सोलह सोमवार व्रत-कथा और उद्यापन विधि
सोलह सोमवार व्रत भगवान शिव व माँ गौरी की कृपा प्राप्त करने का मुख्य व्रत है जिससे जीवन में सुख-शांति, आर्थिक समृद्धि, वैवाहिक खुशहाली और सुयोग्य जीवनसाथी की प्राप्ति होती है विशेषकर अविवाहित कन्याएं मनचाहे वर की प्राप्ति के लिए और विवाहित महिलाएं अपने दाम्पत्य जीवन में मधुरता तथा पति की लंबी आयु के लिए इस व्रत का पालन करती हैं ज्योतिर्विद पूषार्क जेतली जी के अनुसार इस व्रत को श्रावण मास से प्रारंभ करना उत्तम रहता है।
व्रत विधि
श्रावण माह की प्रतिपदा तिथि के दिन स्नानादि कर के शिव जी व माँ गौरी के समक्ष एक घी का दीपक अर्पित कर शिवलिंग पर जल, दूध और पंचामृत से स्नान करवा कर भोग अर्पित करना चाहिए और हाथ में जल लेकर अपना नाम, गोत्र, व्रत उद्देश्य बोलकर सोलह सोमवार व्रत का संकल्प लेना चाहिए और नित्य शिव जी व माँ गौरी की पूजा करनी चाहिए तथा प्रथम सोमवार से 16 सोमवार का व्रत आरंभ करना चाहिए जो कि 4 माह तक चलता है।
सोलह सोमवार व्रत पौराणिक कथा
एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, एक ब्राह्मण ने सोलह सोमवार के व्रत का पालन किया तो उसे देवी पार्वती की कृपा प्राप्त हुई और उसके घर सुंदर पुत्र का जन्म हुआ, पुत्र ने भी यही व्रत किया और उसे राजगद्दी मिली और इसके बाद राजा ने अपनी रानी के साथ नियमित रूप से यह व्रत किया एक दिन रानी ने आलस्यवश मंदिर नहीं जाकर पूजा सामग्री नौकर के हाथ भेज दी, जिससे राजा को आकाशवाणी हुई कि या तो रानी को त्याग दें या तुम्हारा सर्वनाश हो जाएगा इस आकाशवाणी से चिंतित होकर राजा ने रानी को महल से निकाल दिया जिस कारण से रानी अनेक वर्षों तक भटकती रही और उसने सोलह सोमवार व्रत पूर्ण निष्ठा से किया जिससे उसके सत्कर्मों को देखकर भगवान शिव की कृपा हुई और रानी को सभी सुख पुनः प्राप्त हुआ।
सोलह सोमवार व्रत उद्यापन विधि
16 सोमवार व्रत पूर्ण हो जाने के बाद 17 वें सोमवार के दिन सुबह स्नानादि कर भगवान शिव व माँ गौरी की पूजा करनी चाहिए तथा “ॐ रुद्राय नमः” मंत्र का जप करना चाहिए साथ ही शिव जी का रुद्राभिषेक व ब्राह्मण को भोजनादि दान करना चाहिए।






