लोहड़ी पर्व में अग्नि में क्यों डालते हैं “रेवड़ी-फुल्ले”? जाने: लोहड़ी पर नवान्न भोग का महत्व
लोहड़ी पर अग्नि में “रेवड़ी-फुल्ले” (तिल, गुड़ और मक्का) डालने की परंपरा केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि इसके पीछे गहरा आध्यात्मिक और पौराणिक महत्व है सनातन संस्कृति में अग्नि को देवताओं और मनुष्यों के बीच का माध्यम माना गया है।
अग्नि: देवताओं का मुख (हव्यवाहन)
सनातन धर्म और वेदों के अनुसार, अग्नि देव को ‘हव्यवाहन’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है- हवि (भोग) को देवताओं तक पहुँचाने वाला, मान्यता: लोहड़ी की पवित्र अग्नि में हम जो भी सामग्री (रेवड़ी, मूंगफली, फुल्ले) “स्वाहा” कहकर डालते हैं, वह सीधे देवताओं (विशेषकर सूर्य देव और अग्नि देव) को प्राप्त होती है यह रस्म ईश्वर के प्रति कृतज्ञता को प्रकट करने का तरीका है कि उनकी कृपा से फसल अच्छी हुई और घर में अन्न-धन की वर्षा हुई।
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‘नवान्न’ का भोग (नई फसल का स्वागत)
लोहड़ी मुख्य रूप से एक कृषि पर्व है इस समय खेतों में रबी की फसल (जैसे गेहूँ, सरसों, चना) लहलहाने लगती है और मक्का, तिल व गन्ने की कटाई हो चुकी होती है जिस कारण से नए अन्न का ईश्वर को भोग अर्पित किया जाता है।
रेवड़ी और फुल्ले ही क्यों?
रेवड़ी (तिल और गुड़) और फुल्ले (मक्का) इसी मौसम की नई उपज हैं और भारतीय संस्कृति में नियम है कि घर में आया नया अन्न सबसे पहले देवताओं एवं अग्नि को समर्पित किया जाता है, उसके बाद ही स्वयं ग्रहण किया जाता है इसे ‘नवान्न यज्ञ’ का एक लोक-स्वरूप माना जा सकता है।
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शब्द का रहस्य: तिल + रोड़ी = लोहड़ी
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, ‘लोहड़ी’ शब्द की उत्पत्ति भी इन्हीं सामग्रियों से हुई है: तिल + रोड़ी = तिलोड़ी, समय के साथ यह शब्द ‘तिलोड़ी’ से बदलकर ‘लोहड़ी’ हो गया अतः इस त्यौहार का मूल नाम ही उन वस्तुओं पर आधारित है जो अग्नि को समर्पित की जाती हैं।
पौराणिक कथा: माता सती का त्याग
एक पौराणिक मान्यता के अनुसार, यह अग्नि माता सती की याद में भी प्रज्वलित की जाती है मान्यता है कि राजा दक्ष ने जब महायज्ञ किया और भगवान शिव का अपमान किया था, तब माता सती ने योगाग्नि से स्वयं को भस्म कर लिया था, लोक मान्यताओं में लोहड़ी की अग्नि उसी त्याग और देवी शक्ति का प्रतीक मानी जाती है, इसलिए इसमें आहुति देकर सुख-समृद्धि की कामना की जाती है।
अग्नि में “रेवड़ी-फुल्ले” डालना और “आदर आए, दलिदर जाए” (अर्थात सम्मान आए और दरिद्रता जाए) कहना, वास्तव में सूर्य और अग्नि देव से आने वाले वर्ष के लिए समृद्धि का वरदान माँगने की एक वैदिक प्रक्रिया है।
जय श्री राम।






