और ऊर्जा केंद्र को समर्पित है।
3. खगोलीय और ऋतु परिवर्तन का संधि काल
वेद और ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, नवरात्रि ‘ऋतु संधि’ के समय आती है। जब सूर्य एक राशि से दूसरी महत्वपूर्ण स्थिति में जाता है और प्रकृति में बड़ा बदलाव होता है (जैसे शीत से ग्रीष्म और ग्रीष्म से शीत), तब रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) कम होती है।
अथर्ववेद के अनुसार, काल के नौ विभाग होते हैं। इन नौ दिनों में ब्रह्मांडीय ऊर्जा (Cosmic Energy) पृथ्वी के सबसे निकट होती है। मार्कण्डेय पुराण के ‘देवी महात्म्य’ में बताया गया है कि महिषासुर से युद्ध नौ दिनों तक चला था और दसवें दिन विजय प्राप्त हुई थी। यह नौ दिन संघर्ष (तप) के हैं और दसवां दिन ‘फल’ (विजयादशमी) का है।
🚩 विशेष पठन: नवरात्रि के इन 9 दिनों में शक्ति उपासना का सबसे बड़ा माध्यम ‘दुर्गा सप्तशती’ है। क्या आप जानते हैं कि यह केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि कलयुग में हर मनोकामना पूरी करने वाला कल्पवृक्ष है?
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4. नवदुर्गा: चेतना के नौ स्तर
मार्कण्डेय पुराण के ‘कवच’ पाठ में प्रथम श्लोक ही नौ दिनों की महत्ता सिद्ध करता है:-
“प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी। तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्॥
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च। सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति च अष्टमम्॥
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः॥”
यदि हम इसे 8 दिन करते हैं, तो ‘सिद्धिदात्री’ (जो पूर्णता का प्रतीक हैं) छूट जाती हैं। यदि 10 दिन करते हैं, तो वह ‘प्रकृति’ की सीमा लांघकर ‘पुरुष’ (शिव) के तत्व में प्रवेश कर जाता है, जबकि नवरात्रि विशुद्ध रूप से ‘शक्ति’ की आराधना है।
⚠️ ज्योतिषीय सावधानी: नवरात्रि ऊर्जा और शक्ति के संचय का पर्व है, और ज्योतिष में ऊर्जा, रक्त व क्रोध का स्वामी ‘मंगल’ (Mars) होता है। यदि कुंडली में मंगल बिगड़ा हो, तो जीवन में भारी क्लेश और दुर्घटनाएं होती हैं।
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5. गणितीय और आध्यात्मिक तर्क (The Logic of 9)
अंक शास्त्र (Numerology) में 9 को ‘अविनाशी’ माना जाता है। 9 को किसी भी संख्या से गुणा करें, उसका योग सदैव 9 ही आता है (जैसे 9×2=18, 1+8=9)। यह दर्शाता है कि शक्ति पूर्ण है, न उसे घटाया जा सकता है न बढ़ाया।
6. 10वां दिन क्यों नहीं?
अक्सर जिज्ञासा होती है कि दसवें दिन पूजा क्यों समाप्त हो जाती है? दशम अंक ‘शून्य’ और ‘एक’ का मिश्रण है, जो अद्वैत की स्थिति है। नवरात्रि ‘द्वैत’ (भक्त और भगवान) से शुरू होकर साधना के माध्यम से ‘अद्वैत’ तक पहुँचने की यात्रा है। 9 दिनों तक हम माया (शक्ति) की साधना करते हैं, और 10वें दिन हम उस शक्ति के वास्तविक स्वरूप (ब्रह्म) को पहचान लेते हैं, जिसे विजयादशमी कहते हैं।
“या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥”
यह श्लोक सिद्ध करता है कि 9 रात्रियों में हम देवी के उन नौ रूपों को अपने भीतर जगाते हैं जो तामस, राजस और सात्विक गुणों के संतुलन के लिए अनिवार्य हैं।
❓ Google पर सबसे ज्यादा पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ – शास्त्र सम्मत उत्तर)
प्रश्न 1: वर्ष में नवरात्रि कितनी बार आती है?
उत्तर: श्रीमद्देवीभागवत पुराण के अनुसार, 1 वर्ष में कुल 4 बार नवरात्रि आती है— 2 प्रत्यक्ष (चैत्र और शारदीय) और 2 गुप्त (माघ और आषाढ़)।
प्रमाण: “चैत्राश्विने मासि तथा नवरात्रमुपोष्य च।” (गृहस्थों के लिए चैत्र और आश्विन मास की नवरात्रि विशेष फलदायी है)।
प्रश्न 2: नौवें दिन ही कन्या पूजन क्यों किया जाता है?
उत्तर: नौवां दिन माँ ‘सिद्धिदात्री’ का है, जो सभी सिद्धियों को देने वाली हैं। शास्त्र कहते हैं: “सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः”, अर्थात् यह अंतिम स्वरूप है। 2 से 10 वर्ष तक की कन्याओं को साक्षात प्रकृति का निर्मल स्वरूप माना गया है। उन्हें भोजन कराने से 9 दिनों के तप की पूर्णता और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
प्रश्न 3: नवरात्रि में लहसुन-प्याज खाना वर्जित क्यों है?
उत्तर: गीता (अध्याय 17) के अनुसार आहार तीन प्रकार के होते हैं— सात्विक, राजसिक और तामसिक। लहसुन और प्याज ‘तामसिक’ आहार हैं।
प्रमाण: “यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्” (अर्थात जो दुर्गंधयुक्त और तामसिक है, वह साधना भंग करता है)। नवरात्रि ऊर्जा संचय का पर्व है, तामसिक भोजन आलस्य और क्रोध बढ़ाकर साधना (तप) को नष्ट कर देता है।
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सनातन धर्म केवल मान्यताओं का नहीं, बल्कि पूर्ण विज्ञान का नाम है। इस लेख में आपने नवरात्रि के जिस 9 दिन के गणितीय और खगोलीय सत्य को समझा, वह हमारे शास्त्रों के अनंत ज्ञान की केवल एक झलक है।
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🎯 निष्कर्ष
शास्त्रों के अनुसार नवरात्रि का 9 दिन का होना कोई संयोग नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित वैज्ञानिक ढांचा है। 8 दिन की साधना अधूरी रह जाती क्योंकि वह ‘अष्टधा प्रकृति’ तक ही सीमित रहती, और 10वें दिन तक पहुँचते ही वह साधना ‘सिद्धि’ में बदल जाती है। अतः ‘9’ वह संख्या है जो प्रयास और गंतव्य के बीच का उच्चतम बिंदु है।
यह कालखंड ब्रह्मांड की ऊर्जा को संचित करने, इंद्रियों को वश में करने और आत्मा को परमात्मा के समीप ले जाने का ‘परम अवसर’ है।
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जय माता दी🙏






